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  • महाराष्ट्र सरकार ने जारी किया नया GR: 7/12 जमीन की रजिस्ट्री के लिए कब जरूरी होगी NOC?

    महाराष्ट्र सरकार ने जारी किया नया GR: 7/12 जमीन की रजिस्ट्री के लिए कब जरूरी होगी NOC?

    महाराष्ट्र सरकार के नए परिपत्र में साझा 7/12 जमीन की रजिस्ट्री के नियम स्पष्ट किए गए हैं। जानें मोजणी की ‘क’ प्रत और सहहिस्सेदारों की NOC कब जरूरी होगी।

    मुंबई: महाराष्ट्र सरकार ने साझा नाम वाले 7/12 उतारे की जमीन की बिक्री और रजिस्ट्री को लेकर नया परिपत्र जारी किया है। 19 अक्टूबर 2026 के इस परिपत्र के अनुसार, जमीन बेचने वाले सहहिस्सेदार के पास भूमि अभिलेख विभाग की मोजणी की ‘क’ प्रत है और उसे बिक्री के दस्त के साथ जोड़ा गया है, तो अन्य सहहिस्सेदारों की लिखित सहमति या NOC के बिना भी रजिस्ट्री की जा सकती है। लेकिन यह प्रत उपलब्ध नहीं होने या दस्त के साथ नहीं लगाने पर दूसरे सहहिस्सेदारों की सहमति अथवा NOC जरूरी होगी।

    महसूल विभाग के इस निर्देश में सभी दुय्यम निबंधकों को नियमों का पालन करने के लिए कहा गया है। इसका उद्देश्य साझा जमीन की बिक्री के बाद होने वाले विवादों और पंजीकरण कार्यालयों में आने वाली शिकायतों को कम करना है।

    मोजणी की ‘क’ प्रत होने पर NOC की जरूरत नहीं

    परिपत्र के पहले बिंदु के अनुसार, अगर 7/12 उतारे पर कई सहहिस्सेदारों के नाम दर्ज हैं और उनमें से कोई अपने हिस्से का निर्धारित भाग बेचना चाहता है, तो उसे भूमि अभिलेख विभाग से प्राप्त मोजणी की ‘क’ प्रत दस्त के साथ संलग्न करनी होगी।

    ऐसी स्थिति में दुय्यम निबंधक दूसरे सहहिस्सेदारों की लिखित सहमति या ना-हरकत प्रमाणपत्र (NOC) मांगे बिना दस्त का पंजीकरण कर सकते हैं।

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    यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि मोजणी की ‘क’ प्रत का इस्तेमाल जमीन के संबंधित भाग की पहचान और सीमा से जुड़ी जानकारी के लिए किया जाता है। हालांकि, सिर्फ मोजणी का नक्शा होने से स्वामित्व, कानूनी विभाजन या जमीन पर लागू दूसरे प्रतिबंधों की जांच खत्म नहीं होती।

    मोजणी की ‘क’ प्रत नहीं है तो क्या करना होगा?

    परिपत्र के दूसरे बिंदु में स्पष्ट किया गया है कि अगर जमीन बेचने वाला सहहिस्सेदार मोजणी की ‘क’ प्रत उपलब्ध नहीं कराता या उसे दस्त के साथ संलग्न नहीं करता, तो अन्य सहहिस्सेदारों की लिखित सहमति या NOC के बिना दस्त का पंजीकरण नहीं किया जाना चाहिए।

    इसलिए जमीन बेचने से पहले संबंधित दस्तावेज तैयार रखना महत्वपूर्ण होगा। जिन लोगों के पास मोजणी की प्रत नहीं है, उन्हें अपनी स्थिति के अनुसार भूमि अभिलेख विभाग और संबंधित दुय्यम निबंधक कार्यालय से आवश्यक प्रक्रिया की जानकारी लेनी चाहिए।

    सरकार ने नया परिपत्र क्यों जारी किया?

    परिपत्र की प्रस्तावना में बताया गया है कि साझा जमीन के किसी हिस्से की बिक्री के समय दूसरे सहहिस्सेदारों की अनुमति या NOC नहीं लेने से पक्षकारों के बीच विवाद पैदा होते हैं। ऐसे विवादों के कारण न्यायालयों में याचिकाओं की संख्या बढ़ने और पंजीकरण विभाग को शिकायतें मिलने की समस्या का उल्लेख किया गया है।

    इसी वजह से सहहिस्सेदारों की लिखित सहमति को दस्त का हिस्सा बनाने और सभी दुय्यम निबंधकों को मानक कार्यप्रणाली (SOP) के माध्यम से निर्देश देने का प्रस्ताव रखा गया था।

    परिपत्र में महाराष्ट्र के राज्यपाल के आदेश से अवर सचिव विनायक लवटे के हस्ताक्षर का उल्लेख है। इसकी प्रत नोंदणी महानिरीक्षक व मुद्रांक नियंत्रक, महाराष्ट्र राज्य, पुणे; अपर मुद्रांक नियंत्रक, प्रधान मुद्रांक कार्यालय, मुंबई; सभी विभागों के नोंदणी उपमहानिरीक्षक व मुद्रांक उपनियंत्रक; सभी सह जिला निबंधक व मुद्रांक जिलाधिकारी और सभी दुय्यम निबंधकों को भेजे जाने की बात कही गई है।

    संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम की धारा 44 का क्या है महत्व?

    परिपत्र में संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 की धारा 44 का उल्लेख है। सामान्य रूप से यह धारा किसी सह-मालिक को अचल संपत्ति में अपना कानूनी हिस्सा हस्तांतरित करने से संबंधित है।

    इसका मतलब यह नहीं है कि साझा 7/12 पर नाम दर्ज होने के कारण कोई भी सहहिस्सेदार अपना कानूनी हिस्सा हर परिस्थिति में नहीं बेच सकता। लेकिन किसी अविभक्त हिस्से की बिक्री और जमीन के निश्चित भूभाग को अलग करके बेचने की कानूनी स्थिति अलग हो सकती है।

    खरीदारों को यह भी समझना चाहिए कि दस्त का पंजीकरण होना और जमीन पर निर्विवाद, अलग स्वामित्व मिलना दो अलग बातें हैं। इसलिए जमीन खरीदने से पहले विक्रेता के स्वामित्व दस्तावेज, मोजणी नक्शा, फेरफार रिकॉर्ड, बंधक और लंबित मुकदमों की जांच करना जरूरी है।

    मोजणी की ‘क’ प्रत के लिए कहां आवेदन करें?

    महाराष्ट्र भूमि अभिलेख विभाग के ऑनलाइन पोर्टल पर जमीन की मोजणी के लिए आवेदन किया जा सकता है। आवेदन में जिला, तालुका, गांव, सर्वे नंबर या गट नंबर और हिस्सा नंबर जैसी जानकारी की जरूरत पड़ सकती है।

    भूमि अभिलेख विभाग के आधिकारिक पोर्टल पर मोजणी आवेदन की सुविधा उपलब्ध है:
    https://landrecord.mahaonline.gov.in/MeasurementOrdinaryApplication/MeasurementOrdinaryApplication

    आवेदन करने से पहले संबंधित कार्यालय से यह पता कर लेना चाहिए कि जमीन के प्रस्तावित व्यवहार के लिए कौन-सी मोजणी आवश्यक है, ‘क’ प्रत किस रूप में मिलेगी और उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया क्या है।

    जमीन खरीदने और बेचने वालों के लिए जरूरी बातें

    जमीन बेचने वाले सहहिस्सेदार को सबसे पहले अपने कानूनी हिस्से और बिक्री के लिए प्रस्तावित क्षेत्र की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। इसके बाद मोजणी की ‘क’ प्रत की उपलब्धता और पंजीकरण के लिए जरूरी दस्तावेजों की जानकारी संबंधित दुय्यम निबंधक कार्यालय से लेनी चाहिए।

    खरीदार को केवल 7/12 उतारे पर नाम देखकर सौदा अंतिम नहीं करना चाहिए। स्वामित्व दस्तावेज, मोजणी, फेरफार, बंधक और जमीन पर किसी कानूनी विवाद की स्थिति की जांच भी जरूरी है। अगर दूसरे सहहिस्सेदारों के साथ मतभेद हैं, तो दस्त तैयार करने से पहले संपत्ति कानून के जानकार से सलाह लेना उचित होगा।

    महाराष्ट्र सरकार के इस परिपत्र का मुख्य प्रावधान मोजणी की ‘क’ प्रत की उपलब्धता के आधार पर सहहिस्सेदारों की सहमति से जुड़ा है। हालांकि, 19 अक्टूबर 2026 के परिपत्र की मूल आधिकारिक प्रति संलग्न है। जमीन की रजिस्ट्री से पहले संबंधित पंजीकरण कार्यालय से वर्तमान निर्देशों की पुष्टि करना जरूरी है।

  • महाराष्ट्र में फ्लैट रजिस्ट्री के नए नियम: पुराने घरों की बिक्री पर क्या होगा असर?

    महाराष्ट्र में फ्लैट रजिस्ट्री के नए नियम: पुराने घरों की बिक्री पर क्या होगा असर?

    महाराष्ट्र में अनधिकृत फ्लैटों की रजिस्ट्री पर नए निर्देश। जानें जरूरी दस्तावेज, मंजूर नक्शे की जांच, पुराने घरों की बिक्री और खरीदारों पर असर।

    मुंबई: महाराष्ट्र में अनधिकृत निर्माण और मंजूर नक्शे से ज्यादा क्षेत्रफल वाले फ्लैटों की रजिस्ट्री पर रोक लगाने के लिए राज्य सरकार ने नए निर्देश जारी किए हैं। 12 अक्टूबर 2026 के परिपत्र के जरिए दुय्यम निबंधकों को संपत्ति के दस्त रजिस्टर करते समय जरूरी कागजात और फ्लैट के मंजूर क्षेत्रफल की जांच करने के निर्देश दिए गए हैं।

    इस फैसले का मकसद घर खरीदने वालों को गलत जानकारी देकर फ्लैट बेचने और अनधिकृत निर्माण से जुड़े मामलों पर रोक लगाना है। हालांकि, पुराने भवनों के पास मंजूर नक्शे उपलब्ध नहीं होने की समस्या भी सामने आई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि नए नियमों का असर पहले से बनी इमारतों में फ्लैट खरीदने और बेचने वालों पर कैसे पड़ेगा।

    फ्लैट की रजिस्ट्री के लिए किन दस्तावेजों की जरूरत होगी?

    नए निर्देशों के अनुसार, संपत्ति के दस्त रजिस्टर करते समय प्रोजेक्ट की कैटेगरी और लागू नियमों के हिसाब से जरूरी दस्तावेजों की जांच करनी होगी।

    MahaRERA के दायरे में आने वाले प्रोजेक्टों के लिए संबंधित पंजीकरण प्रमाणपत्र या लागू निर्देशों के अनुसार ऑक्युपेशन सर्टिफिकेट (OC), मंजूर भवन नक्शा और उसमें दर्ज फ्लैट के क्षेत्रफल की जांच महत्वपूर्ण होगी।

    वहीं, MahaRERA में रजिस्ट्रेशन से छूट वाले प्रोजेक्टों के लिए निर्माण अनुमति या कमेंसमेंट सर्टिफिकेट (CC), मंजूर भवन नक्शा, जोन सर्टिफिकेट और माप या सर्वे नक्शे जैसे दस्तावेजों की जरूरत हो सकती है।

    यहां ध्यान देना जरूरी है कि CC और OC अलग-अलग दस्तावेज हैं। CC निर्माण शुरू करने की अनुमति से जुड़ा होता है, जबकि OC भवन के इस्तेमाल या उसमें रहने की अनुमति से संबंधित है। किसी प्रोजेक्ट का MahaRERA में रजिस्ट्रेशन होना भी इस बात की पूरी गारंटी नहीं है कि इमारत का हर हिस्सा मंजूर नक्शे के अनुसार बना है।

    मंजूर नक्शे से ज्यादा क्षेत्रफल होने पर क्या होगा?

