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  • मुंबई में 30 लाख घरों का बड़ा प्लान, 2047 तक बदलेगी आवास की तस्वीर; SRA-MHADA की बड़ी भूमिका

    मुंबई में 30 लाख घरों का बड़ा प्लान, 2047 तक बदलेगी आवास की तस्वीर; SRA-MHADA की बड़ी भूमिका

    मुंबई और एमएमआर में 2047 तक 30 लाख किफायती घर बनाने का प्लान सामने आया है। SRA-MHADA से लेकर कीमत, पुनर्विकास और परिवहन तक जानिए असर।

    मुंबई: मुंबई महानगर क्षेत्र यानी एमएमआर में आने वाले वर्षों में घरों की तस्वीर बड़े स्तर पर बदलने की तैयारी है। महाराष्ट्र सरकार ने 2047 तक मुंबई और पूरे एमएमआर में 30 लाख किफायती घर तैयार करने का बड़ा लक्ष्य रखा है। उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने बताया कि इसमें अकेले मुंबई के लिए 10 लाख और एमएमआर के बाकी हिस्सों के लिए 20 लाख घरों का लक्ष्य रखा गया है।

    सरकार की योजना सिर्फ नए फ्लैट बनाने तक सीमित नहीं है। इसके साथ झोपड़पट्टी पुनर्वास, पुराने भवनों का पुनर्विकास, क्लस्टर विकास, किराये के आवास, परिवहन और एमएमआर के नए विकास क्षेत्रों को भी जोड़ा गया है। इसका असर मुंबई, ठाणे, नवी मुंबई, भिवंडी, कल्याण-डोंबिवली और आसपास के तेजी से बढ़ते इलाकों की आवास व्यवस्था और आबादी के फैलाव पर पड़ सकता है।

    मुंबई में 10 लाख और एमएमआर में 20 लाख घर

    सरकार के मुताबिक मुंबई में करीब 10 लाख घरों की जरूरत को पूरा करने के लिए 6 लाख घर एसआरए के माध्यम से और 4 लाख घर म्हाडा तथा दूसरी आवासीय परियोजनाओं के जरिए तैयार करने की योजना है।

    वहीं मुंबई के बाहर एमएमआर के अलग-अलग हिस्सों में 20 लाख अतिरिक्त घर बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें ठाणे, मीरा-भायंदर, कल्याण-डोंबिवली, नवी मुंबई, उल्हासनगर और भिवंडी जैसे इलाके शामिल हैं।

    2047 तक 30 लाख घर तैयार करने के आंकड़े को मौजूदा समयसीमा के हिसाब से देखें तो औसतन हर साल करीब 1.5 लाख घर तैयार करने पड़ेंगे। यह सरकार का घोषित सालाना लक्ष्य नहीं है, बल्कि कुल लक्ष्य और समयसीमा से निकला सामान्य गणित है। इससे योजना के पैमाने का अंदाजा लगाया जा सकता है।

    एसआरए के 6 लाख घरों का मतलब आम खरीदारों के लिए 6 लाख फ्लैट नहीं

    मुंबई के 10 लाख घरों में सबसे बड़ा हिस्सा एसआरए के जरिए आने वाला है। हालांकि एसआरए के इन घरों को आम खरीदारों के लिए उपलब्ध 6 लाख सस्ते फ्लैट समझना सही नहीं होगा।

    एसआरए यानी झोपड़पट्टी पुनर्वसन प्राधिकरण का मुख्य काम पात्र झोपड़पट्टी निवासियों का पुनर्वास करना है। इसलिए 6 लाख का यह हिस्सा मुख्य रूप से पुनर्विकास और पुनर्वास से जुड़ा होगा।

    इसके मुकाबले म्हाडा अलग-अलग आय वर्गों के लिए आवास योजनाएं चलाता है। इसलिए आने वाले समय में 30 लाख घरों की पूरी योजना में किस एजेंसी से कितने घर आएंगे और उनमें कितने घर बिक्री के लिए उपलब्ध होंगे, यह तस्वीर महत्वपूर्ण होगी।

    ‘किफायती घर’ की कीमत अभी सबसे बड़ा मुद्दा

    सरकार ने घरों की संख्या और एजेंसियों की भूमिका का बड़ा खाका सामने रखा है, लेकिन 30 लाख घरों की अंतिम कीमत, कारपेट एरिया, आय वर्ग के हिसाब से पात्रता और खरीद की शर्तों का पूरा विवरण अभी सामने नहीं आया है।

    मुंबई जैसे शहर में किफायती घर का मतलब सिर्फ बाजार कीमत से तय नहीं होता। परिवार की आय, होम लोन की किस्त, डाउन पेमेंट और रोज के यात्रा खर्च को जोड़कर ही किसी घर की वास्तविक affordability समझ आती है।

    2026 के Knight Frank affordability आंकड़ों के मुताबिक एमएमआर देश के प्रमुख आवास बाजारों में सबसे कम किफायती बाजार बना हुआ है। यहां सामान्य परिवार की आय का करीब 69 प्रतिशत हिस्सा होम लोन की मासिक किस्त में जा सकता है, जबकि 50 प्रतिशत को affordability की सीमा माना जाता है।

    ऐसे में 30 लाख घरों की योजना का असली असर उनकी संख्या के साथ-साथ कीमत तय होने पर भी निर्भर करेगा।

    म्हाडा के कुछ हजार घरों के लिए हजारों आवेदन

    मुंबई में सरकारी घरों की मांग का दबाव पहले से दिखाई देता है। 2026 की म्हाडा मुंबई बोर्ड लॉटरी में 2,640 घरों के लिए करीब 78,976 आवेदन आए थे। इनमें 55,244 आवेदकों ने ईएमडी भी जमा की थी।

    इससे साफ है कि सीमित संख्या में उपलब्ध घरों के लिए भी बड़ी संख्या में परिवार आवेदन करते हैं।

    ऐसे माहौल में 30 लाख घरों की योजना अगर चरणबद्ध तरीके से जमीन पर आती है तो आवास की कमी को कम करने का बड़ा मौका बन सकता है। लेकिन घरों की कीमत और पात्रता तय करते समय उन परिवारों को केंद्र में रखना होगा जिनके लिए यह योजना बनाई जा रही है।

    2030 के पुराने 30 लाख लक्ष्य के बाद अब 2047 का लक्ष्य

    नई घोषणा के साथ आवास नीति का एक पुराना अध्याय भी फिर चर्चा में आ गया है।

    2024 में एमएमआर के विकास से जुड़े रोडमैप में 2030 तक 30 लाख किफायती घरों की जरूरत और लक्ष्य सामने आया था। उस समय म्हाडा की तरफ से मुंबई में 2.5 लाख समेत करीब 8 लाख घरों की भूमिका की बात सामने आई थी।

    अब 2047 तक 30 लाख घरों का नया लक्ष्य सामने आया है।

    इसलिए दोनों योजनाओं के बीच स्पष्ट अंतर समझना जरूरी होगा। अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह मानना सही नहीं होगा कि 2047 तक पुराने 30 लाख के ऊपर 30 लाख अतिरिक्त घर बनाए जाएंगे। सरकार की ओर से दोनों लक्ष्यों का स्पष्ट संबंध सामने आने के बाद ही पूरी तस्वीर साफ होगी।

    पुराने और जर्जर भवनों के पुनर्विकास को भी मिलेगा जोर

    मुंबई और ठाणे में पुराने और जर्जर भवनों का पुनर्विकास लंबे समय से बड़ा मुद्दा रहा है। सरकार का कहना है कि यूडीसीपीआर लागू होने से पुराने भवनों के पुनर्विकास का रास्ता आसान हुआ है।

    इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि मुंबई के कई घने इलाकों में पुरानी इमारतों की जगह नई इमारतें बनाना सिर्फ आवास बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।

    सरकार ने पागड़ी सिस्टम वाली इमारतों और कपड़ा मिलों की जमीन पर बनी चालों के पुनर्विकास को भी गति देने की बात कही है। ओसी से जुड़े मामलों के लिए अभय योजना का भी उल्लेख किया गया है।

    क्लस्टर विकास में सिर्फ नई बिल्डिंग नहीं

    अनधिकृत और पुराने इलाकों के पुनर्विकास के लिए क्लस्टर विकास योजना को भी इस बड़े आवास अभियान से जोड़ा गया है।

    सरकार के मुताबिक क्लस्टर विकास में सिर्फ ऊंची इमारतें खड़ी करने के बजाय पूरे इलाके को बेहतर सुविधाओं के साथ विकसित करने का लक्ष्य है। इसमें डिजिटल लाइब्रेरी, खुले स्थान, कम्युनिटी हॉल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और महिला सशक्तिकरण केंद्र समेत 23 तरह की नागरिक सुविधाओं का प्रावधान बताया गया है।

    अगर ये सुविधाएं घरों के साथ जमीन पर उतरती हैं तो पुनर्विकास का असर सिर्फ मकान बदलने तक सीमित नहीं रहेगा।

    घर के साथ किराये का विकल्प भी जरूरी

    मुंबई में हर परिवार घर खरीदने की स्थिति में नहीं है। बड़ी संख्या में लोग नौकरी, पढ़ाई या दूसरे कामों के लिए किराये पर रहते हैं।

    एमएमआरडीए की Rental Housing योजना में 51 प्रस्तावों के जरिए करीब 97,574 किराये के आवास बनने की संभावना बताई गई है। ऐसे में आने वाले वर्षों में किफायती आवास के साथ किराये के आवास की भूमिका भी अहम हो सकती है।

    30 लाख घरों के बड़े लक्ष्य में खरीद के लिए घरों के साथ कम आय वाले परिवारों के लिए सस्ते किराये के आवास कितने होंगे, यह भी आवास नीति की सफलता तय करने वाला महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।

    सिर्फ घर सस्ता होने से जिंदगी सस्ती नहीं होगी

    मुंबई की आवास समस्या को परिवहन से अलग करके देखना मुश्किल है।

    अगर एमएमआर में नए घर शहर के बाहरी हिस्सों में बड़ी संख्या में बनते हैं और लोगों का रोजगार मुंबई या किसी दूसरे दूर के इलाके में रहता है, तो रोज का लंबा सफर परिवार की कुल लागत बढ़ा सकता है।

    मुंबई के निम्न आय वर्ग की परिवहन सुविधा पर हुए एक अध्ययन में सार्वजनिक परिवहन की पहुंच और लागत को बड़ी चुनौती बताया गया है। इसलिए नया घर तभी वास्तविक राहत देगा जब उसके साथ बेहतर सार्वजनिक परिवहन और रोजगार तक आसान पहुंच भी हो।

    यही कारण है कि सरकार ने आवास विस्तार के साथ ठाणे आंतरिक रिंग मेट्रो जैसी परियोजनाओं पर भी जोर दिया है।

    ठाणे रिंग मेट्रो से बढ़ेगी कनेक्टिविटी

    ठाणे आंतरिक रिंग मेट्रो का उद्देश्य ठाणे में रेलवे स्टेशनों पर दबाव कम करना, यात्रा का समय घटाना और अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी बेहतर करना बताया गया है।

    एमएमआर में लाखों नए घर तैयार होने के साथ अगर सार्वजनिक परिवहन का नेटवर्क भी बढ़ता है तो नए आवासीय क्षेत्रों और रोजगार केंद्रों के बीच दूरी कम करने में मदद मिल सकती है।

    हालांकि इस परियोजना को लेकर कुछ नागरिकों ने मार्ग, यातायात, पर्यावरण और स्थानीय परामर्श से जुड़े सवाल भी उठाए हैं। ऐसे में परियोजना की रफ्तार के साथ उसका स्थानीय प्रभाव भी महत्वपूर्ण रहेगा।

    पुनर्वास के बाद रोजी-रोटी का असर भी अहम

    एसआरए और बड़े पुनर्विकास प्रोजेक्ट्स का असर केवल घर मिलने तक नहीं रहता।

    नया घर अगर पुराने इलाके से काफी दूर चला जाता है तो परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी बदल सकती है। नौकरी तक पहुंचने का समय और खर्च बढ़ सकता है, बच्चों को स्कूल बदलना पड़ सकता है और छोटे कारोबार या स्थानीय ग्राहकों पर निर्भर लोगों की आय प्रभावित हो सकती है।

    इसीलिए पुनर्वास की सफलता सिर्फ इस आधार पर नहीं मापी जा सकती कि कितने फ्लैट तैयार हुए। घर के साथ रोजगार, स्कूल, अस्पताल, बाजार और सार्वजनिक परिवहन की दूरी भी महत्वपूर्ण होगी।

    पुनर्विकास के दौरान ट्रांजिट रेंट भी अहम

    पुराने घर से नए घर में जाने के बीच परिवारों को अस्थायी रूप से कहीं और रहना पड़ता है। ऐसे में ट्रांजिट आवास और ट्रांजिट रेंट की व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है।

    एसआरए से जुड़े न्यायिक मामलों में भी ट्रांजिट आवास और किराये के भुगतान को लेकर विवाद सामने आए हैं।

    भविष्य के बड़े पुनर्विकास मॉडल में निर्माण पूरा होने तक परिवारों के रहने और किराये की व्यवस्था को स्पष्ट करना भी उतना ही जरूरी होगा जितना नया घर बनाना।

    ‘तीसरी मुंबई’ से बदल सकता है एमएमआर का अगला नक्शा

    सरकार ने भविष्य के विकास को मौजूदा मुंबई और उसके उपनगरों तक सीमित नहीं रखा है। नवी मुंबई एयरपोर्ट, अटल सेतु और जेएनपीए के आसपास ‘तीसरी मुंबई’ विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना भी सामने रखी गई है।

    इस क्षेत्र में Aerocity, Medicity, Sports City, Educity और IT-Fintech Hub जैसे आधुनिक विकास क्षेत्र तैयार करने की योजना बताई गई है।

    अगर इन इलाकों में घरों के साथ रोजगार भी विकसित होते हैं तो एमएमआर में लोगों को रोज मुंबई शहर तक आने की जरूरत कम हो सकती है। इससे आने वाले वर्षों में आवास और रोजगार का केंद्र धीरे-धीरे और ज्यादा अलग-अलग इलाकों में फैल सकता है।

    30 लाख घरों के साथ 1 करोड़ से ज्यादा लोगों की क्षमता

    30 लाख घरों को सिर्फ इमारतों की संख्या के रूप में देखना इस योजना के पैमाने को छोटा करके देखने जैसा होगा।

    अगर औसतन एक घर में 3.5 से 4 लोग रहते हैं तो 30 लाख घर लगभग 1.05 से 1.20 करोड़ लोगों की आवास क्षमता के बराबर हो सकते हैं। यह केवल समझाने के लिए किया गया अनुमान है, सरकार की घोषित आबादी का आंकड़ा नहीं।

    इतनी बड़ी आबादी के लिए पानी, सीवेज, बिजली, सड़क, स्कूल, अस्पताल, बस, मेट्रो, पार्क, बाजार, कचरा प्रबंधन, अग्निशमन और सुरक्षा व्यवस्था भी साथ में बढ़ानी होगी।

