Category: Court Cases

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  • दिंडोशी सत्र न्यायालय ने पॉक्सो आरोपी फरहान खान को 20 साल सश्रम कारावास की सज़ा सुनाई

    दिंडोशी सत्र न्यायालय ने पॉक्सो आरोपी फरहान खान को 20 साल सश्रम कारावास की सज़ा सुनाई

    एमएचबी कॉलोनी पुलिस थाने के पॉक्सो केस में आरोपी फरहान साकिब खान (27) को दिंडोशी सत्र न्यायालय ने 20 साल सश्रम कारावास और जुर्माने की सज़ा सुनाई। केस की जांच एमएचबी पुलिस टीम ने की थी।

    मुंबई: दिंडोशी सत्र न्यायालय ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में एम.एच.बी. कॉलोनी पुलिस स्टेशन में दर्ज पॉक्सो अपराध के आरोपी फरहान साकिब खान (27 वर्ष) को 20 वर्ष सश्रम कारावास की सज़ा सुनाई। आरोपी को अलग-अलग धाराओं के तहत कुल मिलाकर कई सजाएँ दी गईं, जिनमें धारा 363, 376(2)(n), 506(2) भारतीय दंड संहिता (IPC) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 5(1)(m) व 6 शामिल हैं।

    अदालत का फैसला

    माननीय सत्र न्यायाधीश श्रीमती एस.एन. सचदेव (कोर्ट नंबर 13) ने आदेश में कहा कि आरोपी ने नाबालिग पीड़िता के साथ गंभीर अपराध किया है, इसलिए उसे 20 वर्ष सश्रम कारावास और ₹1000 का आर्थिक दंड दिया जाता है। यदि दंड राशि अदा नहीं की गई, तो आरोपी को एक माह का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा।

    इसके अलावा, अन्य धाराओं के तहत —

    • धारा 363 (अपहरण) के तहत 3 वर्ष सश्रम कारावास और ₹1000 जुर्माना,
    • धारा 376(2)(n) (बलात्कार) के तहत 10 वर्ष सश्रम कारावास,
    • धारा 506(2) (धमकी देना) के तहत 1 वर्ष सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई।

    सभी सजाएँ साथ-साथ चलेंगी (Concurrent Sentences)।

    पुलिस की प्रभावी कार्रवाई

    इस मामले में तत्कालीन जांच अधिकारी पुलिस निरीक्षक प्रकाश जाधव ने आरोपपत्र (Chargesheet) न्यायालय में प्रस्तुत किया था। मुकदमे के दौरान सरकारी अभियोक्ता देवतरसे साहब, चव्हाण मैडम और जाधव मैडम ने केस की पैरवी की।

    पूरी जांच और कार्रवाई वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक हरीश गवळी, पो. नि. अतुल आव्हाड (गुन्हे विभाग), और मा. पो. आ. घनवटे सर के मार्गदर्शन में की गई। न्यायालयीन कार्यवाही की निगरानी म. पो. ह. सातपुते ने की।

    मामले का पृष्ठभूमि (Case Background)

    यह मामला एम.एच.बी. कॉलोनी पुलिस थाने में गुन्हा क्रमांक 288/2019 के तहत दर्ज किया गया था। आरोपी फरहान खान पर नाबालिग बालिका के अपहरण और यौन शोषण का आरोप था। पुलिस ने जांच पूरी कर 2019 में ही न्यायालय में चार्जशीट दाखिल की थी। लगातार सुनवाई के बाद आज न्यायालय ने आरोपी को दोषी ठहराया और सख्त सजा सुनाई।

    Flip kart से चोरी Swiggy में डिलीवरी पुलिस ने किया गिरफ्तार।

    जनहित के नज़रिए से

    पॉक्सो (POCSO) अधिनियम का उद्देश्य नाबालिगों को यौन शोषण से सुरक्षा देना है। यह फैसला समाज को संदेश देता है कि बच्चों के खिलाफ अपराध करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। पुलिस अधिकारियों ने कहा कि यह सज़ा कानून के प्रति विश्वास को मजबूत करेगी और भविष्य में ऐसे अपराधों पर रोक लगाएगी।


    FAQ सेक्शन:

    प्रश्न 1: आरोपी को कितनी सजा मिली है?
    👉 आरोपी को कुल 20 वर्ष सश्रम कारावास और ₹1000 का जुर्माना लगाया गया है।
    प्रश्न 2: केस किस पुलिस थाने में दर्ज था?
    👉 यह केस एम.एच.बी. कॉलोनी पुलिस थाने में दर्ज था।
    प्रश्न 3: जांच अधिकारी कौन थे?
    👉 तत्कालीन जांच अधिकारी पुलिस निरीक्षक प्रकाश जाधव थे।
    प्रश्न 4: फैसला किस न्यायाधीश ने सुनाया?
    👉 यह फैसला माननीय सत्र न्यायाधीश श्रीमती एस.एन. सचदेव (कोर्ट नं. 13) ने सुनाया।
    प्रश्न 5: पुलिस टीम में कौन-कौन अधिकारी शामिल थे?
    👉 वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक हरीश गवळी, पो.नि. अतुल आव्हाड, मा.पो.आ. घनवटे सर और म.पो.ह. सातपुते इस केस में शामिल थे।

  • मुंबई के वकील ने NHRC से की शिकायत, कहा– “खतरनाक पटाखे बन गए ज़हर”

    मुंबई के वकील ने NHRC से की शिकायत, कहा– “खतरनाक पटाखे बन गए ज़हर”

    मुंबई के वकील हितेंद्र गांधी ने मानवाधिकार आयोग (NHRC) से मांग की है कि कार्बाइड आधारित खतरनाक पटाखों पर रोक लगाई जाए। उन्होंने कहा कि ये पटाखे लोगों की सेहत, पर्यावरण और जानवरों के लिए गंभीर खतरा बन रहे हैं।