    यदि फ्लैट के बिक्री दस्त में दर्ज क्षेत्रफल मंजूर भवन नक्शे में दर्ज क्षेत्रफल से ज्यादा पाया जाता है, तो नए निर्देशों के तहत रजिस्ट्री में रुकावट आ सकती है।

    इसका सीधा संबंध उन मामलों से है, जिनमें खरीदार को फ्लैट का ऐसा क्षेत्रफल बताया जाता है जो मंजूर नक्शे या संबंधित दस्तावेजों से मेल नहीं खाता।

    हालांकि, क्षेत्रफल की जांच करते समय कारपेट एरिया, बिल्ट-अप एरिया और दूसरे मापों के बीच अंतर समझना जरूरी है। इन सभी को एक ही मानकर तुलना नहीं की जा सकती। किसी मामले में अंतर दिखाई देने पर संबंधित दस्तावेजों और लागू नियमों की जांच जरूरी होगी।

    निर्देशों का जानबूझकर उल्लंघन करके दस्त रजिस्टर करने वाले संबंधित दुय्यम निबंधक के खिलाफ विभागीय जांच भी की जा सकती है।

    पुरानी इमारतों में फ्लैट खरीदने वालों की बढ़ सकती है परेशानी

    नए नियमों के सामने आने के बाद पुरानी इमारतों में फ्लैट की खरीद-बिक्री को लेकर भी सवाल उठे हैं। कई पुरानी इमारतों के मंजूर नक्शे उपलब्ध नहीं हैं। कुछ मामलों में संबंधित नगर निकाय या दूसरे सक्षम प्राधिकरण से पुराने रिकॉर्ड हासिल करना भी मुश्किल हो सकता है।

    ऐसी स्थिति में फ्लैट का मालिक अपनी संपत्ति बेचना चाहता है, लेकिन जरूरी नक्शा या अन्य दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, तो रजिस्ट्री की प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका है।

    पुरानी इमारतों के लिए किसी खास छूट या वैकल्पिक दस्तावेज प्रक्रिया की पुष्टि जरूरी है। फिलहाल यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि महाराष्ट्र में सभी पुराने फ्लैटों की बिक्री या रजिस्ट्री बंद हो गई है।

    सरकार की ओर से यदि इस विषय पर कोई नया स्पष्टीकरण या राहत जारी होती है, तो पुराने भवनों में रहने वाले परिवारों और हाउसिंग सोसायटियों के लिए यह महत्वपूर्ण अपडेट होगा।

    डोंबिवली की 65 इमारतों का मामला भी चर्चा में

    डोंबिवली में 65 ऐसी इमारतों का मामला सामने आया है, जिनके MahaRERA में रजिस्टर्ड होने के बावजूद निर्माण की वैधता पर सवाल उठे हैं। इस मामले में मुंबई हाई कोर्ट की कार्यवाही और निवासियों से संबंधित हलफनामे का भी उल्लेख हुआ है।

    यह मामला नए परिपत्र से अलग है, लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण बात समझ आती है कि सिर्फ MahaRERA नंबर देखकर किसी इमारत की सभी कानूनी मंजूरियों को सही नहीं मान लेना चाहिए।

    घर खरीदने वालों को संबंधित प्राधिकरण की निर्माण अनुमति, मंजूर नक्शे और लागू होने पर OC जैसे दस्तावेजों की भी जांच करनी चाहिए। यदि किसी इमारत के निर्माण की वैधता पर सवाल हैं, तो खरीदने से पहले कानूनी सलाह लेना बेहतर होगा।

    क्या सरकार के फैसले से घर खरीदने वालों को राहत मिलेगी?

    नए निर्देशों से इल्लीगल कंस्ट्रक्शन और मंजूर नक्शे से अलग क्षेत्रफल वाले फ्लैटों की बिक्री को रोकने में मदद मिल सकती है। इससे खरीदारों को संपत्ति के दस्तावेजों की जांच पर ज्यादा ध्यान देने का अवसर मिलेगा।

    लेकिन दूसरी ओर, जिन पुरानी इमारतों के रिकॉर्ड अधूरे हैं, उनके मालिकों को फ्लैट बेचने में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। बिल्डरों के लिए भी निर्माण अनुमति, प्रोजेक्ट पंजीकरण और मंजूर क्षेत्रफल से जुड़े दस्तावेज सही रखना जरूरी होगा।

    फ्लैट की कीमतों पर इस फैसले का कितना असर पड़ेगा, इसे लेकर फिलहाल कोई प्रमाणित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि नए नियमों से संपत्ति की कीमतें बढ़ेंगी या घटेंगी।

    फ्लैट खरीदने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

    घर खरीदने से पहले कुछ जरूरी जांच करने से भविष्य में होने वाली परेशानियों का जोखिम कम किया जा सकता है।

    • MahaRERA की वेबसाइट पर प्रोजेक्ट का रजिस्ट्रेशन और उपलब्ध जानकारी जांचें।
    • संबंधित प्राधिकरण से मंजूर भवन नक्शे की कॉपी मांगें।
    • बिक्री दस्त में दर्ज फ्लैट के क्षेत्रफल का मंजूर नक्शे से मिलान करें।
    • लागू होने पर OC, CC और अन्य जरूरी अनुमतियों की स्थिति जांचें।
    • पुरानी इमारत में नक्शा उपलब्ध नहीं होने पर संबंधित प्राधिकरण से रिकॉर्ड हासिल करने की प्रक्रिया जानें।
    • दस्त रजिस्टर करने में परेशानी आने पर लिखित कारण मांगें और जरूरत पड़ने पर संपत्ति कानून के विशेषज्ञ से सलाह लें।

    MahaRERA की आधिकारिक वेबसाइट https://www.maharera.maharashtra.gov.in/ पर प्रोजेक्ट से संबंधित उपलब्ध जानकारी देखी जा सकती है। रजिस्ट्री से जुड़ी शिकायतों के लिए महाराष्ट्र के पंजीकरण एवं मुद्रांक विभाग के शिकायत पोर्टल https://grievanceigr.maharashtra.gov.in/ का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

    परिपत्र की कानूनी वैधता पर भी उठे सवाल

    नए निर्देशों को लेकर रियल एस्टेट टेक्नो-लीगल सलाहकार सथ्येन प्रसाद ने सवाल उठाया है कि क्या कार्यकारी परिपत्र के जरिए कानून में दिए गए अधिकारों से आगे जाकर व्यापक प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

    फिलहाल घर खरीदने वालों के लिए सबसे जरूरी बात यही है कि फ्लैट की कीमत और लोकेशन के साथ उसके मंजूर नक्शे, निर्माण अनुमति और दूसरे जरूरी दस्तावेजों की भी जांच करें। वहीं, पुरानी इमारतों के मामले में यह स्पष्ट होना बाकी है कि दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने पर किन वैकल्पिक प्रक्रियाओं या छूट का लाभ मिल सकता है।

  • 1,600 की जगह 2,400 वर्गफुट की मांग, Motilal Nagar में MHADA के खिलाफ क्यों हुआ हंगामा?

    1,600 की जगह 2,400 वर्गफुट की मांग, Motilal Nagar में MHADA के खिलाफ क्यों हुआ हंगामा?

    गोरेगांव के Motilal Nagar redevelopment में 1,600 वर्गफुट घर का प्रस्ताव है, लेकिन निवासी 2,400 वर्गफुट मांग रहे हैं। जानें पूरा विवाद और आगे की स्थिति।

    मुंबई: गोरेगांव के मोतीलाल नगर 1, 2 और 3 का पुनर्विकास अब सिर्फ पुरानी इमारतों को नए टावरों में बदलने की योजना नहीं रह गई है। करीब 143 एकड़ में फैले इस बड़े पुनर्विकास में एक तरफ MHADA आधुनिक आवास, सड़क, जल निकासी, सीवरेज, हरित क्षेत्र और सामुदायिक सुविधाओं वाला नया इलाका तैयार करने की योजना पर आगे बढ़ रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ पात्र निवासियों की 2,400 वर्गफुट के घर की मांग जोर पकड़ रहा है। अगस्त में MHADA ने सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण कराने की मांग स्वीकार की थी, लेकिन 2,400 वर्गफुट की मांग पर अंतिम फैसला अभी बाकी है।

    इस परियोजना को Construction and Development Agency मॉडल के तहत Estatevue Developers Private Limited के जरिए लागू किया जा रहा है, जो अदाणी समूह की कंपनी है। MHADA के साथ जुलाई 2025 में समझौता हो चुका है। जमीन का स्वामित्व और परियोजना पर संस्थागत नियंत्रण MHADA के पास ही रहेगा।

    1,600 वर्गफुट घर पर सहमति, फिर 2,400 की मांग क्यों?

    मोतीलाल नगर पुनर्विकास का सबसे बड़ा सवाल घर के आकार को लेकर है। मौजूदा मास्टर प्लान में करीब 3,702 पात्र आवासीय लाभार्थियों को 1,600 वर्गफुट के पुनर्वास घर देने की योजना बताई गई है। लेकिन निवासियों की मांग 2,400 वर्गफुट कारपेट एरिया की है। अगस्त 2026 में इस मांग को लेकर MHADA मुख्यालय पर प्रदर्शन भी हुआ था। इसके बाद MHADA के उपाध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी संजीव जयस्वाल ने सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण कराने की मांग स्वीकार की, जबकि 2,400 वर्गफुट के मुद्दे को राज्य सरकार के निर्णय के लिए भेजा गया।

    2025 के न्यायिक रिकॉर्ड में परियोजना के मूल Construction and Development Agreement के तहत लगभग 3,372 MHADA पात्र आवासीय इकाइयों को 1,600 वर्गफुट built-up area देने का प्रावधान दर्ज है। वहीं 2026 के मास्टर प्लान में पात्र आवासीय लाभार्थियों की संख्या करीब 3,702 बताई गई है। यानी दोनों दस्तावेजों में 330 इकाइयों का अंतर दिखाई देता है। यह अंतर किस वजह से आया, इसे MHADA की ओर से स्पष्ट किया जाना बाकी है।

    निवासियों की 2,400 वर्गफुट की मांग का एक आधार यह भी है कि कुछ निवासियों ने अपने मूल आवंटित क्षेत्र के अलावा MHADA से अतिरिक्त जमीन खरीदी थी। करीब 45 वर्गमीटर अतिरिक्त जमीन के अधिकार को पुनर्वास क्षेत्र की गणना में किस तरह शामिल किया जाएगा, यह विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।

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    143 एकड़ में सिर्फ इमारतें नहीं, पूरा इलाका बदलेगा

    MHADA का मौजूदा मास्टर प्लान मोतीलाल नगर को एक एकीकृत शहरी क्षेत्र के रूप में विकसित करने की योजना रखता है। प्रस्ताव में चौड़ी आंतरिक सड़कें, नई जल निकासी व्यवस्था, सीवरेज नेटवर्क, जलापूर्ति में सुधार, वर्षा जल संचयन, सौर प्रकाश व्यवस्था और हरित क्षेत्र शामिल हैं। लगभग 12 मीटर और 18 मीटर चौड़ी आंतरिक सड़कों का प्रस्ताव है तथा करीब 17.5 एकड़ क्षेत्र को मनोरंजन और खुले स्थानों के लिए रखने की बात सामने आई है।

    मास्टर प्लान में आवासीय और व्यावसायिक पुनर्वास के साथ बाजार, शॉपिंग सेंटर, कार्यालय, मिश्रित उपयोग वाली इमारतें, स्वास्थ्य सुविधाएं, स्कूल, सामुदायिक केंद्र, सांस्कृतिक सुविधाएं और मनोरंजन से जुड़े स्थान विकसित करने की योजना है। इसका उद्देश्य केवल नई इमारतें बनाना नहीं बल्कि पूरे इलाके की आधारभूत सुविधाओं को एक साथ बदलना है।

    220 पेड़ों और मौजूदा मैदानों का क्या होगा?

    पुनर्विकास के साथ पर्यावरण और खुले स्थानों का सवाल भी सामने आया है। बाद की Tree Authority approval reporting के अनुसार 220 पेड़ों पर असर पड़ने की स्थिति में 89 पेड़ों को काटने और 131 पेड़ों को स्थानांतरित करने की अनुमति दी गई थी। इससे पहले सामने आए प्रस्तावों में दोनों प्रमुख मैदानों के आसपास पेड़ों की कटाई और स्थानांतरण की अलग-अलग संख्या बताई गई थी।

    मोतीलाल नगर के Ambedkar Maidan और Annabhau Sathe Maidan स्थानीय निवासियों के लिए खेल और सामुदायिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण खुले स्थान हैं। दूसरी ओर, पुनर्विकास योजना में करीब 15 एकड़ का नया हरित क्षेत्र, खेल सुविधाएं, उद्यान, जॉगिंग और साइकिल ट्रैक, वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्थान तथा अन्य सार्वजनिक सुविधाओं की योजना है।

    अब असली सवाल यह है कि मौजूदा मैदानों और पेड़ों की जगह बनने वाला नया हरित नेटवर्क स्थानीय लोगों के लिए उसी स्तर का सार्वजनिक उपयोग और पहुंच सुनिश्चित कर पाएगा या नहीं।

    बारिश में जलभराव से लेकर नई आबादी तक बड़ी चुनौती

    मोतीलाल नगर का पुनर्विकास ऐसे इलाके में हो रहा है जहां मानसून के दौरान जलभराव की समस्या का उल्लेख न्यायिक और परियोजना संबंधी रिकॉर्ड में भी हुआ है। इसी वजह से नई stormwater drainage व्यवस्था को परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। सीवरेज नेटवर्क को बढ़ती आबादी के अनुरूप तैयार करने और परिसर में sewage treatment plant बनाने की योजना भी है।

    यानी परियोजना की सफलता केवल नई ऊंची इमारतों से नहीं मापी जाएगी। अगर हजारों नए और पुनर्वासित परिवारों के आने के बाद सड़क, पानी और drainage व्यवस्था दबाव में आती है, तो redevelopment का मूल उद्देश्य अधूरा रह सकता है।

    3,702 परिवारों के अलावा दुकानदार और झुग्गी बस्तियां भी योजना में

    मोतीलाल नगर पुनर्विकास में केवल मौजूदा आवासीय लाभार्थी ही नहीं हैं। न्यायिक रिकॉर्ड में करीब 328 पात्र व्यावसायिक इकाइयों को 987 वर्गफुट built-up area के पुनर्वास का प्रावधान दर्ज है। इसके अलावा करीब 1,600 झुग्गी निवासियों के पुनर्वास और सुविधाओं का प्रावधान लागू SRA नियमों और DCPR के अनुसार रखा गया है।

    इसका मतलब यह है कि पुनर्विकास के दौरान सिर्फ परिवारों के घर बदलने का सवाल नहीं है। स्थानीय दुकानदारों और छोटे कारोबारों की आजीविका, अस्थायी स्थानांतरण और दोबारा कारोबार शुरू करने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होगी।

    Transit accommodation की जिम्मेदारी किसकी?

