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  • MMRDA का e-Punarvasan शुरू, Garib Nagar के 94 PAP परिवारों को मिले कब्जा पत्र

    MMRDA का e-Punarvasan शुरू, Garib Nagar के 94 PAP परिवारों को मिले कब्जा पत्र

    MMRDA ने e-Punarvasan शुरू कर PAP पुनर्वास को डिजिटल किया। Garib Nagar के 94 पात्र परिवारों को पहले दिन कब्जा पत्र मिले, जानिए पूरी प्रक्रिया।

    मुंबई: परियोजनाओं से प्रभावित लोगों के पुनर्वास की प्रक्रिया को डिजिटल बनाने के लिए मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण ने 1 अक्टूबर से मुंबई में ‘ई-पुनर्वसन’ प्रणाली शुरू कर दी है। नई व्यवस्था में परियोजना प्रभावित व्यक्ति यानी पीएपी के सर्वे से लेकर पात्रता जांच, मकान आवंटन, लॉटरी और कब्जा देने तक की प्रक्रिया को एक ही डिजिटल प्रणाली से जोड़ दिया गया है। इसके पहले दिन बांद्रा पूर्व के गरीब नगर के 94 पात्र प्रभावित परिवारों को कब्जा पत्र दिए गए।

    इस प्रणाली को एमएमआरडीए के महानगर आयुक्त डॉ. संजय मुखर्जी ने शुरू किया। इस दौरान अतिरिक्त महानगर आयुक्त-1 वेलरासु और संयुक्त महानगर आयुक्त पंकज देवरे भी मौजूद रहे।

    गरीब नगर के 100 पात्र परिवारों का पुनर्वास

    गरीब नगर का मामला इस नई व्यवस्था का पहला प्रमुख उदाहरण है। बांद्रा पूर्व में रेलवे परियोजना से प्रभावित 100 परिवारों को पुनर्वास के लिए पात्र माना गया था। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार इनमें 84 परिवारों के लिए कुर्ला की पुनर्वास इमारतों में आवास और 16 परिवारों के लिए एचडीआईएल कुर्ला की इमारत में आवास की व्यवस्था की गई थी।

    इन पुनर्वास आवासों का क्षेत्रफल करीब 279 वर्गफुट बताया गया है। 1 अक्टूबर को शुरू हुई डिजिटल प्रक्रिया के पहले दिन 94 पात्र प्रभावित परिवारों को कब्जा पत्र मिलने की जानकारी सामने आई है। कुल 100 पात्र परिवारों और पहले दिन 94 कब्जा पत्र मिलने के बीच का अंतर इस बात से जुड़ा है कि सभी पात्र मामलों की प्रक्रिया एक ही चरण में पूरी नहीं हुई।

    गरीब नगर का मामला अदालत तक पहुंचा था

    गरीब नगर में पुनर्वास का मामला कई महीनों से चल रहा था। जुलाई 2026 में बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष भी पात्र परिवारों को बिजली, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी कठिनाइयों का मुद्दा सामने आया था। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को पात्र परिवारों के लिए जरूरी सुविधाएं बहाल करने और पुनर्वास की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए थे।

    1 सितंबर 2026 के न्यायिक आदेश में एमएमआरडीए ने अदालत को बताया था कि 100 पात्र पीएपी परिवारों को वैकल्पिक आवास देने की प्रक्रिया चल रही है। इनमें 84 परिवारों में से 77 को आवंटन पत्र जारी हो चुके थे, लेकिन संबंधित इमारत को अधिभोग प्रमाणपत्र नहीं मिलने के कारण उन्हें तत्काल भौतिक कब्जा नहीं दिया जा सका था। अग्निशमन विभाग की अनापत्ति भी लंबित बताई गई थी। एमएमआरडीए ने 30 सितंबर तक अधिभोग प्रमाणपत्र हासिल करने के प्रयास की जानकारी अदालत को दी थी। मामले की अगली सुनवाई 6 अक्टूबर 2026 के लिए निर्धारित है।

    सर्वे से लेकर कब्जे तक पूरी प्रक्रिया डिजिटल

    ई-पुनर्वसन में सबसे पहले मोबाइल आधारित ई-सर्वे के जरिए प्रभावित परिवारों की जानकारी दर्ज की जाएगी। इसके बाद आधार आधारित ऑफलाइन सत्यापन, पुराने बिजली बिलों की ऑनलाइन जांच, संयुक्त सत्यापन और पात्रता से जुड़े अनुबंध-2 की प्रक्रिया डिजिटल प्रणाली में शामिल होगी।

    पात्रता तय होने के बाद उपलब्ध पुनर्वास आवासों में से मकान का चयन कंप्यूटरीकृत ई-लॉटरी के जरिए किया जाएगा। एमएमआरडीए के अनुसार उपलब्ध आवासों में से चयन लॉटरी के माध्यम से होगा और चयन के दौरान मानवीय हस्तक्षेप नहीं रहेगा।

    इसके बाद आवंटन पत्र और कब्जा पत्र डिजिटल रूप से तैयार किए जाएंगे। लाभार्थी की पहचान की पुष्टि के लिए अंगूठे का निशान और जीवित तस्वीर भी दर्ज की जाएगी। संबंधित दस्तावेजों को क्यूआर कोड के माध्यम से जोड़ा जा सकेगा।

    आधार सत्यापन की भी होगी डिजिटल व्यवस्था

    ई-पुनर्वसन में आधार आधारित ऑफलाइन सत्यापन मांगने वाली संस्था यानी ओवीएसई व्यवस्था को भी शामिल किया गया है। एमएमआरडीए के अनुसार वह इस व्यवस्था का इस्तेमाल करने वाला देश का पहला संगठन है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य लाभार्थी द्वारा उपलब्ध कराई गई आधार संबंधी जानकारी को ऑफलाइन तरीके से सत्यापित कर उसे संबंधित पुनर्वास मामले से जोड़ना है।

    पुराने बिजली बिलों की भी ऑनलाइन जांच की जाएगी। इससे प्रभावित व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत पुराने निवास संबंधी दस्तावेजों की जांच बिजली सेवा प्रदाताओं के रिकॉर्ड से की जा सकेगी।

    पुनर्वास आवासों का भी बनेगा डिजिटल रिकॉर्ड

    ई-पुनर्वसन सिर्फ लाभार्थियों का रिकॉर्ड डिजिटल नहीं करेगा। पुनर्वास इमारतों और प्रत्येक आवास का भी डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा। इसमें उपलब्ध, आवंटित और कब्जा दिए जा चुके आवासों की स्थिति दर्ज होगी।

    प्राधिकरण के अधिकारी डैशबोर्ड और प्रबंधन सूचना प्रणाली के माध्यम से प्रत्येक मामले की स्थिति, आवंटन और पुनर्वास की प्रगति देख सकेंगे। कब्जा मिलने के बाद की पुनर्वास संबंधी कार्रवाई का रिकॉर्ड भी डिजिटल रूप से रखा जाएगा।

    दो साल पहले शुरू हो चुकी थी डिजिटल व्यवस्था की तैयारी

    ई-पुनर्वसन को पूरी तरह अचानक शुरू की गई व्यवस्था नहीं माना जा सकता। एमएमआरडीए की आधिकारिक जानकारी के अनुसार सामाजिक विकास प्रकोष्ठ के पुनर्वास कार्य को कंप्यूटरीकृत करने और पीएपी आवंटन के लिए ई-लॉटरी प्रणाली तैयार करने का ठेका 15 अक्टूबर 2024 को दिया गया था।

    इस परियोजना की लागत 1.10 करोड़ रुपये, जीएसटी को छोड़कर, निर्धारित की गई थी। इसका ठेका निओसॉफ्ट टेक प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया था। परियोजना के लिए तीन महीने का क्रियान्वयन और सेवा शुरू होने के बाद दो वर्ष का सहयोग निर्धारित था। इस प्रणाली में आधारभूत सामाजिक-आर्थिक सर्वे, पात्रता तय करना, लॉटरी, आवंटन पत्र और कब्जा पत्र जारी करने जैसी प्रक्रियाएं शामिल की गई थीं।

    हजारों प्रभावित परिवारों तक पहुंच सकता है असर

    एमएमआरडीए के पुनर्वास कार्य का दायरा गरीब नगर के 100 परिवारों तक सीमित नहीं है। प्राधिकरण के आधिकारिक आंकड़ों में विभिन्न परियोजनाओं से जुड़े 42,228 आवासीय और 4,458 गैर-आवासीय परियोजना प्रभावित व्यक्तियों का उल्लेख है। इसके अलावा अन्य संस्थाओं की परियोजनाओं से जुड़े प्रभावित लोगों के लिए भी एमएमआरडीए द्वारा पुनर्वास आवास उपलब्ध कराए जाते हैं।

    एमएमआरडीए के पास पहले से बड़ी संख्या में पुनर्वास आवासों का नेटवर्क भी है। ऐसे में उपलब्ध, आवंटित और कब्जा दिए गए आवासों की डिजिटल सूची तैयार होने से भविष्य में किसी पीएपी मामले की स्थिति पता करना अधिकारियों के लिए आसान हो सकता है।

    ई-लॉटरी से आवंटन में क्या बदलेगा

    नई व्यवस्था में आवास का चयन कंप्यूटरीकृत लॉटरी के जरिए किए जाने का दावा है। इसका उद्देश्य उपलब्ध आवासों में से चयन की प्रक्रिया को दर्ज करने योग्य बनाना और व्यक्तिगत स्तर पर मकान चुनने की गुंजाइश कम करना है।

    हालांकि पुनर्वास की पूरी प्रक्रिया केवल लॉटरी पर निर्भर नहीं है। सर्वे, दस्तावेजों की जांच, संयुक्त सत्यापन और पात्रता तय करना जैसे चरण लॉटरी से पहले होते हैं। इसलिए डिजिटल लॉटरी को पूरी पुनर्वास प्रक्रिया से मानवीय निर्णय खत्म होने के रूप में नहीं देखा जा सकता।

    लाभार्थियों के लिए क्या बदलेगा

    ई-पुनर्वसन के बाद किसी पीएपी मामले में सर्वे से लेकर पात्रता, आवंटन और कब्जे तक की स्थिति एकीकृत रिकॉर्ड में दर्ज की जा सकेगी। एमएमआरडीए का कहना है कि इससे अलग-अलग कागजी और एक्सेल रिकॉर्ड पर निर्भरता घटेगी तथा पुनर्वास मामलों की निगरानी आसान होगी।

    प्राधिकरण के अनुसार इस व्यवस्था का एक उद्देश्य प्रभावित लोगों को बिचौलियों पर निर्भरता से बचाना और उनके पुनर्वास मामले की स्थिति को अधिक स्पष्ट बनाना भी है।

    अब आगे क्या

    गरीब नगर में 1 अक्टूबर को ई-पुनर्वसन के जरिए कब्जा पत्र जारी होना इस नई डिजिटल व्यवस्था का पहला बड़ा व्यावहारिक इस्तेमाल है। अब इसकी वास्तविक परीक्षा उन मामलों में होगी जहां बड़ी संख्या में प्रभावित परिवारों की पात्रता, दस्तावेज, आवास उपलब्धता और आवंटन एक साथ संभालना होगा।

    गरीब नगर मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की अगली सुनवाई 6 अक्टूबर को निर्धारित है। इस बीच ई-पुनर्वसन के तहत पुनर्वास प्रक्रिया आगे बढ़ने से यह भी स्पष्ट होगा कि डिजिटल सर्वे, सत्यापन, आवंटन और कब्जे की एकीकृत व्यवस्था लंबे समय से लंबित पीएपी मामलों को कितनी तेजी से आगे बढ़ा पाती है।

  • CJP का 2 अक्टूबर मुंबई प्रदर्शन: ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के अलावा क्या हैं मांगें?

    CJP का 2 अक्टूबर मुंबई प्रदर्शन: ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के अलावा क्या हैं मांगें?

    CJP के 2 अक्टूबर मुंबई प्रदर्शन से पहले जानिए ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, SIR, 2025 की मतदाता सूची और चुनाव आयोग सुधार से जुड़ी पूरी मांगें।

    मुंबई: 2 अक्टूबर को मुंबई में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के साथ चुनाव आयोग और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर कई अन्य मांगें भी सामने आई हैं। अभिजीत दिपके के नेतृत्व में होने वाला यह प्रदर्शन शिवाजी पार्क के गेट नंबर 6 पर शाम 4 बजे शुरू करने की घोषणा की गई है। मुंबई पुलिस से अनुमति नहीं मिलने के बावजूद CJP ने आंदोलन जारी रखने और जरूरत पड़ने पर जेल भरो आंदोलन करने की बात कही है।

    इस आंदोलन का केंद्र सिर्फ ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा नहीं है। CJP ने एसआईआर को रोकने, जनवरी 2025 की मतदाता सूची बहाल करने, चुनाव आयोग से जुड़े 2023 के कानून को बदलने और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए स्वतंत्र व पारदर्शी व्यवस्था बनाने जैसी मांगें भी रखी हैं।

    ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के साथ आपराधिक जांच की मांग

    CJP की पहली प्रमुख मांग मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की है। इसके साथ संगठन ने उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े कथित फैसलों के संबंध में यह स्पष्ट करने की मांग की है कि आदेश किस स्तर से दिए गए थे।

    CJP ने चुनाव आयोग की मतदाता सूची से जुड़ी केंद्रीकृत प्रक्रिया और एसआईआर के दौरान लिए गए फैसलों पर स्वतंत्र जांच की मांग भी उठाई है। संगठन का कहना है कि एसआईआर से जुड़े फैसलों की जांच ऐसी स्वतंत्र संस्था से होनी चाहिए जिस पर लोगों का भरोसा हो।

    एसआईआर रोकने और जनवरी 2025 की मतदाता सूची बहाल करने की मांग

    CJP की दूसरी बड़ी मांग विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को तत्काल रोकने की है। संगठन जनवरी 2025 की मतदाता सूची को फिर से आधार बनाने और आगामी चुनावों को फिलहाल रोकने की मांग कर रहा है।

    इसके अलावा एसआईआर से जुड़े फैसलों और कार्रवाई की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। CJP ने एसआईआर से संबंधित फाइलों और रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने तथा इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका की भी मांग उठाई है।

    महाराष्ट्र में एसआईआर को लेकर क्या स्थिति है?