    यानी 30 लाख घरों का लक्ष्य असल में एमएमआर के अगले दो दशकों के शहरी ढांचे की भी बड़ी परीक्षा होगा।

    पर्यावरण पर भी रहेगा दबाव

    एमएमआर में जमीन सीमित है और शहर लगातार बाहरी इलाकों की तरफ फैल रहा है। इसलिए इतने बड़े स्तर पर आवास निर्माण के दौरान पर्यावरणीय संतुलन भी महत्वपूर्ण रहेगा।

    नई आवासीय परियोजनाओं के लिए जमीन चुनते समय तटीय क्षेत्र, पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील इलाके, हरित क्षेत्र और प्राकृतिक जल निकासी जैसे मुद्दों को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा।

    आने वाले समय में सरकार के सामने सिर्फ घरों की संख्या बढ़ाने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होगा कि नए शहर और नए आवासीय क्षेत्र टिकाऊ तरीके से विकसित हों।

    आइकॉनिक बिल्डिंग से लेकर नई आवास नीति तक

    सरकार ने मुंबई में Iconic Buildings के निर्माण के लिए नई नीति तैयार करने की भी बात कही है।

    इसके साथ पागड़ी सिस्टम वाली इमारतों, चालों, पुराने भवनों और क्लस्टर पुनर्विकास को गति देने की योजनाएं मिलकर मुंबई के पुराने शहरी ढांचे को बदल सकती हैं।

    इस बदलाव में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि पुनर्विकास के दौरान पुराने निवासियों के अधिकार, पुनर्वास और रहने की लागत को किस तरह सुरक्षित रखा जाता है।

    सरकार का फोकस आवास से आगे

    उपमुख्यमंत्री ने मुंबई को Global Fintech Hub के रूप में विकसित करने, Startup और FDI को बढ़ावा देने तथा महाराष्ट्र को GDP और औद्योगिक विकास में देश में आगे रखने का लक्ष्य भी सामने रखा है।

    समृद्धि महामार्ग, Coastal Road और Atal Setu जैसी परियोजनाओं का उदाहरण देते हुए सरकार का कहना है कि बड़े प्रोजेक्ट्स के दौरान विरोध और आशंकाएं सामने आती हैं, लेकिन लोगों से बातचीत और उनकी समस्याओं के समाधान के बाद परियोजनाओं को आगे बढ़ाया जा सकता है।

    इसी सोच को आवास और पुनर्विकास पर भी लागू करने की कोशिश दिखाई दे रही है।

    2047 तक 30 लाख घर, अब जमीन पर अमल की बारी

    मुंबई और एमएमआर में 30 लाख किफायती घरों का लक्ष्य आने वाले वर्षों के लिए बड़ा आवास रोडमैप तैयार करता है। इसमें एसआरए के जरिए पुनर्वास, म्हाडा के जरिए आवास, क्लस्टर विकास, पुराने भवनों का पुनर्विकास, किराये के आवास और एमएमआर के नए विकास केंद्र एक साथ जुड़े हुए हैं।

    अगर योजना समय पर लागू होती है, घर वास्तव में लक्षित आय वर्ग की पहुंच में रहते हैं और उनके साथ परिवहन, स्कूल, अस्पताल, पानी और रोजगार जैसी सुविधाएं भी विकसित होती हैं तो इसका असर मुंबई की आवास समस्या से कहीं आगे जा सकता है।

    लेकिन 30 लाख का आंकड़ा तभी मायने रखेगा जब वह जमीन पर बनने वाले घरों, वहां रहने वाले परिवारों और उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई दे।

    2047 की समयसीमा लंबी है, लेकिन इसकी असली परीक्षा अब से ही शुरू होगी। मुंबई को सिर्फ ज्यादा घर नहीं, बल्कि ऐसे घर चाहिए जो लोगों की पहुंच में हों और जहां घर मिलने के बाद जिंदगी और महंगी या मुश्किल न हो।

  • ईरान में मिला 7.5 Tcf गैस का बड़ा भंडार, अरबों डॉलर की दौलत के बीच अब असली चुनौती क्या?

    ईरान में मिला 7.5 Tcf गैस का बड़ा भंडार, अरबों डॉलर की दौलत के बीच अब असली चुनौती क्या?

    ईरान के फर्स में 7.5 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस मिली है। 5.7 Tcf गैस निकाली जा सकती है, लेकिन युद्ध और प्रतिबंधों के बीच चुनौती उत्पादन की है।

    नई दिल्ली: ईरान ने दक्षिणी फर्स प्रांत में एक नए गैस फील्ड की खोज का ऐलान किया है। यहां 7.5 ट्रिलियन क्यूबिक फीट से ज्यादा प्राकृतिक गैस होने का अनुमान है। ईरान के तेल मंत्री मोहसेन पाकनेजाद के मुताबिक इसमें से करीब 5.7 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस निकाली जा सकती है। यह खोज ऐसे समय हुई है जब ईरान का ऊर्जा सेक्टर युद्ध, अमेरिकी प्रतिबंधों और क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे के दबाव से गुजर रहा है।

    नई खोज को तख्तेह गैस फील्ड बताया गया है। ईरानी नेशनल ऑयल कंपनी के अन्वेषण निदेशक सैयद मोहिउद्दीन जाफरी के मुताबिक यह फील्ड फर्स में खोंज शहर से करीब 10 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में है और पुराने शनुल व होमा गैस फील्ड से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित है।

    जमीन के करीब नहीं, करीब 5 किलोमीटर नीचे मिली गैस

    तख्तेह फील्ड का ढांचा करीब 50 किलोमीटर लंबा और 4 किलोमीटर चौड़ा बताया गया है। यहां गैस तक पहुंचने के लिए करीब 5 किलोमीटर गहराई तक खोजी ड्रिलिंग की गई। ड्रिलिंग के दौरान करीब 450 मीटर मोटी गैस वाली परत मिली। जाफरी के मुताबिक इस इलाके की भूगर्भीय बनावट काफी जटिल है और इसमें कई जगह परतों की दोहराव वाली संरचना और फॉल्टिंग की वजह से खोज का काम आसान नहीं था।

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    इस एक खोजी कुएं तक पहुंचने में करीब 17 महीने लगे। यानी खबर में जिस गैस को लेकर अरबों डॉलर की बात हो रही है, वह अभी जमीन से निकालकर बाजार में पहुंच चुकी गैस नहीं है। पहले फील्ड को विकसित करना, कुएं तैयार करना, गैस को प्रोसेस करना और उसे इस्तेमाल या सप्लाई के लिए नेटवर्क से जोड़ना होगा।

    7.5 Tcf में से 5.7 Tcf ही निकाली जा सकती है

    ईरानी अधिकारियों के मुताबिक फील्ड में मौजूद कुल गैस 7.5 ट्रिलियन क्यूबिक फीट से ज्यादा है, जबकि करीब 5.7 ट्रिलियन क्यूबिक फीट को recoverable माना गया है। यानी जमीन के नीचे मौजूद पूरी गैस को निकाल पाना संभव नहीं माना जा रहा है।

    5.7 Tcf को आसान भाषा में देखें तो यह करीब 161 अरब घन मीटर गैस के बराबर है। ईरान का कहना है कि recoverable मात्रा दक्षिण पार्स गैस फील्ड के एक standard phase से करीब 15 साल के उत्पादन के बराबर है। इसका मतलब पूरे ईरान की 15 साल की गैस जरूरत नहीं है, बल्कि दक्षिण पार्स के एक चरण के उत्पादन से की गई तुलना है।

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    गैस की खासियत भी कम नहीं

    इस खोज की एक खास बात यह है कि यहां मिली गैस को sweet gas बताया गया है। इसका मतलब ऐसी गैस से है जिसमें sour gas की तुलना में हाइड्रोजन सल्फाइड जैसे घटक बहुत कम होते हैं। ईरानी अधिकारियों के मुताबिक इसे sweetening की अलग प्रक्रिया से गुजारने की जरूरत नहीं होगी, जिससे development और processing की राह कुछ छोटी हो सकती है।

    लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि गैस तुरंत बाजार में आ जाएगी। फील्ड की गहराई, जटिल भूगर्भीय संरचना, उत्पादन कुओं और बाकी बुनियादी सुविधाओं की जरूरत फिर भी बनी रहेगी।

    गैस के साथ मिला एक और बड़ा संसाधन

    तख्तेह फील्ड सिर्फ प्राकृतिक गैस तक सीमित नहीं है। यहां करीब 27 मिलियन बैरल गैस condensate होने का अनुमान दिया गया है, जिसमें करीब 20 मिलियन बैरल recoverable बताया गया है। इसे पेट्रोकेमिकल और रिफाइनिंग सेक्टर में इस्तेमाल किया जा सकता है या भविष्य में निर्यात किया जा सकता है।

    इसी गैस और condensate की आर्थिक अहमियत को लेकर ईरानी अधिकारियों ने अरबों डॉलर का अनुमान सामने रखा है। अलग-अलग रिपोर्टिंग में करीब 40 से 45 अरब डॉलर तक का आंकड़ा आया है। इसे तत्काल होने वाली कमाई समझना सही नहीं होगा। यह जमीन के नीचे मौजूद संसाधनों की अनुमानित आर्थिक कीमत से जुड़ा आंकड़ा है।

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    फिर ईरान के लिए यह खोज इतनी बड़ी क्यों है?

    सवाल यह है कि जब ईरान के पास पहले से ही दुनिया के सबसे बड़े गैस भंडारों में से एक है, तो नई खोज इतनी अहम क्यों हो गई?

    इसका जवाब ईरान की मौजूदा गैस स्थिति में छिपा है। देश का सबसे बड़ा गैस स्रोत दक्षिण पार्स है, जो ईरान और कतर के बीच साझा समुद्री गैस क्षेत्र है। दक्षिण पार्स ईरान की गैस उत्पादन व्यवस्था का करीब 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा देता है और यहां से मिलने वाली ज्यादातर गैस देश के अंदर ही इस्तेमाल होती है।

    यानी ईरान के पास जमीन के नीचे संसाधन बहुत हैं, लेकिन उन्हें लगातार उत्पादन में बदलना अलग चुनौती है।

    युद्ध ने पुरानी परेशानी और बढ़ा दी

    ईरान की गैस व्यवस्था पर हाल के महीनों में युद्ध का असर भी पड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक युद्ध शुरू होने के बाद ईरान की गैस उत्पादन क्षमता में करीब 230 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन की कमी आई थी। जुलाई में अधिकारियों ने आने वाले महीनों में करीब 100 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन क्षमता वापस लाने की बात कही थी।

    यही वजह है कि तख्तेह की खोज को सिर्फ नई गैस मिलने की खबर के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। ईरान को पहले मौजूदा गैस ढांचे को संभालना है और उसके बाद नई खोज को production में बदलना होगा।

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    यह पहली बड़ी खोज भी नहीं है

    तख्तेह से पहले अक्टूबर 2025 में ईरान ने दक्षिणी इलाके में पाजन गैस फील्ड की खोज की थी। वहां करीब 10 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस होने और लगभग 7 ट्रिलियन क्यूबिक फीट recoverable होने का अनुमान दिया गया था। उस समय ईरान ने production शुरू होने में करीब 40 महीने लगने का अनुमान बताया था।

    इससे साफ है कि ईरान दक्षिणी इलाकों में नए gas resources खोजने पर लगातार काम कर रहा है। तख्तेह की खोज उसी बड़े exploration push की अगली कड़ी के रूप में सामने आई है।

    लेकिन असली सवाल है—गैस निकलेगी कब?

    तख्तेह से recoverable गैस की मात्रा सामने आ चुकी है, लेकिन इसके commercial production की कोई साफ तारीख ईरान ने अभी घोषित नहीं की है। फील्ड को production तक पहुंचाने के लिए नए कुएं, processing facilities, gathering system, pipelines और दूसरी जरूरी सुविधाएं तैयार करनी होंगी।

    ईरान पहले से ही sanctions, निवेश की कमी और technology restrictions जैसी परेशानियों से जूझ रहा है। ऐसे में नई खोज को वास्तविक production में बदलना सिर्फ drilling का मामला नहीं होगा।

    यानी जमीन के नीचे गैस मिलना पहला कदम है, उससे लगातार उत्पादन शुरू करना अगली बड़ी परीक्षा है।

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    इस वक्त दुनिया के गैस बाजार में भी बड़ा बदलाव

    तख्तेह की खोज ऐसे समय सामने आई है जब Strait of Hormuz की वजह से पूरी दुनिया का energy market दबाव में है।

    26 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले छह महीनों में कतर की LNG exports करीब 96 प्रतिशत तक गिर गईं। पिछले साल की समान अवधि में जहां 509 Qatari LNG shipments हुई थीं, वहीं इस बार सिर्फ 18 shipments हुईं। युद्ध से पहले कतर दुनिया की करीब 20 प्रतिशत LNG supply देता था।

    इसका असर सिर्फ कतर तक सीमित नहीं है। Hormuz से होकर गुजरने वाली energy supply में रुकावट ने एशिया के खरीदारों को दूसरे suppliers की तरफ देखने पर मजबूर किया है।

    भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

    भारत के लिए यह हिस्सा और ज्यादा अहम है क्योंकि देश की LNG supply में कतर की बड़ी भूमिका रही है।

    26 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक अगस्त में भारत को कतर से LNG imports शून्य तक पहुंच गए, जबकि अमेरिका से LNG supply करीब 0.75 मिलियन टन रही। लंबी दूरी से आने वाली supply के कारण भारत की import cost बढ़ने की आशंका भी जताई गई है।

    भारत की energy dependence सिर्फ LNG तक सीमित नहीं है। Hormuz के रास्ते से आने वाली तेल, LNG और LPG supply में किसी भी लंबे disruption का असर import bill और energy prices पर पड़ सकता है। हाल में भारत ने Middle East पर निर्भरता घटाने के लिए दूसरे देशों से energy sourcing बढ़ाने की कोशिश भी की है।

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    क्या भारत को अब ईरान से सस्ती गैस मिलेगी?

    तख्तेह से भारत के लिए किसी direct gas supply agreement की घोषणा नहीं हुई है। ईरान को पहले इस गैस को commercial production में लाना होगा और फिर infrastructure, investment, sanctions तथा international trade की अड़चनों से निपटना होगा।

    इसलिए इस खोज का भारत पर immediate फायदा किसी नई gas supply के रूप में नहीं दिख रहा है। इसका असर फिलहाल Middle East की energy supply और global LNG market में बदलाव के जरिए समझना ज्यादा सही होगा।

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    आगे क्या बदलेगा?

