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नोएडा का ₹10 हजार का इनामी बदमाश फिरोज अहमद मुंबई के कुर्ला से गिरफ्तार हुआ। वह दो साल से फरार था और डेंटिंग का काम कर रहा था।
मुंबई: नोएडा से गैंगस्टर एक्ट के मामले में वांछित और ₹10 हजार का इनामी बदमाश फिरोज अहमद आखिरकार पुलिस के हत्थे चढ़ गया। नोएडा के सेक्टर-63 थाना पुलिस ने उसे मुंबई के कुर्ला स्थित हनुमान नगर से गिरफ्तार किया। पुलिस के मुताबिक, फिरोज करीब दो साल से फरार था और मुंबई में अपनी पहचान छिपाकर रह रहा था।
मुंबई में उसने अपराध की दुनिया से दूरी बनाए रखने का दिखावा करते हुए एक दुकान पर डेंटिंग का काम शुरू कर दिया था। वह अपने भाई के घर के पास किराये के कमरे में रह रहा था। गिरफ्तारी के बाद नोएडा पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर ले गई है और आगे की कार्रवाई में जुटी है।
मोबाइल और सर्विलांस से मिला मुंबई का सुराग
पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह पता लगाना था कि दो साल से फरार फिरोज आखिर कहां छिपा है। पुलिस के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस के जरिए उसकी गतिविधियों पर नजर रखी गई। वहीं, एक रिपोर्ट के अनुसार उसके परिचित के मोबाइल से मिले इनपुट ने भी पुलिस को अहम सुराग दिया।
इसके बाद पुलिस टीम ने मुंबई में उसकी लोकेशन को ट्रेस किया और कुर्ला के हनुमान नगर तक पहुंची। यहां फिरोज को गिरफ्तार कर लिया गया। उपलब्ध जानकारी में यह स्पष्ट नहीं है कि उसने किसी दूसरे नाम से दस्तावेज बनवाए थे या केवल अपनी वास्तविक पहचान छिपाकर रह रहा था।
पहले झुग्गी में रहा, फिर किराये के कमरे में शिफ्ट हुआ
पुलिस के अनुसार, मुंबई पहुंचने के बाद फिरोज शुरुआत में झुग्गी में रह रहा था। करीब डेढ़ साल पहले उसने वह झुग्गी बेच दी और किराये के कमरे में रहने लगा। उसका परिवार नोएडा के बसई गांव में ही रह रहा था।
फिरोज अनपढ़ बताया गया है और मुंबई में वह डेंटिंग का काम करता था। पुलिस के मुताबिक, लंबे समय तक मुंबई में रहने के बावजूद वह नोएडा पुलिस की पकड़ से बाहर रहा।
2024 में मुठभेड़ के बाद सामने आया था नाम
फिरोज का नाम फरवरी 2024 में नोएडा के फेज-3 थाना पुलिस की कार्रवाई के दौरान सामने आया था। पुलिस के मुताबिक, फिरोज अपने साथी आशीष और अन्य आरोपियों के साथ ऐसे गिरोह से जुड़ा था, जिस पर वाहन चोरी और अन्य आपराधिक घटनाओं के आरोप थे।
पुलिस ने उस समय आशीष और फिरोज को मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया था। कार्रवाई के दौरान चोरी के वाहन और वाहन चोरी में इस्तेमाल होने वाले उपकरण बरामद किए जाने की बात सामने आई थी। पुलिस के अनुसार गिरोह के सदस्य कुछ ही मिनटों में चार पहिया वाहन चोरी कर लेते थे और GPS डिवाइस मिलने पर उसे भी निकाल देते थे।
आशीष को गिरोह का सरगना बताया गया था, जबकि फिरोज उसके सक्रिय सदस्यों में शामिल था।
गैंगस्टर एक्ट के बाद हो गया था फरार
पुलिस के अनुसार, फेज-3 थाना क्षेत्र में 2024 में गिरोह के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था। इसके बाद फिरोज फरार हो गया और मुंबई आ गया। उसके खिलाफ फेज-3 थाने में तीन आपराधिक मामले दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।
फरारी के दौरान उस पर ₹10 हजार का इनाम घोषित किया गया था। पुलिस लगातार उसकी तलाश कर रही थी।
अब पुराने मामलों को लेकर होगी पूछताछ
मुंबई से गिरफ्तारी के बाद अब नोएडा पुलिस फिरोज से उसके पुराने आपराधिक मामलों और गिरोह से जुड़े लोगों के बारे में पूछताछ करेगी। इसके साथ ही पुलिस यह भी पता लगा सकती है कि गैंगस्टर एक्ट के मामले में फरार रहने के दौरान उसके संपर्क किन लोगों से रहे और मुंबई में उसके ठिकाने तक पहुंचने में किस नेटवर्क ने मदद की।
पुलिस के सामने यह भी अहम पहलू रहेगा कि करीब दो साल तक मुंबई में रहने के दौरान फिरोज की गतिविधियां क्या थीं और क्या इस अवधि में वह किसी अन्य आपराधिक मामले से जुड़ा था। फिलहाल उपलब्ध जानकारी में मुंबई में उसके खिलाफ किसी नए अपराध की पुष्टि नहीं हुई है।
ट्रांजिट रिमांड की प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसे नोएडा ले जाया जाएगा, जहां पुलिस पुराने मामलों में आगे की कानूनी कार्रवाई करेगी।
BJP विधायक पराग शाह का भिखारी के वेश में मुंबई की सड़कों पर घूमने का वीडियो वायरल है। जानिए 3383 करोड़ की संपत्ति वाले विधायक ने ऐसा क्यों किया।
मुंबई: घाटकोपर पूर्व से भाजपा विधायक पराग शाह का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में वह भिखारी के वेश में सड़क किनारे बैठे और लोगों से भीख मांगते नजर आ रहे हैं। खास बात यह है कि 2024 के विधानसभा चुनाव में दाखिल हलफनामे के मुताबिक पराग शाह ने 3,383.06 करोड़ रुपये की कुल संपत्ति घोषित की थी।
ऐसे में लोगों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इतने संपन्न विधायक ने भिखारी का रूप क्यों अपनाया?
जैन धर्मगुरु की सलाह पर लिया भिखारी का रूप
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, पराग शाह ने यह अनुभव जैन धर्मगुरु नम्रमुनि महाराज के सुझाव पर लिया। जैन धर्म के चातुर्मास के दौरान उन्हें एक दिन भिखारी की तरह जीवन जीकर आम लोगों की परिस्थितियों को करीब से समझने की सलाह दी गई थी।
वीडियो में पराग शाह मेकअप और भिखारी के वेश में घाटकोपर के इलाके में घूमते और सड़क किनारे बैठे दिखाई देते हैं। बताया जा रहा है कि इस दौरान उनके साथ मौजूद सामान्य पहचान और सुविधाएं नहीं थीं, जिसके कारण आसपास के लोग उन्हें पहचान नहीं सके।
घाटकोपर चे कोट्याधीश आमदार पराग शहा जेव्हा वेषांतर करून घाटकोपर च्या रस्त्यावर भिकारी बनून फिरतात…!!! आपल्या गुरूने दिलेली आज्ञा पाळून पाच हजार कोटी चे मालक असलेले आमदार पराग शहा यांनी एक दिवस त्यांच्या मतदार संघ घाटकोपर पूर्व मध्ये भिकारी बनून दिवस काढला..!! तेव्हा काय घडले पहा pic.twitter.com/eEXw9I1joo
उन्होंने लोगों से भीख मांगी और सड़क किनारे भोजन किया। इस अनुभव का उद्देश्य कथित तौर पर यह समझना था कि सड़क पर रहने वाले जरूरतमंद लोगों को रोजमर्रा की जिंदगी में किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।
मेकअप हटाकर उसी जगह लोगों से मिले
इस प्रयोग का एक और हिस्सा वीडियो में दिखाई देता है। भिखारी के वेश में समय बिताने के बाद पराग शाह ने अपना मेकअप हटाया और फिर उन्हीं इलाकों में अपनी वास्तविक पहचान के साथ पहुंचे।
इस तरह उन्होंने यह देखने की कोशिश की कि लोग उन्हें सामान्य रूप से कैसे देखते हैं और भिखारी के रूप में रहने के दौरान उनके प्रति लोगों का व्यवहार कैसा था।
2024 के हलफनामे में घोषित की थी 3383 करोड़ की संपत्ति
पराग शाह की संपत्ति का आंकड़ा इस वायरल वीडियो को और चर्चा में ला रहा है। 2024 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान दाखिल उनके चुनावी हलफनामे के अनुसार, उन्होंने 33,83,06,20,898 रुपये यानी करीब 3,383 करोड़ रुपये की कुल संपत्ति घोषित की थी। इनमें करीब 3,315.52 करोड़ रुपये की चल संपत्ति और 67.53 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति शामिल थी।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के विश्लेषण में भी पराग शाह को 2024 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के सबसे अधिक संपत्ति घोषित करने वाले उम्मीदवारों में शीर्ष पर रखा गया था।
2019 के चुनावी हलफनामे में उनकी घोषित संपत्ति करीब 500.62 करोड़ रुपये थी। 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर 3,383 करोड़ रुपये से अधिक हो गया।
रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े हैं पराग शाह
पराग शाह पेशे से कारोबारी और रियल एस्टेट क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। 2024 के चुनावी रिकॉर्ड में उनका पेशा बिजनेस दर्ज है। वह घाटकोपर पूर्व से भाजपा के विधायक हैं और 2024 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने यह सीट दोबारा जीती थी।
भिखारी के वेश में मुंबई की सड़कों पर घूमने का उनका वीडियो अब सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। इस पूरे प्रयोग के जरिए उन्होंने आर्थिक रूप से कमजोर और सड़क पर जीवन बिताने वाले लोगों की परिस्थितियों को प्रत्यक्ष रूप से समझने की कोशिश की।
दिशा सालियान केस में CBI ने FIR दर्ज कर जांच शुरू की। आदित्य ठाकरे, उद्धव ठाकरे, रिया चक्रवर्ती समेत 24 नामों और पुलिस-FSL अधिकारियों की भूमिका की जांच होगी।
मुंबई: दिशा सालियान की मौत के मामले में करीब छह साल बाद बड़ा कानूनी मोड़ आया है। केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI ने 14 सितंबर 2026 को FIR दर्ज कर मामले की जांच अपने हाथ में ले ली है। बॉम्बे हाईकोर्ट के 2 सितंबर 2026 के आदेश के बाद शुरू हुई इस कार्रवाई में हत्या, गैंगरेप, आपराधिक साजिश और कथित तौर पर सबूत दबाने, नष्ट करने या मामले को आत्महत्या का रूप देने जैसे आरोपों की जांच की जा रही है।
इस FIR की सबसे बड़ी बात यह है कि जांच का दायरा सिर्फ बॉलीवुड से जुड़े कुछ नामों तक सीमित नहीं है। इसमें आदित्य ठाकरे, उद्धव ठाकरे, रिया चक्रवर्ती, शोविक चक्रवर्ती, डिनो मोरिया, सूरज पंचोली और रोहन रॉय के साथ पुलिस अधिकारियों, पोस्टमार्टम से जुड़े डॉक्टरों, फोरेंसिक अधिकारियों और मालवणी पुलिस से जुड़े अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई गई है।
CBI FIR में किन-किन लोगों के नाम?
