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  • तांबे के तार चोरी मामले में आरोपी गिरफ्तार, पूछताछ में 12 वारदातों का खुलासा; कार समेत ₹4.51 लाख का माल जब्त

    तांबे के तार चोरी मामले में आरोपी गिरफ्तार, पूछताछ में 12 वारदातों का खुलासा; कार समेत ₹4.51 लाख का माल जब्त

    नाशिक के लासलगांव में तांबे के तार चोरी का आरोपी गिरफ्तार। पूछताछ में 12 वारदातों का खुलासा, कार समेत ₹4.51 लाख का माल जब्त हुआ। पुराने मामलों की जांच जारी है।

    महाराष्ट्र/नाशिक: लासलगांव में तांबे के तार चोरी के मामले में पुलिस ने एक आरोपी को कार समेत गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, विट्ठलवाड़ी स्थित एक इलेक्ट्रिकल और हार्डवेयर दुकान का शटर तोड़कर करीब ₹3.43 लाख के तांबे के तार चोरी किए गए थे। चोरी के बाद आरोपी कार से माल लेकर निकल रहा था, लेकिन नाकेबंदी के दौरान पुलिस के हत्थे चढ़ गया।

    गिरफ्तार आरोपी की पहचान खुर्शीद अब्दुल हमीद खान के रूप में हुई है। पुलिस पूछताछ में नाशिक जिले के अलग-अलग थाना क्षेत्रों में हुई 12 चोरी और सेंधमारी की वारदातों का कनेक्शन सामने आने का दावा किया गया है। आरोपी के पास से तांबे के तार, कार और चोरी में इस्तेमाल होने वाले औजार समेत कुल ₹4,51,716 का माल जब्त किया गया है।

    दुकान का शटर तोड़कर चोरी किए थे तांबे के तार

    पुलिस के अनुसार, लासलगांव थाना क्षेत्र के विट्ठलवाड़ी गांव में ‘लोणजाईमाता इलेक्ट्रिकल वर्क्स एंड हार्डवेयर’ दुकान को चोरों ने निशाना बनाया था। दुकान से करीब ₹3,43,216 कीमत के तांबे के तार चोरी किए गए।

    चोरी के बाद आरोपी खुर्शीद अब्दुल हमीद खान इन तारों को सेंट्रो कार से लेकर निकल रहा था। आरोपी मूल रूप से उत्तर प्रदेश का रहने वाला बताया गया है और फिलहाल इगतपुरी में रह रहा था। पुलिस रिकॉर्ड में कार का नंबर MH 03 AM 3467 बताया गया है।

    नाकेबंदी के दौरान पुलिस ने पकड़ा

    19 अगस्त की तड़के विंचूर तीन पाटी इलाके में पुलिस की नाकेबंदी चल रही थी। इसी दौरान पुलिस कर्मचारियों को एक संदिग्ध कार दिखाई दी। पुलिस ने कार को रोकने की कोशिश की और उसका पीछा किया।

    पुलिस के मुताबिक, पीछा किए जाने के दौरान कार डिवाइडर से टकरा गई। इसके बाद पुलिस ने आरोपी को पकड़ लिया। कार की तलाशी लेने पर उसमें तांबे के तार, बोल्ट कटर और लोहे की छड़ मिली।

    जब्त सामान में करीब ₹3.43 लाख के तांबे के तार और लगभग ₹1 लाख कीमत की कार शामिल है। पुलिस के अनुसार, सभी सामान की कुल कीमत ₹4,51,716 है।

    पूछताछ में 12 चोरी की वारदातों का कनेक्शन

    आरोपी से पूछताछ के बाद पुलिस को नाशिक जिले के अलग-अलग इलाकों में हुई 12 चोरी और सेंधमारी की वारदातों के बारे में जानकारी मिलने का दावा किया गया है।

    इनमें लासलगांव, सायखेड़ा, पिंपलगांव बसवंत, डिंडोरी, सिन्नर, इगतपुरी, वडनेर भैरव, सटाणा और चांदवड़ समेत कई थाना क्षेत्र शामिल बताए गए हैं।

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    नाशिक पुलिस के साथ गिरफ्तार आरोपी की तस्वीर

    पुलिस अब इन पुराने मामलों की FIR, चोरी हुए सामान और आरोपी के बयान का मिलान कर रही है। जांच में यह भी पता लगाया जा रहा है कि इन वारदातों में आरोपी की सीधी भूमिका कितनी थी और उसके साथ कोई और लोग शामिल थे या नहीं।

    ₹1 करोड़ से ज्यादा के पुराने मामलों की जांच

    पूछताछ में सामने आए पुराने मामलों को जोड़ने पर करीब ₹1 करोड़ से ज्यादा के माल से जुड़े मामलों की जांच की बात सामने आई है।

    हालांकि, यहां एक बात साफ है कि ₹1 करोड़ से ज्यादा की रकम अभी बरामद नहीं हुई है। यह पुराने मामलों में चोरी हुए माल और उससे जुड़े संभावित नुकसान की जांच का हिस्सा है। फिलहाल इस कार्रवाई में पुलिस ने ₹4,51,716 का माल जब्त किया है।

    अब पुलिस पुराने मामलों में चोरी हुआ माल कहां गया, उसे किसे बेचा गया और इस पूरी कड़ी में और कौन लोग शामिल हैं, इसकी जानकारी जुटा रही है।

    पुलिस को अब इन सवालों के जवाब तलाशने हैं

    आरोपी की गिरफ्तारी के बाद पुलिस की जांच सिर्फ इस एक चोरी तक सीमित नहीं है। अब पुराने मामलों की कड़ी जोड़ने पर फोकस है।

    पुलिस यह पता लगा रही है कि चोरी का सामान कहां बेचा जाता था, पुराने मामलों में भी इसी तरह के औजार या वाहन इस्तेमाल हुए थे या नहीं, आरोपी के साथ और कौन लोग थे और अलग-अलग जगहों से चोरी किया गया कितना माल बरामद किया जा सकता है।

    अगर पूछताछ में दूसरे आरोपियों या चोरी का माल खरीदने वालों के बारे में ठोस 12जानकारी मिलती है, तो इस मामले में आगे और कार्रवाई हो सकती है।

    देश के दूसरे हिस्सों में भी सामने आए तांबे की चोरी के मामले

    तांबे के तार चोरी की घटनाएं सिर्फ नाशिक तक सीमित नहीं हैं। हाल के दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से copper wire, बिजली के केबल और दूसरे electrical infrastructure को निशाना बनाने के मामले सामने आए हैं।

    दिल्ली-एनसीआर में पुलिस ने एक interstate copper-wire theft gang को पकड़ा था। पुलिस के मुताबिक, इस गिरोह से 18 चोरी के मामलों का खुलासा हुआ था। आरोपियों पर पुलिस की नजर से बचने के लिए walkie-talkie और internet dongle का इस्तेमाल करने का भी आरोप लगा था।

    राजस्थान में भी एक मामले में पुलिस ने बताया था कि आरोपी online search के जरिए बड़े solar plants की जानकारी जुटाकर उन्हें निशाना बनाते थे। इस मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था।

    गाजियाबाद के ट्रोनिका सिटी में भी पुलिस ने copper और iron चोरी के मामले में आरोपियों को गिरफ्तार कर 35 किलो तांबे का तार बरामद किया था।

    तांबे की चोरी से आम लोगों को क्या नुकसान?

    तांबे के तार की चोरी का नुकसान सिर्फ दुकान या गोदाम के मालिक तक सीमित नहीं रहता। जब यही तार बिजली, रेलवे, टेलीकॉम या दूसरे infrastructure में लगा हो और उसे काटकर चोरी कर लिया जाए, तो उसका असर सीधे आम लोगों पर पड़ सकता है।

    भोपाल में रेलवे signal cables की चोरी के बाद चार passenger trains में 30 से 60 मिनट तक की देरी की रिपोर्ट सामने आई थी। रेलवे infrastructure में इस तरह की चोरी से operation के साथ safety का सवाल भी खड़ा होता है।

    मुंबई में भी MTNL की underground copper cables की चोरी का मामला सामने आया था। इस मामले में एक MTNL कर्मचारी पर कथित तौर पर cable locations की जानकारी चोरी करने वाले गिरोह तक पहुंचाने का आरोप लगा था।

    इसी तरह खेतों में लगे solar panels और नलकूपों के तार चोरी होने पर किसानों को भी सीधा नुकसान उठाना पड़ता है। तार चोरी होने के बाद मोटर या solar system बंद हो सकता है और उसे दोबारा चालू कराने में अलग से खर्च करना पड़ता है।

    लासलगांव मामले में अब आगे क्या?

    लासलगांव पुलिस अब आरोपी से मिली जानकारी के आधार पर पुराने मामलों की जांच आगे बढ़ा रही है। 12 वारदातों में आरोपी की भूमिका, चोरी हुए सामान की बरामदगी और संभावित साथियों की पहचान इस जांच का अगला हिस्सा है।

    उपलब्ध जानकारी के मुताबिक आरोपी को अदालत में पेश करने के बाद 21 अगस्त तक पुलिस हिरासत में भेजा गया था। अब आगे की कार्रवाई में पुलिस हिरासत की स्थिति, पुराने मामलों में बरामदगी और दूसरे आरोपियों की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी।

    इस कार्रवाई में पुलिस अधीक्षक डॉ. डी. एस. स्वामी, अपर पुलिस अधीक्षक विमला एम. और उपविभागीय पुलिस अधिकारी के. के. पाटिल के मार्गदर्शन में टीम ने कार्रवाई की।

    फिलहाल पुलिस की जांच जारी है और पुराने 12 मामलों की कड़ी जुड़ने के बाद इस मामले में चोरी के माल की और बरामदगी या अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी सामने आ सकती है।

    एक नजर में

    घटना: विट्ठलवाड़ी, लासलगांव, नाशिक

    चोरी: करीब ₹3,43,216 के तांबे के तार

    गिरफ्तार आरोपी: खुर्शीद अब्दुल हमीद खान

    बरामद सामान: तांबे के तार, सेंट्रो कार, बोल्ट कटर और लोहे की छड़

    कुल जब्ती: ₹4,51,716

    पुलिस पूछताछ में सामने आए मामले: 12 चोरी और सेंधमारी की वारदातें

    जिन थाना क्षेत्रों का नाम सामने आया: लासलगांव, सायखेड़ा, पिंपलगांव बसवंत, डिंडोरी, सिन्नर, इगतपुरी, वडनेर भैरव, सटाणा और चांदवड़

    पुराने मामलों में जांच: ₹1 करोड़ से ज्यादा के माल से जुड़े मामलों की जांच

    मामले की स्थिति: पुलिस जांच जारी

  • CM Vijay Thalapathy का Fake Video दिखाकर ₹12 लाख की ठगी, सरकारी मदद के नाम पर ऐसे बिछाया जाल

    CM Vijay Thalapathy का Fake Video दिखाकर ₹12 लाख की ठगी, सरकारी मदद के नाम पर ऐसे बिछाया जाल

    वसई में 66 साल की महिला को CM Vijay Thalapathy के Deepfake Video से ₹12 लाख की ठगी का शिकार बनाया गया। जानिए पूरा मामला और Cyber Fraud से बचने का आसान रास्ता।

    पालघर/ वसई: सोशल मीडिया पर दिखने वाला कोई Video कितना भी असली क्यों न लगे, अब उस पर आंख बंद करके भरोसा करना भारी पड़ सकता है। वसई में 66 साल की एक महिला को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय यानी Thalapathy Vijay के नाम और चेहरे से बनाए गए Fake AI Video के जरिए आर्थिक मदद का भरोसा दिलाया गया और करीब 12 लाख रुपये की ठगी कर ली गई।

    पुलिस के मुताबिक, महिला ने Instagram पर एक Reel देखी थी, जिसमें विजय को कथित तौर पर गरीब और जरूरतमंद लोगों को Financial Assistance देने की बात करते दिखाया गया था। Reel में संपर्क करने के लिए एक Phone Number भी दिया गया था। महिला ने जब उस नंबर पर संपर्क किया तो उन्हें दूसरे नंबर पर बात करने के लिए कहा गया। इसके बाद शुरू हुआ पैसे ऐंठने का पूरा खेल।

    Instagram Reel देखकर किया भरोसा

    मामला 27 जुलाई से शुरू हुआ। महिला की नजर Instagram पर एक ऐसी Reel पर पड़ी जिसमें विजय को लोगों को आर्थिक मदद देने की बात कहते हुए दिखाया गया था।

    महिला ने Reel में दिए गए नंबर पर फोन किया। दूसरी तरफ मौजूद लोगों ने उनसे बातचीत शुरू की और उन्हें भरोसा दिलाया कि उन्हें आर्थिक मदद मिल सकती है।

    महिला ने करीब 5 लाख रुपये की मदद मांगी। इसके बाद ठगों ने कहा कि मदद की रकम हासिल करने के लिए पहले 5 हजार रुपये Processing Fee जमा करनी होगी।

    महिला ने यह रकम दे दी।

    यहीं से ठगी का सिलसिला और आगे बढ़ गया।

    ₹5 हजार के बाद ₹77 लाख का नया झांसा

    Processing Fee देने के बाद ठगों ने महिला को बताया कि उन्हें विदेश से करीब 77 लाख रुपये मिलने वाले हैं। इसके लिए Tax और दूसरे Charges के नाम पर लगातार पैसे जमा करने को कहा गया।

    मदद की रकम मिलने की उम्मीद में महिला ठगों की बातों पर भरोसा करती रहीं और अलग-अलग समय पर पैसे भेजती रहीं।

    पुलिस के मुताबिक, महिला ने एक Private Credit Society से Loan लिया, अपनी Jewellery गिरवी रखी और अपनी बेटी के Bank Account से भी पैसे निकाले। इसके बाद ठगों की ओर से बताए गए Bank Accounts में कुल करीब 12 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए गए।

    पूरी रकम करीब 10 दिनों के दौरान भेजी गई।

    12 लाख देने के बाद भी नहीं मिली मदद

    महिला को जब वादा की गई Financial Assistance नहीं मिली और ठग लगातार पैसे मांगते रहे, तब उन्हें शक हुआ।

    इसके बाद उन्हें समझ आया कि जिस Video को देखकर उन्होंने भरोसा किया था, वह असली नहीं बल्कि AI से बनाया गया Fake Video था।

    महिला ने इसके बाद वालिव पुलिस से संपर्क किया।

    वालिव पुलिस ने दर्ज किया मामला

    मामले में वालिव Police Station में शिकायत दर्ज की गई है। पुलिस ने Bharatiya Nyaya Sanhita और Information Technology Act के तहत Cheating का मामला दर्ज किया है।

    Police Inspector Gorakshnath Zaid ने मामले की पुष्टि की है। अब पुलिस उन लोगों का पता लगाने की कोशिश कर रही है जिन्होंने महिला से संपर्क किया और जिन Bank Accounts में रकम ट्रांसफर करवाई गई।

    Deepfake Video के बाद ऐसे आगे बढ़ा Fraud

    इस मामले में ठगों ने सीधे पैसे की मांग नहीं की। पहले Social Media पर एक भरोसेमंद चेहरे का इस्तेमाल किया गया।

    पहले Fake Video दिखाया गया।

    फिर Video में दिए गए नंबर पर संपर्क करवाया गया।

    इसके बाद आर्थिक मदद का भरोसा दिया गया।

    पहले सिर्फ 5 हजार रुपये की Processing Fee मांगी गई।

    इसके बाद 77 लाख रुपये मिलने का दावा किया गया।

    फिर Tax और दूसरे Charges के नाम पर लगातार Payment करवाया गया।

    आखिर में महिला से करीब 12 लाख रुपये ट्रांसफर करवा लिए गए।

    यानी Fake Video ने भरोसा बनाया और उसके बाद Phone Call और अलग-अलग Payment के जरिए ठगी को आगे बढ़ाया गया।

    देश में Deepfake से जुड़े ऐसे और मामले

    वसई का मामला अकेला नहीं है। हाल के महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से Deepfake Video के जरिए Financial Fraud और Blackmail के मामले सामने आए हैं।

    पुणे में 38 साल की एक महिला को Instagram पर उद्योगपति रतन टाटा का Deepfake Video दिखाया गया। इस Video में Share Trading से जुड़े निवेश और अच्छे Return का दावा किया गया था। महिला ने Advertisement पर क्लिक किया और बाद में एक App के जरिए कथित Investment Scheme में पैसे लगाए। पुलिस के अनुसार उन्हें करीब 4.09 लाख रुपये का नुकसान हुआ।

    इसके अलावा वहीं, पुणे में ही 56 साल के एक Businessman को Finance Minister Nirmala Sitharaman के Deepfake Video के जरिए Investment के नाम पर फंसाया गया। इसके बाद Fake Forex Trading Platform, Fake Investment Advisor और SpaceX Shares के नाम पर करीब 1.07 करोड़ रुपये की ठगी की गई। Fake Platform पर कथित Profit बढ़ता हुआ दिखाया गया और पैसा निकालने के लिए आगे और रकम मांगी गई।

    बेंगलुरु में एक Retired Professor को Facebook पर Nirmala Sitharaman का Deepfake Video दिखाया गया। इसके बाद उन्हें एक Fake Trading Platform, Telegram Chat और Overseas Calls के जरिए Investment के नाम पर फंसाया गया और 61 लाख रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ।

    पटना में Deepfake का इस्तेमाल अलग तरीके से किया गया। एक Hotel Owner को उनके चेहरे से बनाए गए कथित अश्लील AI Videos के जरिए Blackmail किया गया और करीब 97 लाख रुपये की रकम वसूली गई। पुलिस ने तीन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था और अंतिम 20 लाख रुपये की किस्त बरामद की गई।

    इन मामलों से साफ है कि Deepfake का इस्तेमाल अब सिर्फ Fake News फैलाने के लिए नहीं बल्कि Investment Fraud, Financial Assistance Scam और Blackmail जैसे अपराधों में भी किया जा रहा है।

    Video में नेता या Celebrity दिखे तो भी तुरंत भरोसा न करें

    AI की मदद से किसी व्यक्ति का चेहरा और आवाज इस्तेमाल करके ऐसा Video तैयार किया जा सकता है जिसमें वह व्यक्ति ऐसी बात कहता हुआ दिखाई दे सकता है जो उसने वास्तव में कही ही नहीं।

    इसलिए अगर किसी Social Media Video में कोई नेता, Celebrity, कारोबारी या सरकारी अधिकारी पैसे, Investment, नौकरी, Lottery या Financial Assistance का दावा करता दिखाई दे और साथ में कोई Mobile Number, WhatsApp Number, Website या Payment Request दी गई हो तो सीधे पैसे भेजना जोखिम भरा हो सकता है।

    ऐसी जानकारी को पहले संबंधित व्यक्ति या संस्था के Official Source से Verify करना जरूरी है।

    सरकारी मदद के नाम पर Processing Fee मांगी जाए तो सावधान

    वसई के मामले में ठगी की शुरुआत सिर्फ 5 हजार रुपये की Processing Fee से हुई। इसके बाद रकम बढ़ती चली गई।

    यही वजह है कि किसी भी Government Scheme या Financial Assistance के नाम पर पहले पैसे जमा करने को कहा जाए तो सावधान रहें।

    किसी अनजान व्यक्ति के बताए Bank Account, UPI ID, Website या App पर Payment करने से पहले उसकी जानकारी Official Government Source से जांचना जरूरी है।

    पैसा चला गया तो तुरंत 1930 पर करें शिकायत

    अगर किसी व्यक्ति के साथ Financial Cyber Fraud हो गया है और उसने पैसे ट्रांसफर कर दिए हैं तो शिकायत करने में देरी नहीं करनी चाहिए।

    Indian Cyber Crime Coordination Centre यानी I4C के मुताबिक Financial Cyber Fraud की शिकायत National Helpline Number 1930 पर की जा सकती है। इसके बाद Cyber Crime Reporting Portal पर शिकायत की जानकारी पूरी करनी होती है।

    शिकायत करते समय Transaction ID, Transaction Date, Bank या Payment App की जानकारी, UPI ID, Account Details, Phone Numbers, Chat और Screenshots जैसी जानकारी सुरक्षित रखना जरूरी है।

    साथ ही अपने Bank या संबंधित Payment Service Provider को भी तुरंत Fraud Transaction की जानकारी देनी चाहिए।

    I4C का Citizen Financial Cyber Fraud Reporting and Management System Financial Fraud की शिकायतों पर Banks और Payment Intermediaries के साथ कार्रवाई के लिए बनाया गया है।

    साइबर फ्रॉड के खिलाफ सरकार की कार्रवाई भी तेज

    सरकार के मुताबिक 30 जून 2026 तक CFCFRMS के जरिए 32.80 लाख से ज्यादा शिकायतों में 11,158 करोड़ रुपये से अधिक की रकम बचाई गई। इसी अवधि तक I4C ने 3,718 Mobile Apps को भी Block किया था। सरकार ने यह भी बताया कि Suspect Registry के जरिए संदिग्ध Identifiers और Mule Accounts की जानकारी Banks और Financial Institutions के साथ साझा की जा रही है।

    अप्रैल 2026 से Money Restoration Module और Grievance Redressal Module भी काम कर रहे हैं, जिनका उद्देश्य Cyber Fraud में फंसी रकम की बहाली और Bank Accounts के Freeze या Lien से जुड़ी शिकायतों को तेजी से संभालना है।

    Deepfake को लेकर नए नियम भी लागू

    भारत सरकार ने 2026 में AI-generated और Deepfake Content से जुड़े नियमों को और मजबूत किया है। फरवरी 2026 में IT Rules में बदलाव करके Synthetically Generated Information यानी AI से तैयार सामग्री से होने वाले नुकसान को लेकर नया regulatory framework लाया गया। इसमें Deepfake और AI-generated content भी शामिल है।

    सरकार ने Social Media Platforms के लिए AI-generated content की स्पष्ट पहचान और traceable information से जुड़ी व्यवस्था भी तय की है। Unlawful content की शिकायतों पर Platforms को तेजी से कार्रवाई करने की जिम्मेदारी दी गई है।

    अब Social Media पर दिखने वाले Video को लेकर क्या सावधानी रखें?

    किसी बड़े नेता या Celebrity का Video देखकर सिर्फ इसलिए भरोसा न करें क्योंकि उसमें चेहरा और आवाज बिल्कुल असली जैसी लग रही है।

    अगर Video में Financial Assistance, Investment, नौकरी, Lottery या किसी दूसरी आर्थिक मदद का दावा है तो पहले Official Source से जानकारी Verify करें।

    Video में दिए गए किसी अनजान Phone Number या Link पर तुरंत संपर्क न करें।

    Processing Fee, Tax, Verification Charge या Withdrawal Charge के नाम पर पैसे मांगने पर रुक जाएं।

    किसी अनजान Bank Account या UPI ID में Payment न करें।

    और अगर गलती से पैसा भेज दिया है तो इंतजार करने के बजाय तुरंत 1930 पर शिकायत करें और Cyber Crime Portal पर मामला दर्ज करें।

    वसई की 66 साल की महिला के साथ हुई यह घटना बताती है कि Social Media पर दिखने वाला भरोसेमंद चेहरा भी ठगी का जरिया बन सकता है। यहां 5 हजार रुपये की छोटी Payment से शुरू हुआ मामला करीब 12 लाख रुपये के नुकसान तक पहुंच गया।

    इसलिए अगली बार किसी Video में कोई बड़ा नेता, Celebrity या सरकारी व्यक्ति आर्थिक मदद या Investment का दावा करता दिखाई दे तो Video देखकर फैसला लेने के बजाय पहले उसकी सच्चाई Verify करें। यही सावधानी आपके पैसे को ऐसे Deepfake Cyber Fraud से बचा सकती है।

  • मालाड के Hotel Radha की किचन में मिले जिंदा चूहे- कॉकरोच, FDA ने फूड लाइसेंस किया सस्पेंड

    मालाड के Hotel Radha की किचन में मिले जिंदा चूहे- कॉकरोच, FDA ने फूड लाइसेंस किया सस्पेंड

    मुंबई के मालाड वेस्ट स्थित Hotel Radha की किचन में जिंदा चूहे और कॉकरोच मिले। FDA ने फूड लाइसेंस तत्काल सस्पेंड कर खाने की बिक्री, स्टोरेज और सप्लाई भी रोक दी

    मुंबई: मालाड वेस्ट स्थित Hotel Radha की किचन में जिंदा चूहे और कॉकरोच मिलने के बाद महाराष्ट्र FDA ने होटल का फूड बिजनेस लाइसेंस तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया है। 18 अगस्त को हुई जांच में किचन की सफाई, ड्रेनेज, स्टोरेज और फूड हैंडलिंग को लेकर कई गंभीर खामियां सामने आईं।

    मालाड के Hotel Radha में FDA की अचानक जांच

    FDA ने 18 अगस्त को मालाड वेस्ट स्थित Hotel Radha की किचन की जांच की। जांच के दौरान अधिकारियों को किचन में जिंदा चूहे और कॉकरोच मिले। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ चूहे छत के पास दिखाई दिए, जबकि कुछ खुले ड्रेनेज के रास्ते किचन में आते मिले।

    Hotel Radha का पता:

    38, 39 & 40, 1st Floor, Sarvodaya Bhuvan, Ramchandra Lane, Malad (West), Mumbai – 400064

    किचन में सिर्फ चूहे- कॉकरोच नहीं, ये गड़बड़ियां भी मिलीं

    FDA की जांच में किचन के कई हिस्सों में तेल और ग्रीस की मोटी परत मिली। जगह-जगह गंदगी थी और पानी जमा होने से बदबू की शिकायत भी सामने आई।

    किचन के ड्रेनेज खुले और खराब हालत में पाए गए। इससे चूहों और दूसरे कीड़ों के अंदर आने का रास्ता बना हुआ था।

    फूड तैयार करने वाले उपकरणों पर कॉकरोच मिले। रिपोर्ट के मुताबिक dough-mixing machine पर भी कॉकरोच दिखाई दिए। काउंटर और बर्तन गंदे थे, जबकि कई बर्तनों पर जंग के निशान मिले।

    टोस्टर के ऊपर रखा था खुला Dustbin

    जांच के दौरान एक और चौंकाने वाली बात सामने आई। किचन में खुला dustbin रखा हुआ था और उसके ठीक ऊपर toaster रखा था, जहां खाना तैयार किया जा रहा था।

    इसके अलावा कुछ food items धूल और गंदगी के बीच रखे मिले। स्टोरेज बॉक्स और कंटेनर भी साफ नहीं थे। इससे food storage और handling को लेकर भी सवाल उठे।

    FDA ने Hotel Radha का फूड लाइसेंस क्यों सस्पेंड किया?

    इन गंभीर food safety और hygiene violations के बाद FDA ने Food Safety and Standards Act, 2006 के Section 32(3) के तहत Hotel Radha का food business licence तत्काल प्रभाव से suspend कर दिया।

    आदेश के तहत 18 अगस्त से होटल में food की manufacturing, storage, sale और distribution से जुड़ी गतिविधियां रोक दी गई हैं। यानी कार्रवाई सिर्फ warning या सफाई के निर्देश तक सीमित नहीं रही, बल्कि होटल के food business पर तत्काल रोक लगाई गई है।

    क्या Hotel Radha में अभी खाना मिल सकता है?

    FDA के suspension order के मुताबिक food की manufacturing, storage, sale और distribution वाली गतिविधियां रोकने का आदेश दिया गया है।

    इसलिए फिलहाल Hotel Radha के food business को लेकर FDA का suspension लागू है। होटल की बाकी सेवाओं पर क्या असर है, यह food licence suspension से अलग विषय है और उपलब्ध FDA कार्रवाई में मुख्य रोक food-related activities पर है।

    क्या Hotel Radha का लाइसेंस हमेशा के लिए रद्द हुआ है?

    नहीं। यहां suspension और cancellation को अलग समझना जरूरी है।

    FDA ने Hotel Radha का food business licence suspend किया है। उपलब्ध कार्रवाई में licence को हमेशा के लिए cancel करने की बात नहीं कही गई है। आगे compliance और FDA की कार्रवाई के बाद स्थिति में बदलाव हो सकता है।

    क्या Hotel Radha का खाना खाने से किसी के बीमार होने की पुष्टि हुई?

    अभी सामने आई FDA कार्रवाई में किसी ग्राहक के बीमार होने की पुष्टि नहीं की गई है।

    जांच में किचन की hygiene, pest control, drainage, storage और food handling से जुड़ी गंभीर कमियां सामने आई हैं। इसलिए इसे food safety risk के तौर पर देखा गया है, लेकिन बिना मेडिकल या laboratory confirmation के यह कहना सही नहीं होगा कि होटल का खाना खाने से किसी व्यक्ति को बीमारी हुई।

    मुंबई में FDA का बड़ा food safety crackdown

    Hotel Radha पर हुई कार्रवाई अकेली कार्रवाई नहीं है। महाराष्ट्र FDA ने हाल की statewide inspection drive में 31 hotels, restaurants, roadside eateries और दूसरे food establishments की जांच की।

    इस कार्रवाई में 22 establishments को improvement notices दिए गए, जबकि पांच food business licences suspend किए गए। करीब 25 लाख रुपये के banned और दूसरे food products जब्त किए गए। 10 लोगों की गिरफ्तारी, आठ FIR और छह establishments को seal किए जाने की जानकारी भी FDA कार्रवाई के बाद सामने आई है।

    इसी अभियान के दौरान Hotel Radha, Malad West का नाम भी उन establishments में शामिल रहा जिनका food business licence suspend किया गया। FDA ने इस अभियान को “Safe Food, Safe Maharashtra” के तहत चलाया है।

    FDA की कार्रवाई में किन चीजों पर नजर है?

    FDA की हालिया inspections में सिर्फ kitchen की सफाई ही नहीं, बल्कि food storage, temperature control, waste disposal, pest control और food handling जैसी चीजों को भी देखा जा रहा है।

    Hotel Radha के मामले में खुले drains, rodents, cockroaches, गंदे utensils, जमा पानी, grease, खराब storage और खुले dustbin जैसी कई कमियां एक साथ सामने आईं।

    मालाड में इससे पहले भी food safety पर कार्रवाई

    मालाड वेस्ट में इससे पहले FDA ने Blinkit के एक dark store पर भी food safety violations को लेकर कार्रवाई की थी। 7 अगस्त की inspection के बाद वहां cockroaches, expired food, floor पर रखे food items और storage तथा pest-control से जुड़ी कमियां सामने आने की रिपोर्ट आई थी। उस facility का food licence भी suspend किया गया था।

    ऐसे में मालाड में लगातार सामने आ रही food safety कार्रवाई ने restaurants और food-storage facilities की hygiene व्यवस्था पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    Restaurant में खाना खाने से पहले ग्राहक क्या देखें?

    बाहर से restaurant कितना भी साफ और अच्छा दिखे, असली food safety kitchen के अंदर की व्यवस्था पर depend करती है।

    ग्राहक restaurant में food licence/FSSAI details देख सकते हैं। अगर किसी जगह पर खुले में रखा खाना, गंदे utensils, cockroaches, rats, खराब storage या दूसरी गंभीर hygiene problem दिखाई देती है तो उसकी शिकायत food safety authorities तक की जा सकती है।

    Hotel Radha पर हुई कार्रवाई ने एक बार फिर यही सवाल सामने ला दिया है कि restaurant की table और kitchen के बीच food safety की असली तस्वीर क्या है।

    फिलहाल FDA की कार्रवाई के बाद Hotel Radha का food business licence suspend है और food की manufacturing, storage, sale और distribution पर रोक लागू है। आगे होटल की compliance और FDA की अगली कार्रवाई से ही पता चलेगा कि licence कब बहाल होता है।

  • कांदिवली के इमिटेशन ज्वेलरी कारखाने में 13 नाबालिग मिले, 9-10 घंटे काम कराने का आरोप

    कांदिवली के इमिटेशन ज्वेलरी कारखाने में 13 नाबालिग मिले, 9-10 घंटे काम कराने का आरोप

    मुंबई के कांदिवली में इमिटेशन ज्वेलरी कारखाने से 13 नाबालिग मुक्त कराए गए। पुलिस के मुताबिक बच्चे 9-10 घंटे काम करते और वहीं रहते थे। जांच जारी है।

    मुंबई: कांदिवली पश्चिम में चारकोप पुलिस ने बाल श्रम के खिलाफ कार्रवाई करते हुए इमिटेशन ज्वेलरी बनाने वाले एक कारखाने से 13 नाबालिगों को मुक्त कराया है। बच्चों की उम्र 13 से 17 वर्ष के बीच बताई जा रही है। पुलिस के अनुसार, इन बच्चों से कथित तौर पर रोजाना 9 से 10 घंटे तक काम कराया जाता था और उन्हें उचित मजदूरी भी नहीं दी जाती थी।

    कार्रवाई चारकोप इंडस्ट्रियल एरिया के ‘जहारा फैशन एरा’ नमक इमिटेशन ज्वेलरी कारखाने में की गई। पुलिस की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, इस कार्रवाई से जुड़ी जानकारी उत्तर परिमंडल-2 के पुलिस उपायुक्त संदीप घुगे और चारकोप पुलिस थाने के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक महेश बळवंतराव की ओर से दी गई।

    कारखाने में काम के साथ रह भी रहे थे बच्चे

    पुलिस के मुताबिक, कारखाने में नाबालिगों से इमिटेशन ज्वेलरी और चूड़ियां बनाने का काम कराया जा रहा था। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि बच्चे जिस जगह काम करते थे, वहीं पर रह रहे थे।

    मुक्त कराए गए सभी 13 बच्चे पश्चिम बंगाल के अलग-अलग जिलों के रहने वाले बताए जा रहे हैं। पुलिस के अनुसार, कारखाने के मालिक और संचालक बच्चों की उम्र साबित करने वाले जरूरी दस्तावेज भी पेश नहीं कर सके।

    मालिक और संचालक हिरासत में

    पुलिस ने कारखाने के मालिक अंकित कुमार महेंद्र रावल और संचालक समीनुर मोतियार रहमान शेख को हिरासत में लिया है। दोनों के खिलाफ बाल एवं किशोर श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम तथा किशोर न्याय अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।

    पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि नाबालिगों को कारखाने में काम पर रखने की प्रक्रिया क्या थी और इसमें अन्य किसी व्यक्ति की भूमिका थी या नहीं।

    पश्चिम बंगाल से मुंबई कौन लेकर आया?

    मामले में पुलिस की जांच अब इस सवाल पर भी केंद्रित है कि पश्चिम बंगाल के अलग-अलग जिलों से ये बच्चे मुंबई के कांदिवली तक कैसे पहुंचे।

    पुलिस यह पता कर रही है कि क्या बच्चों को काम दिलाने के नाम पर मुंबई लाया गया था, क्या किसी बिचौलिए की भूमिका थी और उन्हें कारखाने तक पहुंचाने में किसकी मदद ली गई।

    जांच में यह भी देखा जा रहा है कि क्या इस मामले के पीछे बाल श्रम से जुड़ा कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है। फिलहाल इस संबंध में जांच जारी है और पुलिस की ओर से कोई अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

    13 नाबालिगों को संबंधित विभाग को सौंपा गया

    कार्रवाई के बाद सभी 13 नाबालिगों को आगे की देखभाल और जरूरी कार्रवाई के लिए संबंधित विभाग को सौंप दिया गया है।

    अब बच्चों की उम्र, पहचान और परिवार से जुड़ी जानकारी की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। उनके परिजनों से संपर्क और बच्चों को सुरक्षित तरीके से परिवार तक पहुंचाने को लेकर भी आगे की कार्रवाई की जाएगी।

    बच्चों की पढ़ाई और भविष्य को लेकर भी संबंधित विभाग की ओर से आगे की प्रक्रिया की जाएगी।

    बाल श्रम कानून में क्या प्रावधान है?

    बाल श्रम कानून के तहत 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को काम पर रखना प्रतिबंधित है। वहीं 14 से 18 वर्ष की उम्र के किशोरों को खतरनाक काम या प्रक्रिया में लगाने पर रोक है।

    इस मामले में बच्चों की उम्र 13 से 17 वर्ष के बीच बताई गई है। इसलिए उनकी सही उम्र और कारखाने में उनसे कराए जा रहे काम की प्रकृति भी जांच का हिस्सा है।

    9 से 10 घंटे काम कराने की जांच

    पुलिस के अनुसार, नाबालिगों से कथित तौर पर रोज 9 से 10 घंटे तक काम कराया जाता था। उन्हें उचित मजदूरी नहीं मिलने की बात भी सामने आई है।

    जांच में अब यह पता लगाया जा रहा है कि बच्चों से कितने समय तक काम कराया गया, मजदूरी कितनी तय थी और भुगतान किस तरीके से किया जाता था।

    चारकोप पुलिस बच्चों के पश्चिम बंगाल से मुंबई पहुंचने से लेकर कारखाने में काम करने तक की पूरी कड़ी की जांच कर रही है।

  • प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना पर बड़ा खुलासा: 41 FIR, 178 ट्रेनिंग सेंटर ब्लैकलिस्ट और 34 लाख भुगतान अटके, CAG रिपोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

    प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना पर बड़ा खुलासा: 41 FIR, 178 ट्रेनिंग सेंटर ब्लैकलिस्ट और 34 लाख भुगतान अटके, CAG रिपोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

    प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में 41 FIR, 178 ट्रेनिंग सेंटर ब्लैकलिस्ट और 34 लाख भुगतान अटके। CAG की रिपोर्ट में सामने आईं गंभीर अनियमितताएं।

    नई दिल्ली: प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना यानी युवाओं को skill training देकर job और self-employment के मौके देने वाली देश की बड़ी सरकारी schemes में से एक अब गंभीर सवालों के घेरे में है। CAG की audit findings से लेकर 2026 में दर्ज हुई 41 FIR, 178 Training Centres की blacklisting और NSDC के करीब 20 current और former employees को भेजे गए show-cause notices तक, इस पूरी scheme को लेकर लगातार कार्रवाई सामने आ रही है।

    सबसे बड़ा सवाल उन युवाओं का है जिन्होंने इस scheme के तहत training ली, certificate हासिल किया और payment या job का इंतजार किया। क्या training सही तरीके से हुई? क्या beneficiary का record सही था? Payment क्यों अटका? और certificate मिलने के बाद नौकरी कितनों को मिली?

    41 FIR और 178 Training Centres पर कार्रवाई

    2026 में सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना से जुड़े मामलों में 167 cases को FIR के लिए identify किया गया और 41 FIR दर्ज की गईं।

    वहीं प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना 4.0 के तहत 178 Training Centres को blacklist किया गया। इन centres के खिलाफ आगे की payments रोकने और नियमों के उल्लंघन से जुड़े payments की recovery शुरू करने के निर्देश दिए गए।

    हालांकि यहां यह समझना जरूरी है कि FIR दर्ज होना किसी मामले में आरोप या investigation की शुरुआत है, conviction नहीं। इसी तरह 178 blacklisted centres को सीधे 178 “fake centres” कहना भी सही नहीं होगा। Blacklisting scheme guidelines और inspection findings के आधार पर की गई कार्रवाई है।

    34 लाख से ज्यादा candidates का payment क्यों अटका?

    इस पूरी कहानी का सबसे सीधा असर उन candidates पर पड़ता है जिन्होंने training पूरी की लेकिन उनका payment नहीं पहुंचा।

    CAG के मुताबिक प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के दूसरे और तीसरे phase में 34 लाख candidates के DBT payments outstanding थे।

    पहले phase में भी करीब ₹40 करोड़ की DBT राशि incorrect या incomplete bank और Aadhaar details की वजह से beneficiaries तक नहीं पहुंच सकी थी।

    यानी अगर किसी candidate ने training और certification पूरा किया है, लेकिन उसके खाते में पैसा नहीं आया, तो सिर्फ “payment pending” देखकर मामला खत्म नहीं होता। Bank details, Aadhaar linking और beneficiary record में mismatch भी इसकी वजह हो सकता है।

    एक bank account से 2,106 candidates का record

    CAG audit में bank details की जांच के दौरान एक और बड़ी गड़बड़ी सामने आई।

    प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के दूसरे और तीसरे phase के data में 12,122 unique bank accounts ऐसे पाए गए जो एक से ज्यादा candidates के लिए इस्तेमाल हुए थे।

    इन accounts से कुल 52,381 candidates जुड़े हुए थे।

    सबसे चौंकाने वाला मामला एक ऐसे account का था जिसे 2,106 candidates के records में इस्तेमाल किया गया था।

    कुछ records में 11111111111, zeros, blank और दूसरे apparently invalid entries भी मिले।

    इसका मतलब यह नहीं कि इन सभी candidates को fake घोषित कर दिया गया। लेकिन beneficiary और payment data की verification system पर गंभीर सवाल जरूर खड़े हुए। CAG ने कहा कि उपलब्ध bank-account data से beneficiaries की identity को लेकर पर्याप्त assurance नहीं मिल रही थी।

    क्या training centre सच में चल रहा था?

    CAG की जांच में कुछ Training Centres physical inspection के दौरान बंद मिले।

    कुछ जगह training records और ground reality के बीच mismatch भी सामने आया। Candidate photographs के repeat होने और attendance तथा identity verification में gaps की findings भी सामने आईं।

    यानी सवाल यह भी है कि जिस candidate के नाम पर training और certification का record बना, क्या वह candidate वास्तव में उस training में मौजूद था?

    यहां भी हर irregular record को सीधे fake candidate मानना सही नहीं है। Audit findings मुख्य रूप से verification और monitoring system में मौजूद कमजोरियों की तरफ इशारा करती हैं।

    “Ghost Candidate” का मतलब क्या है?

    अगर किसी व्यक्ति का नाम scheme के record में मौजूद है, लेकिन उसकी identity, attendance, bank details या training participation properly verify नहीं हो पाती, तो मामला questionable या ghost beneficiary verification तक पहुंच सकता है।

    CAG ने candidate eligibility को लेकर भी सवाल उठाए।

    कुछ records में age, education और दूसरे eligibility criteria की proper checking नहीं होने की बात सामने आई।

    यानी scheme में सिर्फ यह देखना काफी नहीं था कि candidate का नाम system में दर्ज है। यह भी जरूरी था कि वह candidate scheme के लिए eligible था और उसकी identity सही तरीके से verify हुई थी।

    Certificate मिला, लेकिन नौकरी कितनों को मिली?

    प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का असली मकसद सिर्फ training और certificate देना नहीं था। इसका final outcome रोजगार और बेहतर income से जुड़ा था।

    लेकिन CAG की audit में पुराने phases के Short Term Training component में certified candidates की placement करीब 41 प्रतिशत के आसपास पाई गई।

    सरकार की बाद की reporting में PMKVY 3.0 तक reported placement करीब 43 प्रतिशत बताई गई।

    इसका सीधा मतलब है कि training या certificate और actual job एक ही चीज नहीं हैं।

    यही वजह है कि किसी भी candidate के लिए सबसे जरूरी सवाल यह होना चाहिए कि course पूरा करने के बाद उसे वास्तव में job या self-employment का फायदा मिला या नहीं।

    कुछ बड़े Training Providers में placement 10% से भी कम

    CAG की detailed जांच में training providers के performance में काफी बड़ा difference सामने आया।

    Top training providers में भी 114 providers ऐसे पाए गए जिनका placement rate 10 प्रतिशत से कम था।

    इन providers ने करीब 5.88 लाख candidates को certify किया, लेकिन लगभग 20,000 candidates ही placement तक पहुंच पाए।

    इससे साफ होता है कि सिर्फ overall placement percentage देखने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। अलग-अलग Training Providers का actual performance काफी अलग रहा।

    Training Providers को इतने बड़े targets कैसे मिले?

    CAG ने Training Providers को मिले targets और certifications को भी examine किया।

    PMKVY 2.0 में top 10 प्रतिशत Training Providers ने करीब 83 प्रतिशत batches और 85.61 प्रतिशत certifications संभालीं।

    PMKVY 3.0 में top 10 प्रतिशत providers ने करीब 82 प्रतिशत batches और 85.31 प्रतिशत certifications संभालीं।

    इसके मुकाबले bottom 50 प्रतिशत providers का share काफी कम था।

    इससे यह सवाल उठता है कि scheme के बड़े targets कुछ Training Providers के पास इतने concentrated क्यों हुए और उनके performance की monitoring कितनी प्रभावी थी।

    Certificate मिलने में सालों की देरी

    Training पूरी होने के बाद candidate के लिए अगला जरूरी step assessment और certification होता है।

    लेकिन CAG की जांच में selected states में कुछ cases में training पूरी होने के बाद assessment में 1,270 दिनों तक की देरी सामने आई।

    Assessment के बाद certification में भी 1,257 दिनों तक की delay दर्ज हुई।

    करीब 23.87 लाख candidates ऐसे थे जिनके certification में सात दिनों से ज्यादा की delay पाई गई।

    जिस युवा को certificate के आधार पर job या आगे की career opportunity तलाशनी हो, उसके लिए इतनी लंबी delay का सीधा असर पड़ सकता है।

    Inspection system पर भी सवाल

    CAG ने inspection records के timestamps को भी examine किया।

    295 cases में एक ही inspector द्वारा अलग-अलग locations पर inspection शुरू करने के बीच पांच मिनट से भी कम का gap पाया गया।

    Ministry ने इन discrepancies को technical issues से जोड़ते हुए बाद में photo-upload और monitoring controls मजबूत करने की जानकारी दी।

    इसलिए इसे सीधे fake inspection कहना सही नहीं होगा, लेकिन audit ने ऐसी discrepancy जरूर दर्ज की जिसे system level पर explain और correct करना जरूरी था।

    RPL में भी सामने आईं गड़बड़ियां

    प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का Recognition of Prior Learning यानी RPL component उन लोगों की existing skills को certify करने के लिए है जो पहले से किसी trade या काम में skilled हैं।

    CAG ने RPL-BICE component में भी कई irregularities दर्ज कीं।

    एक मामले में Radiate Designs ने करीब 15,218 candidates को certify किया था। CAG के मुताबिक company 2014-15 के बाद ROC returns file नहीं कर रही थी और ROC records में struck off थी। Audit team को दिए गए address पर एक shop मिली, जहां company का visible signboard नहीं था।

    CAG ने इस तरह के records के आधार पर certification process की verification पर सवाल उठाए।

    एक दूसरे fitness trainer से जुड़े case में 10,000 candidates की placement और 30,000 employees की capacity का दावा किया गया था, जबकि संबंधित gyms में Ministry के records के अनुसार employees की संख्या काफी कम थी।

    Jharkhand में 8,922 certifications में से 7,145 East Singhbhum में और Rajasthan में सभी 5,444 certifications Churu district में concentrated थीं।

    Audit ने employee-employer relationship की proper verification के बिना certifications किए जाने पर सवाल उठाए।

    PMKVY 4.0 में भी data से जुड़े सवाल

    यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा।

    CAG की मुख्य audit findings प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के पहले तीन phases से जुड़ी हैं। PMKVY 4.0 बाद में शुरू हुई और इसमें technology-based verification को मजबूत किया गया है।

    लेकिन CAG ने PMKVY 4.0 के उपलब्ध data की भी कुछ जांच की।

    इसमें:

    • 175 invalid mobile numbers
    • 2,263 repeated mobile numbers
    • करीब 2.72 लाख null email addresses
    • करीब 3.08 लाख repeated email addresses

    मिले।

    इन आंकड़ों का मतलब यह नहीं कि इतने candidates fake थे। लेकिन इससे यह जरूर पता चलता है कि digital system में भी data validation को लगातार मजबूत रखने की जरूरत है।

    अब सरकार ने क्या बदला?

    PMKVY 4.0 में beneficiary verification और monitoring के लिए कई technology-based controls बढ़ाए गए हैं।

    इनमें:

    • Aadhaar-based verification
    • Face Authentication
    • AEBAS attendance
    • e-KYC
    • duplicate candidate checks
    • digital monitoring
    • physical inspections
    • geo-tagged evidence
    • candidate feedback
    • third-party assessment

    जैसे measures शामिल हैं।

    PMKVY 4.0 में AI, drones, robotics, green energy, semiconductor manufacturing और दूसरे new-age sectors से जुड़े courses पर भी ज्यादा focus किया जा रहा है।

    जून 2026 तक सरकार के मुताबिक PMKVY 4.0 के तहत 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 738 जिलों में 28.17 लाख candidates train किए जा चुके थे। इसके implementation ecosystem में 16,900 से ज्यादा institutions और 6,800 से ज्यादा Skill Hubs शामिल थे।

    PMKVY 4.0 को लेकर सरकार के आंकड़े क्या कहते हैं?

    पुरानी phases की CAG findings के बावजूद PMKVY 4.0 के impact को लेकर सरकार ने positive results भी जारी किए हैं।

    29 जुलाई 2026 को सरकार ने independent impact evaluation का हवाला देते हुए बताया कि Short Term Training candidates में employed और self-employed लोगों का combined share training से पहले 26.6 प्रतिशत था, जो training के बाद 45.4 प्रतिशत हो गया।

    यानी 18.8 percentage points का increase दर्ज किया गया।

    सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 41.4 प्रतिशत STT candidates और 48.9 प्रतिशत RPL candidates ने training और certification के बाद income बढ़ने की बात भी बताई।

    इसलिए आज की स्थिति को सिर्फ पुरानी CAG findings से देखना पूरी तस्वीर नहीं देगा। पुराने phases में गंभीर implementation problems सामने आईं, जबकि PMKVY 4.0 को लेकर सरकार के पास employment और income outcomes में improvement का evaluation data भी है।

    Maharashtra और Mumbai के युवाओं के लिए क्या जरूरी है?

    महाराष्ट्र भी PMKVY की implementation और audit scrutiny में शामिल रहा है।

    अगर आपने Mumbai या Maharashtra में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत training ली है, तो अपने record को जरूर verify करें।

    क्या आपका Training Centre अभी भी active है?

    क्या आपकी attendance सही दर्ज है?

    क्या Aadhaar और bank details सही हैं?

    क्या DBT payment मिला है?

    क्या certificate में आपका सही job role है?

    क्या Training Centre ने placement का दावा किया था?

    और सबसे जरूरी—

    क्या आपको वास्तव में job या income का फायदा मिला?

    क्योंकि scheme की सफलता सिर्फ certificate से तय नहीं होती।

    अगर आपने PMKVY की training ली है तो ये 8 चीजें check करें

    1. Certificate: आपका certificate official record में मौजूद है या नहीं।

    2. Training Centre: जिस centre से आपने course किया, उसकी status क्या है।

    3. Attendance: आपकी training attendance सही दर्ज है या नहीं।

    4. Aadhaar/e-KYC: आपकी identity details सही हैं या नहीं।

    5. Bank Account: आपके नाम से सही bank details linked हैं या नहीं।

    6. DBT Payment: payment मिला, pending है या transaction fail हुआ।

    7. Placement: अगर placement का दावा किया गया था तो employer और job details verify करें।

    8. Complaint: अगर आपके नाम पर ऐसी training या certification दिखाई दे रही है जो आपने की ही नहीं, या payment/identity में गलती है, तो official grievance mechanism पर complaint करें।

    इस पूरे मामले में अब आगे क्या देखना होगा?

    अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने Training Centres blacklist हुए या कितनी FIR दर्ज हुईं।

    आगे यह देखना ज्यादा जरूरी होगा कि:

    41 FIR की investigation कहां तक पहुंचती है?

    178 blacklisted centres में recovery कितनी होती है?

    34 लाख pending payments में कितने candidates को पैसा मिलता है?

    NSDC के जिन करीब 20 current और former employees को notices दिए गए हैं, उनके खिलाफ आगे क्या action होता है?

    और सबसे बड़ा सवाल—

    क्या PMKVY 4.0 में technology-based safeguards पुराने loopholes को वास्तव में बंद कर पाते हैं?

    प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का असली test यही है कि government records में कितने candidates trained और certified दिखते हैं, इससे आगे जाकर कितने युवाओं को वास्तव में skill, payment, job और बेहतर income मिलती है।

    CAG की findings ने पुराने system की कई कमजोरियां सामने रख दी हैं। 2026 की FIR और blacklisting के जरिए कार्रवाई भी चल रही है। वहीं PMKVY 4.0 के नए evaluation में employment और income outcomes में improvement का दावा किया गया है।

    अब नजर इस बात पर है कि पुरानी गलतियों से सीखकर मौजूदा system कितना मजबूत हुआ है और scheme से जुड़े युवाओं को उसका वास्तविक फायदा कितना मिल रहा है।

  • मुंबई में 210 ‘भूतिया कर्मचारियों’ के नाम पर ₹4.15 करोड़ का लोन घोटाला, पूर्व CEO समेत 4 पर FIR

    मुंबई में 210 ‘भूतिया कर्मचारियों’ के नाम पर ₹4.15 करोड़ का लोन घोटाला, पूर्व CEO समेत 4 पर FIR

    मुंबई के विले पार्ले में 210 कथित फर्जी कर्मचारियों के नाम पर ₹4.15 करोड़ का लोन घोटाला सामने आया है। पूर्व CEO समेत 4 पर FIR दर्ज हुई।

    मुंबई: विले पार्ले में बैंक से जुड़े एक बड़े लोन घोटाले का मामला सामने आया है। पुलिस ने मराठा बैंक के पूर्व CEO समेत चार लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है। आरोप है कि 210 कथित ‘भूतिया कर्मचारियों’ के नाम पर कुल ₹4.15 करोड़ से ज्यादा का लोन जारी कराया गया।

    पुलिस के मुताबिक, लोन लेने के लिए जिन लोगों के नाम और दस्तावेज इस्तेमाल किए गए, उन्होंने बाद में इन कंपनियों में काम करने से इनकार किया। मामले में बैंक के तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में है।

    210 लोगों के नाम पर ऐसे निकाली गई रकम

    एफआईआर के मुताबिक, मुंबई पैरामेडिकल कंपनी के 126 कथित कर्मचारियों के नाम पर करीब ₹2.47 करोड़ के लोन जारी किए गए। वहीं पीपल पैरामेडिकल कंपनी के 84 कथित कर्मचारियों के नाम पर करीब ₹1.68 करोड़ का लोन दिया गया।

    इस तरह कुल 210 लोगों के नाम पर 210 लोन खातों से ₹4,15,05,000 की रकम निकाले जाने का आरोप है।

    लोन के लिए लगाए गए दस्तावेज भी कथित तौर पर फर्जी

    पुलिस की जांच में सामने आया कि लोन के लिए इस्तेमाल किए गए कई दस्तावेज कथित तौर पर फर्जी थे।

    इनमें:

    • आईडी कार्ड
    • Salary Slips
    • Salary Certificates
    • Rubber Stamps

    शामिल हैं।

    जिन लोगों के नाम पर लोन लिया गया, उन्होंने कथित तौर पर कंपनियों में काम करने से ही इनकार कर दिया।

    सभी लोन में बताया गया था एक ही कारण

    मामले में खास बात यह सामने आई है कि सभी 210 लोन घर की मरम्मत के नाम पर लिए गए थे।

    इसके लिए Western Construction Engineer और Laxmi Interior के नाम से कथित फर्जी quotations लगाए गए थे।

    एफआईआर के मुताबिक, लोन approve होने वाले दिन ही संबंधित लोगों के savings accounts खोले गए थे।

    बैंक खाते में पैसे आते ही शुरू हुआ cash withdrawal

    लोन की रकम संबंधित खातों में जमा होने के बाद करीब ₹15 हजार से ₹20 हजार तक cash withdrawal किए जाने का आरोप है।

    इसके अलावा कुछ रकम FD में भेजी गई। बची हुई रकम को Pay Order के जरिए एजेंट तक पहुंचाने का आरोप है।

    एफआईआर में कहा गया है कि इन Pay Order पर शाखा प्रमुख गोपाल मुकुंद परब के signatures थे।

    पूर्व CEO समेत 4 लोगों पर FIR

    विले पार्ले पुलिस ने इस मामले में बैंक के चार तत्कालीन अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है।

    FIR में जिन लोगों के नाम हैं:

    1. रमेश विठ्ठल शिरगांवकर — तत्कालीन CEO
    2. दशरथ पुंडलिक नाइक — महाप्रबंधक
    3. वैशाली कृष्णा मायेकर — लोन मैनेजर
    4. गोपाल मुकुंद परब — शाखा प्रमुख

    पुलिस अब यह जांच कर रही है कि कथित लोन फर्जीवाड़े में इन लोगों की क्या भूमिका थी और इसके पीछे और कौन-कौन लोग शामिल हो सकते हैं।

    9 से 10 साल तक बकाया रहे कई लोन

    बैंक के मुताबिक, इस मामले से जुड़े कई लोन 9 से 10 साल तक बकाया रहे। आरोप है कि इस दौरान प्रभावी recovery action नहीं लिया गया।

    बाद में लोन की recovery नहीं होने के बाद RBI ने 29 मई 2023 को मराठा बैंक का Cosmos Bank में merger कर दिया।

    Merger के बाद Cosmos Bank की शिकायत पर विले पार्ले पुलिस ने FIR दर्ज की।

    अब पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है। जांच में कथित फर्जी documents, 210 loan accounts, पैसों के transactions और इस पूरे मामले में शामिल अन्य लोगों की भूमिका को भी देखा जा रहा है।

  • FDA का ताबड़तोड़ एक्शन: Zepto समेत 5 फूड आउटलेट्स पर शिकंजा, लाइसेंस सस्पेंड

    FDA का ताबड़तोड़ एक्शन: Zepto समेत 5 फूड आउटलेट्स पर शिकंजा, लाइसेंस सस्पेंड

    मुंबई में FDA का बड़ा एक्शन, Zepto समेत 5 फूड आउटलेट्स के लाइसेंस सस्पेंड। Prince of Wales, Cafe Sifarish और Otters Club में मिलीं खामियां।

    मुंबई: मुंबई में Food and Drug Administration (FDA) ने फूड सेफ्टी और हाइजीन नियमों को लेकर बड़ा एक्शन लिया है। जांच के दौरान साफ-सफाई, फूड स्टोरेज, तापमान कंट्रोल, कीट नियंत्रण और फूड हैंडलिंग से जुड़ी गंभीर कमियां मिलने के बाद मुंबई के कई फूड एस्टेब्लिशमेंट के लाइसेंस या रजिस्ट्रेशन सस्पेंड कर दिए गए हैं।

    FDA की कार्रवाई की लिस्ट में Otters Club, Daily Fresh Bakers, Prince of Wales Restaurant, Cafe Sifarish और Zepto Limited के चेंबूर आउटलेट शामिल हैं। FDA के मुताबिक, इस कार्रवाई में किसी भी प्रतिष्ठान का लाइसेंस रद्द नहीं किया गया है। वहीं, अभियान के दौरान छह अन्य प्रतिष्ठानों को सुधार नोटिस भी जारी किए गए हैं।

    कहां-कहां मिली गड़बड़ी?

    बांद्रा के Otters Club में फूड आइटम्स के गलत तरीके से स्टोरेज और रखरखाव से जुड़ी कमियां सामने आईं। जांच के दौरान FDA ने यह भी पाया कि Punjab Sind Dairy से सप्लाई किया गया analogue paneer ‘regular paneer’ के तौर पर serve किया जा रहा था।

    खार वेस्ट के Prince of Wales Restaurant में खाने के तापमान को सही तरीके से maintain करने, स्टोरेज, equipment cleaning और pest control से जुड़ी कमियां मिलीं।

    वहीं, Andheri West के Cafe Sifarish में food storage और temperature control की पर्याप्त व्यवस्था नहीं मिली। कर्मचारियों की personal hygiene से जुड़ी सुविधाओं में भी कमी पाई गई। FDA की तरफ से सुधार नोटिस दिए जाने के बावजूद कैफे ने तय समय के अंदर compliance report जमा नहीं की।

    Zepto के चेंबूर आउटलेट में भी तापमान का मामला

    चेंबूर के Zepto Limited outlet में जांच के दौरान chilled और frozen food के temperature को लेकर भी सवाल उठे।

    FDA के मुताबिक, जांच के समय non-veg chilled food का temperature 9°C, जबकि frozen food का temperature -11°C पाया गया। FDA ने कहा कि दोनों food categories निर्धारित temperature से ज्यादा temperature पर रखी गई थीं।

    दहिसर के Daily Fresh Bakers पर भी FDA की कार्रवाई हुई है।

    ‘Safe Food, Safe Maharashtra’ अभियान के तहत एक्शन

    यह कार्रवाई महाराष्ट्र FDA आयुक्त तुकाराम मुंढे के ‘Safe Food, Safe Maharashtra’ अभियान के तहत की गई है। इस अभियान में restaurants, food establishments और दूसरे food businesses की जांच की जा रही है।

    मुंबई में कार्रवाई के साथ-साथ पुणे में भी FDA ने इसी अभियान के तहत बड़ा एक्शन लिया है।

    Burger King पर भी FDA की कार्रवाई

    11 अगस्त से 14 अगस्त 2026 के बीच ‘Safe Food, Safe Drug, Safe Maharashtra’ अभियान के तहत पुणे FDA डिवीजन ने hotels, restaurants, e-commerce establishments और dairies का special inspection किया।

    इस दौरान गंभीर अस्वच्छ परिस्थितियां और food safety standards से जुड़े उल्लंघन मिलने के बाद 16 establishments के licence या registration तत्काल प्रभाव से suspend किए गए।

    इसी कार्रवाई के दौरान पुणे के Camp इलाके में 1992 से चल रहे पुराने Burger King outlet पर भी FDA ने कार्रवाई की।

    FDA की कार्रवाई पर उठ रहे सवाल

    मुंबई और पुणे में लगातार हो रही कार्रवाई के बीच कुछ लोगों ने FDA के तरीके को लेकर ‘पहले कार्रवाई, बाद में बात’ वाले रवैये पर सवाल भी उठाए हैं। हालांकि FDA का कहना है कि कार्रवाई food safety और hygiene standards में मिली कमियों के आधार पर की जा रही है।

    फिलहाल मुंबई में Zepto समेत इन food establishments पर FDA की कार्रवाई के बाद food storage, temperature control और hygiene standards को लेकर फिर चर्चा तेज हो गई है।

  • ब्रेकिंग: कांदिवली में ₹62 करोड़ का जमीन विवाद, Rock Highland के 39-मंजिला टावर पर निर्माण रोक; 105 खरीदारों और 500+ residents की बढ़ी चिंता

    ब्रेकिंग: कांदिवली में ₹62 करोड़ का जमीन विवाद, Rock Highland के 39-मंजिला टावर पर निर्माण रोक; 105 खरीदारों और 500+ residents की बढ़ी चिंता

    कांदिवली के Rock Highland टावर पर ₹62 करोड़ के सरकारी बकाये से रोक लगी। 105 खरीदारों और 500+ residents पर क्या असर होगा, जानिए पूरा मामला।

    मुंबई: कांदिवली वेस्ट के चारकोप से इस वक्त रियल एस्टेट से जुड़ी बड़ी खबर सामने आई है। यहां Rock Highland के 39-मंजिला के तौर पर marketed किए जा रहे under-construction residential tower का काम सरकारी जमीन से जुड़े करीब ₹62 करोड़ के revenue dues के विवाद में रोक दिया गया है।

    इस फैसले का असर सिर्फ construction site तक सीमित नहीं है। करीब 105 prospective homebuyers के लिए अब possession, construction और उनके लगाए पैसे को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। वहीं, उसी बड़े land parcel पर बनी 11 existing buildings में रहने वाले 500 से ज्यादा residents भी जमीन के lease और ownership status को लेकर चिंता में आ गए हैं।

    आखिर ₹62 करोड़ का विवाद क्या है?

    मामला उस जमीन की lease और उसके बाद हुए development से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, करीब 5 एकड़ जमीन 1957 में अखंड शिवर पाटिल को खेती के इस्तेमाल के लिए 999 साल की lease पर दी गई थी। बाद में खेती के अलावा दूसरे इस्तेमाल की अनुमति से जुड़े payments किए गए।

    विवाद तब सामने आया जब revenue authorities ने जमीन के actual development और government-owned parcel के area को लेकर सवाल उठाए। आरोप है कि development करीब 7.4 एकड़ के बड़े parcel पर हुआ, जबकि original lease करीब 5 एकड़ की थी।

    यानी विवाद का एक बड़ा हिस्सा करीब 2.4 एकड़ अतिरिक्त जमीन के इस्तेमाल से जुड़ता है।

    इसी जमीन पर Power of Attorney holder के तौर पर काम कर रहे Ravi Group से जुड़ी development activities के तहत पहले Rock Enclave की 11 buildings बनीं और बाद में Rock Highland tower का construction शुरू हुआ।

    Collector की तरफ से developer पर करीब ₹62 करोड़ की demand रखी गई है। इसमें lease से जुड़े पुराने dues, interest और करीब 2.4 एकड़ जमीन के occupation/regularisation से जुड़े charges शामिल बताए जा रहे हैं।

    ₹62 करोड़ में क्या-क्या शामिल है?

    • Lease से जुड़े पुराने dues
    • Interest
    • करीब 2.4 एकड़ जमीन के occupation/regularisation से जुड़े charges
    • अन्य संबंधित revenue charges

    इस रकम का exact head-wise breakup सामने आने पर यह साफ होगा कि principal dues और interest में कितना-कितना पैसा शामिल है।

    Collector ने क्या आदेश दिया?

    Mumbai Suburban Collector Saurabh Katiyar ने निर्देश दिया है कि संबंधित dues clear होने तक नए tower का construction आगे नहीं बढ़ाया जाए।

    यानी फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि developer और government के बीच ₹62 करोड़ की demand का dispute कब और कैसे resolve होता है।

    यह मामला शिकायतकर्ता Reji Abraham की ओर से government revenue के कथित नुकसान की शिकायत के बाद सामने आया था। मामला कई साल तक government level पर pending रहने के बाद Collector की कार्रवाई तक पहुंचा।

    Developer का क्या कहना है?

    Developer ने Collector की demand और construction रोकने के फैसले को challenge किया है।

    Ravi Group से जुड़े Jayesh Shah का कहना है कि करीब ₹62 करोड़ की demand लागू नहीं होती, क्योंकि जमीन के non-agricultural use से जुड़े जरूरी payments पहले ही किए जा चुके हैं।

    Developer ने यह भी दावा किया है कि action एक RTI activist की शिकायत और दबाव के बाद लिया गया।

    यानी फिलहाल government और developer की तरफ से जमीन के dues को लेकर दो अलग-अलग positions सामने हैं।

    Developer ने Collector के action को court में challenge किया है। हालांकि, सिर्फ court में challenge किए जाने का मतलब यह नहीं है कि construction पर लगी रोक अपने आप हट गई है। इस मामले में court का current interim order और आगे की hearing स्थिति सबसे अहम होगी।

    Rock Highland का MahaRERA status क्या है?

    Rock Highland का MahaRERA registration number P51800049632 है। RERA record में project का promoter Rock Estates दर्ज है।

    RERA-linked project details के मुताबिक project:

    • Kandivali West के CTS No. 1A/1, Village Kandivali में है
    • February 2023 में registered हुआ
    • RERA completion date 30 December 2026 दर्ज है
    • Project में करीब 199 residential units का record सामने आता है

    यहीं एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है।

    मीडिया reports में करीब 105 prospective buyers के प्रभावित होने की बात कही जा रही है, जबकि RERA-linked data में project की total inventory इससे काफी ज्यादा है। इसलिए 105 का आंकड़ा किस category के buyers को दर्शाता है—booked flats, affected allottees या prospective purchasers—इसे current RERA records से साफ करना जरूरी है।

    39 मंजिल या 38 मंजिल?

    Project की अलग-अलग marketing और property listings में floor configuration को लेकर भी फर्क दिखाई देता है।

    कुछ marketing material इसे 39-storey project बताता है, जबकि कुछ records और property listings में 38 floors या अलग configuration दिखाई देता है।

    इसलिए फिलहाल इसे 39-मंजिला के तौर पर marketed Rock Highland tower के रूप में समझना ज्यादा सुरक्षित है। Final sanctioned configuration संबंधित approved plan और Collector record से स्पष्ट होगी।

    सबसे बड़ा सवाल: क्या buyers का पैसा फंस सकता है?

    जिन लोगों ने Rock Highland में flat book किया है, उनके लिए सबसे बड़ा सवाल construction से ज्यादा money, possession और legal status का है।

    अगर construction लंबे समय तक बंद रहता है तो buyer के सामने एक साथ कई financial pressures आ सकते हैं:

    Home loan EMI + rent + delayed possession

    मुंबई जैसे महंगे property market में यह स्थिति buyer के लिए काफी मुश्किल हो सकती है।

    लेकिन सिर्फ construction रोक दिए जाने से यह नहीं कहा जा सकता कि buyers का पैसा डूब गया है।

    Buyer की actual legal position उसके:

    • Agreement for Sale
    • payment history
    • RERA records
    • project approvals
    • lease documents
    • title report
    • court proceedings

    पर depend करेगी।

    क्या buyer refund मांग सकता है?

    यह सवाल हर existing buyer के लिए सबसे important है।

    अगर project में लंबे समय तक delay होता है या promoter की contractual/RERA obligations प्रभावित होती हैं, तो buyer के पास applicable RERA provisions के तहत remedies का सवाल उठ सकता है।

    लेकिन “हर buyer को तुरंत पूरा पैसा वापस मिलेगा” ऐसा कहना सही नहीं होगा।

    Refund, interest या compensation का अधिकार circumstances, agreement और competent authority/court के order पर depend करेगा।

    इसलिए buyer को सबसे पहले अपने Agreement for Sale और current MahaRERA project status की जांच करनी चाहिए।

    Leasehold जमीन पर flat खरीदने वालों के लिए क्या जरूरी है?

    Rock Highland का विवाद सिर्फ construction का नहीं है। इसकी जड़ leasehold land से जुड़ी है।

    RERA के तहत leasehold land पर project होने की स्थिति में promoter को lease से जुड़ी जानकारी और compliance maintain करनी होती है। RERA Section 11(4)(c) में lease certificate, lease period और leasehold land से जुड़े dues/charges की स्थिति से संबंधित requirements दी गई हैं।

    इसका मतलब buyer के लिए एक बेहद जरूरी सवाल है:

    क्या project की lease से जुड़े government dues और required certificates अभी पूरी तरह clear और valid हैं?

    यही वह document है जिसे buyer को developer से मांगकर देखना चाहिए।

    999 साल की lease का मतलब क्या flat की जमीन आपकी नहीं है?

    999-year lease सुनने में ownership जैसा लग सकता है, लेकिन leasehold और freehold एक चीज नहीं हैं।

    Leasehold arrangement में जमीन के underlying rights और leaseholder के rights अलग हो सकते हैं।

    इसीलिए 1957 की original lease deed, बाद के assignments, development rights और government revenue records इस मामले में बहुत महत्वपूर्ण हैं।

    Buyer के लिए सिर्फ builder का brochure देखना पर्याप्त नहीं है।

    उसे यह भी देखना चाहिए कि:

    • जमीन किसके नाम है?
    • lease किसके नाम है?
    • lease कितने साल की है?
    • development rights किस document से मिले?
    • government dues की स्थिति क्या है?
    • title report में कोई pending dispute है या नहीं?

    5 एकड़ से 7.4 एकड़ तक जमीन का सवाल क्यों अहम है?

    पूरे विवाद की सबसे बड़ी कड़ी यही हो सकती है।

    अगर original lease करीब 5 acres की थी और development करीब 7.4 acres के government-owned parcel से जुड़ा है, तो अतिरिक्त 2.4 acres का legal status समझना जरूरी है।

    यही वजह है कि revenue authorities की करीब ₹62 करोड़ की demand में land occupation/regularisation से जुड़े charges का भी उल्लेख सामने आया है।

    इसलिए मामला सिर्फ यह नहीं है कि:

    “बिल्डर पर ₹62 करोड़ बकाया है।”

    असली सवाल है:

    “जिस जमीन पर development हुआ, उसका पूरा legal और revenue trail क्या है?”

    इसके लिए CTS records, Property Card, original lease deed, mutation entries और development documents महत्वपूर्ण होंगे।

    उसी जमीन पर रहने वाले 500+ लोगों का क्या?

    यह विवाद का दूसरा बड़ा हिस्सा है।

    बताया जा रहा है कि उसी बड़े parcel पर 11 existing buildings हैं, जिनमें 500 से ज्यादा residents रहते हैं।

    इन लोगों के लिए सवाल नया tower नहीं, बल्कि अपनी जमीन का legal status है।

    वे जानना चाहेंगे:

    • उनकी building किस land parcel पर है?
    • society के पास कौन-से land documents हैं?
    • lease deed किसके नाम है?
    • conveyance हुआ है या नहीं?
    • Property Card में क्या entry है?
    • क्या disputed 2.4 acres में existing buildings का कोई हिस्सा आता है?
    • future redevelopment पर इसका कोई असर पड़ेगा?

    जब तक land parcel की exact mapping सामने नहीं आती, existing residents के बारे में कोई final conclusion निकालना जल्दबाजी होगी।

    क्या existing residents के flats भी खतरे में हैं?

    फिलहाल ऐसा कहना सही नहीं होगा कि 500+ residents के flats पर कोई सीधा खतरा पैदा हो गया है।

    लेकिन अगर government dispute उसी land parcel के underlying lease/title से जुड़ा है, तो residents के लिए अपने documents की स्थिति समझना जरूरी हो जाता है।

    खासकर:

    Property Card + Lease Deed + Conveyance/Deemed Conveyance + Society records

    की जांच महत्वपूर्ण होगी।

    क्या resale या redevelopment पर असर पड़ सकता है?

    अगर land/lease dispute लंबे समय तक unresolved रहता है तो future property transactions में buyers, banks और legal teams ज्यादा documents मांग सकते हैं।

    इससे resale, mortgage या redevelopment जैसे मामलों में additional legal scrutiny की संभावना हो सकती है।

    लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर existing flat की resale automatically बंद हो जाएगी।

    असल असर इस बात पर depend करेगा कि dispute का exact land area और existing societies के legal documents से क्या संबंध निकलता है।

    Buyer अभी क्या करे?

    अगर आपने Rock Highland में flat book किया है तो घबराने के बजाय ये documents तुरंत check करें:

    Buyer Document Checklist

    1. MahaRERA registration: P51800049632

    2. Agreement for Sale:
    Land title, lease और encumbrance clauses ध्यान से देखें।

    3. Title Report:
    Developer ने जमीन के ownership/lease rights के बारे में क्या बताया है?

    4. Lease Certificate:
    Lease period और government dues की स्थिति देखें।

    5. Encumbrance Certificate:
    कोई charge/dispute दर्ज है या नहीं।

    6. Commencement Certificate और sanctioned plan:
    जिस tower की booking की है, उसका approved configuration check करें।

    7. MahaRERA quarterly updates:
    Construction और bookings की latest स्थिति देखें।

    8. Payment records:
    अब तक developer को कितना पैसा दिया है, उसका पूरा record रखें।

    9. Collector order:
    ₹62 करोड़ की demand किस आधार पर लगाई गई है, देखें।

    10. Court proceedings:
    Developer की petition और court का latest interim/final order check करें।

    क्या project फिर से शुरू हो सकता है?

    हां, construction permanently खत्म हो गया है ऐसा अभी कहना जल्दबाजी होगी।

    इस तरह के विवाद में आगे कई possibilities हो सकती हैं:

    पहला रास्ता

    Developer government की demand clear करे या legally acceptable settlement/regularisation करे और construction फिर शुरू हो।

    दूसरा रास्ता

    Developer court में demand challenge करे और court dispute पर फैसला दे।

    तीसरा रास्ता

    अगर dues, land status और legal permissions लंबे समय तक unresolved रहते हैं तो project में delay बढ़ सकता है।

    इसलिए buyers के लिए अभी सबसे जरूरी चीज court और Collector proceedings की latest स्थिति है।

    देश के दूसरे शहरों में ऐसे मामले पहले भी buyers को प्रभावित कर चुके हैं

    यह सिर्फ मुंबई की समस्या नहीं है।

    Greater Noida में जून 2026 में 14 developers के खिलाफ करीब ₹315.5 करोड़ के land dues की recovery के लिए कार्रवाई की गई। इससे करीब 8,856 homebuyers से जुड़े registration और possession issues सामने आए।

    यानी एक बात साफ है:

    Developer और government authority के बीच land dues का dispute आखिरकार homebuyer तक पहुंच सकता है।

    Greater Noida में stalled projects को revive करने के लिए dues restructuring और relief mechanisms भी इस्तेमाल किए गए हैं।

    एक अन्य stalled project, Antriksh Valley, में करीब ₹45 करोड़ के land dues और दूसरे liabilities resolve होने के बाद project revival के लिए करीब ₹115 करोड़ तक SWAMIH funding sanction हुई।

    मुंबई में भी Nirmal Lifestyle, Mulund जैसे मामले में government premium dues और stalled construction के कारण homebuyers की परेशानी सामने आ चुकी है।

    इससे यह भी साफ होता है कि government dues वाला project हमेशा permanently बंद हो जाए, ऐसा जरूरी नहीं है। कई मामलों में dues resolution और financing के बाद construction दोबारा शुरू हुआ है।

    Maharashtra में leasehold land पर अभी इतनी चर्चा क्यों?

    इस पूरे मामले का एक broader Maharashtra context भी है।

    2026 में Maharashtra government ने government leasehold land records को लेकर statewide overhaul शुरू किया है। नई व्यवस्था में government को land record में “Occupant” और leaseholder को “Other Rights” category में दर्ज करने की दिशा में बदलाव किया गया है।

    इसका मकसद government-owned leasehold land पर ownership को लेकर confusion और गलत claims को कम करना है।

    मुंबई में हजारों cooperative housing societies leasehold/collector land पर बनी हैं। इसलिए lease status, property records और redevelopment rights का सवाल सिर्फ Kandivali तक सीमित नहीं है।

    अब आगे क्या होगा?

    Rock Highland मामले में अब तीन चीजें सबसे ज्यादा important हैं:

    ₹62 करोड़ की demand

    क्या developer इसे pay करेगा, challenge करेगा या government के साथ कोई legal resolution निकलेगा?

    Court का फैसला

    Developer की challenge petition में court क्या interim या final order देता है?

    Land records

    5-acre original lease, disputed 2.4-acre portion और 7.4-acre development parcel का exact legal connection क्या है?

    इन तीनों का जवाब मिलने के बाद ही यह साफ होगा कि 105 reported buyers और 500+ existing residents के लिए यह dispute कितना बड़ा बन सकता है।

    फिलहाल इतना जरूर है कि कांदिवली का यह मामला सिर्फ एक under-construction tower रुकने की खबर नहीं है। यह सवाल सीधे उस जमीन के lease rights, government revenue, developer approvals और homebuyers के future से जुड़ गया है।

    और जब तक ₹62 करोड़ के dispute और जमीन के legal status पर पूरी clarity नहीं आती, Rock Highland के buyers के लिए सबसे जरूरी बात यही है—अपने documents check करें, MahaRERA status देखें और Collector तथा court proceedings की latest update पर नजर रखें।

  • 93% मुआवजा फिर भी सत्याग्रह क्यों? केन-बेतवा पर आदिवासियों की लड़ाई में राहुल गांधी की एंट्री, 14 गांवों में फिर होगा सर्वे

    93% मुआवजा फिर भी सत्याग्रह क्यों? केन-बेतवा पर आदिवासियों की लड़ाई में राहुल गांधी की एंट्री, 14 गांवों में फिर होगा सर्वे

    केन-बेतवा परियोजना पर आदिवासी सत्याग्रह के बीच राहुल गांधी का समर्थन, 93% मुआवजे के सरकारी दावे और 14 गांवों के नए सर्वे से जुड़े सवाल जानिए।

    भोपाल/छतरपुर: केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर बुंदेलखंड में आदिवासी परिवारों का संघर्ष एक बार फिर तेज हो गया है। 19 अगस्त 2026 को राहुल गांधी ने आंदोलन कर रहे आदिवासी भाई-बहनों से मुलाकात कर उनकी समस्याएं, मांगें और आपबीती सुनी और इस लड़ाई में उनके साथ खड़े रहने का भरोसा दिया।

    राहुल गांधी ने कहा कि सालों से अपने अधिकारों के लिए अन्याय और अत्याचार सह रहे बुंदेलखंड के निवासी सम्मान और समर्थन के हकदार हैं। उन्होंने साफ कहा कि आदिवासी भाई-बहनों की इस लड़ाई में वह और कांग्रेस उनके साथ हैं।

    लेकिन इस पूरी खबर में सबसे बड़ा सवाल राहुल गांधी का समर्थन नहीं, बल्कि यह है—

    जब सरकार खुद दावा कर रही है कि प्रभावित परिवारों को 93.78% rehabilitation compensation दिया जा चुका है, तो फिर आदिवासी परिवार अभी भी सत्याग्रह क्यों कर रहे हैं?

    यही सवाल अब केन-बेतवा परियोजना के पूरे विवाद के केंद्र में आ गया है।

    केन-बेतवा परियोजना आखिर क्यों इतनी बड़ी है?

    केन-बेतवा लिंक परियोजना का मकसद केन नदी के पानी को बेतवा नदी बेसिन तक पहुंचाना है। इसमें दाउधन बांध और करीब 221 किलोमीटर की link canal सहित कई बड़े infrastructure works शामिल हैं।

    सरकार का कहना है कि यह project बुंदेलखंड के लंबे समय से चले आ रहे water crisis को कम करने में मदद करेगा। सिंचाई का विस्तार होगा, किसानों को पानी मिलेगा और मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में drinking water supply बेहतर होगी।

    Protest-against-Ken-Betwa-MP-Chhatarpur

    सरकारी project details के मुताबिक लाखों हेक्टेयर जमीन को irrigation coverage देने और लाखों लोगों तक drinking water पहुंचाने का target है।

    यानी एक तरफ सरकार इसे बुंदेलखंड के लिए पानी और विकास की बड़ी योजना बता रही है, वहीं दूसरी तरफ project area में रहने वाले परिवारों का सवाल है—

    “विकास होगा, लेकिन हमारी जमीन और हमारी जिंदगी का क्या होगा?”

    आदिवासी परिवारों का विरोध आखिर किस बात पर है?

    प्रदर्शन कर रहे परिवारों की शिकायत सिर्फ इतनी नहीं है कि उन्हें compensation नहीं चाहिए।

    उनकी मांग है कि अगर project की वजह से उन्हें अपनी जमीन, घर और livelihood छोड़ना पड़ रहा है, तो rehabilitation ऐसा होना चाहिए जिससे विस्थापन के बाद उनकी जिंदगी दोबारा खड़ी हो सके।

    आंदोलन में मुख्य तौर पर इन सवालों को उठाया गया है—

    • कौन-कौन से परिवार वास्तव में project से प्रभावित हैं?
    • क्या सभी eligible परिवारों के नाम rehabilitation list में हैं?
    • जमीन और मकान का assessment सही हुआ है या नहीं?
    • compensation कितना और किस आधार पर मिल रहा है?
    • rehabilitation के बाद खेती और रोजगार का क्या होगा?
    • जंगल और natural resources पर निर्भर परिवारों का क्या होगा?
    • नए स्थान पर घर, पानी, स्कूल और healthcare की व्यवस्था कैसी होगी?

    यानी मामला सिर्फ “पैसा कितना मिला” का नहीं है।

    मामला यह भी है कि “पैसा मिलने के बाद जिंदगी कैसे चलेगी?”

    सरकार का बड़ा दावा: 93.78% compensation paid

    इसी बीच केंद्र सरकार ने 19 अगस्त को केन-बेतवा परियोजना से जुड़े compensation और rehabilitation के आंकड़े सामने रखे हैं।

    सरकार के मुताबिक 5,039 project-affected families को rehabilitation के लिए चिन्हित किया गया है। इनके लिए ₹629.87 करोड़ के awards बनाए गए थे, जिसमें से ₹590.74 करोड़ यानी 93.78% भुगतान किया जा चुका है।

    कृषि भूमि से जुड़े 10,913 प्रभावित व्यक्तियों के लिए ₹360.66 करोड़ के awards बताए गए हैं। इनमें ₹320.45 करोड़ यानी 88.85% रकम का भुगतान होने की जानकारी दी गई है।

    आवासीय संपत्तियों के compensation में भी करीब 94% payment का सरकारी दावा है।

    सरकार का कहना है कि जिन मामलों में payment बाकी है, वहां जरूरी legal और administrative formalities पूरी होने के बाद भुगतान किया जाएगा और land records की verification भी जारी है।

    लेकिन फिर वही सवाल—

    अगर इतना बड़ा हिस्सा भुगतान हो चुका है, तो आंदोलन खत्म क्यों नहीं हुआ?

    असल पेंच: कौन प्रभावित है और किसे कितना मिलेगा?

    यहीं से पूरा विवाद और complicated हो रहा है।

    किसी परिवार का नाम compensation list में होना और हर प्रभावित व्यक्ति की वास्तविक जरूरत पूरी होना एक ही बात नहीं है।

    आंदोलन से जुड़े लोगों ने eligibility, beneficiary criteria, compensation calculation और rehabilitation package को लेकर सवाल उठाए हैं।

    कुछ प्रदर्शनकारियों की मांग है कि rehabilitation benefits तय करते समय परिवार में मौजूद eligible adult members और उनकी वास्तविक livelihood जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाए।

    यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि “एक परिवार को कितना मिला?”

    सवाल यह भी है—

    “उस परिवार में कितने लोग अपनी आजीविका के लिए उसी जमीन पर depend थे?”

    14 गांवों में फिर से survey क्यों कराया जा रहा है?

    इस विवाद के बीच एक बड़ा administrative development सामने आया है।

    छतरपुर प्रशासन ने 14 प्रभावित गांवों में fresh survey का आदेश दिया है।

    इन गांवों में Sukwaha, Bhaurkhuwa, Ghughri, Naiguwan, Kakra, Kadwara, Palkoha, Kharyani, Dhodhan, Mainari, Kupi, Shahpura, Basudha और Dugaria शामिल हैं।

    Fresh verification में जमीन, मकान, पेड़, दूसरी assets और प्रभावित परिवारों की जानकारी दोबारा देखी जा रही है।

    इसका मकसद यह पता लगाना है कि कोई eligible परिवार या asset compensation और rehabilitation process से बाहर तो नहीं रह गया।

    यही fresh survey अब आंदोलनकारियों की मांग और सरकार के आंकड़ों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है।

    अप्रैल से अगस्त तक कैसे बढ़ा आंदोलन?

    यह विरोध आज से शुरू नहीं हुआ।

    प्रभावित परिवारों ने पिछले कई महीनों में अलग-अलग तरीकों से अपनी बात सरकार तक पहुंचाई।

    Protest-against-Ken-Betwa-news-Chhatarpur

    जल सत्याग्रह

    प्रदर्शनकारियों ने पानी में खड़े होकर अपना विरोध जताया।

    चिता आंदोलन

    आदिवासी महिलाओं ने symbolic चिताओं पर लेटकर protest किया। इसका संदेश था कि जमीन और livelihood छिनने के बाद उनके सामने जिंदगी और मौत जैसा सवाल खड़ा हो गया है।

    Protest-against-Ken-Betwa-Project-MP-news

    Hunger Strike

    इसके बाद भूख हड़ताल शुरू हुई, जो कई दिनों तक चली।

    Protest-against-Ken-Betwa-Project-in-MP-Chhatarpur

    Chulha Bandh

    जुलाई में protest का एक और symbolic तरीका सामने आया—Chulha Bandh। यानी खाना बनाना तक बंद कर विरोध जताया गया।

    Protest-against-Ken-Betwa-Project-MP-Chhatarpur

    आंदोलन में महिलाओं की बड़ी भागीदारी ने इसे और गंभीर बना दिया।

    19 जुलाई को police action के बाद विवाद और बढ़ा

    जुलाई में आंदोलन उस समय और बड़ा मुद्दा बन गया जब प्रशासन और पुलिस ने protest site खाली कराया।

    19 जुलाई को प्रदर्शनकारियों को आंदोलन स्थल से हटाया गया। इसके बाद protesters की तरफ से police action पर सवाल उठाए गए।

    राहुल गांधी ने भी इस कार्रवाई की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण protest को दबाया गया।

    हालांकि police और administration का पक्ष अलग है, इसलिए इस मामले में दोनों पक्षों के दावों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

    राहुल गांधी पहले भी उठा चुके हैं मुद्दा

    राहुल गांधी का यह इस मुद्दे पर पहला intervention नहीं है।

    7 अगस्त को Lok Sabha में भी Ken-Betwa project से जुड़े tribal displacement और rehabilitation का मुद्दा उठाया गया था।

    केंद्र के Tribal Affairs Ministry ने बताया कि इस विषय से जुड़ी complaints और representations मिली हैं और उन्हें मध्य प्रदेश सरकार को action और response के लिए भेजा गया है।

    इसके बाद 13 अगस्त को राहुल गांधी ने प्रभावित परिवारों के delegation से मुलाकात की।

    और अब 19 अगस्त को एक बार फिर उन्होंने सार्वजनिक तौर पर इस संघर्ष को समर्थन दिया है।

    इससे साफ है कि Ken-Betwa का tribal displacement issue अब local protest से निकलकर national political debate का हिस्सा बन चुका है।

    सिर्फ जमीन नहीं, जंगल और पर्यावरण का भी सवाल

    केन-बेतवा project का दूसरा बड़ा विवाद environmental impact को लेकर है।

    Project के लिए forest land diversion और Panna Tiger Reserve के आसपास के ecological impact को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।

    पर्यावरण को लेकर concerns में forest habitat, wildlife movement और river ecosystem शामिल हैं।

    दूसरी तरफ project को जरूरी environmental और forest clearances मिल चुकी हैं और सरकार mitigation measures तथा project benefits पर जोर देती रही है।

    इसलिए सवाल यह नहीं है कि सिर्फ “project सही है या गलत?”

    सवाल यह है—

    “बुंदेलखंड को पानी देने वाली इस project के साथ जंगल और wildlife पर पड़ने वाले असर को कितना कम किया जा सकता है?”

    बुंदेलखंड को project से क्या फायदा मिलेगा?

    सरकार का तर्क है कि बुंदेलखंड लंबे समय से पानी की कमी से जूझता रहा है।

    Ken-Betwa project से:

    • irrigation coverage बढ़ेगा
    • किसानों को पानी मिलेगा
    • drinking water supply बेहतर होगी
    • water-stressed गांवों को फायदा मिलेगा
    • hydropower और दूसरे energy benefits मिलेंगे

    सरकार इसे बुंदेलखंड की water security से जोड़कर देख रही है।

    लेकिन प्रभावित परिवारों के लिए सवाल है—

    “अगर बुंदेलखंड को पानी मिलेगा, तो जिस जमीन पर हम रहते हैं, वहां रहने वाले लोगों का भविष्य भी सुरक्षित होगा या नहीं?”

    मुआवजा मिलना और जिंदगी दोबारा बसना एक बात नहीं

    यही इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी मानवीय तस्वीर है।

    एक किसान के लिए जमीन सिर्फ जमीन नहीं होती।

    उसी जमीन से:

    खेती → income → पशुपालन → घर → परिवार का future

    जुड़ा होता है।

    आदिवासी परिवारों के लिए जंगल और आसपास के natural resources भी रोजमर्रा की livelihood का हिस्सा हो सकते हैं।

    ऐसे में compensation मिलने के बाद भी असली सवाल रहता है—

    नया घर कहां होगा? खेती कैसे होगी? रोजगार कहां मिलेगा? बच्चों की पढ़ाई कैसे चलेगी? पानी और healthcare की सुविधा कैसी होगी?

    यही वजह है कि rehabilitation को सिर्फ bank account में पहुंची रकम से नहीं, बल्कि विस्थापित परिवार की नई जिंदगी कितनी स्थिर हुई, इससे भी देखा जाता है।

    देश में अकेला नहीं है Ken-Betwa विवाद

    भारत के अलग-अलग हिस्सों में बड़े dams, mining और infrastructure projects को लेकर tribal displacement और rehabilitation के सवाल उठते रहे हैं।

    राजस्थान के Mahi Bajaj Sagar से जुड़े मामलों में भी displaced families के rehabilitation और दोबारा विस्थापन की चिंता सामने आई है।

    छत्तीसगढ़ के Hasdeo क्षेत्र में mining, forest rights और tribal communities के अधिकारों को लेकर विरोध जारी रहा है।

    इन सभी मामलों में एक common सवाल सामने आता है—

    क्या development project की planning जितनी मजबूत होती है, उतनी ही मजबूत प्रभावित लोगों को बसाने की planning भी होती है?

    अब आगे क्या होगा?

    अब केन-बेतवा विवाद में सबसे ज्यादा नजर 14 गांवों के fresh survey पर रहेगी।

    देखना होगा कि दोबारा verification में कितने नए eligible families या assets सामने आते हैं और compensation तथा rehabilitation से जुड़े pending मामलों का क्या होता है।

    दूसरी तरफ आदिवासी संगठनों की मांगें और तेज होती हैं या सरकार के साथ बातचीत का रास्ता निकलता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।

    राहुल गांधी के समर्थन से इस आंदोलन को political momentum मिला है, जबकि केंद्र ने अपने ताजा आंकड़ों के जरिए compensation process पर अपना पक्ष सामने रखा है।

    लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल अभी भी वही है—

    “93% से ज्यादा मुआवजा दिया जा चुका है, फिर भी आदिवासी सड़क पर क्यों हैं?”

    इस सवाल का जवाब सिर्फ compensation के आंकड़े में नहीं, बल्कि जमीन, rehabilitation, livelihood, जंगल और प्रभावित परिवारों की वास्तविक जिंदगी में छिपा है।

  • Andheri में टिकटलेस यात्री ने TC को धक्का देकर किया घायल, आंख के ऊपर लगी चोट; GRP ने तुरंत लिया Action

    Andheri में टिकटलेस यात्री ने TC को धक्का देकर किया घायल, आंख के ऊपर लगी चोट; GRP ने तुरंत लिया Action

    Andheri में टिकटलेस यात्री ने Western Railway के TC को धक्का देकर घायल कर दिया। आंख के ऊपर चोट लगी। यात्री को पकड़कर GRP के हवाले किया गया।

    मुंबई: Andheri स्टेशन पर मंगलवार शाम ticket checking के दौरान हंगामा हो गया। Western Railway के Ticket Checker (TC) Prakash Dubey को एक ticketless passenger ने कथित तौर पर धक्का दे दिया। धक्का लगने से Dubey जमीन पर गिर गए और उनकी बाईं आंख के ऊपर चोट लग गई, जिससे bleeding शुरू हो गई।

    घटना के तुरंत बाद passenger को पकड़ लिया गया और आगे की कार्रवाई के लिए Andheri GRP के हवाले कर दिया गया।

    Borivali से शुरू हुआ था पूरा मामला

    मिली जानकारी के मुताबिक, Dubey शाम करीब 6:40 बजे Borivali में Virar-Dadar local के second-class ordinary coach में ticket checking कर रहे थे। इसी दौरान एक passenger बिना ticket यात्रा करता मिला।

    Dubey ने passenger से fine भरने को कहा। आरोप है कि passenger ने ticket arrange करने की बात कही। जब local Andheri स्टेशन पहुंची, तो Dubey ने उसे ट्रेन से उतरने को कहा।

    आरोप है कि ट्रेन से नीचे उतरते ही passenger ने Dubey को धक्का दे दिया। अचानक हुए इस हमले में TC गिर पड़े और उनकी आंख के ऊपर चोट लग गई।

    घायल होने के बावजूद passenger को पकड़ा

    चोट लगने के बावजूद Dubey ने senior railway staffer Ganesh Rokde की मदद से passenger को पकड़ लिया। उसे पहले TC office ले जाया गया और बाद में Andheri GRP को सौंप दिया गया।

    वहीं, Dubey को master office को जानकारी देने के बाद railway dispensary ले जाया गया, जहां उनकी चोट का treatment किया गया।

    बिना टिकट यात्रा पर अब ₹500 minimum excess charge

    इस घटना के बीच commuters के लिए यह जानना भी जरूरी है कि 2026 में railway के ticketless-travel rules में minimum excess charge ₹500 किया गया है। इसके अलावा applicable fare या fare difference भी देना पड़ सकता है।

    यानी ticket को लेकर कोई dispute हो तो passenger को railway की तय प्रक्रिया का इस्तेमाल करना चाहिए। Ticket checking के दौरान physical confrontation करना अलग कानूनी कार्रवाई का कारण बन सकता है।

    अब GRP की कार्रवाई पर नजर

    Passenger को Andheri GRP के हवाले किए जाने के बाद अब मामले में FIR, आरोपी पर लगने वाली धाराएं और आगे की legal action महत्वपूर्ण होगी।

    Western Railway ने ticket checking के दौरान होने वाले disputes को record करने के लिए body-camera pilot भी शुरू किया है। इसका उद्देश्य passenger और railway staff के बीच विवाद की स्थिति में recorded evidence उपलब्ध कराना है।

    Andheri की इस घटना में अब GRP की जांच से सामने आने वाली जानकारी पर नजर है।