मुंबई में प्याज 59% महंगा, लासलगांव में भाव ₹4,251 क्विंटल पार। जानिए ₹35 वाला प्याज कहां मिलेगा, कांदा एक्सप्रेस से मुंबई को कब राहत मिलेगी और आगे क्या होगा।
मुंबई: रसोई में प्याज एक बार फिर जेब पर भारी पड़ने लगा है। देश में प्याज का औसत खुदरा भाव एक साल में करीब 59 प्रतिशत बढ़कर ₹43.53 किलो पहुंच गया है। एक साल पहले यही भाव ₹27.37 किलो था। थोक भाव भी ₹21.23 से बढ़कर ₹35.58 किलो हो चुका है।
लेकिन मुंबई के ग्राहक के लिए असली सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि देश में प्याज कितना महंगा हुआ। बड़ा सवाल यह है कि जब देश में प्याज का कुल उत्पादन पिछले साल के लगभग बराबर रहने का अनुमान है, तब नासिक के लासलगांव में भाव ₹4,251 क्विंटल के पार कैसे पहुंच गया? और सरकार की ‘कांदा एक्सप्रेस’ से मुंबई को कब राहत मिलेगी?
लासलगांव में प्याज के भाव ने पकड़ी तेज रफ्तार
25 अगस्त को नासिक के लासलगांव थोक बाजार में प्याज का औसत भाव करीब ₹4,251 प्रति क्विंटल यानी लगभग ₹42.51 किलो पहुंच गया। अच्छी गुणवत्ता वाला प्याज करीब ₹50 किलो तक बताया गया है। इसी दौरान पिंपलगांव एपीएमसी में औसत भाव करीब ₹4,400 प्रति क्विंटल रहा।
सबसे ज्यादा चिंता वाली बात सिर्फ भाव नहीं, बल्कि मंडी में पहुंचने वाले प्याज की मात्रा है। लासलगांव में रोजाना की आवक पिछले कुछ हफ्तों में करीब 15,000 क्विंटल से घटकर लगभग 9,000 क्विंटल रह गई। 25 अगस्त को करीब 10,220 क्विंटल की आवक दर्ज हुई।
यानी बाजार में सालाना उत्पादन की बात अलग है, लेकिन इस समय मंडी में रोज कितना प्याज पहुंच रहा है, यह कीमत तय करने में ज्यादा अहम हो गया है।
पैदावार लगभग उतनी ही, फिर प्याज महंगा क्यों?
यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है।
केंद्र सरकार के दूसरे अग्रिम अनुमान के मुताबिक 2025-26 में प्याज का उत्पादन करीब 307.37 लाख टन रहने का अनुमान है। 2024-25 में यह 307.67 लाख टन था। यानी कुल सालाना उत्पादन में बहुत बड़ा अंतर नहीं है। सरकार ने जुलाई में भी कहा था कि देश में प्याज की उपलब्धता को लेकर तत्काल कोई बड़ी कमी नहीं है।
फिर कीमत इतनी तेजी से क्यों बढ़ी?
क्योंकि पूरे साल में पैदा होने वाला प्याज और किसी खास समय मंडी में उपलब्ध प्याज एक ही बात नहीं है।
इस समय लासलगांव में मुख्य रूप से मार्च-अप्रैल में निकाली गई गर्मी की फसल आ रही है। किसानों ने इस फसल को स्टोर करके रखा था। इसकी सामान्य भंडारण अवधि करीब पांच से छह महीने होती है। अब नई खरीफ फसल की बड़ी आवक अक्टूबर के मध्य से पहले शुरू होने की उम्मीद नहीं है।
यानी अगस्त से अक्टूबर के बीच बाजार को पुराने स्टॉक की आवक पर काफी निर्भर रहना पड़ रहा है। अगर किसान कम प्याज मंडी में लाता है और नई फसल की आवक देर से होती है, तो कुल सालाना उत्पादन पर्याप्त होने के बावजूद तत्काल उपलब्धता कम पड़ सकती है।
बारिश, खरीफ फसल और कम आवक ने बढ़ाया दबाव
लासलगांव एपीएमसी से जुड़ी जानकारी के मुताबिक बारिश और खेतों में खरीफ फसल से जुड़े काम के कारण कई किसान फिलहाल अपना स्टॉक मंडी में नहीं ला रहे हैं। जिन किसानों को तत्काल पैसों की जरूरत है, उनकी तरफ से ज्यादा आवक हो रही है।
अगस्त के मध्य में भी व्यापारियों ने दक्षिण भारत से आने वाली खरीफ प्याज की फसल में देरी को कीमत बढ़ने की एक वजह बताया था। देर से बुआई के कारण नई फसल की आवक आगे खिसकने की आशंका ने बाजार में तेजी को बढ़ाया।
इसलिए मौजूदा तेजी को सिर्फ ‘प्याज कम पैदा हुआ’ कहकर समझना सही नहीं होगा। इसमें मौसम, फसल चक्र, मंडी आवक, भंडारण, मांग और आपूर्ति की टाइमिंग सभी का असर है।
मुंबई में ग्राहक को कितना प्याज मिल रहा है?
यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा। देश का ₹43.53 किलो औसत खुदरा भाव मुंबई का भाव नहीं है।
मुंबई क्षेत्र के उपलब्ध मंडी आंकड़ों में अगस्त के दौरान प्याज के थोक भाव अलग-अलग श्रेणियों में करीब ₹28 से ₹38 किलो के बीच रहे, जबकि शहर की खुदरा जानकारी में मुंबई में प्याज करीब ₹52–58 किलो तक पहुंचने की बात सामने आई। अलग-अलग गुणवत्ता, तारीख और इलाके के कारण दुकानों पर भाव इससे अलग भी हो सकता है।
यानी लासलगांव से निकलने के बाद प्याज की कीमत मुंबई तक आते-आते सिर्फ खरीद भाव से तय नहीं होती। परिवहन, लोडिंग-अनलोडिंग, छंटाई, पैकिंग, खराबा, मंडी खर्च और खुदरा कारोबार की लागत भी जुड़ती है।
आरबीआई के एक अध्ययन में प्याज की मूल्य श्रृंखला का आकलन करते हुए पाया गया था कि उपभोक्ता द्वारा खर्च किए गए हर ₹1 में किसान की औसत हिस्सेदारी करीब 36 पैसे थी। यह पुराना औसत अध्ययन है और इसे आज के मुंबई भाव पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन इससे यह जरूर समझ आता है कि दुकान पर ग्राहक जो पूरा पैसा देता है, वह सीधे किसान तक नहीं पहुंचता।
सरकार ने ‘कांदा एक्सप्रेस’ क्यों शुरू की?
बढ़ती कीमतों के बीच केंद्र ने नासिक से बड़े उपभोग केंद्रों तक बफर स्टॉक का प्याज रेल के जरिए भेजना शुरू किया है। इसे ‘कांदा एक्सप्रेस’ नाम दिया गया है।
केंद्रीय उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे के मुताबिक शुरुआती तौर पर चेन्नई, मदुरै, दिल्ली, एर्नाकुलम और गुवाहाटी को प्याज भेजा जा रहा है। इन खेपों के 26 अगस्त तक संबंधित केंद्रों पर पहुंचने की उम्मीद है। बाजार की जरूरत के हिसाब से आगे दूसरे शहरों को भी जोड़ा जा सकता है।
यहां मुंबई के लोगों के लिए सबसे जरूरी बात सामने आती है।
मुंबई अभी शुरुआती पांच केंद्रों में नहीं
25 अगस्त तक उपलब्ध जानकारी के मुताबिक मुंबई को ‘कांदा एक्सप्रेस’ के शुरुआती पांच केंद्रों में शामिल नहीं किया गया है।
इसलिए अभी यह कहना सही नहीं होगा कि मुंबई में सरकारी ₹35 किलो वाला प्याज दुकानों पर मिलना शुरू हो गया है।
अगर मुंबई में कीमतों का दबाव बना रहता है तो आगे शहर को इस व्यवस्था में शामिल किया जा सकता है, लेकिन फिलहाल ऐसी घोषणा नहीं हुई है।
₹35 किलो वाला प्याज आखिर कहां मिलेगा?