    मुंबई: जाने-माने वकील हितेंद्र गांधी ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को एक याचिका दाखिल की है जिसमें उन्होंने कार्बाइड बेस्ड (Carbide-Based) खतरनाक पटाखों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।
    उनका कहना है कि ये पटाखे न सिर्फ लोगों की सेहत और पर्यावरण के लिए खतरनाक हैं, बल्कि जानवरों और बच्चों की सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा बन चुके हैं।

    गांधी ने NHRC से आग्रह किया है कि इस मुद्दे पर राष्ट्रीय अध्ययन कराया जाए, सार्वजनिक एडवाइजरी जारी की जाए, और सुरक्षा नियमों के उल्लंघन पर कड़े कदम उठाए जाएं — ताकि दिवाली की धार्मिक भावना बनी रहे, पर सेहत और पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे।

    🌫️ दिवाली के बाद बढ़ता प्रदूषण, बिगड़ती हवा की गुणवत्ता

    वकील की याचिका में कहा गया है कि सरकारी मॉनिटरिंग स्टेशन और एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) हर साल दिवाली के बाद PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म प्रदूषक तत्वों में तेज़ उछाल दिखाते हैं।
    कई शहरों में दिवाली की रातों के बाद हवा की स्थिति “Very Poor” से “Severe” कैटेगरी तक पहुंच जाती है।

    हालांकि ग्रीन क्रैकर्स को लागू करने की सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन पहले से मौजूद है, लेकिन वकील का कहना है कि अभी भी गैर-प्रमाणित और जहरीले पटाखे खुलेआम बिक रहे हैं

    🚫 “ग्रीन पटाखे” के बावजूद नहीं थमा जहरीले धुएं का असर

    हितेंद्र गांधी का कहना है कि “ग्रीन पटाखे” के नियमों के बावजूद गैर-लाइसेंसशुदा फायरवर्क्स और कार्बाइड बेस्ड पटाखों की बिक्री जारी है।
    इनसे निकलने वाला धुआं न सिर्फ इंसानों के लिए सांस संबंधी खतरे पैदा करता है बल्कि बच्चों, बुजुर्गों और जानवरों पर भी सीधा असर डालता है।

    🐶 जानवरों पर भी गहरा असर

    याचिका में बताया गया है कि पशु कल्याण संस्थाएं और वेटरनरी क्लीनिक दिवाली के बाद घायल और डरे हुए जानवरों की संख्या में तेज़ बढ़ोतरी दर्ज करते हैं।
    कई शहरों में सैकड़ों पालतू और आवारा जानवर धमाकों और धुएं के कारण घायल या भाग जाते हैं।
    यह स्थिति हर साल मानवता और करुणा की भावना को ठेस पहुंचाती है।

    💣 कार्बाइड गन — नया खतरा बनते “घरेलू बम”

    हितेंद्र गांधी ने अपनी याचिका में “कार्बाइड गन” या घरेलू विस्फोटक उपकरणों की भी चर्चा की है।
    इन गैरकानूनी और असुरक्षित पटाखों के कारण भोपाल से बेंगलुरु तक 130 से ज्यादा लोग, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं, गंभीर रूप से घायल हुए हैं।

    इन “कार्बाइड गनों” के वीडियो सोशल मीडिया पर आसानी से मिल जाते हैं और कोई भी इन्हें घर पर बना सकता है।
    यह चलन अब सार्वजनिक सुरक्षा संकट (Public Safety Crisis) बन चुका है।

    ⚖️ “मानवाधिकार का उल्लंघन” – याचिका में गंभीर आरोप

    वकील ने कहा,

    “ये घटनाएं सिर्फ कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि मानवाधिकारों का सीधा हनन हैं — खासकर जीवन, स्वास्थ्य और गरिमा के अधिकार का।”

    उन्होंने आयोग से अपील की है कि NHRC सरकार को सिफारिश करे कि

    • कार्बाइड आधारित पटाखों पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध लगाया जाए,
    • Explosives Act और अन्य नियमों को सख्ती से लागू किया जाए,
    • और इस मामले पर जागरूकता अभियान चलाया जाए ताकि उत्सव का असली प्रकाश जीवन और करुणा के साथ जुड़ा रहे।

    ❓FAQs

    Q1. किसने NHRC में याचिका दाखिल की है?
    मुंबई के वकील हितेंद्र गांधी ने यह याचिका दाखिल की है।

    Q2. याचिका में क्या मांग की गई है?
    कार्बाइड आधारित पटाखों पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध, और सुरक्षा नियमों की सख्त पालना की मांग की गई है।

    Q3. क्या “ग्रीन क्रैकर्स” से प्रदूषण कम हुआ है?
    नहीं, वकील का कहना है कि ग्रीन क्रैकर्स के बावजूद प्रदूषण स्तर में सुधार नहीं आया।

    Q4. जानवरों पर क्या असर पड़ता है?
    तेज धमाकों और धुएं से जानवर डर जाते हैं, कई घायल या भाग जाते हैं।

    Q5. “कार्बाइड गन” क्या है?
    यह एक असुरक्षित घरेलू विस्फोटक उपकरण है जो दिवाली में धमाके के लिए बनाया जाता है, और इससे कई दुर्घटनाएं हो चुकी हैं।

  • बॉम्बे हाईकोर्ट में महाराष्ट्र सरकार का बयान: दिव्यांगों को दिए गए “खराब ई-रिक्शा” की होगी जांच

    बॉम्बे हाईकोर्ट में महाराष्ट्र सरकार का बयान: दिव्यांगों को दिए गए “खराब ई-रिक्शा” की होगी जांच

    महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट को आश्वासन दिया है कि वह दिव्यांग व्यक्तियों को दिए गए ई-रिक्शों की तकनीकी जांच करवाएगी। कई लाभार्थियों ने आरोप लगाया था कि सरकार की योजना के तहत मिले वाहन “खराब” और “असुरक्षित” हैं।

