म्हाडा की लॉटरी में प्लॉट मिलने के बावजूद मालवणी के 300 परिवार 32 साल से अपने घर का इंतजार कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब क्या बदलेगा?
मुंबई: मालाड-मालवणी के करीब 300 परिवारों का अपने सपनों के घर का इंतजार अब 32 साल लंबा हो चुका है। 1994 में म्हाडा की लॉटरी में भूखंड मिलने और पूरी रकम जमा करने के बावजूद हजारों लोग आज भी अपने प्लॉट पर घर नहीं बना सके हैं। अब 25 फरवरी 2025 को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले और म्हाडा की नई कार्रवाई के बाद इन परिवारों में एक बार फिर उम्मीद जगी है कि शायद उनका तीन दशक पुराना संघर्ष अब खत्म हो सके।
यह मामला मालवणी स्थित मुंबई नागरी विकास प्रकल्प क्रमांक-1 (BUDP) से जुड़ा है, जिसे विश्व बैंक की सहायता से शुरू किया गया था। लेकिन सीआरजेड नियमों, प्रशासनिक देरी और कानूनी लड़ाई ने सैकड़ों परिवारों का सपना अधूरा छोड़ दिया।
एक नजर में पूरा मामला
- वर्ष 1994 में म्हाडा ने मालवणी में भूखंड आवंटित किए।
- करीब 300 परिवारों ने लॉटरी में प्लॉट जीते।
- लाभार्थियों ने तय रकम भी जमा की।
- सीआरजेड नियमों के कारण निर्माण रुक गया।
- मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
- 25 फरवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया।
- अब म्हाडा ने सात सहकारी गृहनिर्माण संस्थाओं के संबंध में कार्रवाई शुरू करने की बात कही है।
1994 में मिला प्लॉट, लेकिन घर आज तक नहीं
करीब 32 साल पहले मालवणी में मुंबई नागरी विकास प्रकल्प क्रमांक-1 के तहत आर्थिक रूप से कमजोर और निम्न आय वर्ग के लोगों को भूखंड आवंटित किए गए थे। लोगों ने लॉटरी जीतने के बाद निर्धारित राशि जमा कर दी थी और उन्हें उम्मीद थी कि कुछ वर्षों में उनका अपना घर बन जाएगा।
लेकिन हालात ऐसे बने कि हजारों लोगों का सपना अधूरा रह गया।
आखिर क्यों रुक गई पूरी योजना?
इस परियोजना के सामने सबसे बड़ी बाधा कोस्टल रेगुलेशन जोन (CRZ) के नियम बने।
समुद्र तट से 60 मीटर के दायरे में आने वाले क्षेत्रों में निर्माण पर प्रतिबंध लगने के बाद मालवणी के कई भूखंड प्रभावित हो गए। इसके कारण जिन लोगों को प्लॉट आवंटित किए गए थे, वे अपने ही भूखंड पर निर्माण नहीं कर सके।
यहीं से शुरू हुई 32 साल लंबी कानूनी और प्रशासनिक लड़ाई।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
मालवणी के भूखंडधारकों ने अपने अधिकारों के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।
25 फरवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाया। इसके बाद म्हाडा ने कहा कि वह सात सहकारी गृहनिर्माण संस्थाओं के संबंध में कानूनी सलाह लेकर आगे की कार्रवाई करेगा।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के आदेश की पूरी प्रति और उसकी सभी शर्तें अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं।
म्हाडा ने क्या कहा?
म्हाडा के अनुसार—
- योजना 30 से 32 साल पुरानी है।
- पुराने आवेदन और रिकॉर्ड बिखरे हुए हैं।
- फाइलों को कोड नंबर के आधार पर दोबारा व्यवस्थित किया जा रहा है।
- सात सहकारी गृहनिर्माण संस्थाओं के मामलों की जांच चल रही है।
- सदस्य सूची में समय-समय पर बदलाव किए गए हैं।
- पुराने रिकॉर्ड की सत्यता की जांच की जा रही है।
- कई मूल लाभार्थियों की मृत्यु हो चुकी हो सकती है।
- वारिसों को अधिकार देने के लिए वारिस प्रमाणपत्र जरूरी होगा।
सबसे बड़ी समस्या: रिकॉर्ड ही नहीं मिल रहे
म्हाडा ने स्वीकार किया है कि तीन दशक पुराने रिकॉर्ड अस्त-व्यस्त हालत में हैं।
अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि—
- पुराने आवेदन ढूंढे जाएं।
- मूल विजेताओं की पहचान की जाए।
- सोसायटी की सदस्य सूची का सत्यापन किया जाए।
- वारिसों की पहचान की जाए।
- प्लॉटों की मौजूदा स्थिति स्पष्ट की जाए।
सात सोसायटियां कौन-सी हैं?
म्हाडा ने सात सहकारी गृहनिर्माण संस्थाओं का जिक्र तो किया है, लेकिन उनके नाम अब तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बन गया है।
अब तक सार्वजनिक रूप से इन सवालों के जवाब नहीं मिले हैं—
- सातों सोसायटियों के नाम क्या हैं?
- उनका रजिस्ट्रेशन नंबर क्या है?
- कौन-कौन से प्लॉट उनसे जुड़े हैं?
