Category: Court Cases

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  • 🚆 17 साल बाद मिला इंसाफ! Local train से गिरकर हुई मौत पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने ₹8 लाख मुआवजा तय किया

    🚆 17 साल बाद मिला इंसाफ! Local train से गिरकर हुई मौत पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने ₹8 लाख मुआवजा तय किया

    मुंबई में 2009 में Local train से गिरकर हुई 16 वर्षीय लड़के की मौत के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने 17 साल बाद ₹8 लाख तक मुआवजा देने का आदेश दिया। पढ़ें पूरी खबर।

    📍 मुंबई | जोगेश्वरी | कोर्ट अपडेट

    मुंबई में साल 2009 में Local train से गिरकर एक 16 वर्षीय किशोर की मौत के मामले में 17 साल बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने इस घटना को “चलती ट्रेन से आकस्मिक गिरावट” माना और मृतक के माता-पिता को ₹8 लाख तक मुआवजा देने का आदेश दिया है।

    ⚖️ क्या है Local train का पूरा मामला?

    यह मामला मुंबई की भीड़भाड़ वाली लोकल ट्रेन से जुड़ा है, जहां रोजाना लाखों लोग सफर करते हैं। ऐसे में दुर्घटनाओं के मामलों में कानूनी प्रक्रिया अक्सर लंबी हो जाती है।

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    👉 2009 में हुआ था हादसा

    मृतक की पहचान Arogyaraj Chetiyar के रूप में हुई है, जो 20 जून 2009 को अपने दोस्त के साथ गोरेगांव से चर्चगेट की ओर सफर कर रहा था।
    दोपहर करीब 2:13 बजे, जोगेश्वरी स्टेशन के पास भीड़भाड़ के कारण वह ट्रेन से गिर गया। बाद में अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

    🚨 रेलवे के दावे और विवाद

    इस केस में शुरुआत से ही रेलवे और परिवार के बीच विवाद बना रहा। रेलवे ने घटना को अलग तरीके से पेश किया, जिससे केस लंबा खिंचता गया।

    👉 रेलवे ने ट्रैक क्रॉसिंग बताया

    रेलवे का दावा था कि मृतक ट्रैक पार करते समय हादसे का शिकार हुआ।
    हालांकि, मृतक के पास वैध टिकट मिला था, जिससे वह एक बोनाफाइड यात्री साबित हुआ।

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    🏛️ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

    लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को समझते हुए खुद सबूतों की जांच की।

    👉 अहम गवाह को नजरअंदाज करना पड़ा भारी

    बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस Jitendra Jain ने कहा कि रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने महत्वपूर्ण गवाह (मृतक के दोस्त) के बयान को नजरअंदाज किया।
    कोर्ट ने माना कि हादसा भीड़ के कारण ट्रेन से गिरने से हुआ था।

    💰 मुआवजा और कोर्ट के निर्देश

    कोर्ट ने पीड़ित परिवार को राहत देते हुए मुआवजे का आदेश दिया, जो लंबे इंतजार के बाद मिला है।

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    👉 ₹8 लाख तक मुआवजा तय

    • ₹4 लाख + 6% वार्षिक ब्याज (2009 से)
    • कुल मुआवजा ₹8 लाख तक सीमित
    • 12 हफ्तों के भीतर भुगतान का आदेश

    कोर्ट ने परिवार को Railway Claims Tribunal में नया क्लेम दाखिल करने का निर्देश भी दिया।

    🔍 कोर्ट ने रेलवे के तर्क खारिज किए

    हाईकोर्ट ने रेलवे के कई तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया, जिससे केस की दिशा बदल गई।

    👉 झोपड़पट्टी और नक्शे का तर्क नहीं माना

    रेलवे ने कहा कि घटना स्थल के पास झोपड़पट्टी है, इसलिए ट्रैक क्रॉसिंग संभव है।
    लेकिन कोर्ट ने साफ कहा कि यह सिर्फ संभावना है, सबूत नहीं।

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    इसके अलावा, स्टेशन के नक्शे को भी कोर्ट ने खारिज कर दिया, क्योंकि वह वर्तमान स्थिति का था, 2009 का नहीं।

    🚉 प्लेटफॉर्म और ट्रैक को लेकर भ्रम

    रेलवे ने यह भी दावा किया कि शव फास्ट ट्रैक पर मिला, जबकि ट्रेन स्लो लाइन पर थी।

    👉 कोर्ट ने तकनीकी तर्क दिया

    कोर्ट ने कहा कि जोगेश्वरी स्टेशन पर प्लेटफॉर्म 2 और 3 जुड़े हुए हैं।
    इसलिए यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मौत ट्रैक पार करते समय हुई।

    ⏳ 17 साल की लंबी कानूनी लड़ाई

    यह मामला न्याय मिलने में देरी का भी एक उदाहरण है। परिवार को वर्षों तक कोर्ट के चक्कर लगाने पड़े।

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    👉 2016 में ट्रिब्यूनल ने खारिज किया था केस

    पहले Railway Claims Tribunal ने 2016 में मुआवजा खारिज कर दिया था।
    इसके बाद परिवार ने 2017 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    🔗 उपयोगी सरकारी लिंक


    ❓ FAQ (People Also Search For)

    ❓ यह घटना कब हुई थी?

    👉 यह हादसा 20 जून 2009 को हुआ था।

    ❓ कोर्ट ने कितना मुआवजा दिया?

    👉 कुल ₹8 लाख तक मुआवजा तय किया गया है।

    ❓ क्या मृतक के पास टिकट था?

    👉 हां, उसके पास वैध टिकट था।

    ❓ केस इतना लंबा क्यों चला?

    👉 शुरुआती दावों और सबूतों पर विवाद के कारण मामला लंबा चला।

    🧾 Conclusion

    यह फैसला सिर्फ एक परिवार को राहत नहीं देता, बल्कि यह भी दिखाता है कि न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन अंततः न्याय मिलता है
    मुंबई जैसे शहर में लोकल ट्रेन सुरक्षा और कानूनी जागरूकता दोनों बेहद जरूरी हैं

  • Bombay High Court का बड़ा आदेश: ₹23.89 करोड़ जमा करो वरना पानी बंद! Sahara Star Hotel केस में बड़ा ट्विस्ट

    Bombay High Court का बड़ा आदेश: ₹23.89 करोड़ जमा करो वरना पानी बंद! Sahara Star Hotel केस में बड़ा ट्विस्ट

    Bombay High Court ने Sahara Star Hotel को पानी सप्लाई बहाल करने के लिए ₹23.89 करोड़ जमा करने का आदेश दिया। BMC Property Tax Dispute में बड़ा खुलासा, जानिए पूरी खबर।

    मुंबई: देश की आर्थिक राजधानी एवं मायानगरी मुंबई शहर में एक हाई-प्रोफाइल कानूनी मामले ने सबका ध्यान खींच लिया है, जहां Bombay High Court ने Sahara Star Hotel को बड़ा झटका देते हुए साफ कहा है कि अगर पानी सप्लाई चाहिए तो पहले ₹23.89 करोड़ जमा करने होंगे। यह मामला BMC और Sahara Hospitality Limited के बीच Property Tax Dispute को लेकर चल रहा है, जिसमें कोर्ट ने अहम अंतरिम राहत भी दी है।

