Category: Corruption

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  • डीबी ओजोन: 3,000 फ्लैट, ओसी संकट और 7 मंजिलों का सवाल

    डीबी ओजोन: 3,000 फ्लैट, ओसी संकट और 7 मंजिलों का सवाल

    डीबी ओजोन मामले में 3,000 सरकारी फ्लैट, हजारों खरीदारों का ओसी संकट और सात मंजिलों के अंतर ने विवाद को नया मोड़ दिया है।

    मुंबई: दहिसर चेक नाके के पास मीरा रोड के महाजनवाड़ी स्थित डीबी ओजोन परियोजना का विवाद अब करीब 3,000 सरकारी आवासों की लंबित सुपुर्दगी से आगे बढ़कर हजारों खरीदारों के कब्जे, ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट और निर्माण की मंजूरियों पर उठे सवालों तक पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले के दौरान हुई संयुक्त जांच में स्वीकृत और मौके पर दर्ज मंजिलों के बीच सात मंजिलों का अंतर सामने आया है। इसी बीच 3,000 से अधिक खरीदार लंबे समय से ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट का इंतजार कर रहे हैं। न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार डेवलपर की याचिका अभी लंबित है।

    अतिरिक्त एफएसआई के बदले देने थे सरकारी आवास

    डीबी ओजोन परियोजना को तत्कालीन किराया आवास योजना के तहत मंजूरी मिली थी। योजना में अतिरिक्त निर्माण क्षमता यानी एफएसआई का लाभ देने के बदले परियोजना के एक हिस्से के आवास एमएमआरडीए को मुफ्त में सौंपने की व्यवस्था थी।

    इस परियोजना में डेवलपर को चार एफएसआई की अनुमति मिली थी। 25 प्रतिशत जमीन पर एक एफएसआई के तहत तैयार होने वाला आवासीय हिस्सा एमएमआरडीए को दिया जाना था, जबकि शेष 75 प्रतिशत जमीन पर तीन एफएसआई बिक्री योग्य हिस्से के लिए थी। इसी व्यवस्था के तहत करीब 3,000 आवास एमएमआरडीए को सौंपे जाने थे।

    निर्माण शुरू होने के बाद बिक्री योग्य हिस्से में काम आगे बढ़ता रहा, लेकिन एमएमआरडीए को सौंपे जाने वाले आठ भवनों को लेकर विवाद बना रहा। वर्ष 2014 में किराया आवास योजना समाप्त कर दी गई, लेकिन पहले से स्वीकृत परियोजनाओं पर उनकी मूल शर्तों का पालन करने की जिम्मेदारी बनी रही। एमएमआरडीए की मौजूदा जानकारी भी बताती है कि 2014 में पुरानी योजना को नगर निकाय क्षेत्रों में किफायती आवास योजना से बदला गया था।

    हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ

    7 अप्रैल 2025 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने नेल्कमल रियल्टर्स सबअर्बन प्राइवेट लिमिटेड की उस चुनौती को खारिज कर दिया, जिसमें परियोजना को नई विकास व्यवस्था के तहत आगे ले जाने की कोशिश की गई थी। अदालत ने मूल किराया आवास योजना के तहत डेवलपर की जिम्मेदारी को महत्वपूर्ण माना और एमएमआरडीए को दिए जाने वाले आठ भवनों को पूरा कर सौंपने का निर्देश दिया।

    इसके बाद डेवलपर ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। मामला एसएलपी (सिविल) संख्या 16899/2025 के रूप में लंबित है। 22 मई 2026 की कार्यवाही के बाद उपलब्ध केस स्थिति में भी यह मामला लंबित दर्ज है।

    सुप्रीम कोर्ट के सामने खरीदार भी पहुंचे

    मामले में डीबी ओजोन होम बायर्स एसोसिएशन की दखल ने विवाद को नया आयाम दिया। 11 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एसोसिएशन की अर्जी पर जवाब दाखिल करने के लिए पक्षों को समय दिया और मामला 22 मई के लिए सूचीबद्ध किया गया।

    22 मई की कार्यवाही के बाद परियोजना के ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट में आ रही बाधाओं को लेकर एमएमआरडीए और मीरा भयंदर महानगरपालिका की संयुक्त जांच का रास्ता खुला। इसके बाद जून में तैयार संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट ने आगे चलकर निर्माण की मंजूरियों को लेकर नया सवाल खड़ा किया।

    493 मंजिलें दर्ज, मंजूरी 486 की

    11 जून 2026 की संयुक्त जांच रिपोर्ट से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार बिक्री योग्य हिस्से की 25 इमारतों में कुल 493 मंजिलें दर्ज की गईं। वहीं 31 दिसंबर 2010 के संशोधित प्रारंभ प्रमाणपत्र में इन्हीं इमारतों के लिए 486 मंजिलों की अनुमति बताई गई थी।

    इस तरह दोनों आंकड़ों में सात मंजिलों का अंतर सामने आया।

    आरटीआई के जरिये दस्तावेज हासिल करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता राजेश सिंह ने इस अंतर को कथित अनधिकृत निर्माण से जोड़ा और आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट को भेजी गई रिपोर्ट में इस विसंगति का उल्लेख नहीं किया गया। हालांकि उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर इसे सीधे सात अवैध मंजिलों का अंतिम निष्कर्ष नहीं कहा जा सकता। मंजूरियों, संशोधनों और वास्तविक निर्माण के बीच इस अंतर पर संबंधित प्राधिकरणों की स्पष्ट आधिकारिक स्थिति महत्वपूर्ण होगी।

    आवासीय हिस्से को ओसी नहीं, व्यावसायिक हिस्से को मंजूरी

    डीबी ओजोन विवाद का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भी सामने आया है। परियोजना के आवासीय हिस्से में रहने वाले हजारों खरीदार ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट (ओसी) की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जबकि व्यावसायिक हिस्से को फरवरी 2024 में अधिभोग प्रमाणपत्र दिया गया था।

    आरटीआई से सामने आए दस्तावेजों के अनुसार उस समय एमएमआरडीए की ओर से परियोजना के लिए बाद की अनापत्ति प्रमाणपत्र (एन ओ सी) जारी नहीं की गई थी। एमएमआरडीए के रिकॉर्ड में 2009 में स्थान मंजूरी और निर्माण संबंधी अनुमति का उल्लेख है। किराया आवास योजना के नियमों में ओसी के लिए एमएमआरडीए की भूमिका और अनापत्ति प्रमाणपत्र का प्रावधान भी था।

    इस व्यावसायिक हिस्से में नाइकी, एडिडास, प्यूमा और वुडलैंड जैसे ब्रांडों की दुकानें संचालित होने की जानकारी भी सामने आई है।

    3,000 से ज्यादा खरीदारों की अलग परेशानी

    परियोजना में रह रहे 3,000 से अधिक परिवारों की समस्या सरकारी आवास वाले हिस्से से अलग है। खरीदारों के अनुसार वे लंबे समय से अपने फ्लैटों में रह रहे हैं, लेकिन ओ सी नहीं होने के कारण उन्हें कानूनी और प्रशासनिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

    9 जून 2026 की सुनवाई के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग को लंबे समय से लंबित मामले में 30 दिनों के भीतर औपचारिक सुनवाई और 60 दिनों के भीतर निर्णय की दिशा में आगे बढ़ने को कहा था। खरीदारों की ओर से यह भी कहा गया कि अधिभोग प्रमाणपत्र नहीं होने के कारण सहकारी आवास संस्था के गठन में दिक्कत बनी हुई है।

    इस बीच डेवलपर के निदेशक विनोद कुमार गोयनका ने जून में कहा था कि ओ सी का मामला किराया आवास वाले आवासों की सुपुर्दगी से जुड़े मुद्दों के कारण अटका है और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती लंबित है। वहीं सुप्रीम कोर्ट की 22 मई की कार्यवाही में एमएमबीसी और एमएमआरडीए को अधिभोग प्रमाणपत्र में आ रही अन्य बाधाओं की संयुक्त जांच करने को कहा गया था।

    खरीदारों के पुराने मामले भी सामने आए

    डीबी ओजोन, जिसे पहले ऑर्किड ओजोन के नाम से जाना जाता था, से जुड़े उपभोक्ता मामलों में भी परियोजना की लंबी देरी सामने आती रही है।

    14 जुलाई 2026 के महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के एक मामले में शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि फ्लैट के लिए बड़ी राशि का भुगतान करने के बावजूद उन्हें वैध और शांतिपूर्ण कब्जा नहीं मिला। रिकॉर्ड के अनुसार 28 अक्टूबर 2010 को भवन संख्या 18 में 624.11 वर्ग फुट के फ्लैट का आवंटन हुआ था। कुल कीमत 46,93,788 रुपये थी और 42,73,199 रुपये यानी करीब 90 प्रतिशत राशि का भुगतान किया जा चुका था। समझौते की शर्तों के अनुसार कब्जा 31 दिसंबर 2014 तक दिया जाना था।

    इसी परियोजना से जुड़े दूसरे उपभोक्ता मामलों में भी नेल्कमल रियल्टर्स सबअर्बन प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशकों के नाम सामने आए हैं। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड में विनोद कुमार गोयनका, विपुल धनप्रकाश बंसल और शाहिद उस्मान बलवा के नाम निदेशक के रूप में दर्ज हैं।

    परियोजना की स्थिति पर कंपनी के अपने दस्तावेज भी महत्वपूर्ण

    कंपनी के 2023-24 के निवेश दस्तावेज में डीबी ओजोन को दहिसर के पास पश्चिमी एक्सप्रेस राजमार्ग से सटी बड़ी आवासीय परियोजना बताया गया था। इसमें 25 भवनों और करीब 3,000 फ्लैट ग्राहकों को सौंपे जाने का उल्लेख था। दस्तावेज में यह भी कहा गया था कि आंतरिक फिनिशिंग और फिटिंग का काम चल रहा था।

    यही तथ्य मौजूदा विवाद को और महत्वपूर्ण बनाता है। एक ओर बड़ी संख्या में खरीदारों को फ्लैट सौंपे जाने का कंपनी रिकॉर्ड मौजूद है, वहीं दूसरी ओर अधिभोग प्रमाणपत्र, सरकारी आवासों की सुपुर्दगी और निर्माण की स्वीकृत मंजिलों को लेकर कानूनी विवाद जारी है।

    एमएमआरडीए के रिकॉर्ड में महाजनवाड़ी का अलग आंकड़ा

    एमएमआरडीए की मौजूदा वेबसाइट पर महाजनवाड़ी, मीरा भयंदर में 632 किराया आवास इकाइयों के पूर्ण होने और उन्हें मीरा भयंदर महानगरपालिका को सौंपे जाने का उल्लेख है। साथ ही एमएमआरडीए पूरे क्षेत्र में किराया आवास योजनाओं से बनने वाली इकाइयों के बड़े आंकड़े भी देता है।

    हालांकि उपलब्ध रिकॉर्ड से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि महाजनवाड़ी की ये 632 इकाइयां डीबी ओजोन के विवादित करीब 3,000 आवासों का ही हिस्सा हैं। दोनों आंकड़ों का संबंध स्पष्ट करने के लिए संबंधित परियोजना दस्तावेजों और एमएमआरडीए के रिकॉर्ड की अलग पुष्टि जरूरी है।

    अब आगे क्या होगा?

