Category: Court Cases

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  • सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद बोरिवली में बीएमसी की कार्रवाई, 27 दुकानें हटाईं

    सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद बोरिवली में बीएमसी की कार्रवाई, 27 दुकानें हटाईं

    बोरिवली पूर्व में बेस्ट बस स्थानक के लिए आरक्षित 3,400 वर्ग मीटर जमीन से बीएमसी ने 27 व्यावसायिक दुकानें हटाईं। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद हुई कार्रवाई।

    मुंबई: बोरिवली पूर्व में बेस्ट बस स्थानक के लिए आरक्षित जमीन से बीएमसी ने 27 व्यावसायिक दुकानें हटा दी हैं। बुधवार, 4 नवंबर को स्वामी विवेकानंद मार्ग पर हुई इस कार्रवाई के लिए 70 कर्मचारियों की टीम तैनात की गई थी। यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के एक दिन बाद हुई, जिसने बीएमसी आयुक्त अश्विनी भिड़े के नवंबर महीने के वेतन पर रोक लगाने का आदेश दिया था।

    यह भूखंड करीब 3,400 वर्ग मीटर का है और बेस्ट बस स्थानक के लिए आरक्षित है। जमीन पर अतिक्रमण के कारण बस स्थानक से जुड़ी परियोजना लंबे समय से प्रभावित थी। बीएमसी के आर मध्य विभाग ने अभियान चलाकर यहां बने व्यावसायिक गालों को हटाया।

    सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद तेज हुई कार्रवाई

    इस जमीन को लेकर लंबे समय से कानूनी विवाद चल रहा है। मामला वर्ष 1986 से जुड़ा है। 13 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने विकासक को करीब 3,400 वर्ग मीटर जमीन और प्रशासनिक इमारत खाली करके बीएमसी को सौंपने का निर्देश दिया था। अदालत ने बीएमसी को परियोजना अपने हाथ में लेकर आगे का काम पूरा करने और जमीन का कब्जा मिलने के तीन महीने के भीतर बस स्थानक चालू करने का निर्देश भी दिया था।

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    इसके बावजूद जमीन से अतिक्रमण हटाने और परियोजना को आगे बढ़ाने में देरी हुई। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने 3 नवंबर 2026 को सख्त रुख अपनाया। अदालत ने बीएमसी आयुक्त अश्विनी भिड़े को कारण बताओ नोटिस जारी किया और नवंबर महीने का वेतन रोकने का आदेश दिया। इसके साथ ही बीएमसी पर 5 लाख रुपये का खर्च भी लगाया गया।

    अदालत की इस कार्रवाई के अगले ही दिन बोरिवली पूर्व में अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाया गया।

    70 कर्मचारियों और मशीनों की मदद से हटाए गए गाले

    बीएमसी के आर मध्य विभाग की ओर से चलाए गए इस अभियान में अभियंताओं सहित करीब 70 मजदूर और कर्मचारी शामिल थे। कार्रवाई के दौरान दो जेसीबी मशीनों और चार डंपरों की मदद से व्यावसायिक गालों को हटाया गया। किसी तरह की कानून-व्यवस्था की समस्या न हो, इसके लिए मौके पर पुलिस बंदोबस्त भी तैनात किया गया था।

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    यह भूखंड स्वामी विवेकानंद मार्ग पर स्थित है। इसका सर्वेक्षण विवरण भूखंड क्रमांक 7 बी, नगर भूमापन क्रमांक 15 और नगर रचना योजना-2 है। जमीन को बेस्ट बस स्थानक के लिए आरक्षित रखा गया है।

    बस स्थानक शुरू होने से यात्रियों को मिल सकती है राहत

    अतिक्रमण हटने से बेस्ट बस स्थानक परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए जमीन उपलब्ध कराने का रास्ता साफ हुआ है। बोरिवली पूर्व के यात्रियों के लिए यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस जमीन का इस्तेमाल सार्वजनिक परिवहन की सुविधा विकसित करने के लिए किया जाना है।

    हालांकि, केवल अतिक्रमण हटने से बस स्थानक तुरंत शुरू नहीं होगा। इसके लिए निर्माण कार्य, जरूरी सुविधाओं और प्रशासनिक प्रक्रिया को पूरा करना होगा। बस स्थानक कब तक तैयार होगा, यहां से कितनी बसें चलेंगी और किन मार्गों पर सेवा उपलब्ध होगी, इसकी समयसीमा अभी स्पष्ट नहीं है।

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    दुकानदारों पर भी पड़ा कार्रवाई का असर

    इस कार्रवाई से जमीन पर चल रहे 27 व्यावसायिक प्रतिष्ठान प्रभावित हुए हैं। दुकानदारों के पुनर्वास, वैकल्पिक जगह या मुआवजे के संबंध में कोई स्पष्ट आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

    फिलहाल बीएमसी ने अतिक्रमण हटाने का अभियान पूरा कर लिया है। अब इस जमीन पर बेस्ट बस स्थानक की परियोजना को किस समयसीमा में आगे बढ़ाया जाता है, इस पर यात्रियों और स्थानीय लोगों की नजर रहेगी।

  • कांदिवली भूखंड मामला: 21 साल बाद म्हाडा को कब्जा देने का आदेश

    कांदिवली भूखंड मामला: 21 साल बाद म्हाडा को कब्जा देने का आदेश

    कांदिवली के चारकोप में 2005 से लंबित भूखंड कब्जे के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने म्हाडा को चार सप्ताह में कब्जा सौंपने का आदेश दिया।

    मुंबई: कांदिवली पश्चिम के चारकोप में आवंटित भूखंड का कब्जा पाने के लिए 21 साल से इंतजार कर रहे आवंटी को बॉम्बे हाईकोर्ट ने बड़ी राहत दी है। हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र गृहनिर्माण व क्षेत्र विकास प्राधिकरण (म्हाडा) को भूखंड का वास्तविक कब्जा चार सप्ताह के भीतर सौंपने का निर्देश दिया है। अदालत ने इतने लंबे समय तक संपत्ति के कब्जे से वंचित रखने को न्याय का मजाक बताते हुए प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की।

    न्यायमूर्ति मकरंद कर्णिक और न्यायमूर्ति संदेश पाटील की खंडपीठ ने राजेश तानाजी बचाव की रिट याचिका क्रमांक 2283/2021 पर 26 अक्टूबर 2026 को यह फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि म्हाडा द्वारा निष्पादित पंजीकृत लीज डीड को किसी सक्षम न्यायालय ने रद्द नहीं किया है। ऐसे में आवंटी को भूखंड का कब्जा देने से रोकने का उचित आधार नहीं बनता।

    2005 में लीज डीड, लेकिन नहीं मिला भूखंड का कब्जा

    यह मामला कांदिवली पश्चिम के चारकोप स्थित आरएससी-11 इलाके के भूखंड क्रमांक 100 से जुड़ा है। इसका क्षेत्रफल 76.75 वर्ग मीटर है। म्हाडा ने खुले भूखंडों के आवंटन के लिए विज्ञापन जारी किया था, जिसके बाद राजेश तानाजी बचाव ने आवेदन किया और उन्हें यह भूखंड आवंटित हुआ।

    आवंटन के बाद निर्धारित प्रीमियम और लीज किराये की रकम स्वीकार कर म्हाडा ने 27 अक्टूबर 2005 को उनके पक्ष में पंजीकृत लीज डीड निष्पादित की। इसके बावजूद उन्हें भूखंड का वास्तविक और भौतिक कब्जा नहीं मिला।

    कब्जा पाने के लिए लगातार प्रयास करने और संबंधित प्राधिकरणों से पत्राचार करने के बाद भी समस्या का समाधान नहीं हुआ। आखिरकार राजेश बचाव ने 2021 में बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    CRZ का हवाला देकर म्हाडा ने रोका था कब्जा

    हाईकोर्ट में म्हाडा की ओर से दलील दी गई कि संबंधित भूखंड समुद्र तटीय नियमन क्षेत्र (CRZ) में आता है। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े पुराने न्यायिक आदेशों के कारण वहां विकास कार्य करना संभव नहीं है। इसलिए भूखंड का कब्जा सौंपने में कानूनी अड़चन है।

    म्हाडा ने यह भी दावा किया कि मूल आवंटी ने भूखंड किसी तीसरे व्यक्ति को हस्तांतरित कर दिया है। इस आधार पर भी याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाया गया।

    हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में म्हाडा का 4 अगस्त 2021 का एक पत्र पेश किया गया। इस पत्र में प्राधिकरण ने संबंधित भूखंड को CRZ प्रभावित क्षेत्र में नहीं आने की बात कही थी। इससे म्हाडा की बाद की दलील पर सवाल खड़ा हुआ।

    अदालत ने क्यों खारिज की म्हाडा की दलील?

    खंडपीठ ने पाया कि 27 अक्टूबर 2005 को निष्पादित पंजीकृत लीज डीड को किसी सक्षम न्यायालय ने रद्द या अवैध घोषित नहीं किया है। म्हाडा भी इस दस्तावेज के निष्पादन से इनकार नहीं कर रहा था।

    अदालत ने यह भी पाया कि भूखंड को किसी तीसरे व्यक्ति को हस्तांतरित किए जाने के दावे के समर्थन में म्हाडा के पास कोई ठोस दस्तावेज नहीं था। केवल इस तरह की आपत्ति के आधार पर आवंटी को लंबे समय तक कब्जे से वंचित रखना उचित नहीं है।

    खंडपीठ ने कहा कि यदि भविष्य में तीसरे पक्ष को हस्तांतरण से संबंधित ठोस प्रमाण सामने आते हैं, तो म्हाडा कानून के अनुसार उचित कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र रहेगा।

    चारकोप में मैंग्रोव और पर्यावरणीय प्रतिबंधों का पुराना विवाद

    चारकोप का यह मामला मुंबई में म्हाडा की पुरानी भूखंड आवंटन योजनाओं और मैंग्रोव संरक्षण से जुड़े कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि में भी महत्वपूर्ण है।

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने 6 अक्टूबर 2005 को मैंग्रोव क्षेत्रों के आसपास 50 मीटर के बफर क्षेत्र में निर्माण गतिविधियों पर अंतरिम रोक लगाई थी। इसके बाद 29 जुलाई 2015 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने बॉम्बे एनवायरनमेंट एक्शन ग्रुप बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले में म्हाडा की विभिन्न भूखंड योजनाओं और पर्यावरणीय प्रतिबंधों पर विचार किया था।

    इसके बाद 25 फरवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश में भी चारकोप स्थित म्हाडा लेआउट के संबंध में यथास्थिति बनाए रखने का उल्लेख आया था। इसी पर्यावरणीय पृष्ठभूमि का हवाला म्हाडा ने मौजूदा मामले में दिया।

    हालांकि, मौजूदा याचिका में हाईकोर्ट ने यह तय नहीं किया कि संबंधित भूखंड CRZ बफर क्षेत्र में आता है या नहीं। अदालत ने केवल भूखंड के कब्जे से जुड़े विवाद पर फैसला दिया है।

    कब्जा देने का आदेश, लेकिन निर्माण की अनुमति नहीं

    इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भूखंड का कब्जा सौंपने और उस पर निर्माण करने की अनुमति को अदालत ने अलग-अलग विषय माना है।

    खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि इस याचिका में भूखंड पर निर्माण की अनुमति का प्रश्न तय नहीं किया जा रहा है। साथ ही, CRZ बफर क्षेत्र से जुड़े विवाद पर भी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया गया है।

    इसका मतलब है कि राजेश बचाव को भूखंड का कब्जा मिलने के बाद भी निर्माण के लिए लागू पर्यावरणीय नियमों और संबंधित प्राधिकरणों की आवश्यक अनुमतियों का पालन करना होगा।

    म्हाडा को चार सप्ताह में कब्जा सौंपने का निर्देश

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए म्हाडा को भूखंड क्रमांक 100 का वास्तविक कब्जा सौंपने का आदेश दिया। इसके लिए आदेश की प्रति प्रतिवादी क्रमांक 1 के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की तारीख से चार सप्ताह की समयसीमा निर्धारित की गई है।