    मुंबई: महाराष्ट्र सरकार के समाज कल्याण विभाग की एक योजना के तहत दिव्यांग लोगों को ई-रिक्शा (e-rickshaw) दिए गए थे ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।
    लेकिन अब इन वाहनों की गुणवत्ता और सुरक्षा पर सवाल उठ गए हैं।

    लगभग 115 दिव्यांग लाभार्थियों ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि उन्हें जो ई-रिक्शे मिले हैं, वो “खराब हालत में” हैं और चलाने के लायक नहीं हैं।
    इन शिकायतों के बाद कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा — और अब सरकार ने कहा है कि वह तकनीकी जांच कराएगी और रिपोर्ट पेश करेगी।

    योजना की शुरुआत और खर्च

    इस योजना की शुरुआत 10 जून 2019 को समाज न्याय विभाग (Social Justice Department) के एक सरकारी निर्णय (GR) से हुई थी।
    इस योजना के तहत लगभग 800 ई-रिक्शे दिव्यांग व्यक्तियों को 20 करोड़ रुपये की लागत से बांटे गए थे।
    योजना का नाम था —
    “Green Energy Powered Environment-Friendly Mobile Shop for Disabled Persons to Become Self-Reliant”

    लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कई वाहन तकनीकी रूप से दोषपूर्ण हैं और इनमें सुरक्षा संबंधी खामियां हैं।

    कोर्ट में क्या हुआ?

    15 अक्टूबर को जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और जस्टिस संदीश डी. पाटिल की डिवीजन बेंच ने इस मामले की सुनवाई की।
    याचिकाकर्ताओं की तरफ से वकील असीम सरोदे और श्रिय आळवे ने कहा कि सरकार ने उन्हें “डिफेक्टिव” यानी खराब वाहन देकर उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया है।

    उन्होंने यह भी मांग की कि

    • एक स्वतंत्र जांच एजेंसी नियुक्त की जाए,
    • और सरकारी खरीद प्रक्रिया (procurement process) की जांच की जाए ताकि यह पता चल सके कि क्या ई-रिक्शा की खरीद में गड़बड़ी हुई थी।

    सरकार और कंपनी का जवाब

    सरकार की ओर से एडिशनल गवर्नमेंट प्लीडर भूपेश सामंत ने कोर्ट को बताया कि
    Maharashtra State Handicapped Finance and Development Corporation (MSHFDC) हर जिले में एक तकनीकी अधिकारी नियुक्त करेगी जो इन ई-रिक्शों की जांच करेगा।

    वहीं, सप्लायर कंपनी Mac Auto India ने भी कहा कि वह सिर्फ इन 115 याचिकाकर्ताओं के नहीं, बल्कि सभी लाभार्थियों के वाहनों की मरम्मत या जांच करेगी।

    कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि वह तकनीकी रिपोर्ट नवंबर 19, 2025 तक पेश करे और इस पूरी जांच में सोशल जस्टिस डिपार्टमेंट पूरा सहयोग करे।

    आरोप क्या हैं?

    • याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ई-रिक्शे कमज़ोर बॉडी और घटिया पार्ट्स से बने हैं।
    • कई वाहनों की बैटरी और मोटर कुछ ही महीनों में फेल हो गई।
    • सरकार ने बाजार मूल्य से अधिक दरों पर खरीदारी की है।
    • कोई बाद की सर्विस या मेंटेनेंस सपोर्ट नहीं दिया गया।

    अदालत की टिप्पणी

    कोर्ट ने पहले ही 3 अक्टूबर को कहा था कि याचिकाकर्ताओं की शिकायतें गंभीर और सटीक लगती हैं।
    अब अदालत इस बात पर नज़र रखेगी कि सरकार और कंपनी जांच में पारदर्शिता बरतती है या नहीं।

    दिव्यांगों की पीड़ा

    दिव्यांग लोगों का कहना है कि ये ई-रिक्शे आजीविका का एकमात्र साधन हैं।
    “खराब वाहन” मिलने की वजह से उनकी रोज़मर्रा की कमाई ठप पड़ गई है।
    कई लोगों को कर्ज चुकाने में मुश्किल हो रही है क्योंकि उन्होंने वाहन पर लोन लिया था।


    FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

    Q1. मामला किस बारे में है?
    ➡️ दिव्यांग लाभार्थियों को सरकार की योजना के तहत दिए गए ई-रिक्शे खराब निकले, जिस पर बॉम्बे हाईकोर्ट में मामला चल रहा है।

    Q2. कितने लोगों ने याचिका दायर की है?
    ➡️ लगभग 115 दिव्यांग व्यक्तियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है।

    Q3. योजना कब शुरू हुई थी?
    ➡️ यह योजना 10 जून 2019 को समाज न्याय विभाग के आदेश से शुरू की गई थी।

    Q4. क्या सरकार ने जांच के लिए हामी भरी है?
    ➡️ हां, महाराष्ट्र सरकार ने कहा है कि वह सभी ई-रिक्शों की तकनीकी जांच करवाएगी।

    Q5. अगली सुनवाई कब होगी?
    ➡️ अगली सुनवाई 19 नवंबर 2025 को निर्धारित की गई है।

  • Bombay High Court ने Shilpa Shetty और Raj Kundra की Phuket जाने की अर्जी ठुकराई, LOC रहेगा लागू

    Bombay High Court ने Shilpa Shetty और Raj Kundra की Phuket जाने की अर्जी ठुकराई, LOC रहेगा लागू

    Bombay High Court ने Shilpa Shetty और उनके पति Raj Kundra की Phuket ट्रिप के लिए विदेश यात्रा की अर्जी खारिज कर दी है। कोर्ट ने गंभीर मामलों की लंबित जांच का हवाला देते हुए यह फैसला सुनाया।