    डीबी ओजोन का मुख्य मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। नेल्कमल रियल्टर्स सबअर्बन प्राइवेट लिमिटेड की एसएलपी पर अंतिम फैसला अभी नहीं आया है।

    इस बीच विवाद के तीन महत्वपूर्ण सवाल बने हुए हैं—एमएमआरडीए को सौंपे जाने वाले करीब 3,000 आवास कब और किस स्थिति में मिलेंगे, डीबी ओजोन के हजारों खरीदारों को अधिभोग प्रमाणपत्र कब मिलेगा और संयुक्त निरीक्षण में सामने आए 493 और 486 मंजिलों के अंतर का आधिकारिक स्पष्टीकरण क्या है।

    इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि दहिसर चेक नाके के पास महाजनवाड़ी की इस लंबी अटकी परियोजना में अब अगला कदम क्या होगा।

  • Cooper Hospital Death Certificate Case: 6 साल बाद भी जांच का जवाब नहीं, डॉक्टर अब BMC के अहम पद पर

    Cooper Hospital Death Certificate Case: 6 साल बाद भी जांच का जवाब नहीं, डॉक्टर अब BMC के अहम पद पर

    Cooper Hospital के 2020 death certificate मामले में ₹10,000 रिश्वत मांगने का आरोप लगा था। डॉक्टर Niranjan Kshirsagar suspend हुए, लेकिन जांच का अंतिम नतीजा अब भी स्पष्ट नहीं।

    मुंबई: Cooper Hospital में अप्रैल 2020 में मृत्यु प्रमाणपत्र जारी करने के लिए ₹10,000 मांगने और ₹7,000 लेने के आरोप से जुड़ा मामला छह साल बाद फिर सवालों के घेरे में है। उस समय BMC ने Casualty Medical Officer Dr Niranjan Kshirsagar को जांच लंबित रहने तक निलंबित किया था। अब 2026 में इसी नाम के Dr Niranjan Kshirsagar को Jogeshwari के Hindu Hriday Samrat Balasaheb Thackeray Trauma Care Municipal Hospital में Medical Superintendent के रूप में सार्वजनिक रूप से दर्ज किया गया है। हालांकि उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड से दोनों पदों पर दर्ज व्यक्ति की पहचान को अंतिम रूप से एक ही व्यक्ति साबित करने वाला BMC सेवा रिकॉर्ड सामने नहीं आया है।

    2020 में क्या हुआ था

    अप्रैल 2020 में Andheri West के Gaondevi निवासी Abu Bakar Gulab Khan की हार्ट अटैक से मौत के बाद उनके परिवार को Cooper Hospital में मृत्यु प्रमाणपत्र लेने के दौरान कथित तौर पर परेशानी का सामना करना पड़ा था। परिवार के सदस्य Yusuf Jafri Ali Shaikh ने दावा किया था कि अस्पताल से जुड़े डॉक्टरों ने Covid-19 के कारण मृत्यु प्रमाणपत्र जारी होने में कई दिन लगने की बात कही और ₹10,000 की मांग की। आरोप के मुताबिक बाद में ₹7,000 पर मामला तय हुआ और परिवार को एक डॉक्टर के पास भेजा गया।

    मामला सामने आने के बाद Andheri West के तत्कालीन BJP MLA Ameet Satam ने ऑडियो रिकॉर्डिंग Municipal Commissioner Praveen Pardeshi को भेजकर जांच की मांग की थी। Cooper Hospital के तत्कालीन Dean Dr Pinakin Gujjar ने जांच शुरू होने की पुष्टि की थी, जबकि तत्कालीन Additional Municipal Commissioner (Health) Suresh Kakani ने दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की बात कही थी।

    Dr Niranjan Kshirsagar ने रिश्वत लेने से इनकार किया था। उनका कहना था कि वह उस रात ड्यूटी पर नहीं थे और परिवार ने करीब रात 2 बजे उनसे संपर्क किया था। उनके अनुसार ₹7,000 रिश्वत नहीं बल्कि उनकी फीस थी, जिसमें देर रात consultation का charge भी शामिल था। उन्होंने यह भी कहा था कि परिवार postmortem नहीं चाहता था और उन्होंने मदद की थी। Kshirsagar ने खुद को फंसाए जाने का आरोप लगाते हुए कहा था कि वह 15 वर्षों की सेवा में पहले कभी रिश्वत के आरोप का सामना नहीं कर चुके थे।

    BMC ने क्या कार्रवाई की थी

    ऑडियो सामने आने के एक दिन बाद BMC ने Dr Niranjan Kshirsagar को inquiry pending रहने तक suspend कर दिया था। उस समय सामने आई जानकारी के अनुसार preliminary inquiry में परिवार जिस डॉक्टर को private doctor बता रहा था, उसके Cooper Hospital से जुड़े होने की बात भी सामने आई थी। Ameet Satam ने उन दूसरे डॉक्टरों की भूमिका की भी जांच की मांग की थी, जिन्होंने परिवार को Kshirsagar तक पहुंचाया था।

    लेकिन इस मामले का सबसे बड़ा अनुत्तरित सवाल आज भी यही है कि उस departmental inquiry का अंतिम परिणाम क्या निकला। उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में इस specific मामले की final inquiry report, अंतिम disciplinary order, charge-sheet, clean chit, dismissal या अन्य अंतिम कार्रवाई का स्पष्ट दस्तावेज सामने नहीं आता।

    Death Certificate और Cause of Death Certificate एक नहीं

    इस मामले को समझने के लिए मृत्यु प्रमाणपत्र और Medical Certificate of Cause of Death के बीच अंतर समझना जरूरी है।

    Medical Certificate of Cause of Death वह चिकित्सकीय प्रमाणपत्र है जिसमें मृत्यु का कारण दर्ज किया जाता है। Registration of Births and Deaths Act की मौजूदा Section 10 के अनुसार, किसी medical institution में मृत्यु होने पर institution को cause-of-death certificate बिना शुल्क उपलब्ध कराना होता है। इस प्रमाणपत्र पर उस medical practitioner के हस्ताक्षर होते हैं जिसने मृतक को हाल की बीमारी के दौरान attend किया था और इसकी एक copy निकटतम रिश्तेदार को दी जानी है।

    2023 के संशोधन के बाद यह जिम्मेदारी medical institution के स्तर पर और स्पष्ट की गई। नए प्रावधान के मुताबिक medical institution, चाहे वह सरकारी हो या निजी, death होने पर cause-of-death certificate free of charge उपलब्ध कराएगा।

    इसका मतलब यह नहीं है कि हर परिस्थिति में मृत्यु से जुड़े किसी भी अलग medical service के लिए कोई निजी शुल्क असंभव है। लेकिन Cooper मामले में Dr Kshirsagar द्वारा बताए गए ₹7,000 को official death-certificate fee मानने का कोई सार्वजनिक BMC fee record उपलब्ध नहीं है। उनका पक्ष यह था कि यह late-night consultation की फीस थी।

    आज BMC से Death Certificate लेने की प्रक्रिया क्या है

    महाराष्ट्र सरकार के Aaple Sarkar portal पर BMC के लिए Death Certificate जारी करने की notified service timeline 3 दिन है। इसमें designated officer Divisional Medical Health Officer (Deputy Registrar), first appellate officer Divisional Deputy Executive Health Officer और second appellate officer Executive Health Officer बताए गए हैं।

    यह वर्तमान व्यवस्था है। इसे अप्रैल 2020 में लागू Covid-period procedure पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। 2020 में महामारी के दौरान deaths की जांच और documentation को लेकर अलग प्रशासनिक व्यवस्था लागू थी।

    Covid काल में death certificate को लेकर क्या बदला था

    Cooper Hospital का यह मामला ऐसे समय सामने आया था जब Covid-19 के कारण मृत्यु की जांच और documentation को लेकर अस्पतालों और परिवारों के सामने अतिरिक्त प्रक्रियात्मक दबाव था। बाद में BMC ने non-Covid deaths को लेकर यह स्पष्ट किया था कि apparent non-Covid death के मामले में death certificate पाने के लिए Covid certificate जरूरी नहीं था। उस समय BMC ने non-Covid deaths के cause-of-death certificate को लेकर अलग procedure भी जारी की थी।

    इसलिए 2020 की घटना में परिवार को बताई गई संभावित देरी और उस समय लागू वास्तविक BMC procedure के बीच अंतर की जांच इस मामले की महत्वपूर्ण कड़ी है।

    ₹7,000 की payment पर अब भी बड़ा सवाल

    Dr Kshirsagar का दावा था कि ₹7,000 उनकी फीस थी। दूसरी तरफ परिवार की ओर से इसे death certificate जल्दी दिलाने के लिए भुगतान बताया गया था। उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों में इस राशि की कोई ऐसी receipt, official fee schedule या BMC-authorised private consultation record सामने नहीं आया जिससे इस payment की प्रकृति निर्णायक रूप से स्पष्ट हो सके।

    उपलब्ध जानकारी में यह आरोप और डॉक्टर का अलग बचाव दोनों मौजूद हैं, जबकि departmental inquiry का अंतिम सार्वजनिक निष्कर्ष स्पष्ट नहीं है।

    अगर सरकारी काम के बदले पैसे मांगे जाएं तो क्या करें

    महाराष्ट्र Anti-Corruption Bureau की मौजूदा व्यवस्था के अनुसार सरकारी कर्मचारी द्वारा रिश्वत मांगने की शिकायत ACB में की जा सकती है। ACB के complaint system में public servant, department, bribe demand और pending government work जैसी जानकारी देने के साथ audio, video और image evidence उपलब्ध कराने की सुविधा भी है।

    ऐसी स्थिति में नागरिक को payment का receipt मांगने, अधिकारी का नाम और पद दर्ज करने, तारीख-समय नोट करने और उपलब्ध documentary या audio-video evidence सुरक्षित रखने की जरूरत है। प्रशासनिक service में देरी या certificate जारी नहीं होने जैसी समस्या के लिए BMC की grievance mechanism भी उपलब्ध है।

    2026 में death registration के नियमों में भी बदलाव

    महाराष्ट्र सरकार ने 31 जुलाई 2026 को Maharashtra Registration of Births and Deaths (Amendment) Rules, 2026 को notify किया है। यह बदलाव Maharashtra Birth and Death Registration Rules, 2000 में संशोधन करता है।

    इसके अलावा केंद्र के स्तर पर Registration of Births and Deaths कानून में हालिया संशोधनों के बाद birth और death registration व्यवस्था में कई बदलाव लागू हुए हैं। Cause-of-death certificate से संबंधित statutory provisions भी 2023 के संशोधन के बाद बदले हैं।

    2026 में Dr Niranjan Kshirsagar की वर्तमान भूमिका

    अगस्त 2026 की सार्वजनिक रिपोर्टों में Jogeshwari के Hindu Hriday Samrat Balasaheb Thackeray Trauma Care Municipal Hospital में Medical Superintendent के रूप में Dr Niranjan Kshirsagar का नाम सामने आया है। 20 अगस्त 2026 की hospital inspection report में Medical Superintendents Dr Chhaya Shinde और Dr Niranjan Kshirsagar की मौजूदगी दर्ज है।

    15 अगस्त 2026 की रिपोर्ट में भी इसी अस्पताल के Medical Superintendent Dr Niranjan Kshirsagar ने canteen से जुड़े विवाद पर hospital administration का पक्ष रखा था।

    हालांकि 2020 के Cooper Hospital मामले में दर्ज Dr Niranjan Kshirsagar और 2026 में Jogeshwari Trauma Care Hospital में दर्ज Dr Niranjan Kshirsagar एक ही व्यक्ति हैं, इसकी अंतिम पुष्टि के लिए BMC का आधिकारिक service/transfer record जरूरी है। इसलिए दोनों records को अभी एक ही व्यक्ति मानकर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा

    सबसे बड़ा सवाल अब भी जांच के अंतिम नतीजे का

    Cooper Hospital के 2020 के मामले में तत्कालीन कार्रवाई स्पष्ट है—जांच शुरू हुई और Dr Niranjan Kshirsagar को suspension का सामना करना पड़ा। लेकिन छह साल बाद भी उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड से यह स्पष्ट नहीं होता कि departmental inquiry अंततः किस निष्कर्ष पर पहुंची।

    यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण unanswered question है: क्या ₹7,000 की payment को लेकर डॉक्टर की सफाई स्वीकार हुई, क्या कोई departmental punishment हुआ, क्या आरोप साबित नहीं हुए, या जांच किसी अन्य निष्कर्ष तक पहुंची?

    जब तक BMC की final inquiry report या संबंधित service record सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आता, इस मामले को आरोप, suspension और डॉक्टर के defence के स्तर पर ही तथ्यात्मक रूप से प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

  • 14 फुट से ऊपर की झोपड़ियां तोड़ने से पहले बीएमसी बताए, क्या सो रहा था प्रशासन?

