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  • Kalina Library Case: छगन भुजबल को कोर्ट से राहत, ‘Invisible Support’ थ्योरी पर सवाल

    Kalina Library Case: छगन भुजबल को कोर्ट से राहत, ‘Invisible Support’ थ्योरी पर सवाल

    Kalina Central Library केस में छगन भुजबल और पांच पूर्व PWD अधिकारियों को डिस्चार्ज किया गया। जानिए ₹2.5 करोड़, जमीन लीज और ₹137 करोड़ का पूरा मामला।

    मुंबई: मुंबई की विशेष अदालत ने महाराष्ट्र के मंत्री छगन भुजबल को Kalina Central Library से जुड़े 2015 के ACB भ्रष्टाचार मामले में डिस्चार्ज कर दिया है। अदालत ने माना कि किसी प्रशासनिक फैसले का गलत, आर्थिक रूप से नुकसानदेह या प्रक्रियागत रूप से अनियमित होना अपने आप में आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए आरोपी की स्पष्ट भागीदारी, आवश्यक मंशा या जानकारी का ठोस आधार होना जरूरी है।

    विशेष MP/MLA अदालत के जज महेश के. जाधव ने भुजबल के साथ पांच पूर्व PWD अधिकारियों को भी मामले से डिस्चार्ज किया। इनमें तत्कालीन PWD अधिकारी गजानन सावंत, हरीश पाटिल, अनिलकुमार गायकवाड़, संजय सोलंकी और एमएस शाह शामिल थे। इस आदेश के साथ भुजबल के PWD मंत्री रहने के दौरान दर्ज लंबित ACB भ्रष्टाचार मामलों में Kalina Library मामला भी समाप्त हो गया है।

    कोर्ट ने भुजबल को क्यों किया डिस्चार्ज?

    मामले में अभियोजन का आरोप था कि तत्कालीन PWD मंत्री भुजबल ने अपने पद का इस्तेमाल करते हुए मुंबई विश्वविद्यालय के Kalina परिसर में Central Library बनाने के लिए निजी डेवलपर Indiabulls Real Estate Ltd को फायदा पहुंचाया।

    अभियोजन ने कथित तौर पर भुजबल और उनके अधीन अधिकारियों के बीच एक ऐसी व्यवस्था का आरोप लगाया था जिसमें मंत्री की ओर से प्रत्यक्ष निर्देश या हस्तक्षेप सामने नहीं आया, लेकिन अधिकारियों को कथित तौर पर उनका “Invisible Support” हासिल था।

    अदालत ने इस दलील को पर्याप्त आपराधिक साक्ष्य नहीं माना। कोर्ट के अनुसार किसी आपराधिक साजिश को केवल परिस्थितियों से निकाले गए अनुमान के आधार पर स्थापित नहीं किया जा सकता। उपलब्ध सामग्री में भुजबल की व्यक्तिगत भागीदारी और आवश्यक आपराधिक मंशा को स्थापित करने वाली पर्याप्त कड़ी नहीं मिली।

    अदालत ने यह भी कहा कि किसी प्रशासनिक निर्णय के बाद में गलत, आर्थिक रूप से नुकसानदेह या प्रक्रियागत रूप से अनियमित पाए जाने और उसके आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी तय होने के बीच अंतर है।

    ₹2.5 करोड़ की sponsorship पर क्या था विवाद?

    इस मामले की जांच में भुजबल से जुड़े एक welfare foundation को मिले कथित corporate sponsorship payments भी जांच के केंद्र में थे।

    ACB की जांच में ₹2.5 करोड़ के दो payments का उल्लेख किया गया था। इनमें ₹1 करोड़ और ₹1.5 करोड़ की रकम शामिल थी। जांच एजेंसी ने इन payments को library project से जुड़े फैसलों के साथ जोड़ते हुए कथित quid pro quo यानी लाभ के बदले भुगतान की आशंका जताई थी।

    हालांकि अदालत ने foundation को banking channels के जरिए मिली रकम को अपने आप में आपराधिक gratification या Prevention of Corruption Act के तहत criminal misconduct साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना। कोर्ट के अनुसार केवल किसी public servant से जुड़े foundation को पैसा मिलना, बिना अतिरिक्त ठोस साक्ष्य के, अपराध स्थापित नहीं करता।

    Kalina की चार एकड़ जमीन का क्या था पूरा मामला?

    Kalina Central Library विवाद की जड़ मुंबई विश्वविद्यालय की करीब चार एकड़ जमीन से जुड़ी थी। यह जमीन Central Library के निर्माण के लिए राज्य सरकार को दी गई थी।

    PWD ने 2009 में library project के लिए tender प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद project को ऐसे मॉडल पर आगे बढ़ाया गया जिसमें निजी developer को library का निर्माण करना था और बदले में जमीन के एक हिस्से के commercial development और लंबे lease अधिकार दिए जाने थे।

    विवाद का प्रमुख हिस्सा यह था कि करीब 7,000 वर्ग मीटर जमीन को 99 साल की अवधि के लिए केवल 1 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर पर lease देने की व्यवस्था की गई थी। ACB ने इसी व्यवस्था को सरकारी जमीन के कम मूल्य पर हस्तांतरण और राज्य को नुकसान से जोड़ते हुए जांच की थी।

    ACB ने राज्य को कितने नुकसान का आरोप लगाया था?

    ACB ने इस पूरे arrangement से राज्य को 75 करोड़ रुपये से अधिक के नुकसान का आरोप लगाया था। कुछ रिपोर्टों में जांच एजेंसी के अनुमानित नुकसान को करीब 79 करोड़ रुपये बताया गया है।

    यह राशि और welfare foundation को मिले कथित ₹2.5 करोड़ एक ही रकम नहीं हैं। ₹2.5 करोड़ alleged sponsorship payments से जुड़ा आरोप था, जबकि ₹75 करोड़ से अधिक का आंकड़ा जमीन और project arrangement से कथित सरकारी नुकसान से संबंधित था।

    Central Library project का आखिर क्या हुआ?

    मामला केवल अदालत तक सीमित नहीं रहा। Library project की जमीन और construction agreement को लेकर विवाद कई वर्षों तक चला।

    2010 में project के लिए work order जारी हुआ था और construction को 36 महीने में पूरा किया जाना था। Library building की अनुमानित construction cost करीब ₹82.5 करोड़ बताई गई थी।

    बाद में project की प्रगति को लेकर विवाद बढ़ा और 2019 में महाराष्ट्र सरकार ने private developer के साथ agreement समाप्त करने का फैसला किया। इसके बाद जमीन वापस लेने की प्रक्रिया शुरू हुई।

    सरकार ने developer को ₹137.07 करोड़ क्यों दिए?

    Agreement खत्म होने के बाद private developer ने करीब ₹229.6 करोड़ compensation की मांग की थी। इसके बाद audit और settlement प्रक्रिया के जरिए मामला तय किया गया और सरकार ने ₹137.07 करोड़ का भुगतान किया।

    इसके बाद भी Central Library project की कहानी खत्म नहीं हुई। 2022 में अधूरे civil और electrical काम को पूरा करने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने करीब ₹53 करोड़ का नया tender जारी किया।

    इस तरह project से जुड़े विवाद में अलग-अलग चरणों पर ₹2.5 करोड़ के alleged sponsorship payments, ₹75 करोड़ से अधिक के alleged state loss, ₹137.07 करोड़ के settlement और ₹53 करोड़ के fresh construction tender जैसे अलग-अलग आंकड़े सामने आए। इन रकमों को आपस में जोड़कर एक ही “घोटाले की रकम” मानना सही नहीं होगा।

    मामले में पहले भी अधिकारियों को राहत मिल चुकी थी

    Kalina case में कुछ PWD अधिकारियों को इससे पहले भी राहत मिल चुकी थी। 2021 में तत्कालीन PWD अधिकारियों अनिलकुमार गायकवाड़ और संजय सोलंकी को discharge किया गया था।

    अब भुजबल और मामले में बचे अन्य आरोपियों के discharge के बाद इस ACB case में सभी आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही समाप्त हो गई है।

    2015 से 2026 तक कैसे बदली मामले की तस्वीर?

    Kalina Central Library विवाद की शुरुआत 2009 की tender प्रक्रिया से जुड़ी थी। 2010 में project का work order जारी हुआ। 2010 और 2011 में welfare foundation को हुए sponsorship payments जांच का हिस्सा बने। 2015 में ACB ने मामला दर्ज किया।

    इसके बाद आरोपपत्र और लंबी कानूनी प्रक्रिया चली। 2019 में सरकार ने project agreement समाप्त किया और ₹137.07 करोड़ के settlement के बाद जमीन वापस ली। 2021 में कुछ PWD अधिकारियों को discharge किया गया और 2022 में अधूरे library work के लिए ₹53 करोड़ का fresh tender निकाला गया।

    24 सितंबर 2026 को Special MP/MLA Court ने छगन भुजबल और पांच पूर्व PWD अधिकारियों को भी discharge कर दिया।

    भुजबल के लिए इस फैसले का क्या मतलब है?