    फैसला सुनाए जाने के बाद म्हाडा के वकील ने आदेश पर रोक लगाने की मांग भी की, लेकिन खंडपीठ ने इसे स्वीकार नहीं किया।

    यह फैसला उन नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण है जिन्हें सरकारी प्राधिकरण से भूखंड का आवंटन और पंजीकृत लीज डीड मिलने के बावजूद वास्तविक कब्जा नहीं मिल पाया है। हालांकि, प्रत्येक मामले में आवंटन की शर्तें, पर्यावरणीय स्थिति और संबंधित कानूनी आदेश अलग हो सकते हैं।

    3 नवंबर 2026 तक इस भूखंड का वास्तविक कब्जा सौंपे जाने की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। फिलहाल हाईकोर्ट का आदेश म्हाडा को निर्धारित समयसीमा में कब्जा देने का निर्देश देता है।

  • मुंबई हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: अवैध गिरफ्तारी पर ₹5 लाख मुआवजा, पुलिस अधिकारी पर कार्रवाई के निर्देश

    मुंबई हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: अवैध गिरफ्तारी पर ₹5 लाख मुआवजा, पुलिस अधिकारी पर कार्रवाई के निर्देश

    बॉम्बे हाई कोर्ट ने बिपिन अग्रवाल की 2017 की गिरफ्तारी अवैध घोषित की। महाराष्ट्र सरकार को ₹5 लाख मुआवजा देने और पुलिस अधिकारी पर कार्रवाई के निर्देश दिए।

    मुंबई: बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2017 में बिपिन सतीश चंद्र अग्रवाल की गिरफ्तारी को गैरकानूनी घोषित करते हुए महाराष्ट्र सरकार को ₹5 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया है। 22 अक्टूबर 2026 को दिए गए इस फैसले में अदालत ने संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने और रिमांड मंजूर करने वाले मजिस्ट्रेट की भूमिका को प्रशासनिक स्तर पर जांच के लिए भेजने का निर्देश दिया।

    न्यायमूर्ति ए. एस. गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की खंडपीठ ने Criminal Writ Petition No. 4458 of 2017 में यह फैसला सुनाया। अदालत के मुताबिक, अग्रवाल को छह दिन पुलिस हिरासत और 20 दिन न्यायिक हिरासत में रहना पड़ा था।

    क्या है पूरा मामला?

    बिपिन अग्रवाल मुंबई के अंधेरी ईस्ट स्थित The New Aarti Co-operative Housing Society के पुनर्विकास से जुड़े मामले में शामिल थे। वह अपनी करीब 70 साल की सास आसावरी कुलकर्णी के पावर ऑफ अटॉर्नी धारक थे और सोसायटी के फ्लैट के पुनर्विकास को लेकर डेवलपर के साथ बातचीत कर रहे थे।

    अदालत के सामने आए रिकॉर्ड के मुताबिक, फ्लैट के सौदे के लिए करीब ₹1.64 करोड़ की रकम पर बातचीत चल रही थी। इसी दौरान डेवलपर की ओर से ₹2 लाख अग्रिम दिए गए। इसके बाद पुलिस मौके पर पहुंची और अग्रवाल को हिरासत में ले लिया गया। मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 384 के तहत जबरन वसूली की FIR दर्ज की गई थी।

    अग्रवाल ने अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की। इसमें गिरफ्तारी की वैधता, पुलिस की कार्रवाई और मजिस्ट्रेट द्वारा रिमांड मंजूर करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए।

    हाई कोर्ट ने गिरफ्तारी को गैरकानूनी क्यों माना?

    अदालत ने पुलिस रिकॉर्ड और संबंधित दस्तावेजों की जांच में कई गंभीर विसंगतियां पाईं। FIR दर्ज होने और गिरफ्तारी के समय को लेकर विरोधाभास सामने आए। रिकॉर्ड से संकेत मिला कि गिरफ्तारी FIR दर्ज होने से पहले हुई थी।

    अरेस्ट मेमो में भी तारीख बदलने से संबंधित विसंगतियां थीं। दस्तावेज में 5 अगस्त 2017 की तारीख को कई जगह बदलकर 4 अगस्त किया गया था।

    पुलिस की ओर से 23 जून 2017 की एक कथित शिकायत का उल्लेख किया गया, लेकिन संबंधित स्टेशन डायरी और RTI के तहत मिले जवाब में उस शिकायत के प्राप्त होने का स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं मिला। चार्जशीट के साथ शिकायत की प्रति संलग्न होने को लेकर भी विरोधाभास सामने आए।

    अदालत ने इन तथ्यों को समग्र रूप से देखते हुए गिरफ्तारी को गैरकानूनी और दुर्भावनापूर्ण माना।

    गिरफ्तारी से पहले नोटिस देने के नियम का पालन नहीं हुआ

    इस मामले में उस समय लागू दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 41A भी अहम थी। यह प्रावधान कुछ परिस्थितियों में गिरफ्तारी के बजाय पुलिस के सामने उपस्थित होने का नोटिस देने से जुड़ा था।

    हाई कोर्ट ने पाया कि संबंधित नोटिस गिरफ्तारी के बाद दिया गया था और अग्रवाल को उसका पालन करने का वास्तविक अवसर दिए जाने का रिकॉर्ड नहीं था। अदालत को ऐसा पर्याप्त आधार भी नहीं मिला जिससे साबित हो कि जांच के लिए उनकी गिरफ्तारी जरूरी थी।

    कानून के मुताबिक, केवल FIR दर्ज होने से हर मामले में गिरफ्तारी जरूरी नहीं हो जाती। पुलिस को संबंधित कानूनी शर्तों और गिरफ्तारी की आवश्यकता पर विचार करना होता है।

    26 दिन हिरासत में रहे, फिर मिली जमानत

    अग्रवाल को 4 अगस्त 2017 को गिरफ्तार किया गया था। वह छह दिन पुलिस हिरासत और 20 दिन न्यायिक हिरासत में रहे। 28 अगस्त 2017 को सेशंस कोर्ट ने उन्हें ₹25,000 के बॉन्ड पर जमानत दी थी।

    हाई कोर्ट ने रिमांड की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। अदालत के अनुसार, हिरासत बढ़ाने के आदेशों में जरूरी कारणों और स्वतंत्र न्यायिक विचार का पर्याप्त उल्लेख नहीं था।

    रिमांड मंजूर करना केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं है। मजिस्ट्रेट को रिकॉर्ड और हिरासत की आवश्यकता पर स्वतंत्र रूप से विचार करना होता है।

    फॉरेंसिक वॉइस सैंपल की जांच पर भी सवाल

    हाई कोर्ट ने वॉइस सैंपल की जांच से जुड़े रिकॉर्ड पर भी ध्यान दिया। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 18 अक्टूबर 2017 को वॉइस सैंपल भेजने, उसका विश्लेषण करने, रिपोर्ट तैयार करने और पुलिस स्टेशन में वापस प्राप्त होने की प्रक्रिया एक ही दिन में पूरी होने पर अदालत ने सवाल उठाए।

    रिपोर्ट को चार्जशीट के साथ संलग्न नहीं किए जाने और पहले के न्यायालयीन निर्देशों के पालन पर भी टिप्पणी की गई। अदालत ने इन तथ्यों को मामले में जांच और दस्तावेजों की विश्वसनीयता से जुड़े सवालों के संदर्भ में देखा।

    महाराष्ट्र सरकार को ₹5 लाख देने का निर्देश

    हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को अग्रवाल को ₹5 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया। भुगतान की समय-सीमा फैसले को हाई कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड किए जाने की तारीख से दो सप्ताह थी।

    अदालत ने माना कि गैरकानूनी गिरफ्तारी से अग्रवाल को आर्थिक नुकसान हुआ और उनकी प्रतिष्ठा तथा व्यावसायिक विश्वसनीयता को भी गंभीर क्षति पहुंची।

    यह राशि इस खास मामले के तथ्यों और अदालत के आदेश के आधार पर तय की गई है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर अवैध गिरफ्तारी के मामले में अपने आप ₹5 लाख मुआवजा मिलता है। दूसरे मामलों में राहत और उसकी राशि संबंधित तथ्यों तथा कानूनी आधार पर निर्भर करेगी।

    पुलिस अधिकारी और मजिस्ट्रेट की भूमिका पर निर्देश

    अदालत ने संबंधित पुलिस उपनिरीक्षक और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया। आदेश में तत्काल निलंबन सहित उचित विभागीय कार्रवाई का उल्लेख है।

    राज्य सरकार को यह भी अनुमति दी गई कि वह उचित समझने पर मुआवजे की राशि जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से आनुपातिक रूप से वसूलने पर विचार कर सकती है। हालांकि, यह निर्देश अपने आप वसूली पूरी हो जाने का प्रमाण नहीं है।

    मजिस्ट्रेट की भूमिका के संबंध में हाई कोर्ट ने संबंधित रिमांड और जमानत आदेशों को प्रशासनिक समिति के सामने रखने का निर्देश दिया। यह किसी मजिस्ट्रेट के खिलाफ अंतिम अनुशासनात्मक सजा घोषित करने के बराबर नहीं है।

    मामले में डेवलपर और पुलिस अधिकारी की कथित मिलीभगत को लेकर भी अदालत ने गंभीर निष्कर्ष दर्ज किए। हालांकि, इस आदेश को डेवलपर के खिलाफ किसी अलग आपराधिक मामले में दोषसिद्धि के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।

    अवैध गिरफ्तारी के मामले में नागरिक क्या कर सकते हैं?

    अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि उसकी गिरफ्तारी गैरकानूनी तरीके से हुई है, तो वह मामले के तथ्यों के अनुसार वकील से सलाह लेकर उचित कानूनी उपाय अपना सकता है।

    ऐसी स्थिति में FIR, अरेस्ट मेमो, पुलिस नोटिस, रिमांड आदेश, जमानत आदेश और संबंधित अन्य दस्तावेज सुरक्षित रखना उपयोगी हो सकता है। गिरफ्तारी का कारण और कानूनी आधार समझना भी जरूरी है।

    संविधान का अनुच्छेद 21 व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है, जबकि अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी के बाद कुछ महत्वपूर्ण संवैधानिक संरक्षण देता है। हालांकि, किसी खास मामले में कौन-सा कानूनी उपाय उपलब्ध है, यह उसके तथ्यों और लागू कानून पर निर्भर करेगा।

    पुराने और वर्तमान कानून में क्या अंतर है?

    2017 की गिरफ्तारी पर उस समय लागू CrPC के प्रावधानों की जांच की गई थी। 1 जुलाई 2024 से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 लागू हुई, जिसने सामान्य आपराधिक प्रक्रिया में CrPC की जगह ली।

    वर्तमान कानून में BNSS की धारा 35 गिरफ्तारी और कुछ परिस्थितियों में नोटिस देने से संबंधित है, जबकि धारा 187 जांच के दौरान रिमांड और हिरासत की प्रक्रिया से जुड़ी है। इस पुराने मामले का मूल्यांकन उस समय लागू कानून के आधार पर किया जाना चाहिए।

    गिरफ्तारी की आवश्यकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों में Arnesh Kumar v. State of Bihar (2014), Joginder Kumar v. State of Uttar Pradesh (1994), D.K. Basu v. State of West Bengal (1997) और Satender Kumar Antil v. CBI (2022) शामिल हैं। इन फैसलों में गिरफ्तारी की कानूनी शर्तों, हिरासत के दौरान अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा से जुड़े सिद्धांत स्पष्ट किए गए हैं।

    अब आगे क्या होगा?