    महाराष्ट्र में एसआईआर के कारण यह विवाद आम मतदाताओं के लिए भी महत्वपूर्ण हो गया है। 31 अगस्त को जारी प्रारूप मतदाता सूची में करीब 7.72 करोड़ नाम शामिल हुए थे, जबकि एसआईआर से पहले महाराष्ट्र में करीब 9.79 करोड़ मतदाता थे। लगभग 2.07 करोड़ मतदाताओं के गणना प्रपत्र उस चरण में उपलब्ध नहीं हो सके थे।

    हालांकि 2.07 करोड़ का आंकड़ा अंतिम रूप से मतदाता सूची से हटाए गए लोगों की संख्या नहीं है। इन मतदाताओं के लिए दावा और आपत्ति की प्रक्रिया उपलब्ध है। इसके अलावा करीब 1.22 करोड़ मतदाताओं के रिकॉर्ड में विसंगतियां चिन्हित की गई हैं, जिनमें पिछले रिकॉर्ड से जानकारी का मेल नहीं होना या संबंधित व्यक्ति से रिकॉर्ड का मिलान नहीं हो पाना शामिल है।

    महाराष्ट्र में दावा और आपत्ति की तारीख बढ़ी

    एसआईआर को लेकर महाराष्ट्र के मतदाताओं के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि दावा और आपत्ति दाखिल करने की अंतिम तारीख 30 सितंबर से बढ़ाकर 12 अक्टूबर 2026 कर दी गई है। नोटिस, दावे और आपत्तियों के निपटारे की प्रक्रिया 10 नवंबर तक चलेगी और अंतिम मतदाता सूची 16 नवंबर 2026 को प्रकाशित की जानी है।

    नोटिस पाने वाले मतदाताओं के लिए भी प्रक्रिया में बदलाव किया गया है। ‘अनमैप्ड’ या ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ जैसे कारणों से नोटिस पाने वाले मतदाताओं से दस्तावेज लेने के लिए बूथ लेवल अधिकारी घर जा सकते हैं। ऐसे मामलों में मतदाता को केवल दस्तावेज जमा करने के लिए अनिवार्य रूप से चुनाव कार्यालय पहुंचने की जरूरत नहीं होगी।

    2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून में बदलाव की मांग

    CJP की तीसरी प्रमुख मांग चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को खत्म करने की है। संगठन इसके स्थान पर ऐसी नई व्यवस्था चाहता है जिसमें चुनाव आयोग में नियुक्तियों की प्रक्रिया अधिक स्वतंत्र और पारदर्शी हो तथा नागरिक समाज की भागीदारी हो।

    मौजूदा कानून का आधिकारिक नाम ‘Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023’ है। CJP इसी नियुक्ति व्यवस्था में बदलाव को चुनाव आयोग के व्यापक सुधार से जोड़ रही है।

    ईसीआई के भीतर मतभेदों की खबर के बाद विवाद क्यों बढ़ा?

    चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर विवाद उस समय और बढ़ा जब आयोग के भीतर एसआईआर और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर मतभेदों की जानकारी सामने आई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्तियां दर्ज की थीं।

    दूसरी ओर चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेद को संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बताया है और कहा है कि एसआईआर सहित आयोग के फैसले तीनों आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए। इसलिए इन आपत्तियों को आयोग के कामकाज में किसी अंतिम रूप से सिद्ध टूट के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता।

    एसआईआर विवाद के बीच चुनाव आयोग ने भी किए बदलाव

    विवाद के बीच चुनाव आयोग ने मतदाता सूची से जुड़े सॉफ्टवेयर की समीक्षा के लिए एक समिति बनाने की घोषणा की है। इसमें एक वरिष्ठ चुनाव अधिकारी के साथ स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञ को शामिल किया जाना है।

    आयोग ने यह भी कहा है कि जिन मतदाताओं के रिकॉर्ड में विसंगतियां मिलती हैं, उनके दस्तावेज लेने के लिए स्थानीय अधिकारी जरूरत पड़ने पर उनके घर जा सकते हैं। इसका उद्देश्य ऐसे मतदाताओं पर कार्यालयों में व्यक्तिगत रूप से पहुंचने का बोझ कम करना है।

    फॉर्म 6 में एसआईआर से जुड़ी घोषणा भी बदली

    30 सितंबर को एसआईआर से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया। जिन राज्यों में एसआईआर पूरा हो चुका है, वहां ईसीआई के ईसीआईनेट पोर्टल पर ऑनलाइन फॉर्म 6 में जोड़ी गई अतिरिक्त एसआईआर घोषणा हटा दी गई। जिन राज्यों में एसआईआर अभी जारी है, वहां यह घोषणा दिखाई दे रही थी।

    यह बदलाव उस समय सामने आया जब फॉर्म 6 में अतिरिक्त घोषणा जोड़ने की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग के भीतर भी सवाल उठे थे।

    मुंबई में प्रदर्शन को पुलिस की अनुमति नहीं

    2 अक्टूबर के प्रदर्शन के लिए CJP ने शिवाजी पार्क को स्थान चुना है, लेकिन मुंबई पुलिस ने अनुमति नहीं दी है। पुलिस की ओर से शिवाजी पार्क में सभा से जुड़े नियमों, 2013 के बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश, यातायात, शोर और आसपास के अस्पतालों तक आपातकालीन आवाजाही जैसे मुद्दों का हवाला दिया गया है।

    इसके बावजूद CJP ने प्रदर्शन जारी रखने का फैसला किया है। संगठन ने पहले ही कहा है कि अनुमति नहीं मिलने की स्थिति में मुंबई में जेल भरो आंदोलन किया जाएगा।

    CJP ने प्रदर्शन का स्थान भी स्पष्ट किया

    2 अक्टूबर को मुंबई के अलावा अलग-अलग शहरों में प्रदर्शन की खबरों के बीच CJP के सह-संयोजक आशुतोष रांका ने स्पष्ट किया कि 2 अक्टूबर का निर्धारित प्रदर्शन केवल मुंबई के शिवाजी पार्क में होगा। दूसरे शहरों में आंदोलन की जानकारी बाद में घोषित करने की बात कही गई है।

    CJP के आंदोलन में अभिजीत दिपके के साथ सौरव दास और आशुतोष रांका भी प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। CJP के राष्ट्रीय संगठन में दिपके राष्ट्रीय संयोजक, जबकि दास और रांका सह-संयोजक की भूमिका में हैं।

    2 अक्टूबर के बाद क्या होगा?

    CJP ने 2 अक्टूबर के मुंबई प्रदर्शन को व्यापक आंदोलन की शुरुआत बताया है। संगठन ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पूरी होने तक आंदोलन जारी रखने की बात कही है और आगे गोवा, बेंगलुरु और कोलकाता समेत दूसरे शहरों में प्रदर्शन की योजना बताई है।

    मुंबई में 4 अक्टूबर को राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में एसआईआर और चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों पर अलग मार्च की भी घोषणा हो चुकी है। इस तरह 2 अक्टूबर का CJP प्रदर्शन और 4 अक्टूबर का ठाकरे गुटों का मार्च अलग-अलग कार्यक्रम हैं, हालांकि दोनों में एसआईआर और चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दे साझा हैं।

    महाराष्ट्र के मतदाताओं के लिए फिलहाल सबसे अहम तारीख 12 अक्टूबर है, जब तक एसआईआर की प्रारूप मतदाता सूची पर दावे और आपत्तियां दाखिल की जा सकती हैं। इसके बाद 10 नवंबर तक दावों और नोटिसों के निपटारे की प्रक्रिया चलेगी और 16 नवंबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जानी है।

    इस बीच CJP का 2 अक्टूबर का प्रदर्शन ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के साथ-साथ एसआईआर, मतदाता सूची और चुनाव आयोग की नियुक्ति व्यवस्था में बदलाव की मांग को लेकर होने वाला है। आंदोलन के अगले चरण और महाराष्ट्र की अंतिम मतदाता सूची पर होने वाली कार्रवाई से इस विवाद की आगे की दिशा स्पष्ट होगी।

  • फ्लाईदुबई विमान में हमले के बाद कैप्टन स्मित मच्छर दुबई एयरलिफ्ट, मुंबई में परिवार की सलामती की दुआ

    फ्लाईदुबई विमान में हमले के बाद कैप्टन स्मित मच्छर दुबई एयरलिफ्ट, मुंबई में परिवार की सलामती की दुआ

    फ्लाईदुबई की उड़ान में हमले के बाद घायल कैप्टन स्मित मच्छर की ताबुक में सर्जरी हुई और अब उन्हें आगे के इलाज के लिए दुबई लाया गया है।

    मुंबई: घाटकोपर से ताल्लुक रखने वाले फ्लाईदुबई के कैप्टन स्मित मच्छर को उड़ान के दौरान सह-पायलट के हमले में गंभीर चोट लगने के बाद ताबुक में आपात शल्य-चिकित्सा कराई गई। अब उन्हें आगे के इलाज के लिए दुबई ले जाया गया है। भारतीय अधिकारियों के अनुसार उनकी हालत स्थिर बताई गई थी। परिवार भी दुबई पहुंच चुका है और भारतीय राजनयिक अधिकारी लगातार उनके संपर्क में हैं।

    यह घटना 30 सितंबर को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान एफजेड1073 में हुई। विमान में 174 यात्री सवार थे। उड़ान के दौरान सह-पायलट ने कैप्टन स्मित पर चाकू से हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद स्मित ने विमान को बचाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    कैसे बची सैकड़ों यात्रियों की जान

    हमले के बाद विमान में अचानक गंभीर आपात स्थिति पैदा हो गई। विमान तेजी से लगभग 14 हजार फुट नीचे आया। इसी दौरान आपातकालीन संकेत जारी किए गए और विमान का मार्ग बदलकर सऊदी अरब के ताबुक हवाई अड्डे की ओर किया गया।

    हमले में घायल कैप्टन स्मित ने किसी तरह कॉकपिट का दरवाजा खोलने में सफलता हासिल की। इसके बाद विमान में मौजूद यात्रियों और चालक दल के सदस्यों ने कॉकपिट में प्रवेश कर हमलावर सह-पायलट को काबू किया।

    विमान में मौजूद कुछ अन्य पायलटों ने भी स्थिति संभालने में मदद की। इसके बाद विमान को सुरक्षित रूप से ताबुक हवाई अड्डे पर उतारा गया। इस घटनाक्रम में कैप्टन स्मित की भूमिका को यात्रियों की जान बचाने में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    कैप्टन स्मित को पहले ताबुक में इलाज मिला

    विमान की सुरक्षित लैंडिंग के बाद गंभीर रूप से घायल कैप्टन स्मित को ताबुक के अस्पताल ले जाया गया। वहां उनकी आपात शल्य-चिकित्सा की गई। इसके बाद उनकी बेहतर चिकित्सा के लिए उन्हें दुबई ले जाया गया है।

    भारतीय दूतावास और सऊदी अरब में भारतीय अधिकारियों ने उनके परिवार के साथ संपर्क बनाए रखा। भारतीय राजदूत दीपक मित्तल और महावाणिज्यदूत विष्णु वर्धन रेड्डी ने भी परिवार से मुलाकात की।

    मुंबई में परिवार और पड़ोसियों की नजर अस्पताल पर

    कैप्टन स्मित का परिवार मुंबई के घाटकोपर में रहता है। उनके परिवार के लोग और पुराने परिचित इस घटना के बाद लगातार उनकी सेहत की जानकारी ले रहे हैं।

    उनके पड़ोसियों डॉ. जिनित शाह, अशोक मकवाना और लक्ष्मीकांत जोशी ने स्मित को शांत और जिम्मेदार व्यक्ति के रूप में याद किया। उनके बचपन के मित्र प्रतीक गांधी भी परिवार के संपर्क में रहे। अक्षय दोशी समेत परिचितों ने परिवार को हवाई अड्डे तक पहुंचाने में मदद की।

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    घाटकोपर स्थित उनके घर के बाहर भी स्थानीय लोगों ने उनके लिए प्रार्थना की। कई लोगों ने भारतीय तिरंगे और उनकी तस्वीरों के साथ उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना की।

    कौन हैं कैप्टन स्मित मच्छर

    स्मित मच्छर का संबंध मुंबई के घाटकोपर से है। उन्होंने न्यूजीलैंड में विमान उड़ाने का प्रशिक्षण लिया था। इसके बाद उन्होंने स्पाइसजेट में करीब एक दशक तक काम किया। वर्ष 2022 में वह फ्लाईदुबई से जुड़े।

    वह बोइंग 737 विमान उड़ाते हैं और उनके पास हजारों घंटे का उड़ान अनुभव है। अलग-अलग उपलब्ध जानकारियों में उनके उड़ान अनुभव को करीब 9,750 घंटे से लेकर लगभग 10 हजार घंटे तक बताया गया है।

    परिवार के मुताबिक, कम उम्र में एक विमानन संबंधी कार्यक्रम में शामिल होने के बाद स्मित ने विमान चालक बनने का फैसला किया था। शुरुआत में उनके परिवार को इस पेशे को लेकर चिंता थी, लेकिन उन्होंने विमानन क्षेत्र में अपना करियर बनाया।