    छगन भुजबल वर्तमान में महाराष्ट्र के Food, Civil Supplies and Consumer Protection मंत्री हैं। महाराष्ट्र सरकार के विभागीय पोर्टल पर उनका नाम वर्तमान मंत्री के रूप में दर्ज है।

    आज का आदेश उनके PWD मंत्री कार्यकाल से जुड़े लंबित ACB corruption cases में अंतिम मामले के रूप में सामने आया है। इससे पहले 2026 में Maharashtra Sadan और उससे जुड़े मामलों में भी उन्हें न्यायिक राहत मिल चुकी थी।

    हालांकि Kalina मामले का विस्तृत reasoned order अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं था। इसलिए आगे की कानूनी स्थिति, यदि कोई नई कार्यवाही होती है, तो विस्तृत आदेश के सामने आने के बाद अधिक स्पष्ट होगी।

    कलिना Central Library विवाद में अदालत का मौजूदा निष्कर्ष यह है कि उपलब्ध अभियोजन सामग्री भुजबल की ऐसी आपराधिक भागीदारी, मंशा या जानकारी स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं थी, जिससे उनके खिलाफ आरोप तय कर मुकदमा आगे बढ़ाया जा सके।

  • जमुई में नाबालिग छात्र-छात्रा से बदसलूकी, 7 पर FIR; 3 गिरफ्तार, राहुल गांधी ने उठाए सवाल

    जमुई में नाबालिग छात्र-छात्रा से बदसलूकी, 7 पर FIR; 3 गिरफ्तार, राहुल गांधी ने उठाए सवाल

    बिहार के जमुई में 19 सितंबर को 10वीं के नाबालिग छात्र-छात्रा को रोककर बदसलूकी का वीडियो वायरल हुआ। POCSO में FIR, 3 गिरफ्तार।

    बिहार: जमुई में 10वीं कक्षा के नाबालिग छात्र और छात्रा को रास्ते में रोककर कथित तौर पर बदसलूकी करने का मामला सामने आया है। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस ने कार्रवाई तेज कर दी है। अब तक 7 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज होने और 3 आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई है। मामले में POCSO Act और भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की जा रही है।

    घटना 19 सितंबर की शाम करीब 6 से 7 बजे के बीच की बताई जा रही है। दोनों नाबालिग जमुई शहर के रहने वाले और 10वीं कक्षा के छात्र हैं। जानकारी के अनुसार, दोनों कोचिंग से लौटने के दौरान स्कूटी से मड़वा पहाड़ की तरफ गए थे। वापस लौटते समय जमुई सदर थाना क्षेत्र में युवकों के एक समूह ने उन्हें रास्ते में रोक लिया।

    वायरल वीडियो में क्या दिखा ?

    वायरल वीडियो में दोनों नाबालिगों को कई लोगों से घिरा हुआ देखा जा सकता है। छात्र और छात्रा लोगों से उन्हें जाने देने की गुहार लगाते दिखाई देते हैं। वीडियो में छात्र के साथ खींचतान और मारपीट तथा छात्रा के साथ कथित तौर पर अनुचित शारीरिक व्यवहार दिखाई देता है। एक अन्य दृश्य में एक व्यक्ति छात्रा को पकड़कर कुछ दूरी तक ले जाने की कोशिश करता दिखाई देता है।

    वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने मामले का संज्ञान लिया। जमुई के पुलिस अधीक्षक विश्वजीत दयाल के नेतृत्व में जांच आगे बढ़ी और दोनों नाबालिगों की पहचान कर उनके बयान लिए गए। पुलिस ने वीडियो में दिखाई देने वाले लोगों की पहचान की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई। जांच में 6 से 7 युवकों के शामिल होने की बात सामने आई है।

    प्रशासन ने क्या कहा ?

    जमुई के जिलाधिकारी नवीन ने कहा है कि घटना 19 सितंबर की शाम जमुई सदर थाना क्षेत्र की है। वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने स्वतः संज्ञान लिया, दोनों नाबालिगों से जानकारी ली गई और प्राथमिकी दर्ज की गई। प्रशासन ने नाबालिगों की निजता बनाए रखते हुए दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का भरोसा दिया है।

    पॉक्सो कानून के तहत मामला दर्ज

    मामले में सात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है और अब तक तीन आरोपियों को गिरफ्तार किए जाने की जानकारी है। पुलिस बाकी आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए कार्रवाई कर रही है। जांच में POCSO Act के साथ भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराएं भी लगाई गई हैं। पुलिस ने पीड़ितों के बयान भी दर्ज किए हैं।

    इस मामले की जांच में जमुई के एसपी विश्वजीत दयाल के साथ DIG राकेश कुमार भी निगरानी कर रहे हैं। पुलिस का फोकस वीडियो में दिखाई देने वाले सभी लोगों की भूमिका तय करने और बाकी आरोपियों तक पहुंचने पर है।

    राहुल गांधी ने उठाए सवाल

    मामले को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी बिहार सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि जमुई का वीडियो बेहद परेशान करने वाला है। राहुल गांधी ने घटना में शामिल लोगों की पहचान कर POCSO के तहत कार्रवाई और जल्द सजा की मांग की। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि घटना 19 सितंबर की है तो आरोपी अब तक सलाखों के पीछे क्यों नहीं हैं और शाम के समय बिहार की सड़कों पर लड़कियों की सुरक्षा को लेकर सरकार जवाब दे।

    हालांकि अब तक सामने आए पुलिस अपडेट के अनुसार कार्रवाई शुरू हो चुकी है और तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। बाकी आरोपियों की गिरफ्तारी और उनकी भूमिका की जांच जारी है।

    नाबालिग पीड़ितों की पहचान कानूनन संरक्षित है। इसलिए उनकी पहचान, चेहरा, स्कूल, पता या ऐसी कोई जानकारी प्रकाशित नहीं की जानी चाहिए जिससे उनकी पहचान सार्वजनिक हो सके। मामले में आगे की कार्रवाई पुलिस जांच और अदालत की प्रक्रिया के आधार पर तय होगी।

  • 3383 करोड़ की संपत्ति वाले BJP विधायक पराग शाह भिखारी बनकर क्यों घूमे? वायरल वीडियो की वजह सामने आई

    3383 करोड़ की संपत्ति वाले BJP विधायक पराग शाह भिखारी बनकर क्यों घूमे? वायरल वीडियो की वजह सामने आई

    BJP विधायक पराग शाह का भिखारी के वेश में मुंबई की सड़कों पर घूमने का वीडियो वायरल है। जानिए 3383 करोड़ की संपत्ति वाले विधायक ने ऐसा क्यों किया।

    मुंबई: घाटकोपर पूर्व से भाजपा विधायक पराग शाह का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में वह भिखारी के वेश में सड़क किनारे बैठे और लोगों से भीख मांगते नजर आ रहे हैं। खास बात यह है कि 2024 के विधानसभा चुनाव में दाखिल हलफनामे के मुताबिक पराग शाह ने 3,383.06 करोड़ रुपये की कुल संपत्ति घोषित की थी।

    ऐसे में लोगों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इतने संपन्न विधायक ने भिखारी का रूप क्यों अपनाया?

    जैन धर्मगुरु की सलाह पर लिया भिखारी का रूप

    उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, पराग शाह ने यह अनुभव जैन धर्मगुरु नम्रमुनि महाराज के सुझाव पर लिया। जैन धर्म के चातुर्मास के दौरान उन्हें एक दिन भिखारी की तरह जीवन जीकर आम लोगों की परिस्थितियों को करीब से समझने की सलाह दी गई थी।

    इसके बाद शाह ने अपनी सामान्य पहचान, सुरक्षा और सुविधाओं से दूर रहकर एक दिन भिखारी के रूप में बिताया।

    घाटकोपर की सड़कों पर किसी ने नहीं पहचाना

    वीडियो में पराग शाह मेकअप और भिखारी के वेश में घाटकोपर के इलाके में घूमते और सड़क किनारे बैठे दिखाई देते हैं। बताया जा रहा है कि इस दौरान उनके साथ मौजूद सामान्य पहचान और सुविधाएं नहीं थीं, जिसके कारण आसपास के लोग उन्हें पहचान नहीं सके।

    उन्होंने लोगों से भीख मांगी और सड़क किनारे भोजन किया। इस अनुभव का उद्देश्य कथित तौर पर यह समझना था कि सड़क पर रहने वाले जरूरतमंद लोगों को रोजमर्रा की जिंदगी में किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।

    मेकअप हटाकर उसी जगह लोगों से मिले

    इस प्रयोग का एक और हिस्सा वीडियो में दिखाई देता है। भिखारी के वेश में समय बिताने के बाद पराग शाह ने अपना मेकअप हटाया और फिर उन्हीं इलाकों में अपनी वास्तविक पहचान के साथ पहुंचे।

    इस तरह उन्होंने यह देखने की कोशिश की कि लोग उन्हें सामान्य रूप से कैसे देखते हैं और भिखारी के रूप में रहने के दौरान उनके प्रति लोगों का व्यवहार कैसा था।

    2024 के हलफनामे में घोषित की थी 3383 करोड़ की संपत्ति

    पराग शाह की संपत्ति का आंकड़ा इस वायरल वीडियो को और चर्चा में ला रहा है। 2024 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान दाखिल उनके चुनावी हलफनामे के अनुसार, उन्होंने 33,83,06,20,898 रुपये यानी करीब 3,383 करोड़ रुपये की कुल संपत्ति घोषित की थी। इनमें करीब 3,315.52 करोड़ रुपये की चल संपत्ति और 67.53 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति शामिल थी।

    एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के विश्लेषण में भी पराग शाह को 2024 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के सबसे अधिक संपत्ति घोषित करने वाले उम्मीदवारों में शीर्ष पर रखा गया था।

    2019 के चुनावी हलफनामे में उनकी घोषित संपत्ति करीब 500.62 करोड़ रुपये थी। 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर 3,383 करोड़ रुपये से अधिक हो गया।

    रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े हैं पराग शाह

    पराग शाह पेशे से कारोबारी और रियल एस्टेट क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। 2024 के चुनावी रिकॉर्ड में उनका पेशा बिजनेस दर्ज है। वह घाटकोपर पूर्व से भाजपा के विधायक हैं और 2024 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने यह सीट दोबारा जीती थी।

    भिखारी के वेश में मुंबई की सड़कों पर घूमने का उनका वीडियो अब सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। इस पूरे प्रयोग के जरिए उन्होंने आर्थिक रूप से कमजोर और सड़क पर जीवन बिताने वाले लोगों की परिस्थितियों को प्रत्यक्ष रूप से समझने की कोशिश की।

  • दिशा सालियान केस में CBI ने दर्ज की FIR, आदित्य ठाकरे समेत 24 नाम जांच के घेरे में; हत्या, गैंगरेप और कथित कवर-अप की धाराओं में जांच

    दिशा सालियान केस में CBI ने दर्ज की FIR, आदित्य ठाकरे समेत 24 नाम जांच के घेरे में; हत्या, गैंगरेप और कथित कवर-अप की धाराओं में जांच

    दिशा सालियान केस में CBI ने FIR दर्ज कर जांच शुरू की। आदित्य ठाकरे, उद्धव ठाकरे, रिया चक्रवर्ती समेत 24 नामों और पुलिस-FSL अधिकारियों की भूमिका की जांच होगी।

    मुंबई: दिशा सालियान की मौत के मामले में करीब छह साल बाद बड़ा कानूनी मोड़ आया है। केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI ने 14 सितंबर 2026 को FIR दर्ज कर मामले की जांच अपने हाथ में ले ली है। बॉम्बे हाईकोर्ट के 2 सितंबर 2026 के आदेश के बाद शुरू हुई इस कार्रवाई में हत्या, गैंगरेप, आपराधिक साजिश और कथित तौर पर सबूत दबाने, नष्ट करने या मामले को आत्महत्या का रूप देने जैसे आरोपों की जांच की जा रही है।

    इस FIR की सबसे बड़ी बात यह है कि जांच का दायरा सिर्फ बॉलीवुड से जुड़े कुछ नामों तक सीमित नहीं है। इसमें आदित्य ठाकरे, उद्धव ठाकरे, रिया चक्रवर्ती, शोविक चक्रवर्ती, डिनो मोरिया, सूरज पंचोली और रोहन रॉय के साथ पुलिस अधिकारियों, पोस्टमार्टम से जुड़े डॉक्टरों, फोरेंसिक अधिकारियों और मालवणी पुलिस से जुड़े अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई गई है।

    CBI FIR में किन-किन लोगों के नाम?

    दिशा सालियान के पिता सतीश सालियान की शिकायत और बाद में CBI के सामने दर्ज बयान के आधार पर सामने आई जानकारी में निम्न नाम और पदों का उल्लेख किया गया है:

    1. आदित्य ठाकरे
    2. रोहन रॉय
    3. डिनो मोरिया
    4. सूरज पंचोली
    5. आदित्य ठाकरे के बॉडीगार्ड
    6. रिया चक्रवर्ती
    7. शोविक चक्रवर्ती
    8. सचिन वाजे
    9. परमबीर सिंह
    10. DCP विशाल ठाकुर
    11. उद्धव ठाकरे
    12. अनिल देशमुख
    13. API अशोक देवाड़े
    14. PI जगदेव कलापड़
    15. PI शैलेंद्र नगरकर
    16. PI चिमाजी आढाव
    17. PI अर्जुन राजाने
    18. मालवणी पुलिस स्टेशन के संबंधित अधिकारी
    19. देरी से पोस्टमार्टम से जुड़े डॉक्टर और स्टाफ
    20. डॉ. संजय जाधव
    21. कालिना स्थित फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी के संबंधित अधिकारी
    22. N.P. भाले, Assistant Chemical Analyser
    23. तत्कालीन संबंधित PI
    24. अन्य पुलिस अधिकारी

    इस तरह CBI की जांच का दायरा कथित घटना में मौजूद लोगों से लेकर उस समय की पुलिस जांच और फोरेंसिक प्रक्रिया तक पहुंचता है।

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    FIR में हत्या, गैंगरेप और कथित साजिश की जांच

    CBI FIR में मुख्य आपराधिक आरोपों के साथ criminal conspiracy, कथित तौर पर आत्महत्या की झूठी कहानी तैयार करने और उसे आगे बढ़ाने तथा सबूतों को दबाने, नष्ट करने या उनमें हेरफेर किए जाने के पहलुओं की जांच का उल्लेख है। FIR में सरकारी अधिकारियों और पुलिस मशीनरी की भूमिका से जुड़े आरोपों की भी जांच की जा रही है।

    दिशा के पिता सतीश सालियान ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि उनकी बेटी की मौत को जिस तरह पेश किया गया, उसमें गंभीर सवाल हैं। परिवार की ओर से हत्या और गैंगरेप के आरोप भी लगाए गए हैं। CBI अब इन आरोपों के पीछे उपलब्ध साक्ष्यों और घटनाक्रम की स्वतंत्र जांच करेगी।

    आदित्य ठाकरे से लेकर रिया चक्रवर्ती तक नाम क्यों महत्वपूर्ण?

    इस मामले में आदित्य ठाकरे का नाम सबसे ज्यादा राजनीतिक चर्चा का विषय रहा है। FIR में उनके साथ उनके बॉडीगार्ड्स का भी उल्लेख है।

    इसके अलावा रोहन रॉय की भूमिका जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण है क्योंकि दिशा जिस फ्लैट में मौजूद थीं, वह रोहन रॉय से जुड़ा था।

    डिनो मोरिया और सूरज पंचोली के नाम भी शिकायत और जांच के संदर्भ में सामने आए हैं। इसी तरह रिया चक्रवर्ती और शोविक चक्रवर्ती के नाम भी FIR में जांच के दायरे में बताए गए हैं।

    दिशा के पिता की ओर से CBI को दिए गए बयान में इन नामों के अलावा अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच की मांग की गई थी।

    सचिन वाजे, परमबीर सिंह और DCP विशाल ठाकुर की भूमिका की भी जांच

    FIR का दूसरा बड़ा हिस्सा पुलिस और प्रशासनिक भूमिका से जुड़ा है।

    सचिन वाजे, पूर्व मुंबई पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह और DCP विशाल ठाकुर के साथ तत्कालीन पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच का उल्लेख है।

    इसके साथ ही API अशोक देवाड़े, PI जगदेव कलापड़, PI शैलेंद्र नगरकर, PI चिमाजी आधव और PI अर्जुन राजाने के नाम भी सामने आए हैं।

    मालवणी पुलिस स्टेशन के संबंधित अधिकारियों और तत्कालीन संबंधित PI की भूमिका भी जांच का हिस्सा है।

    यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दिशा की मौत के बाद शुरुआती जांच मालवणी पुलिस ने की थी और बाद में मामले में पुलिस की जांच प्रक्रिया को लेकर कई सवाल उठाए गए।

    पोस्टमार्टम और FSL अधिकारियों की भूमिका भी जांच में

    CBI ने केवल पुलिस कार्रवाई तक जांच सीमित नहीं रखी है। देरी से पोस्टमार्टम से जुड़े डॉक्टर और स्टाफ तथा डॉ. संजय जाधव की भूमिका भी जांच के दायरे में है।

    इसी तरह कालिना स्थित फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी के संबंधित अधिकारियों और N.P. भाले, Assistant Chemical Analyser का नाम भी जांच से जुड़ा बताया गया है।

    इसका मतलब है कि CBI अब मेडिकल और फोरेंसिक रिकॉर्ड की भी दोबारा जांच करेगी और यह देखेगी कि घटनास्थल से लेकर पोस्टमार्टम और फोरेंसिक रिपोर्ट तैयार होने तक पूरी प्रक्रिया में क्या हुआ था।

    हाईकोर्ट ने पहले की जांच में उठाए थे गंभीर सवाल

    CBI जांच की पृष्ठभूमि में बॉम्बे हाईकोर्ट का 2 सितंबर 2026 का आदेश बेहद महत्वपूर्ण है। अदालत ने पुरानी जांच में कई ऐसी विसंगतियों का उल्लेख किया था जिनके कारण मामले की स्वतंत्र जांच की जरूरत महसूस हुई।

    इनमें स्पॉट पंचनामा तैयार करने में देरी, पुलिस की घटनास्थल पर मौजूदगी की टाइमलाइन, ADR दर्ज करने के समय से जुड़े सवाल, CCTV रिकॉर्ड, घटनास्थल से खून के नमूने का मुद्दा, पोस्टमार्टम में दर्ज चोटें, कमरे के दरवाजे को लेकर विरोधाभास, FSL और मेडिकल रिकॉर्ड में अंतर तथा मोबाइल और लैपटॉप की जांच में हुई देरी शामिल थीं।

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि करीब छह साल तक चली जांच ने कई सवालों का समाधान करने के बजाय और सवाल खड़े किए। इसी कारण CBI को मामले की स्वतंत्र जांच सौंपने का आदेश दिया गया।

    पहले पुलिस और SIT का क्या निष्कर्ष था?