दिशा सालियान के पिता सतीश सालियान की शिकायत और बाद में CBI के सामने दर्ज बयान के आधार पर सामने आई जानकारी में निम्न नाम और पदों का उल्लेख किया गया है:
1. आदित्य ठाकरे 2. रोहन रॉय 3. डिनो मोरिया 4. सूरज पंचोली 5. आदित्य ठाकरे के बॉडीगार्ड 6. रिया चक्रवर्ती 7. शोविक चक्रवर्ती 8. सचिन वाजे 9. परमबीर सिंह 10. DCP विशाल ठाकुर 11. उद्धव ठाकरे 12. अनिल देशमुख 13. API अशोक देवाड़े 14. PI जगदेव कलापड़ 15. PI शैलेंद्र नगरकर 16. PI चिमाजी आढाव 17. PI अर्जुन राजाने 18. मालवणी पुलिस स्टेशन के संबंधित अधिकारी 19. देरी से पोस्टमार्टम से जुड़े डॉक्टर और स्टाफ 20. डॉ. संजय जाधव 21. कालिना स्थित फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी के संबंधित अधिकारी 22. N.P. भाले, Assistant Chemical Analyser 23. तत्कालीन संबंधित PI 24. अन्य पुलिस अधिकारी
इस तरह CBI की जांच का दायरा कथित घटना में मौजूद लोगों से लेकर उस समय की पुलिस जांच और फोरेंसिक प्रक्रिया तक पहुंचता है।
CBI FIR में मुख्य आपराधिक आरोपों के साथ criminal conspiracy, कथित तौर पर आत्महत्या की झूठी कहानी तैयार करने और उसे आगे बढ़ाने तथा सबूतों को दबाने, नष्ट करने या उनमें हेरफेर किए जाने के पहलुओं की जांच का उल्लेख है। FIR में सरकारी अधिकारियों और पुलिस मशीनरी की भूमिका से जुड़े आरोपों की भी जांच की जा रही है।
दिशा के पिता सतीश सालियान ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि उनकी बेटी की मौत को जिस तरह पेश किया गया, उसमें गंभीर सवाल हैं। परिवार की ओर से हत्या और गैंगरेप के आरोप भी लगाए गए हैं। CBI अब इन आरोपों के पीछे उपलब्ध साक्ष्यों और घटनाक्रम की स्वतंत्र जांच करेगी।
आदित्य ठाकरे से लेकर रिया चक्रवर्ती तक नाम क्यों महत्वपूर्ण?
इस मामले में आदित्य ठाकरे का नाम सबसे ज्यादा राजनीतिक चर्चा का विषय रहा है। FIR में उनके साथ उनके बॉडीगार्ड्स का भी उल्लेख है।
इसके अलावा रोहन रॉय की भूमिका जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण है क्योंकि दिशा जिस फ्लैट में मौजूद थीं, वह रोहन रॉय से जुड़ा था।
डिनो मोरिया और सूरज पंचोली के नाम भी शिकायत और जांच के संदर्भ में सामने आए हैं। इसी तरह रिया चक्रवर्ती और शोविक चक्रवर्ती के नाम भी FIR में जांच के दायरे में बताए गए हैं।
दिशा के पिता की ओर से CBI को दिए गए बयान में इन नामों के अलावा अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच की मांग की गई थी।
सचिन वाजे, परमबीर सिंह और DCP विशाल ठाकुर की भूमिका की भी जांच
FIR का दूसरा बड़ा हिस्सा पुलिस और प्रशासनिक भूमिका से जुड़ा है।
सचिन वाजे, पूर्व मुंबई पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह और DCP विशाल ठाकुर के साथ तत्कालीन पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच का उल्लेख है।
इसके साथ ही API अशोक देवाड़े, PI जगदेव कलापड़, PI शैलेंद्र नगरकर, PI चिमाजी आधव और PI अर्जुन राजाने के नाम भी सामने आए हैं।
मालवणी पुलिस स्टेशन के संबंधित अधिकारियों और तत्कालीन संबंधित PI की भूमिका भी जांच का हिस्सा है।
यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दिशा की मौत के बाद शुरुआती जांच मालवणी पुलिस ने की थी और बाद में मामले में पुलिस की जांच प्रक्रिया को लेकर कई सवाल उठाए गए।
पोस्टमार्टम और FSL अधिकारियों की भूमिका भी जांच में
CBI ने केवल पुलिस कार्रवाई तक जांच सीमित नहीं रखी है। देरी से पोस्टमार्टम से जुड़े डॉक्टर और स्टाफ तथा डॉ. संजय जाधव की भूमिका भी जांच के दायरे में है।
इसी तरह कालिना स्थित फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी के संबंधित अधिकारियों और N.P. भाले, Assistant Chemical Analyser का नाम भी जांच से जुड़ा बताया गया है।
इसका मतलब है कि CBI अब मेडिकल और फोरेंसिक रिकॉर्ड की भी दोबारा जांच करेगी और यह देखेगी कि घटनास्थल से लेकर पोस्टमार्टम और फोरेंसिक रिपोर्ट तैयार होने तक पूरी प्रक्रिया में क्या हुआ था।
हाईकोर्ट ने पहले की जांच में उठाए थे गंभीर सवाल
CBI जांच की पृष्ठभूमि में बॉम्बे हाईकोर्ट का 2 सितंबर 2026 का आदेश बेहद महत्वपूर्ण है। अदालत ने पुरानी जांच में कई ऐसी विसंगतियों का उल्लेख किया था जिनके कारण मामले की स्वतंत्र जांच की जरूरत महसूस हुई।
इनमें स्पॉट पंचनामा तैयार करने में देरी, पुलिस की घटनास्थल पर मौजूदगी की टाइमलाइन, ADR दर्ज करने के समय से जुड़े सवाल, CCTV रिकॉर्ड, घटनास्थल से खून के नमूने का मुद्दा, पोस्टमार्टम में दर्ज चोटें, कमरे के दरवाजे को लेकर विरोधाभास, FSL और मेडिकल रिकॉर्ड में अंतर तथा मोबाइल और लैपटॉप की जांच में हुई देरी शामिल थीं।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि करीब छह साल तक चली जांच ने कई सवालों का समाधान करने के बजाय और सवाल खड़े किए। इसी कारण CBI को मामले की स्वतंत्र जांच सौंपने का आदेश दिया गया।
पहले पुलिस और SIT का क्या निष्कर्ष था?