    प्रधानमंत्री मोदी ने बताया ‘हीरो’

    कैप्टन स्मित की बहादुरी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने स्मित को ‘हीरो’ बताते हुए कहा कि गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उनके साहस और दृढ़ संकल्प ने सैकड़ों लोगों की जान बचाने और बड़ी त्रासदी को टालने में मदद की।

    गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने भी स्मित के लिए ‘विशिष्ट गुजरात गरिमा पुरस्कार’ देने और 25 लाख रुपये की सम्मान राशि की घोषणा की है।

    सिर्फ कैप्टन स्मित ही नहीं, यात्रियों ने भी संभाला मोर्चा

    इस घटना में कैप्टन स्मित के साथ विमान में मौजूद कई यात्रियों ने भी अहम भूमिका निभाई। कॉकपिट में पहुंचकर हमलावर को काबू करने वाले कुछ यात्रियों को इजरायल में नागरिक वीरता सम्मान के लिए नामित किए जाने की बात सामने आई है।

    यानी विमान को सुरक्षित उतारने की पूरी प्रक्रिया में केवल चालक दल ही नहीं, बल्कि यात्रियों और अन्य प्रशिक्षित पायलटों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही।

    जांच में अभी कई सवालों के जवाब बाकी

    संयुक्त अरब अमीरात के नागरिक उड्डयन प्राधिकरण ने इस घटना को सुरक्षा संबंधी घटना बताया है। उसके अनुसार कुछ चालक दल के सदस्य घायल हुए और उन्हें सऊदी अरब के अस्पताल ले जाया गया।

    संयुक्त अरब अमीरात के लोक अभियोजन ने घटना की जांच के लिए विशेष टीम गठित की है। जांच में हमले के कारण, उद्देश्य, संभावित पूर्व योजना और किसी आतंकी गतिविधि से संबंध जैसे पहलुओं को देखा जा रहा है। इन बिंदुओं पर अभी अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

    अधिकारियों ने बिना पुष्टि वाली जानकारी फैलाने और जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से बचने की अपील की है।

    फ्लाईदुबई और तेल अवीव उड़ानों पर भी असर

    घटना के बाद इजरायल से जुड़ी फ्लाईदुबई की उड़ानों पर भी असर पड़ा है। अमीरात ने फ्लाईदुबई के साथ तेल अवीव आने-जाने वाली कोडशेयर सेवाओं को अगले आदेश तक रोक दिया है। इससे इस मार्ग पर यात्रा करने वाले यात्रियों को भी प्रभावित होना पड़ा है।

    सोशल मीडिया पर भी सावधानी जरूरी

    घटना के बाद कैप्टन स्मित के नाम से सोशल मीडिया पर कुछ खाते और संदेश सामने आए हैं। इनमें से किसी खाते को कैप्टन स्मित द्वारा संचालित किए जाने की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए ऐसे संदेशों को उनके आधिकारिक बयान के रूप में मानना उचित नहीं होगा।

    फिलहाल सबसे अहम जानकारी यही है कि कैप्टन स्मित ताबुक में आपात इलाज के बाद दुबई पहुंच चुके हैं और आगे का उपचार जारी है। उनके परिवार और भारतीय अधिकारी उनके स्वास्थ्य पर नजर बनाए हुए हैं। वहीं विमान में हुए हमले के कारण और सह-पायलट के उद्देश्य को लेकर जांच जारी है।

  • मुंबई में आज से टोल महंगा: ट्रक-बस समेत इन वाहनों के नए रेट, 2029 तक जारी रहेगी वसूली

    मुंबई में आज से टोल महंगा: ट्रक-बस समेत इन वाहनों के नए रेट, 2029 तक जारी रहेगी वसूली

    मुंबई के पांच प्रवेश टोल नाकों पर 1 अक्टूबर से नए रेट लागू हो गए हैं। जानें किस वाहन पर कितना टोल, किसे छूट और 2029 तक वसूली क्यों जारी रहेगी।

    मुंबई: 1 अक्टूबर 2026 से मुंबई के पांच प्रमुख प्रवेश टोल नाकों पर कॉमर्शियल और भारी वाहनों के लिए टोल की नई दरें लागू हो गई हैं। मिनी बस और हल्के कॉमर्शियल वाहन के लिए अब 90 रुपये, ट्रक और बस के लिए 180 रुपये तथा भारी मोटर वाहन के लिए 225 रुपये प्रति यात्रा टोल देना होगा। इससे अलग निजी कार, एसयूवी और पहले से छूट प्राप्त हल्के वाहनों पर इस बढ़ोतरी का असर नहीं पड़ेगा।

    नई दरें मुंबई के वाशी, ऐरोली, मुलुंड एलबीएस रोड, मुलुंड ईस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे और दहिसर वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे स्थित पांच प्रवेश बिंदुओं पर लागू हुई हैं। अटल सेतु का टोल इस व्यवस्था से अलग है।

    मुंबई के पांच टोल नाकों पर अब कितना शुल्क

    वाहन श्रेणीपुराना टोलनया टोलबढ़ोतरी
    मिनी बस और एलसीवी75 रुपये90 रुपये15 रुपये
    ट्रक और बस150 रुपये180 रुपये30 रुपये
    भारी मोटर वाहन190 रुपये225 रुपये35 रुपये

    महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास महामंडल यानी एमएसआरडीसी के आधिकारिक सार्वजनिक नोटिस में 1 अक्टूबर 2023 से 30 सितंबर 2026 तक मिनी बस/एलसीवी के लिए 75 रुपये, ट्रक/बस के लिए 150 रुपये और भारी मोटर वाहनों के लिए 190 रुपये प्रति यात्रा दर निर्धारित थी। इसलिए भारी वाहन की नई दर 190 से बढ़कर 225 रुपये हुई है।

    इस हिसाब से मिनी बस और एलसीवी तथा ट्रक-बस श्रेणी में वृद्धि 20 प्रतिशत है, जबकि भारी मोटर वाहन की बढ़ोतरी करीब 18.4 प्रतिशत है।

    निजी कार और एसयूवी चालकों को क्या देना होगा

    इस बढ़ोतरी का सबसे सीधा असर कॉमर्शियल और भारी वाहनों पर है। निजी कार और एसयूवी के लिए मुंबई के इन पांच प्रवेश बिंदुओं पर टोल छूट जारी है। हल्के मोटर वाहन, स्कूल बस और राज्य परिवहन बसों को अक्टूबर 2024 से दी गई छूट भी जारी है। सार्वजनिक परिवहन बस, ऑटो-रिक्शा और टैक्सी भी इस टोल से मुक्त हैं।

    यानी सामान्य निजी कार से मुंबई में प्रवेश करने वाले व्यक्ति को 1 अक्टूबर की इस नई दर के कारण अतिरिक्त टोल नहीं देना पड़ेगा।

    एक महीने में कितना बढ़ सकता है खर्च

    नई दर प्रति यात्रा लागू है। इसलिए नियमित रूप से मुंबई आने-जाने वाले कॉमर्शियल वाहनों के लिए कुल खर्च उनकी टोल-योग्य यात्राओं की संख्या पर निर्भर करेगा।

    उदाहरण के तौर पर यदि कोई वाहन 26 दिनों तक रोज एक टोल-योग्य यात्रा करता है, तो एलसीवी के मामले में पुराने और नए टोल के बीच करीब 390 रुपये महीने का अतिरिक्त अंतर होगा। ट्रक या बस के लिए यह अंतर 780 रुपये और भारी मोटर वाहन के लिए 910 रुपये महीने होगा।

    यदि साल में ऐसी 312 यात्राएं मानी जाएं तो अतिरिक्त राशि क्रमशः 4,680 रुपये, 9,360 रुपये और 10,920 रुपये तक पहुंच सकती है। यह केवल गणना का उदाहरण है; वास्तविक खर्च वाहन की यात्रा और टोल नाके से गुजरने की संख्या पर निर्भर करेगा।

    50 और 100 कूपन लेने पर टोल में कितनी छूट

    बार-बार मुंबई आने वाले कॉमर्शियल वाहनों के लिए अग्रिम टोल कूपन की व्यवस्था भी है। एमएसआरडीसी के अनुसार 50 कूपन खरीदने पर 25 प्रतिशत और 100 कूपन खरीदने पर 50 प्रतिशत की छूट दी जाती है। टोल प्लाजा पर रियायती यात्रा स्मार्ट कार्ड भी जारी किए जाते हैं।

    नई दर पर प्रकाशित छूट प्रतिशत को लागू करने पर 90 रुपये के टोल पर 25 प्रतिशत छूट के बाद प्रभावी राशि 67.50 रुपये और 50 प्रतिशत छूट के बाद 45 रुपये बैठती है। 180 रुपये के टोल पर ये राशि 135 और 90 रुपये तथा 225 रुपये के टोल पर 168.75 और 112.50 रुपये होगी।

    टोल बढ़ाने की व्यवस्था क्या है

    मुंबई के इन पांच प्रवेश बिंदुओं पर टोल कलेक्शन सितंबर 2002 में शुरू हुआ था। मौजूदा रियायत व्यवस्था में दरों का संशोधन तीन वर्ष के अंतराल पर किया जाता है। अक्टूबर 2023 में पिछली दरें लागू हुई थीं और 30 सितंबर 2026 को वह अवधि पूरी हुई। इसके बाद 1 अक्टूबर 2026 से संशोधित दरें लागू की गई हैं।

    2010 में मुंबई एंट्री पॉइंट्स लिमिटेड यानी एमईपीएल ने एमएसआरडीसी को बुनियादी ढांचे से जुड़े पूंजीगत खर्च के लिए 2,100 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान किया था। इसके बाद कंपनी को टोल संग्रह के जरिए निवेश के साथ वित्तपोषण, प्रशासन, संचालन और रखरखाव से जुड़े खर्चों की वसूली की व्यवस्था मिली।

    इन प्रवेश बिंदुओं की टोल व्यवस्था मुंबई और आसपास विकसित किए गए फ्लाईओवर, पुल, सबवे और रोड ओवरब्रिज जैसे बुनियादी ढांचे की लागत तथा उससे जुड़ी व्यवस्थाओं से जुड़ी रही है। ऐतिहासिक रूप से इस परियोजना के तहत 55 फ्लाईओवर बनाए जाने का उल्लेख मिलता है।

    2026 में टोल खत्म होना था, फिर 2029 तक क्यों बढ़ा

    यह इस समय टोल व्यवस्था से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण बदलाव है। पांच प्रवेश बिंदुओं पर टोल कलेक्शन की मौजूदा अवधि पहले नवंबर 2026 में समाप्त होनी थी, लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने इसे 17 सितंबर 2029 तक बढ़ाने की व्यवस्था की है।

    अक्टूबर 2024 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के कार्यकाल में पांच प्रवेश टोल नाकों पर कारों और छोटे वाहनों को टोल से छूट दी गई थी। इस छूट से टोल संचालक को होने वाले राजस्व नुकसान की भरपाई के लिए बाद में मुआवजे की व्यवस्था की गई। उपलब्ध सरकारी निर्णय के अनुसार इसी व्यवस्था के तहत टोल संग्रह की अवधि 2029 तक बढ़ाई गई।

    2025 में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में हुई महाराष्ट्र मंत्रिमंडल की बैठक में पांच प्रवेश बिंदुओं पर दी गई टोल छूट से होने वाले राजस्व नुकसान की भरपाई को मंजूरी दी गई थी। इस व्यवस्था के साथ 19 नवंबर 2026 से 17 सितंबर 2029 तक अलग-अलग वाहन श्रेणियों की वास्तविक समय वाहन संख्या का आंकड़ा रखने और सरकार को उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया गया।

    इसी निर्णय में मुंबई और उपनगरों के 27 फ्लाईओवर तथा संबंधित संरचनाओं के रखरखाव और देखरेख की जिम्मेदारी निजी ठेकेदार के पास जारी रखने को मंजूरी दी गई। वाशी क्रीक ब्रिज से संबंधित टोल राजस्व में कमी की भरपाई के लिए 775.58 करोड़ रुपये की चरणबद्ध नकद व्यवस्था को भी मंजूरी दी गई थी।

    टोल बढ़ने से माल ढुलाई और जरूरी सामान पर क्या असर पड़ेगा

    टोल वृद्धि का सीधा असर कॉमर्शियल वाहनों के परिचालन खर्च पर पड़ेगा। ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के सलाहकार और पूर्व अध्यक्ष बाल मलकीत सिंह ने बढ़ोतरी का विरोध करते हुए कहा है कि अतिरिक्त लागत की भरपाई के लिए परिवहन कंपनियां माल ढुलाई शुल्क बढ़ा सकती हैं और इसका असर आगे उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। उन्होंने भारी कॉमर्शियल वाहनों को भी छोटे वाहनों की तरह टोल छूट देने की मांग की है।

    ऐसा नहीं है कि टोल बढ़ते ही फल, सब्जी या दूसरी आवश्यक वस्तुओं की कीमत निश्चित रूप से बढ़ जाएगी। अंतिम कीमत पर ईंधन, दूरी, माल ढुलाई, मांग-आपूर्ति और अन्य लागतों का भी असर होता है। फिलहाल उपभोक्ता कीमतों पर असर को लेकर परिवहन क्षेत्र की चिंता सामने आई है, वास्तविक कीमत वृद्धि का कोई समान या निश्चित आंकड़ा सामने नहीं आया है।

    आगे क्या बदलेगा

    19 नवंबर 2026 से 17 सितंबर 2029 तक वाहन श्रेणीवार वास्तविक समय यातायात आंकड़ा रखने की व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पांचों प्रवेश बिंदुओं से गुजरने वाले वाहनों की संख्या और श्रेणीवार यातायात का रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा।