    ⚖️ Court का सख्त रुख: पहले पैसे जमा करो, फिर मिलेगा पानी

    Bombay High Court की डिवीजन बेंच, जिसमें Chief Justice Shree Chandrashekar और Justice Aarti Sathe शामिल थे, ने अपने आदेश में कहा कि कंपनी को 4 हफ्तों के अंदर ₹23,89,31,590 जमा करने होंगे।

    कोर्ट ने साफ कहा:
    👉 “Undertaking फाइल करते ही पानी सप्लाई तुरंत बहाल की जाए”

    सूत्रों के मुताबिक, कंपनी ने undertaking जमा कर दी है, जिसके बाद होटल की water supply बहाल भी कर दी गई है।

    🏨 Sahara Star Hotel: मुंबई के प्राइम लोकेशन पर स्थित लग्जरी प्रॉपर्टी

    Bombay-High-Court-issues-major-order-Deposit-23-89-crore-cut-water-supply-Sahara-Star-Hotel-case

    Sahara Star Hotel
    मुंबई एयरपोर्ट के पास स्थित यह 5-star होटल Sahara Group की flagship property मानी जाती है। यहां बड़ी-बड़ी corporate events, celebrity functions और international guests का आना-जाना लगा रहता है।

    🧾 क्या है पूरा Property Tax Dispute मामला?

    यह पूरा विवाद BMC द्वारा किए गए Property Tax Reassessment से जुड़ा हुआ है। Sahara Hospitality Limited का आरोप है कि:

    • 2026 में retrospective reassessment किया गया
    • एक property को कई हिस्सों में बांटकर tax लगाया गया
    • 2019 से पुराने dues को जोड़कर भारी रकम मांगी गई

    👉 कंपनी का दावा है कि:

    • ₹69.19 करोड़ का demand notice
    • ₹181.96 करोड़ तक की attachment notices (penalties सहित)

    बिना proper hearing के जारी किए गए।

    🏛️ BMC का पक्ष: Illegal Construction और Inspection का हवाला

    Brihanmumbai Municipal Corporation
    BMC ने कोर्ट में कहा कि:

    • यह reassessment inspection के बाद किया गया
    • होटल परिसर में unauthorized construction मिला
    • Special Notice जारी किया गया था, लेकिन कंपनी ने जवाब नहीं दिया

    इस आधार पर BMC ने tax demand को सही ठहराया।

    👨‍⚖️ Petitioner का तर्क: ‘Civil Death’ जैसी स्थिति बन गई थी

    Senior Advocate Chetan Kapadia ने Sahara की तरफ से दलील दी कि:

    • पानी काटना कंपनी के लिए “civil death” जैसा है
    • 2001 से जुड़े arrears पहली बार 2026 में मांगे गए
    • इससे business operations पूरी तरह ठप हो गए

    📑 Court ने दिए ये बड़े Interim Relief

    कोर्ट ने Sahara को राहत देते हुए:

    • 5 demand notices पर stay लगाया
    • Attachment orders को भी रोका

    📅 जिन dates के notices पर रोक लगी:

    • 1 January
    • 12 February
    • 16 February
    • 23 February (दो notices)

    📂 Case Details (पूरा कानूनी रिकॉर्ड)

    • Case Title: Sahara Hospitality Limited vs Municipal Corporation of Greater Mumbai
    • Case Number: Writ Petition (L) No. 11536 of 2026

    👨‍💼 Appearance:

    • Petitioner: Chetan Kapadia, Pooja Jain
    • State: Mohit Jadhav
    • BMC: Pralhad Paranjpe, Oorja Dhond, Komal Punjabi

    🔍 अब आगे क्या होगा?

    कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 6 हफ्तों बाद तय की है। तब तक:

    • Sahara को ₹23.89 Cr जमा करना होगा
    • BMC कोई coercive action नहीं ले सकेगी

    यह केस आने वाले समय में Mumbai Property Tax System पर बड़ा असर डाल सकता है।

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    FAQ Section

    ❓ Sahara Star Hotel का पानी क्यों काटा गया था?

    👉 BMC ने property tax dues के चलते water supply काट दी थी।

    ❓ कोर्ट ने क्या आदेश दिया?

    👉 ₹23.89 करोड़ जमा करने के बाद पानी सप्लाई बहाल करने का आदेश दिया।

    ❓ क्या कंपनी को कोई राहत मिली?

    👉 हां, 5 demand notices और attachment orders पर stay मिला है।

    ❓ कुल विवादित राशि कितनी है?

    👉 करीब ₹69.19 करोड़ (demand) और ₹181.96 करोड़ (attachment notices)।

    ❓ अगली सुनवाई कब है?

    👉 लगभग 6 हफ्तों बाद।

  • Redevelopment Case में Builder को झटका: अधूरी बिल्डिंग पर Refund नहीं मिलेगा – Bombay HC

    Redevelopment Case में Builder को झटका: अधूरी बिल्डिंग पर Refund नहीं मिलेगा – Bombay HC

    Bombay High Court ने बड़ा फैसला देते हुए कहा कि अधूरी Redevelopment Project पर Builder Refund नहीं मांग सकता। Transit Rent भी वापस नहीं मिलेगा। जानिए पूरा केस।

    मुंबई: शहर में चल रहे Redevelopment Projects के लिए एक बड़ा और अहम फैसला सामने आया है। Bombay High Court ने साफ कर दिया है कि अगर कोई Builder अधूरी बिल्डिंग बनाकर प्रोजेक्ट छोड़ देता है या Agreement रद्द हो जाता है, तो वह अपने खर्च का Refund नहीं मांग सकता। यह फैसला शहर की कई हाउसिंग सोसायटी और डेवलपर्स के लिए गेम चेंजर माना जा रहा है।

    क्या है पूरा मामला?

    यह मामला गोरेगांव की Goregaon Pearl Cooperative Housing Society से जुड़ा है।

    • सोसायटी ने 2007 में SSD Escatics Pvt Ltd को Redevelopment का काम दिया
    • प्रोजेक्ट में 3 विंग का पुनर्विकास होना था
    • देरी के चलते दोनों पक्षों में विवाद शुरू हो गया

    बाद में समझौते के तहत Builder को 30 अक्टूबर 2018 तक प्रोजेक्ट पूरा करना था, लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाया।

    Agreement क्यों हुआ Terminate?

    सोसायटी ने 3 जून 2018 को:

    • Development Agreement रद्द कर दिया
    • Builder पर Terms & Conditions तोड़ने का आरोप लगाया

    मामला Arbitration में गया, जहां Arbitrator ने:

    • सोसायटी के पक्ष में फैसला दिया
    • Builder को ₹7.17 करोड़ देने का आदेश दिया

    इसके बाद Builder हाई कोर्ट पहुंचा।

    High Court ने क्या कहा?

