मुंबई में गंभीर अपराध 99% तक डिटेक्ट, फिर FIR से कोर्ट तक देरी कहाँ?

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मुंबई में गंभीर अपराधों की detection rate ऊंची है, फिर भी FIR, forensic जांच और trial में देरी का सवाल क्यों बना हुआ है? जानिए पूरी तस्वीर।

मुंबई: गंभीर अपराधों की जांच पर एक दिलचस्प तस्वीर सामने आई है। 2026 के पहले आठ महीनों में मुंबई पुलिस ने कुल अपराधों की 85 फीसदी detection rate दर्ज की, जबकि हत्या के मामलों में detection 99 फीसदी, हत्या के प्रयास और डकैती में 100 फीसदी तथा robbery में 99 फीसदी बताई गई। यानी गंभीर अपराधों में पुलिस के स्तर पर आरोपी या अपराध का पता लगाने की क्षमता के आंकड़े काफी ऊंचे हैं। इसके बावजूद एक बड़ा सवाल कायम है—अगर अपराध detect हो रहा है, तो FIR से लेकर forensic जांच, charge-sheet और अदालत में अंतिम फैसले तक न्याय की रफ्तार कहां धीमी पड़ती है?

यह सवाल ऐसे समय में उठा है जब दो छोटे मामलों में तेजी से judicial conclusion सामने आया। एक मामले में 50 वर्षीय कृष्ण कुमार मोहनलाल सिंह को 24 मई 2026 को मुंबई पुलिस आयुक्त कार्यालय के पास फुटपाथ पर स्टील की केतली से चाय बेचने के मामले में दोषी ठहराया गया। दूसरा मामला मालाड के फुटपाथ पर कथित जुए से जुड़ा है, जिसमें 57 वर्षीय राजू जीवन कविरे के खिलाफ महाराष्ट्र प्रिवेंशन ऑफ गैंबलिंग एक्ट के तहत कार्रवाई हुई और उसे दोषी ठहराया गया।

इन दोनों मामलों की प्रकृति अलग है, लेकिन वे criminal justice system की एक बड़ी तस्वीर सामने रखते हैं। सवाल यह नहीं है कि छोटे अपराधों पर कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं। सार्वजनिक रास्ते में बाधा, nuisance और सार्वजनिक स्थान पर जुआ जैसे अपराधों पर कानून के अनुसार कार्रवाई पुलिस की जिम्मेदारी है। असली सवाल यह है कि क्या ऐसे अपेक्षाकृत सरल मामलों और हत्या, बलात्कार, robbery, extortion या cybercrime जैसे जटिल मामलों की investigation और prosecution को एक ही पैमाने से देखा जा सकता है?

चाय बेचने वाले मामले में क्या हुआ?

अभियोजन के अनुसार कृष्ण कुमार मोहनलाल सिंह को 24 मई 2026 को सुबह करीब 10.50 बजे पुलिसकर्मी अंकुश मोरे इंगले ने गश्त के दौरान फुटपाथ पर चाय बेचते पाया था। Azad Maidan Police ने भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 285 और 293 के तहत कार्रवाई की। अदालत ने पुलिस की गवाही और spot panchnama को स्वीकार करते हुए सिंह को दोनों अपराधों में दोषी ठहराया। उसे प्रत्येक अपराध के लिए 1,500 रुपये का जुर्माना और एक-एक दिन की साधारण कैद सुनाई गई तथा appeal period के लिए 10,000 रुपये का bail bond भरने का निर्देश दिया गया।

यहां BNS की धाराओं को समझना भी जरूरी है। धारा 285 सार्वजनिक रास्ते में danger, obstruction या injury से संबंधित है, जबकि धारा 293 lawful injunction के बाद public nuisance जारी रखने से संबंधित है। धारा 293 के मामले में यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि nuisance रोकने के लिए पहले कोई वैध injunction या आदेश हुआ हो। इसलिए इस conviction को समझते समय court order में दर्ज उस procedural background को देखना जरूरी है।

मालाड gambling case में भी तस्वीर अलग है। DCB CID Unit 11 ने जुलाई 2025 में फुटपाथ पर कथित gambling के मामले में राजू जीवन कविरे के खिलाफ महाराष्ट्र Prevention of Gambling Act के तहत कार्रवाई की। उसने दोष स्वीकार किया और अदालत ने उसे सजा तथा 300 रुपये के जुर्माने से दंडित किया।

यहीं से एक महत्वपूर्ण सवाल निकलता है—क्या छोटे मामलों का तेजी से खत्म होना पुलिस की असाधारण efficiency का परिणाम है या इन मामलों की प्रकृति और उपलब्ध evidence के कारण इनकी judicial प्रक्रिया ही comparatively सरल होती है?