    26 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी में ₹5 लाख का भुगतान हो जाने, संबंधित पुलिस अधिकारी के निलंबन या प्रशासनिक समिति के अंतिम निर्णय की स्वतंत्र पुष्टि नहीं मिली है। इसलिए इन कार्रवाइयों की वास्तविक स्थिति को अदालत के निर्देशों से अलग समझना जरूरी है।

    इस फैसले का महत्व केवल मुआवजे तक सीमित नहीं है। यह गिरफ्तारी की कानूनी प्रक्रिया, पुलिस रिकॉर्ड की विश्वसनीयता और रिमांड मंजूर करते समय न्यायिक स्वतंत्र विचार की जिम्मेदारी को भी सामने लाता है।

    मूल न्यायनिर्णय: बॉम्बे हाई कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट

    कानूनी संदर्भ: India Code — भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023

    यह खबर कानूनी जनजागरूकता के उद्देश्य से है। किसी व्यक्तिगत मामले में कानूनी कार्रवाई करने से पहले मूल न्यायनिर्णय और लागू कानून का पूरा पाठ देखना चाहिए।

  • मुंबई: दिंडोशी कोर्ट से हत्या के प्रयास का आरोपी फरार, पुलिस की तलाश जारी

    मुंबई: दिंडोशी कोर्ट से हत्या के प्रयास का आरोपी फरार, पुलिस की तलाश जारी

    मुंबई के दिंडोशी कोर्ट में पेशी के बाद इब्राहिम साजिद मुजावर पुलिस हिरासत से फरार हो गया। कुरार पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज, तलाश जारी।

    मुंबई: गोरेगांव पूर्व के दिंडोशी कोर्ट में पेशी के बाद हत्या के प्रयास के मामले में आरोपी इब्राहिम साजिद मुजावर पुलिस हिरासत से फरार हो गया। 23 अक्टूबर 2026 को हुई इस घटना के बाद कुरार पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज की गई है। आरोपी ने कथित तौर पर पुलिसकर्मी को धक्का दिया, सड़क पार की और ऑटो-रिक्शा से मौके से भाग निकला। पुलिस उसकी तलाश कर रही थी।

    आर्थर रोड जेल से कोर्ट में पेशी के लिए लाया गया था आरोपी

    इब्राहिम साजिद मुजावर को हत्या के प्रयास के एक मामले में आरोपी बनाया गया है। यह मामला अंबोली पुलिस स्टेशन से संबंधित बताया गया है। 23 अक्टूबर को उसे आर्थर रोड जेल से जरूरी वारंट के साथ मुंबई के दिंडोशी कोर्ट में पेश करने के लिए लाया गया था।

    आरोपी को पश्चिमी उपनगर स्थित दिंडोशी कोर्ट के कोर्ट नंबर 10 में पेश किया जाना था, जहां संबंधित आपराधिक मामले की सुनवाई होनी थी। दोपहर करीब 2 बजे उसकी पेशी हुई।

    शाम 4:15 बजे पुलिस हिरासत से भागा

    कोर्ट की कार्यवाही पूरी होने के बाद आरोपी को वापस जेल ले जाने की तैयारी की जा रही थी। इसी दौरान शाम करीब 4:15 बजे वह पुलिस की हिरासत से फरार हो गया।

    पुलिसकर्मी माने के बयान के मुताबिक, आरोपी पुलिस वाहन के पास खड़ा था। तभी उसने अचानक पुलिसकर्मी को धक्का दिया और उसकी हिरासत से निकलकर सड़क पार कर गया। पुलिसकर्मी ने उसे पकड़ने के लिए पीछा करने की कोशिश की, लेकिन आरोपी ऑटो-रिक्शा में बैठकर वहां से निकल गया।

    घटना के बाद पुलिस के सामने फरार आरोपी का पता लगाने और उसे दोबारा गिरफ्तार करने की चुनौती खड़ी हो गई।

    कुरार पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज

    इस घटना को लेकर मलाड पूर्व के कुरार पुलिस स्टेशन में इब्राहिम साजिद मुजावर के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। आरोपी की फरारी के संबंध में पुलिसकर्मी के बयान को मामले का अहम हिस्सा माना जा रहा है।

    CCTV फुटेज और पुलिस की कार्रवाई पर नजर

    घटना के बाद आरोपी किस रास्ते से गया, ऑटो-रिक्शा की पहचान हुई या नहीं और आसपास लगे CCTV कैमरों से क्या जानकारी मिली, इन सवालों का स्पष्ट जवाब अभी सामने नहीं आया है। पुलिस की तलाश के दौरान इन पहलुओं की जांच महत्वपूर्ण रहेगी।

    साथ ही, यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि आरोपी को वापस ले जाने के दौरान कितने पुलिसकर्मी तैनात थे और क्या इस घटना के संबंध में किसी विभागीय जांच या कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं।

    आरोपी की गिरफ्तारी पर अभी स्पष्ट अपडेट नहीं

    आज की ताजा जानकारी के अनुसार, पुलिस इब्राहिम साजिद मुजावर की तलाश कर रही है। उसकी गिरफ्तारी, फरारी में किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका और मूल हत्या के प्रयास के मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई को लेकर कोई नया अपडेट नहीं है।

    फिलहाल, इस घटना में सबसे अहम सवाल आरोपी की गिरफ्तारी और फरारी के पूरे घटनाक्रम की जांच का है। पुलिस की आगे की कार्रवाई और आधिकारिक अपडेट से ही साफ हो सकेगा कि आरोपी को कब पकड़ा गया और अदालत परिसर से फरार होने के मामले में आगे क्या कदम उठाए गए।

  • मुंबई में BEST बस हादसे में छात्रा की मौत, मां को ₹31.08 लाख मुआवजा

    मुंबई में BEST बस हादसे में छात्रा की मौत, मां को ₹31.08 लाख मुआवजा

    मुंबई के मलाड में BEST बस हादसे में Farheen Rizwi Khan की मौत पर MACT ने मां को ₹31.08 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया। जानें गणना और केस की स्थिति।

    मुंबई: मलाड वेस्ट में BEST बस की टक्कर से 20 वर्षीय बायोटेक्नोलॉजी छात्रा Farheen Rizwi Khan की मौत के मामले में मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT) ने उनकी मां को ₹31,08,700 मुआवजा देने का आदेश दिया है। 9 अक्टूबर 2026 को दिए गए फैसले में ट्रिब्यूनल ने छात्रा की औपचारिक आय का पर्याप्त प्रमाण नहीं होने के बावजूद उनकी शिक्षा, शैक्षणिक प्रदर्शन और भविष्य में कमाई की क्षमता को ध्यान में रखते हुए ₹20,000 मासिक अनुमानित आय तय की।

    आदेश में 7.5% सालाना ब्याज और भुगतान की समयसीमा से संबंधित निर्देश भी दिए गए हैं। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मुआवजे की गणना में छात्रा की तत्काल कमाई के साथ भविष्य की संभावित आय को भी शामिल किया गया।

    मालवणी डिपो के पास कैसे हुआ था हादसा?

    यह दुर्घटना 16 सितंबर 2023 को सुबह करीब 7 बजे मलाड वेस्ट में मालवणी डिपो के पास हुई थी। Farheen उस समय पैदल जा रही थीं, जब BEST बस की टक्कर से उनकी मौत हो गई। हादसे में शामिल बस का रजिस्ट्रेशन नंबर MH-01-LA-6908 बताया गया है।

    BEST ने चालक की लापरवाही के आरोपों से इनकार करते हुए कहा था कि एक ऑटो-रिक्शा के कारण चालक का ध्यान भटका था। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने चालक की सफाई को पर्याप्त नहीं माना। चालक यह संतोषजनक ढंग से नहीं समझा सका कि मोड़ लेते समय Farheen बस के नीचे कैसे आ गईं। अधिकरण ने केवल बस की धीमी गति को सावधानी बरतने का पर्याप्त प्रमाण नहीं माना और मृतका को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराने वाली BEST की दलील खारिज कर दी।

    छात्रा की कमाई को लेकर मां ने क्या बताया?

    Farheen बायोटेक्नोलॉजी की पढ़ाई कर रही थीं और एक NGO की स्कूल में पढ़ाने का काम भी करती थीं। उनकी मां ने शुरुआत में बताया था कि बेटी हर महीने ₹7,000 कमाती थी। बाद में उन्होंने ट्रिब्यूनल को बताया कि Farheen की मासिक आय ₹15,000 थी और पोस्टग्रेजुएशन पूरा करने के बाद उनकी कमाई ₹30,000 प्रति माह तक पहुंच सकती थी।

    आय का पूरा औपचारिक प्रमाण उपलब्ध नहीं होने के बावजूद ट्रिब्यूनल ने उनकी उम्र, शैक्षणिक योग्यता और पढ़ाई में प्रदर्शन को ध्यान में रखते हुए ₹20,000 मासिक अनुमानित आय निर्धारित की।

    ₹31.08 लाख मुआवजे की गणना कैसे हुई?

    ट्रिब्यूनल ने Farheen की अनुमानित मासिक आय ₹20,000 मानकर सालाना आय ₹2.40 लाख निकाली। इसमें भविष्य की संभावनाओं के लिए 40% यानी ₹96,000 जोड़े गए। इस तरह सालाना आय ₹3.36 लाख हुई।

    इसके बाद व्यक्तिगत खर्च के लिए 50% राशि घटाई गई। परिवार के लिए अनुमानित सालाना योगदान ₹1.68 लाख माना गया। 18 का गुणक लगाने पर आर्थिक निर्भरता के नुकसान की रकम ₹30.24 लाख निकली।

    मुआवजे का पूरा ब्योरा इस प्रकार है:

    मुआवजे का मदराशि
    आर्थिक निर्भरता का नुकसान₹30,24,000
    संतान की मृत्यु से मां को भावनात्मक क्षति (Filial Consortium)₹48,400
    संपत्ति का नुकसान (Loss of Estate)₹18,150
    अंतिम संस्कार का खर्च₹18,150
    कुल मुआवजा₹31,08,700

    ट्रिब्यूनल ने एम्बुलेंस खर्च देने से इनकार कर दिया क्योंकि इस खर्च के समर्थन में रसीदें पेश नहीं की गई थीं।

    छात्रों की संभावित आय पर अदालतों का रुख

    29 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने S. Mohammed Hakkim v. National Insurance Co. Ltd. मामले में एक इंजीनियरिंग छात्र की मोटर दुर्घटना से जुड़ी अपील पर फैसला दिया था। उस मामले में भी छात्र की अनुमानित मासिक आय ₹20,000 निर्धारित की गई थी और 40% भविष्य की संभावनाओं की वृद्धि तथा 18 का गुणक अपनाया गया था।

    हालांकि, वह मामला गंभीर शारीरिक विकलांगता के कारण आय की क्षति से जुड़ा था, जबकि Farheen का मामला मृत्यु के बाद परिवार को मिलने वाले मुआवजे का है। इसलिए दोनों मामलों की परिस्थितियां अलग हैं।

    दिल्ली हाई कोर्ट के 14 मई 2026 के Oriental Insurance Co. Ltd. v. Manorama Singh मामले में भी छात्रों की संभावित आय के मूल्यांकन पर विचार किया गया। ये फैसले बताते हैं कि औपचारिक आय का पूरा प्रमाण नहीं होने पर भी अदालतें परिस्थितियों के आधार पर भविष्य की कमाई का अनुमान लगा सकती हैं। हालांकि, हर मामले में आय का निर्धारण उपलब्ध साक्ष्यों और संबंधित परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

    मुआवजे का आदेश और आपराधिक मुकदमा अलग

    यह दावा मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 166 के तहत तय किया गया। ऐसे मामलों में ट्रिब्यूनल दुर्घटना और लापरवाही से जुड़े तथ्यों का आकलन संभावनाओं की प्रधानता के आधार पर करता है। आपराधिक मुकदमे में दोष साबित करने का मानक इससे अलग होता है।

    Farheen के मामले में चालक के खिलाफ आपराधिक मुकदमा मजिस्ट्रेट की अदालत में अलग से चल रहा है। BEST के Traffic Department को भी जरूरत के अनुसार आंतरिक अनुशासनात्मक कार्रवाई पर विचार करना है।