    डिजिटल डेस्क
    मुंबई: बॉलीवुड एक्ट्रेस Shilpa Shetty और बिज़नेसमैन Raj Kundra की तीन दिन की फैमिली वेकेशन ट्रिप के लिए दी गई अर्जी को बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) ने खारिज कर दिया है। कपल ने कोर्ट से Thailand के Phuket जाने की परमिशन मांगी थी, लेकिन कोर्ट ने साफ इनकार कर दिया।

    गंभीर केस का हवाला देते हुए अर्जी खारिज

    इस केस की सुनवाई चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस गौतम अंकड की बेंच ने की।
    सरकार के वकील ने कहा कि जब तक Economic Offences Wing (EOW) की जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक विदेश यात्रा की इजाज़त नहीं दी जा सकती।

    • केस बिज़नेसमैन Deepak Kothari की शिकायत पर दर्ज हुआ था।
    • आरोप है कि शिल्पा शेट्टी और राज कुंद्रा ने उनकी कंपनी में 60 करोड़ रुपये निवेश करने के लिए कहा और फिर पैसा डाइवर्ट कर लिया।
    • कोर्ट ने कहा कि ऐसे “गंभीर आरोप” लंबित रहने के दौरान विदेश यात्रा की परमिशन देना उचित नहीं है।

    Lookout Circular (LOC) रहेगा लागू

    Mumbai Police की Economic Offences Wing ने पहले ही कपल के खिलाफ Lookout Circular (LOC) जारी कर रखा है। इसका मतलब है कि बिना कोर्ट की अनुमति के वे विदेश नहीं जा सकते।

    राज कुंद्रा और शिल्पा शेट्टी ने दलील दी थी कि:

    • राज कुंद्रा को बिज़नेस के लिए बार-बार विदेश जाना पड़ता है।
    • शिल्पा शेट्टी की भी विदेश में प्रोफेशनल कमिटमेंट्स रहती हैं।
    • विदेश यात्रा पर रोक लगाना उनके Fundamental Rights का उल्लंघन है।

    लेकिन कोर्ट ने यह दलील मानने से इनकार कर दिया।

    EOW की जांच जारी

    जानकारी के मुताबिक, Raj Kundra पहले भी EOW के सामने पेश हो चुके हैं और उनसे पूछताछ की गई है।
    अब इस मामले की अगली सुनवाई दो हफ्ते बाद होगी। तब तक LOC लागू रहेगा और कपल विदेश यात्रा नहीं कर पाएगा।


    FAQ Section

    Q1. Shilpa Shetty और Raj Kundra को Phuket जाने की परमिशन क्यों नहीं मिली?
    Ans: Bombay HC ने कहा कि उनके खिलाफ गंभीर आर्थिक अपराध के केस पेंडिंग हैं, इसलिए विदेश यात्रा की अनुमति नहीं दी जा सकती।

    Q2. यह केस किसकी शिकायत पर दर्ज हुआ है?
    Ans: बिज़नेसमैन दीपक कोठारी ने शिकायत की थी कि कपल ने उनकी 60 करोड़ रुपये की इन्वेस्टमेंट का गलत इस्तेमाल किया।

    Q3. क्या Lookout Circular अभी भी लागू है?
    Ans: हाँ, LOC जारी रहेगा और दोनों बिना कोर्ट की अनुमति विदेश नहीं जा सकते।

    Q4. अगली सुनवाई कब होगी?
    Ans: अगली सुनवाई दो हफ्ते बाद होगी।

  • दादर स्विमिंग पूल में नाबालिग लड़कियों से छेड़छाड़ करने वाले शख्स को 3 साल की जेल

    दादर स्विमिंग पूल में नाबालिग लड़कियों से छेड़छाड़ करने वाले शख्स को 3 साल की जेल

    मुंबई की एक स्पेशल कोर्ट ने दादर स्विमिंग पूल में 12 और 13 साल की नाबालिग बच्चियों से छेड़छाड़ करने वाले आरोपी को 3 साल की सजा सुनाई है। केस में सबूत, गवाह और पहचान ने आरोपी को दोषी साबित किया।

    मुंबई: दादर के इलाके में पाँच साल पहले हुई शर्मनाक वारदात में अब अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। 30 साल के आरोपी को स्पेशल जज बी.आर. गारे ने तीन साल की सज़ा सुनाई। आरोपी ने 2020 में स्विमिंग पूल में तैर रही दो नाबालिग लड़कियों के साथ यौन शोषण किया था।

    घटना कैसे हुई?

    6 मार्च 2020 को 13 साल की एक लड़की दादर के स्विमिंग पूल में तैर रही थी। तभी एक शख्स ने उसके स्विमिंग कॉस्ट्यूम में हाथ डालकर उसकी प्राइवेट पार्ट को दबाया। घबराई हुई बच्ची ने तुरंत ट्रेनर और लाइफगार्ड को बताया।

    इसी दौरान 12 साल की दूसरी बच्ची ने भी उसी आदमी पर आरोप लगाया कि उसने उसके साथ भी छेड़छाड़ की है। दोनों बच्चियों ने तुरंत आरोपी को पहचान लिया।

    FIR और जांच में क्या हुआ?

    पहली बच्ची के पिता ने अगले दिन थाने में FIR दर्ज करवाई। आरोपी ने खुद को निर्दोष बताते हुए कहा कि पूल में करीब 30 लोग थे और उसकी पहचान गलत हुई है। साथ ही FIR देर से दर्ज होने और CCTV फुटेज न होने पर भी सवाल उठाए।

    लेकिन पुलिस ने कोर्ट में आठ गवाह पेश किए, जिसमें दोनों नाबालिग बच्चियाँ भी शामिल थीं।

    कोर्ट ने क्या कहा?