सिर्फ detection rate से पूरी कहानी नहीं समझी जा सकती

मुंबई पुलिस के जनवरी से अगस्त 2026 के आंकड़े बताते हैं कि गंभीर अपराधों में detection मजबूत रही। हत्या के मामलों में 99 फीसदी, हत्या के प्रयास और dacoity में 100 फीसदी तथा robbery में 99 फीसदी detection दर्ज की गई। कुल crime detection rate 85 फीसदी रही।

लेकिन detection और conviction एक ही चीज नहीं हैं।

Detection का अर्थ है कि पुलिस ने अपराध का पता लगाने और आरोपी या मामले को identify करने की दिशा में सफलता हासिल की। Conviction अदालत के trial के बाद होती है। इनके बीच investigation, forensic examination, charge-sheet, cognizance, framing of charges, witnesses और evidence की कई stages आती हैं।

यही वजह है कि सिर्फ police detection rate देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि serious crime cases भी उसी गति से final justice तक पहुंच रहे हैं।

महाराष्ट्र में अदालतों पर कितना बोझ है?

Latest NCRB data में महाराष्ट्र की criminal justice system की दूसरी तस्वीर सामने आती है। 2023 में राज्य में trial के लिए गए 24,14,487 IPC cases में से केवल 1,82,636 cases decided हुए, जबकि 22,31,851 cases undecided रहे। यानी उस साल IPC cases की trial pendency 92 फीसदी से अधिक थी। इसी dataset में महाराष्ट्र की conviction rate 49.3 फीसदी दर्ज की गई।

इसका अर्थ यह नहीं है कि पुलिस की जांच खराब है। बल्कि यह बताता है कि police detection के बाद criminal justice process का अगला हिस्सा कितना बड़ा है।

यही वह जगह है जहां छोटे और गंभीर अपराधों की तुलना सीधे करना मुश्किल हो जाता है। किसी फुटपाथ पर पुलिस की मौजूदगी में पकड़े गए आरोपी के मामले में evidence collection अपेक्षाकृत सीमित हो सकता है। इसके उलट हत्या, sexual offence, organised crime या cybercrime में medical evidence, CCTV, mobile data, forensic examination, कई गवाह और expert evidence जैसी चीजें investigation को लंबा बना सकती हैं।

FIR के बाद investigation की समय-सीमा क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत में criminal procedure अब Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita यानी BNSS के तहत चलता है, जो 1 जुलाई 2024 से लागू है। BNSS की धारा 173 cognisable offences की सूचना दर्ज करने की प्रक्रिया से संबंधित है। Supreme Court ने 2025-26 के अपने निर्णयों में स्पष्ट किया है कि BNSS की धारा 173(3) कुछ ऐसे cognisable offences में preliminary inquiry की अनुमति देती है जिनमें सजा तीन साल या उससे अधिक लेकिन सात साल से कम है, और इसके लिए संबंधित वरिष्ठ अधिकारी की पूर्व अनुमति जैसी शर्तें लागू होती हैं।

इसलिए आज FIR delay पर चर्चा करते समय केवल 2013 के Lalita Kumari judgment को दोहराना पर्याप्त नहीं है। 2024 के बाद लागू BNSS के नए procedural framework को भी समझना जरूरी है।

हालांकि जहां cognisable offence की सूचना के बाद कानून के अनुसार FIR दर्ज होनी चाहिए, वहां शुरुआती देरी investigation पर असर डाल सकती है। घटनास्थल का evidence, CCTV footage, digital records और गवाहों की उपलब्धता समय के साथ प्रभावित हो सकती है।

गंभीर मामलों में forensic delay भी बड़ा bottleneck

महाराष्ट्र में criminal investigation की एक और बड़ी चुनौती forensic laboratories का workload है।

Directorate of Forensic Science Laboratories के official case dashboard के अनुसार 31 जुलाई 2026 को 56,819 cases pending थे। अगस्त में 24,526 नए cases प्राप्त हुए और 26,448 reports जारी की गईं। इसके बावजूद 1 सितंबर 2026 को 54,897 cases carry forward हुए।

सबसे बड़ी pendency Cyber और TASI divisions में दिखाई देती है। 1 सितंबर को Cyber में 29,666 और TASI में 9,766 cases pending थे। Mumbai laboratory में इसी तारीख को 14,169 cases carry forward हुए।

यह आंकड़ा यह नहीं बताता कि सभी pending cases serious crimes से जुड़े हैं। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि digital और forensic evidence की processing criminal justice system में एक महत्वपूर्ण capacity issue है।

इसी समस्या को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने सितंबर 2026 में DFSL के लिए 220 contractual posts मंजूर किए हैं। इनमें 130 scientific officers और 90 scientific assistants शामिल हैं। सरकार का उद्देश्य cyber और TASI से जुड़े करीब 40,000 pending cases के backlog को कम करना और forensic reports अदालतों तथा investigating agencies तक तेजी से पहुंचाना है।

जब जांच हो जाए, तब भी मामला खत्म नहीं होता

किसी गंभीर अपराध में पुलिस आरोपी तक पहुंच जाए, इसके बाद भी न्यायिक प्रक्रिया बाकी रहती है। Charge-sheet दाखिल होने के बाद court proceedings, charges, witnesses, expert reports और evidence examination जैसे चरण आते हैं।

यही कारण है कि किसी छोटे मामले में कुछ तारीखों के भीतर conviction हो जाना और किसी गंभीर अपराध में वर्षों तक trial चलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पुलिस छोटे अपराधों को ज्यादा priority दे रही है।