    BEST के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि MACT का आदेश मिलने के बाद Claims Department अपने रिटेनर वकील के साथ उसकी जांच करता है। इसके बाद फाइल Traffic, Legal, Audit और Accounts विभागों से गुजरती है और जरूरत के अनुसार General Manager की मंजूरी ली जाती है। आवश्यक होने पर वकील ट्रिब्यूनल से समय बढ़ाने का अनुरोध भी कर सकता है।

    अधिकारी ने कहा कि उन्हें इस विशेष मामले की फाइल BEST तक पहुंचने की स्थिति की जानकारी नहीं थी।

    परिवार को फैसले की जानकारी नहीं थी

    Farheen के भाई Sahil ने बताया कि उन्हें MACT के आदेश की जानकारी नहीं थी। उन्होंने कहा कि घटना को तीन साल हो चुके हैं और अब उनकी बहन के बारे में पूछताछ क्यों की जा रही है। फैसले की जानकारी दिए जाने और परिवार के मालवणी स्थित घर आने की बात कहे जाने पर उन्होंने बाद में संपर्क करने को कहा, लेकिन इसके बाद कोई जवाब नहीं मिला।

    फिलहाल, BEST ने आदेश के खिलाफ अपील की है या मुआवजे का भुगतान कर दिया है, इसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। आदेश के अनुसार, निर्धारित शर्तों के तहत 7.5% सालाना ब्याज दावा दाखिल होने की तारीख से वास्तविक भुगतान तक देय होगा।

  • घर में दुकान या कारोबार चलाने वालों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सील करने की प्रक्रिया से मचा हड़कंप

    घर में दुकान या कारोबार चलाने वालों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सील करने की प्रक्रिया से मचा हड़कंप

    आवासीय इलाके में बिना मंजूरी कारोबार चलाने पर सुप्रीम कोर्ट ने सील करने का निर्देश दिया है। जानें किन संपत्तियों पर कार्रवाई होगी और किसे फिलहाल राहत है।

    नई दिल्ली: आवासीय इलाके में घर या संपत्ति का दुकान, कार्यालय या दूसरे व्यावसायिक काम के लिए इस्तेमाल करने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 22 सितंबर 2026 के आदेश में स्थिति स्पष्ट कर दी है। जिन इलाकों को स्पष्ट रूप से केवल आवासीय उपयोग के लिए निर्धारित किया गया है और जहां स्वीकृति भी आवासीय उपयोग की है, वहां व्यावसायिक गतिविधि पाए जाने पर संबंधित परिसर को पहली कार्रवाई के तौर पर सील किया जा सकता है। हालांकि, यह आदेश हर घर में चल रहे हर कारोबार पर स्वतः लागू नहीं होता। भूमि उपयोग, स्वीकृत भवन योजना और संबंधित क्षेत्र के नियम इसके लिए अहम होंगे।

    यह मामला लॉगनाथन बनाम तमिलनाडु सरकार से जुड़ा है। इसकी सुनवाई न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ कर रही है। मामले की निगरानी के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत कुमार सिन्हा को न्याय मित्र बनाया गया है। अगली सुनवाई 23 नवंबर 2026 को होगी और राज्यों तथा संबंधित प्राधिकरणों को उससे एक सप्ताह पहले अद्यतन स्थिति रिपोर्ट दाखिल करनी है।

    आवासीय इलाके में कारोबार मिला तो पहले होगा सील

    सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि जिन क्षेत्रों को विशेष रूप से आवासीय घोषित किया गया है और जहां राज्य सरकार या सक्षम प्राधिकरण ने केवल आवासीय उपयोग की अनुमति दी है, वहां व्यावसायिक गतिविधि नहीं चलनी चाहिए। ऐसी गतिविधि मिलने पर परिसर को पहली कार्रवाई के तौर पर सील किया जाना है।

    इसमें केवल सड़क किनारे बनी बड़ी दुकानें ही नहीं, बल्कि आवासीय संपत्ति का स्वीकृत उपयोग बदलकर चलाया जा रहा अन्य व्यावसायिक इस्तेमाल भी जांच के दायरे में आ सकता है। कोचिंग केंद्र, कार्यालय, पीजी और दूसरे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से जुड़े मामले भी इस व्यापक भूमि उपयोग जांच का हिस्सा रहे हैं।

    हर घर में दुकान चलाने पर तुरंत कार्रवाई नहीं

    सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि केवल किसी घर में कोई व्यावसायिक गतिविधि दिखाई देने से यह निष्कर्ष नहीं निकलेगा कि उसे तुरंत सील कर दिया जाएगा।

    सबसे पहले यह देखा जाएगा कि संबंधित जमीन या इलाका किस उपयोग के लिए निर्धारित है। इसके बाद स्वीकृत भवन योजना और सक्षम प्राधिकरण से मिली अनुमति की स्थिति देखी जाएगी। यदि क्षेत्र स्पष्ट रूप से आवासीय है और भवन का उपयोग भी केवल आवासीय उद्देश्य के लिए स्वीकृत है, लेकिन वहां नियमों के खिलाफ व्यावसायिक गतिविधि चल रही है, तो सीलिंग की कार्रवाई हो सकती है।

    मिश्रित उपयोग वाले इलाकों में फिलहाल राहत

    ऐसे इलाके जहां भूमि उपयोग स्पष्ट रूप से केवल आवासीय या केवल व्यावसायिक निर्धारित नहीं है, वहां स्थिति अलग है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल ऐसे मामलों में जमीन पर मौजूदा स्थिति नहीं बदलने का निर्देश दिया है। हालांकि संबंधित प्रशासनिक और कानूनी कार्यवाही कागजों पर जारी रह सकती है।

    इसके साथ ही आप को बता दें, कि मिश्रित उपयोग वाले इलाके में दुकान चलाने वाले हर व्यक्ति के लिए तत्काल सील का खतरा नहीं है। यहां संबंधित क्षेत्र का मास्टर प्लान और लागू नियम देखना जरूरी होगा।

    मालिकाना विवाद भी नहीं बनेगा अपने आप बचाव

    यदि किसी मकान, जमीन या इमारत को लेकर अदालत में मुकदमा चल रहा है, तो केवल मुकदमा लंबित होने से कार्रवाई अपने आप नहीं रुकेगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि संपत्ति का वास्तविक उपयोग उस उद्देश्य के खिलाफ है जिसके लिए जमीन या भवन आवंटित किया गया था और सक्षम प्राधिकरण ने जिस योजना को मंजूरी दी थी, तो लंबित मुकदमा होने के बावजूद परिसर को सील किया जा सकता है।

    बिना किसी मंजूरी का निर्माण मिला तो सील होगा या ध्वस्तीकरण

    सुप्रीम कोर्ट ने उन संरचनाओं को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिया है जो पूरी तरह बिना किसी सक्षम प्राधिकरण की मंजूरी के बनाई गई हैं। ऐसी संरचनाओं के मामले में कानून के अनुसार सील या ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ सकती है।

    नगर निकाय मनमानी कार्रवाई नहीं कर सकते

    सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ संपत्ति मालिकों और कारोबारियों पर ही ध्यान नहीं दिया है। नगर निकायों और संबंधित अधिकारियों को भी स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि कार्रवाई में भेदभाव नहीं होना चाहिए।

    यदि समान परिस्थितियों वाली संपत्तियों में से कुछ पर कार्रवाई और कुछ को बिना कारण छोड़ने की शिकायत सामने आती है, तो अदालत ने इसे गंभीरता से लेने की चेतावनी दी है। आदेश में अधिकारियों को किसी भी तरह की चुनिंदा कार्रवाई से बचने को कहा गया है।

    भोपाल में सील प्रक्रिया को लेकर भी उठे सवाल

    सुप्रीम कोर्ट के सामने भोपाल की कार्रवाई का मामला भी आया। वहां कुछ संपत्तियों को सील करने के बाद थोड़े समय में दोबारा खोलने की स्थिति पर सवाल उठे। अदालत को बताया गया कि कुछ मामलों में सील करने के बाद ऐसा कोई नया घटनाक्रम सामने नहीं आया था, जिससे संपत्ति खोलने का आधार स्पष्ट हो। कोर्ट ने कार्रवाई में एकरूपता और नियमों के पालन पर जोर दिया।

    भोपाल का मास्टर प्लान भी इस मामले में महत्वपूर्ण है। अदालत के सामने यह बताया गया कि वहां मास्टर प्लान लंबे समय से संशोधित नहीं हुआ था और नया मसौदा तैयार किया गया है। हालांकि संपत्तियों के मौजूदा उपयोग की वैधता जांचते समय लागू मास्टर प्लान और भवन नियमों को आधार बनाने की बात स्पष्ट की गई है।

    देशभर में क्यों बढ़ी चिंता

    यह मामला मूल रूप से एक बिना स्वीकृति बने जी+1 भवन से जुड़ा था, लेकिन मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे व्यापक स्तर पर लेते हुए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की राजधानियों में आवासीय इलाकों के गैर-आवासीय इस्तेमाल की जांच का निर्देश दिया था। संबंधित नगर निकायों को अपने क्षेत्र में ऐसे मामलों की पहचान कर स्थिति अदालत के सामने रखने को कहा गया था।

    इसके बाद भूमि उपयोग और अनधिकृत निर्माण से जुड़े मामले दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, मेरठ और अन्य शहरों तक पहुंचे। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों से जमीन पर की गई वास्तविक कार्रवाई का ब्योरा मांगा है, केवल कागजी अनुपालन को पर्याप्त नहीं माना है।

    घर में दुकान चलाने वालों को क्या जांचना चाहिए

    ऐसी संपत्ति के मालिक या किरायेदार को सबसे पहले यह देखना चाहिए कि जमीन और भवन का स्वीकृत उपयोग क्या है। इसके साथ स्वीकृत भवन योजना, संबंधित क्षेत्र का मास्टर प्लान, भवन उपविधियां और व्यावसायिक उपयोग से जुड़ी अनुमति की स्थिति देखना जरूरी है।

    सिर्फ व्यापार संबंधी पंजीकरण या लाइसेंस होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि भवन का भूमि उपयोग भी नियमों के अनुसार है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले में स्वीकृत उपयोग और वास्तविक उपयोग के बीच अंतर को महत्वपूर्ण माना है।

    मुंबई में क्या स्थिति है

    सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद बीएमसी से जुड़ी ऐसी कोई भी प्रक्रिया सामने नहीं आई है।हालांकि मुंबई में आवासीय संपत्ति के व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर स्थानीय स्तर पर कार्रवाई के मामले सामने आ रहे हैं। जुहू में एक आवासीय संपत्ति में व्यावसायिक उपयोग के लिए किए जा रहे काम को लेकर बीएमसी ने स्टॉप वर्क नोटिस जारी किया था। स्थानीय निवासियों ने आपत्ति जताई थी। ऐसे कई मामले देखने को मिल सकते है।

    अगली सुनवाई में क्या होगा

    लॉगनाथन मामले में अगली सुनवाई 23 नवंबर 2026 को दोपहर 2 बजे निर्धारित है। राज्यों और संबंधित प्राधिकरणों को उससे एक सप्ताह पहले अपनी अद्यतन स्थिति रिपोर्ट दाखिल करनी है। न्याय मित्र अजीत कुमार सिन्हा को भी समेकित रिपोर्ट प्रस्तुत करनी है।

    फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आवासीय क्षेत्र में चल रहा कारोबार अपने आप अवैध नहीं माना जाएगा, लेकिन जहां क्षेत्र स्पष्ट रूप से केवल आवासीय उपयोग के लिए निर्धारित है और स्वीकृत उपयोग के विपरीत व्यावसायिक गतिविधि चल रही है, वहां सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के तहत सीलिंग की कार्रवाई का रास्ता साफ है। वहीं मिश्रित या स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं किए गए उपयोग वाले क्षेत्रों में फिलहाल जमीनी स्थिति बनाए रखने का निर्देश है।

  • मुंबई में गंभीर अपराध 99% तक डिटेक्ट, फिर FIR से कोर्ट तक देरी कहाँ?

