Category: Court Cases

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  • मराठा आरक्षण: मर भी जाऊंगा तो नहीं हटूंगा- मनोज जरांगे

    मराठा आरक्षण: मर भी जाऊंगा तो नहीं हटूंगा- मनोज जरांगे

    मराठा आरक्षण आंदोलन: मनोज जरांगे पाटिल का ऐलान, “मर भी जाऊं तो भी नहीं हटूंगा”। पांच दिन से भूख हड़ताल, सरकार पर दबाव।

    मुंबई: मराठा आरक्षण की माँग को लेकर आज़ाद मैदान में बैठे मनोज जरांगे पाटिल ने आंदोलन को और सख्त करते हुए बड़ा बयान दिया है। उन्होंने साफ कहा है कि चाहे उनकी जान भी क्यों न चली जाए, वे धरना स्थल से नहीं हटेंगे। पाटिल पिछले पांच दिनों से भूख हड़ताल पर हैं और उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही है।

    जरांगे का सख्त ऐलान

    मनोज जरांगे ने मुख्यमंत्री और सरकार को चेतावनी दी है। उनका कहना है कि सरकार उनकी आवाज़ दबाने की कोशिश कर रही है, लेकिन वे पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने कहा, “अगर मैं मर भी जाऊं, तो भी इस ज़मीन से नहीं उठूंगा। सोमवार को होने वाले जनआक्रोश का सामना करना सरकार के लिए आसान नहीं होगा।”

    हाईकोर्ट और पुलिस की सख्ती

    मुंबई पुलिस ने आंदोलन को जारी रखने की अनुमति नहीं दी और प्रदर्शनकारियों को आज़ाद मैदान खाली करने का आदेश दिया है।
    बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी सोमवार को सुनवाई के दौरान कहा कि आंदोलनकारियों ने अपने वादे पूरे नहीं किए और इसके चलते शहर ठप पड़ा, जिससे आम जनता को परेशानी हुई।

    कोर्ट ने साफ आदेश दिया कि:

    • आंदोलनकारियों को आज़ाद मैदान से हटाया जाए।
    • मुंबई की सड़कों से ट्रैफ़िक जाम हटाया जाए।
    • नए प्रदर्शनकारियों को शहर में एंट्री न दी जाए।
    • जरांगे पाटिल और समर्थकों को मेडिकल सुविधा उपलब्ध कराई जाए।

    पाटिल का पलटवार

    मनोज जरांगे पाटिल ने कोर्ट और पुलिस की कार्रवाई पर प्रतिक्रिया दी। उनका कहना है कि उन्होंने कानून का उल्लंघन नहीं किया है और वे शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन चला रहे हैं।

    उन्होंने दावा किया कि जैसे ही अदालत का आदेश मिला, प्रदर्शनकारियों ने अपनी गाड़ियाँ सड़कों से हटा दीं ताकि ट्रैफ़िक में कोई दिक्कत न हो। पाटिल का कहना है कि वे पिछले दो सालों से शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहे हैं और अब जब तक मांगे पूरी नहीं होतीं, वे मुंबई नहीं छोड़ेंगे।

    मराठा आरक्षण की मुख्य मांग

    पाटिल और उनके समर्थकों की मुख्य मांग है कि मराठा समाज को सरकारी नौकरी और शिक्षा में ओबीसी कोटे के तहत 10% आरक्षण मिले।
    उनका कहना है कि जब तक “हैदराबाद राजपत्र” लागू नहीं होता और लिखित आदेश नहीं आता, तब तक वे धरना खत्म नहीं करेंगे।

    सरकार पर बढ़ा दबाव

    इस आंदोलन के चलते महाराष्ट्र की महायुति सरकार पर दबाव काफी बढ़ गया है। सरकार ने बातचीत के लिए राधाकृष्ण विखे पाटिल की अगुवाई में 10 मंत्रियों की समिति बनाई है। समिति आंदोलनकारियों से बातचीत करने और समाधान निकालने की कोशिश कर रही है।

    आज़ाद मैदान में भीड़ और माहौल

    मुंबई के आज़ाद मैदान में हजारों की संख्या में मराठा समाज के लोग जुटे हुए हैं। आंदोलन के शुरुआती दिनों में शहर के कई हिस्सों में ट्रैफिक जाम हुआ था, लेकिन अब स्थिति सामान्य हो रही है।

    हालांकि, मनोज जरांगे पाटिल की सेहत लगातार गिर रही है। मेडिकल टीम समय-समय पर उनकी जांच कर रही है। इसके बावजूद उन्होंने भूख हड़ताल तोड़ने से साफ इनकार कर दिया है।

    निर्णायक मोड़ पर आंदोलन

    मराठा आरक्षण का यह संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। एक तरफ सरकार और अदालत कानून व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मनोज जरांगे पाटिल साफ कह रहे हैं कि वे “न्याय मिलने तक पीछे नहीं हटेंगे, चाहे जान भी क्यों न चली जाए।”

    यह आंदोलन अब महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन चुका है और आने वाले दिनों में इसका असर राज्य की स्थिरता पर भी पड़ सकता है।

  • HC का अल्टीमेटम: 3 बजे तक जरांगे को आजाद मैदान खाली करना होगा

    HC का अल्टीमेटम: 3 बजे तक जरांगे को आजाद मैदान खाली करना होगा

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने मराठा आरक्षण आंदोलनकारी मनोज जरांगे और उनके समर्थकों को दोपहर 3 बजे तक आजाद मैदान खाली करने का आदेश दिया है। पालन न करने पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी गई।

    मुंबई: मराठा आरक्षण की मांग को लेकर चल रहा आंदोलन अब कोर्ट की सख्ती की वजह से चर्चा में है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को एक अहम सुनवाई में मराठा आंदोलन के नेता मनोज जरांगे और उनके समर्थकों को स्पष्ट आदेश दिया कि उन्हें दोपहर 3 बजे तक मुंबई के आजाद मैदान को खाली करना होगा।

    हाईकोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि अगर आदेश का पालन नहीं किया गया तो कड़ी कार्रवाई होगी। इसमें आंदोलनकारियों पर एक्सेम्प्लरी कॉस्ट (भारी जुर्माना) और यहां तक कि कॉन्टेम्प्ट ऑफ कोर्ट (अवमानना) की कार्रवाई भी की जा सकती है।

    कोर्ट ने क्यों दिया अल्टीमेटम?