    Construction and Development Agreement के अनुसार आवासीय और व्यावसायिक इकाइयों के लिए आवश्यक transit accommodation की व्यवस्था C&DA की जिम्मेदारी में शामिल है। परियोजना चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़नी है, इसलिए सभी लोगों को एक साथ हटाने के बजाय अलग-अलग चरणों में स्थानांतरण की व्यवस्था की जा सकती है।

    हालांकि, निवासियों के लिए अभी सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक सवाल transit rent की राशि, भुगतान की शुरुआत, किराये में बढ़ोतरी, shifting charges और निर्माण में देरी होने की स्थिति में अतिरिक्त भुगतान को लेकर हैं। इन बिंदुओं पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी में अभी उतनी स्पष्टता नहीं है जितनी हजारों परिवारों के लिए जरूरी है।

    अदाणी को जमीन नहीं, विकास की जिम्मेदारी

    मोतीलाल नगर परियोजना को लेकर एक आम भ्रम यह हो सकता है कि 143 एकड़ जमीन अदाणी समूह को सौंप दी गई है। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड इसके बजाय अलग व्यवस्था दिखाता है।

    MHADA जमीन का नियंत्रण अपने पास रखते हुए Construction and Development Agency के जरिए परियोजना लागू कर रहा है। अदालत के रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि C&DA को MHADA की ओर से पुनर्वास भवन, आरक्षित सुविधाएं, MHADA के हिस्से की इमारतें और आधारभूत ढांचा विकसित करना है। परियोजना पर नियंत्रण MHADA के पास रहने की बात भी स्पष्ट रूप से दर्ज है।

    अदाणी समूह की कंपनी को इस मॉडल में परियोजना के विकास और निर्माण की जिम्मेदारी मिलती है। जुलाई 2025 के समझौते के तहत MHADA को करीब 3,97,100 वर्गमीटर निर्मित क्षेत्र मिलने की बात आधिकारिक दस्तावेज में दर्ज है।

    1 लाख करोड़ और 36 हजार करोड़ में फर्क समझना जरूरी

    मोतीलाल नगर परियोजना की लागत को लेकर दो बड़े आंकड़े सामने आते हैं। करीब 36,000 करोड़ रुपये का आंकड़ा पुनर्वास, MHADA हिस्से और संबंधित बुनियादी ढांचे के बड़े खर्च से जुड़ा है। वहीं करीब 1 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पूरे दीर्घकालिक विकास और बिक्री योग्य हिस्से समेत संभावित निवेश से संबंधित है।

    परियोजना के आर्थिक मॉडल में अदाणी समूह को विकास योग्य और बिक्री योग्य क्षेत्र मिलता है, जबकि वह पुनर्वास और अन्य निर्धारित निर्माण कार्यों का खर्च उठाता है। 2025 के न्यायिक रिकॉर्ड में C&DA के लिए free-sale development rights और rehabilitation component की प्रगति के बीच संबंध भी दर्ज है।

    परियोजना में देरी हुई तो क्या होगा?

    यह सवाल भी हजारों परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है। न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार परियोजना को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने की व्यवस्था है और C&DA पर निर्धारित निर्माण तथा पुनर्वास की जिम्मेदारी है। समझौते में performance bank guarantee और देरी की स्थिति में निर्धारित नुकसान की भरपाई का प्रावधान भी दर्ज है। डिफॉल्ट की स्थिति में MHADA के पास C&DA को बदलने की शक्ति भी रखी गई है।

    इससे यह स्पष्ट होता है कि पुनर्विकास केवल developer की इच्छा पर निर्भर परियोजना नहीं है। MHADA ने contractual safeguards के साथ अपनी भूमिका बनाए रखी है।

    कोर्ट से भी मिली पुनर्विकास को आगे बढ़ाने की मंजूरी

    मोतीलाल नगर का integrated redevelopment लंबे समय से कानूनी विवाद का हिस्सा रहा है। 2 जुलाई 2026 के Bombay High Court के फैसले में अदालत ने MHADA के integrated cluster redevelopment मॉडल और C&DA के जरिए परियोजना लागू करने की व्यवस्था को चुनौती से जुड़े मामलों पर विचार किया। अदालत ने यह माना कि MHADA अपने संसाधनों और तकनीकी क्षमता को देखते हुए redevelopment के लिए बाहरी agency नियुक्त कर सकता है और परियोजना का नियंत्रण MHADA के पास रह सकता है।

    अदालत के रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि 6 अक्टूबर 2021 के सरकारी निर्णय के तहत Motilal Nagar I, II और III के संयुक्त पुनर्विकास को विशेष परियोजना का दर्जा दिया गया था। इस मॉडल का उद्देश्य पुराने और जर्जर ढांचे को हटाकर एक साथ infrastructure और amenities विकसित करना है।

    जमीन पर परियोजना कितनी आगे बढ़ी?

    यह परियोजना अभी केवल कागज पर मौजूद योजना नहीं है। MHADA ने 25 मार्च 2026 को Motilal Nagar-1 के Plot MN1 P2 के प्रस्तावित पुनर्विकास के लिए Intimation of Approval जारी किया था। हालांकि IOA को पूरे 143 एकड़ में निर्माण पूरा शुरू होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता; अलग-अलग हिस्सों की मंजूरियों और निर्माण की स्थिति को चरणवार देखना होगा।

    अब सबसे अहम मुद्दा यही है कि master plan से जमीन पर निर्माण तक की प्रक्रिया कितनी तेजी से आगे बढ़ती है और पहले पुनर्वास भवनों का निर्माण कब पूरा होता है।

    मोतीलाल नगर का यह पुनर्विकास इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां केवल इमारतों का भविष्य तय नहीं हो रहा। 143 एकड़ के इस क्षेत्र में MHADA यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि cluster redevelopment के जरिए घर, सड़क, drainage, पानी, खुले स्थान और सामुदायिक सुविधाओं को एक साथ बदला जा सकता है। वहीं 2,400 वर्गफुट की मांग, पात्र लाभार्थियों के आंकड़ों में अंतर, transit व्यवस्था, पेड़ों और मैदानों का भविष्य तथा परियोजना की जमीन पर प्रगति ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब आने वाले चरण में इस परियोजना की वास्तविक सफलता तय करेंगे।

  • MMRDA का e-Punarvasan शुरू, Garib Nagar के 94 PAP परिवारों को मिले कब्जा पत्र

    MMRDA का e-Punarvasan शुरू, Garib Nagar के 94 PAP परिवारों को मिले कब्जा पत्र

    MMRDA ने e-Punarvasan शुरू कर PAP पुनर्वास को डिजिटल किया। Garib Nagar के 94 पात्र परिवारों को पहले दिन कब्जा पत्र मिले, जानिए पूरी प्रक्रिया।

    मुंबई: परियोजनाओं से प्रभावित लोगों के पुनर्वास की प्रक्रिया को डिजिटल बनाने के लिए मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण ने 1 अक्टूबर से मुंबई में ‘ई-पुनर्वसन’ प्रणाली शुरू कर दी है। नई व्यवस्था में परियोजना प्रभावित व्यक्ति यानी पीएपी के सर्वे से लेकर पात्रता जांच, मकान आवंटन, लॉटरी और कब्जा देने तक की प्रक्रिया को एक ही डिजिटल प्रणाली से जोड़ दिया गया है। इसके पहले दिन बांद्रा पूर्व के गरीब नगर के 94 पात्र प्रभावित परिवारों को कब्जा पत्र दिए गए।

    इस प्रणाली को एमएमआरडीए के महानगर आयुक्त डॉ. संजय मुखर्जी ने शुरू किया। इस दौरान अतिरिक्त महानगर आयुक्त-1 वेलरासु और संयुक्त महानगर आयुक्त पंकज देवरे भी मौजूद रहे।

    गरीब नगर के 100 पात्र परिवारों का पुनर्वास

    गरीब नगर का मामला इस नई व्यवस्था का पहला प्रमुख उदाहरण है। बांद्रा पूर्व में रेलवे परियोजना से प्रभावित 100 परिवारों को पुनर्वास के लिए पात्र माना गया था। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार इनमें 84 परिवारों के लिए कुर्ला की पुनर्वास इमारतों में आवास और 16 परिवारों के लिए एचडीआईएल कुर्ला की इमारत में आवास की व्यवस्था की गई थी।

    इन पुनर्वास आवासों का क्षेत्रफल करीब 279 वर्गफुट बताया गया है। 1 अक्टूबर को शुरू हुई डिजिटल प्रक्रिया के पहले दिन 94 पात्र प्रभावित परिवारों को कब्जा पत्र मिलने की जानकारी सामने आई है। कुल 100 पात्र परिवारों और पहले दिन 94 कब्जा पत्र मिलने के बीच का अंतर इस बात से जुड़ा है कि सभी पात्र मामलों की प्रक्रिया एक ही चरण में पूरी नहीं हुई।

    गरीब नगर का मामला अदालत तक पहुंचा था

    गरीब नगर में पुनर्वास का मामला कई महीनों से चल रहा था। जुलाई 2026 में बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष भी पात्र परिवारों को बिजली, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी कठिनाइयों का मुद्दा सामने आया था। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को पात्र परिवारों के लिए जरूरी सुविधाएं बहाल करने और पुनर्वास की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए थे।

    1 सितंबर 2026 के न्यायिक आदेश में एमएमआरडीए ने अदालत को बताया था कि 100 पात्र पीएपी परिवारों को वैकल्पिक आवास देने की प्रक्रिया चल रही है। इनमें 84 परिवारों में से 77 को आवंटन पत्र जारी हो चुके थे, लेकिन संबंधित इमारत को अधिभोग प्रमाणपत्र नहीं मिलने के कारण उन्हें तत्काल भौतिक कब्जा नहीं दिया जा सका था। अग्निशमन विभाग की अनापत्ति भी लंबित बताई गई थी। एमएमआरडीए ने 30 सितंबर तक अधिभोग प्रमाणपत्र हासिल करने के प्रयास की जानकारी अदालत को दी थी। मामले की अगली सुनवाई 6 अक्टूबर 2026 के लिए निर्धारित है।

    सर्वे से लेकर कब्जे तक पूरी प्रक्रिया डिजिटल

    ई-पुनर्वसन में सबसे पहले मोबाइल आधारित ई-सर्वे के जरिए प्रभावित परिवारों की जानकारी दर्ज की जाएगी। इसके बाद आधार आधारित ऑफलाइन सत्यापन, पुराने बिजली बिलों की ऑनलाइन जांच, संयुक्त सत्यापन और पात्रता से जुड़े अनुबंध-2 की प्रक्रिया डिजिटल प्रणाली में शामिल होगी।

    पात्रता तय होने के बाद उपलब्ध पुनर्वास आवासों में से मकान का चयन कंप्यूटरीकृत ई-लॉटरी के जरिए किया जाएगा। एमएमआरडीए के अनुसार उपलब्ध आवासों में से चयन लॉटरी के माध्यम से होगा और चयन के दौरान मानवीय हस्तक्षेप नहीं रहेगा।

    इसके बाद आवंटन पत्र और कब्जा पत्र डिजिटल रूप से तैयार किए जाएंगे। लाभार्थी की पहचान की पुष्टि के लिए अंगूठे का निशान और जीवित तस्वीर भी दर्ज की जाएगी। संबंधित दस्तावेजों को क्यूआर कोड के माध्यम से जोड़ा जा सकेगा।

    आधार सत्यापन की भी होगी डिजिटल व्यवस्था

    ई-पुनर्वसन में आधार आधारित ऑफलाइन सत्यापन मांगने वाली संस्था यानी ओवीएसई व्यवस्था को भी शामिल किया गया है। एमएमआरडीए के अनुसार वह इस व्यवस्था का इस्तेमाल करने वाला देश का पहला संगठन है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य लाभार्थी द्वारा उपलब्ध कराई गई आधार संबंधी जानकारी को ऑफलाइन तरीके से सत्यापित कर उसे संबंधित पुनर्वास मामले से जोड़ना है।

    पुराने बिजली बिलों की भी ऑनलाइन जांच की जाएगी। इससे प्रभावित व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत पुराने निवास संबंधी दस्तावेजों की जांच बिजली सेवा प्रदाताओं के रिकॉर्ड से की जा सकेगी।

    पुनर्वास आवासों का भी बनेगा डिजिटल रिकॉर्ड

    ई-पुनर्वसन सिर्फ लाभार्थियों का रिकॉर्ड डिजिटल नहीं करेगा। पुनर्वास इमारतों और प्रत्येक आवास का भी डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा। इसमें उपलब्ध, आवंटित और कब्जा दिए जा चुके आवासों की स्थिति दर्ज होगी।

    प्राधिकरण के अधिकारी डैशबोर्ड और प्रबंधन सूचना प्रणाली के माध्यम से प्रत्येक मामले की स्थिति, आवंटन और पुनर्वास की प्रगति देख सकेंगे। कब्जा मिलने के बाद की पुनर्वास संबंधी कार्रवाई का रिकॉर्ड भी डिजिटल रूप से रखा जाएगा।