    ईरान के लिए तख्तेह की खोज निश्चित तौर पर बड़ा energy asset है। 7.5 ट्रिलियन क्यूबिक फीट से ज्यादा गैस, करीब 5.7 Tcf recoverable volume और condensate के बड़े भंडार ने देश की future energy potential को और बढ़ाया है।

    लेकिन इस कहानी का अगला अध्याय अब जमीन के नीचे नहीं, जमीन के ऊपर लिखा जाएगा।

    ईरान कितनी तेजी से इस field को develop करता है, युद्ध से प्रभावित energy infrastructure कितनी जल्दी मजबूत होता है, sanctions के बीच investment और technology का इंतजाम कैसे होता है और Hormuz के रास्ते regional energy trade कब सामान्य होता है—इन सवालों पर तय होगा कि आज मिला यह गैस भंडार आने वाले वर्षों में वास्तव में कितनी आर्थिक और ऊर्जा ताकत में बदल पाता है।

    फिलहाल इतना साफ है कि ईरान ने गैस का बड़ा भंडार जरूर खोज लिया है, लेकिन अरबों डॉलर की संभावित दौलत को असली कमाई में बदलने की राह अभी बाकी है।

  • भारत-चीन सीमा विवाद पर डोभाल की चीन में बड़ी बैठक, वांग यी से बातचीत के बाद क्या बदला?

    भारत-चीन सीमा विवाद पर डोभाल की चीन में बड़ी बैठक, वांग यी से बातचीत के बाद क्या बदला?

    डोभाल-वांग यी की 25वीं बैठक में भारत-चीन सीमा विवाद पर क्या निकला? जानिए सीमा पर शांति, पुराने समझौते, व्यापार, कैलाश यात्रा और 2027 के अगले कदम की बड़ी खबर।

    नई दिल्ली: भारत-चीन के रिश्तों को लेकर बीजिंग से बड़ी खबर सामने आई है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच 25 अगस्त को 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि स्तर की बातचीत हुई। करीब छह साल पहले गलवान के बाद जिस रिश्ते में भारी तनाव आ गया था, उसमें अब बातचीत, सीमा प्रबंधन और कारोबारी गतिविधियों के जरिए धीरे-धीरे सामान्य स्थिति लौटने के संकेत जरूर हैं। लेकिन इस पूरी कहानी में एक बड़ा पेंच अभी भी बाकी है।

    25वें दौर की बातचीत के बाद दोनों देशों ने सीमा विवाद के राजनीतिक समाधान की कोशिश जारी रखने पर सहमति जताई है। यानी बातचीत आगे बढ़ी है, लेकिन सीमा विवाद खत्म होने या वास्तविक नियंत्रण रेखा का अंतिम सीमांकन तय होने की घोषणा नहीं हुई है। अगली विशेष प्रतिनिधि स्तर की बैठक 2027 में भारत में होगी।

    यही इस बैठक का सबसे बड़ा मतलब है—भारत और चीन के बीच रिश्तों में जमी बर्फ कुछ हद तक पिघली है, लेकिन सीमा का सबसे मुश्किल सवाल अभी भी टेबल पर है।

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    डोभाल और वांग यी की बैठक में आखिर क्या हुआ?

    बीजिंग में हुई बैठक में सीमा विवाद के साथ-साथ पूरे भारत-चीन संबंधों पर भी बातचीत हुई। दोनों पक्षों ने पिछले कुछ समय में रिश्तों में आई सकारात्मक गति और नेताओं के स्तर पर बनी सहमतियों को लागू करने में हुई प्रगति पर चर्चा की।

    बातचीत में सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने, सीमा से जुड़े मुद्दों पर लगातार संवाद जारी रखने और सीमा के अंतिम समाधान की दिशा में काम करने पर जोर रहा। चीन ने भी कहा कि दोनों पक्ष सीमा विवाद पर बातचीत के साथ-साथ द्विपक्षीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान जारी रखेंगे।

    डोभाल के लिए यह बैठक इसलिए भी अहम थी क्योंकि यह 2025 के 24वें दौर में बनी सहमतियों को आगे बढ़ाने का अगला बड़ा कदम था।

    सबसे पहले जानिए—क्या भारत-चीन सीमा विवाद खत्म हो गया?

    सीधा जवाब है—नहीं।

    25वें दौर में ऐसा कोई अंतिम समझौता सामने नहीं आया जिससे भारत-चीन सीमा की पूरी लाइन तय हो गई हो। न ही पूरे सीमा विवाद के समाधान की घोषणा हुई है।

    जो बात आगे बढ़ी है, वह है राजनीतिक बातचीत और सीमा प्रबंधन की प्रक्रिया। दोनों देश अभी भी 2005 में तय राजनीतिक मापदंडों और मार्गदर्शक सिद्धांतों के आधार पर निष्पक्ष, उचित और दोनों को स्वीकार्य समाधान तलाशने की बात कर रहे हैं।

    यानी एक तरफ सैनिकों के बीच तनाव कम हुआ है, दूसरी तरफ सीमा का अंतिम सवाल अभी बाकी है। यही अंतर समझना इस पूरी खबर को समझने के लिए सबसे जरूरी है।

    डिसएंगेजमेंट हुआ, लेकिन सीमा तय होना अभी बाकी

    भारत-चीन सीमा विवाद में अक्सर डिसएंगेजमेंट, तनाव कम करने और सीमा समाधान को एक ही चीज समझ लिया जाता है, जबकि तीनों अलग-अलग हैं।

    डिसएंगेजमेंट का मतलब है कि जहां दोनों देशों के सैनिक आमने-सामने थे, वहां से उन्हें पीछे हटाना। 21 अक्टूबर 2024 के समझौते के बाद देपसांग और डेमचोक में गश्त की व्यवस्था को लेकर सहमति लागू हुई और भारत सरकार ने संसद में कहा था कि 2020 में बने सभी फ्रिक्शन पॉइंट्स से डिसएंगेजमेंट हो चुका है।

    लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत और चीन के बीच सीमा की अंतिम रेखा तय हो गई है।

    सीमा का अंतिम सीमांकन और राजनीतिक समाधान उससे कहीं बड़ा और लंबा मामला है। 25वें दौर में इसी बड़े सवाल को आगे बढ़ाने की बात हुई है।

    2025 में जो 10 बातें तय हुई थीं, उनका क्या हुआ?

    यहां कहानी और दिलचस्प हो जाती है।

    अगस्त 2025 में हुए 24वें दौर की बातचीत में दोनों देशों ने सिर्फ सामान्य बयान नहीं दिए थे, बल्कि 10 बिंदुओं पर सहमति बनाई थी। इनमें सीमा पर शांति बनाए रखना, 2005 के समझौते को आधार बनाकर राजनीतिक समाधान तलाशना, सीमा निर्धारण के कुछ हिस्सों में शुरुआती प्रगति की संभावना तलाशना, सीमा प्रबंधन के लिए नया कार्य समूह बनाना और सैन्य-कूटनीतिक माध्यमों से तनाव कम करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाना शामिल था।

    सहमति के बाकी अहम हिस्सों में पूर्वी और मध्य सेक्टर के लिए नए स्तर के संवाद तंत्र, सीमा-पार नदियों पर बातचीत, आपात स्थिति में मानवीय आधार पर जल संबंधी जानकारी साझा करना और तीन पारंपरिक सीमा व्यापार बाजारों को फिर खोलना शामिल था।

    24वें दौर की 10 सूत्रीय सहमति में 2026 में 25वें दौर की बैठक चीन में करने का फैसला भी शामिल था, जो अब पूरा हो चुका है।

    एक साल बाद सबसे बड़ा सवाल—कितना काम जमीन पर हुआ?

    यहीं से सिर्फ बयान और जमीन पर बदलाव के बीच फर्क दिखाई देता है।

    25वें दौर के दौरान दोनों पक्षों ने कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली और तीन तय सीमा व्यापार मार्गों से सीमापार कारोबार फिर शुरू होने को सकारात्मक प्रगति के तौर पर माना।

    यानी 2025 की सहमतियों के कुछ हिस्से अब जमीन पर दिखाई देने लगे हैं।

    लेकिन सीमा के अंतिम सीमांकन वाला सबसे मुश्किल हिस्सा अभी भी जारी बातचीत में है।

    छह साल बाद फिर खुला सीमा व्यापार

    1 अगस्त 2026 से भारत और चीन के बीच नाथू ला के रास्ते सीमा व्यापार फिर शुरू हुआ। सिक्किम सरकार के मुताबिक यह कारोबार छह साल बाद दोबारा शुरू हुआ है।

    इसी दौरान हिमाचल प्रदेश के शिपकी ला के रास्ते भी भारत-चीन सीमा व्यापार बहाल हुआ। उत्तराखंड के लिपुलेख मार्ग से भी पारंपरिक सीमा व्यापार गतिविधियां फिर शुरू हुईं।

    यह सिर्फ कारोबार की खबर नहीं है। सीमा क्षेत्रों में रहने वाले स्थानीय कारोबारियों और लोगों के लिए यह पुराने संपर्कों की वापसी का संकेत भी है।

    यही वजह है कि भारत-चीन रिश्तों को सिर्फ सीमा पर सैनिकों की स्थिति देखकर समझना अब अधूरा होगा।

    कैलाश मानसरोवर यात्रा भी फिर पटरी पर

    2026 में कैलाश मानसरोवर यात्रा भी भारत और चीन के बीच सामान्य होते संपर्क की एक बड़ी तस्वीर पेश कर रही है।

    विदेश मंत्रालय के मुताबिक 2026 की यात्रा जून से अगस्त के बीच आयोजित की गई और लिपुलेख तथा नाथू ला, दोनों रास्तों से यात्रियों को भेजा गया। कुल 1,000 यात्रियों का चयन 20 बैचों में किया गया।

    यह इसलिए अहम है क्योंकि कैलाश मानसरोवर यात्रा सिर्फ धार्मिक यात्रा नहीं है। यह भारत और चीन के बीच लोगों के सीधे संपर्क का भी एक पुराना माध्यम रही है।

    इसलिए सीमा व्यापार और कैलाश यात्रा का दोबारा शुरू होना रिश्तों में लौटती सामान्य स्थिति के व्यावहारिक संकेत माने जा सकते हैं।

    फिर भी सब कुछ सामान्य नहीं हुआ है

    यहीं कहानी का दूसरा पहलू सामने आता है।

    भारत और चीन के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा है, लेकिन व्यापार असंतुलन अभी भी बड़ा मुद्दा है। वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार करीब 151.1 अरब डॉलर रहा और भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा करीब 112.16 अरब डॉलर तक पहुंच गया।

    दूसरी तरफ भारतीय कंपनियों के लिए चीन में कारोबारी वीजा से जुड़ी दिक्कतें भी अगस्त 2026 में सामने आई हैं। रिपोर्टों के मुताबिक कई भारतीय कंपनियों के अधिकारियों को चीन की यात्रा और कारोबारी बैठकों के लिए वीजा हासिल करने में परेशानी हुई है।

    इससे साफ है कि रिश्तों में सुधार के संकेत जरूर हैं, लेकिन भरोसा और कारोबारी पहुंच से जुड़े सारे सवाल खत्म नहीं हुए हैं।

    उड़ानें और निवेश में भी धीरे-धीरे बदलाव

    2025 में भारत और चीन के बीच सीधी उड़ानें फिर शुरू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी और अक्टूबर 2025 से पांच साल से ज्यादा समय बाद सीधी उड़ानों की बहाली हुई। यह भी दोनों देशों के रिश्तों में धीरे-धीरे लौटती सामान्य स्थिति का एक संकेत था।

    निवेश के मोर्चे पर भी 2026 में भारत ने कुछ सीमित ढील दी। मई 2026 में संशोधित व्यवस्था के तहत जमीन से जुड़े पड़ोसी देशों के निवेशकों को कुछ शर्तों के साथ 10 प्रतिशत तक गैर-नियंत्रक हिस्सेदारी के लिए स्वचालित रास्ता दिया गया। अगस्त तक ऐसी 29 निवेश प्रस्तावों की जानकारी सामने आई, जिनकी कुल कीमत करीब 4,895 करोड़ रुपये थी।

    इसका मतलब यह नहीं है कि भारत ने चीन के लिए निवेश के दरवाजे पूरी तरह खोल दिए हैं। बल्कि यह एक नियंत्रित और सावधानी वाली आर्थिक वापसी है।

    6 अगस्त की बैठक ने 25वें दौर का रास्ता तैयार किया था

    25 अगस्त की डोभाल-वांग बातचीत अचानक नहीं हुई थी।

    इससे पहले 6 अगस्त को भारत और चीन के बीच सीमा मामलों पर बातचीत के लिए 36वीं WMCC बैठक हुई थी। इसमें 2025 की 24वें दौर की सहमतियों को लागू करने, सीमा निर्धारण, सीमा प्रबंधन, नए तंत्र बनाने और सीमा-पार संपर्क पर चर्चा हुई थी।

    दोनों देशों ने कूटनीतिक और सैन्य माध्यमों से संपर्क बनाए रखने और सीमा क्षेत्रों में शांति बनाए रखने पर भी सहमति जताई थी। इस बैठक में 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि स्तर की बातचीत की तैयारी पर भी काम हुआ था।

    यानी 25 अगस्त की बैठक एक अकेली बैठक नहीं थी। इसके पीछे कई स्तरों पर चल रही बातचीत की पूरी प्रक्रिया थी।

    आखिर यह Special Representatives की बैठक होती क्या है?

    आम भाषा में समझें तो यह भारत-चीन सीमा विवाद पर दोनों देशों का सबसे अहम राजनीतिक बातचीत वाला तंत्र है।

    भारत की तरफ से अजीत डोभाल और चीन की तरफ से वांग यी इस व्यवस्था में विशेष प्रतिनिधि हैं। यह तंत्र सिर्फ सीमा पर तनाव की स्थिति पर बात करने के लिए नहीं है, बल्कि सीमा के राजनीतिक समाधान और दोनों देशों के व्यापक रिश्तों से जुड़े मुद्दों पर भी बातचीत का मंच है।

    चीनी विदेश मंत्रालय ने भी 25वें दौर से पहले इसे सीमा सवाल पर बातचीत का मुख्य माध्यम और आपसी हितों से जुड़े मुद्दों पर संवाद का महत्वपूर्ण मंच बताया था।

    2020 के गलवान संकट से यहां तक कैसे पहुंचे?

    पूरी कहानी को समझने के लिए पिछले छह साल की कड़ी जोड़ना जरूरी है।

    अप्रैल-मई 2020 से पूर्वी लद्दाख में तनाव बढ़ा और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर लंबे समय तक सैन्य गतिरोध बना रहा। भारत सरकार के अनुसार इसके बाद सीमा पर शांति बहाल करने के लिए सैन्य और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर लगातार बातचीत चली।

    2024 में देपसांग और डेमचोक की गश्त व्यवस्था पर समझौते के बाद 2020 में बने सभी फ्रिक्शन पॉइंट्स से डिसएंगेजमेंट की प्रक्रिया पूरी होने की बात भारत सरकार ने कही।

    इसके बाद अक्टूबर 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की कज़ान में मुलाकात हुई। यह दोनों नेताओं की करीब पांच साल बाद प्रतिनिधिमंडल स्तर की पहली द्विपक्षीय बैठक थी। इसमें दोनों ने सीमा पर शांति बनाए रखने और Special Representatives व्यवस्था की भूमिका को महत्वपूर्ण माना।

    अगस्त 2025 में दोनों नेताओं की तियानजिन में फिर मुलाकात हुई और उसके बाद 24वें दौर की विशेष प्रतिनिधि बातचीत में 10 बिंदुओं पर सहमति बनी।

    अब अगस्त 2026 में 25वां दौर हो चुका है।

    यानी 2020 के सैन्य संकट से 2026 की बातचीत तक सफर में एक चीज साफ दिखती है—तनाव कम करने और रिश्ते संभालने के लिए बातचीत के कई रास्ते फिर सक्रिय हुए हैं।

    लेकिन अरुणाचल प्रदेश और सीमा का सवाल अभी भी आसान नहीं

    भारत-चीन संबंधों में अरुणाचल प्रदेश का मुद्दा पुराना और संवेदनशील है। चीन इस क्षेत्र पर अपना दावा करता रहा है, जबकि भारत का रुख स्पष्ट है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है।

    इसके साथ सीमा निर्धारण का बड़ा सवाल भी बाकी है। इसलिए व्यापार, यात्रा, उड़ान और कूटनीतिक बातचीत वापस आने के बावजूद यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत-चीन सीमा विवाद खत्म होने की स्थिति में पहुंच गया है।

    असल चुनौती अब यह है कि दोनों देश सीमा पर शांति को लंबे समय तक बनाए रखते हुए राजनीतिक समाधान की दिशा में कितनी ठोस प्रगति कर पाते हैं।

    शी जिनपिंग का भारत कनेक्शन क्यों अहम है?

