Kalina Central Library केस में छगन भुजबल और पांच पूर्व PWD अधिकारियों को डिस्चार्ज किया गया। जानिए ₹2.5 करोड़, जमीन लीज और ₹137 करोड़ का पूरा मामला।
मुंबई: मुंबई की विशेष अदालत ने महाराष्ट्र के मंत्री छगन भुजबल को Kalina Central Library से जुड़े 2015 के ACB भ्रष्टाचार मामले में डिस्चार्ज कर दिया है। अदालत ने माना कि किसी प्रशासनिक फैसले का गलत, आर्थिक रूप से नुकसानदेह या प्रक्रियागत रूप से अनियमित होना अपने आप में आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए आरोपी की स्पष्ट भागीदारी, आवश्यक मंशा या जानकारी का ठोस आधार होना जरूरी है।
विशेष MP/MLA अदालत के जज महेश के. जाधव ने भुजबल के साथ पांच पूर्व PWD अधिकारियों को भी मामले से डिस्चार्ज किया। इनमें तत्कालीन PWD अधिकारी गजानन सावंत, हरीश पाटिल, अनिलकुमार गायकवाड़, संजय सोलंकी और एमएस शाह शामिल थे। इस आदेश के साथ भुजबल के PWD मंत्री रहने के दौरान दर्ज लंबित ACB भ्रष्टाचार मामलों में Kalina Library मामला भी समाप्त हो गया है।
कोर्ट ने भुजबल को क्यों किया डिस्चार्ज?
मामले में अभियोजन का आरोप था कि तत्कालीन PWD मंत्री भुजबल ने अपने पद का इस्तेमाल करते हुए मुंबई विश्वविद्यालय के Kalina परिसर में Central Library बनाने के लिए निजी डेवलपर Indiabulls Real Estate Ltd को फायदा पहुंचाया।
अभियोजन ने कथित तौर पर भुजबल और उनके अधीन अधिकारियों के बीच एक ऐसी व्यवस्था का आरोप लगाया था जिसमें मंत्री की ओर से प्रत्यक्ष निर्देश या हस्तक्षेप सामने नहीं आया, लेकिन अधिकारियों को कथित तौर पर उनका “Invisible Support” हासिल था।
अदालत ने इस दलील को पर्याप्त आपराधिक साक्ष्य नहीं माना। कोर्ट के अनुसार किसी आपराधिक साजिश को केवल परिस्थितियों से निकाले गए अनुमान के आधार पर स्थापित नहीं किया जा सकता। उपलब्ध सामग्री में भुजबल की व्यक्तिगत भागीदारी और आवश्यक आपराधिक मंशा को स्थापित करने वाली पर्याप्त कड़ी नहीं मिली।
अदालत ने यह भी कहा कि किसी प्रशासनिक निर्णय के बाद में गलत, आर्थिक रूप से नुकसानदेह या प्रक्रियागत रूप से अनियमित पाए जाने और उसके आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी तय होने के बीच अंतर है।
₹2.5 करोड़ की sponsorship पर क्या था विवाद?
इस मामले की जांच में भुजबल से जुड़े एक welfare foundation को मिले कथित corporate sponsorship payments भी जांच के केंद्र में थे।
ACB की जांच में ₹2.5 करोड़ के दो payments का उल्लेख किया गया था। इनमें ₹1 करोड़ और ₹1.5 करोड़ की रकम शामिल थी। जांच एजेंसी ने इन payments को library project से जुड़े फैसलों के साथ जोड़ते हुए कथित quid pro quo यानी लाभ के बदले भुगतान की आशंका जताई थी।
हालांकि अदालत ने foundation को banking channels के जरिए मिली रकम को अपने आप में आपराधिक gratification या Prevention of Corruption Act के तहत criminal misconduct साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना। कोर्ट के अनुसार केवल किसी public servant से जुड़े foundation को पैसा मिलना, बिना अतिरिक्त ठोस साक्ष्य के, अपराध स्थापित नहीं करता।
Kalina की चार एकड़ जमीन का क्या था पूरा मामला?
Kalina Central Library विवाद की जड़ मुंबई विश्वविद्यालय की करीब चार एकड़ जमीन से जुड़ी थी। यह जमीन Central Library के निर्माण के लिए राज्य सरकार को दी गई थी।
PWD ने 2009 में library project के लिए tender प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद project को ऐसे मॉडल पर आगे बढ़ाया गया जिसमें निजी developer को library का निर्माण करना था और बदले में जमीन के एक हिस्से के commercial development और लंबे lease अधिकार दिए जाने थे।
विवाद का प्रमुख हिस्सा यह था कि करीब 7,000 वर्ग मीटर जमीन को 99 साल की अवधि के लिए केवल 1 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर पर lease देने की व्यवस्था की गई थी। ACB ने इसी व्यवस्था को सरकारी जमीन के कम मूल्य पर हस्तांतरण और राज्य को नुकसान से जोड़ते हुए जांच की थी।
ACB ने राज्य को कितने नुकसान का आरोप लगाया था?