    मुंबई में गंभीर अपराध 99% तक डिटेक्ट, फिर FIR से कोर्ट तक देरी कहाँ?

    मुंबई में गंभीर अपराधों की detection rate ऊंची है, फिर भी FIR, forensic जांच और trial में देरी का सवाल क्यों बना हुआ है? जानिए पूरी तस्वीर।

    मुंबई: गंभीर अपराधों की जांच पर एक दिलचस्प तस्वीर सामने आई है। 2026 के पहले आठ महीनों में मुंबई पुलिस ने कुल अपराधों की 85 फीसदी detection rate दर्ज की, जबकि हत्या के मामलों में detection 99 फीसदी, हत्या के प्रयास और डकैती में 100 फीसदी तथा robbery में 99 फीसदी बताई गई। यानी गंभीर अपराधों में पुलिस के स्तर पर आरोपी या अपराध का पता लगाने की क्षमता के आंकड़े काफी ऊंचे हैं। इसके बावजूद एक बड़ा सवाल कायम है—अगर अपराध detect हो रहा है, तो FIR से लेकर forensic जांच, charge-sheet और अदालत में अंतिम फैसले तक न्याय की रफ्तार कहां धीमी पड़ती है?

    यह सवाल ऐसे समय में उठा है जब दो छोटे मामलों में तेजी से judicial conclusion सामने आया। एक मामले में 50 वर्षीय कृष्ण कुमार मोहनलाल सिंह को 24 मई 2026 को मुंबई पुलिस आयुक्त कार्यालय के पास फुटपाथ पर स्टील की केतली से चाय बेचने के मामले में दोषी ठहराया गया। दूसरा मामला मालाड के फुटपाथ पर कथित जुए से जुड़ा है, जिसमें 57 वर्षीय राजू जीवन कविरे के खिलाफ महाराष्ट्र प्रिवेंशन ऑफ गैंबलिंग एक्ट के तहत कार्रवाई हुई और उसे दोषी ठहराया गया।

    इन दोनों मामलों की प्रकृति अलग है, लेकिन वे criminal justice system की एक बड़ी तस्वीर सामने रखते हैं। सवाल यह नहीं है कि छोटे अपराधों पर कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं। सार्वजनिक रास्ते में बाधा, nuisance और सार्वजनिक स्थान पर जुआ जैसे अपराधों पर कानून के अनुसार कार्रवाई पुलिस की जिम्मेदारी है। असली सवाल यह है कि क्या ऐसे अपेक्षाकृत सरल मामलों और हत्या, बलात्कार, robbery, extortion या cybercrime जैसे जटिल मामलों की investigation और prosecution को एक ही पैमाने से देखा जा सकता है?

    चाय बेचने वाले मामले में क्या हुआ?

    अभियोजन के अनुसार कृष्ण कुमार मोहनलाल सिंह को 24 मई 2026 को सुबह करीब 10.50 बजे पुलिसकर्मी अंकुश मोरे इंगले ने गश्त के दौरान फुटपाथ पर चाय बेचते पाया था। Azad Maidan Police ने भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 285 और 293 के तहत कार्रवाई की। अदालत ने पुलिस की गवाही और spot panchnama को स्वीकार करते हुए सिंह को दोनों अपराधों में दोषी ठहराया। उसे प्रत्येक अपराध के लिए 1,500 रुपये का जुर्माना और एक-एक दिन की साधारण कैद सुनाई गई तथा appeal period के लिए 10,000 रुपये का bail bond भरने का निर्देश दिया गया।

    यहां BNS की धाराओं को समझना भी जरूरी है। धारा 285 सार्वजनिक रास्ते में danger, obstruction या injury से संबंधित है, जबकि धारा 293 lawful injunction के बाद public nuisance जारी रखने से संबंधित है। धारा 293 के मामले में यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि nuisance रोकने के लिए पहले कोई वैध injunction या आदेश हुआ हो। इसलिए इस conviction को समझते समय court order में दर्ज उस procedural background को देखना जरूरी है।

    मालाड gambling case में भी तस्वीर अलग है। DCB CID Unit 11 ने जुलाई 2025 में फुटपाथ पर कथित gambling के मामले में राजू जीवन कविरे के खिलाफ महाराष्ट्र Prevention of Gambling Act के तहत कार्रवाई की। उसने दोष स्वीकार किया और अदालत ने उसे सजा तथा 300 रुपये के जुर्माने से दंडित किया।

    यहीं से एक महत्वपूर्ण सवाल निकलता है—क्या छोटे मामलों का तेजी से खत्म होना पुलिस की असाधारण efficiency का परिणाम है या इन मामलों की प्रकृति और उपलब्ध evidence के कारण इनकी judicial प्रक्रिया ही comparatively सरल होती है?

    सिर्फ detection rate से पूरी कहानी नहीं समझी जा सकती

    मुंबई पुलिस के जनवरी से अगस्त 2026 के आंकड़े बताते हैं कि गंभीर अपराधों में detection मजबूत रही। हत्या के मामलों में 99 फीसदी, हत्या के प्रयास और dacoity में 100 फीसदी तथा robbery में 99 फीसदी detection दर्ज की गई। कुल crime detection rate 85 फीसदी रही।

    लेकिन detection और conviction एक ही चीज नहीं हैं।

    Detection का अर्थ है कि पुलिस ने अपराध का पता लगाने और आरोपी या मामले को identify करने की दिशा में सफलता हासिल की। Conviction अदालत के trial के बाद होती है। इनके बीच investigation, forensic examination, charge-sheet, cognizance, framing of charges, witnesses और evidence की कई stages आती हैं।

    यही वजह है कि सिर्फ police detection rate देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि serious crime cases भी उसी गति से final justice तक पहुंच रहे हैं।

    महाराष्ट्र में अदालतों पर कितना बोझ है?

    Latest NCRB data में महाराष्ट्र की criminal justice system की दूसरी तस्वीर सामने आती है। 2023 में राज्य में trial के लिए गए 24,14,487 IPC cases में से केवल 1,82,636 cases decided हुए, जबकि 22,31,851 cases undecided रहे। यानी उस साल IPC cases की trial pendency 92 फीसदी से अधिक थी। इसी dataset में महाराष्ट्र की conviction rate 49.3 फीसदी दर्ज की गई।

    इसका अर्थ यह नहीं है कि पुलिस की जांच खराब है। बल्कि यह बताता है कि police detection के बाद criminal justice process का अगला हिस्सा कितना बड़ा है।

    यही वह जगह है जहां छोटे और गंभीर अपराधों की तुलना सीधे करना मुश्किल हो जाता है। किसी फुटपाथ पर पुलिस की मौजूदगी में पकड़े गए आरोपी के मामले में evidence collection अपेक्षाकृत सीमित हो सकता है। इसके उलट हत्या, sexual offence, organised crime या cybercrime में medical evidence, CCTV, mobile data, forensic examination, कई गवाह और expert evidence जैसी चीजें investigation को लंबा बना सकती हैं।

    FIR के बाद investigation की समय-सीमा क्यों महत्वपूर्ण है?

    भारत में criminal procedure अब Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita यानी BNSS के तहत चलता है, जो 1 जुलाई 2024 से लागू है। BNSS की धारा 173 cognisable offences की सूचना दर्ज करने की प्रक्रिया से संबंधित है। Supreme Court ने 2025-26 के अपने निर्णयों में स्पष्ट किया है कि BNSS की धारा 173(3) कुछ ऐसे cognisable offences में preliminary inquiry की अनुमति देती है जिनमें सजा तीन साल या उससे अधिक लेकिन सात साल से कम है, और इसके लिए संबंधित वरिष्ठ अधिकारी की पूर्व अनुमति जैसी शर्तें लागू होती हैं।

    इसलिए आज FIR delay पर चर्चा करते समय केवल 2013 के Lalita Kumari judgment को दोहराना पर्याप्त नहीं है। 2024 के बाद लागू BNSS के नए procedural framework को भी समझना जरूरी है।

    हालांकि जहां cognisable offence की सूचना के बाद कानून के अनुसार FIR दर्ज होनी चाहिए, वहां शुरुआती देरी investigation पर असर डाल सकती है। घटनास्थल का evidence, CCTV footage, digital records और गवाहों की उपलब्धता समय के साथ प्रभावित हो सकती है।

    गंभीर मामलों में forensic delay भी बड़ा bottleneck

    महाराष्ट्र में criminal investigation की एक और बड़ी चुनौती forensic laboratories का workload है।

    Directorate of Forensic Science Laboratories के official case dashboard के अनुसार 31 जुलाई 2026 को 56,819 cases pending थे। अगस्त में 24,526 नए cases प्राप्त हुए और 26,448 reports जारी की गईं। इसके बावजूद 1 सितंबर 2026 को 54,897 cases carry forward हुए।

    सबसे बड़ी pendency Cyber और TASI divisions में दिखाई देती है। 1 सितंबर को Cyber में 29,666 और TASI में 9,766 cases pending थे। Mumbai laboratory में इसी तारीख को 14,169 cases carry forward हुए।

    यह आंकड़ा यह नहीं बताता कि सभी pending cases serious crimes से जुड़े हैं। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि digital और forensic evidence की processing criminal justice system में एक महत्वपूर्ण capacity issue है।

    इसी समस्या को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने सितंबर 2026 में DFSL के लिए 220 contractual posts मंजूर किए हैं। इनमें 130 scientific officers और 90 scientific assistants शामिल हैं। सरकार का उद्देश्य cyber और TASI से जुड़े करीब 40,000 pending cases के backlog को कम करना और forensic reports अदालतों तथा investigating agencies तक तेजी से पहुंचाना है।

    जब जांच हो जाए, तब भी मामला खत्म नहीं होता

    किसी गंभीर अपराध में पुलिस आरोपी तक पहुंच जाए, इसके बाद भी न्यायिक प्रक्रिया बाकी रहती है। Charge-sheet दाखिल होने के बाद court proceedings, charges, witnesses, expert reports और evidence examination जैसे चरण आते हैं।

    यही कारण है कि किसी छोटे मामले में कुछ तारीखों के भीतर conviction हो जाना और किसी गंभीर अपराध में वर्षों तक trial चलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पुलिस छोटे अपराधों को ज्यादा priority दे रही है।

    हालांकि कुछ गंभीर मामलों में courts ने investigation और evidence collection में देरी को लेकर हाल में सवाल उठाए हैं। सितंबर 2026 में Disha Salian death case में Bombay High Court ने छह साल तक चली पुलिस जांच और FIR से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाते हुए CBI को fresh investigation और FIR की दिशा में कदम उठाने का निर्देश दिया। अदालत की टिप्पणियां उस मामले की जांच से संबंधित थीं और उन्हें पूरे Mumbai Police system की सामान्य कार्यप्रणाली का निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

    इस मामले में बाद में CBI ने FIR दर्ज की और शिकायत में लगाए गए आरोपों के आधार पर जांच शुरू की।

    पुलिस की efficiency को कैसे मापा जाए?

    यहीं से मूल सवाल और बड़ा हो जाता है। किसी police force की performance केवल FIR की संख्या, cases detected या charge-sheets की संख्या से पूरी तरह नहीं समझी जा सकती।

    एक ज्यादा व्यापक तस्वीर में कम से कम ये सवाल शामिल होने चाहिए:

    क्या गंभीर शिकायत पर FIR समय पर दर्ज हुई?

    क्या investigation बिना अनावश्यक देरी के पूरी हुई?

    क्या forensic reports समय पर मिलीं?

    क्या charge-sheet समय पर दाखिल हुई?

    कितने मामलों में charges frame हुए?

    कितने मामलों में trial लंबित है?

    और आखिर में कितने मामलों में conviction या acquittal हुआ?