    25वें दौर की बातचीत का समय भी ध्यान खींचता है।

    सितंबर में नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत आने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि 26 अगस्त तक चीन की तरफ से उनकी यात्रा की अंतिम आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई थी। रिपोर्टों के मुताबिक संभावित यात्रा सितंबर में हो सकती है।

    अगर यह यात्रा होती है, तो डोभाल-वांग बातचीत के बाद भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच एक और महत्वपूर्ण संपर्क का रास्ता खुल सकता है।

    इसलिए 25वें दौर की बातचीत को सिर्फ सीमा बैठक के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी।

    अब आगे क्या होगा?

    सबसे साफ अगला कदम सामने है—भारत में 2027 में 26वां Special Representatives दौर होगा।

    लेकिन उससे पहले कई स्तरों पर काम जारी रहना है।

    सीमा प्रबंधन के तंत्र चलते रहेंगे। कूटनीतिक और सैन्य संवाद जारी रहेगा। 2025 में तय किए गए सीमा प्रबंधन और सीमा निर्धारण से जुड़े काम आगे बढ़ेंगे। सीमा व्यापार, लोगों की आवाजाही और दूसरे व्यावहारिक संपर्कों को स्थिर करने की कोशिश होगी।

    सबसे बड़ा सवाल फिर वही रहेगा—क्या दोनों देश केवल सीमा पर शांति बनाए रखने से आगे बढ़कर सीमा की अंतिम रेखा तय करने की दिशा में ठोस राजनीतिक प्रगति कर पाते हैं?

    एक नजर में पूरी तस्वीर

    2020 — गलवान के बाद बड़ा सैन्य तनाव और सीमा पर लंबा गतिरोध।

    2024 — देपसांग और डेमचोक की गश्त व्यवस्था पर समझौता और 2020 के फ्रिक्शन पॉइंट्स से डिसएंगेजमेंट।

    अक्टूबर 2024 — कज़ान में मोदी-शी की अहम मुलाकात।

    अगस्त 2025 — 24वें दौर में सीमा प्रबंधन, शुरुआती सीमा निर्धारण, व्यापार और दूसरे मुद्दों पर 10 सूत्रीय सहमति।

    अगस्त 2025 — तियानजिन में मोदी-शी की फिर मुलाकात।

    मई 2026 — दोनों देशों के बीच सीमा मामलों पर WMCC का 35वां दौर।

    जून-अगस्त 2026 — कैलाश मानसरोवर यात्रा 20 बैचों के साथ लिपुलेख और नाथू ला मार्ग से आयोजित हुई।

    1 अगस्त 2026 — नाथू ला और शिपकी ला से सीमा व्यापार फिर शुरू हुआ।

    6 अगस्त 2026 — 36वीं WMCC बैठक में 25वें दौर की तैयारी और सीमा निर्धारण पर चर्चा।

    25 अगस्त 2026 — डोभाल और वांग यी की 25वें दौर की बातचीत; राजनीतिक समाधान की कोशिश जारी रखने पर सहमति।

    2027 — अगली विशेष प्रतिनिधि स्तर की बैठक भारत में होगी।

    सबसे अहम बात क्या है?

    भारत-चीन रिश्तों में अब सिर्फ बयान नहीं, बल्कि कुछ जमीन पर दिखने वाले बदलाव भी नजर आ रहे हैं—सीमा पर 2020 के फ्रिक्शन पॉइंट्स से डिसएंगेजमेंट, गश्त व्यवस्था, सीमा व्यापार, कैलाश मानसरोवर यात्रा, सीधी उड़ानों की वापसी और आर्थिक संपर्क को धीरे-धीरे आगे बढ़ाने की कोशिश।

    लेकिन दूसरी तरफ अंतिम सीमा समाधान, सीमा निर्धारण, अरुणाचल से जुड़े मतभेद, व्यापार घाटा और कारोबारी आवाजाही की दिक्कतें अभी भी मौजूद हैं।

    इसलिए 25वें दौर की सबसे सटीक तस्वीर यही है:

    भारत और चीन के रिश्ते पहले से ज्यादा बातचीत की पटरी पर लौटे हैं, लेकिन सीमा विवाद का आखिरी अध्याय अभी लिखा जाना बाकी है। 2027 की भारत में होने वाली अगली बैठक अब इस प्रक्रिया का अगला बड़ा पड़ाव होगी।

  • Ganpati Chakraborty Family Murder: 4 कत्ल के बाद भी 7 घंटे घर में रहे आरोपी, नशा किया, खजूर-खीरा खाया और नहाए

    Ganpati Chakraborty Family Murder: 4 कत्ल के बाद भी 7 घंटे घर में रहे आरोपी, नशा किया, खजूर-खीरा खाया और नहाए

    रंगपुर में गणपति चक्रवर्ती परिवार के 4 लोगों की हत्या का मामला। पुलिस के मुताबिक आरोपी 7 घंटे घर में रहे। मुग्ध और सिद्धार्थ गिरफ्तार।

    बांग्लादेश: चार लोगों की हत्या के बाद कोई घर से भागने के बजाय वहीं करीब सात घंटे रुका रहे—रंगपुर के मछुआपाड़ा में सामने आए इस हत्याकांड की सबसे असामान्य कड़ी यही है। पुलिस का कहना है कि 20 अगस्त की रात गणपति चक्रवर्ती के घर में चार लोगों की हत्या के बाद मुग्ध दास और सिद्धार्थ दास काफी देर तक उसी मकान में मौजूद रहे। दोनों ने कथित तौर पर याबा का सेवन किया, घर में रखे खजूर और खीरे खाए और बाद में स्नान भी किया।

    मामला 22 अगस्त की रात सामने आया, जब रंगपुर शहर के मछुआपाड़ा इलाके में एक बंद घर से चार शव बरामद हुए। घर में रहने वाले 65 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक गणपति चक्रवर्ती, उनकी पत्नी प्रीतिलता, 23 वर्षीय बेटी आगामी चक्रवर्ती प्रार्थी और 12 वर्षीय बेटे प्रियम की मौत हो चुकी थी।

    परिवार से कई घंटों तक संपर्क नहीं हुआ था। रात में घर से दुर्गंध आने के बाद पुलिस को सूचना दी गई। घर खोला गया तो गणपति का शव छत पर मिला। प्रीतिलता और उनकी बेटी के शव सीढ़ियों के पास थे, जबकि प्रियम का शव कमरे में पलंग के नीचे मिला।

    पहली नजर में मामला लूट का लगा। घर के भीतर सामान बिखरा था और पैसे तथा कीमती सामान रखने वाली जगहों से छेड़छाड़ के निशान मिले थे। बिजली का कनेक्शन काटे जाने की जानकारी भी जांच में सामने आई। लेकिन जैसे-जैसे पुलिस ने घटनास्थल से मिले सुरागों को जोड़ना शुरू किया, हत्या की वजह को लेकर तस्वीर बदलती गई।

    छत पर नशा करते हुए पकड़े जाने का डर

    पुलिस की जांच के मुताबिक, पूरी घटना की शुरुआत 20 अगस्त की रात घर की छत से हुई।

    मुग्ध दास और सिद्धार्थ दास पड़ोसी इमारत के रास्ते गणपति के घर की छत पर पहुंचे थे। पुलिस का आरोप है कि दोनों वहां याबा नाम की नशीली गोली का सेवन कर रहे थे।

    छत से आवाज आने पर गणपति ऊपर पहुंचे। दोनों युवकों को उन्होंने पहले से पहचान रखा था और वे उन्हें ‘सर’ कहकर बुलाते थे। गणपति ने वहां मौजूद होने की वजह पूछी।

    पुलिस के मुताबिक, यहीं से मामला हिंसा में बदल गया। दोनों युवकों को डर था कि गणपति उन्हें पहचान चुके हैं। आरोप है कि इसी डर में उन्होंने गणपति के कंधे पर रखे गमछे से उनका गला घोंट दिया।

    गणपति ने बचने की कोशिश की और शोर हुआ। यह आवाज उनकी पत्नी प्रीतिलता तक पहुंची। वह सीढ़ियों से ऊपर आने लगीं। पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने उन्हें भी रास्ते में पकड़ लिया और कपड़े से गला घोंट दिया।

    फिर बेटी और 12 साल के बेटे की बारी आई

    घर में अब गणपति और उनकी पत्नी दोनों की हत्या हो चुकी थी। लेकिन पुलिस का दावा है कि आरोपियों को अब एक और डर था—कहीं घर में मौजूद लोग उन्हें पहचान न लें।

    इसी वजह से उनकी बेटी आगामी को भी मार दिया गया।

    सबसे कम उम्र का सदस्य 12 साल का प्रियम था। पुलिस के अनुसार, प्रियम सिद्धार्थ के छोटे भाई का दोस्त था और आरोपियों को पहचानता था। जांचकर्ताओं का दावा है कि इसी पहचान के कारण दोनों को डर था कि बच्चा उनके बारे में बता सकता है। इसके बाद उसकी भी गला घोंटकर हत्या कर दी गई।

    पुलिस के मुताबिक, परिवार के चारों सदस्यों की मौत गला घोंटने से हुई।

    हत्या के बाद घर से निकलने की जल्दी नहीं थी

    चार लोगों की जान लेने के बाद भी दोनों आरोपी तुरंत वहां से नहीं निकले। पुलिस के अनुसार, वे करीब 6 से 7 घंटे तक घर के भीतर रहे।

    यही हिस्सा जांचकर्ताओं के लिए भी अहम सुराग बना। घर में उनकी मौजूदगी के दौरान याबा का सेवन किए जाने, खजूर और खीरा खाने और स्नान करने के कथित सबूत मिले।

    घर में कुछ चूड़ियों को आग में तपाए जाने के निशान भी मिले। इससे जांच का एक सिरा सोने के काम से जुड़े व्यक्ति की तरफ भी गया।

    उधर, पुलिस अलग-अलग सुरागों को जोड़ रही थी। मामले की जांच में रंगपुर महानगर पुलिस के साथ डिटेक्टिव ब्रांच और क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट भी शामिल हुए।

    23 अगस्त तड़के दोनों पकड़े गए

    जांच आगे बढ़ने के बाद पुलिस मुग्ध दास और सिद्धार्थ दास तक पहुंची। दोनों को 23 अगस्त तड़के हिरासत में लिया गया और पूछताछ के बाद गिरफ्तार कर लिया गया।

    पुलिस का दावा है कि पूछताछ में दोनों ने हत्या में अपनी भूमिका स्वीकार की। उनके पास से कथित तौर पर हत्या में इस्तेमाल सामान और लूटे गए सोने के आभूषण भी बरामद किए गए।

    पुलिस की शुरुआती आशंका लूट की थी, लेकिन बाद की जांच में उसने कहा कि परिवार को निशाना बनाए जाने की मुख्य वजह छत पर याबा का सेवन करते हुए पकड़े जाने का डर था। पुलिस ने परिवार की किसी के साथ ज्ञात दुश्मनी या विवाद की बात भी सामने नहीं रखी है।

    शिक्षक से लेकर 12 साल के बेटे तक—चार जिंदगियां खत्म

    गणपति चक्रवर्ती रंगपुर जिला स्कूल में शिक्षक थे। पिछले साल 31 दिसंबर को वह सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी उम्र 65 साल थी। रिटायरमेंट के बाद वह होम्योपैथिक चिकित्सा से भी जुड़े थे।

    उनकी पत्नी प्रीतिलता की उम्र करीब 50 साल थी। बेटी आगामी ने अंग्रेजी में मास्टर्स किया था। 12 वर्षीय प्रियम उसी रंगपुर जिला स्कूल में पढ़ता था, जहां उसके पिता शिक्षक रह चुके थे।

    स्थानीय लोगों के मुताबिक परिवार पिछले कुछ वर्षों से इलाके में रह रहा था और गणपति को शांत और मिलनसार व्यक्ति के तौर पर जाना जाता था।

    फिलहाल मामले में सामने आया पूरा घटनाक्रम पुलिस की जांच और आरोपियों से पूछताछ में सामने आए दावों पर आधारित है। मुग्ध और सिद्धार्थ के खिलाफ लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि और दोष का फैसला अदालत की प्रक्रिया के बाद ही होगा।

  • Mount Fuji पर 7 साल का बच्चा अकेला रह गया, पिता चोटी की ओर बढ़ा; 5 घंटे बाद लौटने पर खुली पूरी कहानी

    Mount Fuji पर 7 साल का बच्चा अकेला रह गया, पिता चोटी की ओर बढ़ा; 5 घंटे बाद लौटने पर खुली पूरी कहानी

    Mount Fuji पर थका 7 साल का बच्चा 6th Station पर अकेला रह गया। पिता बड़े बेटे के साथ चोटी की ओर बढ़ गया। Police ने बच्चे को सुरक्षित बचाकर पिता को वापस बुलाया।

    Mount Fuji की चढ़ाई पर तीनों साथ थे, फिर छोटा बेटा पीछे रह गया

    20 अगस्त की सुबह जापान के Mount Fuji पर एक पिता अपने दो बेटों के साथ Fujinomiya Route से चढ़ाई कर रहा था। परिवार का छोटा बेटा सिर्फ 7 साल का था। शुरुआत में तीनों साथ ऊपर बढ़ रहे थे, लेकिन करीब 2,500 मीटर की ऊंचाई पर पहुंचते-पहुंचते बच्चे ने आगे चलने में परेशानी जताई।

    बच्चा थक चुका था। इसके बाद 6th Station के पास पिता और उसके बीच बहस जैसी स्थिति बनी। होएईज़ानसो के स्टाफ मेंबर ताकाई अकिरा ने बताया कि सुबह करीब 7 बजे उन्हें दोनों के बीच बातचीत सुनाई दी। उनके मुताबिक पिता की तरफ से बच्चे को वहीं छोड़ने और करीब 8 घंटे इंतजार करने की बात कही जा रही थी।