    जज बी.आर. गारे ने कहा कि बच्चियों का डर और सदमे में होना FIR में हुई एक दिन की देरी का संतोषजनक कारण है। दोनों बच्चियों ने आरोपी को मौके पर और बाद में अदालत में भी पहचान लिया।

    कोर्ट ने माना कि आरोपी ने यौन इरादे से बच्चियों के प्राइवेट पार्ट को छुआ और यह POCSO Act के तहत अपराध है।

    सजा और कानून

    अदालत ने आरोपी को यौन उत्पीड़न और छेड़छाड़ (Sexual Harassment & Assault) के आरोप में दोषी ठहराया और तीन साल की जेल की सजा सुनाई।


    FAQs

    Q1: डाडर स्विमिंग पूल केस कब हुआ था?
    👉 यह घटना 6 मार्च 2020 को हुई थी।

    Q2: इस केस में कितनी बच्चियों ने शिकायत की थी?
    👉 कुल दो नाबालिग बच्चियों (12 और 13 साल) ने आरोपी पर आरोप लगाया।

    Q3: आरोपी को कितनी सजा हुई है?
    👉 अदालत ने आरोपी को तीन साल कैद की सजा सुनाई है।

    Q4: क्या घटना का CCTV फुटेज था?
    👉 नहीं, पुलिस ने बताया कि पूल में CCTV कैमरे मौजूद नहीं थे।

    Q5: आरोपी ने अपनी सफाई में क्या कहा?
    👉 आरोपी ने कहा कि पूल में करीब 30 लोग थे और उसे गलत पहचान लिया गया है।

  • Aksa Beach to be demolished: एनजीटी ने 2 महीने में तोड़ने का आदेश दिया

    Aksa Beach to be demolished: एनजीटी ने 2 महीने में तोड़ने का आदेश दिया

    मलाड वेस्ट के Aksa Beach पर महाराष्ट्र मैरीटाइम बोर्ड (MMB) द्वारा बनाया गया 600 मीटर लंबा प्रोमेनेड एनजीटी ने अवैध ठहराया। CRZ नियमों के उल्लंघन पर इसे 2 महीने में गिराने का आदेश। जानिए पूरी रिपोर्ट।

    मुंबई: मलाड वेस्ट में मशहूर Aksa Beach पर महाराष्ट्र सागरी मंडल (MMB) ने 2023 में करीब ₹11.83 करोड़ खर्च करके 600 मीटर लंबा प्रोमेनेड और 4 मीटर चौड़ा रास्ता बना दिया था। लेकिन अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने इसे पूरी तरह अवैध मानते हुए 2 महीने के अंदर तोड़ने का आदेश दे दिया है।

    📜 कैसे हुआ विवाद?

    • 2017 में MMB ने बीच पर सीफ्रंट डेवलपमेंट का प्रस्ताव रखा।
    • लेकिन Maharashtra Coastal Zone Management Authority (MCZMA) ने यह कहते हुए रिजेक्ट कर दिया कि यह एरिया Coastal Regulation Zone (CRZ) में आता है।
    • 2019 में MCZMA ने केवल एंटी-इरोशन बंड (Anti-Erosion Bund) बनाने की अनुमति दी, पर शर्त रखी कि बीच पर कॉन्क्रीट या पक्का स्ट्रक्चर नहीं बनेगा।
    • इसके बावजूद 2023 में UCR वॉल और कॉबल स्टोन पाथवे बना दिया गया।

    ⚠️ क्यों पड़ा मुद्दा गम्भीर?

    • यह प्रोमेनेड इंटर-टाइडल ज़ोन (High Tide और Low Tide के बीच का इलाका) में बना है, जो इकोलॉजिकल एरिया माना जाता है।
    • एक्टिविस्ट बांदा कुमार और ज़ोरु बाथेना ने NGT में शिकायत करते हुए कहा कि:
    • प्रोमेनेड बीच को सेडिमेंटेशन से रोक देगा
    • बीच का नैचुरल सैंड डिपॉज़िशन बंद हो जाएगा।
    • लगातार बीच इरोशन (कटाव) बढ़ेगा।
    • सबूत यह भी है कि पिछले साल और इस साल प्रोमेनेड का बड़ा हिस्सा ज्वार से टूटकर बह गया

    ⚖️ NGT का फैसला

    NGT ने माना कि MMB का इरादा लैंड को बाढ़ और कटाव से बचाने का था, लेकिन इसके लिए जो काम हुआ वह CRZ नियमों का सीधा उल्लंघन है।
    इसलिए, 2 महीने के भीतर प्रोमेनेड तोड़ने का आदेश दिया गया है।

  • मुंबई DRT-III लोक अदालत में 122 केस सुलझे, ₹34.69 करोड़ की रिकवरी

    मुंबई DRT-III लोक अदालत में 122 केस सुलझे, ₹34.69 करोड़ की रिकवरी

    मुंबई DRT-III में नेशनल लोक अदालत के दौरान 122 मामले निपटाए गए और ₹34.69 करोड़ की रिकवरी हुई। इस प्रक्रिया में बैंक अफसरों, वकीलों और स्टाफ ने अहम भूमिका निभाई।

    मुंबई: डेब्ट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल-III (DRT-III) में शनिवार को नेशनल लोक अदालत का आयोजन हुआ। इस लोक अदालत में कुल 122 मामलों का निपटारा किया गया और बैंकों को करीब ₹34.69 करोड़ की रिकवरी हासिल हुई।

    ये लोक अदालत स्रीकला सुरेश, इंचार्ज प्रेसीडिंग ऑफिसर के मार्गदर्शन में हुई। कार्यक्रम का संचालन पूरी तरह से सौहार्दपूर्ण माहौल में किया गया।

    पैनल और मेंबर्स की अहम भूमिका

    कार्यवाही की अध्यक्षता पूर्व प्रेसीडिंग ऑफिसर वी.एन. लोथे पाटिल ने की। उनके साथ पैनल में सुधांशु एस. साहू (डिप्टी जनरल मैनेजर, केनरा बैंक) और एडवोकेट सुनील हम्ब्रे मौजूद थे।