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    आजाद मैदान मुंबई का ऐतिहासिक और संवेदनशील इलाका है, जहां अक्सर बड़े आंदोलन और प्रदर्शन होते रहते हैं। लेकिन गणेशोत्सव जैसे त्योहार और शहर की भीड़भाड़ को देखते हुए प्रशासन ने कोर्ट से अपील की थी कि आंदोलनकारियों को वहां से हटाया जाए।

    याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने साफ कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर लंबे समय तक कब्जा करना उचित नहीं है। कोर्ट ने आंदोलनकारियों से कहा कि वे अपनी बात रखने के लिए वैधानिक तरीके अपनाएं, लेकिन शहर की सामान्य व्यवस्था को बाधित नहीं कर सकते।

    जरांगे का आंदोलन और उसका असर

    मनोज जरांगे पिछले कई महीनों से मराठा आरक्षण की मांग को लेकर सक्रिय हैं। महाराष्ट्र में यह मुद्दा लगातार राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र बना हुआ है। जरांगे और उनके समर्थक यह मांग कर रहे हैं कि मराठा समुदाय को स्थायी रूप से शिक्षा और नौकरी में आरक्षण दिया जाए।

    जरांगे का कहना है कि मराठा समाज के साथ वर्षों से अन्याय हुआ है और अब सरकार को इसका हल निकालना ही होगा। लेकिन उनकी आंदोलन शैली—चाहे वह अनशन हो या रैली—ने कई बार प्रशासन और अदालत की चिंता बढ़ा दी है।

    हाईकोर्ट की सख्त चेतावनी

    सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा –
    “हमारे आदेश का पालन न करने पर आपको भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। अगर आप समय पर आजाद मैदान खाली नहीं करते तो अवमानना की कार्रवाई होगी और भारी जुर्माना भी लगाया जाएगा।”

    कोर्ट की यह टिप्पणी साफ संकेत देती है कि अब न्यायपालिका इस आंदोलन को सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ मान रही है।

    आंदोलनकारियों में बेचैनी

    जरांगे समर्थकों में कोर्ट के आदेश के बाद हलचल तेज हो गई। आंदोलनकारियों का कहना है कि उनकी मांग जायज़ है और वे इसे छोड़ने वाले नहीं हैं। लेकिन कोर्ट के सख्त रुख ने उन्हें दोराहे पर खड़ा कर दिया है।

    कुछ आंदोलनकारी मानते हैं कि जरांगे को अब आंदोलन की नई रणनीति बनानी होगी, वरना कानूनी कार्रवाई से आंदोलन कमजोर पड़ सकता है।

    राजनीति में गरमाहट

    इस फैसले का असर महाराष्ट्र की राजनीति पर भी साफ दिख रहा है। विपक्ष का कहना है कि सरकार ने जानबूझकर आंदोलन को कोर्ट तक पहुंचाया, ताकि जरांगे की ताकत को कम किया जा सके। वहीं, सत्ताधारी पक्ष का कहना है कि अदालत के आदेश का पालन हर किसी को करना ही होगा।

    मराठा आरक्षण का मुद्दा वैसे भी राज्य की राजनीति में लंबे समय से अहम भूमिका निभाता रहा है। अब कोर्ट की सख्ती के बाद इस पर नया राजनीतिक संग्राम छिड़ सकता है।

    जनता की प्रतिक्रिया

    मुंबई और महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों से लोगों की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कई लोगों का कहना है कि आंदोलन करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन अगर इससे आम जनता की जिंदगी प्रभावित होती है तो सरकार और कोर्ट को कदम उठाना ही चाहिए। वहीं, मराठा समाज से जुड़े लोग मानते हैं कि जरांगे की लड़ाई वैध है और कोर्ट को आंदोलनकारियों के साथ थोड़ा नरमी बरतनी चाहिए।

    आगे क्या होगा?

    अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जरांगे और उनके समर्थक कोर्ट के आदेश का पालन करेंगे या टकराव का रास्ता अपनाएंगे। अगर उन्होंने आदेश मानकर आजाद मैदान खाली किया, तो आंदोलन की दिशा बदल सकती है। और अगर आदेश का उल्लंघन किया, तो कोर्ट की कार्रवाई से आंदोलन को बड़ा झटका लग सकता है।

    बॉम्बे हाईकोर्ट का यह अल्टीमेटम मराठा आंदोलन के लिए निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। एक ओर जरांगे और उनके समर्थकों के सामने आरक्षण की मांग का सवाल है, तो दूसरी ओर अदालत और प्रशासन की सख्ती है।

    यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में मराठा आंदोलन किस दिशा में जाता है। लेकिन इतना तय है कि कोर्ट का यह आदेश महाराष्ट्र की राजनीति और समाज दोनों पर गहरा असर छोड़ने वाला है।

  • HC का झटका: मराठा आरक्षण नेता मनोज जरांगे अब मुंबई में बिना परमिशन प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे

    HC का झटका: मराठा आरक्षण नेता मनोज जरांगे अब मुंबई में बिना परमिशन प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने गणेशोत्सव को देखते हुए मनोज जरांगे को बिना अनुमति प्रदर्शन से रोका। अब सिर्फ तय जगह पर ही हो सकेगा आंदोलन।

    मुंबई। मराठा आरक्षण आंदोलन के नेता मनोज जरांगे को बॉम्बे हाईकोर्ट ने बड़ा झटका दिया है। अदालत ने साफ कहा कि अब जरांगे बिना परमिशन के मुंबई में आंदोलन या प्रदर्शन नहीं कर सकते। कोर्ट ने ये आदेश इसलिए दिया क्योंकि गणेशोत्सव के दौरान पुलिस पहले से ही शहर की सुरक्षा और भीड़ कंट्रोल में व्यस्त रहेगी।

    हाईकोर्ट की बेंच ने ये भी कहा कि लोकतंत्र में विरोध करना सबका हक है, लेकिन ये सिर्फ निर्धारित जगहों पर और सरकार की इजाजत लेकर ही किया जा सकता है। जरांगे और उनके समर्थकों को सरकार चाहे तो नवी मुंबई के खारघर में वैकल्पिक जगह भी दे सकती है, ताकि मुंबई की लाइफ और ट्रैफिक पर असर न पड़े।

    जरांगे ने हाल ही में सरकार को अल्टीमेटम दिया था कि अगर मराठा समाज को OBC कोटे में 10% आरक्षण नहीं मिला, तो वह 29 अगस्त से मुंबई में अनिश्चितकालीन अनशन करेंगे। इसी को लेकर अदालत में एमी फाउंडेशन ने जनहित याचिका दायर की थी।

    राज्य सरकार ने भी कोर्ट में कहा कि वे शांतिपूर्ण आंदोलन का विरोध नहीं करते, लेकिन गणेशोत्सव जैसे बड़े त्योहार में भीड़ और ट्रैफिक की वजह से कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती है। इसी कारण कोर्ट ने परमिशन की शर्त रखी।