    जस्टिस Sandeep Marne ने साफ कहा:

    • Builder ने Timeline और Agreement का उल्लंघन किया
    • Project समय पर पूरा नहीं किया
    • इसलिए Agreement Termination सही है

    कोर्ट ने Arbitrator के फैसले को बरकरार रखा।

    ₹18.09 करोड़ Refund की मांग खारिज

    Builder ने दावा किया था कि:

    • उसने ₹18.09 करोड़ खर्च किए
    • एक बिल्डिंग 21 फ्लोर तक और दूसरी 7 फ्लोर तक बनाई

    लेकिन कोर्ट ने कहा:

    • अधूरी Structure सोसायटी के किसी काम की नहीं
    • इसे “Benefit” नहीं माना जा सकता

    इसलिए Refund का दावा पूरी तरह खारिज कर दिया गया।

    Contract Act की Section 64 पर कोर्ट की टिप्पणी

    Builder ने Indian Contract Act का हवाला दिया था

    कोर्ट ने कहा:

    • Benefit तभी माना जाएगा जब वह पूरी तरह usable हो
    • अधूरी बिल्डिंग को Benefit नहीं माना जा सकता

    Transit Rent भी वापस नहीं मिलेगा

    Builder ने ₹20.43 करोड़ का भी Refund मांगा, जिसमें शामिल था:

    • Transit Rent
    • Corpus Fund
    • Brokerage

    लेकिन कोर्ट ने कहा:

    • Transit Rent सोसायटी के लोगों के अस्थायी रहने के लिए दिया जाता है
    • इसे “Unjust Enrichment” नहीं माना जा सकता

    इसलिए यह पैसा भी वापस नहीं मिलेगा।

    Court की सख्त टिप्पणी

    कोर्ट ने साफ कहा:

    “अगर Builder की गलती से Agreement खत्म हुआ और फिर उसे Refund दे दिया जाए, तो यह उसकी गलती का इनाम होगा।”

    इससे पहले से परेशान सोसायटी के लोगों पर और बोझ पड़ेगा।

    Mumbai Redevelopment Projects पर असर

    इस फैसले के बाद:

    • Builders पर समय पर काम पूरा करने का दबाव बढ़ेगा
    • Housing Societies को ज्यादा अधिकार मिलेंगे
    • Redevelopment Disputes में यह Judgment मिसाल बनेगा

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    FAQ

    Q1. कोर्ट ने Builder को Refund क्यों नहीं दिया?
    क्योंकि बिल्डिंग अधूरी थी और सोसायटी के उपयोग में नहीं आ सकती थी।

    Q2. क्या Transit Rent वापस मिल सकता है?
    नहीं, कोर्ट ने साफ कहा कि यह Refundable नहीं है।

    Q3. यह मामला किस सोसायटी से जुड़ा है?
    Goregaon Pearl CHS, मुंबई।

    Q4. Builder ने कितना Refund मांगा था?
    ₹18.09 करोड़ + ₹20.43 करोड़।

    Q5. इस फैसले का असर क्या होगा?
    Builders पर दबाव बढ़ेगा और Societies को मजबूत अधिकार मिलेंगे।

  • Kurla Bus Accident: Bombay HC ने BEST ड्राइवर को दी बेल, Electric Bus Training पर उठे बड़े सवाल

    Kurla Bus Accident: Bombay HC ने BEST ड्राइवर को दी बेल, Electric Bus Training पर उठे बड़े सवाल

    Mumbai Kurla Bus Accident में Bombay High Court ने BEST ड्राइवर को बेल दी, Electric Bus Training की कमी को बताया बड़ा कारण। जानिए पूरा मामला, कोर्ट की टिप्पणी और BEST पर उठे सवाल।

    मुंबई: कुर्ला में दिसंबर 2024 में हुए दर्दनाक BEST बस हादसे में बड़ा अपडेट सामने आया है। Bombay High Court ने इस मामले में गिरफ्तार BEST ड्राइवर संजय मोरे को जमानत दे दी है। इस हादसे में 9 लोगों की मौत हुई थी, जब एक बेकाबू इलेक्ट्रिक बस ने कई लोगों को कुचल दिया था। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान BEST और सिस्टम की बड़ी लापरवाही पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।

    🔴 Court ने क्यों दी Bail?

    हाई कोर्ट के जस्टिस आर.एम. जोशी ने 30 मार्च को संजय मोरे को 15,000 रुपये के पर्सनल बॉन्ड पर बेल दी। ड्राइवर दिसंबर 2024 से लगातार जेल में था। कोर्ट ने माना कि ट्रायल जल्दी खत्म होने की संभावना नहीं है, इसलिए आरोपी को लंबे समय तक जेल में रखना उचित नहीं।

    Electric Bus Training पर बड़ा खुलासा

    कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सबसे बड़ा मुद्दा उठाया — Electric Bus Training की भारी कमी।

    Brihanmumbai Electric Supply and Transport (BEST) को कॉन्ट्रैक्ट के तहत ड्राइवरों को कम से कम 7 दिन की ट्रेनिंग देना जरूरी था, लेकिन:

    • ट्रेनिंग सिर्फ 3 दिन में खत्म कर दी गई
    • सिर्फ Simulator Training दी गई
    • रोड पर कोई Practical Training नहीं दी गई

    कोर्ट ने इसे “शॉकिंग” बताया और कहा कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी बिना सही ट्रेनिंग के देना खतरनाक है।

    🚍 Accident की वजह क्या बनी?

    कोर्ट ने अपने ऑब्जर्वेशन में साफ कहा कि:

    • ट्रेनिंग की कमी ही इस हादसे की बड़ी वजह हो सकती है
    • Electric Bus चलाने के लिए अलग स्किल्स चाहिए
    • बिना रोड एक्सपीरियंस के ड्राइवर को सीधे पब्लिक रोड पर उतारना गलत है

    यह भी कहा गया कि “बाद में यह कहना आसान है कि ड्राइवर को बस चलाने से मना करना चाहिए था, लेकिन नौकरी की मजबूरी में ऐसा करना मुश्किल होता है।”

    🧪 Alcohol या Drugs का मामला?

    संजय मोरे की मेडिकल रिपोर्ट में साफ पाया गया कि:

    Sanjay-More_Kurla-Bus-Accident-Bombay-HC-grants-bail-BEST-driver-serious-questions-electric-bus-training
    आरोपी बस ड्राइवर संजय मोरे की फाइल तस्वीर
    • वह शराब या नशे के प्रभाव में नहीं था
    • हादसे के समय वह होश में था

    इससे यह बात और मजबूत हुई कि हादसा लापरवाही से ज्यादा सिस्टम की कमी का नतीजा हो सकता है।

    🏙️ Kurla Bus Accident: क्या हुआ था उस दिन?