    14 फुट से ऊपर की झोपड़ियां तोड़ने से पहले बीएमसी बताए, क्या सो रहा था प्रशासन?

    मुंबई में 14 फुट या उससे ऊंची झोपड़ियों पर बीएमसी की कार्रवाई को लेकर सवाल उठे हैं। पुनर्वास के बीच पुराने ढांचों पर कार्रवाई, प्रशासनिक जवाबदेही और मुंबईकरों के पैसे के इस्तेमाल पर सवाल।

    मुंबई: 14 फुट या उससे अधिक ऊंचाई वाली 39,111 झोपड़ी संरचनाओं के खिलाफ बीएमसी ने 1 अक्टूबर से 31 दिसंबर तक विशेष कार्रवाई की घोषणा की है। बीएमसी के आंकड़ों के अनुसार मुंबई में कुल 2,23,150 झोपड़ी संरचनाएं हैं। इनमें 39,111 संरचनाएं 14 फुट या उससे अधिक ऊंचाई की बताई गई हैं। मुंबई शहर में 3,348, पश्चिमी उपनगरों में 4,536 और पूर्वी उपनगरों में 31,227 संरचनाएं शामिल हैं। 4,584 संरचनाओं पर पहले ही कार्रवाई की जा चुकी है और 611 को नोटिस दिए गए हैं।

    लेकिन इस कार्रवाई के साथ एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—अगर इन झोपड़ियों में अनधिकृत निर्माण वर्षों से मौजूद था और बीएमसी के पास वार्ड स्तर पर निगरानी तथा कार्रवाई की व्यवस्था थी, तो निर्माण को 14 फुट से अधिक होने से पहले क्यों नहीं रोका गया? इसमें साफ है कि भ्रष्टाचार खुद बीएमसी के अधिकारियों ने किया है। वरना अवैध निर्माण होते ही नहीं।

    अब पुराने ढांचे तोड़ने की तैयारी क्यों?

    मुंबई में झोपड़पट्टियों के पुनर्विकास और पात्र झोपड़ीवासियों के पुनर्वास के लिए राज्य सरकार की एसआरए व्यवस्था पहले से काम कर रही है। एसआरए की आधिकारिक व्यवस्था में झोपड़पट्टी का सर्वे, झोपड़ियों का माप, पात्रता का निर्धारण और पुनर्वास योजना को आगे बढ़ाने जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं।

    ऐसे में सवाल यह है कि जिन इलाकों में पुनर्वास की प्रक्रिया चल रही है, वहां वर्षों पुराने झोपड़ी ढांचों के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई क्या उसी पुनर्वास प्रक्रिया के साथ तालमेल के लिए या किसी खास डेवलपर को फायदा पहुंचाने के लिए की जा रही है?

    नया अवैध निर्माण रोकना था, पुराने घर तोड़ना क्यों?

    अनधिकृत निर्माण पर कार्रवाई की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन प्रशासनिक नीति का सबसे अहम सवाल यह है कि कार्रवाई का केंद्र क्या होना चाहिए।

    अगर कोई व्यक्ति आज नया अवैध निर्माण कर रहा है, अतिरिक्त मंजिल खड़ी कर रहा है या झोपड़ी की ऊंचाई लगातार बढ़ा रहा है, तो उसे निर्माण के दौरान ही रोकना बीएमसी की जिम्मेदारी के दायरे में आता है। इसी के लिए तो प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्तियां की गई है।

    इसके विपरीत वर्षों से मौजूद झोपड़ी को अब केवल उसकी मौजूदा ऊंचाई के आधार पर निशाना बनाना गरीब परिवारों के लिए गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।

    यही वजह है कि बीएमसी को सार्वजनिक रूप से जवाब देना चाहिए—39,111 संरचनाएं इतनी बड़ी संख्या में 14 फुट या उससे अधिक ऊंचाई तक पहुंचीं तो इन पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

    मुंबईकरों के पैसों से अधिकारियों को वेतन, फिर जवाबदेही किसकी?

    यह सवाल केवल झोपड़ी तोड़ने तक सीमित नहीं है। यह मुंबईकरों के पैसे और प्रशासनिक जवाबदेही से भी जुड़ा है।

    बीएमसी के अलग-अलग वार्डों में अनधिकृत निर्माण की निगरानी, निरीक्षण, नोटिस और कार्रवाई के लिए अधिकारी और कर्मचारी नियुक्त हैं। इन अधिकारियों और कर्मचारियों को वेतन सार्वजनिक धन से दिया जाता है। यह धन मुंबईकरों से मिलने वाले कर और विभिन्न शुल्कों से आता है।

    अगर किसी इलाके में अनधिकृत निर्माण वर्षों तक बढ़ता रहा और अब हजारों संरचनाओं पर एक साथ कार्रवाई की जरूरत पड़ रही है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उस दौरान निगरानी व्यवस्था ने क्या काम किया?

    अगर किसी अधिकारी की जिम्मेदारी के क्षेत्र में निर्माण बढ़ता रहा, तो वहां के सहायक आयुक्त की जवाबदेही तय है? जब मुंबई भर में इतना बड़ा आंकड़ा सामने आया है तो क्या पुराने निरीक्षण रिकॉर्ड की जांच होगी? क्या यह देखा जाएगा कि शिकायत मिलने के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई थी या नियमित निरीक्षण ही नहीं हुआ?

    और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—अगर प्रशासन की निगरानी में कमी के कारण आज बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ और कार्रवाई पर सार्वजनिक धन खर्च होगा, तो उस अतिरिक्त खर्च की जिम्मेदारी किसकी होगी?

    मुंबईकर अपने मेहनत के पैसे से बीएमसी को वेतन और प्रशासनिक व्यवस्था चलाने के लिए पैसा देते हैं। इसलिए जनता यह जानने का अधिकार रखती है कि जिस निर्माण को समय रहते रोकना प्रशासन की जिम्मेदारी थी, उसे वर्षों तक बढ़ने देने के बाद अब उसी पर कार्रवाई करने में होने वाला अतिरिक्त सरकारी खर्च किस प्रशासनिक विफलता का परिणाम है।

    हालांकि केवल किसी निर्माण के लंबे समय तक मौजूद रहने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी अधिकारी ने जानबूझकर उसे बनने दिया या भ्रष्टाचार किया। इसकी पुष्टि के लिए संबंधित मामलों के निरीक्षण रिकॉर्ड, शिकायतें, नोटिस, कार्रवाई आदेश और अधिकारी की जिम्मेदारी की जांच जरूरी होगी।

    लेकिन अगर बीएमसी वास्तव में जवाबदेही को गंभीरता से लेना चाहती है, तो 39,111 संरचनाओं की कार्रवाई के साथ यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि इनमें से कितने मामले पुराने हैं और उन पर पहले क्या कार्रवाई की गई थी।

    14 फुट का मानक नया नहीं

    बीएमसी के पुराने रिकॉर्ड में भी 14 फुट से अधिक ऊंचाई बढ़ाने वाले अनधिकृत निर्माण के खिलाफ कार्रवाई के उदाहरण मिलते हैं। यानी 14 फुट की सीमा सितंबर 2026 में अचानक सामने आया नया मानक नहीं है।

    इससे निगरानी की जवाबदेही और महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि यह सीमा पहले से प्रशासनिक कार्रवाई के दायरे में थी, तो इतने बड़े पैमाने पर संरचनाएं इस सीमा तक कैसे पहुंचीं?

    गरीब परिवारों पर कार्रवाई का असली असर क्या होगा?

    बीएमसी का कहना है कि कार्रवाई 14 फुट से ऊपर बने अनधिकृत हिस्से पर केंद्रित होगी। लेकिन जमीन पर रहने वाले परिवार के लिए यह सवाल इतना सरल नहीं है।

    कई झोपड़ियां वर्षों में धीरे-धीरे बदली और ऊपर की ओर बढ़ी हैं। नीचे का हिस्सा और बाद में जोड़ा गया हिस्सा कई मामलों में एक ही संरचना का हिस्सा हो सकता है। ऐसे में केवल ऊपर का हिस्सा हटाने से पूरी संरचना की मजबूती प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। कई मामलों में ऊपर के हिस्से को तोड़ते समय पूरा स्ट्रक्चर ही भरभरा कर गिर गया है।

    इसलिए कार्रवाई से पहले प्रत्येक संरचना की वास्तविक स्थिति, निर्माण का समय, नीचे और ऊपर के हिस्से का संबंध तथा परिवार की पुनर्वास स्थिति दर्ज करना जरूरी होगा।

    एसआरए चल रहा है तो बीएमसी और एसआरए में तालमेल कहां है?

    शहरभर में सरकार ऑलरेडी झोपड़पट्टी हटाओ अभियान चला रही है। जिसके तहत अलग अलग सरकारी योजनाओं पर काम चल रहा है। जैसे कि एसआरए की व्यवस्था में झोपड़ी की पहचान, सर्वे, पात्रता और पुनर्वास योजना की प्रक्रिया पहले से मौजूद है। ऐसे में 39,111 संरचनाओं की सूची तैयार करते समय बीएमसी और बाकी सरकारी योजनाओं के रिकॉर्ड का मिलान होना चाहिए।

    यह साफ होना चाहिए कि इनमें से कितनी झोपड़ियां बाकी सरकारी योजनाओं के सर्वे में दर्ज हैं, कितने परिवार पात्रता प्रक्रिया में हैं, कितनी जगहों पर पुनर्वास योजना स्वीकृत या चल रही है और कितने मामलों में कोई पुनर्वास योजना नहीं है।

    यदि ऐसा समन्वय नहीं किया गया है तो कार्रवाई गरीब परिवारों के लिए दोहरी परेशानी पैदा कर सकती है—पहले वर्षों तक पुनर्वास की प्रतीक्षा और फिर मौजूदा घर पर तोड़फोड़ की कार्रवाई।

    कार्रवाई से पहले बीएमसी को जवाब देना चाहिए

    39,111 झोपड़ी संरचनाओं पर कार्रवाई कोई सामान्य प्रशासनिक अभियान नहीं है। इसके पीछे हजारों परिवार और उनके घर जुड़े हैं।

    इसलिए बीएमसी को कार्रवाई शुरू करने से पहले 14 फुट की ऊंचाई नापने का स्पष्ट आधार, वॉर्डवार सूची, प्रत्येक संरचना के खिलाफ पूर्व कार्रवाई का रिकॉर्ड, एसआरए रिकॉर्ड से मिलान और कार्रवाई के दौरान परिवारों की सुरक्षा से जुड़े नियम सार्वजनिक करने चाहिए।

    इसके साथ यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि जिन अधिकारियों की जिम्मेदारी वाले क्षेत्रों में ये निर्माण वर्षों तक बढ़ते रहे, उनकी भूमिका और जवाबदेही की समीक्षा कैसे होगी।

    नया अवैध निर्माण रोकना प्रशासन की जिम्मेदारी है। लेकिन वर्षों से मौजूद गरीबों के घरों पर कार्रवाई करने से पहले यह जवाब भी जरूरी है कि जब ये निर्माण बढ़ रहे थे, तब प्रशासन क्या कर रहा था?

    और अगर उस समय निगरानी नहीं हुई, तो मुंबईकरों के मेहनत के पैसे से अधिकारियों को दिए गए वेतन और उस पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही आखिर किसकी है?