    कुछ देर बाद बाहर देखने पर 7 साल का बच्चा अकेला bench पर बैठा दिखाई दिया।

    पिता अपने बड़े बेटे के साथ आगे बढ़ चुका था।

    7 साल के बच्चे को करीब 8 घंटे इंतजार करने को कहा गया था

    बच्चे के मिलने के बाद उसने Police और mountain-hut staff को बताया कि उसके पिता ने उसे वहीं रुककर करीब 8 घंटे इंतजार करने को कहा था।

    बच्चे के अकेले रहने का exact समय निश्चित नहीं हुआ है, लेकिन उपलब्ध घटनाक्रम से साफ है कि वह कई घंटे अपने पिता से अलग रहा। उस वक्त वह Mount Fuji के 6th Station के पास करीब 2,500 मीटर की ऊंचाई पर था।

    उसके पास खाने के लिए कुछ snacks और soft drink थे। पैसे उसके पास नहीं थे। हालांकि उसका climbing equipment ठीक हालत में बताया गया।

    एक छोटे बच्चे के लिए यह स्थिति इसलिए भी गंभीर थी क्योंकि वह जिस जगह बैठा था, वह सामान्य शहर या tourist walkway जैसा इलाका नहीं था। Mount Fuji पर ऊंचाई बढ़ने के साथ रास्ता मुश्किल होता जाता है और मौसम भी तेजी से बदलता रहता है।

    लेकिन उस समय बच्चे को सबसे पहले किसी safety plan की जरूरत थी।

    और यह जिम्मेदारी एक mountain-hut staff member ने संभाली।

    सुबह 7 बजे एक स्टाफ की नजर बच्चे पर पड़ी

    होएईज़ानसो के स्टाफ ने बच्चे को अकेले देखा तो उसे वहीं नहीं छोड़ा। स्टाफ ने उसे अपने झोपड़ी में सुरक्षित रखा और स्थिति की जानकारी लेने की कोशिश की।

    स्टाफ मेंबर ताकाई अकिरा ने बाद में बताया कि उन्होंने पिता और बच्चे के बीच हुई बातचीत सुनी थी। बच्चे के अकेले दिखाई देने के बाद उन्हें चिंता हुई और उन्होंने उसे सुरक्षित जगह पर रखा।

    इसके बाद सुबह करीब 7:40 बजे Police को सूचना दी गई।

    Shizuoka Prefectural Police की Fujinomiya Police Station की टीम मौके पर पहुंची और बच्चे को अपने संरक्षण में लिया। बच्चे को कोई चोट नहीं लगी थी।

    अब Police के सामने सबसे जरूरी सवाल था—उसका पिता कहां है?

    पिता बच्चे को छोड़कर कितनी दूर पहुंच चुका था?

    Police और mountain-hut staff ने पिता की तलाश शुरू की। उनके बारे में मिली जानकारी के आधार पर ऊपर के stations पर मौजूद लोगों से संपर्क किया गया।

    तभी 7th Station के आसपास मौजूद staff से जानकारी मिली कि पिता वहां से आगे जा चुका है।

    वह अपने बड़े बेटे के साथ Mount Fuji की चोटी की तरफ बढ़ रहा था।

    यानी एक तरफ 7 साल का बच्चा 6th Station पर Police और mountain-hut staff के पास था, वहीं दूसरी तरफ उसका पिता बड़े बेटे के साथ उससे काफी ऊपर पहुंच चुका था।

    Police ने पिता को वापस आने के लिए कहा।

    अब जिस चढ़ाई को पूरा करने के लिए वह आगे बढ़ा था, उसे रोककर वापस उसी जगह लौटना पड़ा जहां उसका छोटा बेटा इंतजार कर रहा था।

    करीब 5 घंटे बाद पिता वापस आया

    मिली जानकारी के मुताबिक बच्चे के सुरक्षित मिलने के करीब 5 घंटे बाद पिता 6th Station वापस पहुंचा।

    तब तक बच्चा सुरक्षित था और Police तथा mountain-hut staff उसकी देखभाल कर रहे थे।

    Police ने पिता को कड़ी चेतावनी दी। उसे बताया गया कि बच्चे को इस तरह पहाड़ पर अकेला छोड़कर आगे बढ़ना स्वीकार्य नहीं है।

    पिता ने अपनी गलती मानी और बाद में गहरा regret जताया।

    इसके बाद बच्चा अपने पिता से फिर मिल गया।

    इस पूरे मामले में सबसे बड़ी राहत यही रही कि 7 साल के बच्चे को कोई चोट नहीं आई।

    जिस जगह बच्चा अकेला था, वहां हालात आसान नहीं थे

    Mount Fuji का 6th Station करीब 2,500 मीटर की ऊंचाई पर है। 5th Station से ऊपर जाने वाला रास्ता लगातार चढ़ाई वाला है और कई जगह rocky terrain से होकर गुजरता है।

    घटना की जानकारी देते हुए कुछ मीडिया footage में 5th Station से 6th Station तक का route भी दिखाया गया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहां कई घंटे अकेले बैठना किसी छोटे बच्चे के लिए सामान्य स्थिति नहीं थी।

    trekking expert युया कुरियामा ने भी family climbing को लेकर यही बात कही कि group को सबसे कम stamina वाले व्यक्ति की क्षमता के हिसाब से चलना चाहिए।

    अगर कोई बच्चा आगे नहीं चल पा रहा है, तो बाकी लोगों को अपनी speed और plan उसी के मुताबिक बदलना चाहिए।

    “चोटी तक पहुंचना” इस सफर का सबसे जरूरी हिस्सा नहीं था

    इस घटना के बाद Mount Fuji पर बच्चों के साथ climbing करने वाले parents और trekking experts ने भी इसी बात पर जोर दिया कि बच्चे की physical condition को नजरअंदाज करके चढ़ाई जारी रखना सही नहीं है।

    इस घटना के बाद कुछ parents ने कहा कि अगर बच्चे के लिए आगे बढ़ना मुश्किल हो जाए तो उसके साथ रुकना या जरूरत पड़ने पर वापस लौटना ज्यादा सही फैसला होगा।

    Mount Fuji की चोटी अपनी जगह थी।

    लेकिन उस वक्त 7 साल के बच्चे की safety उससे ज्यादा जरूरी थी।

    Police ने भी hikers को सलाह दी कि group में सबसे कम stamina वाले व्यक्ति की pace के हिसाब से चलें और किसी member को अकेला छोड़कर आगे न बढ़ें।

    इस कहानी में सबसे बड़ी राहत एक अजनबी ने दी

    जब बच्चा अकेला bench पर बैठा था, उसके साथ परिवार का कोई सदस्य नहीं था।

    लेकिन एक mountain-hut staff member ने उसे देखा।

    उसे अपने पास सुरक्षित रखा।

    Police को फोन किया।

    Police ने पिता की तलाश की।

    और कुछ घंटे बाद बच्चा फिर अपने परिवार के साथ था।

    यही इस घटना का सबसे राहत देने वाला हिस्सा है।

    7 साल का बच्चा सुरक्षित मिल गया, लेकिन Mount Fuji की उस सुबह ने family trekking को लेकर एक सीधा सवाल जरूर छोड़ दिया है।

    जब परिवार के सबसे छोटे सदस्य ने कह दिया कि अब उससे आगे नहीं चला जा रहा, तो उस समय मंजिल बदलना ज्यादा जरूरी था या मंजिल तक पहुंचना?

    Mount Fuji की चोटी कहीं जाने वाली नहीं थी।

    लेकिन एक छोटे बच्चे के लिए उस वक्त सबसे जरूरी चीज चोटी तक पहुंचना नहीं, उसके साथ किसी अपने का रहना था।

  • MRPL Assistant Engineer Recruitment 2026: GATE 2026 से 26 पदों पर भर्ती, ₹50,000 सैलरी; आवेदन 19 सितंबर तक

    MRPL Assistant Engineer Recruitment 2026: GATE 2026 से 26 पदों पर भर्ती, ₹50,000 सैलरी; आवेदन 19 सितंबर तक

    MRPL Assistant Engineer Recruitment 2026 में 26 पदों पर भर्ती है। GATE 2026 से Chemical, Mechanical और Electrical AE पदों के लिए आवेदन 19 सितंबर तक करें अब!

    नई दिल्ली: Mangalore Refinery and Petrochemicals Limited (MRPL) ने Assistant Engineer के 26 पदों के लिए भर्ती शुरू कर दी है। यह भर्ती E2 Grade Management Cadre में Chemical, Mechanical और Electrical Engineering के लिए है। आवेदन प्रक्रिया 21 अगस्त 2026 से शुरू हो चुकी है और इच्छुक उम्मीदवार 19 सितंबर 2026 शाम 6 बजे तक ऑनलाइन फॉर्म भर सकते हैं।

    इस भर्ती में सबसे जरूरी बात यह है कि MRPL सिर्फ GATE 2026 के marks स्वीकार करेगा। GATE 2025 या उससे पुराने score के आधार पर इस भर्ती में आवेदन नहीं किया जा सकता। Selection में कोई written exam नहीं रखा गया है। GATE 2026 marks के आधार पर shortlisting होगी, जिसके बाद Group Discussion और Personal Interview लिया जाएगा।

    MRPL Assistant Engineer Recruitment 2026 में कितने पद हैं?

    कुल 26 Assistant Engineer vacancies निकाली गई हैं। Chemical Engineering में 15, Mechanical में 8 और Electrical में 3 पद हैं।

    DisciplineGATE PaperVacancies
    Assistant Engineer – ChemicalCH15
    Assistant Engineer – MechanicalME8
    Assistant Engineer – ElectricalEE3
    Total—26

    Chemical के 15 पद सभी categories के लिए खुले हैं। इनमें UR 8, EWS 1, OBC-NCL 3, SC 1 और ST 2 सीटें हैं।

    Mechanical के 8 पद Special Recruitment Drive के तहत OBC-NCL 4, SC 3 और ST 1 के लिए हैं। इस discipline में UR और EWS के लिए कोई seat नहीं है।

    Electrical के 3 पदों में OBC-NCL 1, SC 1 और ST 1 vacancy है। यहां भी UR और EWS candidates के लिए post उपलब्ध नहीं है।

    कुल category-wise vacancies में UR 8, EWS 1, OBC-NCL 8, SC 5 और ST 4 पद शामिल हैं।

    PwBD candidates के लिए कितनी seats हैं?

    PwBD reservation horizontal basis पर लागू है। इसका मतलब ये posts ऊपर दी गई category vacancies के अंदर ही शामिल हैं और अलग से अतिरिक्त seats नहीं हैं। इसके लिए minimum 40% benchmark disability जरूरी है।

    Chemical में 2 PwBD posts, Mechanical में 1 और Electrical में 1 post earmarked है।

    Chemical में SLD और HH categories को identified किया गया है। Mechanical में HH, LV, OA, BA, OL, CP, Dw, AAV, ASD (M), SLD और MI categories suitable हैं। Electrical में HH, OL, Dw, AAV, ASD (M), SLD और MI categories शामिल हैं।

    अगर earmarked category का suitable candidate उपलब्ध नहीं होता है, तो post दूसरी identified category में जा सकती है।

    यहां HH का मतलब hard of hearing, LV low vision, OA one arm, BA both arms, OL one leg, CP cerebral palsy, Dw dwarfism, AAV acid attack victim, ASD (M) autism spectrum disorder mild, SLD specific learning disability और MI mental illness है।

    MRPL Assistant Engineer के लिए कौन apply कर सकता है?

    उम्मीदवार के पास चार साल की BE, B.Tech या B.Sc. Engineering degree संबंधित discipline में होनी चाहिए। Degree और GATE paper का combination MRPL की eligibility के मुताबिक होना जरूरी है।

    DisciplineEligible Degree
    ChemicalChemical Engineering, Chemical Technology, Petrochemical Engineering, Petrochemical Technology
    MechanicalMechanical Engineering
    ElectricalElectrical Engineering, Electrical and Electronics Engineering

    Production, Automobile, Mechatronics और Construction Engineering जैसी degrees eligible नहीं मानी जाएंगी। MRPL ने साफ किया है कि ये examples indicative हैं और exclusions सिर्फ इन्हीं courses तक सीमित नहीं हैं।

    Degree किसी UGC-recognised Indian university या deemed university, AICTE-approved autonomous institution, संबंधित statutory council या Board of Technical Education से recognised होनी चाहिए।

    कितने प्रतिशत marks जरूरी हैं?

    UR, EWS और OBC-NCL candidates के लिए minimum aggregate 60% है। SC, ST और PwBD candidates के लिए minimum 50% aggregate marks चाहिए।

    यह percentage सभी semesters के average से निकलेगा और इसे round off नहीं किया जाएगा। यानी 59.99% को 60% नहीं माना जाएगा।

    अगर university CGPA conversion formula देती है, तो उसी formula का इस्तेमाल करना होगा। जहां university ने कोई conversion formula नहीं दिया है, वहां CGPA × 10 लागू किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए university से documentary proof देना होगा कि कोई निर्धारित formula मौजूद नहीं है।

    Five-year integrated dual degree में BE या B.Tech plus ME या M.Tech को four-year engineering degree के बराबर माना जाएगा।

    अगर किसी candidate ने qualifying BE, B.Tech या B.Sc. Engineering discipline में की है और GATE 2026 का valid score उसी eligible paper में है, तो अलग discipline में M.Tech होने के बावजूद eligibility बनी रह सकती है।

    Integrated course में दो degrees मिलने पर BE या B.Tech का percentage देखा जाएगा। अगर integrated course के बाद सिर्फ एक ME या M.Tech degree जारी हुई है, तो consolidated integrated-course marks consider किए जाएंगे।

    MRPL AE Recruitment के लिए age limit क्या है?

    19 सितंबर 2026 को UR और EWS candidates की maximum age 27 years होनी चाहिए।

    OBC-NCL candidates को 3 years और SC/ST candidates को 5 years की age relaxation मिलेगी। 40% या उससे ज्यादा disability वाले PwBD candidates को category relaxation के अलावा 10 years की additional relaxation दी जाएगी।

    Ex-Servicemen candidates के लिए age relaxation Government of India rules के अनुसार लागू होगी।

    PwBD relaxation category relaxation के ऊपर लागू होती है, लेकिन यह उसी category के reserved post के लिए लागू होगी।

    Direct Online Apply Link

    MRPL Careers – Online Apply

    ऊपर दिए MRPL के official Careers page पर जाकर:

    1. “Advt. No. 94/2026: Recruitment of Assistant Engineers in E2 Grade…” चुनें।
    2. “Click here to register online” पर क्लिक करें।
    3. Email ID और Mobile Number से registration करें।
    4. Login करके application form भरें।
    5. GATE 2026 Score Card, Photograph, Signature और applicable certificates upload करें।
    6. General/OBC-NCL/EWS candidates को ₹118 online fee देनी होगी। SC/ST/PwBD/Ex-Servicemen candidates fee से exempt हैं।

    Last Date: 19 September 2026, शाम 6:00 बजे।

    ध्यान रखें: MRPL ने साफ कहा है कि application सिर्फ उसके official online portal से ही स्वीकार होगी; किसी agency या individual के जरिए आवेदन नहीं किया जा सकता।

    Selection Process में exam होगा या नहीं?