    दो साल पहले शुरू हो चुकी थी डिजिटल व्यवस्था की तैयारी

    ई-पुनर्वसन को पूरी तरह अचानक शुरू की गई व्यवस्था नहीं माना जा सकता। एमएमआरडीए की आधिकारिक जानकारी के अनुसार सामाजिक विकास प्रकोष्ठ के पुनर्वास कार्य को कंप्यूटरीकृत करने और पीएपी आवंटन के लिए ई-लॉटरी प्रणाली तैयार करने का ठेका 15 अक्टूबर 2024 को दिया गया था।

    इस परियोजना की लागत 1.10 करोड़ रुपये, जीएसटी को छोड़कर, निर्धारित की गई थी। इसका ठेका निओसॉफ्ट टेक प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया था। परियोजना के लिए तीन महीने का क्रियान्वयन और सेवा शुरू होने के बाद दो वर्ष का सहयोग निर्धारित था। इस प्रणाली में आधारभूत सामाजिक-आर्थिक सर्वे, पात्रता तय करना, लॉटरी, आवंटन पत्र और कब्जा पत्र जारी करने जैसी प्रक्रियाएं शामिल की गई थीं।

    हजारों प्रभावित परिवारों तक पहुंच सकता है असर

    एमएमआरडीए के पुनर्वास कार्य का दायरा गरीब नगर के 100 परिवारों तक सीमित नहीं है। प्राधिकरण के आधिकारिक आंकड़ों में विभिन्न परियोजनाओं से जुड़े 42,228 आवासीय और 4,458 गैर-आवासीय परियोजना प्रभावित व्यक्तियों का उल्लेख है। इसके अलावा अन्य संस्थाओं की परियोजनाओं से जुड़े प्रभावित लोगों के लिए भी एमएमआरडीए द्वारा पुनर्वास आवास उपलब्ध कराए जाते हैं।

    एमएमआरडीए के पास पहले से बड़ी संख्या में पुनर्वास आवासों का नेटवर्क भी है। ऐसे में उपलब्ध, आवंटित और कब्जा दिए गए आवासों की डिजिटल सूची तैयार होने से भविष्य में किसी पीएपी मामले की स्थिति पता करना अधिकारियों के लिए आसान हो सकता है।

    ई-लॉटरी से आवंटन में क्या बदलेगा

    नई व्यवस्था में आवास का चयन कंप्यूटरीकृत लॉटरी के जरिए किए जाने का दावा है। इसका उद्देश्य उपलब्ध आवासों में से चयन की प्रक्रिया को दर्ज करने योग्य बनाना और व्यक्तिगत स्तर पर मकान चुनने की गुंजाइश कम करना है।

    हालांकि पुनर्वास की पूरी प्रक्रिया केवल लॉटरी पर निर्भर नहीं है। सर्वे, दस्तावेजों की जांच, संयुक्त सत्यापन और पात्रता तय करना जैसे चरण लॉटरी से पहले होते हैं। इसलिए डिजिटल लॉटरी को पूरी पुनर्वास प्रक्रिया से मानवीय निर्णय खत्म होने के रूप में नहीं देखा जा सकता।

    लाभार्थियों के लिए क्या बदलेगा

    ई-पुनर्वसन के बाद किसी पीएपी मामले में सर्वे से लेकर पात्रता, आवंटन और कब्जे तक की स्थिति एकीकृत रिकॉर्ड में दर्ज की जा सकेगी। एमएमआरडीए का कहना है कि इससे अलग-अलग कागजी और एक्सेल रिकॉर्ड पर निर्भरता घटेगी तथा पुनर्वास मामलों की निगरानी आसान होगी।

    प्राधिकरण के अनुसार इस व्यवस्था का एक उद्देश्य प्रभावित लोगों को बिचौलियों पर निर्भरता से बचाना और उनके पुनर्वास मामले की स्थिति को अधिक स्पष्ट बनाना भी है।

    अब आगे क्या

    गरीब नगर में 1 अक्टूबर को ई-पुनर्वसन के जरिए कब्जा पत्र जारी होना इस नई डिजिटल व्यवस्था का पहला बड़ा व्यावहारिक इस्तेमाल है। अब इसकी वास्तविक परीक्षा उन मामलों में होगी जहां बड़ी संख्या में प्रभावित परिवारों की पात्रता, दस्तावेज, आवास उपलब्धता और आवंटन एक साथ संभालना होगा।

    गरीब नगर मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की अगली सुनवाई 6 अक्टूबर को निर्धारित है। इस बीच ई-पुनर्वसन के तहत पुनर्वास प्रक्रिया आगे बढ़ने से यह भी स्पष्ट होगा कि डिजिटल सर्वे, सत्यापन, आवंटन और कब्जे की एकीकृत व्यवस्था लंबे समय से लंबित पीएपी मामलों को कितनी तेजी से आगे बढ़ा पाती है।

  • Petrol Pump UPI Rule: ₹2,000 से ज्यादा के भुगतान पर बदलेंगे नियम, जानिए ग्राहकों पर क्या होगा असर

    Petrol Pump UPI Rule: ₹2,000 से ज्यादा के भुगतान पर बदलेंगे नियम, जानिए ग्राहकों पर क्या होगा असर

    15 अक्टूबर से ₹2,000 से ज्यादा UPI मर्चेंट पेमेंट पर MDR लागू होगा। पेट्रोल पंपों पर ₹5 शुल्क को लेकर डीलर्स के विरोध से ग्राहकों के भुगतान विकल्प बदल सकते हैं।

    मध्यप्रदेश: ₹2,000 से ज्यादा के पेट्रोल-डीजल भुगतान के लिए UPI इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों को जल्द नया नियम देखने को मिल सकता है। 15 अक्टूबर 2026 से हाई-वैल्यू UPI मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर नया Merchant Discount Rate (MDR) लागू होना है। पेट्रोल और डीजल जैसे fuel transactions के लिए ₹2,000 से ऊपर के भुगतान पर flat ₹5 MDR तय किया गया है। इसी शुल्क का विरोध करते हुए मध्य प्रदेश के पेट्रोल पंप डीलर्स ने 16 अक्टूबर से ₹2,000 से ज्यादा के UPI भुगतान स्वीकार नहीं करने का फैसला किया है।

    इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल पंपों पर UPI पूरी तरह बंद हो जाएगा। ₹2,000 तक के भुगतान पर UPI जारी रहेगा। विवाद सिर्फ ₹2,000 से ज्यादा के merchant payment पर लगने वाले MDR को लेकर है। सरकार की व्यवस्था के मुताबिक यह शुल्क ग्राहक से सीधे वसूलने के लिए नहीं है, बल्कि merchant-side payment processing cost है।

    क्या बदलेगा 15 अक्टूबर से?

    नए framework में सामान्य eligible UPI merchant transactions पर ₹2,000 से ऊपर 0.4 प्रतिशत MDR रखा गया है। वहीं fuel, railway, telecom और कुछ अन्य श्रेणियों के लिए ₹2,000 से ऊपर flat ₹5 MDR का प्रावधान है। सामान्य category में बहुत बड़े transactions के लिए ₹300 की अधिकतम सीमा भी रखी गई है।

    इसलिए पेट्रोल पंप के मामले में 0.4 प्रतिशत और ₹5 MDR के बीच अंतर समझना जरूरी है। उदाहरण के लिए ₹10,000 के सामान्य eligible merchant UPI payment पर 0.4 प्रतिशत के हिसाब से ₹40 MDR बन सकता है, जबकि fuel transaction के लिए ₹2,000 से ऊपर flat ₹5 का प्रावधान है।

    ग्राहक को ₹5 अलग से देना होगा?

    नहीं। MDR को ग्राहक पर सीधे UPI शुल्क के रूप में डालने की व्यवस्था नहीं की गई है। इसका असर merchant और payment ecosystem के बीच होने वाली processing cost पर है। हालांकि पेट्रोल पंप डीलर्स का कहना है कि उनके कम और निर्धारित मार्जिन में यह अतिरिक्त लागत उठाना मुश्किल होगा।

    मध्य प्रदेश में 4,700 पेट्रोल पंपों पर असर

    मध्य प्रदेश में यह फैसला करीब 4,700 पेट्रोल पंपों को प्रभावित कर सकता है। मध्य प्रदेश पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अजय सिंह के मुताबिक प्रत्येक पंप पर रोजाना औसतन करीब 100 ऐसे ग्राहक होते हैं जिनका fuel payment ₹2,000 से ज्यादा होता है। एसोसिएशन ने अनुमान लगाया है कि MDR और GST को मिलाकर एक पंप पर करीब ₹590 प्रतिदिन और लगभग ₹17,700 प्रति माह का अतिरिक्त खर्च बैठ सकता है।

    इस गणना के आधार पर 4,700 पंपों पर संभावित लागत करीब ₹8.3 करोड़ प्रति माह बैठती है। यह डीलर्स के अनुमान पर आधारित गणना है, सरकार की ओर से जारी कोई स्वतंत्र cost assessment नहीं।

    डीलर्स क्यों कर रहे हैं विरोध?

    पेट्रोल पंप कारोबार में fuel की बिक्री पर dealer margin सीमित और निर्धारित होता है। डीलर्स का तर्क है कि बड़े UPI भुगतान पर flat MDR उनकी कमाई को सीधे प्रभावित करेगा। अजय सिंह ने कहा है कि पंप का profit margin बहुत कम है और इस अतिरिक्त खर्च को ग्राहकों से वसूलना भी आसान नहीं है।

    मध्य प्रदेश में डीलर्स ने इस मुद्दे पर अपने State-Level Coordinator को पत्र भी भेजा है और सरकार से UPI को MDR से छूट देने की मांग की है। उनका कहना है कि petrol pumps को credit और debit card transactions में पहले से MDR संबंधी छूट मिली हुई है, इसलिए UPI के लिए भी इसी तरह की राहत दी जानी चाहिए।

    ग्राहकों के पास कौन-कौन से विकल्प रहेंगे?

    अगर मध्य प्रदेश के डीलर्स का फैसला बिना बदलाव लागू होता है, तो ₹2,000 से ज्यादा के fuel payment पर ग्राहक को UPI के बजाय उपलब्ध दूसरे payment mode का इस्तेमाल करना पड़ सकता है।

    ₹2,000 तक के fuel payment के लिए UPI उपलब्ध रहेगा। मध्य प्रदेश डीलर्स एसोसिएशन ने debit और credit card payment सुविधा जारी रखने की बात कही है। इसलिए इसे पूरे पेट्रोल पंप पर cash-only व्यवस्था के रूप में समझना सही नहीं होगा। अलग-अलग पंपों पर उपलब्ध payment options अलग हो सकते हैं।

    क्या ₹2,000 से ज्यादा का UPI भुगतान पूरे देश में बंद होगा?

    नहीं। नया MDR framework पूरे देश में लागू होने वाला payment-cost framework है, लेकिन ₹2,000 से ज्यादा का UPI स्वीकार करना या न करना merchant का अलग operational decision हो सकता है।

    फिलहाल fuel dealers के बीच इसका विरोध कई जगह दिखाई दे रहा है। मध्य प्रदेश में 4,700 पंपों का फैसला सामने आया है, जबकि महाराष्ट्र में भी fuel dealers ने UPI पर MDR से छूट की मांग की है। मुंबई के पेट्रोल पंप संचालकों ने भी 15 अक्टूबर से high-value UPI payments रोकने की चेतावनी दी है, अगर fuel retailers को MDR से छूट नहीं मिलती।

    महाराष्ट्र में भी बढ़ रहा विरोध

    महाराष्ट्र में fuel dealers का कहना है कि ₹5 का flat MDR कम margin वाले कारोबार पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। महाराष्ट्र के dealer organisations इस मुद्दे पर 27 सितंबर के आसपास आगे की रणनीति पर फैसला लेने की बात कह चुके हैं।

    मुंबई में डीलर्स की मांग सिर्फ MDR हटाने तक सीमित नहीं है। उनका एक प्रस्ताव यह भी है कि अगर UPI payment पर कोई processing cost आती है तो उसका बोझ oil marketing companies उठाएं, ताकि पेट्रोल पंप डीलर्स के निर्धारित margin पर सीधा असर न पड़े।

    सरकार और डीलर्स के बीच बातचीत जारी

    इस विवाद के बीच 17 सितंबर को All India Petroleum Dealers Association (AIPDA) के प्रतिनिधियों ने Petroleum and Natural Gas Ministry के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। बैठक में UPI fuel transactions पर MDR exemption की मांग उठाई गई। मंत्रालय की ओर से MDR व्यवस्था के पीछे digital payment infrastructure को मजबूत करने का उद्देश्य भी समझाया गया।

    AIPDA के अध्यक्ष अजय बंसल ने भी Finance Minister के हस्तक्षेप की मांग करते हुए fuel retailers को ₹2,000 से ऊपर UPI payments पर MDR से पूरी छूट देने की मांग की है।

    CAIT ने भी जताई चिंता

    Confederation of All India Traders (CAIT) ने मध्य प्रदेश में high-value UPI payments रोकने के फैसले को डिजिटल transactions के लिए चिंता का विषय बताया है। CAIT के भोपाल जिला अध्यक्ष और मध्य प्रदेश मीडिया प्रभारी धर्मेंद्र शर्मा के अनुसार राज्य के करीब 4,700 पेट्रोल पंप इस फैसले से प्रभावित हो सकते हैं।

    धर्मेंद्र शर्मा ने यह भी स्पष्ट किया कि सामान्य merchant transactions और fuel transactions के MDR में अंतर है। सामान्य eligible merchant payment पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू होता है, जबकि fuel transactions के लिए ₹2,000 से ऊपर flat ₹5 MDR का प्रावधान है।

    एक और जरूरी बात: UPI पूरी तरह महंगा नहीं हुआ है

    नए MDR framework का मतलब यह नहीं है कि हर UPI payment पर शुल्क लगेगा। ₹2,000 तक के merchant payments पर MDR नहीं लगाया गया है और person-to-person UPI transactions भी इस merchant MDR व्यवस्था से अलग हैं। सरकार के मुताबिक नए framework से अधिकांश छोटे-value P2M transactions प्रभावित नहीं होंगे।

    आगे क्या होगा?