    दिसंबर 2024 में मुंबई के कुर्ला इलाके में एक BEST Electric Bus अचानक बेकाबू हो गई थी।

    • बस ने कई लोगों को कुचल दिया
    • 9 लोगों की मौके पर मौत हो गई
    • कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए

    यह हादसा मुंबई के सबसे दर्दनाक रोड एक्सीडेंट्स में से एक बन गया था।

    ⚠️ BEST और सिस्टम पर उठे सवाल

    इस केस के बाद अब कई बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं:

    • क्या Electric Buses को बिना तैयारी के सड़कों पर उतारा जा रहा है?
    • क्या Drivers को Proper Training नहीं दी जा रही?
    • क्या Public Safety से समझौता हो रहा है?

    कोर्ट की टिप्पणी के बाद BEST और मुंबई प्रशासन पर दबाव बढ़ गया है।


    FAQ Section

    Q1. Kurla Bus Accident कब हुआ था?
    👉 यह हादसा दिसंबर 2024 में मुंबई के कुर्ला इलाके में हुआ था।

    Q2. कितने लोगों की मौत हुई थी?
    👉 इस हादसे में 9 लोगों की मौत हुई थी।

    Q3. ड्राइवर को बेल क्यों मिली?
    👉 कोर्ट ने कहा कि ड्राइवर को सही Electric Bus Training नहीं दी गई थी और वह लंबे समय से जेल में था।

    Q4. क्या ड्राइवर नशे में था?
    👉 नहीं, मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार वह नशे में नहीं था।

    Q5. BEST की क्या गलती थी?
    👉 BEST ने 7 दिन की ट्रेनिंग की जगह सिर्फ 3 दिन की Simulator Training दी, कोई Practical Training नहीं दी।

  • 2016 Encounter Case: मुंबई कोर्ट ने हरियाणा के 5 पुलिसकर्मियों समेत 7 आरोपियों को किया बरी

    2016 Encounter Case: मुंबई कोर्ट ने हरियाणा के 5 पुलिसकर्मियों समेत 7 आरोपियों को किया बरी

    Mumbai Court Verdict: 2016 Sandeep Gadoli Encounter Case में 5 Haryana Cops और 2 अन्य आरोपी बरी। Andheri East होटल एनकाउंटर केस में बड़ा फैसला।

    मुंबई: देश की आर्थिक राजधानी मुंबई शहर से एक बड़ा Encounter Case Verdict सामने आया है। साल 2016 के चर्चित Sandeep Gadoli Encounter Case में कोर्ट ने हरियाणा पुलिस के 5 कर्मियों समेत कुल 7 आरोपियों को बरी कर दिया है। यह मामला मुंबई के अंधेरी ईस्ट के एक होटल में हुए कथित फर्जी एनकाउंटर से जुड़ा था।

    Sandeep-Gadoli-Encounter-Case
    संदीप गदोली की फाइल तस्वीर

    कोर्ट का बड़ा फैसला

    मुंबई की सेशन कोर्ट में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रशांत काले ने सभी आरोपियों को Section 302 (murder) समेत अन्य धाराओं से बरी कर दिया।
    कोर्ट ने सबूतों के आधार पर आरोप साबित न होने पर यह फैसला सुनाया। हालांकि विस्तृत आदेश अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।

    क्या था पूरा मामला

    यह घटना 7 फरवरी 2016 की है, जब गुरुग्राम पुलिस ने दावा किया था कि उन्होंने गैंगस्टर संदीप गडोली को अंधेरी ईस्ट के एक होटल में मुठभेड़ में मार गिराया।
    गडोली पर ₹1 लाख का इनाम था और उसके खिलाफ 1999 से अब तक 40 से ज्यादा FIR दर्ज थीं।

    किन-किन पर थे आरोप

    इस मामले में पुलिस ने कुल 8 लोगों को आरोपी बनाया था, जिनमें:

    • 5 हरियाणा पुलिसकर्मी
    • गडोली की कथित गर्लफ्रेंड दिव्या पाहुजा
    • उनकी मां
    • गैंगस्टर का राइवल वीरेंद्र गुज्जर

    शामिल थे।

    आरोपी पुलिसकर्मियों में

    • प्रद्युमन यादव (तत्कालीन सब-इंस्पेक्टर)
    • विक्रम सिंह
    • जितेंद्र यादव
    • दीपक काकरान
    • परमजीत अहलावत

    के नाम शामिल थे।

    साजिश का आरोप क्या था

    प्रोसिक्यूशन के मुताबिक, गैंगस्टर वीरेंद्र गुज्जर की गडोली से पुरानी दुश्मनी थी।
    आरोप था कि उसने पुलिसकर्मियों के साथ मिलकर गडोली को जाल में फंसाया।

    बताया गया कि दिव्या पाहुजा के जरिए गडोली को होटल में बुलाया गया और फिर उसे फर्जी एनकाउंटर में मार दिया गया।

    कैसे किया गया एनकाउंटर

    प्रोसिक्यूशन ने दावा किया कि आरोपियों ने होटल में illegal firearms का इस्तेमाल कर गडोली को गोली मारी और बाद में खुद को बचाने के लिए झूठे सबूत पेश किए।

    सबूत और गवाह

    इस केस में प्रोसिक्यूशन ने

    • 43 गवाह
    • CCTV फुटेज
    • कॉल रिकॉर्ड
    • बैलिस्टिक रिपोर्ट

    जैसे मजबूत तकनीकी सबूत कोर्ट के सामने पेश किए थे, ताकि यह साबित किया जा सके कि यह एक planned conspiracy murder था।

    दिव्या पाहुजा केस का अपडेट

    इस केस की अहम कड़ी मानी जा रही दिव्या पाहुजा की 2024 में हरियाणा के एक होटल में हत्या हो गई थी।
    वह उस समय जमानत पर बाहर थीं। उनकी मौत के बाद उनके खिलाफ केस स्वतः समाप्त (abated) हो गया।

    बचाव पक्ष का क्या कहना था

    आरोपियों के वकील विलास नाइक और विग्नेश अय्यर ने कोर्ट में कहा कि
    यह पूरा मामला “false and malicious allegations” पर आधारित है।

    डिफेंस के मुताबिक, यह केस गडोली के परिवार के दबाव में दर्ज कराया गया था, जिन पर खुद extortion और murder जैसे गंभीर केस चल रहे हैं।

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    FAQ

    Q1. संदीप गडोली कौन था?
    वह एक कुख्यात गैंगस्टर था, जिस पर ₹1 लाख का इनाम था और 40 से ज्यादा केस दर्ज थे।

    Q2. यह एनकाउंटर कब हुआ था?
    7 फरवरी 2016 को अंधेरी ईस्ट के एक होटल में।

    Q3. कोर्ट ने आरोपियों को क्यों बरी किया?
    सबूतों के आधार पर आरोप साबित नहीं हो सके।

    Q4. दिव्या पाहुजा का क्या हुआ?
    2024 में हरियाणा के एक होटल में उनकी हत्या हो गई थी।