    अब अगली सुनवाई 9 सितंबर को होगी और जरांगे को इस मामले में जवाब दाखिल करना होगा।

  • मुंबई स्लम रीडेवलपमेंट: सुप्रीम कोर्ट ने जमीन मालिक के अधिकार को माना, सरकारी अधिग्रहण नोटिस रद्द

    मुंबई स्लम रीडेवलपमेंट: सुप्रीम कोर्ट ने जमीन मालिक के अधिकार को माना, सरकारी अधिग्रहण नोटिस रद्द

    सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के कुर्ला इलाके की जमीन पर बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि स्लम रीडेवलपमेंट में जमीन मालिक का पहला अधिकार है। कोर्ट ने 2018 के बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और महाराष्ट्र सरकार का भूमि अधिग्रहण रद्द कर दिया।

    डिजिटल डेस्क
    मुंबई:
    सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के कुर्ला इलाके में स्लम रीडेवलपमेंट से जुड़ा अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी भी स्लम रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट में जमीन मालिक का पहला अधिकार होता है, न कि सिर्फ झोपड़पट्टीवासियों या स्लम अथॉरिटी (SRA) का।
    22 अगस्त को दिए गए इस फैसले में कोर्ट ने 2018 में बॉम्बे हाई कोर्ट के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें महाराष्ट्र सरकार के अधिग्रहण आदेश को रद्द किया गया था।

    पृष्ठभूमि – 1979 से शुरू हुआ विवाद

    विवादित जमीन पर साल 1979 में झोपड़पट्टीवासियों ने कब्जा कर लिया था। इसके बाद लगभग 3,045 वर्ग मीटर जमीन को स्लम एरिया घोषित किया गया। समय के साथ बस्ती बढ़ती गई और 2002 में वहां के निवासियों ने तराबाई नगर को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी (Tarabai Society) का गठन किया।
    2006 से 2008 के बीच सोसाइटी ने बार-बार स्लम सर्वे और अधिग्रहण की मांग की। अंततः 2011 में पूरी जमीन को SRA एरिया घोषित कर दिया गया।

    जमीन मालिक का हक बनाम झोपड़पट्टीवासियों का अधिकार

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमीन मालिक को महाराष्ट्र स्लम एरिया (इम्प्रूवमेंट, क्लियरेंस और रीडेवलपमेंट) एक्ट, 1971 के तहत अधिकार तो हैं ही, लेकिन उससे भी बढ़कर संवैधानिक और संपत्ति से जुड़े मौलिक अधिकार हैं।
    जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन के सिंह की बेंच ने कहा –
    “Ordinarily, a landowner is entitled to all the incidental benefits derived from the ownership of such immovable property. Ownership rights are also constitutionally protected and can only be interfered with as a result of the operation of law.”

    “Unholy Nexus” की चेतावनी

    कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर SRA और प्राइवेट डेवलपर्स को मनमानी छूट मिल गई तो यह “Unholy Nexus” (गठजोड़) को जन्म देगा, जिससे सबसे ज्यादा नुकसान स्लमवासियों को होगा।
    सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि –

    • जमीन मालिक को पहले मौका देना जरूरी है।
    • अगर जमीन मालिक रीडेवलपमेंट का प्रस्ताव समय पर नहीं लाता, तो स्लमवासी डेवलपर के साथ खुद प्रस्ताव ला सकते हैं।
    • बिना जमीन मालिक को सूचना दिए उसे अधिग्रहण का जिम्मेदार ठहराना अनुचित है।

    सरकार का नोटिफिकेशन रद्द

    2016 में महाराष्ट्र सरकार ने जमीन अधिग्रहण का नोटिफिकेशन जारी किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया कानूनी रूप से गलत थी।
    कोर्ट ने दो टूक कहा कि –
    “सिर्फ एरिया को SR एरिया घोषित करने से यह नहीं माना जा सकता कि मालिक को स्वचालित रूप से रीडेवलपमेंट स्कीम लाना ही होगा।”

    यह फैसला न सिर्फ जमीन मालिकों के लिए बल्कि मुंबई के स्लम रीडेवलपमेंट मॉडल के लिए भी ऐतिहासिक है। सुप्रीम कोर्ट ने जमीन मालिकों को प्राथमिक अधिकार देकर यह स्पष्ट कर दिया है कि स्लमवासियों का पुनर्विकास न्यायसंगत और पारदर्शी प्रक्रिया से ही होना चाहिए।

  • मालेगांव ब्लास्ट के सभी आरोपी कैसे हो गए बरी? जांच एजेंसियों के खिलाफ जनहित याचिका की तैयारी

    मालेगांव ब्लास्ट के सभी आरोपी कैसे हो गए बरी? जांच एजेंसियों के खिलाफ जनहित याचिका की तैयारी

    महाराष्ट्र के मालेगांव में 29 सितम्बर 2008 को हुए बम धमाके के आरोप में गिरफ्तार 7 अभियुक्तों को विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। इसमें जांच एजंसियों की चूक प्रकाश में आते ही हाईकोर्ट के वकील नितिन सातपुते ने जनहित याचिका दायर करने का फैसला किया है। अदालत ने यह भी कहा, “सबूतों के साथ छेड़छाड़ हुई है।”

    मुंबई: देश के बड़े आतंकी हमले में शुमार मालेगांव ब्लास्ट का मामला मुंबई की विशेष एनआईए अदालत में खत्म हो चुका है। आखिरकार 17 सालों बाद फैसला आता है कि गिरफ्तार 7 अभियुक्तों के खिलाफ जांच एजेंसियां सबूत पेश करने में विफल साबित हुई। जबकि सरकारी वकील अविनाश रसाल ने बताया, कि सुनवाई के दौरान कुल 324 गवाहों से पूछताछ की गई थी। जिनमें से 34 गवाह मुकर गए। अदालत ने सभी मुख्य अभियुक्त बीजेपी की पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत 7 लोगों को बरी कर दिया। इसमें जांच एजंसियों की गलतियों के खिलाफ एडवोकेट नितिन सातपुते ने जनहित याचिका दायर करने का फैसला किया है।

    अगर हेमंत करकरे होते तो, ..