    इनके सहयोग से कई जटिल मामले आसानी से सुलझे, जिससे बैंक और उधारकर्ताओं दोनों को राहत मिली।

    122 मामले निपटाए गए, ₹34.69 करोड़ की रिकवरी

    इस लोक अदालत में बैंकों के लंबे समय से पेंडिंग पड़े केसों का समाधान हुआ। इसमें अधिकतर मामले लोन रिकवरी और सेटलमेंट से जुड़े थे।

    122 मामलों के समाधान के बाद ₹34.69 करोड़ की राशि रिकवर हुई। इसे बैंकिंग सेक्टर के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।

    रजिस्ट्रार का आभार व्यक्त

    DRT-III मुंबई के रजिस्ट्रार संजय जायसवाल ने सभी अफसरों, स्टाफ और लिटिगेंट्स का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि इस आयोजन को सफल बनाने में पूरी टीम ने कड़ी मेहनत की।

    उन्होंने खासतौर से स्टाफ मेंबर्स का नाम लेकर आभार जताया –

    • स्नेहल तलाशीळकर (असिस्टेंट रजिस्ट्रार)
    • परवेश शर्मा, मिलिंद खाटू, सतीश बोराडे, राजन कांबले, नरेंद्र महामुंकर, पवन मीणा, प्रवीन लबडे, किशोर इंदुलकर, अमरेन्द्र और प्रियांका गुरव

    लोक अदालत का महत्व

    लोक अदालत को लेकर एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये एक ऐसा मंच है, जहां लंबे समय से पेंडिंग केस जल्दी और आपसी सहमति से सुलझाए जाते हैं। इससे अदालतों पर केसों का बोझ कम होता है और आम लोगों व बैंकों दोनों को राहत मिलती है।

    मुंबई जैसे बड़े शहर में जहां बैंकिंग ट्रांजैक्शन और लोन से जुड़े विवाद बहुत आम हैं, वहां इस तरह की पहल बेहद कारगर साबित होती है।

    मुंबई DRT-III की इस लोक अदालत ने दिखा दिया कि अगर सही माहौल और सहयोग मिले तो जटिल से जटिल केस भी आसानी से सुलझ सकते हैं। इस बार का नतीजा ₹34.69 करोड़ की रिकवरी के साथ काफी सकारात्मक रहा। उम्मीद है कि आगे भी ऐसे प्रयास जारी रहेंगे और बैंकिंग सेक्टर में पेंडिंग केसों का बोझ कम होगा।

  • मुंबई ट्रेन ब्लास्ट केस में बरी वाहिद शेख ने मांगा 9 करोड़ मुआवजा

    मुंबई ट्रेन ब्लास्ट केस में बरी वाहिद शेख ने मांगा 9 करोड़ मुआवजा

    2006 मुंबई ट्रेन ब्लास्ट केस में बरी हुए वाहिद दीन मोहम्मद शेख ने 9 साल की जेल और परिवार को झेली पीड़ा के लिए 9 करोड़ रुपये मुआवजे की मांग की है।

    मुंबई: 2006 के मुंबई सीरियल ट्रेन ब्लास्ट मामले में झूठे आरोपों में फंसे और बाद में बरी हुए डॉ. वाहिद दीन मोहम्मद शेख ने अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से 9 करोड़ रुपये मुआवजे की मांग की है। शेख का कहना है कि यह सिर्फ पैसों की लड़ाई नहीं बल्कि इंसाफ़ और स्वीकार्यता की लड़ाई है।

    9 साल जेल, जिंदगी बर्बाद

    शेख ने बताया कि उन्हें एटीएस ने साल 2006 में हुए ट्रेन ब्लास्ट मामले में मकोका के तहत गिरफ्तार किया। इसके बाद उन्हें नौ साल तक जेल में रहना पड़ा। 11 सितंबर 2015 को विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।
    उन्होंने कहा – “मैं जेल से तो बाहर आ गया, लेकिन मेरी जवानी के सबसे अहम 9 साल, परिवार की खुशियां और समाज में इज्ज़त सब कुछ छिन गया।”

    9 करोड़ रुपये मुआवजे की मांग

    वाहिद शेख ने कहा कि उन्होंने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग से मुआवजे की मांग की है।
    उनका दावा है कि जेल में रहने और झूठे आरोपों से हुए सामाजिक, भावनात्मक और आर्थिक नुकसान की कीमत कोई चुका नहीं सकता। लेकिन, 9 करोड़ रुपये कम-से-कम उनके साथ हुए अन्याय की आंशिक भरपाई करेगा।

    “इसलिए अब तक चुप था”

    शेख ने याचिका में लिखा कि वह नैतिक कारणों से पिछले 10 साल तक चुप रहे और मुआवजे की मांग नहीं की। लेकिन, अब उन्हें लगता है कि यह मुद्दा सिर्फ उनके लिए नहीं बल्कि उन सब लोगों के लिए है जो बेगुनाही के बावजूद सालों जेल में कैद रहे हैं।

    परिवार पर गहरा असर

    शेख पेशे से स्कूल टीचर हैं और परिवार के इकलौते कमाने वाले हैं। जेल में रहने के दौरान उनके परिवार को सामाजिक और आर्थिक तौर पर बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
    उन्होंने बताया कि इलाज और परिवार का खर्च चलाने के लिए लगभग 30 लाख रुपये का कर्ज़ लेना पड़ा।

    सामाजिक और भावनात्मक नुकसान

    वाहिद शेख का कहना है कि उन्हें हिरासत के दौरान प्रताड़ित भी किया गया। इन हालातों ने उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला। उन्होंने कहा – “मैं बाहर तो आ गया हूं, लेकिन जो दाग मेरे नाम पर लगे, उनका असर अब भी मेरे परिवार और बच्चों को झेलना पड़ रहा है।”

    पूरा मामला क्या था?