सरकार चुनिंदा उपभोग केंद्रों में बफर स्टॉक का प्याज करीब ₹35 किलो की दर से उपलब्ध कराने की तैयारी कर रही है। इसकी बिक्री एनसीसीएफ और नेफेड के जरिए की जानी है।
लेकिन ₹35 किलो को पूरे देश का नया खुदरा भाव समझना गलत होगा।
यह सरकारी बफर स्टॉक से होने वाली नियंत्रित बिक्री है, जिसका मकसद उन बाजारों में अतिरिक्त प्याज पहुंचाना है जहां कीमतों पर ज्यादा दबाव है।
इसलिए मुंबई के ग्राहक के लिए फिलहाल सवाल यह नहीं है कि ‘₹35 का प्याज पूरे मुंबई में कब मिलेगा’, बल्कि यह है कि सरकार मुंबई को अपने अगले वितरण केंद्रों में कब शामिल करती है।
सरकार के पास कितना प्याज है?
केंद्र के मुताबिक इस साल करीब 1.21 लाख टन प्याज का बफर स्टॉक उपलब्ध है। सरकार का कहना है कि घरेलू जरूरत के लिए कुल उपलब्धता पर्याप्त है और जरूरत पड़ने पर बफर स्टॉक को चरणबद्ध तरीके से बाजार में उतारा जाएगा।
इसका मतलब यह नहीं है कि बाजार में प्याज की कोई समस्या ही नहीं है। सरकार के पास स्टॉक होना और हर शहर की मंडी में उसी समय पर्याप्त प्याज पहुंचना दो अलग बातें हैं।
इसी वजह से सरकार बफर स्टॉक को एक साथ पूरे बाजार में छोड़ने के बजाय कीमत और स्थानीय उपलब्धता के हिसाब से अलग-अलग केंद्रों तक भेजने की रणनीति अपना रही है।
‘कांदा एक्सप्रेस’ का पैमाना पहले से कितना बढ़ा?
यह व्यवस्था पहली बार इस साल शुरू नहीं हुई है।
2024-25 में करीब 14 रेल रेक के जरिए लगभग 12,000 टन बफर प्याज पांच शहरों तक भेजा गया था।
2025-26 में इसका पैमाना बढ़कर करीब 86 रेक और लगभग 88,000 टन प्याज तक पहुंच गया, जिसे 16 बड़े शहरों तक भेजा गया।
इसका मकसद साफ है—जहां प्याज का स्टॉक ज्यादा है वहां से उसे उन बड़े बाजारों तक जल्दी पहुंचाना जहां कीमत ज्यादा है।
फिर नासिक में दिल्ली से ज्यादा भाव क्यों?
यहीं सरकार की चिंता भी सामने आई है।
केंद्रीय उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे ने कहा है कि नासिक की मंडी में प्याज का भाव दिल्ली से ज्यादा होना सामान्य स्थिति नहीं है। उन्होंने ऐसे हालात में कार्टेलाइजेशन और सट्टेबाजी की भूमिका की आशंका भी जताई है।
हालांकि इसे व्यापारियों पर साबित आरोप के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यह सरकार की ओर से जताई गई आशंका है।
दूसरी तरफ मंडी से जुड़ी जानकारी में कम आवक और मजबूत मांग को कीमत बढ़ने की बड़ी वजह बताया गया है। इसलिए बाजार की मौजूदा तेजी में आपूर्ति की कमी, कम आवक और व्यापारिक गतिविधियों—तीनों पर नजर रखना जरूरी है।
सरकारी खरीद का आंकड़ा भी क्यों अहम है?