    शुक्रवार को एडवोकेट नितिन सातपुते ने बताया कि “मालेगांव बम विस्फोट कांड का फैसला निराशाजनक है। शहीद हेमंत करकरे जैसे कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी ने उचित जाँच के बाद मामला दर्ज किया था। लेकिन बाद में क्या हुआ, यह सभी जानते हैं। अगर शहीद हेमंत करकरे आज हमारे बीच होते, और इस तरह का फैसला सामने आता, तो सही माना जाता। लेकिन इस वक्त जांच एजंसियों की गलतियों पर पूरे देश को शक हो रहा है। इसके साथ ही जिन्होंने नतीजे आने से पहले ही प्रज्ञा सिंह ठाकुर को सांसद बना दिया, उसी विचारधारा के लोग आज देश और प्रदेश में सत्ता में हैं।”

    आरोपी बन गई सांसद

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    उन्होंने सवाल करते हुए कहा कि “यह स्पष्ट है कि आज के परिणामों में उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही जिन्होंने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को सांसद बनाया और अब क्या महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट जाएगी? ये भी एक बड़ा सवाल है। आज के फैसले से साफ़ हो गया है कि सबूत होने पर भी आरोपी बरी हो जाते हैं। तो क्या न्याय धर्म के आधार पर हो रहा है?” इसके साथ ही मामले को लेकर विशेष अदालत के न्यायाधीश एके लाहोटी ने सभी अभियुक्तों को निर्दोष करार देते हुए कहा, “यह एक अत्यंत गंभीर मामला है जिसमें नागरिकों की जान गई। लेकिन अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने के लिए निर्णायक सबूत पेश नही कर पाई।”

    क्या था मालेगांव बम धमाके का मामला?

    29 सितम्बर 2008 को मालेगांव के व्यस्त भिकू चौक के पास एक मोटरसाइकिल में बम धमाका हुआ था। जिस वक्त लोग पास की मस्जिद में नमाज़ के लिए इकट्ठा हो रहे थे। इस विस्फोट में 92 लोग घायल हो गए और 7 लोगों की मौत हो गई। इस आतंकी हमले में “आरडीएक्स” विस्फोटक का इस्तेमाल हुआ लेकिन जांच एजेंसियां उसका स्त्रोत सिद्ध नही कर पाई। यहां तक कि 14 लोगों की गिरफ्तारी में मुख्य अभियुक्त साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के साथ पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, रिटायर्ड मेजर रमेश उपाध्याय, अजय राहिरकर, सुधाकर चतुर्वेदी, समीर कुलकर्णी और सुधाकर द्विवेदी के खिलाफ मकोका के तहत मुकदमे दर्ज किए गए थे। इनके खिलाफ साज़िश रचने से लेकर विस्फोट हासिल करने और कई लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराने जैसे गंभीर आरोप लगे थे।

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    मुकदमा खड़ा ही गलत तरीके से किया गया।

    इसमें साल 2008 में एंटी टेरेरिजम स्कॉड (ATS) ने शुरूआती जांच के दौरान कुल 14 लोगों को गिरफ्तार किया था। एटीएस ने मामले को गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) को सौपने से पहले दो चार्जशीट दाखिल की थी। इसके बाद एनआईए ने 2016 में एक पूरक आरोप पत्र दाखिल किया था। लेकिन 31 जुलाई को अदालत के फैसले मे सामने आया कि सभी साक्षों और गवाहों के आधार पर जो मुकदमा खड़ा हुआ, वह अभियुक्तों का दोष साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

    सबूत ही नहीं मिला

    अदालत ने कहा, कि आरोप लगाया गया था, कि विस्फोट पुरोहित ने कश्मीर से हासिल किया था। लेकिन इसका कोई सबूत नही दिया और यह भी प्रमाणित नहीं किया कि किसी भी अभियुक्त के घर बम तैयार किया गया था। जिस मोटरसाइकिल पर विस्फोट रखा गया था, उसका साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर से ठोस सबूतों के साथ संबंध सिद्ध नहीं हो सका। How did all the accused in Malegaon blast get acquitted? Preparation of PIL against the investigating agencies

    कहां हुई थी साज़िश?

    जांच एजेंसियों का कहना था कि इस घटना से पहले एक बड़ी साजिश रची गई थी। जिसके तहत इंदौर, उज्जैन, पुणे जैसे अलग-अलग जगहों पर इन सभी अभियुक्तों की बैठकें हुईं और वहीं साज़िश रची गई। लेकिन अदालत ने कहा, बैठकों के कोई विश्वसनीय सबूत नहीं मिले। कहा, कि भले ही अभियुक्तों के बीच कुछ आर्थिक लेन-देन के सबूत पेश किए गए, लेकिन यह साबित नहीं हो सका, कि वह पैसे किसी हिंसक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल हुआ।

    सबूतों के साथ छेड़छाड़

    अदालत ने यह भी कहा, कि अभियुक्तों और उनके संबंधित लोगों के कॉल रिकार्ड निकालते समय जरूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। इसके लिए जरूरी अनुमति भी नहीं ली गई। अदालत ने यह भी कहा, कि “सबूतों के साथ छेड़छाड़ हुई है।” अदालत ने कहा, “कुल मिलाकर सरकारी पक्ष विश्वसनीय साक्ष्य पेश करने में असफल रहा और केवल संदेह के आधार पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। भले ही यह गंभीर अपराध हो, लेकिन सबूतों के अभाव में अभियुक्तों को संदेह का लाभ देना पड़ रहा है।” ऐसा कहते हुए अदालत ने सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया।

    जांच एजेंसियों ने की आरोपियों की मदद

    उच्च न्यायलय के वकील नितिन सातपुते ने आरोप लगाते हुए कहा, की जाँच एजेंसी ने जानबूझकर जाँच में चूक की है, जानबूझकर पर्याप्त सबूत नहीं जुटाए हैं और दोषपूर्ण आरोपपत्र दायर किया है ताकि मालेगांव बम विस्फोट मामले में आरोपियों की मदद की जा सके, उन्हें बचाया जा सके, उनकी रक्षा की जा सके। उस पुलिस अधिकारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए जिसने किसी के इशारे पर सभी आरोपियों को बचाने के लिए ठीक से जाँच नहीं की, जिसके परिणामस्वरूप विशेष अदालत के न्यायाधीश लखोटी ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। मैं इन जाँच एजेंसियों के खिलाफ जनहित याचिका दायर करने जा रहा हूँ। How did all the accused in Malegaon blast get acquitted? Preparation of PIL against the investigating agencies

  • झूठे गवाहों का इस्तेमाल कर 19 साल की जेल, मुंबई लोकल ब्लास्ट में 12 मुसल्मानों को किसने फंसाया?

    झूठे गवाहों का इस्तेमाल कर 19 साल की जेल, मुंबई लोकल ब्लास्ट में 12 मुसल्मानों को किसने फंसाया?