दिशा सालियान की मौत के बाद मुंबई पुलिस ने मामले को ADR के तौर पर दर्ज किया था। बाद की पुलिस जांच और SIT की जांच में मौत को आत्महत्या की दिशा में देखा गया और पुलिस ने foul play के पर्याप्त सबूत नहीं मिलने की बात कही थी।
SIT ने भी पुराने रिकॉर्ड, CCTV, कॉल डिटेल और गवाहों से जुड़ी जानकारी की दोबारा समीक्षा की थी। उसकी रिपोर्ट भी आत्महत्या के पहले के निष्कर्ष से अलग नहीं गई थी।
अब CBI उसी जांच रिकॉर्ड, मेडिकल दस्तावेज, CCTV फुटेज, डिजिटल सामग्री, फोरेंसिक रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों की स्वतंत्र तरीके से जांच करेगी।
दिशा सालियान और सुशांत सिंह राजपूत की मौत का कनेक्शन
दिशा सालियान की मौत 8 जून 2020 को हुई थी और सुशांत सिंह राजपूत की मौत 14 जून 2020 को। दोनों घटनाओं के बीच छह दिन का अंतर होने के कारण दोनों मामलों को लेकर लगातार सवाल उठते रहे।
दिशा के मामले में आदित्य ठाकरे, रिया चक्रवर्ती, शोविक चक्रवर्ती, डिनो मोरिया, सूरज पंचोली, रोहन रॉय और अन्य नामों को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं।
अब CBI की जांच में यदि दोनों घटनाओं के बीच कोई प्रमाणित आपराधिक कड़ी सामने आती है तो एजेंसी उस दिशा में भी जांच आगे बढ़ा सकती है। फिलहाल दोनों मामलों की जांच अलग-अलग रही है।
CBI अब पूरे मामले की घटनाक्रम के स्तर पर जांच करेगी। इसमें मुख्य रूप से यह देखा जाएगा कि 8 जून 2020 की रात क्या हुआ, दिशा किन लोगों के संपर्क में थीं, घटनास्थल पर कौन मौजूद था, CCTV और डिजिटल रिकॉर्ड क्या बताते हैं और पहले की पुलिस जांच में सामने आए विरोधाभासों की वास्तविक वजह क्या थी।
इसके साथ ही एजेंसी:
हत्या के आरोपों की जांच करेगी
गैंगरेप के आरोपों की जांच करेगी
कथित आपराधिक साजिश की जांच करेगी
कथित कवर-अप और सबूत दबाने के आरोपों की जांच करेगी
पुलिस अधिकारियों की कार्रवाई की जांच करेगी
पोस्टमार्टम और मेडिकल रिकॉर्ड की जांच करेगी
FSL और Chemical Analysis से जुड़े रिकॉर्ड की जांच करेगी
CCTV, मोबाइल, लैपटॉप और अन्य डिजिटल सामग्री की दोबारा जांच करेगी
FIR में नामित सभी व्यक्तियों की भूमिका को उपलब्ध सबूतों के आधार पर परखेगी
अब छह साल पुराने केस में सामने आएगा असली घटनाक्रम?
दिशा सालियान केस में CBI की FIR ने छह साल पुराने मामले को फिर से जांच के केंद्र में ला दिया है। इस बार जांच का दायरा केवल दिशा की मौत के कारण तक सीमित नहीं है, बल्कि घटना, कथित हत्या और गैंगरेप, आपराधिक साजिश, पुलिस जांच, पोस्टमार्टम, फोरेंसिक प्रक्रिया और कथित कवर-अप तक फैला हुआ है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि FIR में आदित्य ठाकरे, रोहन रॉय, डिनो मोरिया, सूरज पंचोली, आदित्य ठाकरे के बॉडीगार्ड, रिया चक्रवर्ती, शोविक चक्रवर्ती, सचिन वाजे, परमबीर सिंह, DCP विशाल ठाकुर, उद्धव ठाकरे, अनिल देशमुख, API अशोक देवाड़े, PI जगदेव कलापड़, PI शैलेंद्र नगरकर, PI चिमाजी आढाव, PI अर्जुन राजाने, डॉ. संजय जाधव, N.P. भाले और संबंधित पुलिस, मेडिकल, FSL व सुरक्षा अधिकारियों समेत पूरी जांच प्रक्रिया से जुड़े लोगों की भूमिका सामने आई है।
अब CBI की जांच यह तय करेगी कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में से किन आरोपों को उपलब्ध साक्ष्य समर्थन देते हैं और 8 जून 2020 की रात दिशा सालियान के साथ वास्तव में क्या हुआ था।
Rajasthan Nikay Chunav Result 2026 में BJP ने बढ़त बनाई है। जयपुर में 95 वार्ड जीते, जबकि झालावाड़ में कांग्रेस के प्रदर्शन ने मुकाबले को रोचक बना दिया।
Rajasthan Nikay Chunav Result 2026: राजस्थान के 309 नगरीय निकायों के चुनाव की मतगणना सोमवार सुबह 8 बजे से जारी है। शुरुआती और घोषित नतीजों में बीजेपी ने कांग्रेस पर बढ़त बनाई है, लेकिन तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है। जयपुर में बीजेपी ने 150 में से 95 वार्ड जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है, जबकि कांग्रेस 43 वार्डों में विजयी रही। दूसरी ओर, झालावाड़ में कांग्रेस ने 45 में से 29 वार्ड जीतकर बीजेपी को बड़ा झटका दिया है।
राजस्थान निकाय चुनाव 2026 में 10,245 पार्षद पदों के लिए 309 शहरी निकायों में मतदान हुआ था। इनमें 10 नगर निगम, 51 नगर परिषद और 248 नगरपालिकाएं शामिल हैं। मतदान 9 और 11 सितंबर को दो चरणों में कराया गया था और आज नतीजे सामने आ रहे हैं।
राजस्थान निकाय चुनाव में अब तक क्या तस्वीर?
राज्यभर में मतगणना आगे बढ़ने के साथ बीजेपी का प्रदर्शन मजबूत दिखाई दे रहा है। उपलब्ध घोषित नतीजों में बीजेपी 163 वार्ड जीत चुकी थी, जबकि कांग्रेस ने 103 और निर्दलीय उम्मीदवारों ने 43 वार्डों में जीत दर्ज की थी। हालांकि यह आंकड़ा मतगणना के दौरान लगातार बढ़ रहा है, इसलिए इसे अंतिम statewide tally नहीं माना जा सकता।
यही वजह है कि राजस्थान निकाय चुनाव का पूरा परिणाम समझने के लिए सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस की कुल सीटों को देखना पर्याप्त नहीं होगा। कई शहरों में निर्दलीय और अन्य दल बोर्ड गठन के समय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
जयपुर में BJP की बड़ी जीत
राजस्थान की राजधानी जयपुर में बीजेपी ने सबसे मजबूत प्रदर्शन किया है। 150 वार्डों में से बीजेपी ने 95 सीटें जीतकर बहुमत हासिल कर लिया, जबकि कांग्रेस को 43 सीटें मिलीं। इस परिणाम के साथ जयपुर नगर निगम में बोर्ड बनाने के लिए बीजेपी की स्थिति स्पष्ट रूप से मजबूत हो गई है।
जयपुर का परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राजधानी राज्य की सबसे बड़ी शहरी राजनीतिक लड़ाइयों में शामिल थी। निकाय चुनाव में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक प्रतिष्ठा भी दांव पर थी।
जहां जयपुर में बीजेपी ने बढ़त बनाई, वहीं झालावाड़ ने चुनावी तस्वीर में सबसे बड़ा उलटफेर किया है। झालावाड़ नगर परिषद के 45 वार्डों में कांग्रेस ने 29 सीटों पर जीत दर्ज की है। यह परिणाम बीजेपी के लिए इसलिए महत्वपूर्ण झटका माना जा रहा है क्योंकि झालावाड़ को लंबे समय से बीजेपी का मजबूत राजनीतिक आधार और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का प्रभाव क्षेत्र माना जाता रहा है।
इस नतीजे ने यह भी संकेत दिया है कि राजस्थान के शहरी निकाय चुनाव में बीजेपी की statewide बढ़त के बावजूद हर क्षेत्र में मुकाबला एक जैसा नहीं रहा।
Baran में AAP ने चौंकाया
राजस्थान निकाय चुनाव में आम आदमी पार्टी ने भी कुछ क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। बारां नगर परिषद के शुरुआती घोषित नतीजों में AAP का प्रदर्शन खास तौर पर चर्चा में रहा। उपलब्ध अपडेट में 25 घोषित वार्डों में AAP ने 16, कांग्रेस ने 6 और बीजेपी ने 3 वार्ड जीते थे। यह पूरे 60 वार्डों का अंतिम परिणाम नहीं है, इसलिए अंतिम तस्वीर के लिए आगे की counting देखना जरूरी है।
अगर बारां में AAP का प्रदर्शन अंतिम परिणाम में भी मजबूत रहता है, तो यह राजस्थान की स्थानीय राजनीति में बीजेपी-कांग्रेस के बीच तीसरी राजनीतिक ताकत की संभावनाओं को लेकर चर्चा बढ़ा सकता है।
कई शहरों में असली मुकाबला बोर्ड बनाने का
निकाय चुनाव में पार्षदों के नतीजे आने के बाद अगली बड़ी लड़ाई बोर्ड गठन की होगी। खासकर उन नगर निकायों में जहां बीजेपी या कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, वहां निर्दलीय पार्षदों और अन्य दलों की भूमिका बढ़ सकती है।
इसीलिए किसी शहर में सबसे ज्यादा वार्ड जीतना और तुरंत यह मान लेना कि उसी पार्टी का बोर्ड बन गया, हमेशा सही नहीं होगा। जहां मुकाबला करीबी है, वहां अगले कुछ दिनों में पार्षदों का समर्थन और राजनीतिक समीकरण महत्वपूर्ण होंगे।
21 सितंबर को होगा मेयर और अध्यक्ष पद का चुनाव
आज पार्षदों के चुनाव परिणाम सामने आ रहे हैं, लेकिन निकायों की राजनीतिक तस्वीर का अगला अहम चरण अभी बाकी है। चुनाव कार्यक्रम के अनुसार 21 सितंबर को महापौर, नगर परिषद सभापति और नगरपालिका अध्यक्ष के चुनाव होंगे। इसके अगले दिन यानी 22 सितंबर को उपमहापौर, उपसभापति और नगरपालिका उपाध्यक्ष के चुनाव होंगे।
इसका मतलब है कि 14 सितंबर के परिणाम के बाद भी कई निकायों में राजनीतिक गतिविधियां तेज रह सकती हैं।
2028 के लिए कितना बड़ा राजनीतिक संकेत?
