डीबी ओजोन मामले में 3,000 सरकारी फ्लैट, हजारों खरीदारों का ओसी संकट और सात मंजिलों के अंतर ने विवाद को नया मोड़ दिया है।
मुंबई: दहिसर चेक नाके के पास मीरा रोड के महाजनवाड़ी स्थित डीबी ओजोन परियोजना का विवाद अब करीब 3,000 सरकारी आवासों की लंबित सुपुर्दगी से आगे बढ़कर हजारों खरीदारों के कब्जे, ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट और निर्माण की मंजूरियों पर उठे सवालों तक पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले के दौरान हुई संयुक्त जांच में स्वीकृत और मौके पर दर्ज मंजिलों के बीच सात मंजिलों का अंतर सामने आया है। इसी बीच 3,000 से अधिक खरीदार लंबे समय से ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट का इंतजार कर रहे हैं। न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार डेवलपर की याचिका अभी लंबित है।
अतिरिक्त एफएसआई के बदले देने थे सरकारी आवास
डीबी ओजोन परियोजना को तत्कालीन किराया आवास योजना के तहत मंजूरी मिली थी। योजना में अतिरिक्त निर्माण क्षमता यानी एफएसआई का लाभ देने के बदले परियोजना के एक हिस्से के आवास एमएमआरडीए को मुफ्त में सौंपने की व्यवस्था थी।
इस परियोजना में डेवलपर को चार एफएसआई की अनुमति मिली थी। 25 प्रतिशत जमीन पर एक एफएसआई के तहत तैयार होने वाला आवासीय हिस्सा एमएमआरडीए को दिया जाना था, जबकि शेष 75 प्रतिशत जमीन पर तीन एफएसआई बिक्री योग्य हिस्से के लिए थी। इसी व्यवस्था के तहत करीब 3,000 आवास एमएमआरडीए को सौंपे जाने थे।
निर्माण शुरू होने के बाद बिक्री योग्य हिस्से में काम आगे बढ़ता रहा, लेकिन एमएमआरडीए को सौंपे जाने वाले आठ भवनों को लेकर विवाद बना रहा। वर्ष 2014 में किराया आवास योजना समाप्त कर दी गई, लेकिन पहले से स्वीकृत परियोजनाओं पर उनकी मूल शर्तों का पालन करने की जिम्मेदारी बनी रही। एमएमआरडीए की मौजूदा जानकारी भी बताती है कि 2014 में पुरानी योजना को नगर निकाय क्षेत्रों में किफायती आवास योजना से बदला गया था।
हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ
7 अप्रैल 2025 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने नेल्कमल रियल्टर्स सबअर्बन प्राइवेट लिमिटेड की उस चुनौती को खारिज कर दिया, जिसमें परियोजना को नई विकास व्यवस्था के तहत आगे ले जाने की कोशिश की गई थी। अदालत ने मूल किराया आवास योजना के तहत डेवलपर की जिम्मेदारी को महत्वपूर्ण माना और एमएमआरडीए को दिए जाने वाले आठ भवनों को पूरा कर सौंपने का निर्देश दिया।
इसके बाद डेवलपर ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। मामला एसएलपी (सिविल) संख्या 16899/2025 के रूप में लंबित है। 22 मई 2026 की कार्यवाही के बाद उपलब्ध केस स्थिति में भी यह मामला लंबित दर्ज है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने खरीदार भी पहुंचे
मामले में डीबी ओजोन होम बायर्स एसोसिएशन की दखल ने विवाद को नया आयाम दिया। 11 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एसोसिएशन की अर्जी पर जवाब दाखिल करने के लिए पक्षों को समय दिया और मामला 22 मई के लिए सूचीबद्ध किया गया।
