महाराष्ट्र में आदिवासी छात्रों ने नाशिक से मुंबई तक 180 किमी मार्च शुरू किया। आश्रमशालाओं में 584 मौतें, सुरक्षा, भोजन और लंबित मांगें मुद्दा बनीं।
मुंबई: नाशिक से मुंबई तक आदिवासी छात्रों का 180 किमी ‘Tribal Gen Z Ulgulan’ मार्च सोमवार, 28 सितंबर को शुरू हो गया। करीब 40 दिनों से नाशिक में चल रहे धरने के बाद सकल आदिवासी विद्यार्थी आंदोलन कृति समिति के नेतृत्व में छात्र और आदिवासी समुदाय के लोग मुंबई के राजभवन की ओर पैदल रवाना हुए हैं। आंदोलन का केंद्र सिर्फ स्कूलों की सुविधाएं नहीं, बल्कि आश्रमशालाओं में छात्रों की सुरक्षा, मौतों की जांच, भोजन व्यवस्था, छात्रावास सुविधाएं, लंबित आर्थिक सहायता और सरकारी आश्वासनों के क्रियान्वयन का सवाल बन चुका है।
आयोजकों के अनुसार पहले दिन करीब 1,500 छात्र शामिल हो सकते हैं। यह मार्च नाशिक, खानदेश, उत्तर महाराष्ट्र, मराठवाड़ा और विदर्भ सहित अलग-अलग क्षेत्रों से छात्रों और समर्थकों को जोड़ रहा है। मार्च का अंतिम पड़ाव मुंबई का राजभवन है और उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इसके 4 से 5 अक्टूबर के बीच मुंबई पहुंचने की संभावना है।
आखिर छात्र 180 किमी पैदल मुंबई क्यों आ रहे हैं?
छात्रों का कहना है कि नाशिक में लंबे धरने और सरकार के साथ बातचीत के बावजूद उनकी कई प्रमुख मांगों पर ठोस और लिखित कार्रवाई नहीं हुई है। उनकी मांगों में आदिवासी विकास मंत्री अशोक उईके का इस्तीफा, आदिवासी विकास विभाग के सचिव विजय वाघमारे और आयुक्त लीना बंसोडे के तबादले, आश्रमशालाओं और छात्रावासों में बुनियादी सुविधाओं में सुधार, विद्यार्थियों की मौतों की स्वतंत्र जांच तथा पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता शामिल है।
25 सितंबर को आदिवासी विकास विभाग और छात्र प्रतिनिधियों के बीच बैठक भी हुई थी। सरकार ने 27 मांगों पर अपनी स्थिति बताते हुए सात पन्नों का पत्र जारी किया। कुछ मांगों पर काम शुरू होने की जानकारी दी गई, जबकि कई मामलों को नीतिगत निर्णय से जोड़कर अभी लंबित रखा गया है। छात्रों की मुख्य आपत्ति यह है कि उन्हें केवल आश्वासन नहीं, बल्कि स्पष्ट लिखित प्रतिबद्धता और जमीन पर कार्रवाई चाहिए।
दो साल में 584 आदिवासी छात्रों की मौत का आंकड़ा क्यों बना बड़ा मुद्दा?
इस आंदोलन का सबसे गंभीर पहलू महाराष्ट्र की आश्रमशालाओं से जुड़ा 584 विद्यार्थियों की मौत का सरकारी आंकड़ा है। आदिवासी विकास विभाग के वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार 2024-25 और 2025-26 के दौरान सरकारी और सहायता प्राप्त आश्रमशालाओं में कुल 584 विद्यार्थियों की मौत दर्ज हुई। इनमें 384 मौतें सरकारी आश्रमशालाओं और 200 मौतें सहायता प्राप्त आश्रमशालाओं से जुड़ी थीं।
इन मौतों के कारणों में गंभीर बीमारी, सिकल सेल, दुर्घटना, आत्महत्या और सर्पदंश शामिल बताए गए हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 273 मौतें गंभीर बीमारी, 228 दुर्घटना, 55 फांसी और 28 सर्पदंश से जुड़ी थीं। कुल मौतों में लगभग 88 प्रतिशत मौतें विद्यार्थियों के घर पर और करीब 11 प्रतिशत आश्रमशाला परिसर में हुईं। हालांकि 584 मौतों का सवाल सीधे स्कूल की लापरवाही से जुड़ा नहीं है। असल सवाल प्रत्येक मौत के कारण, इलाज, सुरक्षा व्यवस्था और संस्थागत जिम्मेदारी की जांच का है।
इसी वजह से आंदोलनकारी स्वतंत्र और मामले-दर-मामले जांच की मांग कर रहे हैं। नाशिक के सांसद भास्कर भगरे ने भी 584 मौतों की अलग-अलग परिस्थितियों की जांच की मांग उठाई है, जिसमें इलाज, पोषण, पेयजल, स्वच्छता, आवास, कर्मचारियों की उपलब्धता और आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधाओं की जांच शामिल है।
गढ़चिरौली की तीन छात्राओं की मौत ने बढ़ाए सवाल