    मुंबई को अनधिकृत निर्माण से मुक्त करने की नीति यदि वास्तव में सुरक्षा और नियोजन के उद्देश्य से है, तो उसका पहला लक्ष्य नया अवैध निर्माण रोकना, दूसरा पुराने मामलों में प्रशासनिक जवाबदेही तय करना और तीसरा सरकारी योजनाओं के माध्यम से पात्र परिवारों का सुरक्षित पुनर्वास होना चाहिए।

    पुराने घरों पर कार्रवाई करके केवल आंकड़ा कम करना समाधान नहीं है। समाधान तब होगा जब अवैध निर्माण भी रुके, प्रशासनिक जवाबदेही भी तय हो और गरीब परिवार पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी होने से पहले अपने घर से बेघर न हों।

  • कांदिवली के गांधी नगर SRA विवाद में NCR के बाद दस्तावेज और डेवलपर बदलाव पर सवाल

    कांदिवली के गांधी नगर SRA विवाद में NCR के बाद दस्तावेज और डेवलपर बदलाव पर सवाल

    कांदिवली के गांधी नगर SRA विवाद में धमकी के आरोप पर NCR दर्ज हुआ। पुराने SRA रिकॉर्ड, डेवलपर बदलाव और Annexure-II पर उठे सवालों की पड़ताल।

    मुंबई: कांदिवली पश्चिम के गांधी नगर क्षेत्र की SRA योजना को लेकर विवाद अब धमकी के आरोप और पुलिस NCR तक पहुंच गया है। समाजसेवक महबूब ए. शाह को कथित तौर पर जान से मरवा देने की धमकी दिए जाने के मामले में 9 सितंबर 2026 को सोसाइटी अध्यक्ष शमशुद्दीन जमील चौधरी के खिलाफ NCR दर्ज किया गया है। विवाद की पृष्ठभूमि में SRA योजना में कथित दस्तावेजी अनियमितताओं और पात्रता के आधार पर पुनर्वसन फ्लैट मिलने से जुड़े गंभीर सवाल हैं।

    मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि गांधी नगर की संबंधित SRA योजना के पुराने और बाद के सार्वजनिक रिकॉर्ड में डेवलपर तथा CTS विवरण में अंतर दिखाई देता है। उपलब्ध SRA project record में Jai Hind Gandhi Nagar CHS (Prop) के लिए 2 मई 2016 की LOI दर्ज है और उस समय डेवलपर के रूप में M/s Hari Om Developer का नाम सामने आता है। वहीं 2025 के आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड में Jai Hind Gandhi Nagar SRA CHS (P) के साथ Ruparel Indra & Realty Pvt. Ltd. का नाम दर्ज है।

    यही बदलाव अब इस पूरे विवाद का एक अहम दस्तावेजी सवाल बन गया है कि डेवलपर में यह परिवर्तन कब, किस प्रक्रिया के तहत और किस SRA आदेश के आधार पर हुआ।

    गांधी नगर SRA योजना का पुराना रिकॉर्ड क्या बताता है?

    SRA project record के अनुसार Jai Hind Gandhi Nagar CHS (Prop) का proposal number R-S/MHADA&PVT/0002/20060509 दर्ज है। रिकॉर्ड में योजना को Active status के साथ दिखाया गया है और 2 मई 2016 की LOI का reference SRA/ENG/1406/RS/STGL/PL/LOI दिया गया है। इस entry में M/s Hari Om Developer को developer और Shri Vivek Bhole Architect Pvt. Ltd./Neo Modern को architect के रूप में दर्ज किया गया है।

    बाद के न्यायिक रिकॉर्ड में इसी नाम से जुड़ी गांधी नगर SRA योजना के साथ Ruparel Indra & Realty Pvt. Ltd. का नाम सामने आता है। 13 जून 2025 के Apex Grievance Redressal Committee के cause list record में Jai Hind Gandhi Nagar SRA CHS (P) और Ruparel Indra & Realty Pvt. Ltd. बनाम CEO/SRA, Competent Authority-7/SRA तथा Assistant Registrar/SRA के बीच Appeal (L) No. 07 of 2025 दर्ज है।

    इससे यह स्पष्ट है कि गांधी नगर SRA योजना से जुड़ा विवाद केवल स्थानीय स्तर की शिकायत तक सीमित नहीं रहा है। हालांकि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर इस न्यायिक कार्यवाही को अपने आप में भ्रष्टाचार का मामला नहीं कहा जा सकता

    डेवलपर और CTS रिकॉर्ड में अंतर क्यों?

    पुराने SRA record में योजना से जुड़े कई CTS numbers दर्ज हैं, जिनमें CTS 486(Pt), 487 से 490, 492 से 494, 495(Pt), 497, 498(Pt), 499, 500 से 509, 512, 513(Pt), 514, 515, 518(Pt), 536, 538, 539, 543(Pt) और 738(Pt) शामिल हैं।

    वहीं 2025 के न्यायिक रिकॉर्ड में CTS 98(Pt), 737(Pt), 738(Pt), 739, 740, 741, 755(Pt), 756(Pt), 757(Pt), 759(Pt), 761, 762 और 763 का उल्लेख मिलता है।

    CTS विवरण में यह अंतर अपने आप में किसी गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है। SRA योजना में संशोधन, जमीन के पुनर्गठन, CTS बदलाव, अलग हिस्सों के समावेश या revised proposal जैसे कारण हो सकते हैं। लेकिन इन बदलावों का आधिकारिक कारण SRA के संबंधित आदेशों और revised records से स्पष्ट होना जरूरी है।

    यही वह बिंदु है जहां गांधी नगर SRA विवाद में दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।

    फर्जी दस्तावेजों के आरोप की जांच कैसे होगी?

    मामले में स्थानीय रहवासियों और समाजसेवक महबूब ए. शाह की ओर से आरोप लगाया गया है कि गरीब परिवारों को SRA योजना में फ्लैट दिलाने के भरोसे के साथ कथित तौर पर allotment letters, आदेश प्रतियां, Collector office से जुड़े दस्तावेज, सक्षम प्राधिकारी के पत्र, society NOC, बिजली बिल और अन्य सरकारी रिकॉर्ड दिखाए जा रहे हैं।

    इन दस्तावेजों की वास्तविकता का फैसला आरोप के आधार पर नहीं किया जा सकता। प्रत्येक दस्तावेज को उस विभाग के मूल रिकॉर्ड से मिलाना होगा जिसने उसे जारी किया है।

    SRA मामले में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज Annexure-II है। SRA की व्यवस्था में survey और document verification के बाद eligibility तय करने की प्रक्रिया Annexure-II से जुड़ी है। इसलिए किसी व्यक्ति के पास कोई पत्र या अन्य supporting document होना अपने आप में SRA rehabilitation eligibility का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।

    किसी दावे की वास्तविक स्थिति जानने के लिए survey record, Annexure-II, eligibility determination, Competent Authority record और allotment से जुड़े दस्तावेजों के बीच समानता देखना जरूरी होगा।

    धमकी के आरोप के बाद पुलिस NCR

    एक प्रकाशित खबर को लेकर समाजसेवक महबूब ए. शाह और सोसाइटी अध्यक्ष शमशुद्दीन जमील चौधरी के बीच विवाद सामने आया। आरोप है कि चौधरी की ओर से गाली-गलौज के साथ महबूब ए. शाह को जान से मरवा देने की धमकी दी गई।

    महबूब ए. शाह ने इसकी सूचना कांदिवली पुलिस स्टेशन को दी। उपलब्ध पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार 9 सितंबर 2026 को शमशुद्दीन जमील चौधरी के खिलाफ NCR दर्ज की गई। NCR में BNS 351(3) और 352 से संबंधित प्रावधान दर्ज किए गए हैं।

    SRA योजना में अब सबसे बड़ा सवाल क्या है?

    गांधी नगर मामले में अब केवल यह सवाल नहीं है कि महबूब ए. शाह को धमकी क्यों दी गई। उससे बड़ा सवाल यह है कि जिस SRA योजना को लेकर दस्तावेजों और पात्रता पर आरोप लगाए जा रहे हैं, उसकी आधिकारिक रिकॉर्ड श्रृंखला क्या कहती है।

    2016 के उपलब्ध SRA record में Hari Om Developer का नाम है, जबकि 2025 के न्यायिक record में Ruparel Indra & Realty Pvt. Ltd. का नाम सामने आता है। इसी तरह पुराने और बाद के रिकॉर्ड में CTS विवरण भी अलग दिखाई देते हैं।

    इसलिए संबंधित दस्तावेजों से यह स्पष्ट होना जरूरी है कि developer में बदलाव हुआ था या scheme structure में कोई अन्य संशोधन हुआ, वह कब हुआ, किस authority ने मंजूर किया और उसके पीछे कौन-सा official order है।

    रहवासियों पर क्या पड़ सकता है असर?

    SRA योजना में eligibility या supporting documents को लेकर विवाद लंबा खिंचने पर वास्तविक पात्र परिवारों के rehabilitation process पर असर पड़ सकता है। दस्तावेजों की जांच में किसी दावे में कमी मिलने पर संबंधित व्यक्ति की पात्रता पर सवाल उठ सकता है, जबकि genuine beneficiaries के लिए भी redevelopment और rehabilitation की प्रक्रिया विवादित होने से लंबी हो सकती है।

    इसी कारण SRA योजना में survey record और Annexure-II से लेकर allotment तथा rehabilitation status तक दस्तावेजों की स्पष्टता महत्वपूर्ण होती है।

    अब आगे क्या?

    गांधी नगर SRA विवाद में अगला महत्वपूर्ण चरण संबंधित सरकारी रिकॉर्ड की जांच है। विशेष रूप से 2016 की LOI, उसके बाद के revised orders, developer appointment या change से जुड़े दस्तावेज, latest Annexure-II, Competent Authority के रिकॉर्ड और Appeal (L) No. 07 of 2025 से संबंधित आदेश इस पूरे मामले की स्थिति को अधिक स्पष्ट कर सकते हैं।

    साथ ही कथित दस्तावेजों को उनके संबंधित सरकारी विभागों के मूल रिकॉर्ड से मिलाना जरूरी होगा। जब तक यह verification पूरा नहीं होता, फर्जी दस्तावेजों के आरोप को आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

    गांधी नगर SRA योजना में उठे ये सवाल अब केवल एक NCR तक सीमित नहीं हैं। असली जवाब उन सरकारी रिकॉर्ड में छिपा है जो यह बताएंगे कि योजना में पात्रता, सोसाइटी की भूमिका, डेवलपर की स्थिति और पुनर्वसन से जुड़े दस्तावेज वास्तव में एक-दूसरे से कितने मेल खाते हैं।

  • मुंबई में बिल्डर ने दिया कम कारपेट एरिया, फ्लैट मालिकों को ₹6.64 लाख लौटाने का आदेश

    मुंबई में बिल्डर ने दिया कम कारपेट एरिया, फ्लैट मालिकों को ₹6.64 लाख लौटाने का आदेश

    मुंबई मालाड के बिल्डर को कम कारपेट एरिया देने पर ₹6.64 लाख मुआवजा, 9% ब्याज, मानसिक परेशानी और मुकदमेबाजी खर्च देने का आदेश।

    मुंबई: मालाड पश्चिम में agreement में तय carpet area से कम फ्लैट देने के मामले में महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने Sion के बिल्डर Chinnappan Anthony, proprietor of M/s Milan Builders and Developers, को फ्लैट मालिकों को ₹6,64,640 मुआवजा 9 प्रतिशत ब्याज के साथ देने का आदेश दिया है। इसके अलावा प्रत्येक शिकायतकर्ता को ₹50,000 मानसिक परेशानी और ₹25,000 मुकदमेबाजी खर्च भी देना होगा।

    560 की जगह मिला 518.46 वर्गफुट area

    मामला मालाड पश्चिम के Shree Balaji Ashirwad प्रोजेक्ट का है। प्रोजेक्ट का पता नहर नगर रोड, भंडारवाड़ा मार्ग, Smt. KG Mittal Institute of Management के सामने, नेवी कॉलोनी के पास, मालाड पश्चिम, मुंबई – 400064 बताया गया है। यह इलाका लिंक रोड कॉरिडोर और पश्चिमी उपनगरों से जुड़ा हुआ है तथा आसपास बैंक, ATM और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

    शिकायतकर्ता के 11 जनवरी 2016 के registered Agreement for Sale में फ्लैट का carpet area 560 वर्गफुट तय था। नवंबर 2016 में possession मिलने के बाद registered architect से measurement कराई गई, जिसमें area 518.46 वर्गफुट निकला।

    यानी agreement में तय area से 41.54 वर्गफुट, करीब 7.42 प्रतिशत कम जगह मिली।

    शिकायतकर्ता ने ₹16,000 प्रति वर्गफुट के आधार पर नुकसान की गणना की, जिससे ₹6,64,640 की राशि बनी।

    बिल्डर की दलील नहीं मानी

    Developer ने architect की measurement पर सवाल उठाते हुए complaint का विरोध किया। उसने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता landowner है, इसलिए उसे consumer नहीं माना जाना चाहिए।

    आयोग ने दोनों दलीलों को खारिज कर दिया। उसके मुताबिक developer ने architect की report को चुनौती देने के लिए कोई स्वतंत्र expert measurement पेश नहीं की। वहीं development arrangement के तहत constructed flat पाने वाला landowner भी structural deficiency और statutory non-compliance के मामलों में consumer हो सकता है।

    आयोग ने कहा कि agreement में तय carpet area को purchaser की लिखित सहमति या उचित consideration adjustment के बिना कम करना सेवा में कमी और unfair trade practice है।

    Full OC और society formation पर भी आदेश

    मामले में building का पूर्ण Occupation Certificate (OC) नहीं होने और cooperative housing society का गठन नहीं किए जाने की शिकायत भी की गई थी। आयोग ने इन statutory obligations को continuing nature का माना और developer को संबंधित authorities के साथ जरूरी formalities पूरी करने का निर्देश दिया।

    इसी वजह से developer की यह दलील भी नहीं चली कि शिकायत पुरानी होने के कारण limitation से बाहर है। हालांकि हर पुराने property dispute में यही नियम लागू नहीं होता; complaint की तारीख और cause of action के आधार पर limitation तय होती है।

    Flat मालिकों के लिए क्या मायने?