    फिलहाल 1 अक्टूबर 2026 से लागू नई दरों के अनुसार मिनी बस और एलसीवी के लिए 90 रुपये, ट्रक और बस के लिए 180 रुपये तथा भारी मोटर वाहन के लिए 225 रुपये प्रति यात्रा टोल देना होगा। निजी कार और एसयूवी समेत पहले से छूट प्राप्त वाहनों पर इस संशोधन का टोल प्रभाव नहीं है। मुंबई के पांच प्रवेश बिंदुओं की मौजूदा टोल व्यवस्था अब 17 सितंबर 2029 तक जारी रहने की निर्धारित व्यवस्था के तहत चल रही है।

  • मुंबई में 2 अक्टूबर से DigiHealth Connect अभियान, ABHA से Ayushman Card तक जानें किसे क्या फायदा

    मुंबई में 2 अक्टूबर से DigiHealth Connect अभियान, ABHA से Ayushman Card तक जानें किसे क्या फायदा

    मुंबई में 2 अक्टूबर से 100 दिन का DigiHealth Connect अभियान शुरू होगा। ABHA, 70+ Ayushman Card और PMJAY-MJPJAY रजिस्ट्रेशन की पूरी जानकारी यहां जानें।

    मुंबई: 2 अक्टूबर 2026 से मुंबई में 100 दिनों के लिए Mumbai DigiHealth Connect (MDC) अभियान शुरू होने जा रहा है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका का यह अभियान सिर्फ ABHA कार्ड बनाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि 70 वर्ष और उससे अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों के Ayushman Vay Vandana Card, पात्र लाभार्थियों के PMJAY/MJPJAY कार्ड, BMC की स्वास्थ्य संस्थाओं और healthcare professionals को डिजिटल हेल्थ नेटवर्क से जोड़ने पर भी केंद्रित होगा।

    अभियान के दौरान मुंबई के अलग-अलग इलाकों में नागरिकों का ABHA registration कराने के साथ अस्पतालों, दवाखानों, आपला दवाखाना, प्रसूतिगृह, प्रशासनिक कार्यालय, स्कूल-कॉलेज, गृहनिर्माण संस्थाओं, झोपड़पट्टी बस्तियों, बाजारों और राशन दुकानों तक registration अभियान पहुंचाया जाएगा। वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगों और वंचित वर्गों के लिए विशेष जनसंपर्क और डोर टू डोर अभियान भी चलाया जाएगा।

    इस अभियान को समझने से पहले आप को बतादें कि —ABHA और Ayushman Card एक ही चीज नहीं हैं। ABHA डिजिटल हेल्थ पहचान है, जबकि Ayushman Vay Vandana और PM-JAY स्वास्थ्य उपचार के लिए पात्र लाभार्थियों को health coverage उपलब्ध कराने से जुड़ी योजनाएं हैं।

    ABHA Card क्या है और इससे मुंबईकरों को क्या फायदा होगा?

    Ayushman Bharat Health Account यानी ABHA एक डिजिटल हेल्थ पहचान है, जिसका इस्तेमाल स्वास्थ्य संबंधी रिकॉर्ड को डिजिटल तरीके से जोड़ने और उपलब्ध कराने के लिए किया जाता है। ABDM के तहत ABHA, Health Facility Registry और Healthcare Professionals Registry जैसे digital building blocks तैयार किए गए हैं।

    सितंबर 2026 की स्थिति में देश में 97.8 करोड़ से ज्यादा ABHA बनाए जा चुके थे और 121 करोड़ से ज्यादा health records इनसे link हो चुके थे। इसके अलावा 5.6 लाख से ज्यादा health facilities और लगभग 11 लाख healthcare professionals ABDM ecosystem में registered थे।

    ABHA का फायदा उस समय ज्यादा महत्वपूर्ण होता है जब नागरिक का health record ABDM-enabled health facilities और digital systems से link होता है। इसके जरिए उपलब्ध digital health services में health records, laboratory reports, treatment information और discharge summaries जैसे records को डिजिटल रूप से access करने की सुविधा शामिल हो सकती है।

    इसका मतलब यह नहीं है कि ABHA बनते ही किसी व्यक्ति के पुराने सभी मेडिकल रिकॉर्ड अपने आप online हो जाएंगे। Records को संबंधित digital health systems से link किया जाना और health information के access/share के लिए consent-based व्यवस्था लागू होती है।

    क्या ABHA Card से मुफ्त इलाज मिलता है?

    नहीं। ABHA को मुफ्त इलाज या health insurance card समझना सही नहीं है।

    ABHA मुख्य रूप से digital health identity है। वहीं PM-JAY और उससे जुड़ी पात्र health assurance schemes उपचार के लिए health coverage उपलब्ध कराती हैं। इसलिए ABHA बनवाने और Ayushman Card बनवाने को दो अलग प्रक्रियाओं के रूप में समझना चाहिए।

    70 साल या उससे अधिक उम्र के नागरिकों के लिए क्या मिलेगा?

    MDC अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा 70 वर्ष और उससे अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों के Ayushman Vay Vandana Card से जुड़ा है।

    सरकारी व्यवस्था के तहत 70 वर्ष या उससे अधिक उम्र का कोई भी भारतीय नागरिक, उसकी आय या सामाजिक-आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना, इस coverage के लिए पात्र है। 70+ senior citizens के लिए Aadhaar-based e-KYC की आवश्यकता है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार इस योजना में आय की कोई सीमा निर्धारित नहीं है।

    इसका annual health cover ₹5 लाख तक है। यदि परिवार में एक से अधिक 70+ सदस्य हैं, तो ₹5 लाख की सीमा परिवार के आधार पर लागू होती है; हर बुजुर्ग के लिए अलग से ₹5 लाख जोड़कर ₹10 लाख या उससे ज्यादा मान लेना सही नहीं होगा। पहले से PM-JAY beneficiary परिवार में 70+ सदस्य के लिए अतिरिक्त benefit का प्रावधान है और इसके लिए Aadhaar e-KYC दोबारा करना पड़ सकता है।

    यानी 70+ नागरिकों के मामले में ABHA और Ayushman Vay Vandana Card की भूमिका अलग है। ABHA digital health identity है, जबकि Vay Vandana Card PM-JAY health coverage से संबंधित है।

    राशन दुकान पर PMJAY और MJPJAY Card भी बनेंगे

    Mumbai DigiHealth Connect अभियान में राशन दुकानों को भी registration network का हिस्सा बनाया गया है। पात्र राशन कार्डधारकों की पहचान, राशन कार्ड या E-KYC के जरिए eligibility verification और इसके बाद PMJAY/MJPJAY Card registration की व्यवस्था की जाएगी।

    इस काम में सामुदायिक स्वास्थ्य स्वयंसेविका यानी CHV और ASHA कार्यकर्ताओं की भूमिका रहेगी। राशन दुकानों के लिए समय निर्धारित किया जाएगा, ताकि वहां आने वाले पात्र लाभार्थियों का registration किया जा सके।

    आप को बता दें, कि केवल राशन कार्ड होना हर व्यक्ति को स्वतः किसी एक scheme का beneficiary नहीं बना देता। PM-JAY और MJPJAY में beneficiary identification के लिए निर्धारित eligibility criteria लागू होते हैं।

    महाराष्ट्र की मौजूदा MJPJAY व्यवस्था में अलग-अलग beneficiary categories हैं। इनमें Yellow, Antyodaya Anna Yojana, Annapurna और Orange ration card categories के साथ-साथ expanded scheme में White ration card और अन्य निर्धारित categories भी शामिल हैं। पात्रता category के अनुसार अलग हो सकती है और अंतिम verification scheme के निर्धारित documents तथा beneficiary database के आधार पर होती है।

    PM-JAY benefits की portability भी महत्वपूर्ण है। पात्र beneficiary को देशभर में empanelled hospitals में scheme के नियमों के अनुसार cashless treatment की सुविधा मिल सकती है, जबकि MJPJAY के तहत महाराष्ट्र के network hospitals में cashless treatment की व्यवस्था है।

    मुंबई में ABHA और दूसरे कार्ड कहां बनाए जाएंगे?

    BMC के अभियान के दौरान registration को नागरिकों के नजदीक पहुंचाने की योजना है। इसके लिए BMC hospitals, dispensaries, Aapla Dawakhana, maternity homes, administrative ward offices, schools, colleges, housing societies, slum settlements, markets और ration shops जैसे स्थानों पर registration activities की जाएंगी।

    BMC headquarters और विभागीय तथा प्रशासनिक कार्यालयों में अधिकारियों और उनके परिवारों के लिए विशेष ABHA registration camps भी आयोजित किए जाएंगे।

    अभियान के तीसरे चरण में senior citizens, persons with disabilities और disadvantaged sections के लिए special outreach तथा घरपोच यानी डोर टू डोर registration अभियान पर जोर रहेगा।

    हालांकि BMC की घोषणा में अभी प्रत्येक ward के लिए अलग-अलग camp की तारीख, समय और exact location की विस्तृत सूची सार्वजनिक नहीं की गई है। इसलिए नागरिकों को अपने इलाके के camp की जानकारी के लिए BMC की आगे जारी होने वाली स्थानीय सूचना पर ध्यान देना होगा।

    अभियान तीन चरणों में चलेगा

    पहले चरण में जनजागृति अभियान, अधिकारियों-कर्मचारियों और volunteers का training, volunteer registration तथा प्रचार सामग्री का वितरण किया जाएगा।

    दूसरे चरण में बड़े पैमाने पर नागरिकों का registration किया जाएगा। इसमें अस्पतालों, दवाखानों, आपला दवाखाना, प्रसूतिगृह, प्रशासनिक कार्यालय, educational institutions, housing societies, slum areas, markets और ration shops को शामिल किया गया है।

    तीसरे चरण में वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगों और वंचित वर्गों तक विशेष outreach पहुंचाई जाएगी। इस दौरान घरपोच registration और विशेष ABHA camps आयोजित किए जाएंगे।

    BMC की पूरी व्यवस्था में किन अधिकारियों की जिम्मेदारी होगी?

    अभियान में Medical Health Officers की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। प्रत्येक administrative ward में ABHA registration की progress की निगरानी Assistant Commissioners और Deputy Commissioners करेंगे।

    BMC Commissioner Ashwini Bhide ने नागरिकों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। Additional Municipal Commissioner (City) Prajakta Verma ने Public Health Department को अधिक से अधिक नागरिकों को ABHA registration से जोड़ने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने BMC की सभी health institutions को Health Facility Registry यानी HFR में register करने तथा पात्र doctors, nurses, AYUSH practitioners, pharmacists और physiotherapists सहित healthcare professionals को Healthcare Professional Registry यानी HPR में register करने का लक्ष्य रखने को कहा है।

    Public Health Committee Chairman Harish Bhandirge ने भी अधिक से अधिक मुंबईकरों से इस अभियान में भाग लेने की अपील की है।

    HFR और HPR से आम नागरिक को क्या फायदा होगा?

    HFR यानी Health Facility Registry में health facilities को digital ecosystem में register किया जाता है, जबकि HPR में healthcare professionals की verified digital registry तैयार होती है।

    इससे MDC अभियान केवल नागरिकों के ABHA बनाने की drive नहीं रह जाता। इसका दूसरा हिस्सा BMC की health facilities और healthcare workforce को national digital health ecosystem से जोड़ना है।

    राष्ट्रीय स्तर पर ABDM में 5.6 लाख से अधिक health facilities और लगभग 11 लाख healthcare professionals registered हो चुके हैं।

    BMC में digital health services का अगला चरण क्या होगा?

    MDC अभियान के objectives में ABHA-linked health records के साथ Scan & Share, e-prescription, e-discharge summary, digital laboratory और radiology reports तथा EMR/HMIS जैसी digital services का विस्तार शामिल है।

    BMC पहले से अपनी कुछ health facilities में HMIS आधारित digital health infrastructure का इस्तेमाल कर रहा है। BMC के उपलब्ध Year Book में B.Y.L. Nair Hospital और Kasturba Hospital में cloud-based HMIS/Aarogya Sanchayani के implementation का उल्लेख है, जिसमें patient data और कुछ medical information को digital रूप में manage करने की व्यवस्था शामिल है।

    इसलिए MDC को केवल नया registration campaign समझना पूरी तस्वीर नहीं होगी। इसका एक उद्देश्य BMC की health services को broader ABDM digital ecosystem के साथ जोड़ना और digital health services का इस्तेमाल बढ़ाना भी है।

    क्या ABHA बनने के बाद medical records सुरक्षित रहेंगे?