  • Kandivali: बेटे को फ्लैट खाली करने का आदेश, 5000 रुपये महीना देना होगा

    Kandivali: बेटे को फ्लैट खाली करने का आदेश, 5000 रुपये महीना देना होगा

    Mumbai Kandivali West में senior citizen के हक में बड़ा फैसला। Tribunal ने बेटे को फ्लैट खाली करने और ₹5000 monthly maintenance देने का आदेश दिया। जानिए पूरा मामला और Senior Citizens Act 2007 के नियम।

    मुंबई: Kandivali West इलाके से एक अहम मामला सामने आया है, जहां 69 साल के बुजुर्ग पिता को उनके ही बेटे से लड़ कर कोर्ट से न्याय की गुहार लगानी पड़ी। ट्रिब्यूनल कोर्ट ने बेटे को पिता का फ्लैट खाली करने और हर महीने ₹5000 maintenance देने का आदेश दिया है।

    ट्रिब्यूनल ने दिया सख्त आदेश

    यह फैसला Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act 2007 के तहत दिया गया। केस की सुनवाई बांद्रा (पूर्व) के सब-डिविजनल ऑफिसर और पेरेंट्स एंड सीनियर सिटिजन्स मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल कोर्ट में हुई।

    बेटे पर फ्लैट कब्जा करने और परेशान करने का आरोप

    69 वर्षीय बुजुर्ग ने शिकायत में बताया कि उनके बेटे ने उनके खुद के फ्लैट पर जबरन कब्जा कर लिया था और उन्हें वहां से बाहर कर दिया था।

    उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बेटे के कारण उन्हें मानसिक तनाव, आर्थिक परेशानी और मेडिकल खर्च उठाने में दिक्कत हो रही थी।

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    पुलिस में शिकायत और कोर्ट का दरवाजा खटखटाया

    पीड़ित ने पहले पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई और बाद में ट्रिब्यूनल कोर्ट में अपील की।
    जनवरी में कोर्ट ने आदेश दिया था कि फ्लैट वापस बुजुर्ग को सौंपा जाए, लेकिन बेटे ने आदेश नहीं माना।

    पुलिस को हस्तक्षेप के आदेश

    बेटे द्वारा आदेश का पालन नहीं करने पर ट्रिब्यूनल कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि वह हस्तक्षेप कर फ्लैट खाली करवाए और बुजुर्ग को कब्जा दिलाए।

    Mumbai Police की मदद से आखिरकार पिछले महीने फ्लैट का कब्जा बुजुर्ग को वापस दिला दिया गया।

    बेटे की दलील भी कोर्ट ने सुनी

    सुनवाई के दौरान बेटे ने सभी आरोपों को नकारते हुए कहा कि उसने पिता को रहने से नहीं रोका और संपत्ति पर उसका भी अधिकार है।

    उसने पारिवारिक विवाद और harassment के काउंटर आरोप भी लगाए, लेकिन कोर्ट ने सभी दस्तावेज और सबूतों के आधार पर फैसला सुनाया।

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    ट्रिब्यूनल का अहम ऑब्जर्वेशन

    कोर्ट ने माना कि फ्लैट का मालिकाना हक बुजुर्ग के पास है और बेटे के व्यवहार से उनका “peaceful living” प्रभावित हुआ है।

    ट्रिब्यूनल ने कहा कि बच्चों की जिम्मेदारी सिर्फ खाना-पीना नहीं बल्कि माता-पिता को सम्मान और सुरक्षित जीवन देना भी है।

    ट्रिब्यूनल के मुख्य आदेश (Key Directions)

    • बेटे को 30 दिनों के अंदर फ्लैट खाली करना होगा
    • बुजुर्ग को शांतिपूर्ण कब्जा देना अनिवार्य
    • हर महीने ₹5000 maintenance देना होगा
    • जरूरत पड़ने पर पुलिस कार्रवाई सुनिश्चित करेगी

    सरकारी कानून और जानकारी


    FAQ

    Q1. क्या माता-पिता अपने बच्चे को घर से निकाल सकते हैं?
    हाँ, अगर घर उनके नाम पर है और बच्चा परेशान कर रहा है, तो कानून इसके लिए अनुमति देता है।

    Q2. Senior Citizens Act 2007 क्या कहता है?
    यह कानून बच्चों को अपने माता-पिता की देखभाल और maintenance देने के लिए बाध्य करता है।

    Q3. Maintenance कितनी तय होती है?
    यह कोर्ट केस के आधार पर तय करता है, जैसे इस मामले में ₹5000 महीना तय किया गया।

    Q4. अगर बेटा आदेश नहीं माने तो क्या होगा?
    पुलिस हस्तक्षेप कर सकती है और कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।

  • Disha Salian Case: Bombay HC ने Mumbai Police को लगाई फटकार, 5 साल बाद भी Final Report नहीं!

    Disha Salian Case: Bombay HC ने Mumbai Police को लगाई फटकार, 5 साल बाद भी Final Report नहीं!

    Disha Salian Death Case में Bombay High Court ने Mumbai Police को देरी पर फटकार लगाई। जानें पूरा मामला, SIT जांच, CBI रिपोर्ट और लेटेस्ट अपडेट।

    मुंबई: 2020 के हाई-प्रोफाइल Disha Salian Death Case लगभग 5 साल बाद एक बार फिर सुर्खियों में है। Bombay High Court ने 23 मार्च को सुनवाई के दौरान Mumbai Police को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि “Final Report में देरी के लिए कोई भी वजह सही नहीं ठहराई जा सकती।”

    ⚖️ Court Strict: “Delay बिल्कुल भी Acceptable नहीं”

    चीफ जस्टिस Shree Chandrashekhar और जस्टिस Suman Shyam की बेंच ने साफ कहा कि जब preliminary report तैयार है, तो उसे magistrate के सामने पेश क्यों नहीं किया गया?

    कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कोई नया evidence आता है, तो उस पर आधारित रिपोर्ट 24 घंटे के अंदर फाइल करनी होगी

    👨‍👧 Family Angle: पिता ने उठाए सवाल

    दिशा सालियान के पिता Satish Salian ने कोर्ट में याचिका दाखिल कर केस में कथित cover-up और बड़े लोगों की भूमिका का आरोप लगाया है।

    उन्होंने pendrive के जरिए कुछ नए सबूत भी दिए हैं, जिनकी जांच अभी चल रही है।

    👮 Police का जवाब: “Investigation अभी पूरा नहीं”

    सरकार की तरफ से पेश हुईं APP Mankuwar Deshmukh ने कोर्ट को बताया कि preliminary report तैयार है, लेकिन investigation अभी complete नहीं हुआ क्योंकि family की तरफ से नया evidence आया है।

    🏢 Case Background: Malad की घटना से शुरू हुआ मामला

    8 जून 2020 को Disha Salian की मौत Regent Galaxy Building की 12वीं मंजिल से गिरने से हुई थी।

    Malvani Police Station ने उस समय FIR के बजाय ADR (Accidental Death Report) दर्ज की थी, जिससे जांच की रफ्तार धीमी पड़ गई।

    🧾 ADR vs FIR: जांच पर क्या असर पड़ा?