22 मई की कार्यवाही के बाद परियोजना के ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट में आ रही बाधाओं को लेकर एमएमआरडीए और मीरा भयंदर महानगरपालिका की संयुक्त जांच का रास्ता खुला। इसके बाद जून में तैयार संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट ने आगे चलकर निर्माण की मंजूरियों को लेकर नया सवाल खड़ा किया।
493 मंजिलें दर्ज, मंजूरी 486 की
11 जून 2026 की संयुक्त जांच रिपोर्ट से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार बिक्री योग्य हिस्से की 25 इमारतों में कुल 493 मंजिलें दर्ज की गईं। वहीं 31 दिसंबर 2010 के संशोधित प्रारंभ प्रमाणपत्र में इन्हीं इमारतों के लिए 486 मंजिलों की अनुमति बताई गई थी।
इस तरह दोनों आंकड़ों में सात मंजिलों का अंतर सामने आया।
आरटीआई के जरिये दस्तावेज हासिल करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता राजेश सिंह ने इस अंतर को कथित अनधिकृत निर्माण से जोड़ा और आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट को भेजी गई रिपोर्ट में इस विसंगति का उल्लेख नहीं किया गया। हालांकि उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर इसे सीधे सात अवैध मंजिलों का अंतिम निष्कर्ष नहीं कहा जा सकता। मंजूरियों, संशोधनों और वास्तविक निर्माण के बीच इस अंतर पर संबंधित प्राधिकरणों की स्पष्ट आधिकारिक स्थिति महत्वपूर्ण होगी।
आवासीय हिस्से को ओसी नहीं, व्यावसायिक हिस्से को मंजूरी
डीबी ओजोन विवाद का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भी सामने आया है। परियोजना के आवासीय हिस्से में रहने वाले हजारों खरीदार ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट (ओसी) की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जबकि व्यावसायिक हिस्से को फरवरी 2024 में अधिभोग प्रमाणपत्र दिया गया था।
आरटीआई से सामने आए दस्तावेजों के अनुसार उस समय एमएमआरडीए की ओर से परियोजना के लिए बाद की अनापत्ति प्रमाणपत्र (एन ओ सी) जारी नहीं की गई थी। एमएमआरडीए के रिकॉर्ड में 2009 में स्थान मंजूरी और निर्माण संबंधी अनुमति का उल्लेख है। किराया आवास योजना के नियमों में ओसी के लिए एमएमआरडीए की भूमिका और अनापत्ति प्रमाणपत्र का प्रावधान भी था।
इस व्यावसायिक हिस्से में नाइकी, एडिडास, प्यूमा और वुडलैंड जैसे ब्रांडों की दुकानें संचालित होने की जानकारी भी सामने आई है।
3,000 से ज्यादा खरीदारों की अलग परेशानी
परियोजना में रह रहे 3,000 से अधिक परिवारों की समस्या सरकारी आवास वाले हिस्से से अलग है। खरीदारों के अनुसार वे लंबे समय से अपने फ्लैटों में रह रहे हैं, लेकिन ओ सी नहीं होने के कारण उन्हें कानूनी और प्रशासनिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
9 जून 2026 की सुनवाई के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग को लंबे समय से लंबित मामले में 30 दिनों के भीतर औपचारिक सुनवाई और 60 दिनों के भीतर निर्णय की दिशा में आगे बढ़ने को कहा था। खरीदारों की ओर से यह भी कहा गया कि अधिभोग प्रमाणपत्र नहीं होने के कारण सहकारी आवास संस्था के गठन में दिक्कत बनी हुई है।
इस बीच डेवलपर के निदेशक विनोद कुमार गोयनका ने जून में कहा था कि ओ सी का मामला किराया आवास वाले आवासों की सुपुर्दगी से जुड़े मुद्दों के कारण अटका है और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती लंबित है। वहीं सुप्रीम कोर्ट की 22 मई की कार्यवाही में एमएमबीसी और एमएमआरडीए को अधिभोग प्रमाणपत्र में आ रही अन्य बाधाओं की संयुक्त जांच करने को कहा गया था।