- कितने लाभार्थी अभी जीवित हैं?
- कितने मामलों में वारिसों ने दावा किया है?
इसके पहले के आंकड़े क्या है?
इस मामले को लेकर कई बार अलग-अलग दावे किए जा चुके हैं।
हालांकि इस समय करीब 300 परिवारों का जिक्र हो रहा है, जबकि पुराने आंकड़ों में प्रभावित लोगों की संख्या इससे कहीं अधिक बताई गई है। फिलहाल अब सिर्फ 300 परिवार रह गए है, जिन्होंने वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ी और आज भी अपने घर का इंतजार कर रहे हैं।
32 साल में क्या-क्या हुआ? समझिए पूरी टाइमलाइन
1994
म्हाडा ने मालवणी में भूखंडों की लॉटरी निकाली। करीब 300 परिवारों को प्लॉट आवंटित हुए।
1994–1995
लाभार्थियों ने तय रकम जमा की।
1990 के दशक के आखिर में
सीआरजेड नियमों के कारण निर्माण कार्य प्रभावित होने लगा।
2000–2010
मामला कानूनी विवाद में फंस गया और कई परिवार अदालत पहुंचे।
2010–2024
भूखंडधारकों ने विभिन्न स्तरों पर लड़ाई जारी रखी।
25 फरवरी 2025
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में फैसला सुनाया।
जून 2026
म्हाडा ने कहा कि सात सहकारी गृहनिर्माण संस्थाओं के संबंध में कानूनी सलाह लेकर कार्रवाई की जाएगी।
सबसे बड़े सवाल जिसका जवाब ही नहीं मिला
आज भी कई ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब किसी के पास नहीं है—
- 300 परिवारों को जमीन का वास्तविक कब्जा कब मिलेगा?
- सातों सोसायटियों के नाम क्यों छिपाए गए हैं?
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले की पूरी शर्तें क्या हैं?
- कितने प्लॉट निर्माण योग्य हैं?
- कितने मूल लाभार्थियों की मृत्यु हो चुकी है?
- वारिसों को कब तक अधिकार मिलेंगे?
- 32 साल की देरी के लिए जिम्मेदार कौन है?
300 परिवारों का दर्द
कल्पना कीजिए कि किसी व्यक्ति ने 1994 में अपना घर पाने के लिए पूरी जिंदगी की बचत लगा दी हो और 2026 में भी वह अपने घर का इंतजार कर रहा हो।
इन 32 वर्षों में कई लाभार्थी बुजुर्ग हो चुके हैं। कई लोगों का निधन हो चुका है। कुछ परिवारों की दूसरी पीढ़ी अब इस लड़ाई को आगे बढ़ा रही है।
उनके लिए यह सिर्फ एक भूखंड नहीं, बल्कि जीवनभर का सपना है।
आगे क्या होगा?
अब सबकी नजर म्हाडा की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है।
यदि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार प्रक्रिया पूरी होती है, रिकॉर्ड का सत्यापन हो जाता है और वारिसों की पहचान पूरी हो जाती है, तो संभव है कि 32 साल से इंतजार कर रहे सैकड़ों परिवारों को आखिरकार उनका हक मिल सके।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है—
क्या 300 परिवारों का 32 साल पुराना इंतजार सचमुच खत्म होने वाला है, या उन्हें अभी और इंतजार करना पड़ेगा?
FAQ
1. मालवणी म्हाडा भूखंड मामला क्या है?
यह मामला मालाड-मालवणी स्थित मुंबई नागरी विकास प्रकल्प क्रमांक-1 (BUDP) से जुड़ा है। वर्ष 1994 में म्हाडा ने करीब 300 परिवारों को भूखंड आवंटित किए थे, लेकिन सीआरजेड नियमों और कानूनी विवादों के कारण आज तक कई परिवार अपने प्लॉट पर घर नहीं बना सके हैं।
2. यह योजना कितनी पुरानी है?
म्हाडा के अनुसार यह योजना करीब 30 से 32 साल पुरानी है।
3. इस मामले में कितने परिवार प्रभावित हैं?
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस मामले में करीब 300 परिवार सीधे तौर पर प्रभावित हैं।
4. सुप्रीम कोर्ट ने फैसला कब सुनाया था?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 25 फरवरी 2025 को फैसला सुनाया था।
5. निर्माण क्यों रुक गया था?
समुद्र तट के पास लागू सीआरजेड (Coastal Regulation Zone) नियमों के कारण निर्माण कार्य प्रभावित हुआ था।
6. क्या म्हाडा ने कार्रवाई शुरू कर दी है?
म्हाडा ने कहा है कि सात सहकारी गृहनिर्माण संस्थाओं के संबंध में कानूनी राय लेकर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
7. सातों हाउसिंग सोसायटियों के नाम सार्वजनिक हुए हैं?
नहीं। अभी तक सातों सहकारी गृहनिर्माण संस्थाओं के नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।
8. जिन लाभार्थियों का निधन हो चुका है, उनके वारिसों का क्या होगा?
म्हाडा के अनुसार, ऐसे मामलों में वारिसों को अधिकार देने के लिए वारिस प्रमाणपत्र जमा करना होगा।