    दिशा सालियान की मौत के बाद मुंबई पुलिस ने मामले को ADR के तौर पर दर्ज किया था। बाद की पुलिस जांच और SIT की जांच में मौत को आत्महत्या की दिशा में देखा गया और पुलिस ने foul play के पर्याप्त सबूत नहीं मिलने की बात कही थी।

    SIT ने भी पुराने रिकॉर्ड, CCTV, कॉल डिटेल और गवाहों से जुड़ी जानकारी की दोबारा समीक्षा की थी। उसकी रिपोर्ट भी आत्महत्या के पहले के निष्कर्ष से अलग नहीं गई थी।

    अब CBI उसी जांच रिकॉर्ड, मेडिकल दस्तावेज, CCTV फुटेज, डिजिटल सामग्री, फोरेंसिक रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों की स्वतंत्र तरीके से जांच करेगी।

    दिशा सालियान और सुशांत सिंह राजपूत की मौत का कनेक्शन

    दिशा सालियान की मौत 8 जून 2020 को हुई थी और सुशांत सिंह राजपूत की मौत 14 जून 2020 को। दोनों घटनाओं के बीच छह दिन का अंतर होने के कारण दोनों मामलों को लेकर लगातार सवाल उठते रहे।

    दिशा के मामले में आदित्य ठाकरे, रिया चक्रवर्ती, शोविक चक्रवर्ती, डिनो मोरिया, सूरज पंचोली, रोहन रॉय और अन्य नामों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं।

    अब CBI की जांच में यदि दोनों घटनाओं के बीच कोई प्रमाणित आपराधिक कड़ी सामने आती है तो एजेंसी उस दिशा में भी जांच आगे बढ़ा सकती है। फिलहाल दोनों मामलों की जांच अलग-अलग रही है।

    अब CBI की जांच में क्या होगा?

    CBI अब पूरे मामले की घटनाक्रम के स्तर पर जांच करेगी। इसमें मुख्य रूप से यह देखा जाएगा कि 8 जून 2020 की रात क्या हुआ, दिशा किन लोगों के संपर्क में थीं, घटनास्थल पर कौन मौजूद था, CCTV और डिजिटल रिकॉर्ड क्या बताते हैं और पहले की पुलिस जांच में सामने आए विरोधाभासों की वास्तविक वजह क्या थी।

    इसके साथ ही एजेंसी:

    • हत्या के आरोपों की जांच करेगी
    • गैंगरेप के आरोपों की जांच करेगी
    • कथित आपराधिक साजिश की जांच करेगी
    • कथित कवर-अप और सबूत दबाने के आरोपों की जांच करेगी
    • पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई की जांच करेगी
    • पोस्टमार्टम और मेडिकल रिकॉर्ड की जांच करेगी
    • FSL और Chemical Analysis से जुड़े रिकॉर्ड की जांच करेगी
    • CCTV, मोबाइल, लैपटॉप और अन्य डिजिटल सामग्री की दोबारा जांच करेगी
    • FIR में नामित सभी व्यक्तियों की भूमिका को उपलब्ध सबूतों के आधार पर परखेगी

    अब छह साल पुराने केस में सामने आएगा असली घटनाक्रम?

    दिशा सालियान केस में CBI की FIR ने छह साल पुराने मामले को फिर से जांच के केंद्र में ला दिया है। इस बार जांच का दायरा केवल दिशा की मौत के कारण तक सीमित नहीं है, बल्कि घटना, कथित हत्या और गैंगरेप, आपराधिक साजिश, पुलिस जांच, पोस्टमार्टम, फोरेंसिक प्रक्रिया और कथित कवर-अप तक फैला हुआ है।

    सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि FIR में आदित्य ठाकरे, रोहन रॉय, डिनो मोरिया, सूरज पंचोली, आदित्य ठाकरे के बॉडीगार्ड, रिया चक्रवर्ती, शोविक चक्रवर्ती, सचिन वाजे, परमबीर सिंह, DCP विशाल ठाकुर, उद्धव ठाकरे, अनिल देशमुख, API अशोक देवाड़े, PI जगदेव कलापड़, PI शैलेंद्र नगरकर, PI चिमाजी आढाव, PI अर्जुन राजाने, डॉ. संजय जाधव, N.P. भाले और संबंधित पुलिस, मेडिकल, FSL व सुरक्षा अधिकारियों समेत पूरी जांच प्रक्रिया से जुड़े लोगों की भूमिका सामने आई है।

    अब CBI की जांच यह तय करेगी कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में से किन आरोपों को उपलब्ध साक्ष्य समर्थन देते हैं और 8 जून 2020 की रात दिशा सालियान के साथ वास्तव में क्या हुआ था।

  • Rajasthan Nikay Chunav Result 2026: BJP का दबदबा, जयपुर में 95 वार्ड जीते; झालावाड़ में कांग्रेस का बड़ा उलटफेर**

    Rajasthan Nikay Chunav Result 2026: BJP का दबदबा, जयपुर में 95 वार्ड जीते; झालावाड़ में कांग्रेस का बड़ा उलटफेर**

    Rajasthan Nikay Chunav Result 2026 में BJP ने बढ़त बनाई है। जयपुर में 95 वार्ड जीते, जबकि झालावाड़ में कांग्रेस के प्रदर्शन ने मुकाबले को रोचक बना दिया।

    Rajasthan Nikay Chunav Result 2026: राजस्थान के 309 नगरीय निकायों के चुनाव की मतगणना सोमवार सुबह 8 बजे से जारी है। शुरुआती और घोषित नतीजों में बीजेपी ने कांग्रेस पर बढ़त बनाई है, लेकिन तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है। जयपुर में बीजेपी ने 150 में से 95 वार्ड जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है, जबकि कांग्रेस 43 वार्डों में विजयी रही। दूसरी ओर, झालावाड़ में कांग्रेस ने 45 में से 29 वार्ड जीतकर बीजेपी को बड़ा झटका दिया है।

    राजस्थान निकाय चुनाव 2026 में 10,245 पार्षद पदों के लिए 309 शहरी निकायों में मतदान हुआ था। इनमें 10 नगर निगम, 51 नगर परिषद और 248 नगरपालिकाएं शामिल हैं। मतदान 9 और 11 सितंबर को दो चरणों में कराया गया था और आज नतीजे सामने आ रहे हैं।

    राजस्थान निकाय चुनाव में अब तक क्या तस्वीर?

    राज्यभर में मतगणना आगे बढ़ने के साथ बीजेपी का प्रदर्शन मजबूत दिखाई दे रहा है। उपलब्ध घोषित नतीजों में बीजेपी 163 वार्ड जीत चुकी थी, जबकि कांग्रेस ने 103 और निर्दलीय उम्मीदवारों ने 43 वार्डों में जीत दर्ज की थी। हालांकि यह आंकड़ा मतगणना के दौरान लगातार बढ़ रहा है, इसलिए इसे अंतिम statewide tally नहीं माना जा सकता।

    यही वजह है कि राजस्थान निकाय चुनाव का पूरा परिणाम समझने के लिए सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस की कुल सीटों को देखना पर्याप्त नहीं होगा। कई शहरों में निर्दलीय और अन्य दल बोर्ड गठन के समय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

    जयपुर में BJP की बड़ी जीत

    राजस्थान की राजधानी जयपुर में बीजेपी ने सबसे मजबूत प्रदर्शन किया है। 150 वार्डों में से बीजेपी ने 95 सीटें जीतकर बहुमत हासिल कर लिया, जबकि कांग्रेस को 43 सीटें मिलीं। इस परिणाम के साथ जयपुर नगर निगम में बोर्ड बनाने के लिए बीजेपी की स्थिति स्पष्ट रूप से मजबूत हो गई है।

    जयपुर का परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राजधानी राज्य की सबसे बड़ी शहरी राजनीतिक लड़ाइयों में शामिल थी। निकाय चुनाव में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक प्रतिष्ठा भी दांव पर थी।

    झालावाड़ में कांग्रेस ने पलटा समीकरण

    जहां जयपुर में बीजेपी ने बढ़त बनाई, वहीं झालावाड़ ने चुनावी तस्वीर में सबसे बड़ा उलटफेर किया है। झालावाड़ नगर परिषद के 45 वार्डों में कांग्रेस ने 29 सीटों पर जीत दर्ज की है। यह परिणाम बीजेपी के लिए इसलिए महत्वपूर्ण झटका माना जा रहा है क्योंकि झालावाड़ को लंबे समय से बीजेपी का मजबूत राजनीतिक आधार और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का प्रभाव क्षेत्र माना जाता रहा है।

    इस नतीजे ने यह भी संकेत दिया है कि राजस्थान के शहरी निकाय चुनाव में बीजेपी की statewide बढ़त के बावजूद हर क्षेत्र में मुकाबला एक जैसा नहीं रहा।

    Baran में AAP ने चौंकाया

    राजस्थान निकाय चुनाव में आम आदमी पार्टी ने भी कुछ क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। बारां नगर परिषद के शुरुआती घोषित नतीजों में AAP का प्रदर्शन खास तौर पर चर्चा में रहा। उपलब्ध अपडेट में 25 घोषित वार्डों में AAP ने 16, कांग्रेस ने 6 और बीजेपी ने 3 वार्ड जीते थे। यह पूरे 60 वार्डों का अंतिम परिणाम नहीं है, इसलिए अंतिम तस्वीर के लिए आगे की counting देखना जरूरी है।

    अगर बारां में AAP का प्रदर्शन अंतिम परिणाम में भी मजबूत रहता है, तो यह राजस्थान की स्थानीय राजनीति में बीजेपी-कांग्रेस के बीच तीसरी राजनीतिक ताकत की संभावनाओं को लेकर चर्चा बढ़ा सकता है।