ACB ने इस पूरे arrangement से राज्य को 75 करोड़ रुपये से अधिक के नुकसान का आरोप लगाया था। कुछ रिपोर्टों में जांच एजेंसी के अनुमानित नुकसान को करीब 79 करोड़ रुपये बताया गया है।
यह राशि और welfare foundation को मिले कथित ₹2.5 करोड़ एक ही रकम नहीं हैं। ₹2.5 करोड़ alleged sponsorship payments से जुड़ा आरोप था, जबकि ₹75 करोड़ से अधिक का आंकड़ा जमीन और project arrangement से कथित सरकारी नुकसान से संबंधित था।
Central Library project का आखिर क्या हुआ?
मामला केवल अदालत तक सीमित नहीं रहा। Library project की जमीन और construction agreement को लेकर विवाद कई वर्षों तक चला।
2010 में project के लिए work order जारी हुआ था और construction को 36 महीने में पूरा किया जाना था। Library building की अनुमानित construction cost करीब ₹82.5 करोड़ बताई गई थी।
बाद में project की प्रगति को लेकर विवाद बढ़ा और 2019 में महाराष्ट्र सरकार ने private developer के साथ agreement समाप्त करने का फैसला किया। इसके बाद जमीन वापस लेने की प्रक्रिया शुरू हुई।
सरकार ने developer को ₹137.07 करोड़ क्यों दिए?
Agreement खत्म होने के बाद private developer ने करीब ₹229.6 करोड़ compensation की मांग की थी। इसके बाद audit और settlement प्रक्रिया के जरिए मामला तय किया गया और सरकार ने ₹137.07 करोड़ का भुगतान किया।
इसके बाद भी Central Library project की कहानी खत्म नहीं हुई। 2022 में अधूरे civil और electrical काम को पूरा करने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने करीब ₹53 करोड़ का नया tender जारी किया।
इस तरह project से जुड़े विवाद में अलग-अलग चरणों पर ₹2.5 करोड़ के alleged sponsorship payments, ₹75 करोड़ से अधिक के alleged state loss, ₹137.07 करोड़ के settlement और ₹53 करोड़ के fresh construction tender जैसे अलग-अलग आंकड़े सामने आए। इन रकमों को आपस में जोड़कर एक ही “घोटाले की रकम” मानना सही नहीं होगा।
मामले में पहले भी अधिकारियों को राहत मिल चुकी थी
Kalina case में कुछ PWD अधिकारियों को इससे पहले भी राहत मिल चुकी थी। 2021 में तत्कालीन PWD अधिकारियों अनिलकुमार गायकवाड़ और संजय सोलंकी को discharge किया गया था।
अब भुजबल और मामले में बचे अन्य आरोपियों के discharge के बाद इस ACB case में सभी आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही समाप्त हो गई है।
2015 से 2026 तक कैसे बदली मामले की तस्वीर?
Kalina Central Library विवाद की शुरुआत 2009 की tender प्रक्रिया से जुड़ी थी। 2010 में project का work order जारी हुआ। 2010 और 2011 में welfare foundation को हुए sponsorship payments जांच का हिस्सा बने। 2015 में ACB ने मामला दर्ज किया।
इसके बाद आरोपपत्र और लंबी कानूनी प्रक्रिया चली। 2019 में सरकार ने project agreement समाप्त किया और ₹137.07 करोड़ के settlement के बाद जमीन वापस ली। 2021 में कुछ PWD अधिकारियों को discharge किया गया और 2022 में अधूरे library work के लिए ₹53 करोड़ का fresh tender निकाला गया।
24 सितंबर 2026 को Special MP/MLA Court ने छगन भुजबल और पांच पूर्व PWD अधिकारियों को भी discharge कर दिया।
भुजबल के लिए इस फैसले का क्या मतलब है?
छगन भुजबल वर्तमान में महाराष्ट्र के Food, Civil Supplies and Consumer Protection मंत्री हैं। महाराष्ट्र सरकार के विभागीय पोर्टल पर उनका नाम वर्तमान मंत्री के रूप में दर्ज है।
आज का आदेश उनके PWD मंत्री कार्यकाल से जुड़े लंबित ACB corruption cases में अंतिम मामले के रूप में सामने आया है। इससे पहले 2026 में Maharashtra Sadan और उससे जुड़े मामलों में भी उन्हें न्यायिक राहत मिल चुकी थी।
हालांकि Kalina मामले का विस्तृत reasoned order अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं था। इसलिए आगे की कानूनी स्थिति, यदि कोई नई कार्यवाही होती है, तो विस्तृत आदेश के सामने आने के बाद अधिक स्पष्ट होगी।
कलिना Central Library विवाद में अदालत का मौजूदा निष्कर्ष यह है कि उपलब्ध अभियोजन सामग्री भुजबल की ऐसी आपराधिक भागीदारी, मंशा या जानकारी स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं थी, जिससे उनके खिलाफ आरोप तय कर मुकदमा आगे बढ़ाया जा सके।