    इस फैसले से साफ है कि flat खरीदते समय Agreement for Sale में दर्ज carpet area को ध्यान से जांचना जरूरी है। Possession के बाद area में अंतर मिले तो independent architect से measurement कराकर report सुरक्षित रखना उपयोगी हो सकता है। Buyer को OC, sanctioned plan, society formation और conveyance की स्थिति भी जांचनी चाहिए।

    यह फैसला यह भी नहीं कहता कि हर carpet-area dispute में ₹6.64 लाख compensation मिलेगा। इस मामले में रकम 41.54 वर्गफुट की कमी और ₹16,000 प्रति वर्गफुट के valuation basis पर तय हुई।

  • BMC रिश्वत कांड: ₹70 हजार मांगे, ₹60 हजार पर सौदा; ACB ने इंजीनियर और कर्मचारी को रंगे हाथ पकड़ा

    BMC रिश्वत कांड: ₹70 हजार मांगे, ₹60 हजार पर सौदा; ACB ने इंजीनियर और कर्मचारी को रंगे हाथ पकड़ा

    मुंबई के अंधेरी में BMC के जूनियर इंजीनियर और कर्मचारी पर ₹60 हजार रिश्वत लेने का आरोप। ACB ट्रैप में गिरफ्तारी, ₹2.78 लाख कैश बरामद।

    मुंबई: अंधेरी पश्चिम के BMC K/West Ward कार्यालय में Anti-Corruption Bureau (ACB) ने रिश्वत के मामले में BMC के एक जूनियर इंजीनियर और कर्मचारी को गिरफ्तार किया है। ACB के मुताबिक, एक बेकरी संचालक से कथित तौर पर ₹70 हजार की रिश्वत मांगी गई थी। बातचीत के बाद ₹60 हजार में सौदा तय हुआ, जिसके बाद ACB ने ट्रैप लगाकर कर्मचारी को रकम लेते हुए पकड़ लिया।

    मामले में जूनियर इंजीनियर नीरवकुमार चुनीलाल जैसूर (43) और BMC कर्मचारी विजय रमेश पाटील (46) को आरोपी बनाया गया है।

    बेकरी पर कार्रवाई रोकने के बदले रिश्वत का आरोप

    ACB के मुताबिक, शिकायतकर्ता 50 वर्षीय बेकरी संचालक है। आरोप है कि पाटील ने उससे ₹70 हजार मांगे थे। कथित तौर पर यह रकम बेकरी को चलाने देने और उसके खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई नहीं करने के बदले मांगी गई थी।

    शिकायत मिलने के बाद ACB ने रिश्वत की मांग की पुष्टि की। इसी दौरान पाटील ने शिकायतकर्ता की मुलाकात जूनियर इंजीनियर जैसूर से कराई। इसके बाद कथित तौर पर रिश्वत की रकम ₹70 हजार से घटकर ₹60 हजार तय हुई।

    ₹60 हजार लेते ही ACB का ट्रैप

    रकम तय होने के बाद ACB ने K/West Ward कार्यालय में ट्रैप लगाया।

    ACB के अनुसार, विजय पाटील को ₹60 हजार स्वीकार करते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया। इसके बाद जांच टीम ने BMC के छठी मंजिल स्थित कार्यालय से जूनियर इंजीनियर जैसूर को भी हिरासत में लिया।

    दोनों के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक कानून की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।

    कर्मचारी के पास ₹2.78 लाख कैश मिला

    ट्रैप के बाद ACB ने पाटील की तलाशी ली। उसके पास से ₹40,820 नकद और बैग से ₹2,37,600 नकद बरामद हुआ।

    इस तरह कुल ₹2,78,420 कैश मिला।

    तीन मोबाइल फोन भी जब्त

    ACB ने मामले में मोबाइल फोन भी जब्त किए हैं। जूनियर इंजीनियर जैसूर के दो मोबाइल फोन और पाटील का एक मोबाइल फोन जांच के लिए लिया गया है।

    अब जांच में यह पता लगाया जा रहा है कि कथित रिश्वत की मांग और लेन-देन में दोनों आरोपियों की क्या भूमिका थी और क्या इस मामले में कोई अन्य व्यक्ति भी शामिल है।

    अब आगे क्या होगा?

    ACB की कार्रवाई के बाद मामले की जांच जारी है। इस केस में सबसे अहम सवाल अब यह है कि ₹2.78 लाख की अतिरिक्त नकदी का स्रोत क्या था और क्या उसका कथित रिश्वत प्रकरण से कोई संबंध सामने आता है।

    फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर इतना स्पष्ट है कि ACB ने ₹60 हजार की कथित रिश्वत के ट्रैप में BMC के दो कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की है।

  • BMC से PWD तक Transfer-Posting का खेल? नेताओं की सिफारिश पर उठे बड़े सवाल

    BMC से PWD तक Transfer-Posting का खेल? नेताओं की सिफारिश पर उठे बड़े सवाल

    BMC से PWD तक Transfer-Posting पर सवाल उठे हैं। 225 राजनीतिक सिफारिशों, BMC Randomisation और PWD tenure विवाद का पूरा मामला जानिए।

    मुंबई: सरकारी नौकरी में Transfer-Posting नियम से होना चाहिए या किसी नेता की recommendation से? BMC से लेकर महाराष्ट्र PWD तक सामने आ रही घटनाएं इसी बुनियादी सवाल को सामने ला रही हैं। BMC के रिकॉर्ड में पिछले एक साल में 225 अधिकारियों-कर्मचारियों के Transfer और Promotion को लेकर राजनीतिक सिफारिशें मिली हैं। दूसरी तरफ नागपुर PWD में कुछ Junior Engineers के लंबे समय तक एक ही जगह बने रहने और extension की प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं। ऐसे माहौल में BMC ने Engineers के Transfer के लिए अब Online Randomisation की व्यवस्था लागू की है।

    225 सिफारिशें, सवाल सिर्फ संख्या का नहीं

    RTI से सामने आई जानकारी के मुताबिक BMC के City Engineer Office में पिछले एक साल में 225 Transfer/Promotion recommendation letters मिले। इनमें Union Ministers, State Ministers, MPs, MLAs, MLCs और अलग-अलग राजनीतिक दलों के जनप्रतिनिधियों के नाम शामिल हैं।

    रिकॉर्ड में Eknath Shinde का नाम 10 बार और Ramdas Athawale का 9 बार सामने आया। Girish Mahajan और Kalidas Kolambkar के नाम 7-7 बार दर्ज हैं। कई अन्य नेताओं के नाम भी रिकॉर्ड में हैं।

    यहां असली सवाल 225 की संख्या से आगे है—किसी कर्मचारी की Transfer-Posting का प्रशासनिक फैसला जिस competent authority को करना है, वहां किसी राजनीतिक जनप्रतिनिधि की recommendation की भूमिका क्या है?

    Recommendation अपने-आप में किसी Transfer को गैरकानूनी साबित नहीं करती। कई बार जनप्रतिनिधि health problem, family circumstances, travel distance या दूसरी व्यक्तिगत दिक्कतों को लेकर representation भी करते हैं। लेकिन अंतिम फैसला नियमों और सक्षम प्रशासनिक authority के आधार पर होना चाहिए। इसलिए सवाल recommendation के अस्तित्व से ज्यादा उसके प्रभाव और उसके बाद हुए फैसले की प्रक्रिया पर है।

    अब BMC में बदली Computer तय करेगा

    इसी विवाद के बीच BMC ने City Engineer Office में JE, SE और AE के लिए Employee Transfer System Based on Randomization शुरू किया है।

    2 सितंबर के circular के मुताबिक एक ही department/section में तीन साल या उससे ज्यादा समय से काम कर रहे Engineers को 5 से 20 सितंबर के बीच Online Transfer Preference देनी होगी। कर्मचारी कम से कम एक और अधिकतम पांच विकल्प दे सकते हैं। इसके बाद available manpower और vacant posts के आधार पर computerised system Transfer process करेगा।

    ध्यान देने वाली बात यह है कि यह व्यवस्था फिलहाल City Engineer Office के JE, SE और AE पर लागू है। इसे BMC के हर कर्मचारी के लिए लागू नया Transfer rule नहीं कहा जाएगा।

    लेकिन क्या इससे Recommendation का रास्ता बंद होगा?

    यही इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।

    अगर Transfer को computerised randomisation से तय किया जाना है, तो किसी खास कर्मचारी के लिए बाहर से आने वाली recommendation का उस process पर क्या असर होगा? क्या ऐसे मामलों के लिए कोई अलग exception mechanism होगा? और अगर exception होगा तो उसका कारण और approval public record में आएगा या नहीं?

    यानी असली transparency सिर्फ software लगाने से नहीं आएगी। Transparency तब मानी जाएगी जब Transfer का पूरा trail—tenure, vacancy, preference, competent authority का decision और exception का कारण—स्पष्ट हो।

    2025 का विवाद भी इसी सवाल को और गंभीर बनाता है

    BMC में Transfer-Posting को लेकर विवाद पहली बार नहीं उठा। 2025 में करीब 160 Engineers के Transfer को लेकर political influence और “cash-for-transfer” जैसे आरोप लगाए गए थे। विवाद बढ़ने के बाद proposed transfer process पर रोक लगी थी।

    मई 2026 में BJP MLA Mihir Kotecha ने आरोप लगाया कि पहले विवादित list में शामिल करीब 55 अधिकारियों को दोबारा उन्हीं या समान postings पर लाने की कोशिश हो रही है। BMC ने उस समय ऐसी किसी final list की जानकारी से इनकार किया था।

    इन आरोपों की पुष्टि को लेकर अंतिम निष्कर्ष अलग बात है, लेकिन लगातार उठते सवाल बताते हैं कि Transfer-Posting की प्रक्रिया पर भरोसा ही इस विवाद का केंद्र बन चुका है।

    PWD में सवाल अलग, लेकिन मुद्दा वही

    नागपुर PWD की रिपोर्ट ने Transfer और tenure की दूसरी तस्वीर सामने रखी है।

    सरकारी नियम के मुताबिक सामान्य तौर पर एक जगह तीन साल की tenure के बाद Transfer होना चाहिए और उससे आगे extension exceptional circumstances में ही होना चाहिए। लेकिन कुछ Junior Engineers के 8 से 10 साल तक एक ही जगह काम करने की जानकारी सामने आई है। कुछ मामलों में extension के लिए लिखित आदेश नहीं होने पर भी सवाल उठे हैं।

    यहीं प्रशासनिक जवाबदेही का मुद्दा आता है—अगर tenure खत्म हो गया तो किसी कर्मचारी को उसी जगह बनाए रखने का आधार क्या था, और वह आधार किस लिखित आदेश में दर्ज है?