    अब मुख्य सवाल यह है कि 15 अक्टूबर से पहले fuel dealers को MDR से छूट मिलती है या नहीं। सरकार और petroleum dealers के बीच बातचीत हो चुकी है, लेकिन उपलब्ध ताजा जानकारी में fuel sector के लिए पूर्ण MDR exemption की अंतिम घोषणा सामने नहीं आई है। इसलिए मध्य प्रदेश में 16 अक्टूबर से ₹2,000 से ऊपर UPI रोकने का फैसला फिलहाल डीलर्स की घोषित स्थिति है और इसमें सरकार के अगले फैसले के आधार पर बदलाव हो सकता है।

    ग्राहकों के लिए फिलहाल सबसे जरूरी बात यही है कि ₹2,000 तक का UPI payment जारी रहेगा, जबकि इससे ज्यादा के fuel payment के लिए 15-16 अक्टूबर के बाद संबंधित पेट्रोल पंप पर उपलब्ध payment option पहले से जांचना जरूरी होगा।

  • Bappa.org क्या है? मुंबईकर अब घर के गणपति की कहानी भी डिजिटल संग्रह में दर्ज कर सकेंगे

    Bappa.org क्या है? मुंबईकर अब घर के गणपति की कहानी भी डिजिटल संग्रह में दर्ज कर सकेंगे

    मुंबई में गणेशोत्सव की परंपराओं को डिजिटल रूप से सहेजने के लिए BMC का Bappa.org अभियान, जानें फोटो-कहानी कैसे भेजें और क्या मिलेगा।

    मुंबई: गणेशोत्सव के दौरान मुंबई के घरों और सार्वजनिक मंडलों में निभाई जाने वाली परंपराओं, यादों और सांस्कृतिक गतिविधियों को अब डिजिटल रूप से सुरक्षित करने की पहल तेज हो गई है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका ने मुंबईकरों से Bappa.org पर अपने गणेशोत्सव की कहानी, तस्वीरें, वीडियो, पारंपरिक प्रथाएं और सामाजिक व पर्यावरणीय गतिविधियों की जानकारी दर्ज करने की अपील की है। खास बात यह है कि इस डिजिटल संग्रह में सिर्फ बड़े गणेश मंडल ही नहीं, बल्कि घरों में स्थापित होने वाले गणपति भी शामिल किए जा रहे हैं।

    Bappa.org क्या है?

    Bappa.org को महाराष्ट्र के गणेशोत्सव का डिजिटल राज्य संग्रह बताया गया है। इसका उद्देश्य महाराष्ट्र में पीढ़ियों से चली आ रही गणेशोत्सव की परंपराओं, परिवारों की यादों, सार्वजनिक मंडलों की गतिविधियों और मूर्ति व सजावट से जुड़ी कला को डिजिटल रिकॉर्ड के रूप में सुरक्षित करना है। पोर्टल के अनुसार यह महाराष्ट्र शासन के सांस्कृतिक कार्य विभाग का उपक्रम है।

    मुंबईकर इसमें क्या दर्ज कर सकते हैं?

    Bappa.org पर गणेशोत्सव से जुड़ी कई तरह की जानकारी साझा की जा सकती है। इसमें घर या मंडल की गणेश प्रतिमा की तस्वीर, सजावट, पारंपरिक आरती, परिवार की वर्षों पुरानी परंपरा, गणेशोत्सव से जुड़ी व्यक्तिगत यादें, सामाजिक कार्य, पर्यावरण संरक्षण के प्रयास और अन्य सांस्कृतिक गतिविधियां शामिल हैं।

    इसका मतलब है कि किसी परिवार के घर में हर साल एक ही तरीके से होने वाला गणेशोत्सव भी इस डिजिटल संग्रह का हिस्सा बन सकता है। इसी तरह सार्वजनिक गणेश मंडल, गृहनिर्माण संस्था और गणेश प्रतिमा से जुड़ा काम करने वाले कारीगर भी अपनी कहानी साझा कर सकते हैं।

    मुंबई के घरों की परंपराएं भी बनेंगी डिजिटल रिकॉर्ड

    मुंबई में गणेशोत्सव का बड़ा हिस्सा केवल प्रसिद्ध सार्वजनिक मंडलों तक सीमित नहीं है। 15 सितंबर को डेढ़ दिन के गणपति विसर्जन के दौरान मुंबई में 24,631 गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन हुआ था, जिनमें 24,521 घरेलू और 110 सार्वजनिक मंडलों की प्रतिमाएं शामिल थीं। ऐसे में घर-घर मनाए जाने वाले गणेशोत्सव की परंपराओं को दर्ज करने का यह प्रयास शहर की व्यापक सांस्कृतिक तस्वीर को सामने ला सकता है।

    Bappa.org के मौजूदा संग्रह में मुंबई सिटी से Parel cha Raja, Saibaba Nagar Colony और Girgaon cha Raja जैसी प्रविष्टियां दिखाई दे रही हैं। इसका मतलब है कि मुंबई से नागरिकों और मंडलों की भागीदारी शुरू हो चुकी है।

    Bappa.org पर कहानी कैसे दर्ज करें?

    पोर्टल के अनुसार इसके लिए किसी विशेष ऐप को डाउनलोड करने या अलग अकाउंट बनाने की जरूरत नहीं है। एक फोटो और अपनी गणेशोत्सव परंपरा के बारे में कुछ पंक्तियों से शुरुआत की जा सकती है। जानकारी भेजने के बाद टीम उसकी जांच करती है और स्वीकार की गई कहानी को डिजिटल संग्रह में दर्ज किया जाता है।

    इसके अलावा ‘घरोघरी बाप्पा’ अभियान के तहत WhatsApp के जरिए भी गणेशोत्सव की कहानी भेजने की सुविधा दी गई है। इसके लिए +91 91361 72681 नंबर जारी किया गया है। इस अभियान में भाग लेना नि:शुल्क बताया गया है।

    कहानी भेजने के बाद क्या होगा?

    Bappa.org पर स्वीकार की गई प्रविष्टियों को एक अलग रिकॉर्ड नंबर दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर 2026-00290 और 2026-00297 जैसी प्रविष्टियां संग्रह में दर्ज हैं। इन रिकॉर्ड में जमा करने और स्वीकार किए जाने की तारीख के साथ डिजिटल evidence भी दिखाई देता है।

    पोर्टल की जानकारी के अनुसार प्रत्येक योगदान को सत्यापन के बाद महाराष्ट्र के राज्य सांस्कृतिक संग्रह का हिस्सा बनाया जाता है। सफलतापूर्वक कहानी दर्ज कराने वाले परिवारों को सांस्कृतिक कार्य विभाग की ओर से आधिकारिक प्रमाणपत्र दिए जाने की जानकारी भी दी गई है।

    सिर्फ मुंबई नहीं, महाराष्ट्र और विदेशों की कहानियां भी

    Bappa.org पर फिलहाल महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों के साथ दूसरे स्थानों से भी गणेशोत्सव की कहानियां दिखाई दे रही हैं। पोर्टल पर मुंबई, सातारा, रायगढ़, पुणे और अन्य क्षेत्रों की प्रविष्टियों के साथ महाराष्ट्र के बाहर से भी योगदान दर्ज हैं।

    हाल की चयनित कहानियों में नए घर में पहला गणेशोत्सव, पारंपरिक गौरी-गणपति उत्सव, घर पर बनाई गई मिट्टी की गणेश प्रतिमा, वियतनाम में भारतीय विद्यार्थियों का गणेशोत्सव और विसर्जन के बाद बची मिट्टी के इस्तेमाल से जुड़ी पर्यावरणीय पहल जैसी अलग-अलग कहानियां शामिल रही हैं।

    इससे साफ है कि इस डिजिटल संग्रह का दायरा केवल गणेश प्रतिमा या पंडाल की तस्वीर तक सीमित नहीं है। परिवार, परंपरा, कला, पर्यावरण और विदेशों में रहने वाले भारतीयों का गणेशोत्सव भी इसका हिस्सा बन सकता है।

    गणेशोत्सव के डिजिटल दस्तावेजीकरण का बड़ा उद्देश्य

    महाराष्ट्र सरकार ने अगस्त 2025 में गणेशोत्सव को राज्य महोत्सव के रूप में मनाने को मंजूरी दी थी। इसके बाद गणेशोत्सव से जुड़ी कला, परंपरा, संस्कृति और सामाजिक गतिविधियों को व्यापक स्तर पर सामने लाने के प्रयास बढ़े हैं।

    इसी व्यापक संदर्भ में Bappa.org पर गणेशोत्सव की परंपराओं का डिजिटल दस्तावेजीकरण किया जा रहा है। गणेशोत्सव की सांस्कृतिक परंपराओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने और UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत से जुड़े प्रयासों के संदर्भ में भी इस दस्तावेजीकरण को जोड़ा जा रहा है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि गणेशोत्सव को UNESCO की मान्यता मिल चुकी है।

    मुंबईकरों के लिए इसका क्या मतलब?

    मुंबई में हर साल लाखों लोग घरों और सार्वजनिक मंडलों के जरिए गणेशोत्सव मनाते हैं। अलग-अलग इलाकों, परिवारों और समुदायों की अपनी अलग परंपराएं हैं। कई परंपराएं केवल परिवार के बुजुर्गों की यादों तक सीमित रह जाती हैं और उनका कोई डिजिटल रिकॉर्ड नहीं होता।

    Bappa.org इसी अंतर को भरने की कोशिश करता है। किसी परिवार की कई दशक पुरानी पूजा पद्धति हो, किसी मंडल का सामाजिक काम हो, पर्यावरण-अनुकूल मूर्ति हो या किसी इलाके की अलग गणेशोत्सव परंपरा—इन अनुभवों को तस्वीर और कहानी के साथ दर्ज किया जा सकता है।

    मुंबईकरों के लिए आसान भाषा में कहें तो Bappa.org पर सिर्फ यह बताना जरूरी नहीं है कि आपके घर में गणपति की मूर्ति कैसी है। यह भी बताया जा सकता है कि आपके परिवार में बाप्पा की परंपरा कब से है, सजावट कैसे होती है, कौन-सी आरती या प्रथा निभाई जाती है और गणेशोत्सव के दौरान परिवार या मंडल क्या खास करता है।

    यानी इस साल का गणेशोत्सव खत्म होने के बाद भी उसकी कहानी डिजिटल संग्रह में दर्ज रह सकती है। मुंबईकर अपने घर या मंडल की परंपरा को Bappa.org के माध्यम से इस राज्यव्यापी सांस्कृतिक रिकॉर्ड का हिस्सा बना सकते हैं।

  • Maharashtra Vertical Property Card: फ्लैट मालिकों के लिए बड़ा अपडेट, दिसंबर में Land Titling Act की तैयारी

    Maharashtra Vertical Property Card: फ्लैट मालिकों के लिए बड़ा अपडेट, दिसंबर में Land Titling Act की तैयारी

    महाराष्ट्र में Vertical Property Card को Land Titling Act से जोड़ने की तैयारी है। जानें फ्लैट मालिकों की जमीन हिस्सेदारी, Property Card और इसके असर की पूरी जानकारी।

    मुंबई: महाराष्ट्र में जमीन और संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर सरकार बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुळे ने सितंबर 2026 में कहा है कि राज्य सरकार दिसंबर 2026 तक Land Titling Act लाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य संपत्तियों के मालिकाना हक का अधिक स्पष्ट और निश्चित रिकॉर्ड तैयार करना तथा जमीन से जुड़े विवादों को कम करना है।

    इस व्यापक व्यवस्था में Vertical Property Card भी महत्वपूर्ण हो सकता है, जिसके जरिए बहुमंजिला इमारतों में अलग-अलग फ्लैट मालिकों के अधिकार और जमीन में उनके हिस्से को सरकारी रिकॉर्ड में अधिक स्पष्ट तरीके से दर्ज करने की दिशा में काम किया जा रहा है।

    Vertical Property Card क्या है?