    MRPL Assistant Engineer recruitment में अलग से written examination नहीं होगा।

    सबसे पहले GATE 2026 marks के आधार पर candidates की shortlisting होगी। Shortlisted candidates को Group Discussion के लिए बुलाया जाएगा और इसके बाद Personal Interview होगा।

    इस भर्ती के लिए GATE 2026 के केवल CH, ME और EE papers मान्य हैं। पुराने GATE scores इस selection process में स्वीकार नहीं किए जाएंगे।

    MRPL Assistant Engineer की salary कितनी है?

    Selected Assistant Engineer को E2 Grade Management Cadre में नियुक्त किया जाएगा। Starting basic pay ₹50,000 है और pay scale ₹50,000 से ₹1,60,000 तक है।

    Salary structure में IDA pattern पर Dearness Allowance, HRA या township accommodation, cafeteria approach के तहत perks और allowances तथा Performance Related Pay शामिल हैं।

    Job location कहां होगी?

    Posting MRPL की requirement के हिसाब से तय की जाएगी। Selected employees को India या abroad में transfer किया जा सकता है।

    Transfer MRPL, ONGC group companies या अन्य organisation के भीतर भी हो सकता है। जरूरत के मुताबिक shift और night-shift duty भी करनी पड़ सकती है।

    MRPL ने working knowledge of Hindi को desirable qualification के तौर पर रखा है।

    Service Bond कितना है?

    Selected candidate को joining के बाद 3 years का service bond पूरा करना होगा।

    MRPL suitable candidates का panel भी बना सकता है और यह panel one year तक operate किया जा सकता है।

    कंपनी को minimum eligibility standards बढ़ाने, notified posts को भरने या किसी position को vacant रखने का अधिकार भी है और इसके लिए अलग reason देना जरूरी नहीं होगा।

    MRPL Assistant Engineer Recruitment 2026 Application Fee

    General category सहित applicable candidates के लिए application fee ₹118 है।

    SC, ST, PwBD और Ex-Servicemen candidates को application fee से exemption दी गई है।

    Serving Government, PSU या autonomous-body employees को application process के दौरान proper channel से printed application forward करना होगा या interview के समय NOC प्रस्तुत करना होगा।

    MRPL Recruitment 2026 में आवेदन कब तक करें?

    Online application window 21 अगस्त 2026 से शुरू है। आवेदन जमा करने की अंतिम तारीख 19 सितंबर 2026 है और application window शाम 6 बजे बंद होगी।

    इसलिए eligible candidates को GATE 2026 paper, engineering degree, category, marks और age criteria check करने के बाद application submit करना चाहिए।

    MRPL Assistant Engineer Recruitment 2026: जरूरी जानकारी एक नजर में

    जानकारीDetails
    OrganisationMangalore Refinery and Petrochemicals Limited
    Parent CompanyONGC
    PostAssistant Engineer – E2 Grade
    CadreManagement Cadre
    Total Posts26
    Chemical Posts15
    Mechanical Posts8
    Electrical Posts3
    GATE RequirementGATE 2026 only
    GATE PapersCH, ME, EE
    SelectionGATE Shortlisting, Group Discussion, Personal Interview
    Starting Basic Pay₹50,000
    Pay Scale₹50,000 – ₹1,60,000
    Application Start21 August 2026
    Last Date19 September 2026, 6:00 PM
    Application Fee₹118
    ExemptionSC, ST, PwBD, Ex-Servicemen
    Service Bond3 years
    Job LocationMRPL requirements के अनुसार

    MRPL Assistant Engineer Recruitment 2026

    अगर आपके पास eligible engineering degree है और आपने GATE 2026 में संबंधित CH, ME या EE paper दिया है, तो यह भर्ती आपके लिए relevant opportunity है। Application submit करने से पहले अपनी degree nomenclature, aggregate percentage, category और age की conditions जरूर match करें, क्योंकि MRPL ने discipline-wise eligibility अलग रखी है।

  • CM Vijay Thalapathy का Fake Video दिखाकर ₹12 लाख की ठगी, सरकारी मदद के नाम पर ऐसे बिछाया जाल

    CM Vijay Thalapathy का Fake Video दिखाकर ₹12 लाख की ठगी, सरकारी मदद के नाम पर ऐसे बिछाया जाल

    वसई में 66 साल की महिला को CM Vijay Thalapathy के Deepfake Video से ₹12 लाख की ठगी का शिकार बनाया गया। जानिए पूरा मामला और Cyber Fraud से बचने का आसान रास्ता।

    पालघर/ वसई: सोशल मीडिया पर दिखने वाला कोई Video कितना भी असली क्यों न लगे, अब उस पर आंख बंद करके भरोसा करना भारी पड़ सकता है। वसई में 66 साल की एक महिला को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय यानी Thalapathy Vijay के नाम और चेहरे से बनाए गए Fake AI Video के जरिए आर्थिक मदद का भरोसा दिलाया गया और करीब 12 लाख रुपये की ठगी कर ली गई।

    पुलिस के मुताबिक, महिला ने Instagram पर एक Reel देखी थी, जिसमें विजय को कथित तौर पर गरीब और जरूरतमंद लोगों को Financial Assistance देने की बात करते दिखाया गया था। Reel में संपर्क करने के लिए एक Phone Number भी दिया गया था। महिला ने जब उस नंबर पर संपर्क किया तो उन्हें दूसरे नंबर पर बात करने के लिए कहा गया। इसके बाद शुरू हुआ पैसे ऐंठने का पूरा खेल।

    Instagram Reel देखकर किया भरोसा

    मामला 27 जुलाई से शुरू हुआ। महिला की नजर Instagram पर एक ऐसी Reel पर पड़ी जिसमें विजय को लोगों को आर्थिक मदद देने की बात कहते हुए दिखाया गया था।

    महिला ने Reel में दिए गए नंबर पर फोन किया। दूसरी तरफ मौजूद लोगों ने उनसे बातचीत शुरू की और उन्हें भरोसा दिलाया कि उन्हें आर्थिक मदद मिल सकती है।

    महिला ने करीब 5 लाख रुपये की मदद मांगी। इसके बाद ठगों ने कहा कि मदद की रकम हासिल करने के लिए पहले 5 हजार रुपये Processing Fee जमा करनी होगी।

    महिला ने यह रकम दे दी।

    यहीं से ठगी का सिलसिला और आगे बढ़ गया।

    ₹5 हजार के बाद ₹77 लाख का नया झांसा

    Processing Fee देने के बाद ठगों ने महिला को बताया कि उन्हें विदेश से करीब 77 लाख रुपये मिलने वाले हैं। इसके लिए Tax और दूसरे Charges के नाम पर लगातार पैसे जमा करने को कहा गया।

    मदद की रकम मिलने की उम्मीद में महिला ठगों की बातों पर भरोसा करती रहीं और अलग-अलग समय पर पैसे भेजती रहीं।

    पुलिस के मुताबिक, महिला ने एक Private Credit Society से Loan लिया, अपनी Jewellery गिरवी रखी और अपनी बेटी के Bank Account से भी पैसे निकाले। इसके बाद ठगों की ओर से बताए गए Bank Accounts में कुल करीब 12 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए गए।

    पूरी रकम करीब 10 दिनों के दौरान भेजी गई।

    12 लाख देने के बाद भी नहीं मिली मदद

    महिला को जब वादा की गई Financial Assistance नहीं मिली और ठग लगातार पैसे मांगते रहे, तब उन्हें शक हुआ।

    इसके बाद उन्हें समझ आया कि जिस Video को देखकर उन्होंने भरोसा किया था, वह असली नहीं बल्कि AI से बनाया गया Fake Video था।

    महिला ने इसके बाद वालिव पुलिस से संपर्क किया।

    वालिव पुलिस ने दर्ज किया मामला

    मामले में वालिव Police Station में शिकायत दर्ज की गई है। पुलिस ने Bharatiya Nyaya Sanhita और Information Technology Act के तहत Cheating का मामला दर्ज किया है।

    Police Inspector Gorakshnath Zaid ने मामले की पुष्टि की है। अब पुलिस उन लोगों का पता लगाने की कोशिश कर रही है जिन्होंने महिला से संपर्क किया और जिन Bank Accounts में रकम ट्रांसफर करवाई गई।

    Deepfake Video के बाद ऐसे आगे बढ़ा Fraud

    इस मामले में ठगों ने सीधे पैसे की मांग नहीं की। पहले Social Media पर एक भरोसेमंद चेहरे का इस्तेमाल किया गया।

    पहले Fake Video दिखाया गया।

    फिर Video में दिए गए नंबर पर संपर्क करवाया गया।

    इसके बाद आर्थिक मदद का भरोसा दिया गया।

    पहले सिर्फ 5 हजार रुपये की Processing Fee मांगी गई।

    इसके बाद 77 लाख रुपये मिलने का दावा किया गया।

    फिर Tax और दूसरे Charges के नाम पर लगातार Payment करवाया गया।

    आखिर में महिला से करीब 12 लाख रुपये ट्रांसफर करवा लिए गए।

    यानी Fake Video ने भरोसा बनाया और उसके बाद Phone Call और अलग-अलग Payment के जरिए ठगी को आगे बढ़ाया गया।

    देश में Deepfake से जुड़े ऐसे और मामले

    वसई का मामला अकेला नहीं है। हाल के महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से Deepfake Video के जरिए Financial Fraud और Blackmail के मामले सामने आए हैं।

    पुणे में 38 साल की एक महिला को Instagram पर उद्योगपति रतन टाटा का Deepfake Video दिखाया गया। इस Video में Share Trading से जुड़े निवेश और अच्छे Return का दावा किया गया था। महिला ने Advertisement पर क्लिक किया और बाद में एक App के जरिए कथित Investment Scheme में पैसे लगाए। पुलिस के अनुसार उन्हें करीब 4.09 लाख रुपये का नुकसान हुआ।

    इसके अलावा वहीं, पुणे में ही 56 साल के एक Businessman को Finance Minister Nirmala Sitharaman के Deepfake Video के जरिए Investment के नाम पर फंसाया गया। इसके बाद Fake Forex Trading Platform, Fake Investment Advisor और SpaceX Shares के नाम पर करीब 1.07 करोड़ रुपये की ठगी की गई। Fake Platform पर कथित Profit बढ़ता हुआ दिखाया गया और पैसा निकालने के लिए आगे और रकम मांगी गई।

    बेंगलुरु में एक Retired Professor को Facebook पर Nirmala Sitharaman का Deepfake Video दिखाया गया। इसके बाद उन्हें एक Fake Trading Platform, Telegram Chat और Overseas Calls के जरिए Investment के नाम पर फंसाया गया और 61 लाख रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ।

    पटना में Deepfake का इस्तेमाल अलग तरीके से किया गया। एक Hotel Owner को उनके चेहरे से बनाए गए कथित अश्लील AI Videos के जरिए Blackmail किया गया और करीब 97 लाख रुपये की रकम वसूली गई। पुलिस ने तीन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था और अंतिम 20 लाख रुपये की किस्त बरामद की गई।

    इन मामलों से साफ है कि Deepfake का इस्तेमाल अब सिर्फ Fake News फैलाने के लिए नहीं बल्कि Investment Fraud, Financial Assistance Scam और Blackmail जैसे अपराधों में भी किया जा रहा है।

    Video में नेता या Celebrity दिखे तो भी तुरंत भरोसा न करें

    AI की मदद से किसी व्यक्ति का चेहरा और आवाज इस्तेमाल करके ऐसा Video तैयार किया जा सकता है जिसमें वह व्यक्ति ऐसी बात कहता हुआ दिखाई दे सकता है जो उसने वास्तव में कही ही नहीं।

    इसलिए अगर किसी Social Media Video में कोई नेता, Celebrity, कारोबारी या सरकारी अधिकारी पैसे, Investment, नौकरी, Lottery या Financial Assistance का दावा करता दिखाई दे और साथ में कोई Mobile Number, WhatsApp Number, Website या Payment Request दी गई हो तो सीधे पैसे भेजना जोखिम भरा हो सकता है।

    ऐसी जानकारी को पहले संबंधित व्यक्ति या संस्था के Official Source से Verify करना जरूरी है।

    सरकारी मदद के नाम पर Processing Fee मांगी जाए तो सावधान

    वसई के मामले में ठगी की शुरुआत सिर्फ 5 हजार रुपये की Processing Fee से हुई। इसके बाद रकम बढ़ती चली गई।

    यही वजह है कि किसी भी Government Scheme या Financial Assistance के नाम पर पहले पैसे जमा करने को कहा जाए तो सावधान रहें।

    किसी अनजान व्यक्ति के बताए Bank Account, UPI ID, Website या App पर Payment करने से पहले उसकी जानकारी Official Government Source से जांचना जरूरी है।

    पैसा चला गया तो तुरंत 1930 पर करें शिकायत

    अगर किसी व्यक्ति के साथ Financial Cyber Fraud हो गया है और उसने पैसे ट्रांसफर कर दिए हैं तो शिकायत करने में देरी नहीं करनी चाहिए।

    Indian Cyber Crime Coordination Centre यानी I4C के मुताबिक Financial Cyber Fraud की शिकायत National Helpline Number 1930 पर की जा सकती है। इसके बाद Cyber Crime Reporting Portal पर शिकायत की जानकारी पूरी करनी होती है।

    शिकायत करते समय Transaction ID, Transaction Date, Bank या Payment App की जानकारी, UPI ID, Account Details, Phone Numbers, Chat और Screenshots जैसी जानकारी सुरक्षित रखना जरूरी है।

    साथ ही अपने Bank या संबंधित Payment Service Provider को भी तुरंत Fraud Transaction की जानकारी देनी चाहिए।

    I4C का Citizen Financial Cyber Fraud Reporting and Management System Financial Fraud की शिकायतों पर Banks और Payment Intermediaries के साथ कार्रवाई के लिए बनाया गया है।

    साइबर फ्रॉड के खिलाफ सरकार की कार्रवाई भी तेज

    सरकार के मुताबिक 30 जून 2026 तक CFCFRMS के जरिए 32.80 लाख से ज्यादा शिकायतों में 11,158 करोड़ रुपये से अधिक की रकम बचाई गई। इसी अवधि तक I4C ने 3,718 Mobile Apps को भी Block किया था। सरकार ने यह भी बताया कि Suspect Registry के जरिए संदिग्ध Identifiers और Mule Accounts की जानकारी Banks और Financial Institutions के साथ साझा की जा रही है।

    अप्रैल 2026 से Money Restoration Module और Grievance Redressal Module भी काम कर रहे हैं, जिनका उद्देश्य Cyber Fraud में फंसी रकम की बहाली और Bank Accounts के Freeze या Lien से जुड़ी शिकायतों को तेजी से संभालना है।

    Deepfake को लेकर नए नियम भी लागू

    भारत सरकार ने 2026 में AI-generated और Deepfake Content से जुड़े नियमों को और मजबूत किया है। फरवरी 2026 में IT Rules में बदलाव करके Synthetically Generated Information यानी AI से तैयार सामग्री से होने वाले नुकसान को लेकर नया regulatory framework लाया गया। इसमें Deepfake और AI-generated content भी शामिल है।

    सरकार ने Social Media Platforms के लिए AI-generated content की स्पष्ट पहचान और traceable information से जुड़ी व्यवस्था भी तय की है। Unlawful content की शिकायतों पर Platforms को तेजी से कार्रवाई करने की जिम्मेदारी दी गई है।

    अब Social Media पर दिखने वाले Video को लेकर क्या सावधानी रखें?