    BMC में राजनीतिक recommendations और PWD में tenure-extension एक ही मामला नहीं हैं। लेकिन दोनों घटनाएं एक ही बड़ी चिंता सामने लाती हैं: सरकारी Transfer-Posting में नियम कितना साफ है और उसका पालन कितना दिखाई देता है?

    BMC के सामने एक और बड़ा accountability test

    इसी समय Bombay High Court BMC की sanitation workers को housing देने की नीति पर भी लगातार जवाब मांग रहा है। 2008 की State Government policy के बावजूद करीब 18 साल में housing implementation नहीं होने पर Court ने BMC से उसके land resources की विस्तृत जानकारी मांगी है।

    BMC Commissioner के affidavit में करीब 4,176 leasehold properties, 3,505 tenanted properties/staff quarters, 3,668 vacant land tenancies, करीब 8,000 existing amenities और लगभग 6,000 public-purpose reservations का उल्लेख हुआ था। Court ने BMC की land pool को व्यापक रूप से examine करने और sanitation workers के लिए उपलब्ध land identify करने को कहा है।

    31 अगस्त की proceedings के बाद BMC को fresh comprehensive affidavit दाखिल करने के लिए 9 सितंबर 2026 तक का समय दिया गया है। Court ने जरूरत पड़ने पर independent committee के जरिए land की स्थिति की जांच की संभावना भी रखी है।

    यह Transfer case का हिस्सा नहीं है, लेकिन BMC की broader administrative accountability पर चल रही judicial scrutiny को जरूर दिखाता है।

    अब असली कसौटी

    BMC के 225 recommendation letters हों, Engineers के लिए Randomisation System हो या PWD में tenure-extension का सवाल—मुद्दा किसी एक नेता, अधिकारी या कर्मचारी का नहीं है।

    मुद्दा यह है कि सरकारी पद पर Transfer-Posting का फैसला आखिर नियम करेगा या influence?

    BMC ने Randomisation के जरिए एक रास्ता जरूर चुना है। अब देखना यही है कि यह व्यवस्था सिर्फ Transfer order बनाने का नया software बनती है या वास्तव में ऐसी प्रक्रिया तैयार करती है जिसमें किसी की recommendation से ज्यादा महत्व नियम, tenure, vacancy और documented administrative decision का हो।

  • मुंबईकरों के ₹248 करोड़ का नया Flyover, कई बाइकर्स फिसलकर गिरे; अब BMC ने सड़क पर लगाए Speed Breaker

    मुंबईकरों के ₹248 करोड़ का नया Flyover, कई बाइकर्स फिसलकर गिरे; अब BMC ने सड़क पर लगाए Speed Breaker

    मुंबई के ₹248 करोड़ के Mrinaltai Gore Flyover पर बाइकर्स के फिसलने के बाद BMC ने rumble strips लगाए। 2021 की Vigilance रिपोर्ट भी सवाल उठा चुकी थी।

    मुंबई: गोरेगांव में करीब ₹248 करोड़ की लागत से बने Mrinaltai Gore Flyover Extension पर बाइकर्स के फिसलने की शिकायतों के बाद BMC ने अब कार्रवाई शुरू की है। Relief Road की तरफ जाने वाले हिस्से के sharp turns पर BMC ने रफ्तार कम करने वाले rumble strips लगाए हैं। 29 अगस्त को इसी फ्लाईओवर की दीवार से एक ट्रक टकरा गया था, जिसके बाद sound barrier का एक हिस्सा नीचे SV Road पर गिर गया था। गनीमत रही कि इस घटना में किसी के घायल होने की खबर नहीं है।

    नया फ्लाईओवर 6 जून 2026 को आम लोगों के लिए खोला गया था। इसके बाद से Relief Road की तरफ जाने वाले arm की सड़क को लेकर लगातार शिकायतें सामने आईं। खासकर बारिश या सड़क गीली होने पर दोपहिया वाहन फिसलने और बाइकर्स के गिरने के वीडियो सामने आए। यह हिस्सा नीचे उतरने के बाद एक turn पर आता है, जहां बाइक को सड़क की पर्याप्त grip मिलना ज्यादा जरूरी है।

    BMC ने पहले बताया था कि flyover की 40 mm मोटी mastic asphalt surface पर stone aggregates डाले गए हैं ताकि tyre को friction मिले और वाहन फिसलें नहीं। लेकिन मौजूदा शिकायतों के बाद अब चार ऐसे spots चिन्हित किए गए हैं जहां turn और slope है। BMC अधिकारी के मुताबिक दो जगह 15 mm thick rumblers लगाए जा चुके हैं और दो अन्य जगहों पर भी इन्हें लगाया जाना है। साथ ही cautionary और speed-limit boards लगाने तथा sound barriers की मरम्मत की बात कही गई है।

    यहां Speed Breaker शब्द आम लोगों के लिए समझने में आसान है, लेकिन तकनीकी तौर पर लगाए गए rumble strips सामान्य ऊंचे speed breaker जैसे नहीं हैं। इनका मकसद सड़क पर vibration और अतिरिक्त grip देकर वाहन चालकों को turn और slope पर सावधान करना तथा रफ्तार कम कराना है।

    सवाल सिर्फ फिसलन का नहीं, ₹248 करोड़ के पूरे प्रोजेक्ट का है

    सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस 750 मीटर लंबे, चार लेन वाले flyover पर करीब ₹248 करोड़ खर्च हुए, उसे शुरू हुए अभी तीन महीने भी पूरे नहीं हुए और उसके एक हिस्से पर दोपहिया वाहनों की safety को लेकर corrective treatment करना पड़ा। यह वही project है जिसकी construction timeline करीब आठ साल तक खिंची और जिसकी लागत भी बार बार बढ़ाई गई।

    BMC ने नवंबर 2018 में इसका work order जारी किया था और शुरुआती completion target 24 महीने का था। लेकिन project 2026 में जाकर पूरा हुआ। अंतिम लागत ₹247.97 करोड़ तक पहुंची, जबकि मिली जानकारी के मुताबिक शुरुआती estimate ₹170.82 करोड़ था—यानी करीब 45 फीसदी की बढ़ोतरी।

    काम के दौरान contractor पर penalties भी लगाई गईं। BMC के मुताबिक आठ साल में कुल करीब ₹27 लाख की penalty लागू की गई, जो ₹248 करोड़ के project cost का एक फीसदी भी नहीं है। इनमें construction delay और site safety से जुड़े मामलों की penalties शामिल थीं।

    लेकिन असली सवाल 2026 में नहीं, 2021 में उठ चुका था

    इस flyover की कहानी में सबसे गंभीर कड़ी BMC की अपनी Vigilance रिपोर्ट है। जून 2021 की internal vigilance inspection में construction quality, structural elements और monitoring से जुड़े कई सवाल उठाए गए थे—यानी flyover के public use में आने से करीब पांच साल पहले।

    रिपोर्ट में flyover के कई joints और piers में cracks तथा honeycombing मिलने की बात कही गई थी। पांच pillars में cracks और honeycombing का उल्लेख था। Honeycombing concrete में बनने वाली खाली जगहों को कहा जाता है, जो खराब compaction से जुड़ी हो सकती हैं और concrete की strength पर असर डाल सकती हैं।

    Vigilance team ने यह भी सवाल उठाया था कि flyover के piers के पास मौजूद road panels के उठने या damage होने की संभावना को design में पर्याप्त तरीके से address किया गया था या नहीं। अगर ऐसी स्थिति में सड़क unsafe होती है तो उसकी repair contractor की जिम्मेदारी होने की बात रिपोर्ट में दर्ज थी।

    रिपोर्ट में quality records को लेकर भी सवाल थे। Steel और ready-mix concrete यानी RMC से जुड़े जरूरी records उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई थी। इसके अलावा मई 2019 और नवंबर 2020 में concrete strength के tests fail होने के बावजूद कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठे थे।

    और यहां monitoring का सवाल भी सामने आता है। नियुक्त consulting engineer को महीने में कम से कम दो site inspections करनी थीं, लेकिन Vigilance रिपोर्ट में ऐसे visits के records उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई। Contractors और supervising municipal engineers पर effective quality control और monitoring सुनिश्चित नहीं करने को लेकर भी सवाल उठाए गए थे।

    सबसे चौंकाने वाली बात penalties को लेकर थी। फरवरी से मई 2019 के बीच चार अलग-अलग मामलों में contractor पर ₹500 की penalty लगाई गई, जबकि contract conditions में minimum penalty ₹5,000 बताई गई थी। रिपोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि cracks, honeycombing और rough concrete surfaces के लिए penalty क्यों नहीं लगाई गई।

    हालांकि, 1 जून 2021 की compliance report में Bridges Department ने बताया था कि contractor को penalty और warning letter दिया गया, corrective measures और rectification work किए गए तथा records update किए गए। Supervisory staff को भी ज्यादा सतर्क रहने के निर्देश दिए गए थे।

    यानी आज का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सड़क पर rumble strips क्यों लगाने पड़े। बड़ा सवाल यह भी है कि 2021 में Vigilance ने जो कमियां बताई थीं, उनके बाद rectification वास्तव में कितनी प्रभावी रही और बाद के वर्षों में किस स्तर पर उसकी जांच हुई।

    आठ साल का project, बढ़ी लागत और फिर safety correction

    Mrinaltai Gore Flyover Extension का मकसद Goregaon में east-west connectivity को बेहतर करना था। 750 मीटर का यह four-lane arm existing flyover network को Ram Mandir Road और Relief Road से जोड़ता है। लेकिन project को पूरा होने में शुरुआती 24 महीने के target के मुकाबले करीब आठ साल लग गए।

    मार्च 2026 में भी project करीब 80 फीसदी complete बताया गया था और cost escalation को लेकर BMC Standing Committee में सवाल उठ चुके थे। इसी दौरान corporators ने project delay और बढ़ती लागत पर भी आपत्ति जताई थी।

    फिर जून में flyover खुला तो शुरुआती दिनों में uneven surface, loose grit और patchy stretches को लेकर शिकायतें सामने आईं। BMC ने उस समय road condition को structural deficiency नहीं माना और mastic asphalt तथा stone chips को technical construction process का हिस्सा बताया था। Experts ने भी यह कहा था कि mastic asphalt और stone aggregates का इस्तेमाल friction देने के लिए किया जाता है, हालांकि curved हिस्सों पर पर्याप्त grip बेहद जरूरी है।

    अब सितंबर में situation यह है कि उसी नए flyover के कुछ turns और slopes पर BMC को rumble treatment करना पड़ रहा है। एक न्यूज एजेंसी से बात करते हुए transport planner Vivek Pai ने इस तरह की slick surface के संभावित कारणों में mastic surface के बहुत smooth होने और bitumen bleeding जैसे technical factors की चर्चा की है। इसे flyover की खराबी का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता, लेकिन surface grip का सवाल जरूर गंभीर बन गया है।

    BMC से अब जवाब किस बात का चाहिए?

    BMC का मौजूदा safety action जरूरी है और अगर rumble strips, warning boards और sound barrier repairs से दुर्घटनाओं का risk कम होता है तो यह स्वागत योग्य कदम है।

    लेकिन ₹248 करोड़ के इस project में accountability का सवाल इससे खत्म नहीं होता।

    अब यह साफ होना चाहिए कि 2021 की Vigilance रिपोर्ट में उठाए गए सवालों पर किस अधिकारी ने compliance verify किया, rectification की final inspection किसने की, consultant ने कितनी site inspections कीं, quality records किस स्तर पर verify हुए, concrete और road surface की final quality किसने certify की और public opening से पहले safety assessment किस आधार पर किया गया।

    BMC ने जुलाई 2026 में bridge, flyover और tunnel projects के लिए पांच साल के लिए 29 technical consultants का panel बनाने का प्रस्ताव भी रखा था। प्रस्ताव में consultant की design-related गलती से project cost या design variation बढ़ने पर penalty का प्रावधान रखने की बात कही गई थी।

    अब Mrinaltai Gore Flyover का मामला एक सीधा सवाल छोड़ता है—अगर ₹248 करोड़ खर्च करके बना नया flyover तीन महीने के भीतर ही ऐसे turns पर safety correction मांगने लगे जहां बाइकर्स फिसल रहे हैं, तो गलती सिर्फ सड़क पर rumble strips लगाने से खत्म मानी जाए या फिर पूरे project की planning, quality monitoring और accountability की भी दोबारा जांच होनी चाहिए?