    ADR दर्ज होने का मतलब था कि केस को सीधे criminal investigation की तरह नहीं लिया गया।

    इससे forensic जांच, arrests और charge sheet जैसे प्रोसेस में देरी हुई और कई अहम पहलुओं की जांच शुरुआती दौर में नहीं हो सकी।

    🔍 Confusion & Theories: Suicide या Murder?

    जहां पुलिस ने इसे suicide बताया, वहीं सोशल मीडिया, कुछ political leaders और public ने murder और conspiracy के एंगल उठाए।

    इसी वजह से केस लगातार controversy में बना रहा।

    🕵️ SIT Probe: जांच बढ़ी, लेकिन speed नहीं

    दिसंबर 2023 में Special Investigation Team (SIT) बनाई गई ताकि केस की फिर से जांच हो सके।

    लेकिन अब तक SIT भी final report पेश नहीं कर पाई है।

    🏛️ Court Hearings और Delay

    पिछले कुछ सालों में इस केस पर कई petitions दायर हुईं—CBI जांच की मांग, FIR दर्ज करने की मांग और documents access की मांग।

    नवंबर 2025 में भी हाई कोर्ट ने delay पर सवाल उठाए थे।

    🧠 CBI Report: Suicide, No Link to SSR Case

    CBI ने अपनी closure report में इसे suicide बताया और Sushant Singh Rajput केस से कोई संबंध नहीं पाया।

    फिर भी परिवार इस रिपोर्ट से सहमत नहीं है।

    Political Pressure & Late Allegations

    इस केस में political angle भी जुड़ा रहा है।

    परिवार ने rape और murder जैसे गंभीर आरोप काफी देर बाद लगाए, जिससे पुराने evidence और witnesses की फिर से जांच करनी पड़ी—और delay बढ़ गया।

    📊 Current Status: 5 साल बाद भी No Closure

    • Mumbai Police और SIT दोनों जांच कर रहे हैं
    • Court लगातार monitoring कर रहा है
    • Family अब भी justice की मांग पर अड़ी है

    लेकिन 5 साल बाद भी केस में final closure नहीं आया है।

    🔗 सरकारी और ऑफिशियल लिंक


    FAQ (Frequently Asked Questions)

    Q1. Disha Salian Case क्या है?
    यह 2020 में मुंबई में हुई एक संदिग्ध मौत का मामला है, जिसमें अब तक suicide और murder दोनों एंगल पर बहस जारी है।

    Q2. Bombay High Court ने क्या कहा?
    कोर्ट ने Mumbai Police को delay के लिए फटकार लगाते हुए कहा कि “कोई भी वजह देरी को justify नहीं करती।”

    Q3. क्या CBI ने केस बंद कर दिया है?
    CBI ने closure report में इसे suicide बताया, लेकिन family इससे सहमत नहीं है।

    Q4. SIT जांच कब शुरू हुई?
    दिसंबर 2023 में SIT बनाई गई थी, लेकिन अभी तक final report नहीं आई।

    Q5. अभी केस की स्थिति क्या है?
    Case ongoing है, कोर्ट monitoring कर रहा है, लेकिन final conclusion अभी बाकी है।

  • RERA का बड़ा आदेश: Omaxe को घर खरीदारों को देने होंगे ₹53.65 लाख, 3BHK पजेशन में 5 साल की देरी

    RERA का बड़ा आदेश: Omaxe को घर खरीदारों को देने होंगे ₹53.65 लाख, 3BHK पजेशन में 5 साल की देरी

    RERA Order Against OmaxeChandigarh Extension Developers को 3BHK फ्लैट की पजेशन में देरी के मामले में ₹53.65 लाख मुआवजा देने का आदेश। Mumbai के Andheri East के होमबायर्स को मिला बड़ा राहत।

    मुंबई: रियल एस्टेट सेक्टर में देरी से परेशान होमबायर्स के लिए बड़ी राहत की खबर सामने आई है। Punjab Real Estate Regulatory Authority (RERA) ने Omaxe Chandigarh Extension Developers को आदेश दिया है कि वह मुंबई के Andheri East में रहने वाले दो घर खरीदारों को करीब ₹53.65 लाख का मुआवजा (compensation) दे। यह फैसला New Chandigarh, Mohali में स्थित “The Lake Project” में 3BHK फ्लैट की पजेशन में पांच साल से ज्यादा की देरी के कारण सुनाया गया है।

    मुंबई के होमबायर्स ने RERA में दर्ज कराई थी शिकायत

    यह मामला Reena Thakur और Sujit Thakur, जो मुंबई के Andheri East के निवासी हैं, द्वारा दायर शिकायत के बाद सामने आया।

    दोनों ने Real Estate (Regulation and Development) Act, 2016 की Section 31 के तहत RERA में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ताओं की ओर से Advocate M Shahnawaz Khan ने पैरवी की, जबकि डेवलपर की ओर से Advocate Tejeshwar Singh अदालत में पेश हुए।

    2015 में बुक किया था 3BHK फ्लैट

    शिकायत के अनुसार, होमबायर्स ने 9 जुलाई 2015 को The Lake Project के Tower Caspean-B की 12वीं मंजिल पर एक 3BHK residential unit बुक किया था।

    इस फ्लैट की कुल कीमत ₹82,11,487 तय की गई थी।

    खरीदारों का कहना है कि उन्होंने कुल रकम का 90% से ज्यादा यानी ₹76,05,041 पहले ही डेवलपर को भुगतान कर दिया था।

    जनवरी 2019 तक मिलनी थी फ्लैट की पजेशन

    Buyer Agreement के अनुसार, डेवलपर को 42 महीने के भीतर यानी 8 जनवरी 2019 तक फ्लैट का पजेशन देना था

    लेकिन प्रोजेक्ट में लगातार देरी होती गई और पांच साल से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद भी घर खरीदारों को फ्लैट का कब्जा नहीं दिया गया

    RERA ने ₹53.65 लाख ब्याज के रूप में देने का आदेश दिया

    मामले की सुनवाई के बाद Punjab RERA ने Omaxe डेवलपर को निर्देश दिया कि वह खरीदारों को जमा की गई राशि पर Highest MCLR Rate + 2% के हिसाब से ब्याज दे।

    इस गणना के अनुसार कुल मुआवजा करीब ₹53,65,000 बनता है, जिसे डेवलपर को होमबायर्स को देना होगा।

    हर महीने बढ़ता रहेगा मुआवजा

    RERA के आदेश में यह भी कहा गया है कि जब तक डेवलपर Occupation Certificate (OC) या Completion Certificate (CC) लेकर फ्लैट का वैध पजेशन नहीं देता, तब तक मुआवजा बढ़ता रहेगा।

    आदेश के मुताबिक हर महीने करीब ₹62,383 की दर से compensation बढ़ता रहेगा

    Covid-19 को अनंत समय तक बहाना नहीं बना सकता डेवलपर

    RERA ने अपने आदेश में साफ कहा कि डेवलपर कोविड-19 महामारी को हमेशा के लिए देरी का कारण नहीं बता सकता

    अथॉरिटी ने कहा कि अगर प्रोजेक्ट में देरी हुई है तो उसके लिए डेवलपर जिम्मेदार होगा और उसे खरीदारों को उचित मुआवजा देना पड़ेगा।

    आदेश का पालन नहीं किया तो होगी सख्त कार्रवाई

    RERA ने चेतावनी दी है कि अगर डेवलपर इस आदेश का पालन नहीं करता है तो उसके खिलाफ RERA Act की Section 63 के तहत अलग से non-compliance proceedings शुरू की जा सकती हैं।

    इसका मतलब है कि कंपनी को भारी जुर्माना या कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।


    FAQ (Frequently Asked Questions)

    1. RERA ने Omaxe को कितना मुआवजा देने का आदेश दिया है?

    RERA ने करीब ₹53.65 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है।

    2. यह मामला किस प्रोजेक्ट से जुड़ा है?