    महाराष्ट्र में Property Card पहले से जमीन और संपत्ति के अधिकारों का सरकारी रिकॉर्ड है। भूमि अभिलेख विभाग की मौजूदा डिजिटल व्यवस्था में Property Card को ऑनलाइन देखा और डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित प्रति के रूप में डाउनलोड किया जा सकता है। सरकार का आधिकारिक पोर्टल डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित Property Card को सरकारी और कानूनी कार्यों के लिए इस्तेमाल करने की सुविधा भी बताता है।

    Vertical Property Card की अवधारणा का मकसद बहुमंजिला इमारत में individual flat ownership और उससे जुड़े proportionate land interest को अधिक स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड करने की दिशा में है।

    यानी बात केवल इस बात की नहीं है कि किस व्यक्ति के नाम कौन सा फ्लैट है, बल्कि यह भी है कि उस फ्लैट के मालिक का इमारत के नीचे की जमीन में संबंधित हिस्सा किस तरह रिकॉर्ड में दिखाई देगा।

    क्या फ्लैट मालिक जमीन के एक अलग हिस्से का मालिक बन जाएगा?

    यहां सबसे महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। Vertical Property Card का मतलब यह नहीं है कि किसी फ्लैट मालिक को इमारत के नीचे जमीन का कोई अलग और भौतिक रूप से चिन्हित टुकड़ा मिल जाएगा।

    Apartment ownership के कानूनी ढांचे में जमीन और common areas में मालिक का undivided interest जुड़ा होता है। इसलिए Vertical Property Card को जमीन के अलग-अलग भौतिक टुकड़ों का बंटवारा समझना सही नहीं होगा।

    यही कारण है कि इस व्यवस्था का महत्व सरकारी रिकॉर्ड में ownership और संबंधित land interest को ज्यादा स्पष्ट करने में है।

    7/12, Property Card और Vertical Property Card में क्या अंतर है?

    सामान्य जमीन रिकॉर्ड और बहुमंजिला इमारत के फ्लैट ownership record को एक ही चीज समझना सही नहीं है।

    महाराष्ट्र भूमि अभिलेख विभाग वर्तमान में 7/12, 8A, Property Card और mutation records के लिए अलग-अलग डिजिटल सेवाएं उपलब्ध कराता है।

    फ्लैट मालिक के लिए Sale Deed, Society Share Certificate, Property Card और प्रस्तावित Vertical Property Card की अपनी-अपनी भूमिका हो सकती है। इसलिए Vertical Property Card को Sale Deed या अन्य title documents का सीधा replacement मानना जल्दबाजी होगी।

    नए Land Titling Act से क्या बदलेगा?

    प्रस्तावित Land Titling framework का बड़ा उद्देश्य property ownership को ज्यादा definitive और digitally verifiable बनाना है। सितंबर में सामने आई जानकारी के अनुसार नए सिस्टम में property ownership, measurement और valuation जैसी जानकारियों को डिजिटल रिकॉर्ड में शामिल करने तथा QR code के जरिए रिकॉर्ड तक पहुंच उपलब्ध कराने की योजना है।

    सरकार का दावा है कि इससे जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद, फर्जी लेनदेन और रिकॉर्ड से जुड़ी अस्पष्टता कम करने में मदद मिलेगी।

    लेकिन अभी महत्वपूर्ण बात यह है कि Land Titling Act को दिसंबर 2026 में लाने की घोषणा हुई है; इसका अंतिम कानून, नियम और विस्तृत implementation mechanism आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि अलग-अलग श्रेणी की संपत्तियों पर व्यवस्था किस तरह लागू होगी।

    Flat owners को क्या फायदा हो सकता है?

    अगर proposed system प्रभावी तरीके से लागू होता है तो फ्लैट मालिकों के लिए सबसे बड़ा फायदा ownership records की clarity हो सकता है।

    इसका असर खास तौर पर इन क्षेत्रों में पड़ सकता है:

    • संपत्ति के title verification में आसानी
    • resale के दौरान ownership records की बेहतर जांच
    • बैंक और वित्तीय संस्थानों की due diligence में मदद
    • inheritance और ownership transfer के दौरान रिकॉर्ड की स्पष्टता
    • जमीन में फ्लैट से जुड़े हिस्से की सरकारी रिकॉर्ड में बेहतर पहचान
    • property-related disputes में documentary clarity

    महाराष्ट्र सरकार पहले से Property Card और अन्य land records को डिजिटल तथा digitally signed format में उपलब्ध करा रही है।

    Home Loan और Resale पर क्या असर होगा?

    स्पष्ट सरकारी ownership records से भविष्य में property verification की प्रक्रिया आसान होने की संभावना है। बैंक किसी संपत्ति पर loan देने से पहले title और अन्य संबंधित दस्तावेजों की जांच करते हैं। अगर सरकारी रिकॉर्ड में ownership और property details ज्यादा व्यवस्थित तरीके से उपलब्ध हों तो यह प्रक्रिया अधिक efficient हो सकती है।

    हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि Vertical Property Card मिलते ही हर बैंक बिना किसी अतिरिक्त जांच के home loan मंजूर कर देगा। Sale deed, title chain, encumbrance, approvals और अन्य आवश्यक दस्तावेजों की जांच फिर भी परिस्थितियों के अनुसार जरूरी हो सकती है।

    Redevelopment में क्यों महत्वपूर्ण हो सकता है?

    मुंबई और महाराष्ट्र में redevelopment के मामलों में जमीन का title और society का अधिकार बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में individual apartment ownership और underlying land interest का सरकारी रिकॉर्ड भविष्य में documentation को अधिक स्पष्ट करने में मदद कर सकता है।

    लेकिन केवल Vertical Property Card के आधार पर redevelopment rights तय होंगे, ऐसा कहना सही नहीं होगा। Conveyance, title documents, society records, development agreements और संबंधित planning तथा housing नियम भी महत्वपूर्ण रहेंगे।

    क्या इससे पुराने property disputes खत्म हो जाएंगे?

    ऐसा मानना जल्दबाजी होगी।

    Land Titling Act का उद्देश्य ownership disputes को कम करना है, लेकिन पुराना विवाद केवल नया digital record बनने से अपने आप समाप्त नहीं हो जाता। किसी संपत्ति पर पहले से litigation, conflicting documents, mortgage या title dispute मौजूद है तो उसकी कानूनी स्थिति अलग से तय हो सकती है।

    इसी तरह Vertical Property Card को पुराने title documents या court proceedings का automatic replacement नहीं माना जाना चाहिए।

    पुराने फ्लैट मालिकों के लिए सबसे बड़ा सवाल

    जिन लोगों ने कई साल पहले फ्लैट खरीदा है, उनके लिए मुख्य सवाल यह होगा कि नई व्यवस्था उनके existing ownership documents के साथ कैसे जुड़ेगी।

    क्या उन्हें अलग से आवेदन करना होगा?
    कौन सा विभाग Vertical Property Card जारी करेगा?
    कौन से documents चाहिए होंगे?
    क्या existing buildings पर भी यही प्रक्रिया लागू होगी?
    कितनी फीस होगी?
    और पुराने records में गलती होने पर correction कैसे होगा?

    इन सवालों का अंतिम जवाब Land Titling framework और उससे जुड़े नियम/सरकारी अधिसूचनाओं के बाद ज्यादा स्पष्ट होगा। फिलहाल महाराष्ट्र के भूमि अभिलेख विभाग की मौजूदा सेवाओं में Property Card और उससे जुड़े digital तथा mutation services उपलब्ध हैं।

    सरकार की मौजूदा डिजिटल व्यवस्था कितनी आगे बढ़ी है?

    महाराष्ट्र का भूमि अभिलेख विभाग पहले से 7/12, 8A, Property Card, e-Ferfar, document verification और digital land-record services चला रहा है। विभाग के आधिकारिक पोर्टल पर digitally signed Property Card डाउनलोड करने की सुविधा भी उपलब्ध है।

    इसलिए प्रस्तावित Land Titling system को पूरी तरह नई शुरुआत के बजाय मौजूदा digital land-record infrastructure को एक अधिक व्यापक ownership framework में ले जाने की दिशा में भी देखा जा सकता है।

    अब आगे क्या होगा?

    सबसे महत्वपूर्ण अगला पड़ाव दिसंबर 2026 का Winter Session है, जहां सरकार Land Titling Act को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है। इसके बाद कानून के अंतिम प्रावधानों और implementation rules से यह ज्यादा स्पष्ट होगा कि Vertical Property Card किन संपत्तियों पर, किस प्रक्रिया से और किस authority के माध्यम से लागू होगा।

    फ्लैट मालिकों के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि Vertical Property Card को केवल एक नए दस्तावेज के रूप में नहीं, बल्कि महाराष्ट्र में property ownership records को अधिक स्पष्ट और digitally verifiable बनाने वाले बड़े land-record reform के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।

  • महाराष्ट्र हाउसिंग सोसायटी के नए नियम लागू, मेंटेनेंस से पुनर्विकास तक बड़ा बदलाव

    महाराष्ट्र हाउसिंग सोसायटी के नए नियम लागू, मेंटेनेंस से पुनर्विकास तक बड़ा बदलाव

    महाराष्ट्र की हाउसिंग सोसायटियों के लिए नए नियम लागू हैं। मेंटेनेंस, बकाया, पुनर्विकास, निधि, बैठक और नामांकन से जुड़े अहम बदलाव जानिए।

    मुंबई: महाराष्ट्र की सहकारी हाउसिंग सोसायटियों के कामकाज में बड़ा बदलाव हुआ है। राज्य सरकार ने जून 2026 में सहकारी गृहनिर्माण संस्थाओं के लिए अलग नियमों वाला नया अध्याय लागू किया है। इसके तहत मेंटेनेंस वसूली, बकाया पर ब्याज, अलग-अलग निधियों में योगदान, सामान्य सभा, पुनर्विकास और बकाया राशि की वसूली जैसी प्रक्रियाओं को अधिक स्पष्ट किया गया है। सहकार आयुक्त एवं निबंधक की आधिकारिक वेबसाइट पर 22 जून 2026 को गृहनिर्माण नियम 106-सी की अधिसूचना दर्ज है।

    लेकिन फ्लैट मालिकों के लिए एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। नए नियम लागू हो चुके हैं, जबकि संशोधित आदर्श उपविधियों का अलग मसौदा अभी अंतिम रूप की प्रक्रिया में है। सहकार आयुक्त की वेबसाइट पर 13 और 18 अगस्त 2026 के संशोधित आदर्श उपविधियों के मसौदे उपलब्ध हैं।

    मेंटेनेंस से जुड़े खर्च का हिसाब बदलेगा

    नए नियमों में सोसायटी के अलग-अलग खर्चों को बांटने का आधार स्पष्ट किया गया है। सेवा शुल्क सदस्यों के बीच समान रूप से बांटा जा सकता है, जबकि संपत्ति कर, पानी, बीमा, मरम्मत और कुछ अन्य खर्चों के लिए अलग-अलग आधार निर्धारित हैं। मरम्मत एवं रखरखाव निधि के लिए सामान्य सभा द्वारा तय राशि कम से कम निर्माण लागत के सालाना 0.75 प्रतिशत के बराबर होनी चाहिए। डूबत निधि के लिए न्यूनतम 0.25 प्रतिशत का प्रावधान है।

    इसका मतलब यह नहीं है कि हर सोसायटी अगले महीने से मनमाने तरीके से मेंटेनेंस बढ़ा सकती है। शुल्क किस मद में है और उसके लिए नियमों में कौन सा आधार तय है, यह देखना जरूरी होगा।

    फ्लैट खाली रहने पर कितना शुल्क लगेगा?

    फ्लैट का मालिक खुद वहां नहीं रहता और उसे किसी अन्य उपयोग में देता है तो गैर-निवास शुल्क को लेकर भी सीमा तय की गई है। यह शुल्क सेवा शुल्क के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता। इसे पूरे मेंटेनेंस बिल का 10 प्रतिशत समझना सही नहीं होगा।

    यानी यदि किसी सोसायटी में सेवा शुल्क और अन्य मदों को अलग-अलग दिखाया गया है तो गैर-निवास शुल्क की गणना पूरे बिल पर 10 प्रतिशत लगाकर नहीं की जानी चाहिए।

    मेंटेनेंस नहीं देने पर 12 प्रतिशत तक ब्याज

    सोसायटी के बकाये पर ब्याज की अधिकतम सीमा 12 प्रतिशत साधारण ब्याज प्रति वर्ष रखी गई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर सोसायटी स्वतः 12 प्रतिशत ब्याज लगाएगी। लागू दर सामान्य सभा द्वारा तय की जानी है और वह निर्धारित अधिकतम सीमा से अधिक नहीं हो सकती।

    बकाया वसूली की प्रक्रिया भी अधिक औपचारिक की गई है। नियम 106-सी के तहत निर्धारित प्रपत्र और दस्तावेजों के आधार पर वसूली प्रमाणपत्र की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। इससे सोसायटी के बकाये की वसूली के लिए स्पष्ट प्रशासनिक रास्ता मिलता है।

    समिति कितनी राशि तक खर्च कर सकती है?