9 अगस्त को गढ़चिरौली के जपतलाई गांव स्थित सहायता प्राप्त आदिवासी आवासीय स्कूल के छात्रावास में सांप के काटने से तीन आदिवासी छात्राओं की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद राज्य सरकार ने संबंधित स्कूल का लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द करने की कार्रवाई की और पूरे राज्य की आश्रमशालाओं की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठे।
मामला बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ तक भी पहुंचा। अदालत के रिकॉर्ड में छात्रावास में पर्याप्त शौचालय और स्नानघर, अलमारियों, भोजन कक्ष और सीसीटीवी जैसी व्यवस्थाओं से जुड़ी कमियों का उल्लेख है। एक निरीक्षण में 9 सीसीटीवी में से केवल 5 के काम करने की जानकारी भी सामने आई। अदालत ने पहले के निरीक्षण और बाद की जांच में सामने आई स्थितियों के अंतर को देखते हुए संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी विस्तृत जांच की जरूरत बताई।
मामले में मारोतराव कोवसे, उनके बेटे विश्वजीत कोवसे और छात्रावास अधीक्षक भाग्यश्री चिल्लमवार से जुड़ी अग्रिम जमानत याचिकाएं भी हाईकोर्ट के सामने आईं और अदालत ने उन्हें खारिज किया। इस मामले की कानूनी जांच अभी महत्वपूर्ण चरण में है।
584 मौतों की जांच के लिए बनी समिति, लेकिन सवाल रिपोर्ट पर
आदिवासी विकास मंत्री अशोक उईके ने 584 विद्यार्थियों की मौत के कारणों की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति बनाए जाने की जानकारी दी है। सरकार के अनुसार आश्रमशालाओं की जांच चल रही है और रिपोर्ट के आधार पर जिम्मेदारी तय करने तथा दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
अब छात्रों की मांग यह है कि जांच केवल विभागीय प्रक्रिया तक सीमित न रहे और मौतों की स्वतंत्र तथा पारदर्शी जांच हो। दूसरी ओर सरकार की ओर से विशेषज्ञ समिति और आश्रमशालाओं के निरीक्षण की प्रक्रिया चलने की बात कही गई है। इस पूरे मामले में अगला महत्वपूर्ण कदम समिति की रिपोर्ट और उसके आधार पर होने वाली कार्रवाई होगी।
511 सहायता प्राप्त आश्रमशालाओं के ऑडिट पर भी नजर
गढ़चिरौली की घटना के बाद राज्य सरकार ने लगभग 511 सहायता प्राप्त आश्रमशालाओं का तीसरे पक्ष से सुरक्षा ऑडिट कराने की प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य स्कूलों में सुरक्षा, आधारभूत ढांचे और बच्चों के रहने की परिस्थितियों की जांच करना था।
अब सवाल यह है कि 28 सितंबर तक कितनी आश्रमशालाओं का ऑडिट पूरा हुआ, कितनी जगह कमियां मिलीं और कितने संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई हुई। यह जानकारी सामने आना आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण मांगों में से एक पर सरकार की वास्तविक प्रगति स्पष्ट कर सकता है।
केंद्रीय रसोई व्यवस्था पर भी बड़ा विवाद
आंदोलनकारी आश्रमशालाओं के लिए केंद्रीय रसोई से खाना भेजने की व्यवस्था खत्म करने की मांग कर रहे हैं। उनका आरोप है कि खाना पहले तैयार होने और लंबी दूरी तक ले जाए जाने के कारण उसकी गुणवत्ता प्रभावित होती है। कच्चे माल की लेबलिंग, एक्सपायरी और गुणवत्ता जांच को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
सरकार ने कहा है कि केंद्रीय रसोई से लगभग 50 किलोमीटर के दायरे में भोजन पहुंचाया जाता है और इस व्यवस्था की समीक्षा के लिए समिति बनाई गई है। इसी बीच स्कूलों, छात्रावासों, आश्रमशालाओं, केंद्रीय रसोई और भोजन आपूर्तिकर्ताओं की जांच के लिए खाद्य एवं औषधि प्रशासन की विशेष निरीक्षण मुहिम भी शुरू की गई है। इसमें भोजन के नमूने, एफएसएसएआई पंजीकरण, प्रशिक्षित कर्मचारियों और खाद्य सुरक्षा मानकों की जांच शामिल है।
सरकारी छात्रावास मुफ्त, फिर फीस वसूली का आरोप क्यों?