    किसी बड़े नेता या Celebrity का Video देखकर सिर्फ इसलिए भरोसा न करें क्योंकि उसमें चेहरा और आवाज बिल्कुल असली जैसी लग रही है।

    अगर Video में Financial Assistance, Investment, नौकरी, Lottery या किसी दूसरी आर्थिक मदद का दावा है तो पहले Official Source से जानकारी Verify करें।

    Video में दिए गए किसी अनजान Phone Number या Link पर तुरंत संपर्क न करें।

    Processing Fee, Tax, Verification Charge या Withdrawal Charge के नाम पर पैसे मांगने पर रुक जाएं।

    किसी अनजान Bank Account या UPI ID में Payment न करें।

    और अगर गलती से पैसा भेज दिया है तो इंतजार करने के बजाय तुरंत 1930 पर शिकायत करें और Cyber Crime Portal पर मामला दर्ज करें।

    वसई की 66 साल की महिला के साथ हुई यह घटना बताती है कि Social Media पर दिखने वाला भरोसेमंद चेहरा भी ठगी का जरिया बन सकता है। यहां 5 हजार रुपये की छोटी Payment से शुरू हुआ मामला करीब 12 लाख रुपये के नुकसान तक पहुंच गया।

    इसलिए अगली बार किसी Video में कोई बड़ा नेता, Celebrity या सरकारी व्यक्ति आर्थिक मदद या Investment का दावा करता दिखाई दे तो Video देखकर फैसला लेने के बजाय पहले उसकी सच्चाई Verify करें। यही सावधानी आपके पैसे को ऐसे Deepfake Cyber Fraud से बचा सकती है।

  • प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना पर बड़ा खुलासा: 41 FIR, 178 ट्रेनिंग सेंटर ब्लैकलिस्ट और 34 लाख भुगतान अटके, CAG रिपोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

    प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना पर बड़ा खुलासा: 41 FIR, 178 ट्रेनिंग सेंटर ब्लैकलिस्ट और 34 लाख भुगतान अटके, CAG रिपोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

    प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में 41 FIR, 178 ट्रेनिंग सेंटर ब्लैकलिस्ट और 34 लाख भुगतान अटके। CAG की रिपोर्ट में सामने आईं गंभीर अनियमितताएं।

    नई दिल्ली: प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना यानी युवाओं को skill training देकर job और self-employment के मौके देने वाली देश की बड़ी सरकारी schemes में से एक अब गंभीर सवालों के घेरे में है। CAG की audit findings से लेकर 2026 में दर्ज हुई 41 FIR, 178 Training Centres की blacklisting और NSDC के करीब 20 current और former employees को भेजे गए show-cause notices तक, इस पूरी scheme को लेकर लगातार कार्रवाई सामने आ रही है।

    सबसे बड़ा सवाल उन युवाओं का है जिन्होंने इस scheme के तहत training ली, certificate हासिल किया और payment या job का इंतजार किया। क्या training सही तरीके से हुई? क्या beneficiary का record सही था? Payment क्यों अटका? और certificate मिलने के बाद नौकरी कितनों को मिली?

    41 FIR और 178 Training Centres पर कार्रवाई

    2026 में सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना से जुड़े मामलों में 167 cases को FIR के लिए identify किया गया और 41 FIR दर्ज की गईं।

    वहीं प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना 4.0 के तहत 178 Training Centres को blacklist किया गया। इन centres के खिलाफ आगे की payments रोकने और नियमों के उल्लंघन से जुड़े payments की recovery शुरू करने के निर्देश दिए गए।

    हालांकि यहां यह समझना जरूरी है कि FIR दर्ज होना किसी मामले में आरोप या investigation की शुरुआत है, conviction नहीं। इसी तरह 178 blacklisted centres को सीधे 178 “fake centres” कहना भी सही नहीं होगा। Blacklisting scheme guidelines और inspection findings के आधार पर की गई कार्रवाई है।

    34 लाख से ज्यादा candidates का payment क्यों अटका?

    इस पूरी कहानी का सबसे सीधा असर उन candidates पर पड़ता है जिन्होंने training पूरी की लेकिन उनका payment नहीं पहुंचा।

    CAG के मुताबिक प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के दूसरे और तीसरे phase में 34 लाख candidates के DBT payments outstanding थे।

    पहले phase में भी करीब ₹40 करोड़ की DBT राशि incorrect या incomplete bank और Aadhaar details की वजह से beneficiaries तक नहीं पहुंच सकी थी।

    यानी अगर किसी candidate ने training और certification पूरा किया है, लेकिन उसके खाते में पैसा नहीं आया, तो सिर्फ “payment pending” देखकर मामला खत्म नहीं होता। Bank details, Aadhaar linking और beneficiary record में mismatch भी इसकी वजह हो सकता है।

    एक bank account से 2,106 candidates का record

    CAG audit में bank details की जांच के दौरान एक और बड़ी गड़बड़ी सामने आई।

    प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के दूसरे और तीसरे phase के data में 12,122 unique bank accounts ऐसे पाए गए जो एक से ज्यादा candidates के लिए इस्तेमाल हुए थे।

    इन accounts से कुल 52,381 candidates जुड़े हुए थे।

    सबसे चौंकाने वाला मामला एक ऐसे account का था जिसे 2,106 candidates के records में इस्तेमाल किया गया था।

    कुछ records में 11111111111, zeros, blank और दूसरे apparently invalid entries भी मिले।

    इसका मतलब यह नहीं कि इन सभी candidates को fake घोषित कर दिया गया। लेकिन beneficiary और payment data की verification system पर गंभीर सवाल जरूर खड़े हुए। CAG ने कहा कि उपलब्ध bank-account data से beneficiaries की identity को लेकर पर्याप्त assurance नहीं मिल रही थी।

    क्या training centre सच में चल रहा था?

    CAG की जांच में कुछ Training Centres physical inspection के दौरान बंद मिले।

    कुछ जगह training records और ground reality के बीच mismatch भी सामने आया। Candidate photographs के repeat होने और attendance तथा identity verification में gaps की findings भी सामने आईं।

    यानी सवाल यह भी है कि जिस candidate के नाम पर training और certification का record बना, क्या वह candidate वास्तव में उस training में मौजूद था?

    यहां भी हर irregular record को सीधे fake candidate मानना सही नहीं है। Audit findings मुख्य रूप से verification और monitoring system में मौजूद कमजोरियों की तरफ इशारा करती हैं।

    “Ghost Candidate” का मतलब क्या है?

    अगर किसी व्यक्ति का नाम scheme के record में मौजूद है, लेकिन उसकी identity, attendance, bank details या training participation properly verify नहीं हो पाती, तो मामला questionable या ghost beneficiary verification तक पहुंच सकता है।

    CAG ने candidate eligibility को लेकर भी सवाल उठाए।

    कुछ records में age, education और दूसरे eligibility criteria की proper checking नहीं होने की बात सामने आई।

    यानी scheme में सिर्फ यह देखना काफी नहीं था कि candidate का नाम system में दर्ज है। यह भी जरूरी था कि वह candidate scheme के लिए eligible था और उसकी identity सही तरीके से verify हुई थी।

    Certificate मिला, लेकिन नौकरी कितनों को मिली?

    प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का असली मकसद सिर्फ training और certificate देना नहीं था। इसका final outcome रोजगार और बेहतर income से जुड़ा था।

    लेकिन CAG की audit में पुराने phases के Short Term Training component में certified candidates की placement करीब 41 प्रतिशत के आसपास पाई गई।

    सरकार की बाद की reporting में PMKVY 3.0 तक reported placement करीब 43 प्रतिशत बताई गई।

    इसका सीधा मतलब है कि training या certificate और actual job एक ही चीज नहीं हैं।

    यही वजह है कि किसी भी candidate के लिए सबसे जरूरी सवाल यह होना चाहिए कि course पूरा करने के बाद उसे वास्तव में job या self-employment का फायदा मिला या नहीं।

    कुछ बड़े Training Providers में placement 10% से भी कम

    CAG की detailed जांच में training providers के performance में काफी बड़ा difference सामने आया।

    Top training providers में भी 114 providers ऐसे पाए गए जिनका placement rate 10 प्रतिशत से कम था।

    इन providers ने करीब 5.88 लाख candidates को certify किया, लेकिन लगभग 20,000 candidates ही placement तक पहुंच पाए।

    इससे साफ होता है कि सिर्फ overall placement percentage देखने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। अलग-अलग Training Providers का actual performance काफी अलग रहा।

    Training Providers को इतने बड़े targets कैसे मिले?

    CAG ने Training Providers को मिले targets और certifications को भी examine किया।

    PMKVY 2.0 में top 10 प्रतिशत Training Providers ने करीब 83 प्रतिशत batches और 85.61 प्रतिशत certifications संभालीं।

    PMKVY 3.0 में top 10 प्रतिशत providers ने करीब 82 प्रतिशत batches और 85.31 प्रतिशत certifications संभालीं।

    इसके मुकाबले bottom 50 प्रतिशत providers का share काफी कम था।

    इससे यह सवाल उठता है कि scheme के बड़े targets कुछ Training Providers के पास इतने concentrated क्यों हुए और उनके performance की monitoring कितनी प्रभावी थी।

    Certificate मिलने में सालों की देरी

    Training पूरी होने के बाद candidate के लिए अगला जरूरी step assessment और certification होता है।

    लेकिन CAG की जांच में selected states में कुछ cases में training पूरी होने के बाद assessment में 1,270 दिनों तक की देरी सामने आई।

    Assessment के बाद certification में भी 1,257 दिनों तक की delay दर्ज हुई।

    करीब 23.87 लाख candidates ऐसे थे जिनके certification में सात दिनों से ज्यादा की delay पाई गई।

    जिस युवा को certificate के आधार पर job या आगे की career opportunity तलाशनी हो, उसके लिए इतनी लंबी delay का सीधा असर पड़ सकता है।

    Inspection system पर भी सवाल

    CAG ने inspection records के timestamps को भी examine किया।

    295 cases में एक ही inspector द्वारा अलग-अलग locations पर inspection शुरू करने के बीच पांच मिनट से भी कम का gap पाया गया।

    Ministry ने इन discrepancies को technical issues से जोड़ते हुए बाद में photo-upload और monitoring controls मजबूत करने की जानकारी दी।

    इसलिए इसे सीधे fake inspection कहना सही नहीं होगा, लेकिन audit ने ऐसी discrepancy जरूर दर्ज की जिसे system level पर explain और correct करना जरूरी था।

    RPL में भी सामने आईं गड़बड़ियां

    प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का Recognition of Prior Learning यानी RPL component उन लोगों की existing skills को certify करने के लिए है जो पहले से किसी trade या काम में skilled हैं।

    CAG ने RPL-BICE component में भी कई irregularities दर्ज कीं।

    एक मामले में Radiate Designs ने करीब 15,218 candidates को certify किया था। CAG के मुताबिक company 2014-15 के बाद ROC returns file नहीं कर रही थी और ROC records में struck off थी। Audit team को दिए गए address पर एक shop मिली, जहां company का visible signboard नहीं था।

    CAG ने इस तरह के records के आधार पर certification process की verification पर सवाल उठाए।

    एक दूसरे fitness trainer से जुड़े case में 10,000 candidates की placement और 30,000 employees की capacity का दावा किया गया था, जबकि संबंधित gyms में Ministry के records के अनुसार employees की संख्या काफी कम थी।

    Jharkhand में 8,922 certifications में से 7,145 East Singhbhum में और Rajasthan में सभी 5,444 certifications Churu district में concentrated थीं।

    Audit ने employee-employer relationship की proper verification के बिना certifications किए जाने पर सवाल उठाए।

    PMKVY 4.0 में भी data से जुड़े सवाल

    यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा।

    CAG की मुख्य audit findings प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के पहले तीन phases से जुड़ी हैं। PMKVY 4.0 बाद में शुरू हुई और इसमें technology-based verification को मजबूत किया गया है।

    लेकिन CAG ने PMKVY 4.0 के उपलब्ध data की भी कुछ जांच की।

    इसमें:

    • 175 invalid mobile numbers
    • 2,263 repeated mobile numbers
    • करीब 2.72 लाख null email addresses
    • करीब 3.08 लाख repeated email addresses

    मिले।

    इन आंकड़ों का मतलब यह नहीं कि इतने candidates fake थे। लेकिन इससे यह जरूर पता चलता है कि digital system में भी data validation को लगातार मजबूत रखने की जरूरत है।

    अब सरकार ने क्या बदला?

    PMKVY 4.0 में beneficiary verification और monitoring के लिए कई technology-based controls बढ़ाए गए हैं।

    इनमें:

    • Aadhaar-based verification
    • Face Authentication
    • AEBAS attendance
    • e-KYC
    • duplicate candidate checks
    • digital monitoring
    • physical inspections
    • geo-tagged evidence
    • candidate feedback
    • third-party assessment

    जैसे measures शामिल हैं।

    PMKVY 4.0 में AI, drones, robotics, green energy, semiconductor manufacturing और दूसरे new-age sectors से जुड़े courses पर भी ज्यादा focus किया जा रहा है।

    जून 2026 तक सरकार के मुताबिक PMKVY 4.0 के तहत 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 738 जिलों में 28.17 लाख candidates train किए जा चुके थे। इसके implementation ecosystem में 16,900 से ज्यादा institutions और 6,800 से ज्यादा Skill Hubs शामिल थे।

    PMKVY 4.0 को लेकर सरकार के आंकड़े क्या कहते हैं?

    पुरानी phases की CAG findings के बावजूद PMKVY 4.0 के impact को लेकर सरकार ने positive results भी जारी किए हैं।

    29 जुलाई 2026 को सरकार ने independent impact evaluation का हवाला देते हुए बताया कि Short Term Training candidates में employed और self-employed लोगों का combined share training से पहले 26.6 प्रतिशत था, जो training के बाद 45.4 प्रतिशत हो गया।

    यानी 18.8 percentage points का increase दर्ज किया गया।

    सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 41.4 प्रतिशत STT candidates और 48.9 प्रतिशत RPL candidates ने training और certification के बाद income बढ़ने की बात भी बताई।

    इसलिए आज की स्थिति को सिर्फ पुरानी CAG findings से देखना पूरी तस्वीर नहीं देगा। पुराने phases में गंभीर implementation problems सामने आईं, जबकि PMKVY 4.0 को लेकर सरकार के पास employment और income outcomes में improvement का evaluation data भी है।

    Maharashtra और Mumbai के युवाओं के लिए क्या जरूरी है?

    महाराष्ट्र भी PMKVY की implementation और audit scrutiny में शामिल रहा है।

    अगर आपने Mumbai या Maharashtra में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत training ली है, तो अपने record को जरूर verify करें।

    क्या आपका Training Centre अभी भी active है?