    11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में पिछले 19 सालों से जिन 12 मुसलमानों को दोषी ठहरा कर जेल में कैद कर लिया गया था। हाईकोर्ट ने सभी को एक साथ बरी कर दिया। लेकिन इन सब के पीछे कौन हो सकता है यह अभ भी सवाल का विषय बना हुआ है।

    मुंबई: 2006 के मुंबई लोकल ट्रेन बम धमाकों ने पूरे देश को हिला दिया था। इन धमाकों में 187 लोगों की जान गई, 800 से ज़्यादा घायल हुए। इस भयानक घटना के 19 साल बाद, बॉम्बे हाई कोर्ट ने 12 लोगों को बरी कर दिया, जिन्हें इन धमाकों का दोषी ठहराया गया था। हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट के इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है, लेकिन यह भी साफ कर दिया है कि बरी किए गए लोगों को वापस जेल नहीं भेजा जाएगा। अब सवाल है, कि इन 12 मुसलमानों को फंसाने का काम किसने किया था। जिसकी वजह से एक विशेष समुदाय को टार्गेट किया गया। ये सवाल हैं उन 12 लोगों में से एक मोहम्मद अली का, जिन्हें इसी मामले में बरी कर दिया गया है।

    हाईकोर्ट के फैसले पर लगा रोक

    सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने साफ कर दिया, कि सभी आरोपी जेल से रिहा हो चुके हैं, इसलिए उन्हें दोबारा जेल भेजने का सवाल ही नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल की दलीलों पर विचार करते हुए कहा, कि हाई कोर्ट के फैसले को कानूनी मिसाल के तौर पर नहीं माना जाएगा और उस फैसले पर रोक लगाई जाती है।

    वो 13 लोग कौन थे?

    2006 के धमाकों के बाद मुंबई पुलिस ने 13 लोगों को गिरफ्तार किया था। इनमें कमाल अहमद, मोहम्मद साजिद मरगूब अंसारी, मोहम्मद माजिद, नवीद हुसैन खान, मोहम्मद फ़ैसल अतउर रहमान शेख, सुहैल महमूद शेख, आसिफ खान, एहतेशाम कुतुबुद्दीन सिद्दीकी, शेख मोहम्मद अली, जमीर अहमद, मुजम्मिल अतउर रहमान शेख, तनवीर अहमद और अब्दुल वहीद शेख शामिल थे। 19 years in jail using false witnesses, who implicated 12 Muslims in Mumbai local train blast?

    एक की हो गयी मौत

    गिरफ्तार 12 लोगों ने बॉम्बे हाईकोर्ट में अपनी बेगुनाही की अपील की थी। हाईकोर्ट में 10 साल केस चला फिर फैसला आया कि ये सब बेकसूर हैं। इस पूरे मामले में एक ऐसा शख्स भी था जिसने अपनी बेगुनाही की खबर सुनने से पहले ही दुनिया छोड़ दिया। बिहार के मधुबनी जिले के बसोपट्टी के रहने वाले कमाल अहमद मोहम्मद वकील अंसारी की 2021 में कोविड के दौरान जेल में ही मौत हो गई थी।

    मजदूर को किया था गिरफ्तार

    जब कमाल को पुलिस ने गिरफ्तार किया तब उनके बेटे अब्दुल्ला अंसारी सिर्फ छह साल के थे। अब्दुल्ला कहा, ATS ने कमाल अंसारी पर पाकिस्तान में हथियारों का ट्रेनिंग लेने, भारत-नेपाल बॉर्डर के रास्ते आतंकवादियों को लाने और मुंबई के माटुंगा स्टेशन पर विस्फोटक रखने का इल्जाम लगाया था। लेकिन अब्दुल्ला बताते हैं कि उनके पिता एक मजदूर थे, उन्होंने ऐसा नहीं किया। 19 years in jail using false witnesses, who implicated 12 Muslims in Mumbai local train blast?

    क्या अब सरकारें, पुलिस, मीडिया कमाल के परिवार से माफी मांगेगे? उसकी बदनामी के दाग को कौन धोएगा?

    झूठे गवाह और मनगढ़ंत कबूलनामे का खुलासा

    इस मामले में पुलिस ने आरोपियों को फंसाने के लिए कई हथकंडे अपनाए, जिनकी पोल RTI ने खोल दी।

    • गवाह नंबर 74 की झूठी गवाही: अभियोजन पक्ष के गवाह नंबर 74 ने विशेष मकोका अदालत में बताया था कि उसने एहतेशाम सिद्दीकी को चर्चगेट रेलवे स्टेशन पर एक काले बैग के साथ देखा था। इसी गवाही के आधार पर एहतेशाम को बम लगाने वाला बताया गया। लेकिन RTI से मिली जानकारी ने इस गवाह की पोल खोल दी। गवाह ने जिस अस्पताल में किसी से मिलने की बात कही थी, वहां उस नाम का कोई व्यक्ति था ही नहीं और जिस बैंक में मिलने का दावा किया था, वह व्यक्ति भी वहां नहीं था। अदालत ने इस गवाह को पुलिस का ‘स्टॉक गवाह’ करार दिया, यानी एक ऐसा गवाह जिसे पुलिस हर केस में इस्तेमाल करती है। RTI से यह भी सामने आया कि यही गवाह पुलिस के लिए चार और मामलों में भी पेश हुआ था।
    • पहचान में देरी पर सवाल: पुलिस ने कुछ ऐसे गवाह भी पेश किए जिन्होंने ब्लास्ट के 100 दिनों बाद आरोपियों को पहचानने की बात कही। अदालत ने इस पर सवाल उठाया कि कोई इतने लंबे समय बाद किसी व्यक्ति का चेहरा कैसे याद रख सकता है? यह दर्शाता है कि पुलिस असली गुनहगारों को ढूंढने के बजाय आम लोगों को बलि का बकरा बना रही थी।
    • स्केच गवाह का अनुपस्थित होना: आरोपी के स्केच बनाने में मदद करने वाले गवाह को ट्रायल के लिए नहीं बुलाया गया और न ही उसे अदालत में आरोपी की पहचान करने के लिए कहा गया। मामले का यह एक सबसे बड़ा लूप-होल था।
    • कॉपी-पेस्ट के कबूलनामे: पुलिस का केस ज़्यादातर कबूलनामों पर आधारित था, जो पुलिस ने अपनी कस्टडी में लिए थे। MCOCA की धारा 18 के तहत पुलिस के सामने दिए गए कबूलनामों को कोर्ट में मान्यता देता है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इन कबूलनामों के आधार पर सजा देने से इंकार कर दिया, क्योंकि कोई पुख्ता सबूत मौजूद नहीं थे। कोर्ट ने यह भी पाया कि कई आरोपियों ने दो अलग-अलग अधिकारियों के सामने जुर्म कबूल किया था, लेकिन दोनों कबूलनामों में घटना का विवरण, यहां तक कि फुल स्टॉप और कॉमा भी हूबहू कॉपी-पेस्ट थे। कोर्ट ने इसे अविश्वसनीय माना।