    मरम्मत और रखरखाव के खर्च के लिए प्रबंध समिति की वित्तीय सीमा भी सदस्यों की संख्या के अनुसार निर्धारित की गई है। 25 तक सदस्यों वाली सोसायटी के लिए यह सीमा 1 लाख रुपये, 26 से 50 सदस्यों के लिए 2 लाख रुपये, 51 से 100 सदस्यों के लिए 3 लाख रुपये, 101 से 1,000 सदस्यों के लिए 4 लाख रुपये और 1,000 से अधिक सदस्यों वाली सोसायटी के लिए 5 लाख रुपये है। इससे अधिक के बड़े खर्च में सामान्य सभा की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

    पुनर्विकास के लिए भी प्रक्रिया तय

    पुनर्विकास अब केवल समिति और विकासक के बीच की बातचीत तक सीमित नहीं रहेगा। नए नियमों में पुनर्विकास से जुड़ी सामान्य सभा की प्रक्रिया, सूचना और उपस्थिति से संबंधित प्रावधान रखे गए हैं।

    पुनर्विकास की बैठक के लिए 14 स्पष्ट दिनों की सूचना और कुल सदस्य संख्या के दो-तिहाई के बराबर गणपूर्ति का प्रावधान है। विकासक या ठेकेदार के चयन के लिए कुल सदस्यों के 51 प्रतिशत समर्थन की आवश्यकता बताई गई है। दोनों आंकड़ों को एक ही चीज समझना गलत होगा—दो-तिहाई गणपूर्ति और 51 प्रतिशत समर्थन अलग-अलग प्रक्रियाओं से जुड़े हैं।

    स्व-पुनर्विकास के मामले में भी उधारी की सीमा को लेकर विशेष प्रावधान है। नियमों के अनुसार निर्धारित परिस्थितियों में सरकारी मान्यता प्राप्त मूल्यांकनकर्ता द्वारा तय भूमि मूल्य के 10 गुना तक उधारी की सीमा का प्रावधान है। यह बैंक से स्वतः 10 गुना कर्ज मिलने की गारंटी नहीं है।

    मृत सदस्य के बाद फ्लैट का क्या होगा?

    नामांकन को लेकर भी फ्लैट मालिकों के लिए महत्वपूर्ण बदलाव हैं। किसी सदस्य की मृत्यु के बाद नामांकित व्यक्ति को प्रक्रिया के अनुसार अस्थायी सदस्यता मिल सकती है, लेकिन केवल नामांकित व्यक्ति होने से संपत्ति का अंतिम स्वामित्व स्वतः उसके नाम नहीं हो जाता।

    जहां उत्तराधिकार को लेकर विवाद हो, वहां संबंधित कानूनी दस्तावेज और उत्तराधिकार की प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो सकती है। नए प्रावधानों में पंजीकृत पारिवारिक व्यवस्था के माध्यम से कुछ परिस्थितियों में हस्तांतरण की प्रक्रिया को भी जगह दी गई है।

    सामान्य सभा में ऑनलाइन भागीदारी का रास्ता

    नए नियमों में सामान्य सभा की बैठकों में वीडियो सम्मेलन या ऐसे दृश्य-श्रव्य माध्यम से भागीदारी की व्यवस्था को मान्यता दी गई है, जिसमें सदस्य की पहचान और बैठक का समयबद्ध रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जा सके। इससे दूसरे शहर या विदेश में रहने वाले सदस्यों के लिए भागीदारी आसान हो सकती है।

    अब संशोधित आदर्श उपविधियों की बारी

    नए नियम लागू होने के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण अगला चरण संशोधित आदर्श उपविधियों का अंतिम रूप है। राज्य सरकार ने 2026 में इनका विस्तृत मसौदा जारी कर सुझाव और आपत्तियां मांगी थीं। आधिकारिक पोर्टल पर इसका मसौदा 13 और 18 अगस्त को सूचीबद्ध है।

    सुझाव और आपत्तियां देने की अंतिम तारीख 27 अगस्त 2026 थी। 10 सितंबर की ताजा कानूनी जानकारी के अनुसार मसौदा अब अंतिम मंजूरी और राजपत्र में प्रकाशन की प्रक्रिया की ओर बढ़ रहा है तथा अक्टूबर 2026 में लागू होने की संभावना बताई गई है। हालांकि अक्टूबर की तारीख को अभी अंतिम सरकारी अधिसूचना के रूप में नहीं माना जा सकता।

    एक बार संशोधित आदर्श उपविधियां औपचारिक रूप से जारी होने के बाद सोसायटियों को उन्हें अपनाने की प्रक्रिया से गुजरना होगा। मौजूदा नियमों में आदर्श उपविधियां प्रकाशित होने के तीन महीने के भीतर उन्हें अपनाने का प्रावधान है।

    इसलिए महाराष्ट्र के फ्लैट मालिकों और सोसायटी समितियों के लिए अभी सबसे जरूरी बात यह है कि जून 2026 में लागू हुए नए वैधानिक नियमों और अभी अंतिम रूप की प्रतीक्षा कर रहे संशोधित आदर्श उपविधियों को एक ही चीज न समझें। आने वाले महीनों में उपविधियों की अंतिम अधिसूचना के बाद पार्किंग, शिकायत निवारण, विद्युत वाहन चार्जिंग, पुनर्विकास और सोसायटी के दैनिक संचालन से जुड़े कई प्रावधानों का व्यावहारिक असर और स्पष्ट होगा।

  • मुंबई में BOCW सम्मेलन से पहले महाराष्ट्र की बड़ी तस्वीर, CAG ने उठाए थे ये सवाल**

    मुंबई में BOCW सम्मेलन से पहले महाराष्ट्र की बड़ी तस्वीर, CAG ने उठाए थे ये सवाल**

    मुंबई में 11-12 सितंबर को BOCW सम्मेलन होगा। महाराष्ट्र में श्रमिक पंजीकरण, कल्याण निधि और योजनाओं पर CAG की आपत्तियों के बीच नई पहल पर नजर।

    मुंबई: 11 और 12 सितंबर 2026 को मुंबई में इमारत एवं अन्य निर्माण श्रमिकों यानी बीओसीडब्ल्यू के कल्याण पर राष्ट्रीय सम्मेलन होने जा रहा है। केंद्रीय श्रम एवं रोजगार तथा युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया की अध्यक्षता में होने वाली इस बैठक में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के श्रम मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी तथा बीओसीडब्ल्यू कल्याण बोर्डों के पदाधिकारी शामिल होंगे। सम्मेलन में श्रमिकों के पंजीकरण, कल्याणकारी योजनाओं, उपकर से मिलने वाली राशि, डिजिटल सेवाओं, कौशल और रोजगार के साथ अंतरराष्ट्रीय रोजगार के अवसरों पर चर्चा होगी।

    लेकिन मुंबई में होने वाला यह सम्मेलन सिर्फ नई योजनाओं और डिजिटल व्यवस्था की समीक्षा तक सीमित नहीं है। महाराष्ट्र के संदर्भ में इसकी अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि राज्य की निर्माण श्रमिक कल्याण व्यवस्था पर भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग की एक विस्तृत रिपोर्ट पहले ही कई कमियां सामने ला चुकी है।

    सम्मेलन में किन मुद्दों पर होगा मंथन?

    केंद्र सरकार के अनुसार सम्मेलन में राज्यों की अच्छी कार्यप्रणालियों और सफल उपायों को साझा किया जाएगा। इसके साथ ही श्रमिकों के पंजीकरण, कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, कल्याण निधि के प्रबंधन और तकनीक के जरिए सेवाओं को आसान बनाने पर चर्चा होगी।

    नवंबर 2025 में राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन के दौरान शुरू किए गए तीन प्रमुख प्रयासों की प्रगति की भी समीक्षा होगी। इनमें राज्य बीओसीडब्ल्यू डिजिटल लेबर चौक, लेबर चौक-सह-सुविधा केंद्र और ऑनलाइन बीओसीडब्ल्यू उपकर संग्रह पोर्टल शामिल हैं।

    इसका सीधा मतलब है कि अब चर्चा केवल योजना बनाने की नहीं, बल्कि यह देखने की भी है कि इन व्यवस्थाओं का जमीन पर कितना असर पड़ा है।

    महाराष्ट्र में कैग ने क्या तस्वीर दिखाई थी?

    महाराष्ट्र के बीओसीडब्ल्यू कल्याण की कार्यप्रणाली पर कैग की रिपोर्ट संख्या 4, 2025 में 2017-18 से 2021-22 की अवधि का प्रदर्शन ऑडिट किया गया था। इसमें श्रमिकों और निर्माण प्रतिष्ठानों के पंजीकरण, उपकर की वसूली, स्वास्थ्य और सुरक्षा, कल्याण योजनाओं तथा निधि के इस्तेमाल की जांच की गई थी।

    रिपोर्ट के मुताबिक, 60 निर्माण कार्यों की जांच में 44 यानी करीब 73 प्रतिशत प्रतिष्ठान पंजीकृत नहीं पाए गए। छह जिलों में जांचे गए 24 पंजीकृत और 24 अपंजीकृत प्रतिष्ठानों में काम कर रहे 1,391 श्रमिकों में से 894 यानी 64 प्रतिशत श्रमिक बोर्ड के साथ पंजीकृत नहीं थे। कैग ने कहा कि इससे पात्र श्रमिक विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से बाहर रह सकते हैं।

    रिपोर्ट में पंजीकरण की प्रक्रिया में देरी भी सामने आई। अप्रैल 2021 से मार्च 2022 के दौरान पंजीकृत किए गए 10.81 लाख श्रमिकों में करीब 48.18 प्रतिशत के पंजीकरण में 100 दिन से अधिक का समय लगा था। कुछ मामलों में यह अवधि 833 दिन तक पहुंची।

    कल्याण निधि के इस्तेमाल पर भी सवाल

    कैग के अनुसार 2017-18 से 2021-22 के दौरान महाराष्ट्र बोर्ड के पास कुल 16,151.82 करोड़ रुपये की उपलब्ध राशि थी। इसमें से कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर 4,253.77 करोड़ रुपये यानी केवल 26.34 प्रतिशत राशि खर्च की गई। इसी अवधि में उपकर संग्रह 7,689.73 करोड़ रुपये था।

    कैग ने यह भी दर्ज किया कि मार्च 2022 तक बोर्ड ने 11,350 करोड़ रुपये राष्ट्रीयकृत बैंकों में सावधि जमा में निवेश किए थे। रिपोर्ट में योजनाओं के क्रियान्वयन और श्रमिकों तक लाभ पहुंचाने की व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत बताई गई।

    यह आंकड़े पुराने ऑडिट काल से जुड़े हैं। इसलिए इन्हें 2026 की मौजूदा स्थिति का आंकड़ा नहीं माना जा सकता। लेकिन 11-12 सितंबर के राष्ट्रीय सम्मेलन के संदर्भ में ये आंकड़े यह सवाल जरूर खड़ा करते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में पंजीकरण, निधि के इस्तेमाल और लाभ पहुंचाने की व्यवस्था में कितना सुधार हुआ है।

    2026 में महाराष्ट्र ने क्या बदला?

    महाराष्ट्र सरकार ने जुलाई 2026 में निर्माण श्रमिकों के लिए कई नई सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को लागू करने संबंधी फैसले जारी किए हैं। महाराष्ट्र इमारत एवं अन्य निर्माण कामगार कल्याण बोर्ड की आधिकारिक सूची के अनुसार 13 जुलाई 2026 को सेवानिवृत्ति पेंशन योजना, मृत्यु सहायता एवं जीवन बीमा योजना, प्रसूति सहायता योजना और पंजीकृत सक्रिय श्रमिकों के बच्चों के लिए शैक्षणिक सहायता योजना से संबंधित फैसले जारी किए गए।

    यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कैग की रिपोर्ट में 60 वर्ष से अधिक उम्र के लाभार्थियों के लिए पेंशन और समूह बीमा जैसी योजनाएं तैयार नहीं किए जाने की बात सामने आई थी। अब महाराष्ट्र में पेंशन और बीमा से संबंधित नई व्यवस्था के फैसले सामने आ चुके हैं।

    अब असली सवाल पंजीकरण और लाभ पहुंचने का है

    निर्माण श्रमिकों के लिए सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में पंजीकरण सबसे महत्वपूर्ण चरणों में से एक है। कैग की रिपोर्ट में दर्ज व्यवस्था के अनुसार 18 से 60 वर्ष की आयु का ऐसा निर्माण श्रमिक, जिसने पिछले 12 महीनों में कम से कम 90 दिन निर्माण कार्य किया हो, पात्रता की शर्तें पूरी करने पर बीओसीडब्ल्यू लाभार्थी के रूप में पंजीकरण करा सकता था।

    महाराष्ट्र बोर्ड ने ऑनलाइन व्यवस्था के जरिए पंजीकरण, नवीनीकरण और विभिन्न योजनाओं के लिए दावे जमा करने की सुविधा भी विकसित की थी। इसके बावजूद ऑडिट अवधि में पंजीकरण और नवीनीकरण में देरी जैसी समस्याएं सामने आईं।

    यही वजह है कि मुंबई सम्मेलन में डिजिटल व्यवस्था की प्रगति की समीक्षा केवल तकनीकी मुद्दा नहीं होगी। अगर डिजिटल माध्यम से पंजीकरण, रोजगार के अवसर और कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच आसान होती है, तो इसका सीधा असर उन श्रमिकों पर पड़ सकता है जो अब तक व्यवस्था से बाहर रहे हैं।

    डिजिटल लेबर चौक से क्या बदलेगा?