    यह मामला The Lake Project, New Chandigarh (Mohali) से जुड़ा है।

    3. शिकायत किसने दर्ज कराई थी?

    मुंबई के Andheri East के निवासी Reena Thakur और Sujit Thakur ने शिकायत दर्ज कराई थी।

    4. फ्लैट कब तक मिलना था?

    Agreement के अनुसार 8 जनवरी 2019 तक पजेशन मिलना था।

    5. हर महीने कितना अतिरिक्त मुआवजा बढ़ेगा?

    जब तक पजेशन नहीं मिलता, ₹62,383 प्रति माह मुआवजा बढ़ता रहेगा।

  • Mumbai Court का बड़ा फैसला: मां की हत्या में बेटे को Life Imprisonment

    Mumbai Court का बड़ा फैसला: मां की हत्या में बेटे को Life Imprisonment

    Mumbai Session Court ने Dahisar में मां की हत्या के मामले में आरोपी बेटे को IPC Section 302 के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई। Court ने Circumstantial Evidence के आधार पर दोषी ठहराया, Police Confession को सबूत नहीं माना।

    मुंबई: देश की आर्थिक राजधानी मुंबई शहर से एक सनसनीखेज Crime News सामने आई है। मुंबई की सेशन कोर्ट ने अपनी मां की हत्या करने वाले बेटे को Life Imprisonment की सजा सुनाई है। कोर्ट ने साफ कहा कि Circumstantial Evidence के आधार पर यह साबित होता है कि आरोपी ही हत्या के लिए जिम्मेदार है।

    🏛️ Court का फैसला: “Homicidal Death हुई, आरोपी जिम्मेदार”

    Additional Sessions Judge M Mohiuddin ने 24 फरवरी के अपने Judgment में कहा कि मृतका ललिता शेनॉय की मौत आरोपी की कस्टडी में हुई और यह Homicidal Death है।

    कोर्ट के मुताबिक:

    • घटना के समय घर में सिर्फ आरोपी मौजूद था
    • Crime Scene से Blood-Stained Items बरामद हुए
    • आरोपी यह नहीं बता सका कि मां को चोटें कैसे आईं

    जज ने कहा कि आरोपी द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण झूठा प्रतीत होता है, जो उसके खिलाफ मजबूत परिस्थिति जन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) है।

    📍 Dahisar की Chawl में रहता था आरोपी

    यह मामला मुंबई के Dahisar इलाके का है। आरोपी अपनी मां के साथ एक Chawl में रहता था।

    कोर्ट रिकॉर्ड के अनुसार:

    • घटना के समय घर में कोई अन्य परिवार सदस्य मौजूद नहीं था
    • पड़ोसियों ने बताया कि मां-बेटे के बीच कभी-कभी झगड़ा होता था

    📞 सुबह पुलिस को दी थी “Unknown Person” वाली जानकारी

    हत्या की रात के बाद अगली सुबह आरोपी ने पुलिस को फोन कर बताया कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने उसकी मां की हत्या कर दी है।

    जब पुलिस मौके पर पहुंची तो मां अपने कमरे में मृत पाई गई। कमरे से कई खून से सने सामान बरामद हुए, जिनमें शामिल थे:

    • Paper Cutter
    • खून से सने कपड़े
    • Pillow Cover

    🧾 कथित कबूलनामा, लेकिन Court ने नहीं माना

    कोर्ट ने नोट किया कि आरोपी ने पुलिस के सामने कथित रूप से कबूल किया था कि:

    • उसने मां को 30 Sleeping Tablets दीं
    • तकिए से मुंह दबाया
    • Paper Cutter से गला काटा

    उसने कहा कि झगड़े के बाद उसने “हमेशा के लिए बहस खत्म करने” के लिए यह कदम उठाया।

    लेकिन Indian Evidence Act की Section 25 और Bhartiya Nagrik Suraksha Sanhita की Section 23 के तहत पुलिस के सामने दिया गया Confession अदालत में मान्य नहीं होता।

    इसलिए कोर्ट ने आरोपी के बयान पर भरोसा नहीं किया और फैसला Circumstantial Evidence के आधार पर सुनाया।

    🔬 Forensic Report और Medical Evidence

    जांच के दौरान पुलिस ने कमरे से कई सामान जब्त किए:

    • Paper Cutter
    • Blood-Stained Clothes
    • Pillow
    • Mattress का टुकड़ा

    Forensic Tests में कुछ सामान पर Human Blood की पुष्टि हुई। Medical Examination में पाया गया कि मौत गर्दन पर गहरे कट (Deep Incised Neck Injuries) के कारण हुई।

    हालांकि Paper Cutter पर आरोपी के Fingerprints नहीं मिले, लेकिन कोर्ट ने कहा कि घटना के समय घर में और कोई नहीं था।

    ❗ आरोपी का “Unnatural Conduct” भी बना सबूत

    कोर्ट ने आरोपी के व्यवहार पर भी सवाल उठाए।

    जज ने कहा:

    • अगर कोई अज्ञात व्यक्ति हत्या करता, तो आरोपी शोर मचाता
    • पड़ोसियों को बुलाता
    • मां को अस्पताल ले जाने की कोशिश करता

    लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया और सुबह तक चुप रहा। कोर्ट ने इसे “Unnatural Conduct” मानते हुए आरोपी के खिलाफ मजबूत परिस्थिति माना।

    ⚖️ सजा और जुर्माना

    कोर्ट ने आरोपी को Indian Penal Code की Section 302 के तहत Murder का दोषी ठहराया।

    सजा:

    • Life Imprisonment
    • ₹5,000 Fine
    • Fine नहीं भरने पर 3 महीने की अतिरिक्त सजा

    कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी 29 नवंबर 2018 से न्यायिक हिरासत में है और Code of Criminal Procedure की Section 428 के तहत जेल में बिताया गया समय सजा में Adjust किया जाएगा।

    👩‍⚖️ कौन थे वकील?