राजस्थान निकाय चुनाव को 2028 विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी और कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। BJP के लिए बड़े शहरी निकायों में मजबूत प्रदर्शन मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा सरकार के लिए राजनीतिक बढ़त के तौर पर देखा जा सकता है।
लेकिन अभी इन नतीजों को 2028 विधानसभा चुनाव का सीधा संकेत या भविष्यवाणी मानना जल्दबाजी होगी। झालावाड़ जैसे क्षेत्रों में कांग्रेस की बड़ी जीत और कुछ निकायों में करीबी मुकाबला बताता है कि राजस्थान का urban political map पूरी तरह एकतरफा नहीं हुआ है।
मतदाताओं ने भी बड़ी संख्या में किया मतदान
इस चुनाव में मतदान प्रतिशत भी महत्वपूर्ण रहा। पहले चरण में करीब 76.42 प्रतिशत और दूसरे चरण में 70.68 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। कुल मिलाकर 1.44 करोड़ से अधिक मतदाता इस चुनाव प्रक्रिया से जुड़े थे।
इतने बड़े मतदान के बाद अब राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि अलग-अलग शहरों में स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवारों और पार्टी संगठन ने परिणामों को कितना प्रभावित किया।
अब आगे क्या?
14 सितंबर को पार्षदों के परिणामों के बाद अब नजर उन नगर निकायों पर रहेगी जहां बहुमत का आंकड़ा स्पष्ट नहीं है। जयपुर जैसे शहरों में तस्वीर साफ हो चुकी है, जबकि करीबी मुकाबले वाले निकायों में अगले कुछ दिन बोर्ड गठन के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
इसके बाद 21 सितंबर को मेयर और अध्यक्ष पदों का चुनाव और 22 सितंबर को उपमहापौर, उपसभापति और उपाध्यक्ष पदों का चुनाव होगा। इसलिए राजस्थान निकाय चुनाव 2026 की पूरी राजनीतिक तस्वीर आज के वार्ड परिणामों के साथ खत्म नहीं होगी।
राजस्थान निकाय चुनाव 2026 की मतगणना के साथ अब सबसे बड़ा सवाल यही है—कहां BJP का बोर्ड बनेगा, कहां कांग्रेस वापसी करेगी और किन शहरों में निर्दलीय तय करेंगे कि सत्ता किसके हाथ जाएगी।
Vimal Elaichi विवाद में Delhi HC 14 सितंबर को तय करेगा कि महाराष्ट्र FDA के नोटिस पर PB Agro की याचिका दिल्ली में सुनी जाएगी या नहीं।
नई दिल्ली: Vimal Elaichi के विज्ञापन को लेकर चल रहे विवाद में सोमवार, 14 सितंबर 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट का अहम आदेश आने वाला है। कोर्ट यह तय करेगा कि महाराष्ट्र FDA की ओर से Shah Rukh Khan, Ajay Devgn और Tiger Shroff को जारी किए गए शो-कॉज नोटिस को चुनौती देने वाली PB Agro LLP की याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट सुनवाई कर सकता है या नहीं। फिलहाल मामला विज्ञापन की वैधता के अंतिम फैसले तक नहीं पहुंचा है; 7 सितंबर को कोर्ट ने territorial jurisdiction के मुद्दे पर सुनवाई पूरी होने के बाद आदेश सुरक्षित रखा था।
14 सितंबर को कोर्ट के सामने क्या सवाल है?
इस मामले में तत्काल सवाल यह नहीं है कि Vimal Elaichi का विज्ञापन वास्तव में surrogate advertising है या नहीं। सबसे पहले यह तय होना है कि महाराष्ट्र FDA के खिलाफ दायर PB Agro की याचिका को Delhi High Court सुन सकता है या नहीं।
PB Agro ने अदालत में महाराष्ट्र FDA की कार्रवाई को चुनौती दी है। कंपनी का कहना है कि FDA ने उसके ब्रांड एंबेसडरों को नोटिस जारी किया, जबकि कंपनी स्वयं इस कार्रवाई से सीधे प्रभावित है। याचिका में यह भी कहा गया है कि कंपनी को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया और विज्ञापन अभियान लागू कानूनों के अनुरूप है।
दूसरी ओर, महाराष्ट्र से जुड़े regulatory action को लेकर jurisdiction पर आपत्ति उठाई गई है। इसलिए 14 सितंबर का आदेश यह तय करने में महत्वपूर्ण होगा कि इस कानूनी विवाद की अगली सुनवाई दिल्ली में होगी या कंपनी को किसी अन्य उपयुक्त forum का रुख करना पड़ सकता है।
Maharashtra FDA ने Shah Rukh Khan, Ajay Devgn और Tiger Shroff को नोटिस क्यों दिया?
महाराष्ट्र FDA ने 11 अगस्त 2026 को तीनों अभिनेताओं को Vimal Elaichi के विज्ञापन से जुड़े शो-कॉज नोटिस जारी किए थे। FDA की आपत्ति यह है कि भले ही विज्ञापन Elaichi उत्पाद का दिखाई देता हो, लेकिन उसके जरिए Vimal brand की ऐसी promotion हो सकती है जो प्रतिबंधित Pan Masala product की indirect या surrogate promotion का माध्यम बनती हो।
FDA ने जिस regulatory background का हवाला दिया है, उसमें महाराष्ट्र में 13 जुलाई 2026 से लागू prohibition order भी शामिल है। इस आदेश के तहत राज्य में प्रतिबंधित tobacco और nicotine-containing products के manufacture, storage, transportation, distribution और sale पर रोक लागू की गई है। FDA ने Vimal brand के advertisement को इसी broader regulatory framework में देखा है।
आप को बता दें, कि surrogate advertising का आरोप अभी अदालत की ओर से साबित किया गया तथ्य नहीं है। यह महाराष्ट्र FDA की regulatory आपत्ति है, जिस पर आगे कानूनी प्रक्रिया होनी है।
Ajay Devgn और Tiger Shroff ने FDA को जवाब दिया, Shah Rukh Khan की स्थिति क्या है?
मामले में एक अहम ताजा घटनाक्रम यह भी है कि Ajay Devgn और Tiger Shroff ने महाराष्ट्र FDA को अपने जवाब सौंप दिए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार FDA को दोनों के responses मिल चुके हैं, जबकि Shah Rukh Khan का जवाब अभी लंबित बताया गया था।
हालांकि, इन दोनों अभिनेताओं के जवाबों की पूरी substantive सामग्री सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इन जवाबों के हवाले से ये पता नहीं है कि उन्होंने FDA के आरोपों को स्वीकार किया है या खारिज किया है।
PB Agro LLP, जो Vimal Elaichi से जुड़ा master licensee बताया गया है, ने Delhi High Court में कहा है कि वह Elaichi जैसे non-tobacco product के promotion के लिए प्रमुख अभिनेताओं की सेवाएं लेता है और उसके advertising campaigns लागू कानूनों का पालन करते हैं। कंपनी ने FDA की कार्रवाई पर कई कानूनी आपत्तियां उठाई हैं।
कंपनी की याचिका में यह सवाल भी उठाया गया है कि यदि regulatory action का सीधा असर कंपनी के commercial campaign पर पड़ रहा है, तो केवल celebrities को नोटिस जारी करने की प्रक्रिया कितनी उचित है और कंपनी को अपना पक्ष रखने का अवसर क्यों नहीं दिया गया।
क्या Vimal Elaichi पर पहले भी कानूनी विवाद हुआ है?