    2015 में इसी केस में बरी हुएम अब्दुल वाहिद शेख बताते हैं कि उन्होंने “हर दिन 20-25 आरटीआई एप्लीकेशन” दायर किए, जिनमें पुलिस स्टेशनों की लॉगबुक से लेकर अस्पताल के रिकॉर्ड और हर जरूरी जानकारी मांगी गई।

    19 सालों बाद सामने आया पीड़ितों का दर्द

    मोहम्मद साजिद अंसारी, जो इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि से थे, बताते हैं, “मेरा इलेक्ट्रॉनिक्स का बैकग्राउंड था, इसलिए इन लोगों के लिए आसान था कहना कि ये टाइमर बम बनाने के लायक है। इसी वजह से मुझे टारगेट किया गया, इन्होंने रिकवरी के तौर पर मेरे मोबाइल रिपेयरिंग इंस्टीट्यूट के जो सामान थे और जो रिपेयरिंग की इलेक्ट्रॉनिक्स की चीजें थी उसे रिकवरी में दिखाया गया। हालांकि एफएसएल रिपोर्ट के अंदर क्लियर हुआ कि कुछ भी एक्सप्लोसिव मेरे पास नहीं मिला।”

    187 लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है?

    19 सालों तक इन लोगों के परिवार के साथ पुलिस, समाज, मीडिया, सरकारें, अदालत नाइंसाफी करती रहीं।

    ऐसे में सवाल उठता है कि इन 12 लोगों और इनके परिवार के 19 साल के दर्द का जिम्मेदार कौन है? क्या उन लोगों को सजा मिलेगी जिन्होंने इन 12 लोगों को फंसाया था?

    एक सवाल और है, 2006 के ब्लास्ट में 187 लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है? उन परिवारों से क्या कहा जाएगा जिन्होंने अपनों को खोया था? वो लोग लौटकर नहीं आएंगे लेकिन उनके कातिल को हमारा प्रशासन आज तक नहीं ढूंढ पाया और ना ही कटघरे में खड़ा कर पाया, सजा तो दूर की बात हो गई।

  • पुलिस पर लगे कॉपी पेस्ट के आरोप, सरकार को दिया कोर्ट ने निर्देश

    पुलिस पर लगे कॉपी पेस्ट के आरोप, सरकार को दिया कोर्ट ने निर्देश

    पुलिस प्रशासन पर कॉपी पेस्ट के आरोप लग रहे हैं। कहा जा रहा है कि पुलिस प्रशासन के बीच ये कॉपी पेस्ट का कल्चर खतरनाक ट्रेंड बनता जा रहा है। इससे कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं।

    मुंबई: गवाहों के बयान और आरोपियों के जवाब एक दूसरे से मेल नही खाते। तब पर भी क्यों न्याय के लिए पीड़ितों को 19 साल का इंतजार करना पड़ा। मुंबई लोकल ट्रेन बम ब्लास्ट के मामले ने सैकड़ों निरपराध लोगों की जान ले ली और प्रशासन लीपा-पोती कर निर्दोष लोगों को जेल में ठूंस दिया। यहां तक कि कईयों को उम्र कैद तो कईयों को फांसी की सजा तक सूना दी गई। लेकिन आखिरकार हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया तब जाकर फैसला सामने आया, कि पुलिस ने आरोप पत्र में गड़बड़ियां की हुई है और गिरफ्तार आरोपियों को सज़ा देने के लिए कोई भी ठोस सबूत नही है।

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    लापरवाह प्रशासन

    मुंबई लोकल ट्रेन बम धमाका कोई छोटी मोटी घटना नहीं थी। इस घटना ने पूरे देश को झगझोड कर रख दिया था। लेकिन प्रशासन उन आरोपियों को पकड़ने में नाकाम हो गई और बेगुनाहों को बली का बकरा बना दिया गया। ये कैसी क्रूरता रही की उन निरपराध लोगों को 19 सालों का वनवास काटना पड़ा। इसकी जांच और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। जबकि सरकारी पक्ष भी कोर्ट में गलत साबित हुआ।

    कोर्ट में क्या हुआ?

    मुंबई ट्रेन बम ब्लास्ट मामले में हाईकोर्ट ने आरोपियों के इकबालिया बयान में समानता पर गंभीरता से गौर किया। कोर्ट ने कहा कि आरोपियों के बयान कई आधारों पर अधूरे हैं और सत्यता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। बॉम्बे हाईकोर्ट ने चार्जशीट में गवाहों के बयान में कॉपी-पेस्ट कल्चर पर चिंता जताते हुए इसे खतरनाक ट्रेंड बताया है। अदालत ने 2006 के मुंबई ट्रेन बम ब्लास्ट मामले में 12 आरोपियों को बरी कर दिया।

    अदालत ने क्या कहा?

    अदालत ने कहा कि गवाहों और आरोपियों के बयान अधूरे और असत्य पाए गए हैं और इनके कुछ हिस्से एक-दूसरे से हूबहू मिलते हैं, जो कॉपी-पेस्ट कल्चर को दर्शाते हैं। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने मई और जून के मामलों में गवाहों के बयानों में कॉपी-पेस्ट पर संज्ञान लिया और महाराष्ट्र सरकार से इससे निपटने और इस संबंध में गाइडलाइन जारी करने को कहा।

    पुलिस प्रशासन का कॉपी पेस्ट

    मई में हाईकोर्ट ने एक अन्य मामले में पुलिस की ओर से अमल में लाए जा रहे एक और खतरनाक कल्चर पर संज्ञान लिया था, जिसमें गंभीर अपराधों में भी गवाहों के बयान कॉपी-पेस्ट किए गए थे। अदालत ने तब कहा था कि गवाहों के बयान में कॉपी पेस्ट के इस तरह के कई मामले सामने आए है। पिछले महीने हाईकोर्ट ने एक अन्य आपराधिक मामले में भी इसी तरह के ट्रेंड पर संज्ञान लिया था और राज्य सरकार को इससे निपटने का निर्देश दिया था।

    2006 के मुंबई ट्रेन बम ब्लास्ट मामले में जस्टिस अनिल किलोर और जस्टिस श्याम चंदक की विशेष पीठ ने कहा कि कई आरोपियों के इकबालिया बयान इस तरह के थे, जिन्हें देखकर लग रहा था कि सवालों के जवाब कॉपी-पेस्ट किए गए हैं। Police accused of copy paste, court gives instructions to the government

  • तलाक के लिए पत्नी ने किया करोड़ों का घर 12 करोड़ रुपये की डिमांड, कोर्ट भी हैरान

    तलाक के लिए पत्नी ने किया करोड़ों का घर 12 करोड़ रुपये की डिमांड, कोर्ट भी हैरान

    सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को पति- पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद में गुजारे- भत्ते को लेकर एक हाई प्रोफाइल केस आया। पत्नी के गुजारे भत्ते की डिमांड सूनकर कोर्ट भी हैरान, कहा तुम नौकरी कर अपना गुजारा क्यों नही कर सकती पति पर आश्रित क्यों रहना है?