केंद्र ने 2026-27 के लिए नेफेड और एनसीसीएफ को कुल 2 लाख टन प्याज खरीदने का लक्ष्य दिया था। दोनों एजेंसियों के लिए एक-एक लाख टन का लक्ष्य रखा गया।
25 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों एजेंसियां मिलकर अब तक करीब 1.15 लाख टन गर्मी की फसल खरीद पाई हैं। इसमें नेफेड की खरीद करीब 56,000 टन और एनसीसीएफ की करीब 59,000 टन बताई गई।
जुलाई के अंत में केंद्र ने खरीद दर बढ़ाकर ₹2,335 प्रति क्विंटल यानी ₹23.35 किलो की थी। लेकिन किसान संगठनों ने इस दर को भी कम बताया। ग्रेड-ए प्याज और 45 से 65 मिलीमीटर आकार की गुणवत्ता शर्तों को लेकर भी किसानों ने आपत्ति जताई थी।
यानी सरकार के सामने एक साथ दो चुनौती हैं—बफर स्टॉक बनाना और किसानों से ऐसी कीमत पर खरीद करना जिससे उन्हें बाजार में राहत मिले।
किसान को महंगे प्याज का कितना फायदा?
यह मान लेना गलत होगा कि मुंबई में प्याज महंगा होने का मतलब किसान भी उसी अनुपात में कमा रहा है।
महाराष्ट्र के प्याज किसान लंबे समय से कम भाव और बढ़ती लागत की शिकायत करते रहे हैं। किसान संगठन के अध्यक्ष भारत दिघोले ने सरकार से कम से कम ₹3,000 प्रति क्विंटल खरीद भाव और पहले कम कीमत पर प्याज बेच चुके किसानों के लिए ₹1,500 प्रति क्विंटल सहायता की मांग की थी।
दिघोले के मुताबिक प्याज की उत्पादन लागत ₹2,000 प्रति क्विंटल से ऊपर पहुंच चुकी है और भंडारण के दौरान करीब 30 प्रतिशत तक नुकसान होने से किसान को बाजार में दिखने वाले ऊंचे भाव का पूरा फायदा नहीं मिलता।
यानी कुछ महीने पहले किसान कम भाव से परेशान था और अब कम मंडी आवक के कारण ग्राहक महंगा प्याज खरीद रहा है।
मई से अगस्त तक पूरी तस्वीर कैसे बदली?
मई-जून में प्याज के भाव गिरने के दौरान किसानों ने लागत के आसपास भी भाव नहीं मिलने की शिकायत की थी। उस समय महाराष्ट्र के किसान संगठनों ने करीब ₹30 किलो का न्यूनतम भाव मांगा था।
महाराष्ट्र सरकार ने भी केंद्र के सामने नेफेड और एनसीसीएफ की खरीद बढ़ाने, किसानों से सीधे खरीद करने और ग्रेडिंग में पारदर्शिता लाने जैसे मुद्दे रखे थे।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उस समय बताया था कि केंद्र ने मशीन आधारित ग्रेडिंग की दिशा में कदम उठाने और प्याज पर निर्यात प्रतिबंध या अतिरिक्त निर्यात शुल्क नहीं लगाने का भरोसा दिया था।
अब अगस्त में तस्वीर पलट गई है। मंडियों में आवक कमजोर हुई, नई खरीफ फसल अभी दूर है और उपभोक्ता बाजार में कीमत बढ़ गई।
यही प्याज बाजार की सबसे बड़ी समस्या है—भाव में तेज उतार-चढ़ाव।
आम परिवार की रसोई पर क्या असर?