    मुंबई पुलिस के मौजूदा आंकड़े यह बताते हैं कि गंभीर अपराधों का detection स्तर ऊंचा है। दूसरी तरफ महाराष्ट्र की अदालतों और forensic system के आंकड़े बताते हैं कि detection के बाद criminal justice chain में बड़ी pendency मौजूद है।

    पुलिस का पक्ष

    मुंबई के Joint Commissioner of Police (Law and Order) Manoj Kumar Sharma ने चाय विक्रेता मामले पर कहा कि court order देखे बिना इस पर टिप्पणी करना मुश्किल होगा।

    इस बीच मुंबई पुलिस आयुक्त ने 2026 के पहले आठ महीनों में 85 फीसदी overall detection और गंभीर अपराधों में ऊंची detection rate का आंकड़ा सामने रखा है। पुलिस के मुताबिक cyber fraud मामलों में भी recovery mechanism के जरिए बड़ी राशि freeze की गई है।

    कानूनी और criminology का सवाल

    Criminal lawyer Advocate Mikhail Dey का कहना है कि genuine complaints पर police cognisance को लेकर शिकायतें सामने आती हैं, जबकि minor offences में cases तेजी से register और prosecute हो जाते हैं। उनके मुताबिक पहले से भारी judicial backlog के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि हर छोटे मामले को उसी स्तर की police-prosecution-court machinery से गुजारना कितना उचित है।

    Indian Society of Criminology के chairman Professor Madhavan Somasundaram का कहना है कि petty offences पर कानून लागू होना चाहिए, लेकिन कार्रवाई disproportionate नहीं होनी चाहिए। उनका तर्क है कि जिन violations को fine या digital mechanism के जरिए निपटाया जा सकता है, उनमें unnecessarily पूरी criminal justice machinery लगाने से व्यक्ति और राज्य दोनों पर अतिरिक्त लागत पड़ सकती है।

    इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि छोटे अपराधों पर कार्रवाई को अपने आप में गलत नहीं माना जा सकता। असली सवाल resources के allocation, investigation की गुणवत्ता और serious offences के लिए response time का है।

    अब असली सवाल क्या है?

    कृष्ण कुमार मोहनलाल सिंह और राजू जीवन कविरे के मामलों में conviction यह दिखाती है कि जब अपराध सामने हो, आरोपी की पहचान हो और prosecution के लिए जरूरी evidence उपलब्ध हो, तो criminal justice system अपेक्षाकृत तेजी से judicial conclusion तक पहुंच सकता है।

    लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि गंभीर अपराधों की जांच को कम priority दी जा रही है।

    मुंबई में 2026 की ऊंची serious-crime detection rate एक तरफ है, वहीं forensic laboratories की हजारों मामलों की pendency और महाराष्ट्र की बड़ी trial pendency दूसरी तरफ।

    इसलिए policing की असली efficiency का सवाल केवल यह नहीं है कि अपराधी पकड़ा गया या नहीं। असली कसौटी यह भी है कि शिकायत से FIR, FIR से investigation, investigation से evidence, evidence से charge-sheet और charge-sheet से final judgment तक पूरी प्रक्रिया कितनी समयबद्ध और प्रभावी रहती है।

    महाराष्ट्र में forensic capacity बढ़ाने के लिए 220 नए पदों की मंजूरी और investigation तथा conviction rate सुधारने की कोशिशें इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। अब इनका वास्तविक असर इस बात से दिखाई देगा कि pending evidence, investigation और trials कितनी तेजी से कम होते हैं और गंभीर अपराधों के पीड़ितों को अंतिम न्याय कितने समय में मिलता है।

  • Acme Boulevard Homebuyer Fraud: CBI की 21वीं Chargesheet, 2022 से अटके Project की पूरी कहानी

    Acme Boulevard Homebuyer Fraud: CBI की 21वीं Chargesheet, 2022 से अटके Project की पूरी कहानी

    Jogeshwari East के Acme Boulevard मामले में CBI ने 5 पूर्व प्रमोटर्स-डायरेक्टर्स पर chargesheet दाखिल की। जानिए project, insolvency और homebuyers की पूरी स्थिति।

    मुंबई: Jogeshwari East स्थित Acme Boulevard housing project से जुड़े कथित homebuyer fraud मामले में Central Bureau of Investigation (CBI) ने पांच पूर्व promoters/directors और Acme Realties Private Limited की holding company Acme Housing India Private Limited के खिलाफ chargesheet दाखिल की है। यह chargesheet Additional Chief Judicial Magistrate (CBI Cases), 3rd Court, Esplanade Court, Mumbai के सामने दाखिल हुई है। CBI के अनुसार, जांच में homebuyers को कथित तौर पर false assurances और fraudulent representations के जरिए प्रभावित कर financial benefits हासिल करने के आरोप सामने आए हैं।

    CBI ने आरोपों में criminal conspiracy, cheating, criminal breach of trust और dishonest receipt of stolen property से जुड़े भारतीय दंड संहिता के प्रावधान लगाए हैं। हालांकि chargesheet दाखिल होना आरोपों का न्यायिक रूप से साबित होना नहीं है और मामले में आगे अदालत की कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी।

    Acme Boulevard की कहानी सिर्फ CBI chargesheet तक सीमित नहीं है। इस project से जुड़े homebuyers के विवाद, MahaRERA proceedings, redevelopment dispute और बाद में शुरू हुई insolvency resolution process का लंबा background है। यही वजह है कि इस मामले में मौजूदा CBI कार्रवाई के साथ यह समझना भी जरूरी है कि project की स्थिति यहां तक कैसे पहुंची।

    Acme Boulevard project कहां है और विवाद क्या है?

    Acme Boulevard Village Majas, Sarvodaya Nagar, Jogeshwari East में स्थित redevelopment project है। NCLT के रिकॉर्ड के अनुसार जिस जमीन पर redevelopment हुआ, वह MHADA की लगभग 40,429.64 वर्ग मीटर जमीन थी। यहां पहले 88 chawls में 655 tenements थे। वर्ष 2008 में Majaswadi Sarvodayanagar Co-operative Housing Society के सदस्यों ने इस property के composite redevelopment का फैसला लिया था और redevelopment के लिए developers को आमंत्रित किया गया था।

    Project के development structure में J.P. Infra Mumbai Private Limited, Keemaya Developers Private Limited और Acme Realities Private Limited से जुड़े arrangements का उल्लेख NCLT और MahaRERA records में मिलता है। Acme Boulevard के Boulevard Tower 4 और Boulevard Tower 5 इसी redevelopment framework का हिस्सा हैं।

    2022 में बढ़ा विवाद

    Acme Boulevard Tower 5 के MahaRERA record में project की proposed completion date 30 December 2022 दर्ज थी। बाद में revised completion date 30 December 2023 की गई, लेकिन promoter ने extension के लिए आवेदन नहीं किया था। MahaRERA के 2025 interim order में project को 30 December 2023 के बाद lapsed बताया गया और उस समय Occupation Certificate भी नहीं मिला था।

    इसी दौरान Majaswadi Sarvodayanagar Society ने नवंबर 2022 में termination notice और public notice जारी किया था। Acme Realities ने इसका विरोध करते हुए legal proceedings शुरू कीं। MahaRERA के रिकॉर्ड में Acme की ओर से यह भी दर्ज है कि विवाद को Bombay High Court के सामने ले जाया गया और arbitration का रास्ता अपनाया गया।

    यानी project का विवाद केवल individual homebuyers की possession समस्या तक सीमित नहीं रहा, बल्कि developer और redevelopment society के बीच भी गंभीर विवाद सामने आया।

    Homebuyers का विवाद NCLT तक कैसे पहुंचा?

    Acme Boulevard Tower 4 और Tower 5 के homebuyers ने possession में देरी को लेकर insolvency proceedings का रास्ता अपनाया। NCLT के रिकॉर्ड के अनुसार Abhishek Ranganathan और अन्य homebuyers ने Acme Realities के खिलाफ Corporate Insolvency Resolution Process यानी CIRP शुरू करने की मांग की थी। Petition में इन buyers को financial creditors/homebuyers के रूप में दर्ज किया गया और बताया गया कि उन्होंने Boulevard Tower 4 और Boulevard Tower 5 में residential units खरीदे थे।

    NCLT ने 21 February 2024 को Acme Realities के खिलाफ CIRP शुरू किया। इसके बाद company के लिए resolution process शुरू हुआ। IBBI के रिकॉर्ड में Acme Realities Private Limited के लिए resolution plan process और Resolution Professional के रूप में Subodh Kumar Agrawal का उल्लेख मिलता है।

    Homebuyers के दावे कितने बड़े थे?

    CIRP के दौरान homebuyers के admitted claims लगभग 525.65 करोड़ रुपये दर्ज किए गए। यह रकम CBI द्वारा बताए गए alleged fraud amount के रूप में नहीं देखी जानी चाहिए। यह insolvency proceedings में homebuyers के admitted financial claims से संबंधित figure है।

    यही अंतर इस मामले को समझने में महत्वपूर्ण है। CBI की मौजूदा chargesheet में इस specific case के alleged fraud की कुल रकम सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आई है, जबकि insolvency proceedings में homebuyers के financial claims का अलग रिकॉर्ड मौजूद है।

    Project के लिए आया resolution plan

    Acme Realities की insolvency process के दौरान Mantra Properties & Developers Private Limited resolution applicant के तौर पर सामने आया। NCLT के रिकॉर्ड के अनुसार Mantra Properties को 13 February 2025 को 100 प्रतिशत voting के साथ Successful Resolution Applicant घोषित किया गया था। इसके बाद 26 August 2025 को NCLT ने resolution plan को मंजूरी दी।

    Resolution plan में homebuyers के लिए flats की delivery को महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया था। NCLT के रिकॉर्ड में homebuyers से संबंधित flats की aggregate value लगभग 525.67 करोड़ रुपये बताई गई है। Acme Boulevard के Tower 4 और Tower 5 के लिए Effective Date से 18 महीने के भीतर completion और delivery का framework रखा गया था, हालांकि इसके साथ project implementation और अन्य आवश्यक conditions भी जुड़ी थीं।

    इसका मतलब यह है कि CBI की criminal proceedings और Acme project की insolvency-resolution process दो अलग कानूनी tracks हैं। CBI chargesheet पूर्व promoters/directors के खिलाफ alleged criminal conduct से जुड़ी है, जबकि NCLT resolution plan project को आगे बढ़ाने और creditors तथा homebuyers के claims को resolution mechanism के जरिए address करने से संबंधित है।

    MahaRERA में homebuyers की शिकायतें भी दर्ज

    Acme Boulevard Tower 5 के खिलाफ MahaRERA proceedings में homebuyers की शिकायतें सामने आई हैं। एक MahaRERA proceeding में Vijay Rammurat Singh तथा Anoop Chokhani और Jaigovind Chokhani की complaints दर्ज हैं, जिसमें Acme Realities, J.P. Infra और संबंधित entities को respondents बनाया गया था।

    इन proceedings में homebuyers को RERA के तहत allottees और संबंधित companies को promoters के रूप में दर्ज किया गया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि project से संबंधित buyer disputes CBI investigation से पहले भी regulatory और insolvency forums तक पहुंच चुके थे।

    Project की completion अब कब तक?

    Acme Boulevard के Tower 4 और Tower 5 के उपलब्ध RERA-linked records में original completion timeline December 2022 की थी। बाद की project information में revised completion timeline June 2027 दिखाई देती है। इस बदलाव को project की लंबी regulatory, redevelopment और insolvency journey के संदर्भ में देखना जरूरी है।

    इसलिए homebuyers के लिए मौजूदा सबसे बड़ा सवाल केवल CBI chargesheet नहीं है। असली सवाल यह है कि resolution plan के तहत project completion और flat possession का implementation किस गति से आगे बढ़ता है।

    92 redevelopment members के लिए भी अलग obligations

    NCLT resolution proceedings में Majaswadi Sarvodayanagar Society के 92 members से जुड़े obligations का भी उल्लेख है। Resolution arrangement में पुराने rent dues, hardship compensation और आगे के rent से जुड़े भुगतान का framework रखा गया था।

    इसके अलावा redevelopment/rehabilitation component के Occupation Certificate को लेकर भी समयसीमा से जुड़ी condition दर्ज है। यदि निर्धारित अवधि में आवश्यक Occupation Certificate हासिल नहीं होता, तो settlement terms में कुछ परिस्थितियों में enhanced rent का प्रावधान रखा गया था।

    इससे Acme Boulevard dispute का असर केवल private flat buyers तक सीमित नहीं रहता। Project के पुराने occupants और redevelopment beneficiaries भी इसके outcome से जुड़े हुए हैं।

    अब CBI chargesheet के बाद क्या होगा?