    न्यूज़ डेस्क
    नई दिल्‍ली:
    सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को पति- पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद में गुजारे- भत्ते को लेकर एक हाई प्रोफाइल केस आया। मुख्‍य न्‍यायधीश (CJI) भूषण आर. गवई की बेंच के सामने इस मुद्दे को लेकर दिलचस्प बहस हुई। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने कई बड़ी टिप्पणियां कर फैसला सुरक्षित रख लिया। इस दौरान CJI गवई ने महिला को नसीहत दी कि वो पढ़ी लिखी है तो उसे पति के गुजारे- भत्ते के भरोसे नहीं रहना चाहिए। खास बात ये है कि महिला अपने केस की खुद पैरवी कर रही है।

    18 महीने की शादी में करोड़ों की डिमांड

    सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश बी.आर गवई ने महिला से पूछा, ‘आपकी क्या मांग है?’ इस पर महिला ने कहा कि बस मुंबई वाला घर और 12 करोड़ रुपये का गुजारा भत्ता चाहिए। इस पर CJI  गवई ने कहा, ‘वह घर तो कल्पतरु में है। जो अच्छे बिल्डरों में से एक है और आप तो IT एक्सपर्ट हैं, आपने MBA किया है। जबकि बेंगलुरु, हैदराबाद नौकरी के क्षेत्र में आपकी डिमांड है!  कभी भी आप नौकरी शुरू कर सकती हैं तो आप नौकरी भी क्यों नहीं करतीं?’ उन्होंने यह भी कहा, कि ‘आपकी शादी सिर्फ़ 18 महीने चली और अब आप एक BMW भी चाहती हैं? 18 महीने की शादी और आप हर महीने एक करोड़ चाहती हैं।’ महिला ने जवाब दिया, ‘लेकिन वो बहुत अमीर आदमी हैं। उसने मुझे सिजोफ्रेनिया का शिकार बताकर शादी रद्द करने की मांग की।’

    कोर्ट ने मांगा आयटी रिटर्न

    इस दौरान पति की ओर से वरिष्ठ वकील माधवी दीवान ने कहा, ‘उसे भी काम करना पड़ता है। हर चीज की मांग ऐसे नहीं पूरी की जा सकती।’ महिला ने सवाल किया, ‘क्या मैं सिजोफ्रेनिया से पीड़ित दिखती हूं ?’ CJI गवई ने कहा, ‘आयटी रिटर्न दाखिल करें। लेकिन समझ लीजिए कि आप उसके पिता की संपत्ति पर भी दावा नहीं कर सकतीं’ लंच के बाद फिर सुनवाई शुरू हुई। CJI गवई की बेंच ने पति का आयटी रिटर्न देखा। Wife demands Rs 12 crore for a house worth crores for divorce, court is also surprised

    आप भी कमाया सकते हैं।

    वरिष्ठ वकील दीवान ने कहा, ‘कृपया पूरी कॉपी दें। 2015-16 में आय ज्‍यादा है क्योंकि उस समय वो नौकरी करते थे। 2 करोड़ 50 लाख और 1 करोड़ का बोनस, प्रॉक्सी बिजनेस के भी आरोप हैं। चलिए इसे भी उदाहरण के तौर पर लेते हैं। वो बैलेंस शीट भी है। जिस फ्लैट में वह रह रही हैं, उसके अलावा। दो कार पार्किंग भी हैं। वह उससे कमाई कर सकती है।’ इस पर मुख्य न्यायाधीश गवई ने हामी भरी, ‘हां हां, मुंबई में सभी जगहों से पैसा कमाया जा सकता है।’  दीवान ने आगे कहा, ‘जिस BMW का वह सपना देख रही हैं, वह 10 साल पुरानी है और बहुत पहले ही बंद हो चुकी है।’  Wife demands Rs 12 crore for a house worth crores for divorce, court is also surprised

    खुद कमाकर खाइए

    CJI गवई मे महिला से कहा, ‘या तो आपको बिना किसी बोझ के फ्लैट मिलेगा या कुछ भी नहीं मिलेगा। जब आप उच्च शिक्षित हों और अपनी इच्छा से काम न करने का फैसला करें।या तो आप वो 4 करोड़ रुपये ले लें, पुणे/हैदराबाद/बेंगलुरु में कोई अच्छी नौकरी ढूंढ लें। आईटी केंद्रों में आप जैसी होनहार लोगों की मांग है।’ इस पर याचिकाकर्ता महिला ने शिकायत की, ‘मेरी नौकरी भी इन्हीं ने छुड़वा दी। मुझ पर FIR भी दर्ज करा दी।’ इस पर मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा, ‘आप FIR दे दीजिए, हम वो भी रद्द कर देंगे। हम निर्देश देंगे कि कोई भी पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ कोई आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं करेगा।’ इस पर पति की वकील ने बताया कि ये तो समझौते में है ही। फैसला सुरक्षित रखते हुए CJI गवई ने महिला से कहा, ‘आपको खुद मांगना नहीं चाहिए बल्कि, आपको खुदको कमाकर खाना चाहिए।’

  • मुंबई ट्रेन ब्लास्ट के सभी आरोपी हो गए बरी, फांसी की सजा भी हुई रद्द

    मुंबई ट्रेन ब्लास्ट के सभी आरोपी हो गए बरी, फांसी की सजा भी हुई रद्द

    Mumbai Train Blast: 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए धमाकों के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने गिरफ्तार सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया है।

    न्यूज़ डेस्क
    Mumbai Train Blast:
    साल 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए सीरियल बम धमाकों के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को अहम फैसला सुनाते हुए सभी को बरी कर दिया है। हाईकोर्ट ने इस केस में शामिल सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया है और उन्हें तुरंत जेल से रिहा करने का भी आदेश दिया है। All the accused in Mumbai train blast case were acquitted, death sentence was also cancelled

    क्या है पूरा मामला?