    ABDM framework में health information sharing consent-based व्यवस्था पर आधारित है। ABHA digital identity बनने का अर्थ यह नहीं है कि किसी भी व्यक्ति या संस्था को नागरिक के सभी medical records स्वतः देखने की अनुमति मिल जाती है।

    Digital health records को link और share करने की प्रक्रिया में consent और authorised access की व्यवस्था महत्वपूर्ण है। ABDM का उद्देश्य interoperable digital health ecosystem तैयार करना है, जिसमें नागरिक अपने health records को digital रूप से manage कर सके।

    मुंबईकरों के लिए सबसे जरूरी बात

    अगर किसी परिवार में 70 वर्ष या उससे अधिक उम्र का सदस्य है, तो इस अभियान के दौरान ABHA और Ayushman Vay Vandana Card को अलग-अलग समझना सबसे जरूरी है। ABHA digital health identity है, जबकि 70+ senior citizens के लिए Ayushman Vay Vandana PM-JAY health coverage से संबंधित है।

    इसी तरह PMJAY/MJPJAY registration को भी ABHA registration से अलग समझना होगा। राशन दुकानों पर होने वाला registration पात्र लाभार्थियों की eligibility verification के बाद किया जाएगा।

    MDC अभियान के जरिए BMC नागरिकों, health facilities और healthcare professionals—तीनों को digital health framework से जोड़ने की कोशिश कर रहा है। 2 अक्टूबर से शुरू होने वाले 100 दिनों के अभियान में registration, awareness, training और targeted outreach के जरिए इसका विस्तार किया जाएगा।

    राष्ट्रीय स्तर पर ABDM पहले ही 97.8 करोड़ से ज्यादा ABHA और 121 करोड़ से ज्यादा linked health records का आंकड़ा पार कर चुका है। ऐसे में मुंबई में शुरू होने वाला यह 100 दिवसीय अभियान नागरिकों तक digital health services और पात्र health-assurance benefits को जमीनी स्तर पर पहुंचाने की दिशा में BMC की महत्वपूर्ण पहल है।

  • तनीषा मुखर्जी के Lonavala घर की बिजली क्यों कटी? MSEDCL ने बताया पूरा मामला

    तनीषा मुखर्जी के Lonavala घर की बिजली क्यों कटी? MSEDCL ने बताया पूरा मामला

    तनीषा मुखर्जी के Lonavala घर की बिजली कटने पर MSEDCL ने ₹3,000 बकाया और नोटिस का हवाला दिया। भुगतान के बाद 30 सितंबर को बिजली बहाल हुई।

    मुंबई: तनीषा मुखर्जी के लोनावला स्थित पुश्तैनी घर की बिजली काटे जाने को लेकर शुरू हुआ विवाद अब MSEDCL के जवाब के बाद नया मोड़ ले चुका है। तनीषा ने 29 सितंबर को आरोप लगाया था कि बिजली विभाग ने तय तारीख से पहले बिजली काट दी और भुगतान के लिए दबाव बनाया। इसके एक दिन बाद MSEDCL ने बिजली काटने की वजह बताते हुए कहा कि कनेक्शन पर बकाया राशि जमा नहीं की गई थी और नोटिस दिए जाने के बाद 26 सितंबर को सप्लाई बंद की गई थी। 30 सितंबर को करीब 3,000 रुपये का ऑनलाइन भुगतान किए जाने के बाद बिजली बहाल कर दी गई।

    MSEDCL के अनुसार, लोनावला की इस संपत्ति पर तीन-फेज बिजली कनेक्शन तनीषा मुखर्जी के नाम पर दर्ज है। जुलाई 2026 का बिजली बिल 5 अगस्त को चुकाया गया था। इसके बाद अगस्त और सितंबर के बिल जारी हुए। विभाग के अनुसार अगस्त के बिल की भुगतान की अंतिम तारीख 4 सितंबर थी।

    MSEDCL का कहना है कि बकाया राशि की जानकारी तनीषा के पंजीकृत मोबाइल नंबर पर SMS के जरिए दी गई थी। विभाग के अनुसार 19 सितंबर तक भुगतान के लिए दी गई अवधि भी समाप्त हो गई, लेकिन बकाया जमा नहीं हुआ। इसके बाद 26 सितंबर को बिजली आपूर्ति काट दी गई।

    तनीषा ने इससे पहले क्या आरोप लगाया था?

    29 सितंबर को तनीषा मुखर्जी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लोनावला में अपने पुश्तैनी घर की बिजली कटने को लेकर नाराजगी जताई थी। उन्होंने महाराष्ट्र के बिजली विभाग पर भारी बिल देने और कथित तौर पर भुगतान के लिए बिजली काटने का आरोप लगाया था। तनीषा ने कार्रवाई को गंभीर बताते हुए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और अन्य लोगों से हस्तक्षेप की अपील की थी।

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    तनीषा का कहना था कि बिजली शनिवार शाम को काटी गई और उनके अनुसार बिल की due date अभी नहीं आई थी। इसी आधार पर उन्होंने लोनावला में बिजली विभाग के कामकाज पर सवाल उठाए थे।

    MSEDCL ने 26 सितंबर को बिजली काटने की वजह क्या बताई?

    MSEDCL के मुताबिक, बिजली आपूर्ति बकाया बिल के कारण काटी गई थी। विभाग ने कहा कि भुगतान के लिए SMS भेजने के अलावा स्थानीय कर्मचारियों ने फार्महाउस के मैनेजर से भी कई बार बिल जमा कराने के लिए संपर्क किया था।

    MSEDCL के बताए घटनाक्रम के अनुसार अगस्त के बिल की 4 सितंबर की due date निकल चुकी थी और 19 सितंबर तक भुगतान का notice period भी पूरा हो गया था। इसके बाद 26 सितंबर को कनेक्शन काटा गया।

    30 सितंबर को क्या हुआ?

    विवाद के बीच 30 सितंबर को तनीषा मुखर्जी ने ऑनलाइन माध्यम से करीब 3,000 रुपये की बकाया राशि का भुगतान किया। MSEDCL के अनुसार भुगतान प्राप्त होने के बाद बिजली आपूर्ति बहाल कर दी गई।

    इस तरह फिलहाल बिजली कनेक्शन चालू है और विवाद का तत्काल कारण बनी supply disconnection की स्थिति भुगतान के बाद समाप्त हो गई है।

    मीटर और फार्महाउस की एंट्री को लेकर भी MSEDCL ने दी जानकारी

    MSEDCL ने बिजली काटे जाने के कारण के साथ इस कनेक्शन की meter-reading व्यवस्था को लेकर भी जानकारी दी है। विभाग के अनुसार बिजली का मीटर संपत्ति के प्रवेश द्वार से करीब 300 फीट की दूरी पर स्थित है।

    MSEDCL के मुताबिक, संपत्ति के प्रवेश द्वार पर सुरक्षा कर्मचारी तैनात रहते हैं और meter reading के लिए आने वाले कर्मचारियों को अंदर जाने के लिए caretaker की अनुमति लेनी पड़ती है। हालांकि, विभाग ने meter तक पहुंच की इस स्थिति को बिजली बिल की किसी कथित गड़बड़ी का कारण नहीं बताया है।

    क्या बकाया बिजली बिल पर कनेक्शन काटा जा सकता है?

    MSEDCL के मुताबिक, बिल का भुगतान नहीं होने पर बिजली आपूर्ति काटने से पहले उपभोक्ता को notice दिया जाता है और भुगतान के लिए 15 दिन की अवधि दी जाती है। MSEDCL यह भी बताता है कि बिल में गलत meter reading या पहले से भुगतान की गई राशि के बावजूद arrears दिखने जैसी समस्या होने पर उपभोक्ता संबंधित कार्यालय में billing complaint दर्ज करा सकता है।

    MSEDCL की online payment व्यवस्था भी स्पष्ट करती है कि due date के बाद बिल का भुगतान करने पर delayed payment charges और अन्य लागू कार्रवाई हो सकती है तथा केवल online payment की सुविधा उपलब्ध होने से पहले से शुरू की गई disconnection प्रक्रिया अपने आप खत्म नहीं होती।

    हालांकि तनीषा मुखर्जी के मामले में यह अलग सवाल है कि उनके द्वारा बताई गई due date और MSEDCL की बताई गई 4 सितंबर की due date के बीच अंतर क्यों था। उपलब्ध जानकारी में संबंधित मूल बिल या notice की प्रति सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है, इसलिए इस बिंदु पर किसी एक पक्ष के दावे को अंतिम निष्कर्ष मानना उचित नहीं होगा।

    बिजली बिल में गड़बड़ी हो तो उपभोक्ता क्या कर सकता है?

    MSEDCL के अनुसार billing या बिजली से जुड़ी शिकायतें 1912, 19120, 1800-233-3435 और 1800-212-3435 पर दर्ज की जा सकती हैं। शिकायतें portal, mobile app और अन्य उपलब्ध माध्यमों से भी दर्ज की जा सकती हैं।

    MSEDCL के मुताबिक बिल में गलत reading, भुगतान के बावजूद arrears या अन्य billing anomaly होने पर संबंधित कार्यालय में शिकायत की जा सकती है। शिकायत का समाधान नहीं होने पर उपभोक्ता आगे की grievance redressal व्यवस्था का इस्तेमाल कर सकता है। MSEDCL ने Consumer Grievance Redressal Forums यानी CGRF भी स्थापित किए हैं।

    बिजली बहाल करने को लेकर क्या नियम हैं?

    महाराष्ट्र विद्युत नियामक आयोग (MERC) के 2021 Supply Code में गैर-भुगतान के कारण disconnect हुए कनेक्शन के भुगतान के बाद reconnection के लिए निर्धारित service standards दिए गए हैं। इसमें छह महीने से कम अवधि से disconnected consumer के लिए भुगतान के बाद शहरी क्षेत्रों में आठ घंटे और ग्रामीण क्षेत्रों में 24 घंटे का standard दिया गया है, कुछ शर्तों के अधीन।

    तनीषा के मामले में MSEDCL ने बताया है कि 30 सितंबर को ऑनलाइन भुगतान मिलने के बाद बिजली आपूर्ति बहाल कर दी गई।

    फिलहाल विवाद में आगे क्या?

    फिलहाल तनीषा मुखर्जी के लोनावला घर की बिजली बहाल हो चुकी है। इस पूरे विवाद में मुख्य अंतर तनीषा द्वारा बताए गए कथित due-date से पहले disconnection और MSEDCL द्वारा बताई गई billing तथा notice timeline को लेकर है।

    MSEDCL का कहना है कि 4 सितंबर की due date, 19 सितंबर तक notice period और 26 सितंबर के disconnection के बाद 30 सितंबर को बकाया करीब 3,000 रुपये का भुगतान मिलने पर supply बहाल की गई। दूसरी ओर, तनीषा ने बिजली काटे जाने के समय और बिल की स्थिति पर सवाल उठाए थे। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी में इस विवाद को लेकर किसी सरकारी जांच या नियामकीय आदेश की पुष्टि सामने नहीं आई है।

  • मुंबई में 96.64% पानी फिर भी 10% कटौती क्यों? BMC ने बताई मई 2027 तक की स्थिति

    मुंबई में 96.64% पानी फिर भी 10% कटौती क्यों? BMC ने बताई मई 2027 तक की स्थिति

    मुंबई की 7 झीलों में 96.64% पानी के बावजूद 10% कटौती जारी है। BMC ने मई 2027 तक के स्टॉक, 500 MLD गैप और नए जल प्लान की जानकारी दी।

    मुंबई: सातों जलापूर्ति झीलों में 96.64% पानी होने के बावजूद मुंबई में 10% पानी की कटौती हटाने की तैयारी नहीं है। BMC ने अब साफ किया है कि मौजूदा जल भंडार को बचाकर चलाना जरूरी है और उपलब्ध स्टॉक का अनुमान 17 मई 2027 तक लगाया गया है। ऐसे में सवाल है कि जब झीलें लगभग भर चुकी हैं तो मुंबई में पानी की कटौती क्यों जारी है और आने वाले महीनों में इसका असर कितना बढ़ सकता है।

    BMC के अतिरिक्त नगर आयुक्त अभिजीत बांगर ने नागरिक निकाय की बैठक में बताया कि मौजूदा पानी का स्टॉक मई 2027 तक चलाने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है। शिवसेना (यूबीटी) की नेता और सदन में विपक्ष की नेता किशोरी पेडणेकर ने 10% पानी की कटौती वापस लेने की मांग उठाई थी। इसके जवाब में BMC प्रशासन ने मौजूदा कटौती जारी रखने की जरूरत बताई।

    मुंबई की सात झीलों में कितना पानी है?

    मुंबई को पानी देने वाली सात प्रमुख झीलें तुलसी, विहार, भातसा, तानसा, मोडक सागर, अपर वैतरणा और मिडिल वैतरणा हैं। 29 सितंबर को इनमें कुल 13,98,722 मिलियन लीटर उपयोगी पानी था, जो 14,47,363 मिलियन लीटर की कुल उपयोगी क्षमता का 96.64% है। 30 सितंबर की सुबह यह स्टॉक 96.37% दर्ज किया गया। यानी झीलों का स्तर ऊंचा होने के बावजूद उसमें लगातार मामूली गिरावट भी देखी जा रही है।

    पिछले दो वर्षों की तुलना करें तो 29 सितंबर 2025 को यही स्टॉक 97.57% और 2024 में 99.09% था। इस साल सातों झीलें 100% के स्तर तक नहीं पहुंच सकीं।

    96% पानी होने के बावजूद संकट क्यों?