आदिवासी विकास विभाग की आधिकारिक जानकारी के अनुसार पात्र अनुसूचित जनजाति विद्यार्थियों के लिए सरकारी छात्रावास में रहने, भोजन और शैक्षणिक सामग्री जैसी सुविधाएं मुफ्त उपलब्ध कराने का प्रावधान है।
इसके बावजूद आंदोलन से जुड़े लोगों ने कुछ संस्थानों में प्रवेश, दान और अन्य शुल्क के नाम पर बड़ी रकम वसूले जाने का आरोप लगाया है। कुछ मामलों में यह रकम एक लाख रुपये तक होने का दावा किया गया है। छात्रों ने ऐसी कथित वसूली की जांच और कार्रवाई की मांग की है।
इस आरोप की वास्तविक स्थिति तय करने के लिए संबंधित संस्थानों के शुल्क रिकॉर्ड और विभागीय जांच का सामने आना जरूरी होगा।
Swayam योजना का पैसा भी आंदोलन का मुद्दा
आंदोलन में पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्वयम् योजना के लंबित प्रत्यक्ष लाभ अंतरण की राशि जारी करने और सहायता बढ़ाने की मांग भी शामिल है।
स्वयम् योजना उन अनुसूचित जनजाति विद्यार्थियों के लिए है जिन्हें सरकारी छात्रावास में प्रवेश नहीं मिल पाता और जो उच्च शिक्षा के लिए आगे बढ़ते हैं। योजना के तहत भोजन, आवास, निर्वाह और शैक्षणिक सामग्री जैसी जरूरतों के लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान है। छात्रों का कहना है कि लंबित भुगतान और सहायता की अपर्याप्त राशि के कारण उन्हें आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ता है।
अगस्त में छात्रावास के नियम बदले, फिर भी आंदोलन क्यों जारी?
अगस्त में छात्रावास प्रवेश और नियमों को लेकर छात्रों का विरोध तेज हुआ था। 30 वर्ष की आयु सीमा सहित नए प्रावधानों को लेकर विवाद के बाद सरकार ने 14 अगस्त के संबंधित शासन निर्णय और संशोधित नियम वापस लेने तथा आयु सीमा हटाने की घोषणा की थी।
लेकिन इसके बाद आंदोलन खत्म नहीं हुआ। इसका कारण यह है कि छात्रों की मौजूदा मांगें केवल छात्रावास की आयु सीमा तक सीमित नहीं हैं। अब मुद्दा आश्रमशालाओं की सुरक्षा, 584 मौतों की जांच, भोजन, छात्रावास, स्वास्थ्य सुविधा, आर्थिक सहायता और अधिकारियों की जवाबदेही तक फैल चुका है।
नाशिक से मुंबई तक आगे क्या?
मार्च के दौरान छात्र दिन में पैदल चलने और रात में खुले स्थानों पर रुकने की योजना के साथ आगे बढ़ रहे हैं। प्रस्तावित मार्ग नाशिक से इगतपुरी, कसारा, शाहपुर और ठाणे क्षेत्र होते हुए मुंबई तक जाने का है। आयोजकों का लक्ष्य राजभवन पहुंचकर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से सीधे मुलाकात करना है।
आंदोलन से जुड़े राहुल पावरा सहित नेताओं का कहना है कि अलग-अलग क्षेत्रों से छात्रों और आदिवासी समुदाय के लोगों की भागीदारी बढ़ रही है। पहले हुए संवादों में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, मंत्री अशोक उईके और नाशिक के तत्कालीन जिलाधिकारी आयुष प्रसाद से बातचीत का भी उल्लेख किया गया था। छात्रों की मांग है कि सरकार उनके मुद्दों पर लिखित और स्पष्ट निर्णय दे।
इससे पहले 3 सितंबर को कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत डिपके ने प्रदर्शनकारियों से मुलाकात कर भूख हड़ताल समाप्त कर आंदोलन मुंबई ले जाने का आग्रह किया था। अब आंदोलन नाशिक से निकलकर सीधे राज्य की राजधानी की ओर बढ़ गया है।
सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि 180 किलोमीटर की इस पैदल यात्रा के मुंबई पहुंचने से पहले सरकार छात्रों के साथ कोई ठोस लिखित समझौता करती है या आंदोलन राजभवन तक पहुंचता है। 25 सितंबर के सात पन्नों के सरकारी जवाब के बाद अब छात्रों की नजर केवल घोषणाओं पर नहीं, बल्कि मांगों के वास्तविक क्रियान्वयन पर है।