यह विवाद पूरी तरह नया नहीं है। जनवरी 2024 में भी Delhi High Court के सामने Vimal Elaichi से जुड़े surrogate advertising का मामला आया था। उस मामले में DGHS ने 2018 में जारी किए गए शो-कॉज नोटिस के खिलाफ कंपनियों को मिली stay को चुनौती दी थी। Delhi High Court ने trial court की stay को बरकरार रखा था।
उस मामले में अदालत ने यह भी कहा था कि किसी brand name का इस्तेमाल Elaichi या Pan Masala जैसे उत्पादों के प्रचार में करना प्रतिबंधित tobacco या gutka की indirect या surrogate advertising है या नहीं, यह evidence का विषय हो सकता है। इसका मतलब यह नहीं था कि अदालत ने Vimal Elaichi को surrogate advertising से अंतिम तौर पर clean chit दे दी थी।
यही पुराना legal background मौजूदा विवाद को और महत्वपूर्ण बनाता है।
मौजूदा विवाद का असर केवल Vimal brand या इन तीन अभिनेताओं तक सीमित नहीं हो सकता। मामला यह सवाल भी उठाता है कि किसी celebrity को किसी ऐसे brand के advertisement में शामिल होने से पहले product और brand architecture की कितनी due diligence करनी चाहिए, खासकर तब जब उसी brand name से जुड़े दूसरे products regulatory restrictions के दायरे में हों।
महाराष्ट्र FDA ने अपने notices के जरिए advertisement और उससे जुड़े regulatory compliance पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, actors के responses और PB Agro की legal challenge से आगे यह तय होना है कि इस तरह के endorsement में individual celebrity की जिम्मेदारी किस सीमा तक बनती है।
अगर Delhi High Court territorial jurisdiction स्वीकार करता है, तो PB Agro की याचिका पर आगे substantive सुनवाई का रास्ता खुल सकता है। इसके बाद court को FDA के notices, regulator की powers और surrogate advertising से जुड़े वास्तविक कानूनी सवालों पर विचार करना पड़ सकता है।
अगर Delhi High Court jurisdiction स्वीकार नहीं करता, तो इसका अर्थ यह नहीं होगा कि अदालत ने Vimal Elaichi advertisement को surrogate advertising घोषित कर दिया या तीनों अभिनेताओं को किसी उल्लंघन का दोषी माना। इसका तत्काल प्रभाव केवल forum से जुड़ा होगा और PB Agro को अपने कानूनी उपाय के लिए दूसरे उचित forum का रुख करना पड़ सकता है।
यानी 14 सितंबर का आदेश इस विवाद का अंतिम फैसला नहीं, बल्कि आगे की कानूनी लड़ाई की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण कदम होगा।
फिलहाल सबसे अहम सवाल यही है कि Delhi High Court महाराष्ट्र FDA की कार्रवाई के खिलाफ PB Agro की याचिका सुनने का अधिकार स्वीकार करता है या नहीं। इसके बाद ही Vimal Elaichi advertisement की legality, surrogate promotion के आरोप और celebrity endorsement की जिम्मेदारी जैसे मूल सवालों पर विवाद आगे बढ़ेगा।
Haj 2027 मेडिकल सर्टिफिकेट की Deadline में सिर्फ 2 दिन बाकी हैं। मुंबई में भीड़ के बीच हज यात्रियों ने केंद्र बढ़ाने और राहत की मांग की।
मुंबई: Haj 2027 के लिए मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट जमा करने की 15 सितंबर की अंतिम तारीख में अब सिर्फ दो दिन बाकी हैं। इसी बीच मुंबई में मेडिकल जांच कराने वाले हज यात्रियों को सीमित केंद्रों और सामान्य मरीजों के साथ साझा कतार के कारण परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। यात्रियों की ओर से अब समयसीमा बढ़ाने और मेडिकल स्क्रीनिंग के लिए अतिरिक्त सरकारी केंद्र उपलब्ध कराने की मांग तेज हो गई है।
मौजूदा व्यवस्था में हज यात्रियों को निर्धारित मेडिकल स्क्रीनिंग पूरी कर फिटनेस सर्टिफिकेट की प्रक्रिया पूरी करनी है। मुंबई में यात्रियों का कहना है कि कई जगह सामान्य मरीजों और हज यात्रियों के लिए अलग व्यवस्था नहीं होने के कारण लंबी कतार लग रही है। इसका असर खासकर बुजुर्ग यात्रियों और महिलाओं पर पड़ रहा है।
15 सितंबर की Deadline, अब सिर्फ दो दिन बाकी
Haj Committee of India ने 1 सितंबर 2026 को “Medical Screening and Uploading of Relevant Documents for Haj 2027” से संबंधित Circular No. 10 जारी किया था। महाराष्ट्र राज्य हज समिति की आधिकारिक circular सूची में भी 1 सितंबर को मेडिकल स्क्रीनिंग और संबंधित दस्तावेज अपलोड करने से जुड़ा circular दर्ज है।
ऐसे में 15 सितंबर की deadline नजदीक आने के साथ यात्रियों की चिंता बढ़ गई है। मांग की जा रही है कि जिन यात्रियों को समय पर मेडिकल जांच का अवसर नहीं मिल पा रहा है, उन्हें प्रक्रिया पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय दिया जाए।
मुंबई में मेडिकल जांच को लेकर क्या परेशानी है?
यात्रियों की शिकायत है कि उपलब्ध सरकारी मेडिकल सुविधाओं पर सामान्य मरीजों और हज यात्रियों की साझा कतार होने से इंतजार का समय बढ़ रहा है। हज यात्रा के लिए मेडिकल प्रक्रिया पूरी करने पहुंचे कई लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ रहा है।
सबसे अधिक चिंता 60 वर्ष से अधिक उम्र के यात्रियों को लेकर है। Haj-2027 Guidelines में 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के प्रत्येक यात्री के लिए विशेष medical screening का प्रावधान किया गया है। ऐसे में लंबी कतार और भीड़ के बीच वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलग सुविधा उपलब्ध कराने की मांग उठ रही है।
महिला यात्रियों के लिए भी अधिक सुविधाजनक व्यवस्था, अलग कतार और आवश्यकता के अनुसार महिला स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता जैसे मुद्दे उठाए जा रहे हैं।
Haj 2027 में Medical Screening क्यों महत्वपूर्ण है?
Haj Committee of India की Haj-2027 Guidelines के अनुसार इस बार मेडिकल स्क्रीनिंग दो चरणों में होगी। पहला चरण provisional selection के बाद और दूसरा बाद के चरण में किया जाना है। स्वास्थ्य प्रमाणपत्र और आवश्यक स्वास्थ्य संबंधी दस्तावेज Haj प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
Guidelines में Haj को शारीरिक रूप से कठिन यात्रा बताया गया है। यात्रियों को सऊदी अरब की परिस्थितियों में लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ सकती है। इसलिए यात्रा से पहले स्वास्थ्य स्थिति की जांच को महत्वपूर्ण माना गया है।
मेडिकल स्क्रीनिंग और फिटनेस सर्टिफिकेट की प्रक्रिया पूरी करना Haj की पूरी स्वास्थ्य संबंधी प्रक्रिया का पहला महत्वपूर्ण चरण है। इसके बाद यात्रियों को आवश्यक दस्तावेज अपलोड करने और अन्य निर्धारित औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी।
Haj-2027 Guidelines में selected pilgrims के लिए Health and Training (HAT) Card का भी प्रावधान है। इसके अलावा Saudi Arabia और भारत के स्वास्थ्य संबंधी निर्धारित नियमों के अनुसार जरूरी vaccination requirements पूरी करनी होंगी।
इस बार दो चरणों की medical screening होने के कारण यात्रियों के लिए शुरुआती deadline को समय पर पूरा करना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
यात्रियों की तीन प्रमुख मांगें
मुंबई में हज यात्रियों की परेशानी को देखते हुए प्रशासन से मुख्य रूप से तीन मांगें की जा रही हैं।
पहली मांग: Medical Fitness Certificate जमा करने की अंतिम तारीख 15 सितंबर से कम से कम एक महीने बढ़ाई जाए, ताकि जिन यात्रियों की जांच समय पर नहीं हो सकी है उन्हें पर्याप्त अवसर मिल सके।
दूसरी मांग: मुंबई में अधिक से अधिक BMC और अन्य निर्धारित सरकारी अस्पतालों में हज यात्रियों के लिए मेडिकल फिटनेस जांच की सुविधा उपलब्ध कराई जाए।
तीसरी मांग: सामान्य मरीजों से अलग Dedicated Queue और Special Counter शुरू किए जाएं, ताकि हज यात्रियों को सामान्य OPD की भीड़ में लंबा इंतजार न करना पड़े।
इसके अलावा वरिष्ठ नागरिकों को प्राथमिकता, महिलाओं के लिए सुविधाजनक व्यवस्था और जरूरत पड़ने पर विशेष Haj Medical Camps आयोजित करने की मांग भी उपयोगी समाधान के तौर पर सामने आ रही है।
15 सितंबर की deadline में अब सिर्फ दो दिन बाकी हैं। ऐसे में केवल समयसीमा बढ़ाना ही पर्याप्त समाधान नहीं होगा। यदि अतिरिक्त समय दिया जाता है, तो उसके साथ मेडिकल स्क्रीनिंग की क्षमता बढ़ाना भी जरूरी होगा।
मुंबई में कितने अधिकृत केंद्रों पर Haj 2027 की मेडिकल स्क्रीनिंग हो रही है, प्रतिदिन कितने यात्रियों की जांच की जा रही है और कितने यात्रियों की प्रक्रिया अभी बाकी है, इन आंकड़ों से वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।
फिलहाल इन तीनों का स्पष्ट centre-wise आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए 15 सितंबर तक सभी यात्रियों की जांच पूरी होना असंभव है, ऐसा निश्चित रूप से कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन deadline के बेहद करीब पहुंचने के बीच यात्रियों की ओर से अतिरिक्त सुविधा और समय की मांग प्रशासन के सामने एक तत्काल सार्वजनिक सुविधा का मुद्दा बन गई है।
अब नजर इस बात पर है कि BMC, महाराष्ट्र राज्य हज समिति और Haj Committee of India मुंबई के यात्रियों की परेशानी को देखते हुए अतिरिक्त मेडिकल केंद्र, अलग screening व्यवस्था या deadline में राहत को लेकर क्या कदम उठाते हैं।
महाराष्ट्र में Vertical Property Card को Land Titling Act से जोड़ने की तैयारी है। जानें फ्लैट मालिकों की जमीन हिस्सेदारी, Property Card और इसके असर की पूरी जानकारी।
मुंबई: महाराष्ट्र में जमीन और संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर सरकार बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुळे ने सितंबर 2026 में कहा है कि राज्य सरकार दिसंबर 2026 तक Land Titling Act लाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य संपत्तियों के मालिकाना हक का अधिक स्पष्ट और निश्चित रिकॉर्ड तैयार करना तथा जमीन से जुड़े विवादों को कम करना है।
इस व्यापक व्यवस्था में Vertical Property Card भी महत्वपूर्ण हो सकता है, जिसके जरिए बहुमंजिला इमारतों में अलग-अलग फ्लैट मालिकों के अधिकार और जमीन में उनके हिस्से को सरकारी रिकॉर्ड में अधिक स्पष्ट तरीके से दर्ज करने की दिशा में काम किया जा रहा है।
महाराष्ट्र में Property Card पहले से जमीन और संपत्ति के अधिकारों का सरकारी रिकॉर्ड है। भूमि अभिलेख विभाग की मौजूदा डिजिटल व्यवस्था में Property Card को ऑनलाइन देखा और डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित प्रति के रूप में डाउनलोड किया जा सकता है। सरकार का आधिकारिक पोर्टल डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित Property Card को सरकारी और कानूनी कार्यों के लिए इस्तेमाल करने की सुविधा भी बताता है।
Vertical Property Card की अवधारणा का मकसद बहुमंजिला इमारत में individual flat ownership और उससे जुड़े proportionate land interest को अधिक स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड करने की दिशा में है।
यानी बात केवल इस बात की नहीं है कि किस व्यक्ति के नाम कौन सा फ्लैट है, बल्कि यह भी है कि उस फ्लैट के मालिक का इमारत के नीचे की जमीन में संबंधित हिस्सा किस तरह रिकॉर्ड में दिखाई देगा।
क्या फ्लैट मालिक जमीन के एक अलग हिस्से का मालिक बन जाएगा?
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। Vertical Property Card का मतलब यह नहीं है कि किसी फ्लैट मालिक को इमारत के नीचे जमीन का कोई अलग और भौतिक रूप से चिन्हित टुकड़ा मिल जाएगा।
Apartment ownership के कानूनी ढांचे में जमीन और common areas में मालिक का undivided interest जुड़ा होता है। इसलिए Vertical Property Card को जमीन के अलग-अलग भौतिक टुकड़ों का बंटवारा समझना सही नहीं होगा।
यही कारण है कि इस व्यवस्था का महत्व सरकारी रिकॉर्ड में ownership और संबंधित land interest को ज्यादा स्पष्ट करने में है।
7/12, Property Card और Vertical Property Card में क्या अंतर है?
सामान्य जमीन रिकॉर्ड और बहुमंजिला इमारत के फ्लैट ownership record को एक ही चीज समझना सही नहीं है।
महाराष्ट्र भूमि अभिलेख विभाग वर्तमान में 7/12, 8A, Property Card और mutation records के लिए अलग-अलग डिजिटल सेवाएं उपलब्ध कराता है।
फ्लैट मालिक के लिए Sale Deed, Society Share Certificate, Property Card और प्रस्तावित Vertical Property Card की अपनी-अपनी भूमिका हो सकती है। इसलिए Vertical Property Card को Sale Deed या अन्य title documents का सीधा replacement मानना जल्दबाजी होगी।
प्रस्तावित Land Titling framework का बड़ा उद्देश्य property ownership को ज्यादा definitive और digitally verifiable बनाना है। सितंबर में सामने आई जानकारी के अनुसार नए सिस्टम में property ownership, measurement और valuation जैसी जानकारियों को डिजिटल रिकॉर्ड में शामिल करने तथा QR code के जरिए रिकॉर्ड तक पहुंच उपलब्ध कराने की योजना है।
सरकार का दावा है कि इससे जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद, फर्जी लेनदेन और रिकॉर्ड से जुड़ी अस्पष्टता कम करने में मदद मिलेगी।
लेकिन अभी महत्वपूर्ण बात यह है कि Land Titling Act को दिसंबर 2026 में लाने की घोषणा हुई है; इसका अंतिम कानून, नियम और विस्तृत implementation mechanism आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि अलग-अलग श्रेणी की संपत्तियों पर व्यवस्था किस तरह लागू होगी।
स्पष्ट सरकारी ownership records से भविष्य में property verification की प्रक्रिया आसान होने की संभावना है। बैंक किसी संपत्ति पर loan देने से पहले title और अन्य संबंधित दस्तावेजों की जांच करते हैं। अगर सरकारी रिकॉर्ड में ownership और property details ज्यादा व्यवस्थित तरीके से उपलब्ध हों तो यह प्रक्रिया अधिक efficient हो सकती है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि Vertical Property Card मिलते ही हर बैंक बिना किसी अतिरिक्त जांच के home loan मंजूर कर देगा। Sale deed, title chain, encumbrance, approvals और अन्य आवश्यक दस्तावेजों की जांच फिर भी परिस्थितियों के अनुसार जरूरी हो सकती है।
Redevelopment में क्यों महत्वपूर्ण हो सकता है?
मुंबई और महाराष्ट्र में redevelopment के मामलों में जमीन का title और society का अधिकार बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में individual apartment ownership और underlying land interest का सरकारी रिकॉर्ड भविष्य में documentation को अधिक स्पष्ट करने में मदद कर सकता है।
लेकिन केवल Vertical Property Card के आधार पर redevelopment rights तय होंगे, ऐसा कहना सही नहीं होगा। Conveyance, title documents, society records, development agreements और संबंधित planning तथा housing नियम भी महत्वपूर्ण रहेंगे।
क्या इससे पुराने property disputes खत्म हो जाएंगे?
ऐसा मानना जल्दबाजी होगी।
Land Titling Act का उद्देश्य ownership disputes को कम करना है, लेकिन पुराना विवाद केवल नया digital record बनने से अपने आप समाप्त नहीं हो जाता। किसी संपत्ति पर पहले से litigation, conflicting documents, mortgage या title dispute मौजूद है तो उसकी कानूनी स्थिति अलग से तय हो सकती है।
इसी तरह Vertical Property Card को पुराने title documents या court proceedings का automatic replacement नहीं माना जाना चाहिए।
पुराने फ्लैट मालिकों के लिए सबसे बड़ा सवाल
जिन लोगों ने कई साल पहले फ्लैट खरीदा है, उनके लिए मुख्य सवाल यह होगा कि नई व्यवस्था उनके existing ownership documents के साथ कैसे जुड़ेगी।
क्या उन्हें अलग से आवेदन करना होगा? कौन सा विभाग Vertical Property Card जारी करेगा? कौन से documents चाहिए होंगे? क्या existing buildings पर भी यही प्रक्रिया लागू होगी? कितनी फीस होगी? और पुराने records में गलती होने पर correction कैसे होगा?
इन सवालों का अंतिम जवाब Land Titling framework और उससे जुड़े नियम/सरकारी अधिसूचनाओं के बाद ज्यादा स्पष्ट होगा। फिलहाल महाराष्ट्र के भूमि अभिलेख विभाग की मौजूदा सेवाओं में Property Card और उससे जुड़े digital तथा mutation services उपलब्ध हैं।
सरकार की मौजूदा डिजिटल व्यवस्था कितनी आगे बढ़ी है?
महाराष्ट्र का भूमि अभिलेख विभाग पहले से 7/12, 8A, Property Card, e-Ferfar, document verification और digital land-record services चला रहा है। विभाग के आधिकारिक पोर्टल पर digitally signed Property Card डाउनलोड करने की सुविधा भी उपलब्ध है।
इसलिए प्रस्तावित Land Titling system को पूरी तरह नई शुरुआत के बजाय मौजूदा digital land-record infrastructure को एक अधिक व्यापक ownership framework में ले जाने की दिशा में भी देखा जा सकता है।
अब आगे क्या होगा?
सबसे महत्वपूर्ण अगला पड़ाव दिसंबर 2026 का Winter Session है, जहां सरकार Land Titling Act को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है। इसके बाद कानून के अंतिम प्रावधानों और implementation rules से यह ज्यादा स्पष्ट होगा कि Vertical Property Card किन संपत्तियों पर, किस प्रक्रिया से और किस authority के माध्यम से लागू होगा।
फ्लैट मालिकों के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि Vertical Property Card को केवल एक नए दस्तावेज के रूप में नहीं, बल्कि महाराष्ट्र में property ownership records को अधिक स्पष्ट और digitally verifiable बनाने वाले बड़े land-record reform के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
BMC के ‘मोदक महोत्सव 2026’ में महिला बचत समूहों द्वारा तैयार उकडी और तले हुए मोदक मुंबईकरों को मिलेंगे। 14 सितंबर से होम डिलीवरी के लिए shgeshop.com पर ऑनलाइन पंजीकरण कर सकेंगे।
मुंबई: गणपति बाप्पा के आगमन के साथ ही घरों में नैवेद्य की तैयारियां शुरू हो गई हैं। गणेशोत्सव में भगवान गणेश को प्रिय माने जाने वाले मोदक की मांग को देखते हुए बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) की ओर से इस वर्ष ‘मोदक महोत्सव 2026’ का आयोजन किया गया है। इस पहल के तहत BMC द्वारा संचालित महिला बचत समूहों द्वारा तैयार किए गए उकडी के और तले हुए मोदक मुंबईकरों के लिए उपलब्ध कराए जाएंगे।
इस पहल के तहत नागरिकों को मोदक खरीदने के लिए ऑनलाइन पंजीकरण की सुविधा भी दी गई है। https://shgeshop.com वेबसाइट के माध्यम से पूरे गणेशोत्सव के दौरान ऑनलाइन ऑर्डर किया जा सकेगा। ऑनलाइन पंजीकरण करने वाले नागरिकों को 14 सितंबर 2026 से मोदक की होम डिलीवरी उपलब्ध कराई जाएगी।
BMC के नियोजन विभाग के अनुसार, मोदक की होम डिलीवरी का लाभ लेने के लिए मुंबईकरों को कम से कम एक दिन पहले ऑनलाइन पंजीकरण करना होगा। यह होम डिलीवरी सेवा केवल मुंबई क्षेत्र में उपलब्ध रहेगी।
‘मोदक महोत्सव 2026’ पूरे गणेशोत्सव काल के दौरान जारी रहेगा। इसके तहत नागरिकों को उकडी के साथ-साथ तले हुए मोदक भी उपलब्ध होंगे।
गणेशोत्सव के दौरान मोदक की बढ़ती मांग को ध्यान में रखते हुए BMC द्वारा आर्थिक सहायता प्राप्त महिला बचत समूहों के माध्यम से इस महोत्सव का आयोजन किया गया है। इन समूहों द्वारा तैयार किए गए मोदक गणेशोत्सव के पूरे कालखंड में ग्राहकों के लिए उपलब्ध रहेंगे।
इस पहल का उद्देश्य केवल गणेशोत्सव के दौरान नागरिकों को मोदक उपलब्ध कराना ही नहीं, बल्कि महिला बचत समूहों के उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराना और उनके व्यवसाय को बढ़ावा देना भी है।