    सिर्फ झीलों में मौजूद पानी का प्रतिशत देखकर पूरे साल की जल सुरक्षा तय नहीं होती। मुंबई की सालाना जरूरत पूरी करने के लिए सातों जलाशयों का पूरा उपयोगी भंडार करीब 14.47 लाख मिलियन लीटर होना जरूरी माना जाता है। मौजूदा स्टॉक इस स्तर से नीचे है और अगले मानसून तक शहर को लगातार पानी उपलब्ध कराना है।

    यही वजह है कि BMC फिलहाल पानी की बचत को प्राथमिकता दे रहा है। मई में जब सातों झीलों का स्टॉक सिर्फ 23.5% के आसपास रह गया था, तब 15 मई से पूरे मुंबई में 10% पानी की कटौती लागू की गई थी। बाद में जुलाई की भारी बारिश से जलाशयों का स्तर तेजी से बढ़ा, लेकिन कटौती वापस नहीं ली गई।

    मुंबई की पानी की जरूरत और सप्लाई में भी बड़ा अंतर

    मुंबई के जल संकट की एक वजह सिर्फ बारिश नहीं है। शहर में पानी की मांग और उपलब्ध आपूर्ति के बीच भी बड़ा अंतर बना हुआ है। BMC के आंकड़ों के अनुसार शहर को करीब 4,100 MLD पानी की आपूर्ति होती है, जबकि मांग लगभग 4,600 MLD है। यानी करीब 500 MLD का अंतर है। इसके अलावा पानी के वितरण तंत्र में 32 से 35% तक पानी लीकेज और चोरी के कारण नुकसान होने का अनुमान है।

    इसका मतलब यह है कि जलाशयों में पानी बढ़ने के बावजूद शहर के सामने पानी को लंबे समय तक सुरक्षित रखने और वितरण व्यवस्था में होने वाले नुकसान को कम करने की चुनौती बनी हुई है।

    महाराष्ट्र के सूखे का मुंबई पर भी असर

    महाराष्ट्र में इस साल बारिश की कमी ने स्थिति को और जटिल कर दिया है। राज्य सरकार ने 358 में से 265 तालुकों को सूखा प्रभावित घोषित किया है। यह राज्य के करीब 74% तालुकों के बराबर है। 18 सितंबर तक राज्य में सामान्य से 18.8% कम बारिश दर्ज की गई थी। मराठवाड़ा और विदर्भ के कई हिस्सों में कमी और ज्यादा रही।

    मुंबई की जलापूर्ति व्यवस्था सात प्रमुख झीलों पर निर्भर है, लेकिन कुछ अतिरिक्त जल स्रोत राज्य के नियंत्रण में हैं। राज्य के दूसरे हिस्सों में जल संकट बढ़ने की स्थिति में इन संसाधनों के इस्तेमाल और जल उपलब्धता को लेकर भी दबाव बढ़ सकता है। इसलिए मुंबई के लिए सिर्फ अपने सात जलाशयों का मौजूदा प्रतिशत देखना पर्याप्त नहीं है।

    El Niño और बढ़ते तापमान की चिंता

    BMC ने अक्टूबर और नवंबर के दौरान El Niño के प्रभाव के मजबूत होने की संभावना और उससे तापमान बढ़ने की स्थिति में झीलों से पानी के तेजी से वाष्पीकरण की चिंता जताई है। इसी कारण प्रशासन मौजूदा जल भंडार को बिना अतिरिक्त दबाव के अगले मानसून तक खींचना चाहता है।

    इस साल जुलाई में हुई भारी बारिश ने मुंबई को बड़ी राहत दी थी। जुलाई की शुरुआत में सातों जलाशयों का स्टॉक बेहद निचले स्तर पर था, लेकिन कुछ ही दिनों में भारी बारिश के कारण इसमें तेज बढ़ोतरी हुई। हालांकि अगस्त और सितंबर में जलाशयों में बढ़ोतरी की रफ्तार काफी धीमी रही।

    BMC का नया प्लान: 3,000 कुएं और 10,000 रिचार्ज स्ट्रक्चर

    जल संकट की आशंका के बीच BMC अब पारंपरिक जल स्रोतों को भी दोबारा इस्तेमाल करने की तैयारी कर रहा है। करीब 3,000 पुराने कुओं को साफ कर उन्हें दोबारा उपयोग योग्य बनाने की योजना पर काम हो रहा है। कुओं की सफाई, पानी की गुणवत्ता और खारेपन की जांच की जा रही है, क्योंकि मुंबई के तटीय इलाकों में भूजल में समुद्री पानी के प्रवेश की समस्या भी सामने आ सकती है।

    इसके साथ ही भूजल रिचार्ज बढ़ाने के लिए करीब 10,000 रिचार्ज स्ट्रक्चर तैयार करने की योजना भी सामने आई है। इसका उद्देश्य बारिश के पानी को जमीन में उतारकर भूजल स्तर को मजबूत करना है।

    पानी की कमी बढ़ी तो टैंकर व्यवस्था भी बदल सकती है

    जल संकट की स्थिति में टैंकरों पर निर्भरता बढ़ने की संभावना को देखते हुए BMC एक नई टैंकर नियमन नीति तैयार कर रहा है। इसका उद्देश्य पानी की कमी वाले इलाकों में टैंकर आपूर्ति को नियंत्रित करना और संभावित अनियमितताओं पर रोक लगाना है। प्रस्तावित नीति को संबंधित समितियों के सामने रखा जाना है और मंजूरी मिलने के बाद इसे लागू करने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।

    मुंबई में निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियों पर क्या असर पड़ेगा?

    जून में जब सातों झीलों का स्टॉक 10% के करीब पहुंच गया था, तब BMC ने निर्माण स्थलों और स्विमिंग पूल के लिए पानी की आपूर्ति रोकने तथा औद्योगिक और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर 20% अतिरिक्त कटौती लागू करने का फैसला किया था।

    मौजूदा समय में ऐसे पुराने प्रतिबंधों को स्वतः लागू मानना सही नहीं होगा। लेकिन अगर जल भंडार में दोबारा गंभीर गिरावट आती है तो BMC के पास पहले इस्तेमाल किए गए संरक्षण उपायों को दोबारा लागू करने का विकल्प मौजूद रहेगा।

    मुंबई के लिए आगे की बड़ी योजनाएं

    दीर्घकालीन जल सुरक्षा के लिए BMC की योजनाओं में गारगाई बांध से 440 MLD, मनोरी desalination project से 400 MLD और वर्सोवा desalination project से करीब 200 MLD अतिरिक्त क्षमता जोड़ने का लक्ष्य शामिल है। इन परियोजनाओं से कुल करीब 1,040 MLD अतिरिक्त क्षमता तैयार करने की योजना है।

    इसके अलावा बारिश के पानी के इस्तेमाल और भूजल रिचार्ज पर भी जोर बढ़ाया जा रहा है। मुंबई में भारी बारिश के दौरान बड़ी मात्रा में stormwater को बाढ़ रोकने के लिए समुद्र और खाड़ियों की ओर पंप करना पड़ता है। इसी बीच वसई-विहार प्रणाली से अतिरिक्त पानी हासिल करने और stormwater management को बेहतर बनाने जैसी योजनाओं पर भी काम हो रहा है।

    फिलहाल क्या स्थिति है?

    मुंबई में 10% पानी की कटौती अभी जारी है। सातों झीलों का स्टॉक करीब 96% से अधिक है, लेकिन पिछले दो वर्षों की तुलना में इस साल का स्तर कम है। BMC ने मौजूदा भंडार को 17 मई 2027 तक बनाए रखने का अनुमान दिया है और पानी की कटौती को हटाने के बजाय जल संरक्षण पर जोर दिया है।

    आने वाले महीनों में मुंबई के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारक झीलों के catchment में बारिश, तापमान और वाष्पीकरण, शहर की पानी की मांग, वितरण में होने वाला नुकसान और अगले मानसून से पहले उपलब्ध जल भंडार रहेगा। अभी उपलब्ध आंकड़े तत्काल पानी खत्म होने का संकेत नहीं देते, लेकिन BMC की रणनीति साफ है कि मौजूदा स्टॉक को अगले मानसून तक सुरक्षित रखने के लिए पानी की बचत जारी रखनी होगी।

  • बोरिवली में 35 अतिक्रमणों पर बीएमसी की बड़ी कार्रवाई, 8 किमी फुटपाथ होंगे मुक्त

    बोरिवली में 35 अतिक्रमणों पर बीएमसी की बड़ी कार्रवाई, 8 किमी फुटपाथ होंगे मुक्त

    बोरिवली पश्चिम में बीएमसी ने 20 अनधिकृत निर्माण और 15 स्टॉल हटाए। 6 फुटपाथ के करीब 8 किमी हिस्से को अतिक्रमणमुक्त करने की मुहिम जारी है।

    मुंबई: बोरिवली पश्चिम में पैदल चलने वालों के लिए रास्ता खाली कराने की मुहिम के तहत बीएमसी ने 20 अनधिकृत निर्माण और 15 अनधिकृत स्टॉल पर कार्रवाई की है। 29 सितंबर को लोकमान्य तिलक रोड, मार्केट लेन और बोरिवली सबवे रोड क्षेत्र में हुई इस कार्रवाई के साथ पहले चरण में चिन्हित 6 फुटपाथ के करीब 8 किलोमीटर हिस्से को अतिक्रमणमुक्त करने का काम आगे बढ़ाया गया है।

    यह कार्रवाई ‘पादचारी प्रथम’ अभियान के तहत की गई। बीएमसी का उद्देश्य फुटपाथ पर मौजूद ऐसे अतिक्रमण और निर्माण हटाकर पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित, लगातार और बाधामुक्त रास्ता उपलब्ध कराना है। इसका सीधा असर बोरिवली पश्चिम रेलवे स्टेशन से आने-जाने वाले यात्रियों और आसपास के इलाकों में पैदल चलने वाले नागरिकों पर पड़ने की उम्मीद है।

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    कार्यवाही की तस्वीर

    बोरिवली पश्चिम में इन जगहों पर हुई कार्रवाई

    बीएमसी के अनुसार लोकमान्य तिलक रोड, मार्केट लेन और बोरिवली सबवे रोड परिसर में कार्रवाई की गई। कुल 20 अनधिकृत निर्माण और 15 अनधिकृत स्टॉल हटाए गए।

    कार्रवाई के लिए बीएमसी ने 2 जेसीबी, 5 डंपर, 10 से अधिक अधिकारी-कर्मचारी और 20 कामगार तैनात किए थे। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए 15 से अधिक पुलिसकर्मियों का बंदोबस्त भी किया गया।

    उपायुक्त परिमंडल-7 मनीष वळंजु के मार्गदर्शन में और आर-मध्य विभाग के सहायक आयुक्त डॉ. प्रफुल तांबे के नेतृत्व में संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों और कामगारों की टीम ने कार्रवाई को अंजाम दिया।

    6 पदपथों पर करीब 8 किलोमीटर का अभियान

    बीएमसी ने बोरिवली क्षेत्र में पहले चरण के तहत 6 फुटपाथ को अतिक्रमणमुक्त करने का काम शुरू किया है। इन सभी हिस्सों की कुल लंबाई करीब 8 किलोमीटर बताई गई है।

    फिलहाल बीएमसी की ओर से जारी जानकारी में इन 6 फुटपाथ की पूरी सूची और प्रत्येक फुटपाथ की अलग-अलग लंबाई सार्वजनिक नहीं की गई है। हालांकि, अभियान का उद्देश्य इन मार्गों पर पैदल यात्रियों के लिए उपलब्ध जगह को बाधामुक्त करना है।

    बोरिवली पश्चिम में फुटपाथ पर अतिक्रमण की समस्या लंबे समय से सामने आती रही है। वर्ष 2019 में भी रोकडिया लेन से बोरिवली स्टेशन पश्चिम की ओर जाने वाले पदपथ पर अतिक्रमण के कारण लोगों को सड़क पर चलने की स्थिति का उल्लेख किया गया था।

    मुंबई में बड़े अभियान का हिस्सा है कार्रवाई

    बोरिवली की कार्रवाई मुंबई के व्यापक ‘पादचारी प्रथम’ अभियान का हिस्सा है। अभियान के पहले चरण में बीएमसी ने 200 फुटपाथ से अतिक्रमण हटाने का लक्ष्य रखा था। अगस्त के अंत तक 134 पदपथों पर कार्रवाई शुरू हो चुकी थी और करीब 197 किलोमीटर फुटपाथ को अतिक्रमणमुक्त करने का दावा किया गया था। उस समय 1,459 स्थानों पर कार्रवाई की जानकारी सामने आई थी।

    बीएमसी ने अगस्त में पहले चरण के लिए करीब 320 किलोमीटर पदपथों से अतिक्रमण हटाने के निर्देश भी दिए थे। अभियान में अनधिकृत फेरीवालों के साथ फुटपाथ पर मौजूद अन्य प्रकार के अवरोध हटाने और फुटपाथ की सुधार, सुरक्षा तथा सुंदरीकरण से जुड़े काम करने पर भी जोर दिया गया था।

    सिर्फ अतिक्रमण हटाना नहीं, पदपथ की मरम्मत भी

    बोरिवली पश्चिम में फुटपाथ से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई ऐसे समय हुई है, जब बीएमसी ने इसी क्षेत्र में फुटपाथ की मरम्मत के लिए भी निविदा प्रक्रिया शुरू की है।

    आर-मध्य विभाग के बीट नंबर 17 में बोरिवली पश्चिम के विभिन्न स्थानों पर फुटपाथ की मरम्मत के लिए करीब 18.09 लाख रुपये की निविदा जारी की गई थी। इसकी निविदा प्रक्रिया सितंबर के अंतिम सप्ताह में हुई और बोली खोलने की तारीख 30 सितंबर रखी गई थी।

    इससे संकेत मिलता है कि क्षेत्र में फुटपाथ को उपयोगी बनाने के लिए अतिक्रमण हटाने के साथ मरम्मत का काम भी अलग स्तर पर आगे बढ़ रहा है। हालांकि, 29 सितंबर की कार्रवाई में हटाए गए अतिक्रमण वाले सभी स्थान इस मरम्मत परियोजना में शामिल हैं या नहीं, इसकी अलग से पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

    अब असली चुनौती दोबारा अतिक्रमण रोकने की

    फुटपाथ खाली कराने के बाद सबसे महत्वपूर्ण चुनौती यह रहेगी कि इन जगहों पर दोबारा अतिक्रमण न हो और पैदल यात्रियों के लिए उपलब्ध रास्ता लगातार बना रहे। बोरिवली पश्चिम के अलग-अलग इलाकों में इस वर्ष भी फुटपाथ और सड़क पर फेरीवालों तथा अन्य अवरोधों को लेकर नागरिक शिकायतें सामने आती रही हैं। चीकूवाड़ी और साईबाबा नगर रोड जैसे इलाकों में पैदल यात्रियों के लिए जगह कम होने की शिकायतें दर्ज हुई थीं।