    CBI की chargesheet के बाद मामला अदालत की प्रक्रिया में आगे बढ़ेगा। आरोपों पर न्यायिक निर्णय होना बाकी है। दूसरी तरफ Acme Realities की insolvency resolution process के तहत मंजूर किए गए plan का project completion और homebuyers की delivery पर प्रभाव अलग से बना रहेगा।

    CBI ने कहा है कि Acme मामला उसकी nationwide homebuyer fraud investigation का हिस्सा है। Agency के अनुसार इस broader investigation में विभिन्न builder companies और financial institutions के unidentified officials से जुड़े 32 अन्य मामले भी जांच के दायरे में हैं। Acme मामले की chargesheet इस nationwide probe में 21वीं chargesheet है।

    Homebuyers के लिए सबसे अहम बात

    Acme Boulevard मामले में फिलहाल तीन अलग-अलग developments को एक साथ समझना जरूरी है। पहला, CBI ने पांच पूर्व promoters/directors के खिलाफ alleged cheating और अन्य आपराधिक धाराओं के तहत chargesheet दाखिल की है। दूसरा, Acme Realities पहले ही insolvency proceedings से गुजर चुकी है और Mantra Properties का resolution plan NCLT से मंजूर हो चुका है। तीसरा, homebuyers और redevelopment society से जुड़े विवादों का रिकॉर्ड MahaRERA और NCLT proceedings में पहले से मौजूद है।

    इसलिए CBI की नई chargesheet मामले का एक नया कानूनी चरण है, लेकिन Acme Boulevard project की पूरी कहानी इससे कहीं पुरानी है। अब इस मामले में आगे की निगरानी दो स्तरों पर होगी—अदालत में criminal proceedings और दूसरी तरफ resolution plan के तहत project completion तथा homebuyers को possession मिलने की प्रक्रिया।

  • Kalina Library Case: छगन भुजबल को कोर्ट से राहत, ‘Invisible Support’ थ्योरी पर सवाल

    Kalina Library Case: छगन भुजबल को कोर्ट से राहत, ‘Invisible Support’ थ्योरी पर सवाल

    Kalina Central Library केस में छगन भुजबल और पांच पूर्व PWD अधिकारियों को डिस्चार्ज किया गया। जानिए ₹2.5 करोड़, जमीन लीज और ₹137 करोड़ का पूरा मामला।

    मुंबई: मुंबई की विशेष अदालत ने महाराष्ट्र के मंत्री छगन भुजबल को Kalina Central Library से जुड़े 2015 के ACB भ्रष्टाचार मामले में डिस्चार्ज कर दिया है। अदालत ने माना कि किसी प्रशासनिक फैसले का गलत, आर्थिक रूप से नुकसानदेह या प्रक्रियागत रूप से अनियमित होना अपने आप में आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए आरोपी की स्पष्ट भागीदारी, आवश्यक मंशा या जानकारी का ठोस आधार होना जरूरी है।

    विशेष MP/MLA अदालत के जज महेश के. जाधव ने भुजबल के साथ पांच पूर्व PWD अधिकारियों को भी मामले से डिस्चार्ज किया। इनमें तत्कालीन PWD अधिकारी गजानन सावंत, हरीश पाटिल, अनिलकुमार गायकवाड़, संजय सोलंकी और एमएस शाह शामिल थे। इस आदेश के साथ भुजबल के PWD मंत्री रहने के दौरान दर्ज लंबित ACB भ्रष्टाचार मामलों में Kalina Library मामला भी समाप्त हो गया है।

    कोर्ट ने भुजबल को क्यों किया डिस्चार्ज?

    मामले में अभियोजन का आरोप था कि तत्कालीन PWD मंत्री भुजबल ने अपने पद का इस्तेमाल करते हुए मुंबई विश्वविद्यालय के Kalina परिसर में Central Library बनाने के लिए निजी डेवलपर Indiabulls Real Estate Ltd को फायदा पहुंचाया।

    अभियोजन ने कथित तौर पर भुजबल और उनके अधीन अधिकारियों के बीच एक ऐसी व्यवस्था का आरोप लगाया था जिसमें मंत्री की ओर से प्रत्यक्ष निर्देश या हस्तक्षेप सामने नहीं आया, लेकिन अधिकारियों को कथित तौर पर उनका “Invisible Support” हासिल था।

    अदालत ने इस दलील को पर्याप्त आपराधिक साक्ष्य नहीं माना। कोर्ट के अनुसार किसी आपराधिक साजिश को केवल परिस्थितियों से निकाले गए अनुमान के आधार पर स्थापित नहीं किया जा सकता। उपलब्ध सामग्री में भुजबल की व्यक्तिगत भागीदारी और आवश्यक आपराधिक मंशा को स्थापित करने वाली पर्याप्त कड़ी नहीं मिली।

    अदालत ने यह भी कहा कि किसी प्रशासनिक निर्णय के बाद में गलत, आर्थिक रूप से नुकसानदेह या प्रक्रियागत रूप से अनियमित पाए जाने और उसके आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी तय होने के बीच अंतर है।

    ₹2.5 करोड़ की sponsorship पर क्या था विवाद?

    इस मामले की जांच में भुजबल से जुड़े एक welfare foundation को मिले कथित corporate sponsorship payments भी जांच के केंद्र में थे।

    ACB की जांच में ₹2.5 करोड़ के दो payments का उल्लेख किया गया था। इनमें ₹1 करोड़ और ₹1.5 करोड़ की रकम शामिल थी। जांच एजेंसी ने इन payments को library project से जुड़े फैसलों के साथ जोड़ते हुए कथित quid pro quo यानी लाभ के बदले भुगतान की आशंका जताई थी।

    हालांकि अदालत ने foundation को banking channels के जरिए मिली रकम को अपने आप में आपराधिक gratification या Prevention of Corruption Act के तहत criminal misconduct साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना। कोर्ट के अनुसार केवल किसी public servant से जुड़े foundation को पैसा मिलना, बिना अतिरिक्त ठोस साक्ष्य के, अपराध स्थापित नहीं करता।

    Kalina की चार एकड़ जमीन का क्या था पूरा मामला?

    Kalina Central Library विवाद की जड़ मुंबई विश्वविद्यालय की करीब चार एकड़ जमीन से जुड़ी थी। यह जमीन Central Library के निर्माण के लिए राज्य सरकार को दी गई थी।

    PWD ने 2009 में library project के लिए tender प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद project को ऐसे मॉडल पर आगे बढ़ाया गया जिसमें निजी developer को library का निर्माण करना था और बदले में जमीन के एक हिस्से के commercial development और लंबे lease अधिकार दिए जाने थे।

    विवाद का प्रमुख हिस्सा यह था कि करीब 7,000 वर्ग मीटर जमीन को 99 साल की अवधि के लिए केवल 1 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर पर lease देने की व्यवस्था की गई थी। ACB ने इसी व्यवस्था को सरकारी जमीन के कम मूल्य पर हस्तांतरण और राज्य को नुकसान से जोड़ते हुए जांच की थी।

    ACB ने राज्य को कितने नुकसान का आरोप लगाया था?

    ACB ने इस पूरे arrangement से राज्य को 75 करोड़ रुपये से अधिक के नुकसान का आरोप लगाया था। कुछ रिपोर्टों में जांच एजेंसी के अनुमानित नुकसान को करीब 79 करोड़ रुपये बताया गया है।

    यह राशि और welfare foundation को मिले कथित ₹2.5 करोड़ एक ही रकम नहीं हैं। ₹2.5 करोड़ alleged sponsorship payments से जुड़ा आरोप था, जबकि ₹75 करोड़ से अधिक का आंकड़ा जमीन और project arrangement से कथित सरकारी नुकसान से संबंधित था।

    Central Library project का आखिर क्या हुआ?

    मामला केवल अदालत तक सीमित नहीं रहा। Library project की जमीन और construction agreement को लेकर विवाद कई वर्षों तक चला।

    2010 में project के लिए work order जारी हुआ था और construction को 36 महीने में पूरा किया जाना था। Library building की अनुमानित construction cost करीब ₹82.5 करोड़ बताई गई थी।

    बाद में project की प्रगति को लेकर विवाद बढ़ा और 2019 में महाराष्ट्र सरकार ने private developer के साथ agreement समाप्त करने का फैसला किया। इसके बाद जमीन वापस लेने की प्रक्रिया शुरू हुई।

    सरकार ने developer को ₹137.07 करोड़ क्यों दिए?

    Agreement खत्म होने के बाद private developer ने करीब ₹229.6 करोड़ compensation की मांग की थी। इसके बाद audit और settlement प्रक्रिया के जरिए मामला तय किया गया और सरकार ने ₹137.07 करोड़ का भुगतान किया।

    इसके बाद भी Central Library project की कहानी खत्म नहीं हुई। 2022 में अधूरे civil और electrical काम को पूरा करने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने करीब ₹53 करोड़ का नया tender जारी किया।

    इस तरह project से जुड़े विवाद में अलग-अलग चरणों पर ₹2.5 करोड़ के alleged sponsorship payments, ₹75 करोड़ से अधिक के alleged state loss, ₹137.07 करोड़ के settlement और ₹53 करोड़ के fresh construction tender जैसे अलग-अलग आंकड़े सामने आए। इन रकमों को आपस में जोड़कर एक ही “घोटाले की रकम” मानना सही नहीं होगा।

    मामले में पहले भी अधिकारियों को राहत मिल चुकी थी

    Kalina case में कुछ PWD अधिकारियों को इससे पहले भी राहत मिल चुकी थी। 2021 में तत्कालीन PWD अधिकारियों अनिलकुमार गायकवाड़ और संजय सोलंकी को discharge किया गया था।

    अब भुजबल और मामले में बचे अन्य आरोपियों के discharge के बाद इस ACB case में सभी आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही समाप्त हो गई है।

    2015 से 2026 तक कैसे बदली मामले की तस्वीर?

    Kalina Central Library विवाद की शुरुआत 2009 की tender प्रक्रिया से जुड़ी थी। 2010 में project का work order जारी हुआ। 2010 और 2011 में welfare foundation को हुए sponsorship payments जांच का हिस्सा बने। 2015 में ACB ने मामला दर्ज किया।

    इसके बाद आरोपपत्र और लंबी कानूनी प्रक्रिया चली। 2019 में सरकार ने project agreement समाप्त किया और ₹137.07 करोड़ के settlement के बाद जमीन वापस ली। 2021 में कुछ PWD अधिकारियों को discharge किया गया और 2022 में अधूरे library work के लिए ₹53 करोड़ का fresh tender निकाला गया।

    24 सितंबर 2026 को Special MP/MLA Court ने छगन भुजबल और पांच पूर्व PWD अधिकारियों को भी discharge कर दिया।

    भुजबल के लिए इस फैसले का क्या मतलब है?