हालांकि कुछ गंभीर मामलों में courts ने investigation और evidence collection में देरी को लेकर हाल में सवाल उठाए हैं। सितंबर 2026 में Disha Salian death case में Bombay High Court ने छह साल तक चली पुलिस जांच और FIR से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाते हुए CBI को fresh investigation और FIR की दिशा में कदम उठाने का निर्देश दिया। अदालत की टिप्पणियां उस मामले की जांच से संबंधित थीं और उन्हें पूरे Mumbai Police system की सामान्य कार्यप्रणाली का निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

इस मामले में बाद में CBI ने FIR दर्ज की और शिकायत में लगाए गए आरोपों के आधार पर जांच शुरू की।

पुलिस की efficiency को कैसे मापा जाए?

यहीं से मूल सवाल और बड़ा हो जाता है। किसी police force की performance केवल FIR की संख्या, cases detected या charge-sheets की संख्या से पूरी तरह नहीं समझी जा सकती।

एक ज्यादा व्यापक तस्वीर में कम से कम ये सवाल शामिल होने चाहिए:

क्या गंभीर शिकायत पर FIR समय पर दर्ज हुई?

क्या investigation बिना अनावश्यक देरी के पूरी हुई?

क्या forensic reports समय पर मिलीं?

क्या charge-sheet समय पर दाखिल हुई?

कितने मामलों में charges frame हुए?

कितने मामलों में trial लंबित है?

और आखिर में कितने मामलों में conviction या acquittal हुआ?

मुंबई पुलिस के मौजूदा आंकड़े यह बताते हैं कि गंभीर अपराधों का detection स्तर ऊंचा है। दूसरी तरफ महाराष्ट्र की अदालतों और forensic system के आंकड़े बताते हैं कि detection के बाद criminal justice chain में बड़ी pendency मौजूद है।

पुलिस का पक्ष

मुंबई के Joint Commissioner of Police (Law and Order) Manoj Kumar Sharma ने चाय विक्रेता मामले पर कहा कि court order देखे बिना इस पर टिप्पणी करना मुश्किल होगा।

इस बीच मुंबई पुलिस आयुक्त ने 2026 के पहले आठ महीनों में 85 फीसदी overall detection और गंभीर अपराधों में ऊंची detection rate का आंकड़ा सामने रखा है। पुलिस के मुताबिक cyber fraud मामलों में भी recovery mechanism के जरिए बड़ी राशि freeze की गई है।

कानूनी और criminology का सवाल

Criminal lawyer Advocate Mikhail Dey का कहना है कि genuine complaints पर police cognisance को लेकर शिकायतें सामने आती हैं, जबकि minor offences में cases तेजी से register और prosecute हो जाते हैं। उनके मुताबिक पहले से भारी judicial backlog के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि हर छोटे मामले को उसी स्तर की police-prosecution-court machinery से गुजारना कितना उचित है।

Indian Society of Criminology के chairman Professor Madhavan Somasundaram का कहना है कि petty offences पर कानून लागू होना चाहिए, लेकिन कार्रवाई disproportionate नहीं होनी चाहिए। उनका तर्क है कि जिन violations को fine या digital mechanism के जरिए निपटाया जा सकता है, उनमें unnecessarily पूरी criminal justice machinery लगाने से व्यक्ति और राज्य दोनों पर अतिरिक्त लागत पड़ सकती है।

इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि छोटे अपराधों पर कार्रवाई को अपने आप में गलत नहीं माना जा सकता। असली सवाल resources के allocation, investigation की गुणवत्ता और serious offences के लिए response time का है।

अब असली सवाल क्या है?

कृष्ण कुमार मोहनलाल सिंह और राजू जीवन कविरे के मामलों में conviction यह दिखाती है कि जब अपराध सामने हो, आरोपी की पहचान हो और prosecution के लिए जरूरी evidence उपलब्ध हो, तो criminal justice system अपेक्षाकृत तेजी से judicial conclusion तक पहुंच सकता है।

लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि गंभीर अपराधों की जांच को कम priority दी जा रही है।

मुंबई में 2026 की ऊंची serious-crime detection rate एक तरफ है, वहीं forensic laboratories की हजारों मामलों की pendency और महाराष्ट्र की बड़ी trial pendency दूसरी तरफ।

इसलिए policing की असली efficiency का सवाल केवल यह नहीं है कि अपराधी पकड़ा गया या नहीं। असली कसौटी यह भी है कि शिकायत से FIR, FIR से investigation, investigation से evidence, evidence से charge-sheet और charge-sheet से final judgment तक पूरी प्रक्रिया कितनी समयबद्ध और प्रभावी रहती है।

महाराष्ट्र में forensic capacity बढ़ाने के लिए 220 नए पदों की मंजूरी और investigation तथा conviction rate सुधारने की कोशिशें इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। अब इनका वास्तविक असर इस बात से दिखाई देगा कि pending evidence, investigation और trials कितनी तेजी से कम होते हैं और गंभीर अपराधों के पीड़ितों को अंतिम न्याय कितने समय में मिलता है।

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