    इसलिए 29 सितंबर की कार्रवाई के बाद केवल हटाए गए निर्माणों की संख्या ही महत्वपूर्ण नहीं होगी, बल्कि यह भी देखना होगा कि इन मार्गों पर पैदल चलने की जगह कितनी लगातार और उपयोगी रहती है।

    पैदल चलना अब मौलिक अधिकार

    बोरिवली की यह कार्रवाई ऐसे समय हो रही है जब सर्वोच्च न्यायालय ने 19 जून 2026 के फैसले में सुरक्षित और चिन्हित फुटपाथ पर चलने के अधिकार को मौलिक अधिकार माना है। अदालत ने कहा कि सड़क होने पर नगर निगमों और अन्य संबंधित स्थानीय निकायों का दायित्व है कि पैदल चलने वालों के लिए चिन्हित और अच्छी तरह बनाए गए फुटपाथ उपलब्ध कराए जाएं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चिन्हित फुटपाथ पर पैदल चलने का अधिकार मोटर वाहनों की आवाजाही पर प्राथमिकता रखता है।

    ऐसे में बोरिवली में 6 फुटपाथ के करीब 8 किलोमीटर हिस्से को अतिक्रमणमुक्त करने की कार्रवाई सिर्फ अतिक्रमण हटाने तक सीमित नहीं है। इसके बाद इन रास्तों का रखरखाव, पैदल यात्रियों के लिए लगातार उपलब्ध जगह और दोबारा अतिक्रमण रोकने की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।

    फिलहाल बीएमसी की कार्रवाई जारी है और बोरिवली पश्चिम के चिन्हित फुटपाथ को अतिक्रमणमुक्त करने का काम अभियान के अगले चरणों में आगे बढ़ाया जाएगा।

  • मुंबई में 4 साल से फ्रीजर में था बुजुर्ग का शव, अमेरिका ले जाने की थी योजना; पुलिस ने शुरू की जांच

    मुंबई में 4 साल से फ्रीजर में था बुजुर्ग का शव, अमेरिका ले जाने की थी योजना; पुलिस ने शुरू की जांच

    मुंबई के मालाड में चार साल से फ्रीजर में रखे 78 वर्षीय बुजुर्ग के शव का मामला सामने आया है। परिवार अमेरिका के क्रायोनिक्स सेंटर ले जाना चाहता था।

    मुंबई: मालाड में एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां जून 2022 में मौत के बाद करीब 78 वर्षीय बुजुर्ग का शव चार साल से अधिक समय तक एक फ्रीजर में रखा गया। शव कुरार विलेज के कोंकणी पाड़ा इलाके में स्थित एक बंद डे-केयर सेंटर के परिसर से मिला। स्थानीय लोगों की सूचना के बाद कुरार पुलिस मौके पर पहुंची और फ्रीजर की जांच में शव बरामद किया। पुलिस ने फिलहाल मामले में FIR दर्ज नहीं की है और शव को इतने लंबे समय तक सुरक्षित रखने की कानूनी स्थिति की जांच की जा रही है।

    पुलिस के सामने परिवार ने बताया कि बुजुर्ग की मृत्यु प्राकृतिक कारणों से हुई थी। परिवार शव का अंतिम संस्कार करने के बजाय उसे लंबे समय तक सुरक्षित रखना चाहता था। परिवार ने भविष्य में चिकित्सा तकनीक के जरिए मृत व्यक्ति को दोबारा जीवित किए जाने की संभावना से जुड़ी क्रायोनिक्स तकनीक के बारे में जानकारी जुटाई थी और अमेरिका की ऐसी सुविधा तक शव पहुंचाने की योजना पर भी विचार किया था।

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    बंद सेंटर से बदबू आने के बाद सामने आया मामला

    मामला तब सामने आया जब बंद पड़े परिसर से दुर्गंध आने की शिकायत स्थानीय लोगों ने की। डे-केयर सेंटर करीब एक महीने से बंद था और परिसर को redevelopment के लिए खाली कराने की प्रक्रिया चल रही थी। सूचना मिलने के बाद पुलिस ने परिसर की जांच की और फ्रीजर के अंदर शव मिला।

    पुलिस की जांच में फिलहाल किसी तरह के foul play की पुष्टि नहीं हुई है। परिवार की ओर से मृत्यु से जुड़े दस्तावेज भी पुलिस को उपलब्ध कराए गए हैं। अब जांच का एक प्रमुख हिस्सा यह पता करना है कि मृत्यु के बाद शव को किस प्रक्रिया से संरक्षित रखा गया, फ्रीजर की व्यवस्था किसने की और इतने लंबे समय तक शव को निजी परिसर में रखने की अनुमति किस स्तर पर थी।

    2022 में हुई थी मौत, परिवार ने शव को सुरक्षित रखने का फैसला किया

    उपलब्ध जानकारी के अनुसार बुजुर्ग की मृत्यु जून 2022 में हुई थी। उनकी बेटी करीब 40 वर्ष की हैं और परिवार मुंबई में रहता है। परिवार का कहना है कि पिता की मृत्यु के बाद उनसे गहरा भावनात्मक लगाव होने के कारण शव को तुरंत अंतिम संस्कार के लिए नहीं भेजा गया। इसके बजाय उसे सुरक्षित रखने की कोशिश की गई।

    क्या यह वास्तव में Cryonics था?

    इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है। फ्रीजर में चार साल तक शव रखा जाना अपने आप में Cryonics प्रक्रिया नहीं माना जा सकता।

    Cryonics में कानूनी मृत्यु के बाद शरीर को बहुत कम तापमान तक तेजी से ठंडा कर लंबे समय तक संरक्षित करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। Cryonics संस्थाएं भविष्य की ऐसी चिकित्सा तकनीक की संभावना पर भरोसा करती हैं जो कभी संरक्षित शरीर या उसके महत्वपूर्ण ऊतकों को नुकसान से उबारकर पुनर्जीवन संभव बना सके। वर्तमान तकनीक से किसी cryopreserved इंसान को पुनर्जीवित करना अभी संभव साबित नहीं हुआ है।

    इसलिए मालाड के मामले में फिलहाल ज्यादा सटीक बात यह है कि परिवार शव को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहा था और अमेरिका की Cryonics सुविधा तक पहुंचाने की योजना पर विचार कर रहा था।

    भारत में शव को इतने लंबे समय तक रखने का कानून क्या कहता है?

    भारत में मृत शरीर को वर्षों तक निजी परिसर में संरक्षित रखने के लिए Cryonics को स्पष्ट कानूनी मान्यता देने वाला कोई अलग व्यापक regulatory framework सामने नहीं आता। भारतीय न्यायिक रिकॉर्ड में भी ऐसे मामलों में कानून की स्पष्टता का सवाल सामने आ चुका है।

    2017 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने Ashutosh Maharaj से जुड़े मामले में Cryonics और लंबे समय तक शव सुरक्षित रखने के सवाल पर विचार किया था। अदालत ने कहा था कि उस समय ऐसी स्थिति को स्पष्ट रूप से अनुमति देने या रोकने वाला विशिष्ट कानून उपलब्ध नहीं था। अदालत ने यह भी माना कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, नैतिकता या सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की स्थिति में राज्य की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

    इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में कोई भी व्यक्ति किसी निजी स्थान पर शव को अनिश्चितकाल तक फ्रीजर में रख सकता है। शव के संरक्षण, स्वास्थ्य सुरक्षा, स्थानीय प्रशासन और अंतिम निस्तारण से जुड़े नियम अलग-अलग परिस्थितियों में लागू हो सकते हैं।

    क्या भारत से शव अमेरिका भेजा जा सकता है?

    अगर परिवार शव को अमेरिका स्थित किसी सुविधा तक ले जाना चाहता है तो इसे सामान्य तरीके से विमान में ले जाना संभव नहीं है। भारत से मानव अवशेषों को विदेश भेजने के लिए संबंधित भारतीय और गंतव्य देश की आवश्यक अनुमतियां और दस्तावेज पूरे करने होते हैं।

    भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय की International Health Division के अनुसार विदेश भेजे जाने वाले मानव अवशेषों के लिए गंतव्य देश की पूर्व अनुमति के साथ संबंधित भारतीय सक्षम प्राधिकारी की अनुमति आवश्यक हो सकती है। मानव अवशेषों की पैकेजिंग, सीलिंग और स्वास्थ्य संबंधी दस्तावेज भी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होने चाहिए।

    अमेरिका में भी मानव अवशेषों के प्रवेश के लिए मृत्यु प्रमाणपत्र, उपयुक्त leak-proof container और परिस्थितियों के अनुसार अन्य दस्तावेज या अनुमति की आवश्यकता हो सकती है। अमेरिकी CDC के अनुसार, कुछ विशेष परिस्थितियों में human remains के लिए import permit भी आवश्यक हो सकता है।

    इसलिए मालाड में मिला शव सीधे किसी अमेरिकी Cryonics facility तक भेज देना केवल परिवार के निर्णय से संभव नहीं होगा। पहले भारतीय कानून और स्वास्थ्य संबंधी औपचारिकताएं तथा अमेरिका की import requirements पूरी करनी होंगी।

    BMC की sealing को लेकर भी उठ रहे सवाल

    जांच में यह तथ्य भी सामने आया है कि जिस डे-केयर सेंटर में शव मिला, उसे करीब तीन महीने पहले BMC द्वारा seal किए जाने की बात सामने आई है। वहीं परिसर लगभग एक महीने से बंद बताया गया था।

    अब जांच में यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि sealing के समय परिसर का निरीक्षण किस तरह हुआ था, फ्रीजर मौजूद था या नहीं और उस समय अधिकारियों को शव के बारे में कोई जानकारी मिली थी या नहीं।

    शव को रखने में कितना खर्च हुआ?

    शव को लंबे समय तक संरक्षित रखने पर खर्च को लेकर भी अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। एक पुलिस-आधारित रिपोर्ट में परिवार द्वारा कुल 50 लाख रुपये से अधिक खर्च किए जाने की बात कही गई है, जबकि दूसरी रिपोर्ट में करीब 1.60 लाख रुपये प्रतिमाह preservation agency को भुगतान किए जाने का उल्लेख है।

    इन दोनों आंकड़ों में अंतर होने के कारण कुल खर्च की सटीक राशि को अभी अंतिम रूप से तय नहीं माना जा सकता। पुलिस की जांच में यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि preservation की व्यवस्था किस एजेंसी या व्यक्ति के माध्यम से की गई थी और भुगतान किसे किया गया।

    पुलिस ने FIR दर्ज की या नहीं?

    फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार कुरार पुलिस ने मामले में FIR दर्ज नहीं की है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि इतने लंबे समय तक शव को फ्रीजर में रखने के लिए कौन-कौन से कानूनी प्रावधान लागू होते हैं और परिवार तथा परिसर से जुड़े लोगों की क्या भूमिका रही।

    पुलिस ने शव की स्थिति को समझने के लिए चिकित्सा विशेषज्ञों से भी सलाह ली है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार Cooper Hospital के डॉक्टरों से इस संबंध में consultation किया गया है।

    अब शव का क्या होगा?

    फिलहाल अंतिम निर्णय का इंतजार है। पुलिस परिवार के साथ कानूनी प्रक्रिया पर काम कर रही है और यह तय किया जाना बाकी है कि शव का अंतिम संस्कार किस प्रक्रिया के तहत होगा या उसे किसी अन्य वैधानिक व्यवस्था के तहत BMC को सौंपा जाएगा।

    मालाड का यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें सिर्फ एक परिवार द्वारा अपने मृत परिजन को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का सवाल नहीं है। इसके साथ मृत शरीर के संरक्षण, निजी परिसरों में शव रखने, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर human remains के परिवहन और भविष्य की Cryonics तकनीक की कानूनी स्थिति जैसे कई सवाल जुड़े हुए हैं। फिलहाल पुलिस की जांच और विशेषज्ञों की राय से यह स्पष्ट होना बाकी है कि इस मामले में आगे कौन-सी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

  • मुंबई में गंभीर अपराध 99% तक डिटेक्ट, फिर FIR से कोर्ट तक देरी कहाँ?

    मुंबई में गंभीर अपराध 99% तक डिटेक्ट, फिर FIR से कोर्ट तक देरी कहाँ?

    मुंबई में गंभीर अपराधों की detection rate ऊंची है, फिर भी FIR, forensic जांच और trial में देरी का सवाल क्यों बना हुआ है? जानिए पूरी तस्वीर।

    मुंबई: गंभीर अपराधों की जांच पर एक दिलचस्प तस्वीर सामने आई है। 2026 के पहले आठ महीनों में मुंबई पुलिस ने कुल अपराधों की 85 फीसदी detection rate दर्ज की, जबकि हत्या के मामलों में detection 99 फीसदी, हत्या के प्रयास और डकैती में 100 फीसदी तथा robbery में 99 फीसदी बताई गई। यानी गंभीर अपराधों में पुलिस के स्तर पर आरोपी या अपराध का पता लगाने की क्षमता के आंकड़े काफी ऊंचे हैं। इसके बावजूद एक बड़ा सवाल कायम है—अगर अपराध detect हो रहा है, तो FIR से लेकर forensic जांच, charge-sheet और अदालत में अंतिम फैसले तक न्याय की रफ्तार कहां धीमी पड़ती है?