    छगन भुजबल वर्तमान में महाराष्ट्र के Food, Civil Supplies and Consumer Protection मंत्री हैं। महाराष्ट्र सरकार के विभागीय पोर्टल पर उनका नाम वर्तमान मंत्री के रूप में दर्ज है।

    आज का आदेश उनके PWD मंत्री कार्यकाल से जुड़े लंबित ACB corruption cases में अंतिम मामले के रूप में सामने आया है। इससे पहले 2026 में Maharashtra Sadan और उससे जुड़े मामलों में भी उन्हें न्यायिक राहत मिल चुकी थी।

    हालांकि Kalina मामले का विस्तृत reasoned order अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं था। इसलिए आगे की कानूनी स्थिति, यदि कोई नई कार्यवाही होती है, तो विस्तृत आदेश के सामने आने के बाद अधिक स्पष्ट होगी।

    कलिना Central Library विवाद में अदालत का मौजूदा निष्कर्ष यह है कि उपलब्ध अभियोजन सामग्री भुजबल की ऐसी आपराधिक भागीदारी, मंशा या जानकारी स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं थी, जिससे उनके खिलाफ आरोप तय कर मुकदमा आगे बढ़ाया जा सके।

  • मुंबई में 124 पेड़ों की कटाई पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, IICT प्रोजेक्ट पर उठे कई सवाल

    मुंबई में 124 पेड़ों की कटाई पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस, IICT प्रोजेक्ट पर उठे कई सवाल

    मुंबई Film City में IICT के लिए 124 पेड़ काटने और 333 पेड़ों के ट्रांसप्लांट पर सुप्रीम कोर्ट ने जवाब मांगा।

    मुंबई: Film City के पास प्रस्तावित Indian Institute of Creative Technologies (IICT) के स्थायी कैंपस के लिए 124 पेड़ों की कटाई और 333 पेड़ों के ट्रांसप्लांटेशन का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। बुधवार को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने महाराष्ट्र सरकार और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने पेड़ काटने की अनुमति नहीं दी है।

    चीफ जस्टिस सूर्य कांत के साथ जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने मुंबई की Tree Authority की ओर से यह आवेदन रखा गया था। मामला Aarey में पेड़ों की कटाई से संबंधित सुप्रीम कोर्ट की पहले से चल रही कार्यवाही से जुड़ा है।

    IICT के लिए 124 पेड़ काटने और 333 पेड़ों को दूसरी जगह लगाने का प्रस्ताव

    प्रस्तावित कैंपस के लिए कुल 457 पेड़ प्रभावित होने की बात सामने आई है। इनमें 124 पेड़ों को काटने और 333 पेड़ों को ट्रांसप्लांट करने की अनुमति मांगी गई है।

    Tree Authority की ओर से कोर्ट को बताया गया कि संबंधित जमीन Film City में है और Aarey Forest के अंदर नहीं आती। कोर्ट के सामने आवेदन इसलिए भी रखा गया क्योंकि जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने Aarey Colony क्षेत्र में पेड़ों की कटाई की अनुमति को लेकर Tree Authority पर बिना कोर्ट की मंजूरी के आगे बढ़ने पर रोक लगाई थी।

    इस मामले में अभी सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि प्रस्तावित कैंपस की जमीन की वास्तविक कानूनी और भौगोलिक स्थिति क्या है और पेड़ों की कटाई तथा ट्रांसप्लांटेशन का मौजूदा प्रस्ताव किस आधार पर तैयार किया गया है।

    IICT आखिर क्या है?

    यह परियोजना केवल एक सामान्य फिल्म इंस्टीट्यूट नहीं है। Indian Institute of Creative Technologies को Animation, Visual Effects, Gaming, Comics और Extended Reality यानी AVGC-XR क्षेत्र के लिए National Centre of Excellence के रूप में विकसित किया जा रहा है।

    IICT एक Section 8 कंपनी के रूप में केंद्र सरकार, महाराष्ट्र सरकार और उद्योग जगत की भागीदारी से बनाई गई है। इसमें केंद्र सरकार की 34 प्रतिशत और महाराष्ट्र सरकार की 14 प्रतिशत हिस्सेदारी बताई गई है। बाकी हिस्सेदारी उद्योग संगठनों की है।

    केंद्र सरकार ने IICT की स्थापना के लिए 391.15 करोड़ रुपये की one-time budgetary support को मंजूरी दी थी। वहीं Film City के स्थायी कैंपस से जुड़ी पहले की जानकारी में अलग project cost सामने आई थी, इसलिए दोनों आंकड़ों को एक ही लागत मानना सही नहीं होगा।

    IICT का मौजूदा काम पहले से जारी है। संस्थान ने मुंबई के NFDC परिसर से जुलाई 2025 में काम शुरू किया था। अप्रैल 2026 तक 18 courses में 136 students के enrolled होने की जानकारी सामने आई थी। Film City में प्रस्तावित परिसर इसका permanent campus होगा।

    सरकार ने IICT को AVGC-XR ecosystem के विस्तार से भी जोड़ा है। 15,000 secondary schools और 500 colleges में AVGC Content Creator Labs स्थापित करने की योजना भी सामने आ चुकी है।

    Aarey और Film City को लेकर क्यों उठ रहा है सवाल?

    इस मामले में Aarey Forest, Aarey Colony और Film City को एक ही जगह मानना सही नहीं होगा। परियोजना पक्ष का कहना है कि जिस जमीन पर IICT campus प्रस्तावित है, वह Film City में है और Aarey Forest का हिस्सा नहीं है।

    वहीं पर्यावरण कार्यकर्ता और NGO Vanashakti की ओर से इस location और project के लिए वैकल्पिक जगहों की संभावना पर सवाल उठाए गए हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता अरुंधति काटजू ने कोर्ट में पूछा कि जंगल से सटे क्षेत्र में इस तरह का संस्थान बनाने के लिए यही जगह क्यों जरूरी है और क्या दूसरे स्थानों की suitability का अध्ययन किया गया है।

    पेड़ों की संख्या में बदलाव ने भी सवाल खड़े किए

    इस पूरे मामले में पेड़ों के आंकड़ों का बदलना भी ध्यान देने योग्य है। जनवरी 2026 में सामने आई जानकारी में इसी IICT campus के लिए 255 पेड़ों की कटाई और 201 पेड़ों के transplantation का आंकड़ा बताया गया था। उस हिसाब से कुल 456 पेड़ प्रभावित होने थे।

    अब सुप्रीम कोर्ट के सामने 124 पेड़ काटने और 333 पेड़ों के transplantation का आंकड़ा रखा गया है। कुल संख्या 457 होती है, लेकिन दोनों प्रस्तावों में कटाई और transplantation की संख्या में बड़ा बदलाव है।

    उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट नहीं है कि यह बदलाव revised tree survey, project design में परिवर्तन, पेड़ों की श्रेणी में बदलाव या किसी अन्य तकनीकी मूल्यांकन के कारण हुआ। इसलिए इस अंतर का आधिकारिक स्पष्टीकरण आगे महत्वपूर्ण हो सकता है।

    सुप्रीम कोर्ट में स्वतंत्र पेड़ मूल्यांकन का विकल्प

    सुनवाई के दौरान पेड़ों की संख्या और उनके मूल्यांकन को लेकर भी चर्चा हुई। Tree Authority की ओर से यह बताया गया कि जरूरत पड़ने पर स्वतंत्र संस्था से assessment कराया जा सकता है। इसके लिए IIT Bombay, VJTI और Bombay Natural History Society जैसे संस्थानों के नाम भी सामने आए।

    इससे मामले का फोकस सिर्फ पेड़ काटने की संख्या तक सीमित नहीं रहता। यह भी देखा जा सकता है कि कौन से पेड़ काटने की श्रेणी में रखे गए हैं, किन पेड़ों को ट्रांसप्लांट किया जा सकता है और क्या परियोजना में पेड़ों को बचाने के लिए वैकल्पिक डिजाइन या व्यवस्था संभव है।

    5,000 पेड़ लगाने का undertaking

    परियोजना पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट को compensatory afforestation के तहत महाराष्ट्र Forest Development Corporation के माध्यम से 5,000 पेड़ लगाने का undertaking दिए जाने की जानकारी दी है।

    लेकिन compensatory plantation में सिर्फ संख्या महत्वपूर्ण नहीं होती। plantation की जगह, पेड़ों की प्रजातियां, survival monitoring और लंबे समय तक उनकी देखरेख भी महत्वपूर्ण होंगी।

    Aarey से जुड़े पुराने मामलों में भी compensatory afforestation और पेड़ों के survival की निगरानी सुप्रीम कोर्ट के सामने महत्वपूर्ण मुद्दा रही है। इसलिए इस मामले में भी 5,000 पेड़ों के plantation की वास्तविक निगरानी आगे अहम हो सकती है।

    2025 के 95 पेड़ों वाले मामले से भी जुड़ता है मामला

    Film City क्षेत्र में पेड़ों की कटाई को लेकर 2025 में Goregaon-Mulund Link Road से संबंधित 95 पेड़ों का मामला भी सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था। उस मामले में भी Film City की जमीन और Aarey से संबंधित कोर्ट के आदेश के बीच संबंध को लेकर सवाल उठा था।

    सुप्रीम कोर्ट ने उस कार्यवाही में alternative options, expert assessment और compensatory afforestation जैसे पहलुओं पर ध्यान दिया था। वर्तमान IICT मामले में भी alternative site और पेड़ों के independent assessment का मुद्दा सामने आया है।

    जनवरी 2025 का सुप्रीम कोर्ट आदेश क्यों महत्वपूर्ण है?

    10 जनवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने Aarey Colony क्षेत्र में Tree Authority द्वारा पेड़ काटने की अनुमति देने की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। Tree Authority आवेदन पर विचार कर सकती है, लेकिन Aarey Colony में पेड़ों की कटाई के लिए कोर्ट की अनुमति के बिना आगे नहीं बढ़ सकती।

    इसी पृष्ठभूमि में वर्तमान IICT आवेदन सुप्रीम कोर्ट के सामने आया है। हालांकि वर्तमान मामले में परियोजना पक्ष का स्पष्ट कहना है कि संबंधित जमीन Aarey Forest के भीतर नहीं है।

    Environmental clearance और tree-cutting permission अलग-अलग हैं

    IICT campus को लेकर environmental और wildlife clearance से संबंधित प्रक्रिया भी आगे बढ़ चुकी है। अगस्त 2026 में परियोजना के Sanjay Gandhi National Park के आसपास के eco-sensitive zone से जुड़े पर्यावरणीय पहलुओं पर भी मंजूरी और शर्तों की जानकारी सामने आई थी।

    इन शर्तों में wildlife conservation के लिए राशि जमा करना, compound wall और सुरक्षा उपाय तथा wildlife को प्रभावित करने वाली high-intensity lighting पर नियंत्रण जैसे प्रावधान शामिल बताए गए थे।

    हालांकि environmental या wildlife clearance को Supreme Court की tree-felling permission के बराबर नहीं माना जा सकता। वर्तमान सुनवाई में 124 पेड़ों की कटाई और 333 पेड़ों के transplantation के लिए Court की भूमिका इसी वजह से महत्वपूर्ण है।

    IICT का विस्तार भी जारी

    IICT का permanent campus ऐसे समय में प्रस्तावित है जब संस्थान अपने education और industry ecosystem का विस्तार कर रहा है। अगस्त 2026 में Netflix के साथ partnership के तहत 100 students के लिए scholarships की घोषणा की गई थी। छह professional programmes के लिए financial support का प्रावधान किया गया है।

    इससे IICT का दायरा traditional filmmaking से आगे animation, VFX, gaming और अन्य creative technologies तक दिखाई देता है।

    अब आगे क्या होगा?

    सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है और इसके लिए दो सप्ताह का समय दिया है। इसके बाद कोर्ट tree-felling proposal, पेड़ों की संख्या, project location, alternative possibilities और compensatory afforestation से जुड़े पहलुओं पर आगे विचार कर सकता है।

    अगर स्वतंत्र tree assessment कराया जाता है, तो 124 पेड़ों की कटाई और 333 पेड़ों के transplantation के मौजूदा आंकड़ों की स्वतंत्र जांच भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

    फिलहाल स्थिति साफ है: IICT के स्थायी Film City campus के लिए 124 पेड़ काटने और 333 पेड़ों को ट्रांसप्लांट करने की अनुमति का मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने है, लेकिन पेड़ काटने की अंतिम अनुमति अभी नहीं मिली है। आने वाले दो सप्ताह में महाराष्ट्र सरकार और अन्य पक्षों के जवाब के बाद इस मामले की अगली दिशा स्पष्ट होगी।