मुंबई महानगर में महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम और आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से BMC के माध्यम से महिला बचत समूहों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इन समूहों द्वारा तैयार किए जाने वाले विभिन्न उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने, उनके व्यवसाय को गति देने और उन्हें अधिक व्यावसायिक अवसर उपलब्ध कराने के लिए BMC की ओर से अलग-अलग नवाचारपूर्ण और व्यवसाय-केंद्रित पहल की जाती हैं।
इसी प्रयास के तहत इस वर्ष गणेशोत्सव के अवसर पर ‘मोदक महोत्सव 2026’ आयोजित किया गया है।
BMC के अनुसार, इस पहल के माध्यम से महिला बचत समूहों द्वारा तैयार किए गए गुणवत्तापूर्ण मोदक नागरिकों को उपलब्ध होंगे। साथ ही, मुंबईकरों को गणेशोत्सव की खुशियों के साथ महिला उद्यमियों को प्रोत्साहित करने का अवसर भी मिलेगा।
इस संबंध में निदेशक (नियोजन) डॉ. (श्रीमती) प्राची जांभेकर ने जानकारी दी कि महिला बचत समूहों के उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने और उनके व्यवसाय को प्रोत्साहित करने की दिशा में यह पहल महत्वपूर्ण है।
मीनल तुर्डे के मार्गदर्शन में आयोजन
यह उपक्रम महिला व बालकल्याण समिति की अध्यक्षा श्रीमती मीनल तुर्डे के मार्गदर्शन में चलाया जा रहा है।
BMC की ओर से मुंबईकरों से अपील की गई है कि वे ‘मोदक महोत्सव 2026’ को उत्स्फूर्त प्रतिसाद दें और महिला बचत समूहों द्वारा तैयार किए गए उत्पादों को प्रोत्साहित करें।
मुंबई रेलवे में प्रतिबंधित गुटखा तस्करी के आरोप में दो GRP कांस्टेबल निलंबित। गुजरात से ट्रेनों के जरिए खेप पहुंचाने के आरोपों की जांच जारी।
मुंबई:मुंबई रेलवे पुलिस ने प्रतिबंधित गुटखे की कथित तस्करी में मदद करने के आरोप में दो कांस्टेबलों को निलंबित किया है। 7 सितंबर को की गई इस कार्रवाई के बाद अब जांच का दायरा केवल दो पुलिसकर्मियों तक सीमित नहीं रहने के संकेत हैं। आरोप है कि गुजरात से मुंबई तक गुटखे की खेप पहुंचाने के लिए रेलवे की लंबी दूरी की ट्रेनों और उनके भंडारण क्षेत्रों का इस्तेमाल किया जाता था।
निलंबित पुलिसकर्मियों की पहचान अनिल गुजर, बोरीवली रेलवे पुलिस थाने में तैनात कांस्टेबल और तुषार ठाकुर, वसई रेलवे पुलिस थाने में तैनात कांस्टेबल के रूप में हुई है। वरिष्ठ रेलवे पुलिस अधिकारी के अनुसार, दोनों के खिलाफ एक नागरिक की शिकायत मिलने के बाद विभागीय जांच की गई थी। जांच में उनकी कथित भूमिका सामने आने के बाद मुंबई रेलवे पुलिस आयुक्त एम. राकेश कलासागर ने निलंबन की कार्रवाई की।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार शिकायत में आरोप लगाया गया था कि दोनों पुलिसकर्मी गुटखा आपूर्तिकर्ताओं के संपर्क में थे और प्रतिबंधित माल की खेप को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने में मदद करते थे। जांच के दौरान उनकी कथित भूमिका सामने आने के बाद विभागीय कार्रवाई की गई।
मामले को गंभीर इसलिए माना जा रहा है क्योंकि सूत्रों ने आरोप लगाया है कि केवल पुलिसकर्मियों की भूमिका नहीं थी। कथित तौर पर कुछ भंडारण ठेकेदारों को भुगतान कर खेपों की आवाजाही आसान बनाई जाती थी। कुछ रेलवे सुरक्षा बल और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के कर्मियों को भी नियमित रूप से खेप गुजरने देने के लिए भुगतान किए जाने का आरोप है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और जांच में संबंधित लोगों की भूमिका स्पष्ट होना बाकी है।
जांच से जुड़े सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक गुटखे के पैकेट काले बैगों में रखकर ट्रेनों में छिपाए जाते थे। एक वीडियो में वातानुकूलित कोच के भंडारण हिस्से में गुटखे से भरे बैग दिखाई देने का दावा किया गया है।
आरोप है कि कुछ खेपें वसई या बोरीवली से ट्रेनों में चढ़ाई जाती थीं और बाद में बांद्रा टर्मिनस पहुंचने के बाद टैक्सी या दूसरे वाहनों के जरिए आगे भेजी जाती थीं। मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों के इस्तेमाल की भी बात सामने आई है।
जिन ट्रेनों के नाम इस मामले से जुड़े आरोपों में सामने आए हैं, उनमें सूर्यनगरी एक्सप्रेस, गोल्डन टेंपल मेल, गरीब रथ एक्सप्रेस, अवध एक्सप्रेस, भावनगर एक्सप्रेस और हरिद्वार एक्सप्रेस शामिल हैं। हालांकि, इन सभी ट्रेनों के जरिए नियमित रूप से गुटखा तस्करी होने की स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।
जुलाई में 320 किलो गुटखा पकड़ा गया था
इस कार्रवाई से पहले 30 जुलाई 2026 को बोरीवली रेलवे स्टेशन पर प्रतिबंधित तंबाकू उत्पादों की बड़ी खेप पकड़ी गई थी। रेलवे विजिलेंस ने बांद्रा टर्मिनस-अजमेर सुपरफास्ट एक्सप्रेस के कोच एस-2 से करीब 320 किलोग्राम तंबाकू, पान मसाला और गुटखा उत्पाद जब्त किए थे। इनकी अनुमानित कीमत करीब 1.70 लाख रुपये बताई गई थी। एक व्यक्ति को पकड़े जाने के बाद आरोपी और जब्त माल को रेलवे पुलिस के हवाले किया गया था।
हालांकि, जुलाई में पकड़ी गई इस खेप और सितंबर में निलंबित किए गए दोनों कांस्टेबलों के बीच सीधे संबंध की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए दोनों घटनाओं को एक ही गिरोह या नेटवर्क की कार्रवाई के रूप में देखना फिलहाल जल्दबाजी होगी।
GRP के साथ RPF की भूमिका पर भी सवाल
मौजूदा आरोपों में कुछ रेलवे सुरक्षा बल कर्मियों की कथित भूमिका का भी उल्लेख है। ऐसे में जांच का एक अहम सवाल यह है कि यदि प्रतिबंधित सामान नियमित रूप से रेलवे के जरिए पहुंच रहा था, तो सुरक्षा और जांच की अलग-अलग व्यवस्थाओं के बावजूद वह लगातार कैसे आगे बढ़ता रहा।
रेलवे पुलिस और रेलवे सुरक्षा बल की जिम्मेदारियां अलग हैं। GRP राज्य पुलिस व्यवस्था का हिस्सा होकर रेलवे परिसर में अपराध और कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों को संभालती है, जबकि RPF रेलवे संपत्ति और यात्रियों की सुरक्षा से संबंधित जिम्मेदारियां निभाती है। इसलिए दोनों एजेंसियों से जुड़े किसी भी कर्मचारी की कथित मिलीभगत की पुष्टि होने पर मामला सिर्फ तस्करी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रेलवे सुरक्षा व्यवस्था की जवाबदेही का सवाल भी उठेगा।
मुंबई रेलवे में पहले भी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई हुई
मुंबई रेलवे पुलिस में पिछले वर्ष भी पुलिसकर्मियों की कथित मिलीभगत और भ्रष्टाचार से जुड़े कई मामले सामने आए थे। सितंबर 2025 में पांच महीनों के भीतर 13 GRP कर्मियों को यात्रियों से कथित जबरन वसूली के आरोप में निलंबित किए जाने की जानकारी सामने आई थी। कार्रवाई मुंबई सेंट्रल, दादर, कुर्ला, बांद्रा टर्मिनस, बोरीवली, ठाणे, कल्याण और पनवेल जैसे स्टेशनों से जुड़े मामलों में हुई थी।
इन मामलों में यात्रियों के सामान की जांच के दौरान कथित तौर पर उन्हें ऐसे कमरों में ले जाने की शिकायतें सामने आई थीं, जहां सीसीटीवी निगरानी नहीं थी। बाद में रेलवे पुलिस ने सामान की जांच सीसीटीवी की निगरानी में करने और प्रक्रिया को अधिक जवाबदेह बनाने के लिए दिशानिर्देशों पर काम किया था।
इसी दौरान वसई रेलवे स्टेशन से जुड़े एक मामले में तीन GRP कांस्टेबलों को भी कथित वसूली के आरोप में निलंबित किया गया था।
हालांकि, इन पुराने मामलों और वर्तमान गुटखा तस्करी मामले के बीच कोई सीधा संबंध आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आया है।
गुटखा और तंबाकू-युक्त ऐसे खाद्य उत्पादों पर महाराष्ट्र में प्रतिबंध लंबे समय से लागू है। प्रतिबंध का आधार खाद्य सुरक्षा नियमों के तहत खाद्य पदार्थों में तंबाकू और निकोटीन के इस्तेमाल पर रोक है। इसलिए मामला केवल अवैध बिक्री का नहीं, बल्कि प्रतिबंधित उत्पाद के निर्माण, भंडारण, परिवहन और वितरण से भी जुड़ सकता है।
गुटखा स्वास्थ्य के लिहाज से भी गंभीर चिंता का विषय है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और कैंसर अनुसंधान से जुड़े अंतरराष्ट्रीय स्रोतों के अनुसार धूम्ररहित तंबाकू उत्पादों का इस्तेमाल मुंह और अन्य कैंसर सहित कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा है।
दो कांस्टेबलों के निलंबन के बाद जांच के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल हैं। क्या कथित आपूर्तिकर्ताओं की पहचान हुई है? क्या भंडारण ठेकेदारों से पूछताछ की जा रही है? क्या किसी RPF या अन्य सुरक्षा कर्मचारी की भूमिका की औपचारिक जांच हो रही है? क्या जुलाई में पकड़ी गई 320 किलो की खेप और मौजूदा मामले के बीच कोई संबंध सामने आया है?