    कई शहरों में असली मुकाबला बोर्ड बनाने का

    निकाय चुनाव में पार्षदों के नतीजे आने के बाद अगली बड़ी लड़ाई बोर्ड गठन की होगी। खासकर उन नगर निकायों में जहां बीजेपी या कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, वहां निर्दलीय पार्षदों और अन्य दलों की भूमिका बढ़ सकती है।

    इसीलिए किसी शहर में सबसे ज्यादा वार्ड जीतना और तुरंत यह मान लेना कि उसी पार्टी का बोर्ड बन गया, हमेशा सही नहीं होगा। जहां मुकाबला करीबी है, वहां अगले कुछ दिनों में पार्षदों का समर्थन और राजनीतिक समीकरण महत्वपूर्ण होंगे।

    21 सितंबर को होगा मेयर और अध्यक्ष पद का चुनाव

    आज पार्षदों के चुनाव परिणाम सामने आ रहे हैं, लेकिन निकायों की राजनीतिक तस्वीर का अगला अहम चरण अभी बाकी है। चुनाव कार्यक्रम के अनुसार 21 सितंबर को महापौर, नगर परिषद सभापति और नगरपालिका अध्यक्ष के चुनाव होंगे। इसके अगले दिन यानी 22 सितंबर को उपमहापौर, उपसभापति और नगरपालिका उपाध्यक्ष के चुनाव होंगे।

    इसका मतलब है कि 14 सितंबर के परिणाम के बाद भी कई निकायों में राजनीतिक गतिविधियां तेज रह सकती हैं।

    2028 के लिए कितना बड़ा राजनीतिक संकेत?

    राजस्थान निकाय चुनाव को 2028 विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी और कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। BJP के लिए बड़े शहरी निकायों में मजबूत प्रदर्शन मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा सरकार के लिए राजनीतिक बढ़त के तौर पर देखा जा सकता है।

    लेकिन अभी इन नतीजों को 2028 विधानसभा चुनाव का सीधा संकेत या भविष्यवाणी मानना जल्दबाजी होगी। झालावाड़ जैसे क्षेत्रों में कांग्रेस की बड़ी जीत और कुछ निकायों में करीबी मुकाबला बताता है कि राजस्थान का urban political map पूरी तरह एकतरफा नहीं हुआ है।

    मतदाताओं ने भी बड़ी संख्या में किया मतदान

    इस चुनाव में मतदान प्रतिशत भी महत्वपूर्ण रहा। पहले चरण में करीब 76.42 प्रतिशत और दूसरे चरण में 70.68 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। कुल मिलाकर 1.44 करोड़ से अधिक मतदाता इस चुनाव प्रक्रिया से जुड़े थे।

    इतने बड़े मतदान के बाद अब राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि अलग-अलग शहरों में स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवारों और पार्टी संगठन ने परिणामों को कितना प्रभावित किया।

    अब आगे क्या?

    14 सितंबर को पार्षदों के परिणामों के बाद अब नजर उन नगर निकायों पर रहेगी जहां बहुमत का आंकड़ा स्पष्ट नहीं है। जयपुर जैसे शहरों में तस्वीर साफ हो चुकी है, जबकि करीबी मुकाबले वाले निकायों में अगले कुछ दिन बोर्ड गठन के लिए महत्वपूर्ण होंगे।

    इसके बाद 21 सितंबर को मेयर और अध्यक्ष पदों का चुनाव और 22 सितंबर को उपमहापौर, उपसभापति और उपाध्यक्ष पदों का चुनाव होगा। इसलिए राजस्थान निकाय चुनाव 2026 की पूरी राजनीतिक तस्वीर आज के वार्ड परिणामों के साथ खत्म नहीं होगी।

    राजस्थान निकाय चुनाव 2026 की मतगणना के साथ अब सबसे बड़ा सवाल यही है—कहां BJP का बोर्ड बनेगा, कहां कांग्रेस वापसी करेगी और किन शहरों में निर्दलीय तय करेंगे कि सत्ता किसके हाथ जाएगी।

  • नितेश राणे के करीबी दाऊद शेख ने छोड़ी भाजपा, सैकड़ों कार्यकर्ताओं संग मनसे में शामिल

    नितेश राणे के करीबी दाऊद शेख ने छोड़ी भाजपा, सैकड़ों कार्यकर्ताओं संग मनसे में शामिल

    मुंबई में भाजपा को झटका, नितेश राणे के करीबी दाऊद शेख सैकड़ों कार्यकर्ताओं के साथ मनसे में शामिल हुए। जानिए उनकी राजनीतिक यात्रा और असर।

    मुंबई: मुंबई की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तहत भाजपा युवा मोर्चा के उत्तर-पश्चिम मुंबई उपनगर के पूर्व उपाध्यक्ष दाऊद शेख ने भाजपा छोड़कर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का दामन थाम लिया है। दाऊद शेख के साथ सैकड़ों पदाधिकारी और कार्यकर्ताओं के मनसे में शामिल होने की जानकारी सामने आई है। यह प्रवेश अमित ठाकरे की मौजूदगी में हुआ।

    इस घटनाक्रम को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि दाऊद शेख की राजनीतिक यात्रा लंबे समय तक राणे परिवार की राजनीतिक धारा से जुड़ी रही है। उनकी राजनीति की शुरुआत स्वाभिमान संगठन से हुई थी और वे शुरू से इस संगठन से जुड़े रहे।

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    कार्यक्रम के दौरान बाहर जमा कार्यकर्ताओं की तस्वीर

    स्वाभिमान संगठन से शुरू हुई दाऊद शेख की राजनीतिक यात्रा

    दाऊद शेख का राजनीतिक सफर सीधे भाजपा से शुरू नहीं हुआ था। वे पहले स्वाभिमान संगठन से जुड़े थे, जिसका नेतृत्व राणे परिवार की राजनीतिक धारा से जुड़ा रहा। बाद में जब स्वाभिमान संगठन का भाजपा में विलय हुआ, तब दाऊद शेख भी भाजपा में शामिल हुए।

    इसी राजनीतिक यात्रा के दौरान वे नारायण राणे और नितेश राणे के सान्निध्य में सक्रिय रहे। बाद में भाजपा संगठन में उनकी सक्रियता बढ़ी और उन्होंने भाजपा युवा मोर्चा में उत्तर-पश्चिम मुंबई उपनगर के स्तर पर जिम्मेदारी संभाली।

    यही कारण है कि दाऊद शेख का भाजपा छोड़कर मनसे में जाना केवल एक सामान्य दल-बदल की घटना नहीं माना जा रहा है। उनके लंबे राजनीतिक सफर और राणे परिवार से पुराने जुड़ाव के कारण इस फैसले ने मुंबई के राजनीतिक हलकों का ध्यान खींचा है।

    भाजपा-मनसे के बढ़ते टकराव के बीच लिया फैसला

    दाऊद शेख का मनसे में प्रवेश ऐसे समय हुआ है जब भाजपा और मनसे के बीच राजनीतिक टकराव पहले से तेज है। पुणे के एक सरकारी कॉलेज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर हटाने के विवाद के बाद दोनों दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच बयानबाजी तथा विरोध प्रदर्शन बढ़े थे।

    अमित ठाकरे के खिलाफ भाजपा युवा मोर्चा के आंदोलन को लेकर भी विवाद हुआ था। इस दौरान भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण ने युवा मोर्चा की आंदोलन शैली पर नाराजगी जताते हुए कार्यकर्ताओं को संयमित और सकारात्मक तरीके से काम करने की सलाह दी थी।

    इसके बाद मुंबई में भाजपा और मनसे के कार्यकर्ताओं के बीच तनावपूर्ण स्थिति भी सामने आई। ऐसे राजनीतिक माहौल के बीच दाऊद शेख का भाजपा से निकलकर अमित ठाकरे की मौजूदगी में मनसे में शामिल होना इस घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बनाता है।

    भाजपा छोड़ने की वजह पर अभी स्पष्ट बयान नहीं

    दाऊद शेख के मनसे में शामिल होने की खबर सामने आ चुकी है, लेकिन उन्होंने भाजपा छोड़ने का विस्तृत कारण क्या बताया है, इस बारे में उपलब्ध जानकारी में कोई स्पष्ट सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया है।

    इसी तरह उनके साथ मनसे में शामिल हुए पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की सटीक संख्या भी स्पष्ट नहीं की गई है। फिलहाल जानकारी सैकड़ों कार्यकर्ताओं के प्रवेश की है।

    भाजपा की ओर से दाऊद शेख के जाने और उनके साथ कार्यकर्ताओं के मनसे में शामिल होने पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है। नितेश राणे की ओर से इस घटनाक्रम पर कोई स्पष्ट सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आती है तो यह इस राजनीतिक घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बना सकती है।

    उत्तर-पश्चिम मुंबई में क्या पड़ सकता है असर?