    मुंबईकरों के टैक्स के पैसे से बने इस flyover पर अब असली जरूरत सिर्फ रफ्तार कम करने की नहीं, बल्कि यह पता लगाने की है कि शुरुआत से आखिर कहां-कहां निगरानी कमजोर पड़ी।

  • प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना पर बड़ा खुलासा: 41 FIR, 178 ट्रेनिंग सेंटर ब्लैकलिस्ट और 34 लाख भुगतान अटके, CAG रिपोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

    प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना पर बड़ा खुलासा: 41 FIR, 178 ट्रेनिंग सेंटर ब्लैकलिस्ट और 34 लाख भुगतान अटके, CAG रिपोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

    प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में 41 FIR, 178 ट्रेनिंग सेंटर ब्लैकलिस्ट और 34 लाख भुगतान अटके। CAG की रिपोर्ट में सामने आईं गंभीर अनियमितताएं।

    नई दिल्ली: प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना यानी युवाओं को skill training देकर job और self-employment के मौके देने वाली देश की बड़ी सरकारी schemes में से एक अब गंभीर सवालों के घेरे में है। CAG की audit findings से लेकर 2026 में दर्ज हुई 41 FIR, 178 Training Centres की blacklisting और NSDC के करीब 20 current और former employees को भेजे गए show-cause notices तक, इस पूरी scheme को लेकर लगातार कार्रवाई सामने आ रही है।

    सबसे बड़ा सवाल उन युवाओं का है जिन्होंने इस scheme के तहत training ली, certificate हासिल किया और payment या job का इंतजार किया। क्या training सही तरीके से हुई? क्या beneficiary का record सही था? Payment क्यों अटका? और certificate मिलने के बाद नौकरी कितनों को मिली?

    41 FIR और 178 Training Centres पर कार्रवाई

    2026 में सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना से जुड़े मामलों में 167 cases को FIR के लिए identify किया गया और 41 FIR दर्ज की गईं।

    वहीं प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना 4.0 के तहत 178 Training Centres को blacklist किया गया। इन centres के खिलाफ आगे की payments रोकने और नियमों के उल्लंघन से जुड़े payments की recovery शुरू करने के निर्देश दिए गए।

    हालांकि यहां यह समझना जरूरी है कि FIR दर्ज होना किसी मामले में आरोप या investigation की शुरुआत है, conviction नहीं। इसी तरह 178 blacklisted centres को सीधे 178 “fake centres” कहना भी सही नहीं होगा। Blacklisting scheme guidelines और inspection findings के आधार पर की गई कार्रवाई है।

    34 लाख से ज्यादा candidates का payment क्यों अटका?

    इस पूरी कहानी का सबसे सीधा असर उन candidates पर पड़ता है जिन्होंने training पूरी की लेकिन उनका payment नहीं पहुंचा।

    CAG के मुताबिक प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के दूसरे और तीसरे phase में 34 लाख candidates के DBT payments outstanding थे।

    पहले phase में भी करीब ₹40 करोड़ की DBT राशि incorrect या incomplete bank और Aadhaar details की वजह से beneficiaries तक नहीं पहुंच सकी थी।

    यानी अगर किसी candidate ने training और certification पूरा किया है, लेकिन उसके खाते में पैसा नहीं आया, तो सिर्फ “payment pending” देखकर मामला खत्म नहीं होता। Bank details, Aadhaar linking और beneficiary record में mismatch भी इसकी वजह हो सकता है।

    एक bank account से 2,106 candidates का record

    CAG audit में bank details की जांच के दौरान एक और बड़ी गड़बड़ी सामने आई।

    प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के दूसरे और तीसरे phase के data में 12,122 unique bank accounts ऐसे पाए गए जो एक से ज्यादा candidates के लिए इस्तेमाल हुए थे।

    इन accounts से कुल 52,381 candidates जुड़े हुए थे।

    सबसे चौंकाने वाला मामला एक ऐसे account का था जिसे 2,106 candidates के records में इस्तेमाल किया गया था।

    कुछ records में 11111111111, zeros, blank और दूसरे apparently invalid entries भी मिले।

    इसका मतलब यह नहीं कि इन सभी candidates को fake घोषित कर दिया गया। लेकिन beneficiary और payment data की verification system पर गंभीर सवाल जरूर खड़े हुए। CAG ने कहा कि उपलब्ध bank-account data से beneficiaries की identity को लेकर पर्याप्त assurance नहीं मिल रही थी।

    क्या training centre सच में चल रहा था?

    CAG की जांच में कुछ Training Centres physical inspection के दौरान बंद मिले।

    कुछ जगह training records और ground reality के बीच mismatch भी सामने आया। Candidate photographs के repeat होने और attendance तथा identity verification में gaps की findings भी सामने आईं।

    यानी सवाल यह भी है कि जिस candidate के नाम पर training और certification का record बना, क्या वह candidate वास्तव में उस training में मौजूद था?

    यहां भी हर irregular record को सीधे fake candidate मानना सही नहीं है। Audit findings मुख्य रूप से verification और monitoring system में मौजूद कमजोरियों की तरफ इशारा करती हैं।

    “Ghost Candidate” का मतलब क्या है?

    अगर किसी व्यक्ति का नाम scheme के record में मौजूद है, लेकिन उसकी identity, attendance, bank details या training participation properly verify नहीं हो पाती, तो मामला questionable या ghost beneficiary verification तक पहुंच सकता है।

    CAG ने candidate eligibility को लेकर भी सवाल उठाए।

    कुछ records में age, education और दूसरे eligibility criteria की proper checking नहीं होने की बात सामने आई।

    यानी scheme में सिर्फ यह देखना काफी नहीं था कि candidate का नाम system में दर्ज है। यह भी जरूरी था कि वह candidate scheme के लिए eligible था और उसकी identity सही तरीके से verify हुई थी।

    Certificate मिला, लेकिन नौकरी कितनों को मिली?

    प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का असली मकसद सिर्फ training और certificate देना नहीं था। इसका final outcome रोजगार और बेहतर income से जुड़ा था।

    लेकिन CAG की audit में पुराने phases के Short Term Training component में certified candidates की placement करीब 41 प्रतिशत के आसपास पाई गई।

    सरकार की बाद की reporting में PMKVY 3.0 तक reported placement करीब 43 प्रतिशत बताई गई।

    इसका सीधा मतलब है कि training या certificate और actual job एक ही चीज नहीं हैं।

    यही वजह है कि किसी भी candidate के लिए सबसे जरूरी सवाल यह होना चाहिए कि course पूरा करने के बाद उसे वास्तव में job या self-employment का फायदा मिला या नहीं।

    कुछ बड़े Training Providers में placement 10% से भी कम

    CAG की detailed जांच में training providers के performance में काफी बड़ा difference सामने आया।

    Top training providers में भी 114 providers ऐसे पाए गए जिनका placement rate 10 प्रतिशत से कम था।

    इन providers ने करीब 5.88 लाख candidates को certify किया, लेकिन लगभग 20,000 candidates ही placement तक पहुंच पाए।

    इससे साफ होता है कि सिर्फ overall placement percentage देखने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। अलग-अलग Training Providers का actual performance काफी अलग रहा।

    Training Providers को इतने बड़े targets कैसे मिले?

    CAG ने Training Providers को मिले targets और certifications को भी examine किया।

    PMKVY 2.0 में top 10 प्रतिशत Training Providers ने करीब 83 प्रतिशत batches और 85.61 प्रतिशत certifications संभालीं।

    PMKVY 3.0 में top 10 प्रतिशत providers ने करीब 82 प्रतिशत batches और 85.31 प्रतिशत certifications संभालीं।

    इसके मुकाबले bottom 50 प्रतिशत providers का share काफी कम था।

    इससे यह सवाल उठता है कि scheme के बड़े targets कुछ Training Providers के पास इतने concentrated क्यों हुए और उनके performance की monitoring कितनी प्रभावी थी।

    Certificate मिलने में सालों की देरी

    Training पूरी होने के बाद candidate के लिए अगला जरूरी step assessment और certification होता है।

    लेकिन CAG की जांच में selected states में कुछ cases में training पूरी होने के बाद assessment में 1,270 दिनों तक की देरी सामने आई।

    Assessment के बाद certification में भी 1,257 दिनों तक की delay दर्ज हुई।

    करीब 23.87 लाख candidates ऐसे थे जिनके certification में सात दिनों से ज्यादा की delay पाई गई।

    जिस युवा को certificate के आधार पर job या आगे की career opportunity तलाशनी हो, उसके लिए इतनी लंबी delay का सीधा असर पड़ सकता है।

    Inspection system पर भी सवाल

    CAG ने inspection records के timestamps को भी examine किया।

    295 cases में एक ही inspector द्वारा अलग-अलग locations पर inspection शुरू करने के बीच पांच मिनट से भी कम का gap पाया गया।

    Ministry ने इन discrepancies को technical issues से जोड़ते हुए बाद में photo-upload और monitoring controls मजबूत करने की जानकारी दी।

    इसलिए इसे सीधे fake inspection कहना सही नहीं होगा, लेकिन audit ने ऐसी discrepancy जरूर दर्ज की जिसे system level पर explain और correct करना जरूरी था।

    RPL में भी सामने आईं गड़बड़ियां

    प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का Recognition of Prior Learning यानी RPL component उन लोगों की existing skills को certify करने के लिए है जो पहले से किसी trade या काम में skilled हैं।

    CAG ने RPL-BICE component में भी कई irregularities दर्ज कीं।

    एक मामले में Radiate Designs ने करीब 15,218 candidates को certify किया था। CAG के मुताबिक company 2014-15 के बाद ROC returns file नहीं कर रही थी और ROC records में struck off थी। Audit team को दिए गए address पर एक shop मिली, जहां company का visible signboard नहीं था।

    CAG ने इस तरह के records के आधार पर certification process की verification पर सवाल उठाए।

    एक दूसरे fitness trainer से जुड़े case में 10,000 candidates की placement और 30,000 employees की capacity का दावा किया गया था, जबकि संबंधित gyms में Ministry के records के अनुसार employees की संख्या काफी कम थी।

    Jharkhand में 8,922 certifications में से 7,145 East Singhbhum में और Rajasthan में सभी 5,444 certifications Churu district में concentrated थीं।

    Audit ने employee-employer relationship की proper verification के बिना certifications किए जाने पर सवाल उठाए।

    PMKVY 4.0 में भी data से जुड़े सवाल

    यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा।

    CAG की मुख्य audit findings प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के पहले तीन phases से जुड़ी हैं। PMKVY 4.0 बाद में शुरू हुई और इसमें technology-based verification को मजबूत किया गया है।

    लेकिन CAG ने PMKVY 4.0 के उपलब्ध data की भी कुछ जांच की।

    इसमें:

    • 175 invalid mobile numbers
    • 2,263 repeated mobile numbers
    • करीब 2.72 लाख null email addresses
    • करीब 3.08 लाख repeated email addresses

    मिले।

    इन आंकड़ों का मतलब यह नहीं कि इतने candidates fake थे। लेकिन इससे यह जरूर पता चलता है कि digital system में भी data validation को लगातार मजबूत रखने की जरूरत है।

    अब सरकार ने क्या बदला?