    केंद्र सरकार ने डिजिटल लेबर चौक की अवधारणा के जरिए निर्माण श्रमिकों को रोजगार के अवसरों से जोड़ने और कल्याणकारी सेवाओं तक पहुंच आसान बनाने की दिशा में पहल की है। लेबर चौक-सह-सुविधा केंद्रों का उद्देश्य श्रमिकों के लिए अधिक व्यवस्थित और सम्मानजनक सेवा उपलब्ध कराना है।

    वहीं ऑनलाइन बीओसीडब्ल्यू उपकर संग्रह पोर्टल का उद्देश्य उपकर के संग्रह और उसकी निगरानी को अधिक पारदर्शी तथा प्रभावी बनाना है। सम्मेलन में इन तीनों पहलों की प्रगति की समीक्षा होने वाली है।

    उपकर से जुटने वाली राशि और श्रमिकों का सवाल

    बीओसीडब्ल्यू व्यवस्था में निर्माण कार्यों से मिलने वाला उपकर कल्याणकारी योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय आधार है। इसलिए सम्मेलन में उपकर संग्रह की निगरानी और उसके उपयोग पर चर्चा का सीधा संबंध श्रमिकों को मिलने वाले लाभ से है।

    महाराष्ट्र में पहले भी बड़ा उपकर संग्रह और उपलब्ध निधि होने के बावजूद कैग ने उस अवधि में योजनाओं पर कम उपयोग और लाभ पहुंचाने में कमियों की ओर ध्यान दिलाया था। अब नई डिजिटल व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या पैसा जमा होने से लेकर पात्र श्रमिक तक लाभ पहुंचने की पूरी प्रक्रिया समयबद्ध और पारदर्शी बन पाती है?

    कौशल और रोजगार पर भी रहेगा जोर

    दो दिवसीय सम्मेलन में केवल कल्याणकारी योजनाओं पर चर्चा नहीं होगी। कौशल विकास, रोजगार के अवसर, श्रमिकों से संबंधित आंकड़े और अंतरराष्ट्रीय श्रम गतिशीलता के रास्तों पर भी विचार किया जाएगा।

    इसका महत्व इसलिए है क्योंकि निर्माण क्षेत्र बड़ी संख्या में श्रमिकों को रोजगार देता है और इस क्षेत्र में कौशल के आधार पर बेहतर रोजगार उपलब्ध कराने की संभावना भी है। अगर राज्यों की डिजिटल और कौशल आधारित व्यवस्थाओं को एक-दूसरे से जोड़ा जाता है, तो श्रमिकों के लिए रोजगार खोजने और सही अवसर तक पहुंचने की प्रक्रिया आसान हो सकती है।

    अब नजर 11-12 सितंबर के फैसलों पर

    मुंबई में होने वाली राष्ट्रीय परिषद के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौती यह होगी कि अलग-अलग राज्यों में चल रही अच्छी व्यवस्थाओं को किस तरह बड़े स्तर पर लागू किया जाए और पुरानी कमियों को कैसे दूर किया जाए।

    महाराष्ट्र के मामले में खास तौर पर तीन सवाल महत्वपूर्ण रहेंगे—पात्र निर्माण श्रमिकों का पंजीकरण कितना बढ़ा, कल्याण निधि का उपयोग कितना प्रभावी हुआ और नई सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक कितनी तेजी से पहुंच रहा है।

    सम्मेलन में इन मुद्दों पर होने वाली चर्चा से यह स्पष्ट हो सकता है कि बीओसीडब्ल्यू व्यवस्था अब केवल निधि और योजनाओं के संचालन तक सीमित रहती है या फिर रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, डिजिटल सेवाओं और श्रमिकों के अधिकारों को एक साथ जोड़ने वाली नई व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ती है।

  • महाराष्ट्र में खिलाड़ियों को 5% नौकरी आरक्षण, 3 महीने में Sports Certificate Verification अनिवार्य

    महाराष्ट्र में खिलाड़ियों को 5% नौकरी आरक्षण, 3 महीने में Sports Certificate Verification अनिवार्य

    महाराष्ट्र में खिलाड़ियों के 5% नौकरी आरक्षण की नई नीति मंजूर, पुराने प्रमाणपत्रों का 3 महीने में सत्यापन जरूरी; जानिए किसे मिलेगा लाभ।

    मुंबई: महाराष्ट्र में सरकारी नौकरी का इंतजार कर रहे प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के लिए बड़ा फैसला हुआ है। राज्य मंत्रिमंडल ने सरकारी, अर्ध-सरकारी और अन्य पात्र संस्थाओं में खिलाड़ियों के लिए लागू 5% नौकरी आरक्षण की संशोधित नीति को मंजूरी दे दी है। नई व्यवस्था में सबसे अहम बदलाव यह है कि आरक्षण का लाभ लेने वाले खिलाड़ियों को अपने Sports Certificate की वैधता का सत्यापन तीन महीने के भीतर कराना होगा।

    यह तीन महीने की समयसीमा नए संशोधित शासन निर्णय (GR) के जारी होने की तारीख से लागू होगी। सरकार ने Sports Quota से जुड़े पहले के सभी शासन निर्णयों को रद्द कर एक एकीकृत नीति लागू करने का फैसला किया है। नया GR जल्द जारी किया जाएगा।

    5% Sports Quota किन नौकरियों में लागू होगा?

    संशोधित नीति के तहत यह आरक्षण मंत्रालयीन विभागों और उनके अधीन सरकारी कार्यालयों के साथ जिला परिषद, पंचायत समिति, ग्राम पंचायत, महानगरपालिका, सरकारी उपक्रम, मंडल, महामंडल, विश्वविद्यालय, सरकारी अनुदान प्राप्त शैक्षणिक संस्थान, आश्रमशाला, सहकारी संस्थाओं और सरकारी निधि अथवा अनुदान प्राप्त अन्य पात्र संस्थाओं में सीधी भर्ती के पदों पर लागू रहेगा।

    इसमें समूह-अ, समूह-ब, समूह-क और समूह-ड के पद शामिल होंगे।

    महाराष्ट्र में 5% Sports Quota की व्यवस्था 30 अप्रैल 2005 से लागू है। क्रीड़ा विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार अब तक 4,949 खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी में इसका लाभ मिल चुका है।

    किस खिलाड़ी को किस पद के लिए पात्रता मिलेगी?

    नई नीति में खेल उपलब्धि और प्रतियोगिता के स्तर के आधार पर अलग-अलग समूहों के लिए पात्रता तय की गई है।

    समूह-अ: ओलंपिक, एशियन गेम्स, वरिष्ठ विश्व एवं एशियन चैंपियनशिप/कप, कॉमनवेल्थ गेम्स, टेनिस ग्रैंड स्लैम, ग्रैंडमास्टर स्तर की शतरंज प्रतियोगिताओं और पैरालंपिक सहित अधिकृत अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त खिलाड़ी।

    समूह-ब राजपत्रित: युवा/कनिष्ठ विश्व एवं एशियन चैंपियनशिप, कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप, यूथ ओलंपिक तथा संबंधित अंतरराष्ट्रीय स्कूल, विश्वविद्यालय और पैरा प्रतियोगिताओं के पदक विजेता।

    समूह-ब अराजपत्रित: नेशनल गेम्स, राष्ट्रीय चैंपियनशिप, राष्ट्रीय फेडरेशन कप, पैरा नेशनल गेम्स और राष्ट्रीय स्कूल खेल प्रतियोगिताओं के पदक विजेता।

    समूह-क: खेलो इंडिया, अखिल भारतीय अंतर-विश्वविद्यालय, राज्य स्तरीय वरिष्ठ/युवा/कनिष्ठ, स्कूल, अंतर-विश्वविद्यालय और पैरा खेल प्रतियोगिताओं के पदक विजेता।

    समूह-ड: निर्धारित खेल योग्यता रखने वाले खिलाड़ी अथवा वरिष्ठ वर्ग की राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता, राष्ट्रीय चैंपियनशिप और वरिष्ठ पैरा राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग लेने वाले खिलाड़ी।

    क्रिकेट, कबड्डी, खो-खो और शतरंज भी पात्र खेलों में

    नई नीति में खेलों की पात्रता का दायरा बढ़ाया गया है। 2005 के बाद लगातार तीन ओलंपिक में शामिल खेलों के साथ क्रिकेट, कबड्डी, खो-खो, शतरंज और मल्लखंब को भी शामिल किया गया है।

    ओलंपिक, पैरालंपिक, एशियन गेम्स, पैरा एशियन गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स में तीन ओलंपिक वाली शर्त लागू नहीं होगी।

    पात्र खेलों में एथलेटिक्स, बैडमिंटन, बॉक्सिंग, फुटबॉल, हॉकी, जूडो, रोइंग, शूटिंग, तैराकी, टेबल टेनिस, वेटलिफ्टिंग, कुश्ती, टेनिस, गोल्फ, घुड़सवारी, सेलिंग, स्पोर्ट्स क्लाइम्बिंग और अन्य निर्धारित खेल भी शामिल हैं।

    पुराने Sports Certificate वालों के लिए क्या बदलेगा?

    नई नीति का यह हिस्सा हजारों खिलाड़ियों के लिए महत्वपूर्ण है। पुराने शासन निर्णयों के तहत Sports Quota के पात्र खिलाड़ियों को भी नए GR की तारीख से तीन महीने के भीतर अपने Sports Certificate का verification कराना होगा।

    यानी केवल पहले से जारी प्रमाणपत्र होना पर्याप्त नहीं होगा। निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उसकी वैधता की पुष्टि कराना जरूरी होगा।

    ‘क्रीड़ा ई-प्रमाण’ से होगी डिजिटल जांच

    सरकार Sports Certificate verification के लिए ‘क्रीड़ा ई-प्रमाण’ की डिजिटल व्यवस्था लागू कर रही है। प्रतियोगिता समाप्त होने के सात दिनों के भीतर परिणामों को डिजिटल हस्ताक्षर के साथ upload करना अनिवार्य होगा।

    Blockchain technology के जरिए रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने और automated cryptographic hash के माध्यम से उसकी authenticity जांचने की व्यवस्था की जाएगी। इसका उद्देश्य फर्जी और छेड़छाड़ किए गए खेल प्रमाणपत्रों पर रोक लगाना है।

    5% आरक्षण का उद्देश्य क्या है?

    सरकार के मुताबिक इस नीति का उद्देश्य राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को सरकारी रोजगार में अवसर देना और उनकी सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा मजबूत करना है।

    Sports Quota को Mission Lakshyavedh जैसी खेल प्रोत्साहन पहलों के साथ देखने पर इसका व्यापक उद्देश्य खिलाड़ियों को बेहतर training और competition के साथ भविष्य की employment security उपलब्ध कराना भी है।

    महाराष्ट्र कैबिनेट के अन्य फैसले

    PRAGATI Health Project

    सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत करने के लिए 2026 से 2031 तक PRAGATI Project लागू करने को मंजूरी दी गई है। परियोजना की अनुमानित लागत ₹4,250 करोड़ है, जिसमें ₹2,975 करोड़ Asian Development Bank loan और ₹1,275 करोड़ राज्य का हिस्सा होगा।

    इसके तहत कोल्हापुर और नांदेड में 500-500 बेड, नागपुर और लातूर में 300-300 बेड तथा पुणे में 200 बेड का विशेष रेफरल अस्पताल प्रस्तावित है। कुल 2,430 पद भी बनाए जाएंगे।

    Hyosung India को Capital Grant

    छत्रपति संभाजीनगर के Auric City, Shendra में Hyosung India के Spandex/Elastomeric Yarn manufacturing project को Integrated and Sustainable Textile Policy 2023-28 के तहत विशेष मामले में capital grant देने को मंजूरी मिली है। सरकार ने इसे मराठवाड़ा और विदर्भ में निवेश तथा रोजगार की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया है।

    Madha में District and Additional Sessions Court

    सोलापुर के Madha में नया District and Additional Sessions Court स्थापित होगा। अभी यहां के मामले Barshi court में चलते हैं। नए न्यायालय के लिए 20 नियमित और 6 outsourced पद मंजूर किए गए हैं।

    मुंबई में दो भूमि संबंधी फैसले

    मुंबई के Bhuleshwar स्थित Kaivalyadham Yogic Centre के भूमि पट्टे का अगले 30 वर्षों के लिए ₹12 सालाना की रियायती दर पर नवीनीकरण मंजूर किया गया है।

    वहीं Chembur की Bhikkhu Sangh United Buddhist Mission संस्था को उसके कब्जे में रही 1,735 वर्ग मीटर सरकारी जमीन नाममात्र दर पर lease पर देने को मंजूरी दी गई है।

    Koradi में Mahalakshmi Jagdamba Sansthan को जमीन

    नागपुर के Koradi में तीर्थक्षेत्र विकास योजना के तहत विकसित सरकारी जमीन को Shri Mahalakshmi Jagdamba Sansthan को 30 वर्ष के लिए lease पर देने की मंजूरी दी गई है। इसका उद्देश्य तीर्थक्षेत्र में सुविधाओं और रखरखाव का बेहतर प्रबंधन करना है।

    आगे क्या?

    Sports Quota के मामले में अब संशोधित एकीकृत Government Resolution जारी होना सबसे महत्वपूर्ण अगला कदम है। इसी के बाद verification की औपचारिक प्रक्रिया और तीन महीने की समयसीमा प्रभावी होगी।

    खिलाड़ियों के लिए नई नीति का सबसे बड़ा बदलाव केवल 5% आरक्षण जारी रखना नहीं, बल्कि eligibility, certificate verification और digital authentication को एकीकृत व्यवस्था में लाना है।