    दाऊद शेख लंबे समय से उत्तर-पश्चिम मुंबई के राजनीतिक और संगठनात्मक क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। ऐसे में उनके साथ स्थानीय स्तर के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं का मनसे में जाना संगठनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    हालांकि, केवल इस प्रवेश के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि भाजपा के चुनावी आधार पर कोई बड़ा असर पड़ गया है। इसका वास्तविक राजनीतिक प्रभाव इस बात से तय होगा कि दाऊद शेख के साथ गए कार्यकर्ता मनसे के संगठन में कितनी सक्रिय भूमिका निभाते हैं और उन्हें पार्टी में आगे क्या जिम्मेदारी दी जाती है।

    फिलहाल सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि स्वाभिमान संगठन से शुरू होकर राणे परिवार की राजनीतिक धारा और फिर भाजपा तक पहुंचे दाऊद शेख ने अब मनसे का रास्ता क्यों चुना। आने वाले दिनों में दाऊद शेख, भाजपा और मनसे की ओर से आने वाले बयानों से इस फैसले के पीछे की राजनीतिक तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।

  • कुरार के वाघेश्वरी मंदिर को संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के पर्यटन मानचित्र में शामिल करने की मांग, वन मंत्री की बैठक

    कुरार के वाघेश्वरी मंदिर को संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के पर्यटन मानचित्र में शामिल करने की मांग, वन मंत्री की बैठक

    कुरार के प्राचीन वाघेश्वरी मंदिर को संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के पर्यटन स्थलों में शामिल करने की मांग पर वन मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए।

    मुंबई: मलाड (पूर्व) कुरार गांव स्थित प्राचीन वाघेश्वरी मंदिर को संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के आधिकारिक पर्यटन स्थलों में शामिल करने की मांग को लेकर बुधवार को मंत्रालय में महत्वपूर्ण बैठक हुई। शिवसेना विधायक सुनील प्रभु की मांग पर हुई इस बैठक में वन मंत्री गणेश नाईक ने अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करते हुए आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश दिए। मंदिर तक पहुंचने वाले रास्ते में सुधार और श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ को देखते हुए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने पर भी चर्चा हुई।

    विधायक सुनील प्रभु ने इस संबंध में 26 जून 2026 को वन मंत्री को लिखित पत्र दिया था। उनका कहना है कि कुरार गांव की ग्रामदेवता के रूप में प्रसिद्ध वाघेश्वरी मंदिर को संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के अन्य पर्यटन स्थलों की तरह आधिकारिक पर्यटन मानचित्र में स्थान मिलना चाहिए। मंदिर ट्रस्ट की ओर से सामाजिक कार्यकर्ता बाबूभाई भवानजी ने भी वन मंत्री को निवेदन दिया था।

    मंदिर तक पहुंच और श्रद्धालुओं की सुविधा पर जोर

    बैठक में मंदिर तक जाने वाले रास्ते को बेहतर और सुगम बनाने का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। नवरात्रि सहित वर्षभर यहां श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। स्थानीय महिलाओं के बीच मंदिर में ओटी भरने की परंपरा भी लंबे समय से चली आ रही है।

    वन मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि श्रद्धालुओं की संख्या और भीड़ को ध्यान में रखते हुए उचित व्यवस्था की जाए। इसमें मंदिर तक पहुंच की सुविधा और भीड़ के समय आने वाली संभावित परेशानियों को दूर करने पर ध्यान देने की बात कही गई।

    हालांकि, बैठक के बाद वाघेश्वरी मंदिर को संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान का आधिकारिक पर्यटन स्थल घोषित किए जाने की जानकारी सामने नहीं आई है। फिलहाल मामला मांग, बैठक और अधिकारियों को दिए गए निर्देशों के स्तर पर है।

    एसजीएनपी में पहले से बढ़ रहा है पर्यटन ढांचा

    वाघेश्वरी मंदिर को पर्यटन मानचित्र में शामिल करने की मांग ऐसे समय में सामने आई है, जब संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में पर्यटन सुविधाओं को बढ़ाने की व्यापक योजना पर काम चल रहा है। मार्च 2026 में वन मंत्री गणेश नाईक ने उद्यान के लिए करीब 775 करोड़ रुपये के प्रस्तावित विकास खाके की जानकारी दी थी। इसमें तेंदुआ सफारी, नौकायन सुविधाओं में सुधार, पदयात्रा मार्ग और पर्यटकों के लिए नई व्यवस्थाएं शामिल हैं।

    महाराष्ट्र सरकार ने इसी वर्ष संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान के पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र के लिए क्षेत्रीय मास्टर प्लान को भी मंजूरी दी है। इसमें नियंत्रित और टिकाऊ पर्यटन के साथ पर्यटक सुविधाओं, प्रकृति मार्गों, जानकारी केंद्रों तथा सांस्कृतिक विरासत स्थलों के संरक्षण पर जोर दिया गया है।

    वर्तमान में महाराष्ट्र पर्यटन विभाग की संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान संबंधी जानकारी में कान्हेरी गुफाएं, वन्यजीव और प्रकृति आधारित पर्यटन प्रमुख आकर्षणों में शामिल हैं। मुंबई उपनगर जिला प्रशासन की पर्यटन सूची में भी संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान और कान्हेरी गुफाओं सहित कई प्रमुख स्थल दर्ज हैं, जबकि वाघेश्वरी मंदिर अलग आधिकारिक पर्यटन स्थल के रूप में सूचीबद्ध नहीं है।

    विकास के साथ पर्यावरणीय नियम भी महत्वपूर्ण

    संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान संरक्षित वन क्षेत्र होने के कारण यहां किसी भी नए निर्माण या विकास कार्य को सामान्य शहरी परियोजना की तरह नहीं देखा जा सकता। उद्यान के आसपास का क्षेत्र पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र के अंतर्गत आता है और विकास गतिविधियों पर पर्यावरणीय नियंत्रण लागू हैं।

    इसके अलावा उद्यान से जुड़े अतिक्रमण और संरक्षण के मामलों में न्यायालय के निर्देश भी महत्वपूर्ण हैं। सितंबर 2026 में वन विभाग ने उद्यान के अतिक्रमण, पात्र परिवारों के पुनर्वास और सीमा सुरक्षा को लेकर समीक्षा की है।

    ऐसे में वाघेश्वरी मंदिर तक रास्ता सुधारने या पर्यटन सुविधाएं बढ़ाने की कोई भी योजना पर्यावरणीय नियमों और न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप ही आगे बढ़ानी होगी। यही वजह है कि वन मंत्री ने अधिकारियों को स्पष्ट रूप से न्यायालय के आदेशों के अधीन आवश्यक कार्यवाही करने को कहा है।

    बढ़ते पर्यटन के साथ भीड़ और पर्यावरण का सवाल

    यदि भविष्य में वाघेश्वरी मंदिर को आधिकारिक पर्यटन मानचित्र में शामिल किया जाता है, तो श्रद्धालुओं के साथ अन्य पर्यटकों की संख्या बढ़ने की संभावना होगी। इसके लिए रास्ते, पैदल आवागमन, स्वच्छता, पेयजल, सुरक्षा, आपातकालीन पहुंच और भीड़ नियंत्रण जैसी व्यवस्थाओं की जरूरत बढ़ सकती है।

    दूसरी ओर, संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में मानवीय गतिविधियों के विस्तार का असर वन क्षेत्र और वन्यजीवों पर न पड़े, यह भी महत्वपूर्ण होगा। सितंबर 2026 में उद्यान में धार्मिक आयोजनों और पर्यावरणीय नियमों को लेकर भी सवाल उठे हैं।

    इसलिए वाघेश्वरी मंदिर के विकास का अगला चरण केवल सुशोभीकरण तक सीमित नहीं रहेगा। मंदिर को पर्यटन स्थल का दर्जा देने का निर्णय होता है तो उसके साथ श्रद्धालुओं की सुविधा और उद्यान के पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना भी बड़ी चुनौती होगी।

    फिलहाल वन विभाग की बैठक के बाद अधिकारियों को आवश्यक कार्यवाही के निर्देश दिए गए हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वाघेश्वरी मंदिर को आधिकारिक पर्यटन मानचित्र में शामिल करने की मांग पर सरकार आगे क्या निर्णय लेती है और मंदिर तक पहुंच तथा श्रद्धालुओं की सुविधाओं में सुधार के लिए कौन से कार्य मंजूर किए जाते हैं।

  • महाराष्ट्र SIR: 38 सीटों में 37.51 लाख मतदाता ड्राफ्ट सूची से बाहर, मुंबई में भी बड़ा असर

    महाराष्ट्र SIR: 38 सीटों में 37.51 लाख मतदाता ड्राफ्ट सूची से बाहर, मुंबई में भी बड़ा असर

    महाराष्ट्र SIR में 38 मुस्लिम आबादी वाली सीटों पर 37.51 लाख मतदाता ड्राफ्ट सूची में आगे नहीं बढ़े। जानिए कारण, आंकड़े और अब क्या करें।

    मुंबई: महाराष्ट्र में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के बाद जारी प्रारूप मतदाता सूची ने चुनावी प्रक्रिया को लेकर नई बहस छेड़ दी है। मुस्लिम आबादी 20 प्रतिशत से अधिक वाली 38 विधानसभा सीटों में करीब 37.51 लाख मतदाता यानी 29.77 प्रतिशत पिछले मतदाता आंकड़े से प्रारूप सूची में आगे नहीं बढ़े हैं। पूरे महाराष्ट्र में यह अनुपात 21.14 प्रतिशत है।

    हालांकि, इन आंकड़ों को सीधे मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाए जाने के तौर पर देखना सही नहीं होगा। उपलब्ध आंकड़ों में मतदाताओं को धर्म के आधार पर अलग नहीं किया गया है। नाम आगे नहीं बढ़ने के पीछे स्थानांतरण, अनुपस्थिति, मृत्यु, दोहरी प्रविष्टि और अन्य कारण शामिल हैं।

    महाराष्ट्र और 38 विधानसभा सीटों में कितना अंतर?