    11 जुलाई 2006 को मुंबई लोकल ट्रेनों में हुए सीरियल ब्लास्ट ने पूरे देश को हिला दिया था। इन धमाकों में 187 लोगों की मौत और 600 से ज्यादा लोग घायल हुए थे।
    ATS ने इस मामले में 13 लोगों को गिरफ्तार किया था। लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने 2015 में वाहिद शेख को बरी कर दिया, जबकि बाकी 12 आरोपियों को फांसी या उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।

    जुलाई 2025 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया।

    वाहिद शेख का संदेश

    शेख ने कहा कि उनका संघर्ष केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि समाज के लिए है। उन्होंने मांग की कि सरकार और एजेंसियां झूठे मामलों में फंसे लोगों को इंसाफ दिलाने के लिए ठोस कदम उठाए।

  • Mumbai- जॉगिंग कर रही महिला को जंगल में घसीटा मिली एक साल की सज़ा

    Mumbai- जॉगिंग कर रही महिला को जंगल में घसीटा मिली एक साल की सज़ा

    मुंबई की बोरीवली कोर्ट ने महिला जॉगर से छेड़छाड़ करने वाले आरोपी को एक साल की सजा सुनाई। घटना के दौरान राहगीर ने महिला को बचाया था।

    मुंबई: महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े एक अहम मामले में बोरीवली की मजिस्ट्रेट अदालत ने कड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने 30 वर्षीय नरेश कोल को महिला जॉगर से छेड़छाड़ करने के मामले में एक साल की सजा सुनाई। अदालत ने यह भी कहा कि समाज में महिलाओं के साथ होने वाले गलत व्यवहार को शुरुआत से ही रोकना जरूरी है, इसलिए ऐसे मामलों में किसी तरह की नरमी नहीं दिखाई जा सकती।

    🚨 घटना का विवरण

    यह घटना 21 मार्च की रात लगभग 8 बजे मुंबई के पश्चिमी उपनगर में हुई थी। महिला रोजाना की तरह जॉगिंग कर रही थी, तभी एक अजनबी पीछे से आया और उसे पकड़कर जबरदस्ती जंगल की ओर खींचने की कोशिश करने लगा। महिला ने शोर मचाया और मदद के लिए चिल्लाई।

    इसी दौरान वहां से गुजर रहे एक मोटरसाइकिल सवार ने महिला को बचाया और आरोपी को पकड़ लिया। बाद में पुलिस मौके पर पहुंची और आरोपी को हिरासत में ले लिया।

    🧾 महिला और गवाह की गवाही

    मुकदमे के दौरान महिला और मोटरसाइकिल सवार दोनों को गवाह के रूप में पेश किया गया। दोनों ने अदालत के सामने साफ तौर पर बयान दिया कि आरोपी ने महिला के साथ बदसलूकी की और उसे जबरन जंगल की तरफ खींचने की कोशिश की।

    अदालत ने कहा कि महिला और राहगीर एक-दूसरे को नहीं जानते थे और न ही आरोपी से कोई संबंध था। ऐसे में किसी अजनबी के खिलाफ झूठा आरोप लगाने का कोई कारण नहीं हो सकता।

    🙅 आरोपी की दलील और अदालत का जवाब

    नरेश कोल ने अदालत में दावा किया कि उसने महिला को छुआ नहीं बल्कि तेज रफ्तार गाड़ी से बचने के लिए दौड़ते हुए गलती से उससे टकरा गया। लेकिन अदालत ने उसकी इस दलील को खारिज कर दिया।

    अदालत ने अपने फैसले में कहा –
    “अगर आरोपी निर्दोष होता, तो महिला को डरने और चिल्लाने की कोई जरूरत नहीं पड़ती। आरोपी का महिला को जंगल की ओर घसीटना साफ दिखाता है कि उसका इरादा गलत था।”

    ⚖️ अदालत का फैसला

    22 अगस्त को आए फैसले में बोरीवली कोर्ट ने आरोपी को दोषी करार देते हुए कहा –
    “भले ही आरोपी युवा है, लेकिन इस तरह की हरकत से समाज की महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा को खतरा पहुंचता है। ऐसे मामलों में सख्त सजा देना जरूरी है।”

    अदालत ने आरोपी को भारतीय न्याय संहिता की धारा 74 (महिला की मर्यादा भंग करने की नीयत से हमला या बल प्रयोग) के तहत दोषी पाया और एक साल कैद की सजा सुनाई। इसमें वह 5 महीने की जेल भी शामिल है, जो आरोपी पहले से ही इस मामले में काट चुका है।

    👩‍⚖️ महिला सुरक्षा पर संदेश

    अदालत के इस फैसले से समाज को यह साफ संदेश मिला कि महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों पर कोई नरमी नहीं बरती जाएगी। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे अपराधों को समय रहते रोकना समाज की जिम्मेदारी है और हर महिला को न्याय दिलाना न्याय व्यवस्था की प्राथमिकता होनी चाहिए।

  • मुंबई पुनर्विकास विवाद: 6,000 परिवार हाईकोर्ट में अटके

    मुंबई पुनर्विकास विवाद: 6,000 परिवार हाईकोर्ट में अटके

    मुंबई में 6,000 से ज़्यादा परिवार पुनर्विकास विवाद में फंसे हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट में केस लंबित, RERA सुरक्षा से बाहर, और घर लौटने का इंतज़ार। Mumbai redevelopment dispute 6,000 families stuck in High Court

    मुंबई का स्काईलाइन दिन-ब-दिन बदल रहा है। नई-नई ऊँची इमारतें खड़ी हो रही हैं, पुरानी बिल्डिंग्स ध्वस्त की जा रही हैं। लेकिन इस विकास के पीछे एक खामोश संकट भी छिपा है—हज़ारों परिवार जो अपने ही घर का इंतज़ार कर रहे हैं।