इसके अलावा, जिन ट्रेनों के नाम जांच से जुड़े आरोपों में सामने आए हैं, उनके सीसीटीवी फुटेज, स्टेशन स्तर के रिकॉर्ड और संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की जांच भी मामले की दिशा स्पष्ट कर सकती है।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर दो GRP कांस्टेबलों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई हो चुकी है, जबकि कथित व्यापक नेटवर्क में शामिल अन्य लोगों की भूमिका की पुष्टि जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
Cheque Bounce Case में समझौते के बाद दोषसिद्धि खत्म करने का रास्ता कैसे खुलता है? Bombay HC के 2019 फैसले और 2026 के Supreme Court आदेश से समझिए।
मुंबई: चेक बाउंस मामले में दोषसिद्धि के बाद भी समझौते से राहत मिल सकती है। बॉम्बे हाई कोर्ट के 4 अक्टूबर 2019 के एक फैसले में ललिता कमल व्यास की दोषसिद्धि और उसके खिलाफ पारित निचली अदालतों के आदेश रद्द कर दिए गए थे। इस पुराने फैसले की कानूनी अहमियत अब इसलिए फिर सामने आती है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 2025 और 2026 में भी चेक अनादरण के मामलों में दोषसिद्धि के बाद समझौते को स्वीकार करते हुए राहत दी है।
ललिता कमल व्यास मामले में क्या हुआ था?
ललिता कमल व्यास को मुंबई के अंधेरी स्थित 48वें महानगरीय मजिस्ट्रेट न्यायालय ने परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत दोषी ठहराया था। यह मामला C.C. No. 4281/SS/2017 से संबंधित था। 8 मार्च 2018 के इस आदेश को चुनौती दी गई, लेकिन 19 जनवरी 2019 को सत्र न्यायालय ने भी दोषसिद्धि को बरकरार रखा। इसके बाद मामला बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा।
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता और ललिता कमल व्यास के बीच विवाद आपसी समझौते से समाप्त हो गया। दोनों पक्षों ने 1 अक्टूबर 2019 को समझौता शर्तें और सहमति पत्र तैयार किया। शिकायतकर्ता की ओर से शपथपत्र भी दिया गया, जिसमें उसने आरोपी के खिलाफ आगे कोई शिकायत या दावा नहीं होने की बात कही।
शिकायतकर्ता अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुआ और समझौते की पुष्टि की। इसके बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने निचली अदालत और सत्र न्यायालय के आदेशों को रद्द करते हुए ललिता कमल व्यास को धारा 138 के अपराध से बरी कर दिया। यह फैसला न्यायमूर्ति एस.एस. शिंदे ने 4 अक्टूबर 2019 को सुनाया था।
क्या दोषसिद्धि के बाद भी चेक बाउंस मामले में समझौता हो सकता है?
यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है।
परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 147 के तहत धारा 138 का अपराध समझौते के जरिए समाप्त किया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि मामला केवल इसलिए खत्म होने की संभावना से बाहर नहीं हो जाता कि आरोपी को पहले ही दोषी ठहराया जा चुका है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच निजी समझौता होते ही दोषसिद्धि अपने आप समाप्त हो जाती है। समझौते को न्यायिक प्रक्रिया के तहत स्वीकार किया जाना जरूरी है और अदालत के सामने पक्षों की सहमति तथा समझौते की शर्तों को रिकॉर्ड पर लाना महत्वपूर्ण होता है।
इस कानूनी स्थिति को अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने और स्पष्ट किया।
Gian Chand Garg बनाम Harpal Singh मामले में आरोपी को धारा 138 के तहत दोषी ठहराया गया था। निचली अदालत की दोषसिद्धि को अपीलीय अदालत ने बरकरार रखा और पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका भी खारिज हो गई। इसके बाद 6 अप्रैल 2025 को शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच समझौता हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 147 के कारण धारा 138 का अपराध समझौते योग्य है और पक्षों के स्वैच्छिक समझौते की स्थिति में कार्यवाही को उचित चरण पर समाप्त किया जा सकता है। अदालत ने शिकायतकर्ता द्वारा पूर्ण और अंतिम समझौते के रूप में राशि स्वीकार किए जाने के बाद दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया।
2026 का सुप्रीम कोर्ट फैसला: जेल जाने के बाद भी मिली राहत
इस कानूनी स्थिति का सबसे ताजा और महत्वपूर्ण उदाहरण Parsharvanath Weld Wires Pvt. Ltd. बनाम State of Chhattisgarh है।
इस मामले में धारा 138 के तहत दोषसिद्धि के बाद आरोपी को एक वर्ष के साधारण कारावास और शिकायतकर्ता को 28 लाख रुपये मुआवजा देने की सजा मिली थी। सत्र न्यायालय और बाद में हाई कोर्ट ने भी दोषसिद्धि को बरकरार रखा।
मामला यहां तक पहुंच गया कि कंपनी के निदेशक को 23 अप्रैल 2026 को सजा भुगतने के लिए जेल भेज दिया गया। इसके केवल दो दिन बाद, 25 अप्रैल को दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया। समझौते के तहत शिकायतकर्ता को 30 लाख रुपये देकर पूरे विवाद का अंतिम निपटारा किया गया।
निचली अदालत और हाई कोर्ट ने अंतिम दोषसिद्धि के बाद मामले को दोबारा खोलने पर राहत देने से इनकार किया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 को समझौता स्वीकार करते हुए धारा 138 के अपराध को समझौते के जरिए समाप्त किया और दोषसिद्धि तथा सजा को रद्द कर दिया। अदालत ने केंद्रीय जेल, रायपुर के अधीक्षक को आरोपी को तत्काल रिहा करने का निर्देश भी दिया।
इसका सीधा मतलब क्या है?
इन फैसलों से यह स्पष्ट होता है कि चेक बाउंस मामले में दोषसिद्धि हो जाने के बाद भी समझौते का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होता।
लेकिन इसे स्वतः मिलने वाली राहत नहीं माना जा सकता। शिकायतकर्ता की स्वैच्छिक सहमति, समझौते की वास्तविक शर्तें, भुगतान और मामले की न्यायिक स्थिति जैसे पहलू महत्वपूर्ण होते हैं। अदालत ही यह तय करती है कि समझौते को स्वीकार कर दोषसिद्धि और सजा समाप्त की जा सकती है या नहीं।
2025 के Gian Chand Garg फैसले और 2026 के Parsharvanath Weld Wires फैसले ने इस बात को और मजबूत किया है कि केवल इस आधार पर समझौते को अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि धारा 138 के मामले में दोषसिद्धि पहले ही अंतिम स्तर तक पहुंच चुकी है।
ललिता कमल व्यास के फैसले की आज क्यों चर्चा हो रही है?
ललिता कमल व्यास का मामला स्वयं 2026 का नया फैसला नहीं है। बॉम्बे हाई कोर्ट का मूल निर्णय 4 अक्टूबर 2019 का है। हाल में कानूनी वेबसाइटों पर इस पुराने फैसले को दोबारा प्रकाशित या सूचीबद्ध किए जाने के कारण यह मामला फिर सामने आया है।
इसकी मौजूदा प्रासंगिकता इसलिए है क्योंकि 2025 और 2026 में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने उसी व्यापक कानूनी सिद्धांत को आगे स्पष्ट किया है—यानी धारा 138 के मामले में स्वैच्छिक समझौते के बाद, उचित न्यायिक प्रक्रिया के जरिए दोषसिद्धि और सजा समाप्त की जा सकती है।
क्या हर चेक बाउंस मामले में समझौते के बाद सजा खत्म हो जाएगी?
समझौता होने के बाद भी उसे अदालत के समक्ष उचित तरीके से प्रस्तुत करना और न्यायिक आदेश प्राप्त करना जरूरी है। इसके अलावा, समझौते की शर्तें पूरी हुई हैं या नहीं और शिकायतकर्ता की सहमति वास्तविक और स्वैच्छिक है या नहीं, यह भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
इसलिए धारा 138 के किसी मामले में केवल निजी समझौता हो जाने को अपने आप दोषसिद्धि समाप्त होने के बराबर नहीं माना जाना चाहिए।
आम लोगों के लिए क्या मायने रखता है?
चेक अनादरण के मामलों में मुकदमा लंबा चलने के बावजूद विवाद को समझौते से समाप्त करने का रास्ता उपलब्ध रह सकता है। यहां तक कि दोषसिद्धि के बाद भी अदालत के समक्ष समझौते के आधार पर राहत मांगी जा सकती है।
ललिता कमल व्यास का 2019 का बॉम्बे हाई कोर्ट फैसला और 2025-26 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले मिलकर यह दिखाते हैं कि धारा 138 के मामलों में समझौता केवल मुकदमे की शुरुआती अवस्था तक सीमित विकल्प नहीं है।