    क्षेत्रपिछली मतदाता संख्या के मुकाबले आगे नहीं बढ़े मतदाता
    महाराष्ट्र21.14%
    मुस्लिम आबादी 20% से अधिक वाली 38 सीटें29.77%
    इन 38 सीटों में मतदाताकरीब 37.51 लाख
    पूरे महाराष्ट्र में ऐसे मतदाता2.06 करोड़ से अधिक

    इन 38 सीटों का अनुपात राज्य के औसत से करीब 8.63 प्रतिशत अंक ज्यादा है।

    भिवंडी पूर्व में करीब आधे मतदाता आगे नहीं बढ़े

    विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़ों में भिवंडी पूर्व में सबसे ज्यादा 49.10 प्रतिशत मतदाता प्रारूप सूची में आगे नहीं बढ़े। इसके बाद भिवंडी पश्चिम में 44.72 प्रतिशत और मुंब्रा-कलवा में 42.91 प्रतिशत का आंकड़ा रहा।

    विधानसभा क्षेत्रमुस्लिम आबादीप्रारूप सूची में आगे नहीं बढ़े
    भिवंडी पूर्व51.0%49.10%
    भिवंडी पश्चिम49.5%44.72%
    मुंब्रा-कलवा43.7%42.91%
    मानखुर्द शिवाजी नगर53.0%42.31%
    चांदिवली27.6%41.44%
    सायन-कोलीवाड़ा21.1%40.73%
    पुणे कैंटोनमेंट20.7%40.36%
    मालाड पश्चिम27.7%38.57%
    मुंबादेवी50.9%38.52%
    वर्सोवा33.5%38.46%
    नागपुर मध्य22.1%38.01%
    कुर्ला30.7%36.37%
    अंधेरी पश्चिम27.1%36.37%
    भायखला41.5%34.88%
    धारावी33.4%34.55%
    बांद्रा पूर्व33.1%34.44%

    इन आंकड़ों से यह जरूर पता चलता है कि कई मुस्लिम आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में प्रारूप सूची से आगे नहीं बढ़े मतदाताओं का अनुपात राज्य के औसत से काफी अधिक है। लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि ये सभी मतदाता मुस्लिम थे या धर्म के आधार पर हटाए गए।

    37.51 लाख मतदाताओं के नाम आगे क्यों नहीं बढ़े?

    यहां SIR की प्रक्रिया को समझना जरूरी है। प्रारूप सूची में नाम का आगे नहीं बढ़ना अपने आप में स्थायी रूप से मतदाता सूची से नाम हट जाना नहीं है।

    38 विधानसभा क्षेत्रों के उपलब्ध आंकड़ों में सबसे बड़ी श्रेणी स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाताओं की है। इसके बाद अनुपस्थित या पता नहीं चल पाने वाले मतदाता हैं।

    कारणहिस्सेदारी
    स्थायी रूप से स्थानांतरित42.05%
    अनुपस्थित/पता नहीं चला35.59%
    मृत12.76%
    दोहरी प्रविष्टि8.33%
    अन्यशेष

    इससे यह भी स्पष्ट होता है कि 29.77 प्रतिशत का पूरा आंकड़ा फर्जी मतदाताओं की संख्या नहीं है। इसमें ऐसे लोग भी शामिल हैं जो दूसरे स्थान पर चले गए या पुनरीक्षण के दौरान उपलब्ध नहीं मिले।

    क्या मुस्लिम आबादी ज्यादा होने पर नाम भी ज्यादा हटे?

    इस सवाल का सीधा जवाब अभी नहीं है।

    इसका सबसे बड़ा उदाहरण मालेगांव मध्य है। यहां मुस्लिम आबादी करीब 78.4 प्रतिशत है, जो इन 38 सीटों में सबसे ज्यादा है, लेकिन प्रारूप सूची में आगे नहीं बढ़े मतदाताओं का अनुपात 23.46 प्रतिशत रहा।

    विधानसभा क्षेत्रमुस्लिम आबादीआगे नहीं बढ़े मतदाता
    मालेगांव मध्य78.4%23.46%
    भिवंडी पूर्व51.0%49.10%
    मानखुर्द शिवाजी नगर53.0%42.31%
    मुंबादेवी50.9%38.52%

    इसलिए उपलब्ध आंकड़े मुस्लिम मतदाताओं की धर्म आधारित व्यापक कटौती का निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए धर्मवार मतदाता आंकड़े और व्यक्तिगत प्रविष्टियों की जांच जरूरी होगी।

    क्या सिर्फ मुस्लिम आबादी वाले इलाकों में ही ज्यादा नाम बाहर हुए?

    नहीं। यही इस मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है।

    महाराष्ट्र में 53 विधानसभा सीटों पर आगे नहीं बढ़े मतदाताओं का अनुपात 29.77 प्रतिशत से भी ज्यादा रहा। इनमें कोलाबा, खड़कवासला, कोथरूड और कल्याण ग्रामीण जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं।

    इससे संकेत मिलता है कि SIR का असर केवल मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। बड़े शहरों और तेजी से बदलती आबादी वाले इलाकों में पता बदलने, स्थानांतरण और मतदाताओं की उपलब्धता का सवाल भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

    मुंबई और ठाणे में भी बड़ा असर

    मुंबई में प्रारूप मतदाता सूची से आगे नहीं बढ़े मतदाताओं का अनुपात करीब 34.75 प्रतिशत बताया गया है। ठाणे में यह आंकड़ा करीब 38.37 प्रतिशत रहा।

    मुंबई महानगर क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग नौकरी, किराये के मकान और अन्य कारणों से एक इलाके से दूसरे इलाके में स्थानांतरित होते हैं। ऐसे में SIR के दौरान किसी पुराने पते पर मतदाता नहीं मिलने की स्थिति कई प्रविष्टियों को प्रभावित कर सकती है।

    हालांकि, किसी खास मतदाता का नाम किस कारण से आगे नहीं बढ़ा, इसका सही जवाब उसकी व्यक्तिगत प्रविष्टि और दर्ज कारण की जांच के बाद ही मिल सकता है।

    विपक्ष ने उठाए सवाल, चुनाव आयोग का जवाब भी अहम

    मतदाता सूची में इतने बड़े बदलाव को लेकर विपक्षी दलों ने सवाल उठाए हैं। विपक्षी नेताओं का दावा है कि मुंबई, मुंबई महानगर क्षेत्र और कुछ अल्पसंख्यक आबादी वाले क्षेत्रों में ज्यादा नाम प्रभावित हुए हैं। राहुल गांधी ने भी महाराष्ट्र में अलग-अलग चुनावों के दौरान मतदाताओं की संख्या में हुए बदलाव पर सवाल उठाया है।

    दूसरी ओर, चुनाव अधिकारियों का कहना है कि मौजूदा सूची प्रारूप सूची है। जिन पात्र मतदाताओं के नाम नहीं हैं, उन्हें दावा दाखिल करने का अवसर दिया गया है। इसलिए प्रारूप सूची के आंकड़े को अंतिम मतदाता सूची का आंकड़ा मानना अभी जल्दबाजी होगी।

    ड्राफ्ट सूची में नाम नहीं है तो क्या करें?

    सबसे पहले मतदाता को महाराष्ट्र की आधिकारिक चुनाव संबंधी वेबसाइट पर अपना नाम खोजकर यह देखना चाहिए कि उसका नाम प्रारूप सूची में है या नहीं और यदि नहीं है तो संबंधित कारण क्या दर्ज किया गया है।

    पात्र मतदाता का नाम शामिल नहीं है तो फॉर्म 6 के माध्यम से दावा किया जा सकता है। गलत नाम हटाने पर आपत्ति के लिए फॉर्म 7 और मतदाता सूची में नाम, पता या अन्य विवरण में सुधार के लिए फॉर्म 8 का इस्तेमाल किया जाता है।

    इसलिए अगर किसी व्यक्ति का नाम प्रारूप सूची में नहीं दिखाई दे रहा है, तो उसे इसे अंतिम रूप से नाम कटने की स्थिति मानकर चुप नहीं बैठना चाहिए।

    30 सितंबर तक मिलेगा दावा करने का मौका

    SIR की प्रारूप सूची जारी होने के बाद दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की प्रक्रिया 30 सितंबर 2026 तक चलेगी। इसके बाद दावों की जांच और निपटारे की प्रक्रिया होगी।

    अंतिम मतदाता सूची 4 नवंबर 2026 को प्रकाशित होने वाली है।

    यानी अभी सामने आया 29.77 प्रतिशत का आंकड़ा अंतिम स्थिति नहीं है। असली तस्वीर तब स्पष्ट होगी जब दावों और आपत्तियों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अंतिम सूची जारी होगी।

    अब सबसे बड़ा सवाल क्या है?