खरीदारों के पुराने मामले भी सामने आए
डीबी ओजोन, जिसे पहले ऑर्किड ओजोन के नाम से जाना जाता था, से जुड़े उपभोक्ता मामलों में भी परियोजना की लंबी देरी सामने आती रही है।
14 जुलाई 2026 के महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के एक मामले में शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि फ्लैट के लिए बड़ी राशि का भुगतान करने के बावजूद उन्हें वैध और शांतिपूर्ण कब्जा नहीं मिला। रिकॉर्ड के अनुसार 28 अक्टूबर 2010 को भवन संख्या 18 में 624.11 वर्ग फुट के फ्लैट का आवंटन हुआ था। कुल कीमत 46,93,788 रुपये थी और 42,73,199 रुपये यानी करीब 90 प्रतिशत राशि का भुगतान किया जा चुका था। समझौते की शर्तों के अनुसार कब्जा 31 दिसंबर 2014 तक दिया जाना था।
इसी परियोजना से जुड़े दूसरे उपभोक्ता मामलों में भी नेल्कमल रियल्टर्स सबअर्बन प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशकों के नाम सामने आए हैं। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड में विनोद कुमार गोयनका, विपुल धनप्रकाश बंसल और शाहिद उस्मान बलवा के नाम निदेशक के रूप में दर्ज हैं।
परियोजना की स्थिति पर कंपनी के अपने दस्तावेज भी महत्वपूर्ण
कंपनी के 2023-24 के निवेश दस्तावेज में डीबी ओजोन को दहिसर के पास पश्चिमी एक्सप्रेस राजमार्ग से सटी बड़ी आवासीय परियोजना बताया गया था। इसमें 25 भवनों और करीब 3,000 फ्लैट ग्राहकों को सौंपे जाने का उल्लेख था। दस्तावेज में यह भी कहा गया था कि आंतरिक फिनिशिंग और फिटिंग का काम चल रहा था।
यही तथ्य मौजूदा विवाद को और महत्वपूर्ण बनाता है। एक ओर बड़ी संख्या में खरीदारों को फ्लैट सौंपे जाने का कंपनी रिकॉर्ड मौजूद है, वहीं दूसरी ओर अधिभोग प्रमाणपत्र, सरकारी आवासों की सुपुर्दगी और निर्माण की स्वीकृत मंजिलों को लेकर कानूनी विवाद जारी है।
एमएमआरडीए के रिकॉर्ड में महाजनवाड़ी का अलग आंकड़ा
एमएमआरडीए की मौजूदा वेबसाइट पर महाजनवाड़ी, मीरा भयंदर में 632 किराया आवास इकाइयों के पूर्ण होने और उन्हें मीरा भयंदर महानगरपालिका को सौंपे जाने का उल्लेख है। साथ ही एमएमआरडीए पूरे क्षेत्र में किराया आवास योजनाओं से बनने वाली इकाइयों के बड़े आंकड़े भी देता है।
हालांकि उपलब्ध रिकॉर्ड से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि महाजनवाड़ी की ये 632 इकाइयां डीबी ओजोन के विवादित करीब 3,000 आवासों का ही हिस्सा हैं। दोनों आंकड़ों का संबंध स्पष्ट करने के लिए संबंधित परियोजना दस्तावेजों और एमएमआरडीए के रिकॉर्ड की अलग पुष्टि जरूरी है।
अब आगे क्या होगा?
डीबी ओजोन का मुख्य मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। नेल्कमल रियल्टर्स सबअर्बन प्राइवेट लिमिटेड की एसएलपी पर अंतिम फैसला अभी नहीं आया है।
इस बीच विवाद के तीन महत्वपूर्ण सवाल बने हुए हैं—एमएमआरडीए को सौंपे जाने वाले करीब 3,000 आवास कब और किस स्थिति में मिलेंगे, डीबी ओजोन के हजारों खरीदारों को अधिभोग प्रमाणपत्र कब मिलेगा और संयुक्त निरीक्षण में सामने आए 493 और 486 मंजिलों के अंतर का आधिकारिक स्पष्टीकरण क्या है।
इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि दहिसर चेक नाके के पास महाजनवाड़ी की इस लंबी अटकी परियोजना में अब अगला कदम क्या होगा।