    यह सवाल ऐसे समय में उठा है जब दो छोटे मामलों में तेजी से judicial conclusion सामने आया। एक मामले में 50 वर्षीय कृष्ण कुमार मोहनलाल सिंह को 24 मई 2026 को मुंबई पुलिस आयुक्त कार्यालय के पास फुटपाथ पर स्टील की केतली से चाय बेचने के मामले में दोषी ठहराया गया। दूसरा मामला मालाड के फुटपाथ पर कथित जुए से जुड़ा है, जिसमें 57 वर्षीय राजू जीवन कविरे के खिलाफ महाराष्ट्र प्रिवेंशन ऑफ गैंबलिंग एक्ट के तहत कार्रवाई हुई और उसे दोषी ठहराया गया।

    इन दोनों मामलों की प्रकृति अलग है, लेकिन वे criminal justice system की एक बड़ी तस्वीर सामने रखते हैं। सवाल यह नहीं है कि छोटे अपराधों पर कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं। सार्वजनिक रास्ते में बाधा, nuisance और सार्वजनिक स्थान पर जुआ जैसे अपराधों पर कानून के अनुसार कार्रवाई पुलिस की जिम्मेदारी है। असली सवाल यह है कि क्या ऐसे अपेक्षाकृत सरल मामलों और हत्या, बलात्कार, robbery, extortion या cybercrime जैसे जटिल मामलों की investigation और prosecution को एक ही पैमाने से देखा जा सकता है?

    चाय बेचने वाले मामले में क्या हुआ?

    अभियोजन के अनुसार कृष्ण कुमार मोहनलाल सिंह को 24 मई 2026 को सुबह करीब 10.50 बजे पुलिसकर्मी अंकुश मोरे इंगले ने गश्त के दौरान फुटपाथ पर चाय बेचते पाया था। Azad Maidan Police ने भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 285 और 293 के तहत कार्रवाई की। अदालत ने पुलिस की गवाही और spot panchnama को स्वीकार करते हुए सिंह को दोनों अपराधों में दोषी ठहराया। उसे प्रत्येक अपराध के लिए 1,500 रुपये का जुर्माना और एक-एक दिन की साधारण कैद सुनाई गई तथा appeal period के लिए 10,000 रुपये का bail bond भरने का निर्देश दिया गया।

    यहां BNS की धाराओं को समझना भी जरूरी है। धारा 285 सार्वजनिक रास्ते में danger, obstruction या injury से संबंधित है, जबकि धारा 293 lawful injunction के बाद public nuisance जारी रखने से संबंधित है। धारा 293 के मामले में यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि nuisance रोकने के लिए पहले कोई वैध injunction या आदेश हुआ हो। इसलिए इस conviction को समझते समय court order में दर्ज उस procedural background को देखना जरूरी है।

    मालाड gambling case में भी तस्वीर अलग है। DCB CID Unit 11 ने जुलाई 2025 में फुटपाथ पर कथित gambling के मामले में राजू जीवन कविरे के खिलाफ महाराष्ट्र Prevention of Gambling Act के तहत कार्रवाई की। उसने दोष स्वीकार किया और अदालत ने उसे सजा तथा 300 रुपये के जुर्माने से दंडित किया।

    यहीं से एक महत्वपूर्ण सवाल निकलता है—क्या छोटे मामलों का तेजी से खत्म होना पुलिस की असाधारण efficiency का परिणाम है या इन मामलों की प्रकृति और उपलब्ध evidence के कारण इनकी judicial प्रक्रिया ही comparatively सरल होती है?

    सिर्फ detection rate से पूरी कहानी नहीं समझी जा सकती

    मुंबई पुलिस के जनवरी से अगस्त 2026 के आंकड़े बताते हैं कि गंभीर अपराधों में detection मजबूत रही। हत्या के मामलों में 99 फीसदी, हत्या के प्रयास और dacoity में 100 फीसदी तथा robbery में 99 फीसदी detection दर्ज की गई। कुल crime detection rate 85 फीसदी रही।

    लेकिन detection और conviction एक ही चीज नहीं हैं।

    Detection का अर्थ है कि पुलिस ने अपराध का पता लगाने और आरोपी या मामले को identify करने की दिशा में सफलता हासिल की। Conviction अदालत के trial के बाद होती है। इनके बीच investigation, forensic examination, charge-sheet, cognizance, framing of charges, witnesses और evidence की कई stages आती हैं।

    यही वजह है कि सिर्फ police detection rate देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि serious crime cases भी उसी गति से final justice तक पहुंच रहे हैं।

    महाराष्ट्र में अदालतों पर कितना बोझ है?

    Latest NCRB data में महाराष्ट्र की criminal justice system की दूसरी तस्वीर सामने आती है। 2023 में राज्य में trial के लिए गए 24,14,487 IPC cases में से केवल 1,82,636 cases decided हुए, जबकि 22,31,851 cases undecided रहे। यानी उस साल IPC cases की trial pendency 92 फीसदी से अधिक थी। इसी dataset में महाराष्ट्र की conviction rate 49.3 फीसदी दर्ज की गई।

    इसका अर्थ यह नहीं है कि पुलिस की जांच खराब है। बल्कि यह बताता है कि police detection के बाद criminal justice process का अगला हिस्सा कितना बड़ा है।

    यही वह जगह है जहां छोटे और गंभीर अपराधों की तुलना सीधे करना मुश्किल हो जाता है। किसी फुटपाथ पर पुलिस की मौजूदगी में पकड़े गए आरोपी के मामले में evidence collection अपेक्षाकृत सीमित हो सकता है। इसके उलट हत्या, sexual offence, organised crime या cybercrime में medical evidence, CCTV, mobile data, forensic examination, कई गवाह और expert evidence जैसी चीजें investigation को लंबा बना सकती हैं।

    FIR के बाद investigation की समय-सीमा क्यों महत्वपूर्ण है?

    भारत में criminal procedure अब Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita यानी BNSS के तहत चलता है, जो 1 जुलाई 2024 से लागू है। BNSS की धारा 173 cognisable offences की सूचना दर्ज करने की प्रक्रिया से संबंधित है। Supreme Court ने 2025-26 के अपने निर्णयों में स्पष्ट किया है कि BNSS की धारा 173(3) कुछ ऐसे cognisable offences में preliminary inquiry की अनुमति देती है जिनमें सजा तीन साल या उससे अधिक लेकिन सात साल से कम है, और इसके लिए संबंधित वरिष्ठ अधिकारी की पूर्व अनुमति जैसी शर्तें लागू होती हैं।

    इसलिए आज FIR delay पर चर्चा करते समय केवल 2013 के Lalita Kumari judgment को दोहराना पर्याप्त नहीं है। 2024 के बाद लागू BNSS के नए procedural framework को भी समझना जरूरी है।

    हालांकि जहां cognisable offence की सूचना के बाद कानून के अनुसार FIR दर्ज होनी चाहिए, वहां शुरुआती देरी investigation पर असर डाल सकती है। घटनास्थल का evidence, CCTV footage, digital records और गवाहों की उपलब्धता समय के साथ प्रभावित हो सकती है।

    गंभीर मामलों में forensic delay भी बड़ा bottleneck

    महाराष्ट्र में criminal investigation की एक और बड़ी चुनौती forensic laboratories का workload है।

    Directorate of Forensic Science Laboratories के official case dashboard के अनुसार 31 जुलाई 2026 को 56,819 cases pending थे। अगस्त में 24,526 नए cases प्राप्त हुए और 26,448 reports जारी की गईं। इसके बावजूद 1 सितंबर 2026 को 54,897 cases carry forward हुए।

    सबसे बड़ी pendency Cyber और TASI divisions में दिखाई देती है। 1 सितंबर को Cyber में 29,666 और TASI में 9,766 cases pending थे। Mumbai laboratory में इसी तारीख को 14,169 cases carry forward हुए।

    यह आंकड़ा यह नहीं बताता कि सभी pending cases serious crimes से जुड़े हैं। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि digital और forensic evidence की processing criminal justice system में एक महत्वपूर्ण capacity issue है।

    इसी समस्या को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने सितंबर 2026 में DFSL के लिए 220 contractual posts मंजूर किए हैं। इनमें 130 scientific officers और 90 scientific assistants शामिल हैं। सरकार का उद्देश्य cyber और TASI से जुड़े करीब 40,000 pending cases के backlog को कम करना और forensic reports अदालतों तथा investigating agencies तक तेजी से पहुंचाना है।

    जब जांच हो जाए, तब भी मामला खत्म नहीं होता

    किसी गंभीर अपराध में पुलिस आरोपी तक पहुंच जाए, इसके बाद भी न्यायिक प्रक्रिया बाकी रहती है। Charge-sheet दाखिल होने के बाद court proceedings, charges, witnesses, expert reports और evidence examination जैसे चरण आते हैं।

    यही कारण है कि किसी छोटे मामले में कुछ तारीखों के भीतर conviction हो जाना और किसी गंभीर अपराध में वर्षों तक trial चलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पुलिस छोटे अपराधों को ज्यादा priority दे रही है।

    हालांकि कुछ गंभीर मामलों में courts ने investigation और evidence collection में देरी को लेकर हाल में सवाल उठाए हैं। सितंबर 2026 में Disha Salian death case में Bombay High Court ने छह साल तक चली पुलिस जांच और FIR से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाते हुए CBI को fresh investigation और FIR की दिशा में कदम उठाने का निर्देश दिया। अदालत की टिप्पणियां उस मामले की जांच से संबंधित थीं और उन्हें पूरे Mumbai Police system की सामान्य कार्यप्रणाली का निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

    इस मामले में बाद में CBI ने FIR दर्ज की और शिकायत में लगाए गए आरोपों के आधार पर जांच शुरू की।

    पुलिस की efficiency को कैसे मापा जाए?

    यहीं से मूल सवाल और बड़ा हो जाता है। किसी police force की performance केवल FIR की संख्या, cases detected या charge-sheets की संख्या से पूरी तरह नहीं समझी जा सकती।

    एक ज्यादा व्यापक तस्वीर में कम से कम ये सवाल शामिल होने चाहिए:

    क्या गंभीर शिकायत पर FIR समय पर दर्ज हुई?

    क्या investigation बिना अनावश्यक देरी के पूरी हुई?

    क्या forensic reports समय पर मिलीं?

    क्या charge-sheet समय पर दाखिल हुई?

    कितने मामलों में charges frame हुए?

    कितने मामलों में trial लंबित है?

    और आखिर में कितने मामलों में conviction या acquittal हुआ?

    मुंबई पुलिस के मौजूदा आंकड़े यह बताते हैं कि गंभीर अपराधों का detection स्तर ऊंचा है। दूसरी तरफ महाराष्ट्र की अदालतों और forensic system के आंकड़े बताते हैं कि detection के बाद criminal justice chain में बड़ी pendency मौजूद है।

    पुलिस का पक्ष

    मुंबई के Joint Commissioner of Police (Law and Order) Manoj Kumar Sharma ने चाय विक्रेता मामले पर कहा कि court order देखे बिना इस पर टिप्पणी करना मुश्किल होगा।

    इस बीच मुंबई पुलिस आयुक्त ने 2026 के पहले आठ महीनों में 85 फीसदी overall detection और गंभीर अपराधों में ऊंची detection rate का आंकड़ा सामने रखा है। पुलिस के मुताबिक cyber fraud मामलों में भी recovery mechanism के जरिए बड़ी राशि freeze की गई है।

    कानूनी और criminology का सवाल

    Criminal lawyer Advocate Mikhail Dey का कहना है कि genuine complaints पर police cognisance को लेकर शिकायतें सामने आती हैं, जबकि minor offences में cases तेजी से register और prosecute हो जाते हैं। उनके मुताबिक पहले से भारी judicial backlog के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि हर छोटे मामले को उसी स्तर की police-prosecution-court machinery से गुजारना कितना उचित है।

    Indian Society of Criminology के chairman Professor Madhavan Somasundaram का कहना है कि petty offences पर कानून लागू होना चाहिए, लेकिन कार्रवाई disproportionate नहीं होनी चाहिए। उनका तर्क है कि जिन violations को fine या digital mechanism के जरिए निपटाया जा सकता है, उनमें unnecessarily पूरी criminal justice machinery लगाने से व्यक्ति और राज्य दोनों पर अतिरिक्त लागत पड़ सकती है।

    इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि छोटे अपराधों पर कार्रवाई को अपने आप में गलत नहीं माना जा सकता। असली सवाल resources के allocation, investigation की गुणवत्ता और serious offences के लिए response time का है।

    अब असली सवाल क्या है?

    कृष्ण कुमार मोहनलाल सिंह और राजू जीवन कविरे के मामलों में conviction यह दिखाती है कि जब अपराध सामने हो, आरोपी की पहचान हो और prosecution के लिए जरूरी evidence उपलब्ध हो, तो criminal justice system अपेक्षाकृत तेजी से judicial conclusion तक पहुंच सकता है।

    लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि गंभीर अपराधों की जांच को कम priority दी जा रही है।

    मुंबई में 2026 की ऊंची serious-crime detection rate एक तरफ है, वहीं forensic laboratories की हजारों मामलों की pendency और महाराष्ट्र की बड़ी trial pendency दूसरी तरफ।

    इसलिए policing की असली efficiency का सवाल केवल यह नहीं है कि अपराधी पकड़ा गया या नहीं। असली कसौटी यह भी है कि शिकायत से FIR, FIR से investigation, investigation से evidence, evidence से charge-sheet और charge-sheet से final judgment तक पूरी प्रक्रिया कितनी समयबद्ध और प्रभावी रहती है।

    महाराष्ट्र में forensic capacity बढ़ाने के लिए 220 नए पदों की मंजूरी और investigation तथा conviction rate सुधारने की कोशिशें इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। अब इनका वास्तविक असर इस बात से दिखाई देगा कि pending evidence, investigation और trials कितनी तेजी से कम होते हैं और गंभीर अपराधों के पीड़ितों को अंतिम न्याय कितने समय में मिलता है।