    • आरोपी की ओर से Advocate Shashikant Damodarlal Chandak (Legal Aid) और Kanchan Chandak पेश हुए।
    • राज्य की ओर से Additional Public Prosecutor PS Rathod ने पैरवी की।

    ❓ FAQ Section

    1. आरोपी को किस धारा में सजा मिली?

    IPC Section 302 (Murder) के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई गई।

    2. क्या आरोपी का Confession कोर्ट में माना गया?

    नहीं, Indian Evidence Act और BNSS Act के तहत पुलिस के सामने दिया गया Confession मान्य नहीं होता।

    3. सजा क्या है?

    Life Imprisonment और ₹5,000 जुर्माना।

    4. घटना कब की है?

    आरोपी को 29 नवंबर 2018 को गिरफ्तार किया गया था और तभी से वह न्यायिक हिरासत में है।

  • Mental Healthcare Act को Litigation Weapon नहीं बना सकते: Bombay HC

    Mental Healthcare Act को Litigation Weapon नहीं बना सकते: Bombay HC

    Bombay High Court ने साफ किया कि Mental Healthcare Act 2017 और Section 105 का इस्तेमाल property dispute या किसी भी litigation में विरोधी की mental capacity पर सवाल उठाने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा – यह कानून protection के लिए है, harassment के लिए नहीं।

    मुंबई: शहर में चल रहे एक अहम property dispute case में Bombay High Court ने बड़ा और साफ संदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि Mental Healthcare Act, 2017 को किसी भी पक्ष द्वारा सामने वाले की mental capacity पर सवाल उठाने के लिए “litigation weapon” की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यह कानून कमजोर और जरूरतमंद लोगों की हिफाज़त के लिए है, न कि कोर्ट में बढ़त लेने की चाल के लिए।

    ⚖️ Welfare Law के Misuse पर सख्त टिप्पणी

    17 फरवरी को जस्टिस Farhan Dubash ने सुनवाई के दौरान कहा कि सिर्फ एक पक्ष के आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति की जांच के लिए Mental Health Review Board (MHRB) को रेफर करना कानून के गलत इस्तेमाल का रास्ता खोल सकता है।

    कोर्ट ने साफ कहा कि अगर ऐसा होने लगा तो welfare legislation को adversarial parties अपने फायदे के लिए “weaponise” करने लगेंगी। इससे कानून का असली मकसद ही खत्म हो जाएगा।

    📜 Section 105 की सही व्याख्या

    कोर्ट ने समझाया कि Section 105 of Mental Healthcare Act 2017 अदालत को यह अधिकार देता है कि अगर न्यायिक प्रक्रिया के दौरान mental illness का पुख्ता सबूत हो, तभी मामले को Mental Health Review Board के पास भेजा जा सकता है।

    लेकिन जस्टिस दुबाश ने कहा कि इस प्रावधान को पूरे कानून के उद्देश्य के साथ पढ़ना जरूरी है। इसका मकसद है rights protection, न कि किसी विरोधी पक्ष के खिलाफ सबूत इकट्ठा करने का तरीका।

    कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा:

    “यह कानून मानसिक बीमारी से जूझ रहे लोगों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए है, न कि किसी प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ इस्तेमाल होने वाला हथियार।”

    🏠 Property Dispute का पूरा मामला

    यह फैसला एक ongoing property dispute in Mumbai के दौरान आया। बेटे ने अपने पिता की मानसिक स्थिति पर सवाल उठाते हुए एक independent medical board बनाने की मांग की थी।

    बेटे का दावा था कि उसके पिता मुकदमे को समझने और लड़ने में सक्षम नहीं हैं। उसने एक medical certificate भी पेश किया, जिसमें confusion और forgetfulness के एपिसोड का जिक्र था। डॉक्टरों ने इन लक्षणों को diabetes से जुड़ी hypoglycaemia की वजह बताया था।

    🩺 Temporary Symptoms को Mental Illness नहीं माना

    कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट का बारीकी से अध्ययन किया और कहा कि जिन लक्षणों का जिक्र है, वे अस्थायी (temporary) और medically reversible थे। ब्लड शुगर लेवल में उतार-चढ़ाव के कारण ऐसी स्थिति बन सकती है।

    इसलिए इसे mental illness under Mental Healthcare Act की कानूनी परिभाषा में नहीं रखा जा सकता।

    🚫 Harassment का रास्ता नहीं खुलेगा

    कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा:

    “अगर ऐसी मांगों को मंजूरी दी गई तो बेईमान litigants कानून को harassment के हथियार की तरह इस्तेमाल करेंगे।”

    कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा होने से हर मुकदमे में एक पक्ष दूसरे की mental fitness पर सवाल उठाकर litigation strategy के तहत फायदा उठाने की कोशिश करेगा।

    🔄 Mental Health Law में बदलाव की याद दिलाई

    कोर्ट ने कहा कि 2017 का कानून भारत में mental health law का बड़ा बदलाव है। पहले की व्यवस्था custodial और stigma-driven थी, लेकिन अब यह rights-based framework है, जो dignity, autonomy, treatment और rehabilitation पर फोकस करता है।

    🛡️ “Shield है, Sword नहीं”

    कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि Section 105 एक “shield” है, जो मानसिक बीमारी से जूझ रहे लोगों की सुरक्षा करता है, न कि एक “sword” जो किसी के खिलाफ कोर्ट में चलाया जाए।

    ❌ कोर्ट ने याचिका खारिज की

    अदालत ने पाया कि बेटे की अर्जी पिता के welfare से ज्यादा ongoing litigation में advantage लेने की कोशिश थी।

    साथ ही कोर्ट ने यह भी नोट किया कि इसी तरह की एक अर्जी पहले भी दायर की गई थी, जिसे बिना दोबारा दाखिल करने की अनुमति के वापस ले लिया गया था।

    इसी आधार पर कोर्ट ने अंतरिम आवेदन (interim application) खारिज कर दिया।


    ❓ FAQ (Frequently Asked Questions)

    Q1. Bombay High Court ने क्या फैसला दिया?

    कोर्ट ने कहा कि Mental Healthcare Act 2017 को property dispute या किसी भी litigation में विरोधी की mental capacity पर सवाल उठाने के हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

    Q2. Section 105 क्या है?

    Section 105 अदालत को यह अधिकार देता है कि यदि मानसिक बीमारी का सबूत हो तो मामले को Mental Health Review Board को भेजा जा सकता है।

    Q3. इस केस में मेडिकल रिपोर्ट में क्या था?

    रिपोर्ट में confusion और भूलने की समस्या बताई गई थी, जो diabetes से जुड़ी hypoglycaemia के कारण अस्थायी रूप से हुई थी।

    Q4. कोर्ट ने याचिका क्यों खारिज की?

    कोर्ट को लगा कि यह अर्जी पिता के हित के बजाय litigation advantage पाने के लिए दाखिल की गई थी।

    Q5. Mental Healthcare Act 2017 का मुख्य उद्देश्य क्या है?

    यह एक rights-based law है, जिसका मकसद mental illness से जूझ रहे लोगों की dignity, autonomy और protection सुनिश्चित करना है।