    PMKVY 4.0 में beneficiary verification और monitoring के लिए कई technology-based controls बढ़ाए गए हैं।

    इनमें:

    • Aadhaar-based verification
    • Face Authentication
    • AEBAS attendance
    • e-KYC
    • duplicate candidate checks
    • digital monitoring
    • physical inspections
    • geo-tagged evidence
    • candidate feedback
    • third-party assessment

    जैसे measures शामिल हैं।

    PMKVY 4.0 में AI, drones, robotics, green energy, semiconductor manufacturing और दूसरे new-age sectors से जुड़े courses पर भी ज्यादा focus किया जा रहा है।

    जून 2026 तक सरकार के मुताबिक PMKVY 4.0 के तहत 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 738 जिलों में 28.17 लाख candidates train किए जा चुके थे। इसके implementation ecosystem में 16,900 से ज्यादा institutions और 6,800 से ज्यादा Skill Hubs शामिल थे।

    PMKVY 4.0 को लेकर सरकार के आंकड़े क्या कहते हैं?

    पुरानी phases की CAG findings के बावजूद PMKVY 4.0 के impact को लेकर सरकार ने positive results भी जारी किए हैं।

    29 जुलाई 2026 को सरकार ने independent impact evaluation का हवाला देते हुए बताया कि Short Term Training candidates में employed और self-employed लोगों का combined share training से पहले 26.6 प्रतिशत था, जो training के बाद 45.4 प्रतिशत हो गया।

    यानी 18.8 percentage points का increase दर्ज किया गया।

    सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 41.4 प्रतिशत STT candidates और 48.9 प्रतिशत RPL candidates ने training और certification के बाद income बढ़ने की बात भी बताई।

    इसलिए आज की स्थिति को सिर्फ पुरानी CAG findings से देखना पूरी तस्वीर नहीं देगा। पुराने phases में गंभीर implementation problems सामने आईं, जबकि PMKVY 4.0 को लेकर सरकार के पास employment और income outcomes में improvement का evaluation data भी है।

    Maharashtra और Mumbai के युवाओं के लिए क्या जरूरी है?

    महाराष्ट्र भी PMKVY की implementation और audit scrutiny में शामिल रहा है।

    अगर आपने Mumbai या Maharashtra में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत training ली है, तो अपने record को जरूर verify करें।

    क्या आपका Training Centre अभी भी active है?

    क्या आपकी attendance सही दर्ज है?

    क्या Aadhaar और bank details सही हैं?

    क्या DBT payment मिला है?

    क्या certificate में आपका सही job role है?

    क्या Training Centre ने placement का दावा किया था?

    और सबसे जरूरी—

    क्या आपको वास्तव में job या income का फायदा मिला?

    क्योंकि scheme की सफलता सिर्फ certificate से तय नहीं होती।

    अगर आपने PMKVY की training ली है तो ये 8 चीजें check करें

    1. Certificate: आपका certificate official record में मौजूद है या नहीं।

    2. Training Centre: जिस centre से आपने course किया, उसकी status क्या है।

    3. Attendance: आपकी training attendance सही दर्ज है या नहीं।

    4. Aadhaar/e-KYC: आपकी identity details सही हैं या नहीं।

    5. Bank Account: आपके नाम से सही bank details linked हैं या नहीं।

    6. DBT Payment: payment मिला, pending है या transaction fail हुआ।

    7. Placement: अगर placement का दावा किया गया था तो employer और job details verify करें।

    8. Complaint: अगर आपके नाम पर ऐसी training या certification दिखाई दे रही है जो आपने की ही नहीं, या payment/identity में गलती है, तो official grievance mechanism पर complaint करें।

    इस पूरे मामले में अब आगे क्या देखना होगा?

    अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने Training Centres blacklist हुए या कितनी FIR दर्ज हुईं।

    आगे यह देखना ज्यादा जरूरी होगा कि:

    41 FIR की investigation कहां तक पहुंचती है?

    178 blacklisted centres में recovery कितनी होती है?

    34 लाख pending payments में कितने candidates को पैसा मिलता है?

    NSDC के जिन करीब 20 current और former employees को notices दिए गए हैं, उनके खिलाफ आगे क्या action होता है?

    और सबसे बड़ा सवाल—

    क्या PMKVY 4.0 में technology-based safeguards पुराने loopholes को वास्तव में बंद कर पाते हैं?

    प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का असली test यही है कि government records में कितने candidates trained और certified दिखते हैं, इससे आगे जाकर कितने युवाओं को वास्तव में skill, payment, job और बेहतर income मिलती है।

    CAG की findings ने पुराने system की कई कमजोरियां सामने रख दी हैं। 2026 की FIR और blacklisting के जरिए कार्रवाई भी चल रही है। वहीं PMKVY 4.0 के नए evaluation में employment और income outcomes में improvement का दावा किया गया है।

    अब नजर इस बात पर है कि पुरानी गलतियों से सीखकर मौजूदा system कितना मजबूत हुआ है और scheme से जुड़े युवाओं को उसका वास्तविक फायदा कितना मिल रहा है।

  • Vimal Elaichi पर FDA का बड़ा एक्शन! शाहरुख, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को नोटिस, 15 दिन में देना होगा जवाब

    Vimal Elaichi पर FDA का बड़ा एक्शन! शाहरुख, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को नोटिस, 15 दिन में देना होगा जवाब

    महाराष्ट्र FDA ने Vimal Elaichi विज्ञापन को लेकर शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को नोटिस दिया है। 15 दिन में जवाब और प्रचार सामग्री हटाने को कहा।

    मुंबई/महाराष्ट्र: विमल इलायची के विज्ञापन को लेकर बॉलीवुड के तीन बड़े सितारे महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के निशाने पर आ गए हैं। FDA ने शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा है कि उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई क्यों न की जाए। मामला उस विज्ञापन से जुड़ा है, जिसे FDA ने प्रथम दृष्टया प्रतिबंधित पान मसाला के अप्रत्यक्ष या छद्म प्रचार से जुड़ा माना है।

    नोटिस की तारीख 11 अगस्त 2026 बताई गई है और यह करीब नौ पन्नों का है। अब तीनों अभिनेताओं को नोटिस मिलने के बाद तय समय के भीतर अपना पक्ष रखना होगा।

    FDA को Vimal Elaichi विज्ञापन पर आपत्ति क्यों है?

    सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब विज्ञापन में इलायची दिखाई जा रही है, तो FDA को आपत्ति किस बात पर है?

    FDA का कहना है कि विज्ञापन में विमल नाम और ब्रांड पहचान का इस्तेमाल इस तरह किया गया हो सकता है कि उससे महाराष्ट्र में प्रतिबंधित विमल पान मसाला का अप्रत्यक्ष प्रचार हो। यानी विवाद इलायची को प्रतिबंधित बताने का नहीं, बल्कि उसके विज्ञापन के जरिए किसी प्रतिबंधित उत्पाद की पहचान और प्रचार को बढ़ावा देने के आरोप का है।

    यही मामला छद्म विज्ञापन यानी किसी प्रतिबंधित उत्पाद का सीधे नाम लिए बिना उससे जुड़े ब्रांड या दूसरे उत्पाद के जरिए प्रचार करने के सवाल तक पहुंचता है।

    तीनों सितारों को क्या करना होगा?

    FDA ने सिर्फ जवाब मांगकर मामला खत्म नहीं किया है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक तीनों को संबंधित विज्ञापन अभियान में अपनी भूमिका के बारे में जानकारी देने के साथ-साथ प्रचार अभियान से जुड़े दस्तावेज भी उपलब्ध कराने को कहा गया है।

    नोटिस में उनसे विज्ञापन से जुड़ी प्रचार सामग्री हटाने और अपने आधिकारिक सोशल मीडिया खातों से संबंधित सामग्री हटाने को भी कहा गया है। साथ ही विज्ञापन और प्रचार अभियान से जुड़े समझौते, अभियान की जानकारी, भुगतान व्यवस्था तथा यह बताने वाले दस्तावेज मांगे गए हैं कि विज्ञापन स्वीकार करने से पहले उनकी ओर से किस तरह की जांच की गई थी।

    15 दिन में देना होगा जवाब

    तीनों अभिनेताओं को नोटिस मिलने के बाद 15 दिन के भीतर लिखित जवाब देना है।

    अगर तय समय में जवाब नहीं दिया गया या FDA को जवाब संतोषजनक नहीं लगा, तो आगे की कार्रवाई की जा सकती है। तीनों को व्यक्तिगत सुनवाई का विकल्प भी दिया गया है। वे खुद या अपने अधिकृत प्रतिनिधि के जरिए अपना पक्ष रख सकते हैं।

    इसका मतलब फिलहाल मामला नोटिस और जांच के चरण में है। अभी तीनों अभिनेताओं को दोषी ठहराने वाला कोई अंतिम आदेश सामने नहीं आया है।

    महाराष्ट्र में पान मसाला पर पहले से रोक

    इस कार्रवाई का समय भी महत्वपूर्ण है। महाराष्ट्र में प्रतिबंधित पान मसाला और उससे जुड़े तंबाकू उत्पादों को लेकर FDA पहले से अभियान चला रहा है।

    इसी पृष्ठभूमि में विमल इलायची के विज्ञापन पर कार्रवाई सामने आई है। FDA का सवाल है कि अगर राज्य में संबंधित पान मसाला प्रतिबंधित है, तो उसी से जुड़ी ब्रांड पहचान का इस्तेमाल दूसरे उत्पाद के विज्ञापन में करके क्या प्रतिबंध को अप्रत्यक्ष तरीके से दरकिनार किया जा रहा है।

    यह मामला सिर्फ इन तीन अभिनेताओं तक सीमित नहीं

    विमल ब्रांड के विज्ञापनों को लेकर विवाद नया नहीं है। इससे पहले भी इस तरह के विज्ञापनों में बॉलीवुड सितारों की भूमिका को लेकर सवाल उठ चुके हैं।

    अक्षय कुमार भी इसी ब्रांड से जुड़े विज्ञापन को लेकर विवाद में आए थे और बाद में उन्होंने सार्वजनिक रूप से माफी मांगते हुए उस विज्ञापन से पीछे हटने की बात कही थी।

    वहीं, पहले भी शाहरुख खान और अजय देवगन के ऐसे विज्ञापनों को लेकर सार्वजनिक बहस होती रही है। मौजूदा कार्रवाई ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि किसी सेलिब्रिटी की जिम्मेदारी सिर्फ विज्ञापन में दिखने तक सीमित है या उसे उस ब्रांड से जुड़े दूसरे उत्पादों और उसकी बाजार पहचान की भी जांच करनी चाहिए।

    क्या Vimal Elaichi खुद प्रतिबंधित है?

    नहीं, इस मामले को इस तरह समझना सही नहीं होगा।

    FDA की आपत्ति यह नहीं है कि इलायची अपने आप में प्रतिबंधित उत्पाद है। विवाद इस बात पर है कि क्या Vimal Elaichi के विज्ञापन का इस्तेमाल प्रतिबंधित पान मसाला के अप्रत्यक्ष प्रचार के लिए किया जा रहा है।

    यही कारण है कि मामले में विज्ञापन की प्रस्तुति, ब्रांड पहचान और उसके पीछे के प्रचार उद्देश्य महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इस आरोप को अभी अंतिम कानूनी निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

    अब आगे क्या होगा?

    अब इस मामले में सबसे ज्यादा नजर तीनों अभिनेताओं के जवाब पर रहेगी। उन्हें यह बताना होगा कि उन्होंने संबंधित विज्ञापन में किस भूमिका में काम किया, विज्ञापन को लेकर उनके और कंपनी के बीच क्या समझौता था और उन्होंने अभियान से पहले किस तरह की जांच की थी।

    इसके बाद FDA उनके जवाब और उपलब्ध दस्तावेजों की समीक्षा करेगा। अगर जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया तो आगे कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है।

    इस पूरे मामले में फिलहाल सबसे अहम बात यही है कि FDA ने विज्ञापन को प्रथम दृष्टया संदिग्ध मानते हुए तीनों सितारों से जवाब मांगा है, लेकिन अभी किसी को दोषी घोषित नहीं किया गया है।

    अब असली सवाल यह है—क्या शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ FDA को यह समझा पाएंगे कि उनका विज्ञापन सिर्फ इलायची का था, या फिर महाराष्ट्र FDA की जांच में इसे प्रतिबंधित पान मसाला के अप्रत्यक्ष प्रचार के तौर पर आगे की कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा?