Category: BMC Updates

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  • Andheri में BMC की बड़ी कार्रवाई: 34,000 वर्ग फुट में बने 9 अवैध ढांचे हटे, Fire Station का रास्ता साफ

    Andheri में BMC की बड़ी कार्रवाई: 34,000 वर्ग फुट में बने 9 अवैध ढांचे हटे, Fire Station का रास्ता साफ

    Andheri के Chitrakoot Ground पर BMC ने 34,000 वर्ग फुट में बने अवैध ढांचे हटाए। 1991 से लंबित Fire Station का रास्ता साफ, अब निर्माण की बारी।

    मुंबई: Andheri West के Link Road स्थित Chitrakoot Ground पर BMC ने सोमवार को बड़ी demolition कार्रवाई करते हुए Fire Station के लिए आरक्षित जमीन पर बने अनधिकृत ढांचों को हटा दिया है। करीब 34,000 वर्ग फुट क्षेत्र में फैली संरचनाओं पर हुई इस कार्रवाई में garage, banquet/marriage hall और अन्य निर्माण शामिल थे। Bombay High Court में इसी विवाद से जुड़े मामले में नौ संरचनाओं का उल्लेख है। अदालत ने 25 अगस्त 2026 को दोनों याचिकाएं खारिज करते हुए कुल ₹10 लाख की लागत भी लगाई थी।

    यह कार्रवाई इसलिए अहम है क्योंकि Chitrakoot Ground का यह हिस्सा 1991 से Fire Station के लिए आरक्षित बताया जाता रहा है। करीब 34 साल से अटकी इस परियोजना के लिए अब जमीन खाली कराने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। हालांकि, जमीन खाली होने के बाद अगला सवाल अब यही है कि Ambivali Fire Station का वास्तविक निर्माण कब शुरू होगा।

    BMC ने क्या-क्या हटाया?

    BMC के K-West Ward ने Chitrakoot Ground पर करीब 34,000 वर्ग फुट में फैले अनधिकृत निर्माण हटाए। इनमें DRM Motors, DRM Apparels और Chitrakoot Banquet Hall के अवैध ढांचे बनाए गए थे। कार्रवाई के दौरान BMC के Building and Factory विभाग ने भारी मशीनरी का इस्तेमाल किया और Amboli Police Station की पुलिस टीम personnel सुरक्षा के लिए मौजूद रहे।

    Bombay High Court में दाखिल मामले में संबंधित निर्माणों के रूप में porta cabins, temporary office structures, car workshop और तीन banquet halls समेत नौ संरचनाओं का विवाद सामने आया था।

    मामला Bombay High Court तक कैसे पहुंचा?

    BMC की कार्रवाई से पहले संबंधित निजी निर्माण कंपनी ने civic body’s demolition notices और orders को Bombay High Court में चुनौती दी थी। अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक BMC ने 13 मई 2026 को notices जारी किए और बाद में 1 जुलाई 2026 को removal orders जारी किए।

    मामला Shah Constructions Co. Ltd. बनाम Municipal Corporation of Greater Mumbai के रूप में हाई कोर्ट पहुंचा। 25 अगस्त 2026 को जस्टिस A.S. Gadkari और जस्टिस Kamal Khata की पीठ ने दोनों writ petitions खारिज कर दीं। अदालत ने प्रत्येक याचिका पर ₹5 लाख यानी कुल ₹10 लाख की लागत लगाई।

    हाई कोर्ट ने अवैध निर्माण को लेकर क्या कहा?

    मामले में याचिकाकर्ता की ओर से पुराने municipal records, tax assessments, licences और repair permissions जैसे दस्तावेजों पर भरोसा किया गया था। अदालत ने माना कि ऐसे दस्तावेज अपने आप किसी निर्माण को कानूनी नहीं बना देते। किसी संरचना को वैध साबित करने के लिए sanctioned plan और उसके मूल निर्माण की विश्वसनीय जानकारी जरूरी थी।

    मामले में लगभग 34,000 वर्ग फुट constructed area में से करीब 18,000 वर्ग फुट हिस्सा हटाने की पेशकश भी की गई थी, लेकिन अदालत ने बाकी निर्माण को बचाने का आधार स्वीकार नहीं किया। अदालत के अनुसार यह साबित करने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं था कि पुराने और बाद में किए गए निर्माण को स्पष्ट रूप से अलग किया जा सकता है।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि property-tax assessment, licences या repair permissions किसी अनधिकृत निर्माण को स्वतः regularise नहीं करते। इसी आधार पर BMC के notices और demolition orders को बरकरार रखा गया।

    1991 से Fire Station के लिए आरक्षित है जमीन

    Chitrakoot Ground का यह हिस्सा Development Plan में Fire Station के लिए आरक्षित किए जाने के बाद भी दशकों तक अपने उद्देश्य के अनुसार विकसित नहीं हो सका। स्थानीय नागरिक संगठनों और पुरानी रिपोर्टों के अनुसार reservation का इतिहास 1991 तक जाता है।

    इस परियोजना को लेकर 2009 में एक और महत्वपूर्ण कदम सामने आया था। जानकारी के अनुसार BMC के Building Proposal Department ने Ambivali Fire Station के निर्माण के लिए Commencement Certificate जारी किया था। लेकिन निर्माण आगे नहीं बढ़ा और बाद में वह अनुमति रद्द हो गई।

    यानी जमीन आरक्षित होने, construction permission मिलने और वर्षों तक प्रशासनिक follow-up के बावजूद Fire Station जमीन पर आकार नहीं ले सका।

    2016 से 2024 तक चलता रहा प्रशासनिक Follow-Up

    यह मामला केवल हाल की demolition drive से शुरू नहीं हुआ। उपलब्ध जानकारी में Mumbai Fire Brigade की 2016 से 2024 तक की correspondence और administrative follow-up का उल्लेख है।

    इस दौरान जमीन के acquisition, handover, development proposal और संबंधित कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए विभिन्न स्तरों पर पत्राचार और बैठकें हुईं। 2022 में Suburban Collector के साथ बैठक हुई थी। 2023 में Ambivali Fire Station development proposal से संबंधित प्रक्रिया आगे बढ़ने की बात सामने आई थी।

    2025 में भी Fire Brigade ने जमीन को Fire Station के लिए उपलब्ध कराने को लेकर Collector स्तर पर मामला उठाया था। उस समय करीब 5,500 वर्ग मीटर के plot का उल्लेख किया गया था।

    2026 में जमीन खाली कराने की प्रक्रिया तेज हुई

    मार्च 2026 में BMC ने संबंधित पक्ष को Fire Station के लिए आरक्षित जमीन hand over करने के लिए सात दिन का अंतिम समय दिए जाने की जानकारी सामने आई थी। इससे पहले notice और reminder communication के जरिए जमीन सौंपने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई थी।

    इसके बाद project से जुड़ी ₹1.33 करोड़ की bank guarantee भी सामने आई। जानकारी के मुताबिक 31 मार्च 2026 को Municipal Commissioner के पक्ष में यह guarantee जमा की गई थी। अप्रैल में अधिकारियों की ओर से आने वाले महीनों में काम शुरू होने की उम्मीद जताई गई थी।

    लेकिन सितंबर तक उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी में Fire Station का actual construction शुरू होने की स्पष्ट पुष्टि नहीं हुई थी। यही वजह है कि मौजूदा demolition के बाद परियोजना की अगली समयसीमा सबसे अहम सवाल बन गई है।

    Chitrakoot Ground पर पहले भी हो चुकी है आग की घटना

    Fire Station की जरूरत केवल कागजों में दर्ज reservation का मामला नहीं है। जुलाई 2022 में इसी Chitrakoot Ground पर एक फिल्म सेट में आग लगने से 32 वर्षीय मजदूर की मौत हुई थी। उस घटना के बाद भी इलाके में Fire Station की जरूरत और emergency response को लेकर सवाल उठे थे।

    Lokhandwala-Oshiwara और Link Road का इलाका पिछले वर्षों में तेजी से विकसित हुआ है। यहां residential towers, commercial establishments और high-rise buildings बढ़े हैं। ऐसे इलाके में Fire Brigade के लिए response time बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

    एक वरिष्ठ Fire official के अनुसार वर्तमान में Andheri West के लिए fire brigades को Vile Parle, Goregaon और Bandra जैसे स्थानों से dispatch करना पड़ सकता है, जबकि peak traffic के दौरान दूरी और congestion response time को प्रभावित कर सकते हैं।

    पुरानी रिपोर्टों में traffic और दूरी के कारण emergency response में 30 से 45 मिनट तक की देरी की चिंता भी दर्ज की गई हैं।

    स्थानीय नागरिक वर्षों से उठा रहे हैं मांग

    Lokhandwala-Oshiwara Citizens Association सहित स्थानीय नागरिक समूह लंबे समय से इस जमीन पर Fire Station विकसित करने की मांग करते रहे हैं।

    नागरिकों का कहना है कि केवल demolition करके मामला खत्म नहीं होना चाहिए। पूरी आरक्षित जमीन को दोबारा encroachment से सुरक्षित करना और construction process को आगे बढ़ाना जरूरी है।

    स्थानीय BJP corporator Rupesh Sawarkar ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए कहा है कि उन्होंने चुनाव के बाद से Fire Station की जमीन से encroachment हटाने के लिए प्रशासन के साथ follow-up किया। उनका दावा है कि आरक्षित जमीन का इस्तेमाल wedding functions, film shoots और turf cricket जैसी गतिविधियों के लिए किया जा रहा था और lease arrangements में financial irregularities की आशंका थी।

    अब जमीन खाली होने के बाद सबसे बड़ा सवाल क्या?

    BMC की कार्रवाई ने Fire Station के लिए लंबे समय से अटकी जमीन से अनधिकृत निर्माण हटाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। लेकिन demolition का मतलब Fire Station का निर्माण शुरू होना नहीं है।

    अब प्रशासन के सामने अगली जिम्मेदारियां हैं—क्या पूरा आरक्षित भूखंड सुरक्षित और उपलब्ध हो चुका है, Fire Department को possession कब मिलेगा, final building plan की स्थिति क्या है, project की लागत कितनी है, tender जारी हुआ है या नहीं, निर्माण एजेंसी कौन होगी और Fire Station कब तक operational होगा।

    फरवरी 2026 में करीब 18 महीने के संभावित construction timeline की चर्चा हुई थी, जबकि अप्रैल में आने वाले महीनों में काम शुरू होने की उम्मीद जताई गई थी। अब सितंबर की demolition कार्रवाई के बाद इस timeline की स्थिति स्पष्ट करना BMC के लिए जरूरी होगा।

    34 साल पुराने Ambivali Fire Station के लिए रास्ते का एक बड़ा अवरोध जरूर हटा है, लेकिन Andheri West के लोगों को अब बुलडोजर कार्रवाई के बाद निर्माण शुरू होने और Fire Station operational होने की तारीख का इंतजार है।

  • BMC से PWD तक Transfer-Posting का खेल? नेताओं की सिफारिश पर उठे बड़े सवाल

    BMC से PWD तक Transfer-Posting का खेल? नेताओं की सिफारिश पर उठे बड़े सवाल

    BMC से PWD तक Transfer-Posting पर सवाल उठे हैं। 225 राजनीतिक सिफारिशों, BMC Randomisation और PWD tenure विवाद का पूरा मामला जानिए।

    मुंबई: सरकारी नौकरी में Transfer-Posting नियम से होना चाहिए या किसी नेता की recommendation से? BMC से लेकर महाराष्ट्र PWD तक सामने आ रही घटनाएं इसी बुनियादी सवाल को सामने ला रही हैं। BMC के रिकॉर्ड में पिछले एक साल में 225 अधिकारियों-कर्मचारियों के Transfer और Promotion को लेकर राजनीतिक सिफारिशें मिली हैं। दूसरी तरफ नागपुर PWD में कुछ Junior Engineers के लंबे समय तक एक ही जगह बने रहने और extension की प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं। ऐसे माहौल में BMC ने Engineers के Transfer के लिए अब Online Randomisation की व्यवस्था लागू की है।

    225 सिफारिशें, सवाल सिर्फ संख्या का नहीं

    RTI से सामने आई जानकारी के मुताबिक BMC के City Engineer Office में पिछले एक साल में 225 Transfer/Promotion recommendation letters मिले। इनमें Union Ministers, State Ministers, MPs, MLAs, MLCs और अलग-अलग राजनीतिक दलों के जनप्रतिनिधियों के नाम शामिल हैं।

    रिकॉर्ड में Eknath Shinde का नाम 10 बार और Ramdas Athawale का 9 बार सामने आया। Girish Mahajan और Kalidas Kolambkar के नाम 7-7 बार दर्ज हैं। कई अन्य नेताओं के नाम भी रिकॉर्ड में हैं।

    यहां असली सवाल 225 की संख्या से आगे है—किसी कर्मचारी की Transfer-Posting का प्रशासनिक फैसला जिस competent authority को करना है, वहां किसी राजनीतिक जनप्रतिनिधि की recommendation की भूमिका क्या है?

    Recommendation अपने-आप में किसी Transfer को गैरकानूनी साबित नहीं करती। कई बार जनप्रतिनिधि health problem, family circumstances, travel distance या दूसरी व्यक्तिगत दिक्कतों को लेकर representation भी करते हैं। लेकिन अंतिम फैसला नियमों और सक्षम प्रशासनिक authority के आधार पर होना चाहिए। इसलिए सवाल recommendation के अस्तित्व से ज्यादा उसके प्रभाव और उसके बाद हुए फैसले की प्रक्रिया पर है।

    अब BMC में बदली Computer तय करेगा

    इसी विवाद के बीच BMC ने City Engineer Office में JE, SE और AE के लिए Employee Transfer System Based on Randomization शुरू किया है।

    2 सितंबर के circular के मुताबिक एक ही department/section में तीन साल या उससे ज्यादा समय से काम कर रहे Engineers को 5 से 20 सितंबर के बीच Online Transfer Preference देनी होगी। कर्मचारी कम से कम एक और अधिकतम पांच विकल्प दे सकते हैं। इसके बाद available manpower और vacant posts के आधार पर computerised system Transfer process करेगा।

    ध्यान देने वाली बात यह है कि यह व्यवस्था फिलहाल City Engineer Office के JE, SE और AE पर लागू है। इसे BMC के हर कर्मचारी के लिए लागू नया Transfer rule नहीं कहा जाएगा।

    लेकिन क्या इससे Recommendation का रास्ता बंद होगा?

    यही इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।

    अगर Transfer को computerised randomisation से तय किया जाना है, तो किसी खास कर्मचारी के लिए बाहर से आने वाली recommendation का उस process पर क्या असर होगा? क्या ऐसे मामलों के लिए कोई अलग exception mechanism होगा? और अगर exception होगा तो उसका कारण और approval public record में आएगा या नहीं?

    यानी असली transparency सिर्फ software लगाने से नहीं आएगी। Transparency तब मानी जाएगी जब Transfer का पूरा trail—tenure, vacancy, preference, competent authority का decision और exception का कारण—स्पष्ट हो।

    2025 का विवाद भी इसी सवाल को और गंभीर बनाता है

    BMC में Transfer-Posting को लेकर विवाद पहली बार नहीं उठा। 2025 में करीब 160 Engineers के Transfer को लेकर political influence और “cash-for-transfer” जैसे आरोप लगाए गए थे। विवाद बढ़ने के बाद proposed transfer process पर रोक लगी थी।

    मई 2026 में BJP MLA Mihir Kotecha ने आरोप लगाया कि पहले विवादित list में शामिल करीब 55 अधिकारियों को दोबारा उन्हीं या समान postings पर लाने की कोशिश हो रही है। BMC ने उस समय ऐसी किसी final list की जानकारी से इनकार किया था।

    इन आरोपों की पुष्टि को लेकर अंतिम निष्कर्ष अलग बात है, लेकिन लगातार उठते सवाल बताते हैं कि Transfer-Posting की प्रक्रिया पर भरोसा ही इस विवाद का केंद्र बन चुका है।

    PWD में सवाल अलग, लेकिन मुद्दा वही

    नागपुर PWD की रिपोर्ट ने Transfer और tenure की दूसरी तस्वीर सामने रखी है।

    सरकारी नियम के मुताबिक सामान्य तौर पर एक जगह तीन साल की tenure के बाद Transfer होना चाहिए और उससे आगे extension exceptional circumstances में ही होना चाहिए। लेकिन कुछ Junior Engineers के 8 से 10 साल तक एक ही जगह काम करने की जानकारी सामने आई है। कुछ मामलों में extension के लिए लिखित आदेश नहीं होने पर भी सवाल उठे हैं।

    यहीं प्रशासनिक जवाबदेही का मुद्दा आता है—अगर tenure खत्म हो गया तो किसी कर्मचारी को उसी जगह बनाए रखने का आधार क्या था, और वह आधार किस लिखित आदेश में दर्ज है?

    BMC में राजनीतिक recommendations और PWD में tenure-extension एक ही मामला नहीं हैं। लेकिन दोनों घटनाएं एक ही बड़ी चिंता सामने लाती हैं: सरकारी Transfer-Posting में नियम कितना साफ है और उसका पालन कितना दिखाई देता है?

    BMC के सामने एक और बड़ा accountability test

    इसी समय Bombay High Court BMC की sanitation workers को housing देने की नीति पर भी लगातार जवाब मांग रहा है। 2008 की State Government policy के बावजूद करीब 18 साल में housing implementation नहीं होने पर Court ने BMC से उसके land resources की विस्तृत जानकारी मांगी है।

    BMC Commissioner के affidavit में करीब 4,176 leasehold properties, 3,505 tenanted properties/staff quarters, 3,668 vacant land tenancies, करीब 8,000 existing amenities और लगभग 6,000 public-purpose reservations का उल्लेख हुआ था। Court ने BMC की land pool को व्यापक रूप से examine करने और sanitation workers के लिए उपलब्ध land identify करने को कहा है।

    31 अगस्त की proceedings के बाद BMC को fresh comprehensive affidavit दाखिल करने के लिए 9 सितंबर 2026 तक का समय दिया गया है। Court ने जरूरत पड़ने पर independent committee के जरिए land की स्थिति की जांच की संभावना भी रखी है।

    यह Transfer case का हिस्सा नहीं है, लेकिन BMC की broader administrative accountability पर चल रही judicial scrutiny को जरूर दिखाता है।

    अब असली कसौटी

    BMC के 225 recommendation letters हों, Engineers के लिए Randomisation System हो या PWD में tenure-extension का सवाल—मुद्दा किसी एक नेता, अधिकारी या कर्मचारी का नहीं है।

    मुद्दा यह है कि सरकारी पद पर Transfer-Posting का फैसला आखिर नियम करेगा या influence?

    BMC ने Randomisation के जरिए एक रास्ता जरूर चुना है। अब देखना यही है कि यह व्यवस्था सिर्फ Transfer order बनाने का नया software बनती है या वास्तव में ऐसी प्रक्रिया तैयार करती है जिसमें किसी की recommendation से ज्यादा महत्व नियम, tenure, vacancy और documented administrative decision का हो।

  • मुंबईकरों के ₹248 करोड़ का नया Flyover, कई बाइकर्स फिसलकर गिरे; अब BMC ने सड़क पर लगाए Speed Breaker

    मुंबईकरों के ₹248 करोड़ का नया Flyover, कई बाइकर्स फिसलकर गिरे; अब BMC ने सड़क पर लगाए Speed Breaker

    मुंबई के ₹248 करोड़ के Mrinaltai Gore Flyover पर बाइकर्स के फिसलने के बाद BMC ने rumble strips लगाए। 2021 की Vigilance रिपोर्ट भी सवाल उठा चुकी थी।

    मुंबई: गोरेगांव में करीब ₹248 करोड़ की लागत से बने Mrinaltai Gore Flyover Extension पर बाइकर्स के फिसलने की शिकायतों के बाद BMC ने अब कार्रवाई शुरू की है। Relief Road की तरफ जाने वाले हिस्से के sharp turns पर BMC ने रफ्तार कम करने वाले rumble strips लगाए हैं। 29 अगस्त को इसी फ्लाईओवर की दीवार से एक ट्रक टकरा गया था, जिसके बाद sound barrier का एक हिस्सा नीचे SV Road पर गिर गया था। गनीमत रही कि इस घटना में किसी के घायल होने की खबर नहीं है।

    नया फ्लाईओवर 6 जून 2026 को आम लोगों के लिए खोला गया था। इसके बाद से Relief Road की तरफ जाने वाले arm की सड़क को लेकर लगातार शिकायतें सामने आईं। खासकर बारिश या सड़क गीली होने पर दोपहिया वाहन फिसलने और बाइकर्स के गिरने के वीडियो सामने आए। यह हिस्सा नीचे उतरने के बाद एक turn पर आता है, जहां बाइक को सड़क की पर्याप्त grip मिलना ज्यादा जरूरी है।

    BMC ने पहले बताया था कि flyover की 40 mm मोटी mastic asphalt surface पर stone aggregates डाले गए हैं ताकि tyre को friction मिले और वाहन फिसलें नहीं। लेकिन मौजूदा शिकायतों के बाद अब चार ऐसे spots चिन्हित किए गए हैं जहां turn और slope है। BMC अधिकारी के मुताबिक दो जगह 15 mm thick rumblers लगाए जा चुके हैं और दो अन्य जगहों पर भी इन्हें लगाया जाना है। साथ ही cautionary और speed-limit boards लगाने तथा sound barriers की मरम्मत की बात कही गई है।

    यहां Speed Breaker शब्द आम लोगों के लिए समझने में आसान है, लेकिन तकनीकी तौर पर लगाए गए rumble strips सामान्य ऊंचे speed breaker जैसे नहीं हैं। इनका मकसद सड़क पर vibration और अतिरिक्त grip देकर वाहन चालकों को turn और slope पर सावधान करना तथा रफ्तार कम कराना है।

    सवाल सिर्फ फिसलन का नहीं, ₹248 करोड़ के पूरे प्रोजेक्ट का है

    सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस 750 मीटर लंबे, चार लेन वाले flyover पर करीब ₹248 करोड़ खर्च हुए, उसे शुरू हुए अभी तीन महीने भी पूरे नहीं हुए और उसके एक हिस्से पर दोपहिया वाहनों की safety को लेकर corrective treatment करना पड़ा। यह वही project है जिसकी construction timeline करीब आठ साल तक खिंची और जिसकी लागत भी बार बार बढ़ाई गई।

    BMC ने नवंबर 2018 में इसका work order जारी किया था और शुरुआती completion target 24 महीने का था। लेकिन project 2026 में जाकर पूरा हुआ। अंतिम लागत ₹247.97 करोड़ तक पहुंची, जबकि मिली जानकारी के मुताबिक शुरुआती estimate ₹170.82 करोड़ था—यानी करीब 45 फीसदी की बढ़ोतरी।

    काम के दौरान contractor पर penalties भी लगाई गईं। BMC के मुताबिक आठ साल में कुल करीब ₹27 लाख की penalty लागू की गई, जो ₹248 करोड़ के project cost का एक फीसदी भी नहीं है। इनमें construction delay और site safety से जुड़े मामलों की penalties शामिल थीं।

    लेकिन असली सवाल 2026 में नहीं, 2021 में उठ चुका था

    इस flyover की कहानी में सबसे गंभीर कड़ी BMC की अपनी Vigilance रिपोर्ट है। जून 2021 की internal vigilance inspection में construction quality, structural elements और monitoring से जुड़े कई सवाल उठाए गए थे—यानी flyover के public use में आने से करीब पांच साल पहले।

    रिपोर्ट में flyover के कई joints और piers में cracks तथा honeycombing मिलने की बात कही गई थी। पांच pillars में cracks और honeycombing का उल्लेख था। Honeycombing concrete में बनने वाली खाली जगहों को कहा जाता है, जो खराब compaction से जुड़ी हो सकती हैं और concrete की strength पर असर डाल सकती हैं।

    Vigilance team ने यह भी सवाल उठाया था कि flyover के piers के पास मौजूद road panels के उठने या damage होने की संभावना को design में पर्याप्त तरीके से address किया गया था या नहीं। अगर ऐसी स्थिति में सड़क unsafe होती है तो उसकी repair contractor की जिम्मेदारी होने की बात रिपोर्ट में दर्ज थी।

    रिपोर्ट में quality records को लेकर भी सवाल थे। Steel और ready-mix concrete यानी RMC से जुड़े जरूरी records उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई थी। इसके अलावा मई 2019 और नवंबर 2020 में concrete strength के tests fail होने के बावजूद कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठे थे।

    और यहां monitoring का सवाल भी सामने आता है। नियुक्त consulting engineer को महीने में कम से कम दो site inspections करनी थीं, लेकिन Vigilance रिपोर्ट में ऐसे visits के records उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई। Contractors और supervising municipal engineers पर effective quality control और monitoring सुनिश्चित नहीं करने को लेकर भी सवाल उठाए गए थे।

    सबसे चौंकाने वाली बात penalties को लेकर थी। फरवरी से मई 2019 के बीच चार अलग-अलग मामलों में contractor पर ₹500 की penalty लगाई गई, जबकि contract conditions में minimum penalty ₹5,000 बताई गई थी। रिपोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि cracks, honeycombing और rough concrete surfaces के लिए penalty क्यों नहीं लगाई गई।

    हालांकि, 1 जून 2021 की compliance report में Bridges Department ने बताया था कि contractor को penalty और warning letter दिया गया, corrective measures और rectification work किए गए तथा records update किए गए। Supervisory staff को भी ज्यादा सतर्क रहने के निर्देश दिए गए थे।

    यानी आज का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सड़क पर rumble strips क्यों लगाने पड़े। बड़ा सवाल यह भी है कि 2021 में Vigilance ने जो कमियां बताई थीं, उनके बाद rectification वास्तव में कितनी प्रभावी रही और बाद के वर्षों में किस स्तर पर उसकी जांच हुई।

    आठ साल का project, बढ़ी लागत और फिर safety correction

    Mrinaltai Gore Flyover Extension का मकसद Goregaon में east-west connectivity को बेहतर करना था। 750 मीटर का यह four-lane arm existing flyover network को Ram Mandir Road और Relief Road से जोड़ता है। लेकिन project को पूरा होने में शुरुआती 24 महीने के target के मुकाबले करीब आठ साल लग गए।

    मार्च 2026 में भी project करीब 80 फीसदी complete बताया गया था और cost escalation को लेकर BMC Standing Committee में सवाल उठ चुके थे। इसी दौरान corporators ने project delay और बढ़ती लागत पर भी आपत्ति जताई थी।

    फिर जून में flyover खुला तो शुरुआती दिनों में uneven surface, loose grit और patchy stretches को लेकर शिकायतें सामने आईं। BMC ने उस समय road condition को structural deficiency नहीं माना और mastic asphalt तथा stone chips को technical construction process का हिस्सा बताया था। Experts ने भी यह कहा था कि mastic asphalt और stone aggregates का इस्तेमाल friction देने के लिए किया जाता है, हालांकि curved हिस्सों पर पर्याप्त grip बेहद जरूरी है।

    अब सितंबर में situation यह है कि उसी नए flyover के कुछ turns और slopes पर BMC को rumble treatment करना पड़ रहा है। एक न्यूज एजेंसी से बात करते हुए transport planner Vivek Pai ने इस तरह की slick surface के संभावित कारणों में mastic surface के बहुत smooth होने और bitumen bleeding जैसे technical factors की चर्चा की है। इसे flyover की खराबी का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता, लेकिन surface grip का सवाल जरूर गंभीर बन गया है।

    BMC से अब जवाब किस बात का चाहिए?

    BMC का मौजूदा safety action जरूरी है और अगर rumble strips, warning boards और sound barrier repairs से दुर्घटनाओं का risk कम होता है तो यह स्वागत योग्य कदम है।

    लेकिन ₹248 करोड़ के इस project में accountability का सवाल इससे खत्म नहीं होता।

    अब यह साफ होना चाहिए कि 2021 की Vigilance रिपोर्ट में उठाए गए सवालों पर किस अधिकारी ने compliance verify किया, rectification की final inspection किसने की, consultant ने कितनी site inspections कीं, quality records किस स्तर पर verify हुए, concrete और road surface की final quality किसने certify की और public opening से पहले safety assessment किस आधार पर किया गया।

    BMC ने जुलाई 2026 में bridge, flyover और tunnel projects के लिए पांच साल के लिए 29 technical consultants का panel बनाने का प्रस्ताव भी रखा था। प्रस्ताव में consultant की design-related गलती से project cost या design variation बढ़ने पर penalty का प्रावधान रखने की बात कही गई थी।

    अब Mrinaltai Gore Flyover का मामला एक सीधा सवाल छोड़ता है—अगर ₹248 करोड़ खर्च करके बना नया flyover तीन महीने के भीतर ही ऐसे turns पर safety correction मांगने लगे जहां बाइकर्स फिसल रहे हैं, तो गलती सिर्फ सड़क पर rumble strips लगाने से खत्म मानी जाए या फिर पूरे project की planning, quality monitoring और accountability की भी दोबारा जांच होनी चाहिए?

    मुंबईकरों के टैक्स के पैसे से बने इस flyover पर अब असली जरूरत सिर्फ रफ्तार कम करने की नहीं, बल्कि यह पता लगाने की है कि शुरुआत से आखिर कहां-कहां निगरानी कमजोर पड़ी।

  • BMC की ₹2.46 करोड़ वाली ट्रिप का असली सवाल: 30,714 बच्चों के लिए Keshav Srushti ही क्यों? ₹802 rate, tender और RSS connection की पूरी कहानी

    BMC की ₹2.46 करोड़ वाली ट्रिप का असली सवाल: 30,714 बच्चों के लिए Keshav Srushti ही क्यों? ₹802 rate, tender और RSS connection की पूरी कहानी

    BMC ने 30,714 छात्रों की Keshav Srushti ट्रिप के लिए ₹2.46 करोड़ मंजूर किए। ₹802 rate, tender और RSS connection पर विपक्ष ने सवाल उठाए।

    मुंबई: BMC के 30,714 कक्षा 7 के छात्रों को Keshav Srushti, Uttan ले जाने की ₹2.46 करोड़ की योजना अब सिर्फ एक educational trip का मामला नहीं रह गई है। Standing Committee ने 28 अगस्त को विपक्ष के विरोध के बावजूद proposal को majority से मंजूरी दे दी। लेकिन इस फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है—30 हजार से ज्यादा बच्चों के लिए Keshav Srushti को ही क्यों चुना गया और ₹802 प्रति छात्र का rate किस आधार पर तय हुआ?

    विपक्ष का आरोप है कि Keshav Srushti का RSS के संस्थापक डॉ. K.B. Hedgewar से institutional connection है और BMC के proposal में इस संस्था के लिए “Monopoly” तथा सामान्य tender process में relaxation का सवाल भी सामने आता है। हालांकि, इन आरोपों को अभी भ्रष्टाचार या किसी राजनीतिक साजिश का साबित तथ्य नहीं माना जा सकता। असली जवाब BMC के selection और costing documents से ही मिलेगा।

    30,714 बच्चों पर ₹2.46 करोड़ का पूरा मामला

    BMC के reported proposal के मुताबिक 2026-27 में municipal schools की कक्षा 7 के छात्रों के लिए “Environment Study and Training Educational Trip” आयोजित की जाएगी।

    कुल 30,714 छात्रों का अनुमान लगाया गया है। इनमें 30,302 primary section और 412 secondary section के छात्र बताए गए हैं।

    कुल खर्च ₹2,46,32,628 यानी करीब ₹2.46 करोड़ है। प्रति छात्र रकम ₹802 है।

    जानकारीविवरण
    कुल छात्र30,714
    कक्षा7वीं
    कुल प्रस्तावित खर्च₹2,46,32,628
    प्रति छात्र₹802
    जगहKeshav Srushti, Uttan, Bhayandar
    Academic Year2026-27
    ProgrammeEnvironment Study & Training Educational Trip

    Reported proposal के मुताबिक package में transport, breakfast, lunch, evening snack और insurance जैसी सुविधाएं शामिल हैं।

    Keshav Srushti को ही क्यों चुना गया?

    यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम सवाल है।

    Keshav Srushti कोई सामान्य picnic spot नहीं है। Uttan में स्थित इस बड़े campus में organic farming, dairy, beekeeping, medicinal plants, waste management, recycling, water management, solar energy और biodiversity जैसी activities होती हैं। BMC के पक्ष में सबसे मजबूत argument भी यही है कि बच्चों को environment का practical exposure दिया जा सकता है।

    लेकिन Mumbai में environmental education और conservation पर काम करने वाली दूसरी institutions भी हैं।

    Congress group leader Ashraf Azmi ने BNHS Conservation Education Centre, Maharashtra Nature Park, CERE, Conservation Action Trust, WWF-India, CEED और Nature Forever Society जैसी institutions का विकल्प गिनाते हुए सवाल किया कि इन organisations को opportunity क्यों नहीं दी गई।

    इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि Keshav Srushti में environmental activities हैं या नहीं। सवाल है:

    “BMC ने दूसरी institutions के मुकाबले इसी campus को कैसे evaluate किया?”

    क्या दूसरी organisations से proposals या quotations लिए गए? क्या comparative assessment हुआ? क्या Keshav Srushti की facilities को दूसरे options के मुकाबले बेहतर पाया गया? इसका अब तक बीएमसी प्रशासन की और से कोई भी जवाब प्राप्त नहीं हुआ है।

    RSS connection कहां से आया?

    Keshav Srushti का RSS connection विपक्ष की तरफ से लगाया गया कोई नया label भर नहीं है। Keshav Srushti की अपनी description में campus को RSS के संस्थापक डॉ. K.B. Hedgewar की स्मृति को समर्पित बताया गया है।

    इसके campus ecosystem में Rambhau Mhalgi Prabodhini यानी RMP से जुड़ी activities भी मौजूद हैं। इसी broader institutional background को लेकर Congress और दूसरे opposition members ने सवाल उठाया कि अलग-अलग medium और communities से आने वाले municipal school students को ऐसे campus में environmental education के नाम पर क्यों ले जाया जा रहा है।

    लेकिन यहां एक जरूरी distinction है।

    अभी ऐसा कोई verified evidence सामने नहीं आया है कि BMC के बच्चों को इस trip के दौरान RSS की political ideology सिखाने का programme बनाया गया है। BMC का official justification environmental education है। इसलिए “RSS से जुड़ी संस्था” और “बच्चों को RSS ideology सिखाई जाएगी”—इन दोनों बातों को एक नहीं माना जा सकता।

    Tender का सवाल इतना बड़ा क्यों है?

    Opposition का दूसरा और ज्यादा administrative सवाल tender process को लेकर है।

    Mumbai Congress ने दावा किया है कि BMC के proposal में Keshav Srushti की “Monopoly” का reference है और normal tender process में relaxation की मांग की गई है।

    Standing Committee में भी विपक्ष ने tender न बुलाए जाने को लेकर सवाल उठाए। खबर के मुताबिक proposal का विरोध करते हुए Congress, Shiv Sena (UBT) और Samajwadi Party के सदस्यों ने selection process पर आपत्ति जताई।

    लेकिन यहां भी एक सावधानी जरूरी है।

    सिर्फ यह कहना कि “tender नहीं हुआ, इसलिए नियम टूटा” अभी सही नहीं होगा। अगर BMC ने किसी specific procurement rule या exemption के तहत direct selection किया है, तो उसकी legality proposal और supporting documents देखकर ही तय होगी।

    इसलिए असली सवाल है:

    “किस rule के तहत Keshav Srushti को चुना गया और tender से relaxation क्यों दी गई?”

    ₹802 का rate भी जांच के दायरे में क्यों?

    30,714 छात्रों के लिए ₹802 प्रति छात्र का मतलब कुल ₹2.46 करोड़ है।

    यही वजह है कि rate calculation भी इस कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।

    Keshav Srushti से जुड़े पुराने published outing rates में 2024-25 के “A Date with Nature” programme की कीमत ₹550 प्रति व्यक्ति बताई गई थी। उस listing में transport शामिल नहीं था।

    2020 के एक अलग organised outing में ₹500-₹550 प्रति व्यक्ति का package था, जिसमें breakfast, lunch, evening refreshments और Keshav Srushti tour शामिल था।

    लेकिन इन पुराने rates को 2026 के BMC package से सीधे compare करके overcharging का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। 2026 के package में transport और insurance भी शामिल बताए गए हैं और services की costing अलग हो सकती है।

    फिर भी एक सवाल जरूर बनता है:

    ₹802 में Keshav Srushti के environmental programme/venue का actual component कितना है?

    Transport पर कितना?

    Food पर कितना?

    Insurance पर कितना?

    और क्या BMC को school students के लिए कोई special institutional rate मिला?

    इन सवालों का जवाब detailed costing sheet से ही मिलेगा।

    क्या यह सिर्फ political controversy है?

    इस समय मामले में दो अलग-अलग layers हैं।

    पहली layer है educational justification। Keshav Srushti में वास्तव में environment, agriculture, biodiversity और waste-management से जुड़ी activities मौजूद हैं। इसलिए environmental study के लिए वहां students को ले जाना अपने आप में असंभव या असंगत फैसला नहीं है।

    दूसरी layer है selection और procurement।

    यहीं ज्यादा गंभीर सवाल हैं—एक ही institution क्यों, ₹802 का rate कैसे तय हुआ, दूसरी organisations को मौका मिला या नहीं और tender relaxation किस आधार पर हुई।

    अगर BMC इन सवालों का documents के साथ जवाब देता है, तो controversy का बड़ा हिस्सा साफ हो सकता है।

    Standing Committee में क्या हुआ?

    Congress के Ashraf Azmi ने proposal को वापस लेने और दूसरी environmental organisations को मौका देने की मांग की। MNS के Yashwant Killadar ने भी विरोध का समर्थन किया।

    दूसरी तरफ ruling side ने environmental education के practical benefit का argument दिया। BJP के Ganesh Khankar ने कहा कि बच्चों को यहां practical experience मिलेगा। Standing Committee chairman Prabhakar Shinde ने opposition की आपत्ति को खारिज करते हुए proposal को majority से मंजूरी दे दी।

    यानी political opposition के बावजूद administrative approval आगे बढ़ चुका है।

    अब सबसे ज्यादा नजर किस पर रहेगी?

    इस पूरे मामले में सबसे अहम अगला document trip की तारीख नहीं, बल्कि BMC की decision-making file होगी।

    अब यह साफ होना जरूरी है कि:

    • Keshav Srushti को select करने का initial proposal किस level पर तैयार हुआ?
    • ₹802 प्रति छात्र का rate किस calculation पर तय हुआ?
    • Keshav Srushti की तरफ से क्या quotation/proposal दिया गया?
    • दूसरी environmental organisations से कोई quotation या proposal लिया गया या नहीं?
    • “Monopoly” और tender relaxation का official आधार क्या है?
    • ₹2.46 करोड़ का component-wise breakup क्या है?
    • final work order किस entity के नाम जारी होगा?

    फिलहाल BMC Standing Committee ने 30,714 छात्रों की Keshav Srushti environmental trip के लिए करीब ₹2.46 करोड़ के proposal को मंजूरी दे दी है। RSS connection और selection process पर विपक्ष ने गंभीर सवाल उठाए हैं, जबकि BMC की तरफ से इसे environmental education programme के तौर पर justify किया गया है।

    अब इस मामले की असली तस्वीर इस बात से साफ होगी कि BMC Keshav Srushti के selection, ₹802 rate और tender relaxation का documentary justification कितना स्पष्ट करती है।

  • मुंबई महापौर के सोशल मीडिया पर 25 लाख का विवाद, अब प्रस्ताव खारिज; जानिए पूरा मामला

    मुंबई महापौर के सोशल मीडिया पर 25 लाख का विवाद, अब प्रस्ताव खारिज; जानिए पूरा मामला

    मुंबई महापौर रितू तावडे के सोशल मीडिया प्रबंधन पर 25 लाख रुपये के प्रस्ताव से विवाद बढ़ा। किशोरी पेडणेकर ने सवाल उठाए, अब स्थायी समिति ने प्रस्ताव खारिज कर दिया।

    मुंबई: मुंबई महानगरपालिका में महापौर रितू तावडे के कार्यालय के सोशल मीडिया प्रबंधन को लेकर शुरू हुआ 25 लाख रुपये से ज्यादा का विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। जिस प्रस्ताव को लेकर विपक्ष ने मनपा के पैसों के इस्तेमाल पर सवाल उठाए थे, उसे स्थायी समिति ने अब आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया है।

    मामला सिर्फ 25 लाख रुपये का नहीं था। सवाल यह भी उठा कि जब मनपा के पास पहले से जनसंपर्क विभाग और सोशल मीडिया व्यवस्था मौजूद है, तो महापौर कार्यालय के लिए अलग से इतनी बड़ी रकम की जरूरत क्यों पड़ी?

    क्या था पूरा मामला?

    मनपा में महापौर कार्यालय के सोशल मीडिया प्रबंधन से जुड़ा 25 लाख 12 हजार 786 रुपये का प्रस्ताव सामने आया था। यह रकम 1 अगस्त 2026 से 31 जुलाई 2027 तक एक साल की अवधि के लिए बताई गई थी।

    प्रस्ताव में महापौर कार्यालय की बैठकों, दौरे, निरीक्षण और दूसरे आधिकारिक कार्यक्रमों की जानकारी सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंचाने के लिए व्यवस्था की बात थी।

    मामले ने तब राजनीतिक रंग पकड़ लिया, जब यह सवाल उठने लगा कि क्या मुंबईकरों से मिलने वाले टैक्स का पैसा महापौर की सोशल मीडिया मौजूदगी और प्रचार पर खर्च किया जा रहा है।

    किशोरी पेडणेकर ने उठाए सवाल

    मुंबई मनपा में विपक्ष की नेता किशोरी पेडणेकर ने इस मुद्दे पर महापौर और सत्ताधारी भाजपा पर तीखा हमला बोला।

    पेडणेकर का कहना था कि मुंबईकर टैक्स इसलिए नहीं देते कि उनकी मेहनत की कमाई सोशल मीडिया प्रचार पर खर्च हो। उनके मुताबिक शहर में सड़कें, गड्ढे, कचरा, नालियों और नालों की सफाई, ट्रैफिक और दूसरी बुनियादी नागरिक सुविधाओं से जुड़े सवाल अब भी मौजूद हैं।

    ऐसे में सोशल मीडिया प्रबंधन पर लाखों रुपये खर्च करने की जरूरत पर उन्होंने सवाल खड़ा किया।

    विपक्ष की आपत्ति का सीधा सवाल यही था—जब मनपा के पास पहले से जनसंपर्क और सोशल मीडिया का ढांचा है, तो महापौर कार्यालय के लिए अलग खर्च क्यों?

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    लेकिन महापौर रितू तावडे का पक्ष क्या है?

    विवाद बढ़ने के बाद महापौर रितू तावडे ने सफाई दी कि इस पूरे मामले में उनकी तरफ से किसी एजेंसी को चुनने या ठेका देने में कोई दखल नहीं है।

    उनके मुताबिक, मनपा में सोशल मीडिया से जुड़ी एजेंसी पहले से काम कर रही है और पिछले करीब दो वर्षों से मनपा के सोशल मीडिया काम को संभाल रही है। महापौर ने यह भी कहा कि उनके कार्यालय से संबंधित तकनीकी जरूरतों के लिए कुछ कर्मचारियों की व्यवस्था की बात कही गई थी, जिसे लेकर उन्होंने पत्र दिया था।

    महापौर ने यह आरोप भी लगाया कि उनके नाम को इस मामले में राजनीतिक विवाद खड़ा करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

    25 लाख का मतलब महापौर की निजी प्रसिद्धि के लिए अलग एजेंसी नहीं?

    यहीं इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू सामने आता है।

    मनपा और महापौर कार्यालय की सफाई के मुताबिक, 25 लाख रुपये किसी नई अलग एजेंसी को सिर्फ महापौर की निजी प्रसिद्धि के लिए देने का मामला नहीं था। मनपा के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म संभालने वाली Runtime Solutions Private Limited को ही एक साल के लिए काम जारी रखने का प्रस्ताव था और उसी व्यवस्था के तहत महापौर कार्यालय के सोशल मीडिया काम को भी संभाला जाना था।

    यानी विपक्ष ने जिस खर्च को महापौर की सोशल मीडिया प्रसिद्धि से जोड़कर सवाल उठाया, मनपा का पक्ष यह है कि यह मनपा की मौजूदा सोशल मीडिया व्यवस्था से जुड़ा खर्च था, न कि महापौर के लिए अलग नई प्रचार एजेंसी की नियुक्ति।

    फिर विवाद इतना बढ़ा क्यों?

    विवाद इसलिए बड़ा क्योंकि प्रस्ताव में महापौर कार्यालय के सोशल मीडिया प्रबंधन के लिए 25 लाख 12 हजार 786 रुपये की रकम साफ तौर पर सामने आई।

    रिपोर्टों के मुताबिक यह खर्च करीब 2.09 लाख रुपये प्रति महीने और लगभग 6,900 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से बैठता था। प्रस्ताव में महापौर के आधिकारिक कार्यक्रमों, बैठकों, निरीक्षण दौरों और सार्वजनिक गतिविधियों की जानकारी सोशल मीडिया पर पहुंचाने की बात थी।

    इसके बाद विपक्ष ने सवाल किया कि मनपा के पास पहले से जनसंपर्क विभाग और केंद्रीय सोशल मीडिया व्यवस्था होने के बावजूद इस तरह का अतिरिक्त खर्च जरूरी क्यों है।

    अब आया सबसे बड़ा मोड़

    इस पूरे विवाद का फिलहाल सबसे अहम अपडेट यह है कि स्थायी समिति ने 25 लाख रुपये वाले इस प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ाया।

    21 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक स्थायी समिति की बैठक में प्रस्ताव को ‘नॉट टेकन’ घोषित कर दिया गया। यानी जिस प्रस्ताव को लेकर पिछले दिनों सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हुए थे, वह फिलहाल मंजूरी की दिशा में आगे नहीं गया।

    बताया गया कि विवाद बढ़ने के बाद महापौर ने भी अपनी स्थिति साफ करते हुए कहा था कि स्थायी समिति के सामने आने वाले प्रस्ताव उनकी व्यक्तिगत अनुमति से नहीं आते और अगर उन्हें पहले से इसकी जानकारी होती तो वह इस प्रस्ताव को रोकने की कोशिश करतीं।

    मुंबईकरों के लिए असली सवाल क्या है?

    इस विवाद ने मनपा के खर्च को लेकर एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है।

    मुंबई जैसे शहर में जहां सड़क, गड्ढे, सफाई, नाले, ट्रैफिक और दूसरी नागरिक सुविधाएं लगातार लोगों की रोजमर्रा की परेशानी बनी रहती हैं, वहां सोशल मीडिया और प्रचार से जुड़े खर्च की जरूरत और उसका फायदा जनता को कितना मिलेगा—इसका हिसाब साफ होना जरूरी है।

    दूसरी तरफ मनपा का कहना है कि यह कोई नई अलग प्रचार एजेंसी नियुक्त करने का मामला नहीं था, बल्कि पहले से चल रही मनपा की सोशल मीडिया व्यवस्था से जुड़ा काम था।

    फिलहाल 25 लाख 12 हजार 786 रुपये का विवादित प्रस्ताव स्थायी समिति में आगे नहीं बढ़ा है। लेकिन इस पूरे मामले ने एक सवाल जरूर छोड़ दिया है—मुंबईकरों के टैक्स से होने वाले हर खर्च की प्राथमिकता आखिर तय कैसे होनी चाहिए?

    एक नजर में

    मामलाजानकारी
    विवादमहापौर कार्यालय के सोशल मीडिया प्रबंधन का खर्च
    प्रस्तावित रकम25 लाख 12 हजार 786 रुपये
    अवधि1 अगस्त 2026 से 31 जुलाई 2027
    एजेंसीRuntime Solutions Private Limited
    मुख्य आपत्तिमनपा के मौजूदा सोशल मीडिया और जनसंपर्क ढांचे के बावजूद खर्च
    विपक्ष का रुखमुंबईकरों के टैक्स के पैसे के इस्तेमाल पर सवाल
    महापौर का पक्षअलग नई प्रचार एजेंसी नहीं, प्रक्रिया में उनका हस्तक्षेप नहीं
    ताजा स्थितिस्थायी समिति ने प्रस्ताव को ‘नॉट टेकन’ घोषित किया
  • Goregaon-Mulund Link Road: SGNP के नीचे TBM Tulsi ने शुरू की 5.3 KM सुरंग की खुदाई, 20 मिनट में सफर का दावा

    Goregaon-Mulund Link Road: SGNP के नीचे TBM Tulsi ने शुरू की 5.3 KM सुरंग की खुदाई, 20 मिनट में सफर का दावा

    Mumbai GMLR tunnel: SGNP के नीचे TBM Tulsi ने 5.3 किमी tunnel की खुदाई शुरू की। जानिए Goregaon-Mulund route, 20 मिनट सफर, safety और 2029 deadline की जानकारी।

    मुंबई: Goregaon और Mulund के बीच सफर करने वालों के लिए बड़ी खबर है। Goregaon-Mulund Link Road (GMLR) project के तहत Sanjay Gandhi National Park (SGNP) के नीचे twin tunnel की actual खुदाई शुरू हो गई है। BMC ने पहली Tunnel Boring Machine यानी TBM ‘Tulsi’ को excavation के लिए commission कर दिया है। यह tunnel Goregaon East की Dadasaheb Phalke Chitranagari यानी Film City को Mulund West के Amar Nagar से जोड़ेगी।

    यह सिर्फ एक और road project का construction update नहीं है। GMLR पूरा होने के बाद Mumbai के western और eastern suburbs के बीच direct east-west connectivity तैयार होगी। अभी Goregaon से Mulund जाने में traffic और route के हिसाब से काफी समय लगता है, जबकि project के पूरा होने के बाद travel time करीब 90 मिनट से घटकर 20 मिनट तक आने की उम्मीद जताई गई है। हालांकि यह estimated corridor travel time है, यानी हर हालत में door-to-door 20 मिनट की guarantee नहीं है।

    SGNP के नीचे आखिर बन क्या रहा है?

    GMLR की कुल length करीब 12.2 किलोमीटर है और project को चार phases में execute किया जा रहा है। SGNP के नीचे बनने वाला tunnel हिस्सा Phase 3(B) का सबसे अहम component है। यहां दो तीन-लेन वाली tunnels बनाई जा रही हैं, जो Film City side से शुरू होकर Mulund West के Amar Nagar तक जाएंगी।

    BMC की latest जानकारी के मुताबिक tunnel package की total length करीब 6.6 किलोमीटर है। इसमें twin tunnels के साथ 17 cross passages, 720 मीटर के twin-box tunnel और Goregaon तथा Mulund की तरफ करीब 600 मीटर approach roads भी शामिल हैं। यानी सिर्फ underground boring पूरा होना ही पूरा काम नहीं है; इसके बाद approach roads, internal systems और बाकी infrastructure को भी ready करना होगा।

    TBM Tulsi इतनी खास क्यों है?

    जिस machine ने अब खुदाई शुरू की है उसका नाम Tulsi रखा गया है। यह अत्याधुनिक Earth Pressure Balance (EPB) TBM technology पर काम करेगी। इसका इस्तेमाल खास तौर पर इस तरह किया जा रहा है कि SGNP के sensitive forest area में surface-level construction का impact कम से कम रहे।

    पहली TBM की assembly पूरी हो चुकी थी और उसका Site Acceptance Test भी successfully complete किया गया। अब यही machine underground excavation का actual काम शुरू कर चुकी है। दूसरी TBM की assembly अभी चल रही है और BMC के मुताबिक उससे October 2026 में excavation शुरू करने का target है।

    जंगल के नीचे tunnel बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?

    GMLR का सबसे sensitive हिस्सा SGNP के नीचे से गुजरता है। जमीन के ऊपर बड़ी road बनाने से forest और biodiversity पर ज्यादा disturbance हो सकता था। इसलिए tunnel boring technology के जरिए road को underground ले जाने का रास्ता चुना गया है। पुराने project documents में भी SGNP के अंदर किसी shaft की जरूरत न पड़े, इसके लिए TBM-based tunnelling का प्रस्ताव रखा गया था।

    SGNP में Tulsi और Vihar lakes भी हैं, जो Mumbai की water supply का हिस्सा हैं। इसलिए इस project में tunnel construction के दौरान environment और water-related concerns को लेकर safeguards खास महत्व रखते हैं।

    यही वजह है कि इस project की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ चट्टान काटकर tunnel बनाना नहीं, बल्कि sensitive forest और आसपास के ecological system को ध्यान में रखते हुए construction पूरा करना भी है।

    Tunnel के अंदर safety का क्या इंतजाम होगा?

    इतनी लंबी underground road tunnel में सिर्फ road बना देना काफी नहीं है। किसी accident, fire या emergency की situation में लोगों को safe तरीके से बाहर निकालना भी जरूरी है।

    GMLR tunnel में mechanical ventilation, mist-based firefighting system, CCTV surveillance, SCADA control system, LED lighting और modern signage लगाए जाएंगे। दोनों tunnels के बीच 17 cross passages भी होंगे। इनका मकसद emergency situation में एक tunnel से दूसरी tunnel तक access और evacuation की सुविधा देना है।

    Tunnel में utility ducts भी रखे जाएंगे और हर tunnel में 1,800 mm diameter की water pipeline के लिए provision किया गया है। यानी underground corridor का इस्तेमाल सिर्फ traffic movement तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि city utilities के लिए भी space रखा गया है।

    Goregaon से Mulund का सफर कितना बदल सकता है?

    GMLR का सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को मिलने की उम्मीद है जिन्हें रोज western suburbs से eastern suburbs की तरफ जाना पड़ता है।

    अभी Goregaon, Jogeshwari, Powai, Mulund और आसपास के routes पर traffic के कारण east-west movement काफी समय ले सकता है। GMLR के जरिए एक direct high-capacity corridor मिलने से existing roads पर traffic pressure कम करने का target है।

    Project operational होने के बाद Goregaon-Mulund journey करीब 20 मिनट तक आने की उम्मीद है। इससे travel time के साथ fuel consumption में भी कमी आ सकती है। लेकिन actual journey time इस बात पर भी depend करेगा कि tunnel के entry-exit points, approach roads और आगे के connecting roads पर उस समय कितना traffic है।

    Mumbai के लिए इसका फायदा सिर्फ Goregaon और Mulund तक नहीं

    GMLR का असर सिर्फ इन दो इलाकों तक सीमित नहीं रहने वाला। यह western suburbs को eastern side के Mulund, Thane और आगे Navi Mumbai की तरफ जाने वाले road network से बेहतर तरीके से connect करने में मदद कर सकता है।

    इससे उन commuters को भी फायदा मिलने की उम्मीद है जिन्हें रोज east-west direction में travel करना पड़ता है। Emergency services, logistics और commercial movement के लिए भी faster connectivity महत्वपूर्ण हो सकती है।

    Project से प्रभावित लोगों का क्या होगा?

    GMLR की construction के कारण प्रभावित होने वाले करीब 906 project-affected persons के rehabilitation का काम भी project का हिस्सा है। BMC के मुताबिक Kanjurmarg में छह ground-plus-23-storey buildings में इनका rehabilitation किया जा रहा है।

    इसका मतलब GMLR की कहानी सिर्फ road और tunnel की नहीं है। Project के साथ उन लोगों का rehabilitation भी जुड़ा है जिनकी property या रहने की जगह infrastructure work से प्रभावित हुई है।

    दूसरा TBM कब शुरू होगा और पूरा project कब मिलेगा?

    पहली TBM Tulsi ने excavation शुरू कर दिया है। दूसरी TBM की assembly चल रही है और BMC ने October 2026 में उसकी excavation शुरू करने का target रखा है।

    पूरे GMLR project को February 2029 तक complete करने का target रखा गया है। BMC के मुताबिक project में अब तक करीब 21% physical progress हो चुकी है।

    यानी अभी Mumbai commuters को 20 मिनट के सफर का फायदा तुरंत नहीं मिलने वाला। पहले tunnels की excavation और lining, cross passages, approach roads, ventilation, firefighting, CCTV, lighting और बाकी systems का काम पूरा होगा। उसके बाद testing और commissioning के बाद यह corridor traffic के लिए open किया जाएगा।

    GMLR की असली परीक्षा अब शुरू हुई है

    Goregaon-Mulund Link Road लंबे समय से Mumbai के बड़े connectivity projects में शामिल है, लेकिन अब इसका सबसे challenging underground phase जमीन पर दिखाई देने लगा है।

    TBM Tulsi के शुरू होने का मतलब है कि project अब planning और preparation से निकलकर actual tunnelling phase में पहुंच गया है। आगे दूसरी TBM का काम शुरू होना, दोनों tunnels की excavation पूरी होना और बाकी road infrastructure का समय पर तैयार होना सबसे अहम रहेगा।

    अगर BMC का February 2029 वाला target पूरा होता है, तो Mumbai को western और eastern suburbs के बीच एक नया direct high-capacity route मिलेगा। और अगर travel-time estimate के मुताबिक सफर करीब 20 मिनट तक आता है, तो Goregaon-Mulund के बीच रोज travel करने वाले हजारों लोगों के लिए यह सिर्फ एक नई road नहीं, बल्कि daily commute में बड़ा बदलाव हो सकता है।

  • मालाड में सड़कों और खेल मैदान को लेकर मनपा से बड़ी मांग

    मालाड में सड़कों और खेल मैदान को लेकर मनपा से बड़ी मांग

    मालाड में आनंद रोड और साईनाथ रोड के चौड़ीकरण के साथ चिंचोली बंदर खेल मैदान के विकास की मांग उठी। RPI (आ) ने मनपा पी-उत्तर के सहायक आयुक्त को ज्ञापन सौंपा।

    मुंबई: मालाड (पश्चिम) में आनंद रोड और साईनाथ रोड के चौड़ीकरण सहित चिंचोली बंदर रोड स्थित खेल मैदान के संरक्षण और विकास की मांग को लेकर रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आठवले गुट) के पदाधिकारियों ने मनपा पी-उत्तर विभाग के सहायक आयुक्त कुंदन वलवी से मुलाकात की। शिष्टमंडल ने इलाके की नागरिक समस्याओं पर चर्चा करते हुए सहायक आयुक्त को अपनी मांग पत्र सौंपा।

    बैठक में आनंद रोड और साईनाथ रोड के विस्तारीकरण का लंबे समय से लंबित मामला प्रमुखता से उठाया गया। RPI (आ) के पदाधिकारियों ने मांग की कि इन दोनों सड़कों के चौड़ीकरण का काम जल्द से जल्द पूरा किया जाए, ताकि इलाके के नागरिकों को इसका फायदा मिल सके।

    इसके अलावा चिंचोली बंदर रोड स्थित खेल मैदान के संरक्षण और विकास का मुद्दा भी उठाया गया। शिष्टमंडल ने कहा कि खेल मैदान के साथ-साथ इलाके में पड़ी अन्य सरकारी खाली जमीन का भी सही तरीके से इस्तेमाल होना चाहिए। इसके लिए मनपा प्रशासन को तत्काल जरूरी कदम उठाने की मांग की गई।

    पहले भी हो चुका है पत्राचार

    RPI (आ) के उत्तर मुंबई जिला सचिव विनोद घोलप की ओर से इस मामले को लेकर पहले भी मनपा प्रशासन के साथ पत्राचार किया गया था। इतना ही नहीं, समाचार पत्रों के माध्यम से भी इस मुद्दे को सामने लाया गया था। इसके बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने पर शिष्टमंडल ने एक बार फिर मनपा प्रशासन का ध्यान इस ओर दिलाया।

    शिष्टमंडल ने सहायक आयुक्त कुंदन वलवी से कहा कि सड़क चौड़ीकरण और खेल मैदान से जुड़े मामलों को सिर्फ कागजी कार्रवाई तक सीमित न रखा जाए, बल्कि जमीन पर भी जल्द काम दिखाई देना चाहिए।

    सहायक आयुक्त ने दिया कार्रवाई का भरोसा

    मांगों पर चर्चा के बाद सहायक आयुक्त कुंदन वलवी ने सकारात्मक विचार करने और आवश्यक कार्रवाई किए जाने का आश्वासन दिया। खेल मैदान के मामले में संबंधित विभागों के माध्यम से उचित कार्रवाई करने की बात भी कही गई।

    अब स्थानीय नागरिकों की नजर इस बात पर है कि लंबे समय से लंबित आनंद रोड और साईनाथ रोड के चौड़ीकरण तथा चिंचोली बंदर खेल मैदान के विकास को लेकर मनपा प्रशासन आगे क्या कदम उठाता है।

    इस दौरान RPI (आ) के जिला कोषाध्यक्ष ओम यादव, मुंबई सचिव आशीष सिंह, जिला उपाध्यक्ष सुदन कांबले, वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र राजभर, दैनिक पब्लिक भारत के संपादक शिवकुमार सोनी, पत्रकार एवं समाजसेवक नंदू अहिरे और सुनील जोंधले सहित अन्य पदाधिकारी मौजूद रहे।

  • BMC का बड़ा फैसला: 3 दिन में जन्म-मृत्यु और विवाह प्रमाणपत्र, पुराने प्रमाणपत्र को भी QR वाला बना सकेंगे

    BMC का बड़ा फैसला: 3 दिन में जन्म-मृत्यु और विवाह प्रमाणपत्र, पुराने प्रमाणपत्र को भी QR वाला बना सकेंगे

    मुंबई में BMC ने जन्म, मृत्यु और विवाह प्रमाणपत्र की प्रक्रिया आसान की है। जानिए 3 दिन की समयसीमा, QR प्रमाणपत्र और सुधार की पूरी जानकारी।

    मुंबई: मुंबईकरों के लिए जन्म, मृत्यु और विवाह प्रमाणपत्र से जुड़ी प्रक्रिया अब पहले के मुकाबले आसान और तेज होने जा रही है। बीएमसी ने नए जन्म, मृत्यु और विवाह प्रमाणपत्र के आवेदनों को तीन कार्य दिवस में निपटाने की व्यवस्था की है। जन्म प्रमाणपत्र में बच्चे का नाम जोड़ने की सुविधा भी तीन कार्य दिवस में देने का लक्ष्य रखा गया है।

    हालांकि, यहां एक बात समझना जरूरी है। तीन दिन की समयसीमा पुराने प्रमाणपत्र को क्यूआर कोड वाले नए प्रमाणपत्र में बदलने या जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र में सुधार के लिए नहीं है। इन मामलों में ज्यादा समय लग सकता है।

    बीएमसी की यह नई व्यवस्था ऐसे समय में आई है जब मुंबई में जन्म प्रमाणपत्रों की लंबित अर्जियों, पुराने रिकॉर्ड को डिजिटल करने और क्यूआर कोड वाले प्रमाणपत्र की बढ़ती मांग को लेकर नागरिकों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा था।

    अब नए प्रमाणपत्र के लिए क्या होगा?

    बीएमसी के वार्ड कार्यालय में मौजूद नागरी सुविधा केंद्र यानी सीएफसी के जरिए जन्म और मृत्यु पंजीकरण पोर्टल पर प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किया जा सकेगा। प्रमाणपत्र में सुधार के लिए भी आवेदन की सुविधा इसी व्यवस्था के जरिए उपलब्ध होगी।

    आवेदन जमा करने के बाद नागरिक को यूनिक पहचान संख्या वाली पावती दी जाएगी। इस पहचान संख्या से आवेदन की स्थिति की जानकारी ली जा सकेगी।

    इससे नागरिकों को यह पता लगाने में आसानी होगी कि उनका आवेदन किस स्थिति में है और उसे लेकर बार-बार कार्यालय के चक्कर लगाने की जरूरत कम हो सकती है।

    मुंबई BMC का वृक्ष संजीवनी अभियान, मालाड़ के स्कूली बच्चों ने ली ट्रेनिंग

    तीन दिन में कौन-कौन से प्रमाणपत्र मिलेंगे?

    नई व्यवस्था के तहत नए आवेदन वाले:

    • जन्म प्रमाणपत्र
    • मृत्यु प्रमाणपत्र
    • विवाह प्रमाणपत्र

    को तीन कार्य दिवस में जारी करने की व्यवस्था की गई है।

    जन्म प्रमाणपत्र में बच्चे का नाम दर्ज कराने की सुविधा भी तीन कार्य दिवस में उपलब्ध कराने की बात कही गई है।

    यानी अगर किसी बच्चे का जन्म दर्ज हो चुका है लेकिन प्रमाणपत्र में नाम दर्ज नहीं है, तो उसके लिए भी अलग से लंबी प्रक्रिया का सामना नहीं करना पड़ेगा।

    पुराने जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र का क्या होगा?

    मुंबई में बड़ी संख्या में लोगों के पास पुराने समय के कागजी या हस्तलिखित जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र हैं। ऐसे लोगों के लिए बीएमसी ने पुराने प्रमाणपत्र को क्यूआर कोड वाले नए प्रमाणपत्र में बदलने की सुविधा शुरू की है।

    इसके लिए सीएफसी में अलग खिड़की उपलब्ध कराई गई है।

    पुराने प्रमाणपत्र की मूल प्रति जमा करनी होगी। इसके बाद बीएमसी अपने विभागीय रिकॉर्ड से उसकी जानकारी का मिलान करेगी।

    सामान्य स्थिति में पुराने जन्म या मृत्यु प्रमाणपत्र को क्यूआर कोड वाले नए प्रमाणपत्र में बदलने की प्रक्रिया करीब 25 कार्य दिवस में पूरी करने का प्रयास किया जाएगा।

    लेकिन अगर रिकॉर्ड बहुत पुराना है, स्थानीय कार्यालय में उपलब्ध नहीं है या उसे खोजने में परेशानी आती है, तो इसमें ज्यादा समय लग सकता है।

    इसलिए पुराने प्रमाणपत्र के मामले में तीन दिन वाली समयसीमा लागू समझना सही नहीं होगा।

    क्यूआर कोड वाला प्रमाणपत्र क्यों जरूरी हो रहा है?

    क्यूआर कोड वाला प्रमाणपत्र सिर्फ नया दिखने वाला कागज नहीं है। इसका एक बड़ा फायदा दस्तावेज की जानकारी को डिजिटल रिकॉर्ड से सत्यापित करने में हो सकता है।

    देश के कई नगर निकायों में क्यूआर कोड के जरिए प्रमाणपत्र की प्रामाणिकता जांचने की व्यवस्था शुरू की जा चुकी है। इससे फर्जी प्रमाणपत्रों की पहचान करने और सरकारी रिकॉर्ड का सत्यापन आसान हो सकता है।

    मुंबई में भी इसकी जरूरत खास तौर पर उन लोगों को महसूस हो रही है जिन्हें जन्म प्रमाणपत्र का इस्तेमाल पासपोर्ट, विदेश में पढ़ाई, वीजा या दूसरे जरूरी दस्तावेजी कामों में करना पड़ता है।

    हालांकि, यह मान लेना सही नहीं होगा कि हर काम के लिए क्यूआर प्रमाणपत्र अनिवार्य है। किसी खास विभाग की अपनी अलग दस्तावेजी जरूरत हो सकती है।

    जन्म प्रमाणपत्र में किन चीजों में सुधार कराया जा सकता है?

    बीएमसी की नई व्यवस्था में जन्म प्रमाणपत्र से जुड़े कई तरह के सुधार के आवेदन स्वीकार किए जाएंगे।

    इनमें बच्चे के:

    • नाम में सुधार
    • पता बदलना
    • जन्म तारीख से जुड़ा सुधार
    • लिंग संबंधी सुधार

    जैसे मामले शामिल हैं।

    लेकिन इन सुधारों के लिए तीन कार्य दिवस वाली सुविधा लागू नहीं है। बीएमसी के मुताबिक ऐसे जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र सुधार मामलों के निपटारे के लिए करीब 25 कार्य दिवस की व्यवस्था है।

    मृत्यु प्रमाणपत्र में भी सुधार की सुविधा

    अगर मृत्यु प्रमाणपत्र में जानकारी गलत दर्ज हो गई है तो उसके सुधार के लिए भी सीएफसी के जरिए आवेदन किया जा सकेगा।

    यह सुविधा उन परिवारों के लिए खास तौर पर काम की हो सकती है जिन्हें मृत्यु प्रमाणपत्र का इस्तेमाल बैंक, बीमा, पेंशन, संपत्ति या दूसरे सरकारी कामों में करना पड़ता है।

    मृत्यु प्रमाणपत्र में किसी गलती के कारण परिवार को आगे की प्रक्रिया रोकनी पड़ती है। ऐसे मामलों में आवेदन की स्थिति पता चलना और तय समयसीमा मिलना नागरिकों के लिए राहत की बात है।

    विवाह प्रमाणपत्र में सुधार कितने दिन में होगा?

    विवाह प्रमाणपत्र में सुधार के मामलों के लिए बीएमसी ने तीन कार्य दिवस में आवेदन निपटाने की व्यवस्था बताई है।

    यह उन लोगों के लिए उपयोगी होगा जिन्हें विवाह प्रमाणपत्र में दर्ज जानकारी में सुधार कराने की जरूरत है और आगे किसी सरकारी या कानूनी काम के लिए सही प्रमाणपत्र चाहिए।

    बीएमसी ने सीएफसी पर क्या बदलाव करने को कहा?

    बीएमसी कमिश्नर अश्विनी भिडे ने इस नई व्यवस्था को लेकर लोगों में ज्यादा से ज्यादा जानकारी पहुंचाने के निर्देश दिए हैं।

    सीएफसी में अलग-अलग सेवाओं और आवेदन की प्रक्रिया की जानकारी देने वाले नोटिस बोर्ड लगाने के भी निर्देश दिए गए हैं।

    इसका फायदा यह होगा कि नागरिकों को आवेदन से पहले यह पता चल सके कि किस सेवा के लिए कहां और किस तरह आवेदन करना है।

    क्या अब बीएमसी कार्यालय के चक्कर कम होंगे?

    यही इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा हो सकता है।

    पहले प्रमाणपत्र के लिए आवेदन करने के बाद नागरिकों को यह पता नहीं रहता था कि उनका आवेदन किस स्थिति में है और काम कब तक होगा। ऐसे में कई बार उन्हें सीएफसी या संबंधित कार्यालय में जाकर जानकारी लेनी पड़ती थी।

    अब यूनिक पहचान संख्या और आवेदन की स्थिति देखने की सुविधा से यह प्रक्रिया ज्यादा पारदर्शी हो सकती है।

    लेकिन असली बदलाव तभी माना जाएगा जब तय समयसीमा जमीन पर भी लागू हो और पुराने रिकॉर्ड वाले मामलों में अनावश्यक देरी कम हो।

    मुंबई में क्यूआर प्रमाणपत्र की मांग क्यों बढ़ी?

    बीएमसी पहले से ही जन्म प्रमाणपत्रों की लंबित अर्जियों को कम करने के लिए डिजिटल व्यवस्था, अतिरिक्त कर्मचारियों और सीएफसी की सेवाओं को बेहतर करने की दिशा में काम कर रही है।

    क्यूआर कोड वाले प्रमाणपत्रों की मांग भी बढ़ी है। खासकर शिक्षा, पासपोर्ट और विदेश जाने से जुड़े कामों में दस्तावेजों के सत्यापन की जरूरत ज्यादा होती है।

    यही वजह है कि पुराने प्रमाणपत्रों को भी नए क्यूआर कोड वाले प्रमाणपत्र में बदलने की सुविधा महत्वपूर्ण बन गई है।

    देश में भी बदल रहा है प्रमाणपत्रों का तरीका

    मुंबई का यह कदम अकेला बदलाव नहीं है। देश के दूसरे शहरों में भी जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र को डिजिटल बनाने, ऑनलाइन उपलब्ध कराने और क्यूआर कोड के जरिए उसकी प्रामाणिकता जांचने की व्यवस्था बढ़ रही है।

    दिल्ली में नगर निकाय की सेवाओं को डिजिटल लॉकर जैसी डिजिटल व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में भी काम चल रहा है। इसका मकसद नागरिकों को प्रमाणपत्र आसानी से उपलब्ध कराना और उनके सत्यापन को तेज करना है।

    यानी आने वाले समय में जन्म, मृत्यु और विवाह जैसे प्रमाणपत्र सिर्फ कागज पर निर्भर दस्तावेज नहीं रहेंगे, बल्कि उनका डिजिटल रिकॉर्ड और ऑनलाइन सत्यापन भी ज्यादा महत्वपूर्ण होगा।

    आम मुंबईकर पर क्या असर पड़ेगा?

    इस बदलाव का सबसे सीधा असर उन परिवारों पर पड़ेगा जिन्हें किसी जरूरी काम के लिए प्रमाणपत्र जल्दी चाहिए।

    बच्चे के स्कूल या आगे की पढ़ाई से जुड़े काम, पासपोर्ट, विदेश जाने की तैयारी, बैंक और बीमा के काम या परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु के बाद जरूरी कागजी प्रक्रिया—इन सभी मामलों में प्रमाणपत्र समय पर मिलना काफी महत्वपूर्ण होता है।

    अगर बीएमसी की तीन कार्य दिवस वाली समयसीमा सही तरीके से लागू होती है तो नागरिकों का समय बचेगा और कार्यालयों के चक्कर भी कम हो सकते हैं।

    दूसरी तरफ, पुराने रिकॉर्ड को डिजिटल करने में रिकॉर्ड उपलब्ध न होने की समस्या अभी भी चुनौती बनी रहेगी।

    सबसे जरूरी बात: तीन दिन वाली खबर को ऐसे समझें

    मुंबईकरों को इस नई व्यवस्था को लेकर तीन अलग-अलग समयसीमा याद रखनी चाहिए:

    नया जन्म, मृत्यु और विवाह प्रमाणपत्र — तीन कार्य दिवस।

    जन्म प्रमाणपत्र में बच्चे का नाम दर्ज करना — तीन कार्य दिवस।

    जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र में सुधार और पुराने प्रमाणपत्र को क्यूआर वाले प्रमाणपत्र में बदलना — सामान्य मामलों में करीब 25 कार्य दिवस।

    पुराना रिकॉर्ड बीएमसी के रिकॉर्ड में नहीं मिलता है या उसे खोजने में परेशानी होती है तो इसमें और समय लग सकता है।

    अब असली नजर बीएमसी की कार्यप्रणाली पर

    बीएमसी ने समयसीमा तय करके नागरिकों की एक बड़ी परेशानी को कम करने की कोशिश की है। लेकिन इस फैसले की असली परीक्षा अब शुरू होगी।

    मुंबई जैसे बड़े शहर में रोजाना बड़ी संख्या में जन्म, मृत्यु और विवाह से जुड़े आवेदन आते हैं। ऐसे में तीन कार्य दिवस की समयसीमा तभी सफल होगी जब सीएफसी में पर्याप्त कर्मचारी हों, पुराने रिकॉर्ड आसानी से मिलें और डिजिटल व्यवस्था बिना रुकावट काम करे।

    फिलहाल मुंबईकरों के लिए सबसे बड़ी राहत यह है कि प्रमाणपत्र के आवेदन को लेकर समयसीमा और आवेदन की स्थिति जानने की व्यवस्था पहले से ज्यादा साफ की जा रही है।

    और अगर आपके पास कोई बहुत पुराना जन्म या मृत्यु प्रमाणपत्र है, तो उसे आखिरी समय तक संभालकर रखने के बजाय यह जांच लेना बेहतर होगा कि उसे क्यूआर कोड वाले नए प्रमाणपत्र में बदलने की जरूरत है या नहीं।

  • महापौर बंगले पर फिर करोड़ों का खर्च? कुछ ही महीनों में BMC के नए टेंडर से उठे बड़े सवाल

    महापौर बंगले पर फिर करोड़ों का खर्च? कुछ ही महीनों में BMC के नए टेंडर से उठे बड़े सवाल

    कुछ महीने पहले करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद BMC ने मुंबई महापौर के आधिकारिक हेरिटेज बंगले के लिए फिर करीब ₹3 करोड़ का नया टेंडर जारी किया है। आखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ी? जानिए पूरा मामला।

    मुंबई: मुंबई में सार्वजनिक धन के इस्तेमाल को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) ने मुंबई महापौर के आधिकारिक हेरिटेज बंगले के लिए करीब ₹2.9 करोड़ (लगभग ₹3 करोड़) का नया टेंडर जारी किया है। हैरानी की बात यह है कि इसी बंगले पर कुछ महीने पहले ही करोड़ों रुपये खर्च कर व्यापक मरम्मत और नवीनीकरण का काम कराया गया था। ऐसे में नया टेंडर सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों से लेकर आम मुंबईकरों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर इतने कम समय में दोबारा करोड़ों रुपये खर्च करने की जरूरत क्यों पड़ गई।

    BMC का कहना है कि यह कोई साधारण सरकारी आवास नहीं, बल्कि एक संरक्षित हेरिटेज इमारत है। इसलिए इसके संरक्षण, संरचनात्मक मजबूती और लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए अतिरिक्त तकनीकी कार्य जरूरी हैं। दूसरी ओर विपक्षी दल, RTI कार्यकर्ता और कई नागरिक इस पूरे खर्च की पारदर्शिता पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि हाल ही में बड़े पैमाने पर रेनोवेशन किया गया था, तो अब नए टेंडर की आवश्यकता और उसके दायरे को स्पष्ट किया जाना चाहिए।

    आखिर कौन-सा है यह महापौर बंगला?

    इस खबर को लेकर सोशल मीडिया पर एक भ्रम भी देखने को मिला। कई लोग इसे दादर के शिवाजी पार्क स्थित पुराने महापौर बंगले से जोड़ रहे हैं, जबकि नया टेंडर भायखला स्थित वीरमाता जीजाबाई भोसले उद्यान (रानी बाग) परिसर में मौजूद BMC के आधिकारिक हेरिटेज बंगले से संबंधित है।

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    भायखला स्थित वीरमाता जीजाबाई भोसले उद्यान (रानी बाग) परिसर में मौजूद हेरिटेज बंगले की तस्वीर

    यह इमारत ब्रिटिश काल की विरासत संरचनाओं में गिनी जाती है और वर्षों तक खाली पड़ी रही। हाल ही में इसे मुंबई महापौर के आधिकारिक निवास के रूप में तैयार करने का निर्णय लिया गया। चूंकि यह हेरिटेज भवन है, इसलिए यहां किसी भी निर्माण या मरम्मत का कार्य सामान्य सरकारी इमारतों की तुलना में अधिक तकनीकी प्रक्रिया और संरक्षण मानकों के तहत किया जाता है।

    यही कारण है कि BMC इस पूरे रेनोवेशन को “हेरिटेज कंजर्वेशन” का हिस्सा बता रही है। हालांकि इसी दलील के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि कुछ महीने पहले किए गए कार्य और अब प्रस्तावित नए कार्यों में वास्तविक अंतर क्या है।

    कैसे बढ़ती गई लागत? पूरी टाइमलाइन समझिए

    इस पूरे मामले को समझने के लिए पिछले कुछ महीनों की घटनाओं पर नजर डालना जरूरी है।

    मार्च 2026

    महापौर के आधिकारिक बंगले के व्यापक नवीनीकरण का पहला प्रस्ताव सामने आया। शुरुआती अनुमान करीब ₹1.5 करोड़ का था। उस समय कहा गया कि लंबे समय से खाली पड़े हेरिटेज भवन को रहने योग्य बनाने और उसकी मूल संरचना को सुरक्षित रखने के लिए विशेष मरम्मत आवश्यक है।

    अप्रैल 2026

    रेनोवेशन का दायरा बढ़ा और प्रस्तावित लागत में भी वृद्धि हुई। इसके बाद व्यापक मरम्मत, इंटीरियर अपग्रेड और हेरिटेज संरक्षण के कार्यों को मंजूरी मिली। प्राप्त जानकारी के अनुसार इसी चरण में करोड़ों रुपये के कार्य स्वीकृत किए गए।

    अगले कुछ महीने

    करीब ₹2.4 करोड़ की लागत से पहले चरण का कार्य पूरा होने की जानकारी सामने आई। इस दौरान भवन की संरचना मजबूत करने, इंटीरियर सुधारने और आधुनिक सुविधाएं विकसित करने का काम किया गया।

    अगस्त 2026

    काम पूरा होने के कुछ ही महीने बाद BMC ने करीब ₹2.9 करोड़ का नया टेंडर जारी कर दिया। यहीं से विवाद की शुरुआत हुई। विपक्ष और RTI कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाया कि आखिर पहले चरण में कौन-कौन से काम पूरे हुए थे और अब किन नए कार्यों के लिए दोबारा इतनी बड़ी राशि खर्च की जा रही है।

    पहले चरण में क्या-क्या काम किए गए थे?

    उपलब्ध जानकारी और प्रस्तावों के अनुसार पहले रेनोवेशन में केवल पेंटिंग या सामान्य मरम्मत नहीं हुई थी, बल्कि कई बड़े कार्य शामिल थे। इनमें—

    • भवन की संरचनात्मक मजबूती
    • लकड़ी के हिस्सों की मरम्मत
    • आधुनिक किचन का निर्माण
    • अतिरिक्त बेडरूम और बाथरूम
    • मीटिंग रूम का विकास
    • इटालियन मार्बल फ्लोरिंग
    • एंटीक झूमर (Chandeliers)
    • वेनेशियन ब्लाइंड्स
    • इलेक्ट्रिकल सिस्टम का अपग्रेड
    • हेरिटेज इंटीरियर का संरक्षण

    जैसे काम शामिल बताए गए थे।

    इन कार्यों को देखते हुए अब सबसे बड़ा सवाल यही बनता है कि यदि इतने व्यापक स्तर पर रेनोवेशन हो चुका था, तो नए टेंडर में ऐसा कौन-सा अतिरिक्त काम शामिल है, जिसकी वजह से फिर करीब ₹3 करोड़ खर्च करने की आवश्यकता पड़ रही है।

    नए टेंडर में क्या प्रस्तावित है?

    BMC के ताजा टेंडर के अनुसार इस चरण में मुख्य रूप से—

    • संरचनात्मक मरम्मत (Structural Repairs)
    • हेरिटेज बहाली (Heritage Restoration)
    • आंतरिक सुधार (Interior Improvements)
    • रखरखाव से जुड़े अतिरिक्त कार्य
    • सिविल और संरचनात्मक अपग्रेड

    जैसे कार्य प्रस्तावित हैं।

    हालांकि अभी तक BMC ने सार्वजनिक रूप से दोनों चरणों के कार्यों की विस्तृत तुलना जारी नहीं की है। इसी वजह से यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि पहले किए गए कार्यों से अलग इस बार कौन-कौन से नए काम प्रस्तावित हैं और कितनी लागत किस मद में खर्च की जाएगी।

    यहीं से शुरू होता है सबसे बड़ा सवाल

    सार्वजनिक धन से होने वाले किसी भी बड़े सरकारी खर्च में पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण होती है। यही वजह है कि इस पूरे मामले में नागरिकों का ध्यान अब केवल ₹3 करोड़ के नए टेंडर पर नहीं, बल्कि पहले और दूसरे चरण के बीच अंतर पर है।

    यदि पहले चरण में भवन की संरचनात्मक मरम्मत, इंटीरियर विकास और हेरिटेज संरक्षण का बड़ा हिस्सा पूरा हो चुका था, तो क्या नए टेंडर में वास्तव में ऐसे अतिरिक्त कार्य शामिल हैं जो पहले नहीं किए गए थे? या फिर यह पहले से स्वीकृत कार्यों का ही विस्तार है?

    इन सवालों के जवाब अभी स्पष्ट रूप से सार्वजनिक नहीं हुए हैं। यही कारण है कि अब इस पूरे मामले की चर्चा केवल एक सरकारी टेंडर तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि सार्वजनिक धन के उपयोग और प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़े बड़े मुद्दे के रूप में देखी जा रही है।

    BMC का पक्ष: “हेरिटेज भवन है, इसलिए अतिरिक्त काम जरूरी”

    नए टेंडर पर उठ रहे सवालों के बीच BMC अधिकारियों का कहना है कि महापौर का यह बंगला एक संरक्षित हेरिटेज भवन है। ऐसे भवनों की मरम्मत सामान्य सरकारी इमारतों की तरह नहीं की जा सकती। हर चरण में विशेषज्ञों की सलाह, संरचनात्मक जांच और हेरिटेज संरक्षण के नियमों का पालन करना पड़ता है।

    अधिकारियों के अनुसार, नए टेंडर का उद्देश्य भवन की मूल पहचान को सुरक्षित रखते हुए उसकी संरचनात्मक मजबूती बढ़ाना, संरक्षण संबंधी अतिरिक्त कार्य करना और लंबे समय तक भवन को सुरक्षित रखना है।

    हालांकि अब तक BMC ने यह विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की है कि पहले चरण में पूरा हुआ काम और नए टेंडर में प्रस्तावित कार्य एक-दूसरे से किस प्रकार अलग हैं। यही वजह है कि पारदर्शिता को लेकर सवाल लगातार उठ रहे हैं।

    विपक्ष ने क्यों घेरा BMC?

    इस पूरे मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है।

    विपक्षी दलों का कहना है कि यदि कुछ महीने पहले ही करोड़ों रुपये खर्च कर रेनोवेशन पूरा हो चुका था, तो अब नए टेंडर की आवश्यकता का विस्तृत तकनीकी आधार सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

    शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने आरोप लगाया कि बंगला वर्षों तक खाली पड़ा रहा और समय पर रखरखाव नहीं होने के कारण अब एक साथ करोड़ों रुपये खर्च करने की नौबत आई है।

    वहीं सत्तापक्ष का कहना है कि हेरिटेज भवनों के संरक्षण में कई बार चरणबद्ध तरीके से काम करना पड़ता है और अतिरिक्त तकनीकी आवश्यकताओं के कारण लागत बढ़ सकती है।

    यानी इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों की राय अलग-अलग है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच बहस का केंद्र सरकारी खर्च और उसकी आवश्यकता ही बनी हुई है।

    RTI कार्यकर्ताओं ने किन सवालों की मांग उठाई?

    इस पूरे मामले में RTI कार्यकर्ता अनिल गलगली ने भी कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं।

    उनका कहना है कि नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि—

    • पहले चरण में किन-किन कार्यों पर कितना खर्च हुआ?
    • कौन-सा ठेकेदार नियुक्त किया गया?
    • कार्य पूरा होने का प्रमाणपत्र (Completion Certificate) कब जारी हुआ?
    • क्या तकनीकी निरीक्षण के बाद ही नया टेंडर निकाला गया?
    • नए टेंडर में ऐसा क्या अतिरिक्त है जो पहले नहीं था?

    RTI कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि ये दस्तावेज़ सार्वजनिक किए जाएं, तो पूरा मामला स्वतः स्पष्ट हो जाएगा।

    क्या दोनों टेंडरों में एक जैसे काम हैं?

    यही इस पूरी मुद्दे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

    फिलहाल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना संभव नहीं है कि दोनों टेंडरों में शामिल कार्य पूरी तरह समान हैं या नहीं।

    इसके पीछे कारण भी स्पष्ट है।

    BMC ने अभी तक दोनों टेंडरों का Bill of Quantities (BOQ), विस्तृत कार्य सूची और तुलना सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं कराई है।

    ऐसे में यह दावा करना कि दोनों टेंडरों में एक ही काम दोबारा कराया जा रहा है, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

    लेकिन यह सवाल जरूर उठ रहा है कि—

    यदि पहले चरण में—

    • संरचनात्मक मरम्मत,
    • लकड़ी का संरक्षण,
    • इंटीरियर सुधार,
    • इलेक्ट्रिकल अपग्रेड,
    • हेरिटेज रिस्टोरेशन

    जैसे कार्य हो चुके थे, तो नए टेंडर में इनसे अलग कौन-से अतिरिक्त कार्य शामिल हैं?

    यही वह जानकारी है जिसका इंतजार राजनीतिक दलों, RTI कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों को है।

    सोशल मीडिया पर हंगामा

    इस खबर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी बहस तेज हो गई।

    कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि—

    • “क्या कुछ महीने पहले किया गया काम पर्याप्त नहीं था?”
    • “क्या सार्वजनिक धन का बेहतर उपयोग हो सकता था?”
    • “क्या BMC दोनों टेंडरों का पूरा विवरण सार्वजनिक करेगी?”

    हालांकि सोशल मीडिया पर व्यक्त की गई राय व्यक्तिगत विचार हैं। इन्हें आधिकारिक तथ्य नहीं माना जा सकता, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि इस मुद्दे को लेकर लोगों में जिज्ञासा और सवाल दोनों मौजूद हैं।

    पहली नजर में यह केवल महापौर के सरकारी आवास का मामला लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह सार्वजनिक धन के उपयोग से जुड़ा विषय है।

    मुंबई जैसे शहर में हर साल हजारों करोड़ रुपये नागरिक सुविधाओं पर खर्च किए जाते हैं।

    ऐसे में जब किसी सरकारी भवन पर कम समय में दो बार करोड़ों रुपये खर्च होने की खबर सामने आती है, तो स्वाभाविक रूप से नागरिक यह जानना चाहते हैं कि—

    • क्या यह खर्च पूरी तरह आवश्यक था?
    • क्या इसका तकनीकी आधार मौजूद है?
    • क्या पहले चरण में किए गए कार्य पर्याप्त नहीं थे?

    इन्हीं सवालों के जवाब पारदर्शिता तय करते हैं।

    आगे क्या हो सकता है?

    इस मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ होंगे—

    • नए टेंडर का विस्तृत BOQ
    • पहले रेनोवेशन का BOQ
    • Work Order
    • Completion Certificate
    • Final Measurement Book
    • तकनीकी निरीक्षण रिपोर्ट

    यदि ये दस्तावेज़ सार्वजनिक होते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि नया टेंडर पहले किए गए कार्यों का विस्तार है या पूरी तरह अलग कार्यों के लिए जारी किया गया है।

    यही दस्तावेज़ आगे किसी भी राजनीतिक या प्रशासनिक बहस का आधार बन सकते हैं।

    Indian Fasttrack Analysis

    इस पूरे मामले में फिलहाल दो बातें एक साथ सच हैं।

    पहली—BMC का कहना है कि यह एक हेरिटेज भवन है और उसके संरक्षण के लिए अतिरिक्त कार्य आवश्यक हैं।

    दूसरी—कुछ महीने पहले करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद फिर नया टेंडर जारी होने से नागरिकों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।

    इन दोनों बातों के बीच अंतिम निष्कर्ष तभी निकलेगा, जब BMC दोनों चरणों के कार्यों का विस्तृत तकनीकी विवरण सार्वजनिक करेगी।

    फिलहाल उपलब्ध आधिकारिक जानकारी यही बताती है कि नया टेंडर जारी हो चुका है, लेकिन यह स्पष्ट होना अभी बाकी है कि पहले हुए कार्यों की तुलना में इस बार क्या नया किया जाएगा।

    FAQ

    Q1. BMC ने महापौर बंगले के लिए नया टेंडर कितने रुपये का जारी किया है?

    BMC ने महापौर के आधिकारिक हेरिटेज बंगले के लिए करीब ₹2.9 करोड़ (लगभग ₹3 करोड़) का नया टेंडर जारी किया है।

    Q2. यह महापौर बंगला कहाँ स्थित है?

    यह बंगला भायखला स्थित वीरमाता जीजाबाई भोसले उद्यान (रानी बाग) परिसर में स्थित BMC की एक हेरिटेज इमारत है, जिसे आधिकारिक महापौर निवास के रूप में विकसित किया जा रहा है।

    Q3. विवाद की वजह क्या है?

    कुछ महीने पहले ही इसी बंगले पर करोड़ों रुपये खर्च कर रेनोवेशन कराया गया था। अब दोबारा करीब ₹3 करोड़ का नया टेंडर जारी होने से सार्वजनिक धन के इस्तेमाल और खर्च की आवश्यकता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

    Q4. BMC इस खर्च को कैसे सही ठहरा रही है?

    BMC का कहना है कि यह एक संरक्षित हेरिटेज भवन है। इसकी संरचनात्मक मजबूती, संरक्षण और रखरखाव के लिए विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार अतिरिक्त कार्य आवश्यक हैं।

    Q5. क्या यह साबित हो गया है कि पहले वाला काम दोबारा कराया जा रहा है?

    नहीं। फिलहाल ऐसा कोई आधिकारिक दस्तावेज़ सार्वजनिक नहीं है जिससे यह साबित हो कि पहले किए गए कार्यों को ही दोबारा कराया जा रहा है। दोनों टेंडरों के विस्तृत BOQ और तकनीकी दस्तावेज़ सामने आने के बाद ही इसकी स्पष्ट तस्वीर मिलेगी।4

    Official Sources

    Brihanmumbai Municipal Corporation (BMC)
    https://portal.mcgm.gov.in

    Maharashtra e-Tender Portal
    https://mahatenders.gov.in

    Indian Fasttrack Exclusive | दस्तावेज़ों से खुलेगा पूरा सच

    हमारी टीम BMC से निम्न दस्तावेज़ हासिल करने का प्रयास कर रही है:

    • अप्रैल 2026 का Work Order
    • पहले रेनोवेशन का BOQ
    • Completion Certificate
    • Final Bill
    • नए टेंडर का BOQ
    • Heritage Committee की मंजूरी
    • तकनीकी निरीक्षण रिपोर्ट

    इन दस्तावेज़ों के सार्वजनिक होने के बाद ही यह पूरी तरह स्पष्ट होगा कि नया टेंडर पहले हुए कार्यों का विस्तार है या पूरी तरह अलग कार्यों के लिए जारी किया गया है। Indian Fasttrack इस मामले से जुड़े हर आधिकारिक अपडेट पर नजर बनाए हुए है।

  • मुंबई में 4290 करोड़ लीटर पानी समंदर में क्यों बहाया गया? जानिए 10 दिनों की बर्बादी का सच

    मुंबई में 4290 करोड़ लीटर पानी समंदर में क्यों बहाया गया? जानिए 10 दिनों की बर्बादी का सच

    मुंबई में महज 8 दिनों में 4290 करोड़ लीटर मीठा पानी समंदर में बहा दिया गया। आखिर बीएमसी को ऐसा क्यों करना पड़ा और क्या इस पानी को बचाया जा सकता था? जानिए पूरी कहानी।

    मुंबई: मुंबई में कुछ हफ्ते पहले तक पानी बचाने की अपील की जा रही थी, लेकिन अब एक ऐसा आंकड़ा सामने आया है जिसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। 30 जून से 7 जुलाई के बीच हुई भारी बारिश के दौरान बीएमसी के 19 पंपिंग स्टेशनों ने 4,290.5 करोड़ लीटर मीठा पानी समंदर में बहा दिया। यह मात्रा इतनी है कि इससे मुंबई के करीब 1.25 करोड़ लोगों की लगभग 10 दिनों की जरूरत पूरी हो सकती थी।

    सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब शहर पहले से पानी की कमी से जूझ रहा था, तो आखिर इतना पानी समंदर में क्यों बहाना पड़ा?

    आखिर मुंबई में पानी समंदर में क्यों बहाया गया?

    बीएमसी अधिकारियों के मुताबिक, मुंबई एक द्वीप (Island City) है और समुद्र तल के बेहद करीब बसी हुई है। लगातार भारी बारिश होने पर अगर पंपिंग स्टेशनों के जरिए पानी को तुरंत बाहर नहीं निकाला जाए, तो शहर के कई इलाके गंभीर जलभराव की चपेट में आ सकते हैं।

    30 जून से 7 जुलाई के बीच मुंबई में करीब 898 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई। इसके बाद जलभराव रोकने के लिए पंपिंग स्टेशनों को लगातार चलाना पड़ा।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यह पानी बर्बादी नहीं, बल्कि मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर की मजबूरी है। हालांकि, बेहतर जल-संग्रह प्रणाली बनाकर इस नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    कितनी बड़ी है यह मात्रा?

    4,290.5 करोड़ लीटर पानी को समझना आसान नहीं है।

    • यह पानी मुंबई की लगभग 10 दिनों की जरूरत के बराबर है।
    • यह करीब 8 पवई झीलों के कुल जल भंडार के बराबर माना जा रहा है।
    • मुंबई की रोजाना पानी की जरूरत लगभग 4,300 MLD (मिलियन लीटर प्रतिदिन) है।

    दिलचस्प बात यह है कि बीएमसी रोजाना केवल 3,900 MLD पानी ही सप्लाई कर पाती है। यानी शहर में हर दिन करीब 400 MLD पानी की कमी बनी रहती है।

    सबसे ज्यादा पानी किन पंपिंग स्टेशनों ने निकाला?

    30 जून से 7 जुलाई के बीच तीन बड़े पंपिंग स्टेशनों ने सबसे ज्यादा पानी समुद्र में छोड़ा।

    • इर्ला पंपिंग स्टेशन (विले पार्ले): 783.14 करोड़ लीटर
    • हाजी अली पंपिंग स्टेशन: 595.43 करोड़ लीटर
    • लव ग्रोव पंपिंग स्टेशन (वर्ली): 535.69 करोड़ लीटर

    इन तीन स्टेशनों ने अकेले 1,914.26 करोड़ लीटर पानी बाहर निकाला, जो मुंबई की लगभग साढ़े चार दिनों की जरूरत के बराबर है।

    क्या इस पानी को बचाया जा सकता था?

    जल विशेषज्ञों का मानना है कि पूरी बारिश को रोककर स्टोर करना फिलहाल संभव नहीं है, लेकिन शहर के भीतर गिरने वाले पानी का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है।

    इसके लिए कुछ उपाय सुझाए गए हैं—

    • बड़े स्तर पर रेनवॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम।
    • भूमिगत जल भंडारण टैंक।
    • पुराने तालाबों और झीलों का पुनर्जीवन।
    • नई जल-संग्रह परियोजनाएं।
    • भूजल रिचार्ज सिस्टम।

    विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मुंबई की इमारतों और सार्वजनिक स्थानों पर बड़े पैमाने पर वर्षा जल संचयन लागू किया जाए, तो भविष्य में पानी की कमी को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    2027 तक क्या बदलने वाला है?

    बीएमसी ने विहार झील परियोजना पर काम शुरू किया है। इस परियोजना के तहत हर साल ओवरफ्लो होने वाले पानी को पंप करके भांडुप फिल्ट्रेशन प्लांट तक पहुंचाया जाएगा।

    करीब 98 करोड़ रुपये की इस परियोजना से भविष्य में मुंबई को अतिरिक्त 200 MLD पानी मिलने की उम्मीद है।

    इसके अलावा दादर, माटुंगा, अंधेरी और सांताक्रूज जैसे इलाकों में 800 बायोस्वेल (स्पंज पॉकेट) बनाए जा रहे हैं, ताकि बारिश का पानी जमीन के भीतर जाकर भूजल स्तर बढ़ा सके।

    मुंबई के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

    मुंबई की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि एक तरफ हर साल मानसून के दौरान करोड़ों लीटर मीठा पानी समुद्र में चला जाता है, जबकि दूसरी तरफ गर्मियों में शहर को पानी की कटौती का सामना करना पड़ता है

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में सिर्फ नई झीलें बनाना ही समाधान नहीं होगा, बल्कि शहर के भीतर जल संरक्षण की नई तकनीकों पर तेजी से काम करना होगा।

    Official Sources

    FAQ

    Q1. मुंबई में कितना पानी समंदर में बहाया गया?

    30 जून से 7 जुलाई के बीच करीब 4,290.5 करोड़ लीटर पानी समुद्र में छोड़ा गया।

    Q2. बीएमसी को ऐसा क्यों करना पड़ा?

    भारी बारिश और जलभराव से शहर को बचाने के लिए पंपिंग स्टेशनों से पानी बाहर निकालना जरूरी था।

    Q3. क्या इस पानी को स्टोर किया जा सकता था?

    विशेषज्ञों के अनुसार, पूरी मात्रा को स्टोर करना मुश्किल है, लेकिन रेनवॉटर हार्वेस्टिंग और नए स्टोरेज सिस्टम से काफी पानी बचाया जा सकता है।

    Q4. मुंबई को हर दिन कितने पानी की जरूरत होती है?

    मुंबई को रोजाना लगभग 4,300 MLD पानी की जरूरत होती है।