    11 जुलाई 2006 की शाम को मुंबई में एक दिल दहला देने वाली घटना हुई थी। उस वक्त लोकल ट्रेनें यात्रियों से भरी थी। तभी महज़ 11 मिनट के भीतर शहर की अलग-अलग जगहों पर 7 धमाके हुए। इस घटना में 189 लोगों की मौत हो गई और 827 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। ये धमाके खार, सांताक्रूज, बांद्रा, जोगेश्वरी, माहिम, मीरा रोड, भायंदर, माटुंगा, माहिम और बोरीवली में हुए थी। इस हमले से पूरे मुंबई में डर और अफरा-तफरी मच गई। शुरू में इन घटनाओं को लेकर सात अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गईं, लेकिन बाद में जब यह पता चला कि यह एक बड़ा आतंकी हमला है, तो इसकी जांच ATS को सौंप दी गई।

    12 लोगों को दोषी ठहराया गया

    नवंबर 2006 में पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की। 2015 में ट्रायल कोर्ट ने सभी 12 आरोपियों को दोषी ठहराया था और इनमें से 5 को फांसी की सजा और 7 को उम्रकैद दी गई थी। All the accused in Mumbai train blast case were acquitted, death sentence was also cancelled

    गवाहों पर नहीं हुआ कोर्ट को भरोसा

    ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ सभी आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील की थी। जनवरी 2025 में इस मामले की सुनवाई पूरी हुई और अब 19 साल बाद फैसला आया की सभी आरोपियों को बरी कर दिया जाना चाहिए। हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति एस. चांडक की खंडपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष यानी कि सरकार की ओर से मुकदमा लड़ने वाले पक्के सबूत नहीं दे सके जिसके कारण ये फैसला लेना पड़ा है।

    कोर्ट ने 2006 मुंबई ट्रेन ब्लास्ट केस में दिए गए ज्यादातर गवाहों के बयानों को भरोसे लायक नहीं माना। फैसले में कहा, कि टैक्सी ड्राइवरों और ट्रेन में मौजूद लोगों के लिए धमाके के 100 दिन बाद आरोपियों को पहचानना बहुत मुश्किल था। इतने लंबे समय बाद दी गई गवाही पर भरोसा नहीं किया जा सकता, इसलिए कोर्ट ने गवाही को मान्यता नहीं दी।

    राज्य सरकार की याचिका भी हुई खारिज

    हाईकोर्ट ने न सिर्फ आरोपियों की अपील मंजूर की, बल्कि राज्य सरकार की उस याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें उसने फांसी की सजा बरकरार रखने की मांग की थी। All the accused in Mumbai train blast case were acquitted, death sentence was also cancelled

  • राज ठाकरे की मनसे पर पुलिस का डंडा चलेगा? वकीलों ने डीजीपी से मदद मांगी

    राज ठाकरे की मनसे पर पुलिस का डंडा चलेगा? वकीलों ने डीजीपी से मदद मांगी

    एक समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, पत्र में विशेष रूप से मनसे प्रमुख राज ठाकरे द्वारा 5 जुलाई को मुंबई के वर्ली क्षेत्र में आयोजित रैली में दिए गए भाषण का उल्लेख किया गया है

    मुंबई: शहर के तीन वकीलों ने महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक (DGP) को एक पत्र लिखकर राज ठाकरे के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के खिलाफ हाल ही में पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा गैर-मराठी भाषी लोगों पर कथित हमलों के लिए कानूनी कार्रवाई का अनुरोध किया है। एक न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार पत्र में विशेष रूप से मनसे प्रमुख राज ठाकरे द्वारा 5 जुलाई को मुंबई के वर्ली इलाके में एक रैली में दिए गए भाषण का हवाला दिया गया है। इसमें दावा किया गया है कि ठाकरे ने गैर-मराठी भाषी लोगों के खिलाफ भड़काऊ बयान दिया, जिसके बाद पार्टी कार्यकर्ताओं ने आम नागरिकों के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया, स्थानीय दुकानदारों पर हमला किया और धमकियाँ दीं।

    देश के लिए खतरा बताया

    रिपोर्ट के मुताबिक इस तरह की घटनाओं को देश की एकता, शांति और अखंडता के लिए खतरा बताते हुए, पत्र में पुलिस से मुख्य साजिशकर्ताओं और “राष्ट्र-विरोधी” तत्वों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत कार्रवाई करने का आग्रह किया गया है। इसके अलावा, अधिवक्ता पंकज मिश्रा, नित्यानंद शर्मा और आशीष राय द्वारा लिखे गए पत्र में इन घटनाओं को “गंभीर और गैरकानूनी स्थितियाँ” बताया गया है जो सामाजिक सद्भाव और कानून-व्यवस्था के लिए ख़तरा हैं।

    हमले और अपमान

    इसके अलावा, इस बात पर ज़ोर देते हुए कि प्रत्येक भारतीय नागरिक का मराठी भाषा का सम्मान करना कर्तव्य है, पत्र में आरोप लगाया गया है कि मनसे कार्यकर्ता हाल ही में राज्य में रहने वाले गैर-मराठी भाषी व्यक्तियों पर हमले और सार्वजनिक रूप से अपमान करने की घटनाओं में शामिल रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार इसमें दावा किया गया है कि ऐसी घटनाएँ राष्ट्रीय अखंडता और सह-अस्तित्व के लिए गंभीर ख़तरा हैं और न केवल महाराष्ट्र में, बल्कि पूरे देश में कानून-व्यवस्था की स्थिति ख़राब कर दी है।

    भाषणों की होगी जांच

    वकीलों ने डीजीपी से मनसे नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं, जिन्हें वर्तमान में पुलिस सुरक्षा प्राप्त है, के भाषणों और हिंसक कार्रवाइयों की जाँच शुरू करने का आग्रह किया है। रिपोर्ट के मुताबिक पत्र में कहा गया है कि भय का माहौल बनाने के दोषी पाए जाने वालों के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए, जिससे भविष्य में सद्भाव को नुकसान पहुँचेगा, और यह भी कहा, कि असंवैधानिक बयान देने वालों को दंडित किया जाना चाहिए।

    मार पीट और तोडफोड

    इसके अलावा, एक अलग घटना में, मनसे कार्यकर्ताओं ने हाल ही में मुंबई से सटे मिराभायंदर क्षेत्र में एक मिठाई की दुकान के मालिक की मराठी न बोलने पर पिटाई कर दी। रिपोर्ट के मुताबिक इस महीने की शुरुआत में, मनसे कार्यकर्ताओं ने मुंबई के शेयर बाजार निवेशक सुशील केडिया के वर्ली स्थित कार्यालय पर पथराव करते हुए शीशे के दरवाज़े को तोड़ दिया, क्योंकि उन्होंने घोषणा की थी कि वह मराठी नहीं बोलेंगे और पार्टी प्रमुख राज ठाकरे को चुनौती दी थी।