    महाराष्ट्र SIR के आंकड़े निश्चित तौर पर एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करते हैं। मुस्लिम आबादी 20 प्रतिशत से अधिक वाली 38 सीटों में प्रारूप सूची से आगे नहीं बढ़े मतदाताओं का अनुपात राज्य के औसत से करीब 8.63 प्रतिशत अंक ज्यादा है।

    लेकिन इस अंतर को केवल धार्मिक आधार पर मतदाता हटाए जाने का प्रमाण मानना उपलब्ध आंकड़ों से संभव नहीं है। अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह देखना होगी कि 30 सितंबर तक कितने पात्र मतदाता दावा दाखिल करते हैं और 4 नवंबर की अंतिम सूची में कितने नाम वापस जुड़ते हैं।

    यही अंतिम आंकड़ा बताएगा कि SIR के दौरान सामने आया बड़ा अंतर वास्तविक मतदाता बदलाव कितना था और प्रारूप स्तर पर हुई अनुपलब्धता या अन्य प्रविष्टियों का हिस्सा कितना।

  • संजय दत्त को मराठी सीखने का न्योता, अभिजीत राणे बोले- हमारी कक्षा में आइए

    संजय दत्त को मराठी सीखने का न्योता, अभिजीत राणे बोले- हमारी कक्षा में आइए

    संजय दत्त के मराठी बयान पर विवाद के बीच अभिजीत राणे ने उन्हें मराठी प्रशिक्षण कक्षा में आने का न्योता दिया। जानिए पूरा मामला और सरकार का नियम।

    मुंबई: संजय दत्त के मराठी भाषा को लेकर दिए गए बयान पर चर्चा के बीच भाजपा कामगार आघाड़ी के अध्यक्ष अभिजीत राणे ने अभिनेता को मराठी सीखने के लिए अपनी प्रशिक्षण कक्षा में आने का न्योता दिया है। यह निमंत्रण गोरेगांव पश्चिम के बांगुर नगर स्थित अय्यप्पा मंदिर परिसर में आयोजित मराठी प्रशिक्षण कक्षा के प्रमाणपत्र वितरण समारोह में दिया गया।

    महाराष्ट्र शासन के परिवहन विभाग, राज्य मराठी विकास संस्था, कोकण मराठी साहित्य परिषद तथा धड़क कामगार यूनियन महासंघ की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में गैर-मराठी भाषी रिक्शा चालकों को प्रशिक्षण दिया गया। आयोजकों के अनुसार, करीब 5,000 चालकों को प्रमाणपत्र वितरित किए गए।

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    कार्यक्रम की तस्वीर

    दहीहंडी में संजय दत्त ने क्या कहा था?

    हाल ही में दहीहंडी कार्यक्रम में परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक की मौजूदगी में संजय दत्त से मराठी में बोलने का आग्रह किया गया था। इसके जवाब में अभिनेता ने मजाकिया अंदाज में कहा था कि वह छह साल येरवडा जेल में रहे, लेकिन फिर भी मराठी नहीं सीख पाए। उनका यह वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर तेजी से प्रसारित हुआ।

    इसी घटनाक्रम के बाद राणे ने संजय दत्त को अपनी मराठी प्रशिक्षण कक्षा में प्रवेश लेने का निमंत्रण दिया है।

    मंत्री ने वायरल वीडियो पर क्या सफाई दी?

    विवाद बढ़ने के बाद परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने कहा कि संजय दत्त ने कार्यक्रम में मराठी बोली थी और प्रसारित किया जा रहा वीडियो काटकर संदर्भ से अलग पेश किया गया है।

    इस बीच संजय दत्त का एक पुराना वीडियो भी सामने आया, जिसमें वह मराठी में बातचीत करते दिखाई दे रहे हैं। इससे अभिनेता के मराठी ज्ञान को लेकर चर्चा और तेज हुई। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है कि उन्होंने जानबूझकर मराठी बोलने से इनकार किया था।

    महाराष्ट्र में चालकों को मराठी क्यों सिखाई जा रही है?

    राणे का निमंत्रण महाराष्ट्र में चल रहे मराठी प्रशिक्षण अभियान से जुड़ा है। सरकार की पहल के तहत रिक्शा, टैक्सी और अन्य व्यावसायिक यात्री वाहन चालकों को रोजमर्रा के कामकाज में इस्तेमाल होने वाली मराठी सिखाई जा रही है।

    प्रशिक्षण में साहित्यिक या कठिन भाषा के बजाय यात्रियों से बातचीत, गंतव्य पूछने, किराया बताने, मीटर और यात्रा से जुड़ी सामान्य बातचीत जैसे व्यावहारिक विषयों पर जोर दिया जा रहा है।

    अगस्त के अंत तक सामने आए आंकड़ों के अनुसार, राज्य में करीब 1.65 लाख व्यावसायिक वाहन चालकों को इस तरह का प्रशिक्षण दिया जा चुका था।

    क्या मराठी सीखना चालकों के लिए जरूरी है?

    महाराष्ट्र में रिक्शा, टैक्सी और अन्य व्यावसायिक यात्री वाहन चालकों के लिए मराठी के व्यावहारिक ज्ञान से जुड़े नियम लागू किए गए हैं। अगस्त 2026 में नियमों में बदलाव के बाद इसका दायरा ऐप आधारित कैब चालकों और संबंधित परमिट धारकों तक भी बढ़ाया गया।

    हालांकि, नियमों के पालन के लिए चालकों को अतिरिक्त समय दिया गया है। ऐप आधारित कैब चालकों की ओर से नियम को अदालत में चुनौती दिए जाने के बाद राज्य सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट को बताया था कि उन्हें मराठी सीखने के लिए एक साल का अतिरिक्त समय दिया जाएगा।

    इससे साफ है कि प्रशिक्षण की नीति खत्म नहीं हुई है, बल्कि नियमों का पालन करने के लिए चालकों को समय दिया गया है।

    कार्यक्रम में कौन-कौन मौजूद रहा?

    प्रमाणपत्र वितरण समारोह में भाजपा मुंबई के महासचिव आचार्य पवन त्रिपाठी, भाजपा मुंबई के महासचिव विनोद शेलार, सूचना के अधिकार कार्यकर्ता अनिल गलगली तथा धड़क कामगार यूनियन और भाजपा कामगार आघाड़ी के पदाधिकारी मौजूद रहे।

    संजय दत्त को मराठी कक्षा में शामिल होने का अभिजीत राणे का निमंत्रण अब इस पूरे घटनाक्रम में नया मोड़ है। अभिनेता की ओर से इस निमंत्रण पर कोई प्रतिक्रिया सामने आती है या वह प्रशिक्षण कक्षा में शामिल होते हैं, इस पर आगे नजर रहेगी।

  • ठाकरे गुट के 14 विधायक शिंदे के संपर्क में? जल्द ‘Operation Tiger-4’ का दावा

    ठाकरे गुट के 14 विधायक शिंदे के संपर्क में? जल्द ‘Operation Tiger-4’ का दावा

    महाराष्ट्र में Operation Tiger-4 की चर्चा तेज, 14 UBT विधायकों के शिंदे गुट के संपर्क में होने का दावा। जानिए क्या है पूरा मामला और कितनी है पुष्टि।

    मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़े उलटफेर की चर्चा तेज हो गई है। दावा किया गया है कि उद्धव ठाकरे गुट के 14 विधायक एकनाथ शिंदे के संपर्क में हैं और जल्द ‘Operation Tiger-4’ देखने को मिल सकता है।

    एकनाथ शिंदे गुट के शिवसेना विधायक मुरजी पटेल ने सोमवार को यह दावा करते हुए कहा कि इन विधायकों के शिंदे गुट में आने के लिए नेतृत्व के ‘ग्रीन सिग्नल’ का इंतजार है। उन्होंने यह भी कहा कि विधायकों के बाद कुछ नगरसेवक भी शिंदे गुट का रुख कर सकते हैं।

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    कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से बात करते विधायक मर्जी पटेल की तस्वीर

    14 विधायकों का आंकड़ा क्यों अहम है?

    उद्धव ठाकरे गुट के पास विधानसभा में 20 विधायक हैं। ऐसे में 14 विधायक दो-तिहाई संख्या बनाते हैं, इसलिए यह आंकड़ा दल-बदल कानून के लिहाज से महत्वपूर्ण है। हालांकि, केवल 14 विधायकों के अलग होने से अयोग्यता से सुरक्षा अपने आप तय नहीं होती। संविधान की दसवीं अनुसूची में विलय से जुड़ी विशेष शर्तें लागू होती हैं।

    Operation Tiger-4 से पहले क्या हुआ?

    जून 2026 में ठाकरे गुट के छह लोकसभा सांसद शिंदे की शिवसेना में शामिल हुए थे। इसके बाद इसे Operation Tiger की सफलता बताया गया। बाद में विधायकों और स्थानीय स्तर के नेताओं को लेकर भी इसी तरह के दावे सामने आते रहे।

    अब 14 विधायकों के संपर्क में होने के दावे ने इस राजनीतिक अभियान के अगले चरण की चर्चा बढ़ा दी है।

    क्या 14 विधायकों के नाम सामने आए हैं?

    फिलहाल 14 विधायकों की कोई आधिकारिक या स्वतंत्र रूप से पुष्टि की गई सूची सामने नहीं आई है।

    ठाकरे गुट की ओर से ऐसे दावों को पहले भी खारिज किया गया है। ताजा जानकारी में संजय राऊत ने भी इस दावे को राजनीतिक बयान बताते हुए खारिज करने की बात कही है।

    क्या Operation Tiger-4 आधिकारिक रूप से शुरू हो गया है?

    अभी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। फिलहाल 14 विधायकों के संपर्क में होने का दावा ही सामने आया है।

    अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि बताए गए 14 विधायक कौन हैं और क्या उनमें से कोई सार्वजनिक रूप से शिंदे गुट में जाने की पुष्टि करता है। अगर ऐसा होता है, तो इसका असर महाराष्ट्र की राजनीति के साथ मुंबई के स्थानीय राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है।

    डिस्क्लेमर: इस खबर में 14 विधायकों के शिंदे गुट के संपर्क में होने की जानकारी शिवसेना विधायक मुरजी पटेल के दावे पर आधारित है। अभी तक इन 14 विधायकों के नाम, उनके संपर्क में होने या शिंदे गुट में शामिल होने की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इस दावे को फिलहाल राजनीतिक दावा ही माना जाना चाहिए।