    बॉम्बे हाईकोर्ट में इस समय 6,000 से अधिक पुनर्विकास से जुड़े मामले लंबित हैं। इनमें अधिकांश वो परिवार हैं जिनकी इमारतें तोड़ दी गईं और डेवलपर ने नए घर का वादा किया, लेकिन सालों बाद भी उन्हें घर नहीं मिला। Mumbai redevelopment dispute 6,000 families stuck in High Court

    कानून की खामियां और RERA का दायरा

    जब कोई इमारत गिरा दी जाती है, तो उसके मूल निवासी RERA (Real Estate Regulation and Development Act) की सुरक्षा से बाहर हो जाते हैं।

    • RERA केवल उन खरीदारों को सुरक्षा देता है जिन्होंने पैसे देकर नया फ्लैट खरीदा हो।
    • लेकिन पुनर्विकास और SRA (स्लम रिहैबिलिटेशन) योजनाओं में, निवासी अपना पुराना घर छोड़ते हैं और बदले में नया फ्लैट मिलने की उम्मीद रखते हैं।

    इसमें पैसे का लेन-देन नहीं होता, लेकिन जोखिम उतना ही बड़ा है। और यही सबसे बड़ी कानूनी खामी है।

    क्यों हो रही है देरी?

    अधिवक्ता गॉडफ्रे पिमेंटा का कहना है कि डेवलपर्स पर जवाबदेही तय करने वाला कोई ठोस कानून नहीं है।

    • कई परियोजनाएं सालों से रुकी हुई हैं
    • परिवारों को अदालतों में लंबी लड़ाई लड़नी पड़ रही है।
    • औसतन एक केस 5-7 साल तक चलता है, जिससे मध्यमवर्गीय और वरिष्ठ नागरिक बेहद परेशान हो जाते हैं।

    पिमेंटा का कहना है, “अगर पुनर्विकास को RERA के दायरे में लाया जाए तो डेवलपर्स पर समय सीमा पूरी करने का दबाव बनेगा और निवासियों को कानूनी सुरक्षा मिलेगी।” Mumbai redevelopment dispute 6,000 families stuck in High Court

    विशेषज्ञों की राय: नए कानून की ज़रूरत

    महाराष्ट्र सोसायटीज़ वेलफेयर एसोसिएशन (महासेवा) के अध्यक्ष, सीए रमेश प्रभु का कहना है कि जब RERA लागू हुआ तो यह ऐतिहासिक कदम था, लेकिन यह नए फ्लैट खरीदारों को ध्यान में रखकर बनाया गया था।

    उनके अनुसार, अब सरकार को चाहिए कि:

    • पुनर्विकास और पुनर्वास के लिए एक अलग ढांचा तैयार करे।
    • इसके लिए एक थिंक टैंक स्थापित किया जाए।
    • समयबद्ध मंजूरी और निगरानी के लिए एकल खिड़की प्रणाली लागू की जाए।

    महाराष्ट्र की भूमिका और ज़िम्मेदारी

    महाराष्ट्र हमेशा से आवास सुधारों में अग्रणी रहा है।

    • MOFA (Maharashtra Ownership Flats Act) ने देशभर को दिशा दी।
    • 2012 में, केंद्र की RERA से पहले ही राज्य ने अपना आवास कानून लागू कर दिया था।

    अब विशेषज्ञों का कहना है कि महाराष्ट्र को एक बार फिर नेतृत्व करना चाहिए और पुनर्विकास न्यायाधिकरण (Redevelopment Tribunal) की स्थापना करनी चाहिए, जिसके पास सख्त समयसीमा और प्रवर्तन की शक्ति हो।

    आँकड़े बताते हैं संकट की गहराई

    • महाराष्ट्र में 1.25 लाख से ज़्यादा हाउसिंग सोसायटीज़ और 2 लाख अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स हैं।
    • इनमें से लगभग 30% सोसायटीज़ पुनर्विकास की प्रक्रिया में हैं या उसके इंतज़ार में हैं।
    • बॉम्बे हाईकोर्ट में 6,000 से अधिक केस लंबित हैं, जबकि दीवानी अदालतों में यह संख्या और ज़्यादा है।

    एडवोकेट श्रीप्रसाद परब कहते हैं, “यह एक परिवर्तनकारी दौर है, लेकिन जब तक समय पर न्याय और कड़ा कानूनी ढांचा नहीं मिलता, तब तक हज़ारों लोग अधर में फंसे रहेंगे।” Mumbai redevelopment dispute 6,000 families stuck in High Court

    परिवारों की जंग और मानसिक असर

    जो परिवार अपने घर छोड़कर किराए के मकानों में रह रहे हैं, वे सिर्फ आर्थिक बोझ ही नहीं बल्कि मानसिक तनाव भी झेल रहे हैं।

    • किराया और खर्चा बढ़ रहा है।
    • कई बुज़ुर्ग परिवार हर रोज़ घर लौटने की उम्मीद में जी रहे हैं।
    • लंबे केस और धीमी प्रक्रिया ने कई लोगों की मानसिक शांति और सम्मान छीन लिया है।

    प्रभु कहते हैं, “प्रगति अच्छी है, लेकिन अगर यह लोगों के घर और जीवन की शांति छीन ले तो इसका क्या मतलब?”

    मुंबई के हर नए टॉवर के साथ यह सवाल खड़ा होता है कि कहीं कोई पुराना परिवार तो अपने घर की राह नहीं देख रहा।
    पुनर्विकास एक सुनहरा सपना है, लेकिन जब तक कानून में बदलाव नहीं होता और निवासियों को RERA जैसी सुरक्षा नहीं मिलती, तब तक यह एक जुआ ही रहेगा। Mumbai redevelopment dispute 6,000 families stuck in High Court