प्याज रोजमर्रा के खाने का हिस्सा है, इसलिए इसकी कीमत बढ़ने का असर सीधे किराने के बजट पर पड़ता है। कम आय वाले परिवारों पर इसका असर ज्यादा हो सकता है, क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा खाने-पीने पर खर्च होता है।
जुलाई 2026 में देश की खुदरा महंगाई 4.45 प्रतिशत और खाद्य महंगाई 5.52 प्रतिशत थी। इसी महीने प्याज की सालाना महंगाई दर 22.54 प्रतिशत दर्ज हुई।
अगर प्याज की तेजी लंबे समय तक बनी रहती है तो घरों के अलावा होटल, ढाबे और छोटे खाद्य कारोबार पर भी लागत का दबाव बढ़ सकता है। खासकर उन चीजों में जहां प्याज का इस्तेमाल ज्यादा होता है।
आरबीआई के अध्ययन भी बताते हैं कि प्याज, टमाटर और आलू जैसी रोजमर्रा की सब्जियों की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव खाद्य महंगाई को अस्थिर कर सकता है और इसका असर कम आय वाले परिवारों पर ज्यादा पड़ सकता है।
प्याज के साथ चीनी भी महंगी
त्योहारी मौसम से पहले सिर्फ प्याज ही चिंता नहीं बढ़ा रहा है। चीनी के भाव में भी तेजी दर्ज हुई है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 20 जुलाई को चीनी का औसत भाव ₹48.18 किलो था, जो 20 अगस्त को बढ़कर ₹55.70 किलो हो गया।
केंद्र सरकार ने कहा है कि चीनी की मौजूदा तेजी को सिर्फ इथेनॉल के लिए चीनी डायवर्ट किए जाने से जोड़ना सही नहीं है। सरकार के मुताबिक इथेनॉल के लिए डायवर्ट होने वाली चीनी की हिस्सेदारी 2022-23 के करीब 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में करीब 9 प्रतिशत हुई है।
सरकार ने चीनी की तेजी के पीछे कम घरेलू उत्पादन, त्योहारों से पहले बढ़ी मांग, मौसम से गन्ने को नुकसान, वैश्विक आपूर्ति में कमी और कुछ क्षेत्रों में सट्टेबाजी व जमाखोरी जैसे कारणों का भी जिक्र किया है।
यानी आने वाले त्योहारों से पहले घर के बजट पर प्याज और चीनी दोनों का दबाव देखने को मिल रहा है।
अब प्याज सस्ता होगा या और महंगा?
इसका कोई पक्का जवाब अभी देना जल्दबाजी होगी। लेकिन आने वाले दिनों में तीन चीजें सबसे ज्यादा मायने रखेंगी।
पहली—लासलगांव और दूसरी बड़ी मंडियों में रोजाना प्याज की आवक कितनी बढ़ती है।
दूसरी—केंद्र बफर स्टॉक से कितनी मात्रा निकालकर किन शहरों में भेजता है।
तीसरी—नई खरीफ फसल अक्टूबर के मध्य के आसपास कितनी तेजी से बाजार में आती है।
अगर मंडी आवक बढ़ती है, नई फसल समय पर आती है और सरकारी स्टॉक ज्यादा कीमत वाले बाजारों तक पहुंचता है तो भाव पर दबाव कम हो सकता है।
लेकिन अगर पुरानी फसल की आवक कमजोर रहती है और खरीफ प्याज की एंट्री और आगे खिसकती है तो तेजी कुछ समय और बनी रह सकती है।
मुंबई वालों के लिए अभी सबसे जरूरी बात
फिलहाल मुंबई में ₹35 किलो वाला सरकारी प्याज मिलने की कोई घोषित व्यवस्था नहीं है। ‘कांदा एक्सप्रेस’ की शुरुआती सूची में मुंबई शामिल नहीं है। सरकार ने फिलहाल चेन्नई, मदुरै, दिल्ली, एर्नाकुलम और गुवाहाटी को शुरुआती केंद्र बनाया है और जरूरत के मुताबिक आगे दूसरे शहर जोड़ने की बात कही है।
इसलिए मुंबई में प्याज की कीमत नीचे आने का सबसे बड़ा संकेत सिर्फ ‘कांदा एक्सप्रेस’ नहीं होगा। असली नजर नासिक-लासलगांव की आवक, वाशी और मुंबई की मंडियों के भाव, नई खरीफ फसल की एंट्री और केंद्र की अगली आपूर्ति योजना पर रहेगी।
फिलहाल तस्वीर इतनी साफ है कि देश में प्याज की सालाना पैदावार में कोई बड़ी कमी नहीं बताई जा रही, लेकिन अगस्त के इस दौर में मंडियों में उपलब्ध माल की आवक घट गई है और नई खरीफ फसल अभी बाजार से दूर है। इसी बीच कीमत बढ़ी है।
सरकार बफर स्टॉक और ‘कांदा एक्सप्रेस’ के जरिए इस दबाव को कम करने की कोशिश कर रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकारी प्याज मुंबई तक कब पहुंचेगा और लासलगांव की घटती आवक कब दोबारा रफ्तार पकड़ेगी।