    क्या आपकी attendance सही दर्ज है?

    क्या Aadhaar और bank details सही हैं?

    क्या DBT payment मिला है?

    क्या certificate में आपका सही job role है?

    क्या Training Centre ने placement का दावा किया था?

    और सबसे जरूरी—

    क्या आपको वास्तव में job या income का फायदा मिला?

    क्योंकि scheme की सफलता सिर्फ certificate से तय नहीं होती।

    अगर आपने PMKVY की training ली है तो ये 8 चीजें check करें

    1. Certificate: आपका certificate official record में मौजूद है या नहीं।

    2. Training Centre: जिस centre से आपने course किया, उसकी status क्या है।

    3. Attendance: आपकी training attendance सही दर्ज है या नहीं।

    4. Aadhaar/e-KYC: आपकी identity details सही हैं या नहीं।

    5. Bank Account: आपके नाम से सही bank details linked हैं या नहीं।

    6. DBT Payment: payment मिला, pending है या transaction fail हुआ।

    7. Placement: अगर placement का दावा किया गया था तो employer और job details verify करें।

    8. Complaint: अगर आपके नाम पर ऐसी training या certification दिखाई दे रही है जो आपने की ही नहीं, या payment/identity में गलती है, तो official grievance mechanism पर complaint करें।

    इस पूरे मामले में अब आगे क्या देखना होगा?

    अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने Training Centres blacklist हुए या कितनी FIR दर्ज हुईं।

    आगे यह देखना ज्यादा जरूरी होगा कि:

    41 FIR की investigation कहां तक पहुंचती है?

    178 blacklisted centres में recovery कितनी होती है?

    34 लाख pending payments में कितने candidates को पैसा मिलता है?

    NSDC के जिन करीब 20 current और former employees को notices दिए गए हैं, उनके खिलाफ आगे क्या action होता है?

    और सबसे बड़ा सवाल—

    क्या PMKVY 4.0 में technology-based safeguards पुराने loopholes को वास्तव में बंद कर पाते हैं?

    प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का असली test यही है कि government records में कितने candidates trained और certified दिखते हैं, इससे आगे जाकर कितने युवाओं को वास्तव में skill, payment, job और बेहतर income मिलती है।

    CAG की findings ने पुराने system की कई कमजोरियां सामने रख दी हैं। 2026 की FIR और blacklisting के जरिए कार्रवाई भी चल रही है। वहीं PMKVY 4.0 के नए evaluation में employment और income outcomes में improvement का दावा किया गया है।

    अब नजर इस बात पर है कि पुरानी गलतियों से सीखकर मौजूदा system कितना मजबूत हुआ है और scheme से जुड़े युवाओं को उसका वास्तविक फायदा कितना मिल रहा है।

  • मुंबई में 210 ‘भूतिया कर्मचारियों’ के नाम पर ₹4.15 करोड़ का लोन घोटाला, पूर्व CEO समेत 4 पर FIR

    मुंबई में 210 ‘भूतिया कर्मचारियों’ के नाम पर ₹4.15 करोड़ का लोन घोटाला, पूर्व CEO समेत 4 पर FIR

    मुंबई के विले पार्ले में 210 कथित फर्जी कर्मचारियों के नाम पर ₹4.15 करोड़ का लोन घोटाला सामने आया है। पूर्व CEO समेत 4 पर FIR दर्ज हुई।

    मुंबई: विले पार्ले में बैंक से जुड़े एक बड़े लोन घोटाले का मामला सामने आया है। पुलिस ने मराठा बैंक के पूर्व CEO समेत चार लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है। आरोप है कि 210 कथित ‘भूतिया कर्मचारियों’ के नाम पर कुल ₹4.15 करोड़ से ज्यादा का लोन जारी कराया गया।

    पुलिस के मुताबिक, लोन लेने के लिए जिन लोगों के नाम और दस्तावेज इस्तेमाल किए गए, उन्होंने बाद में इन कंपनियों में काम करने से इनकार किया। मामले में बैंक के तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में है।

    210 लोगों के नाम पर ऐसे निकाली गई रकम

    एफआईआर के मुताबिक, मुंबई पैरामेडिकल कंपनी के 126 कथित कर्मचारियों के नाम पर करीब ₹2.47 करोड़ के लोन जारी किए गए। वहीं पीपल पैरामेडिकल कंपनी के 84 कथित कर्मचारियों के नाम पर करीब ₹1.68 करोड़ का लोन दिया गया।

    इस तरह कुल 210 लोगों के नाम पर 210 लोन खातों से ₹4,15,05,000 की रकम निकाले जाने का आरोप है।

    लोन के लिए लगाए गए दस्तावेज भी कथित तौर पर फर्जी

    पुलिस की जांच में सामने आया कि लोन के लिए इस्तेमाल किए गए कई दस्तावेज कथित तौर पर फर्जी थे।

    इनमें:

    • आईडी कार्ड
    • Salary Slips
    • Salary Certificates
    • Rubber Stamps

    शामिल हैं।

    जिन लोगों के नाम पर लोन लिया गया, उन्होंने कथित तौर पर कंपनियों में काम करने से ही इनकार कर दिया।

    सभी लोन में बताया गया था एक ही कारण

    मामले में खास बात यह सामने आई है कि सभी 210 लोन घर की मरम्मत के नाम पर लिए गए थे।

    इसके लिए Western Construction Engineer और Laxmi Interior के नाम से कथित फर्जी quotations लगाए गए थे।

    एफआईआर के मुताबिक, लोन approve होने वाले दिन ही संबंधित लोगों के savings accounts खोले गए थे।

    बैंक खाते में पैसे आते ही शुरू हुआ cash withdrawal

    लोन की रकम संबंधित खातों में जमा होने के बाद करीब ₹15 हजार से ₹20 हजार तक cash withdrawal किए जाने का आरोप है।

    इसके अलावा कुछ रकम FD में भेजी गई। बची हुई रकम को Pay Order के जरिए एजेंट तक पहुंचाने का आरोप है।

    एफआईआर में कहा गया है कि इन Pay Order पर शाखा प्रमुख गोपाल मुकुंद परब के signatures थे।

    पूर्व CEO समेत 4 लोगों पर FIR

    विले पार्ले पुलिस ने इस मामले में बैंक के चार तत्कालीन अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है।

    FIR में जिन लोगों के नाम हैं:

    1. रमेश विठ्ठल शिरगांवकर — तत्कालीन CEO
    2. दशरथ पुंडलिक नाइक — महाप्रबंधक
    3. वैशाली कृष्णा मायेकर — लोन मैनेजर
    4. गोपाल मुकुंद परब — शाखा प्रमुख

    पुलिस अब यह जांच कर रही है कि कथित लोन फर्जीवाड़े में इन लोगों की क्या भूमिका थी और इसके पीछे और कौन-कौन लोग शामिल हो सकते हैं।

    9 से 10 साल तक बकाया रहे कई लोन

    बैंक के मुताबिक, इस मामले से जुड़े कई लोन 9 से 10 साल तक बकाया रहे। आरोप है कि इस दौरान प्रभावी recovery action नहीं लिया गया।

    बाद में लोन की recovery नहीं होने के बाद RBI ने 29 मई 2023 को मराठा बैंक का Cosmos Bank में merger कर दिया।

    Merger के बाद Cosmos Bank की शिकायत पर विले पार्ले पुलिस ने FIR दर्ज की।

    अब पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है। जांच में कथित फर्जी documents, 210 loan accounts, पैसों के transactions और इस पूरे मामले में शामिल अन्य लोगों की भूमिका को भी देखा जा रहा है।

  • 93% मुआवजा फिर भी सत्याग्रह क्यों? केन-बेतवा पर आदिवासियों की लड़ाई में राहुल गांधी की एंट्री, 14 गांवों में फिर होगा सर्वे

    93% मुआवजा फिर भी सत्याग्रह क्यों? केन-बेतवा पर आदिवासियों की लड़ाई में राहुल गांधी की एंट्री, 14 गांवों में फिर होगा सर्वे

    केन-बेतवा परियोजना पर आदिवासी सत्याग्रह के बीच राहुल गांधी का समर्थन, 93% मुआवजे के सरकारी दावे और 14 गांवों के नए सर्वे से जुड़े सवाल जानिए।

    भोपाल/छतरपुर: केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर बुंदेलखंड में आदिवासी परिवारों का संघर्ष एक बार फिर तेज हो गया है। 19 अगस्त 2026 को राहुल गांधी ने आंदोलन कर रहे आदिवासी भाई-बहनों से मुलाकात कर उनकी समस्याएं, मांगें और आपबीती सुनी और इस लड़ाई में उनके साथ खड़े रहने का भरोसा दिया।

    राहुल गांधी ने कहा कि सालों से अपने अधिकारों के लिए अन्याय और अत्याचार सह रहे बुंदेलखंड के निवासी सम्मान और समर्थन के हकदार हैं। उन्होंने साफ कहा कि आदिवासी भाई-बहनों की इस लड़ाई में वह और कांग्रेस उनके साथ हैं।

    लेकिन इस पूरी खबर में सबसे बड़ा सवाल राहुल गांधी का समर्थन नहीं, बल्कि यह है—

    जब सरकार खुद दावा कर रही है कि प्रभावित परिवारों को 93.78% rehabilitation compensation दिया जा चुका है, तो फिर आदिवासी परिवार अभी भी सत्याग्रह क्यों कर रहे हैं?

    यही सवाल अब केन-बेतवा परियोजना के पूरे विवाद के केंद्र में आ गया है।

    केन-बेतवा परियोजना आखिर क्यों इतनी बड़ी है?

    केन-बेतवा लिंक परियोजना का मकसद केन नदी के पानी को बेतवा नदी बेसिन तक पहुंचाना है। इसमें दाउधन बांध और करीब 221 किलोमीटर की link canal सहित कई बड़े infrastructure works शामिल हैं।

    सरकार का कहना है कि यह project बुंदेलखंड के लंबे समय से चले आ रहे water crisis को कम करने में मदद करेगा। सिंचाई का विस्तार होगा, किसानों को पानी मिलेगा और मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में drinking water supply बेहतर होगी।

    Protest-against-Ken-Betwa-MP-Chhatarpur

    सरकारी project details के मुताबिक लाखों हेक्टेयर जमीन को irrigation coverage देने और लाखों लोगों तक drinking water पहुंचाने का target है।

    यानी एक तरफ सरकार इसे बुंदेलखंड के लिए पानी और विकास की बड़ी योजना बता रही है, वहीं दूसरी तरफ project area में रहने वाले परिवारों का सवाल है—

    “विकास होगा, लेकिन हमारी जमीन और हमारी जिंदगी का क्या होगा?”

    आदिवासी परिवारों का विरोध आखिर किस बात पर है?

    प्रदर्शन कर रहे परिवारों की शिकायत सिर्फ इतनी नहीं है कि उन्हें compensation नहीं चाहिए।

    उनकी मांग है कि अगर project की वजह से उन्हें अपनी जमीन, घर और livelihood छोड़ना पड़ रहा है, तो rehabilitation ऐसा होना चाहिए जिससे विस्थापन के बाद उनकी जिंदगी दोबारा खड़ी हो सके।

    आंदोलन में मुख्य तौर पर इन सवालों को उठाया गया है—

    • कौन-कौन से परिवार वास्तव में project से प्रभावित हैं?
    • क्या सभी eligible परिवारों के नाम rehabilitation list में हैं?
    • जमीन और मकान का assessment सही हुआ है या नहीं?
    • compensation कितना और किस आधार पर मिल रहा है?
    • rehabilitation के बाद खेती और रोजगार का क्या होगा?
    • जंगल और natural resources पर निर्भर परिवारों का क्या होगा?
    • नए स्थान पर घर, पानी, स्कूल और healthcare की व्यवस्था कैसी होगी?

    यानी मामला सिर्फ “पैसा कितना मिला” का नहीं है।

    मामला यह भी है कि “पैसा मिलने के बाद जिंदगी कैसे चलेगी?”

    सरकार का बड़ा दावा: 93.78% compensation paid

    इसी बीच केंद्र सरकार ने 19 अगस्त को केन-बेतवा परियोजना से जुड़े compensation और rehabilitation के आंकड़े सामने रखे हैं।

    सरकार के मुताबिक 5,039 project-affected families को rehabilitation के लिए चिन्हित किया गया है। इनके लिए ₹629.87 करोड़ के awards बनाए गए थे, जिसमें से ₹590.74 करोड़ यानी 93.78% भुगतान किया जा चुका है।

    कृषि भूमि से जुड़े 10,913 प्रभावित व्यक्तियों के लिए ₹360.66 करोड़ के awards बताए गए हैं। इनमें ₹320.45 करोड़ यानी 88.85% रकम का भुगतान होने की जानकारी दी गई है।

    आवासीय संपत्तियों के compensation में भी करीब 94% payment का सरकारी दावा है।

    सरकार का कहना है कि जिन मामलों में payment बाकी है, वहां जरूरी legal और administrative formalities पूरी होने के बाद भुगतान किया जाएगा और land records की verification भी जारी है।

    लेकिन फिर वही सवाल—

    अगर इतना बड़ा हिस्सा भुगतान हो चुका है, तो आंदोलन खत्म क्यों नहीं हुआ?

    असल पेंच: कौन प्रभावित है और किसे कितना मिलेगा?

    यहीं से पूरा विवाद और complicated हो रहा है।

    किसी परिवार का नाम compensation list में होना और हर प्रभावित व्यक्ति की वास्तविक जरूरत पूरी होना एक ही बात नहीं है।

    आंदोलन से जुड़े लोगों ने eligibility, beneficiary criteria, compensation calculation और rehabilitation package को लेकर सवाल उठाए हैं।

    कुछ प्रदर्शनकारियों की मांग है कि rehabilitation benefits तय करते समय परिवार में मौजूद eligible adult members और उनकी वास्तविक livelihood जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाए।

    यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि “एक परिवार को कितना मिला?”

    सवाल यह भी है—

    “उस परिवार में कितने लोग अपनी आजीविका के लिए उसी जमीन पर depend थे?”

    14 गांवों में फिर से survey क्यों कराया जा रहा है?

    इस विवाद के बीच एक बड़ा administrative development सामने आया है।

    छतरपुर प्रशासन ने 14 प्रभावित गांवों में fresh survey का आदेश दिया है।

    इन गांवों में Sukwaha, Bhaurkhuwa, Ghughri, Naiguwan, Kakra, Kadwara, Palkoha, Kharyani, Dhodhan, Mainari, Kupi, Shahpura, Basudha और Dugaria शामिल हैं।

    Fresh verification में जमीन, मकान, पेड़, दूसरी assets और प्रभावित परिवारों की जानकारी दोबारा देखी जा रही है।

    इसका मकसद यह पता लगाना है कि कोई eligible परिवार या asset compensation और rehabilitation process से बाहर तो नहीं रह गया।

    यही fresh survey अब आंदोलनकारियों की मांग और सरकार के आंकड़ों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है।

    अप्रैल से अगस्त तक कैसे बढ़ा आंदोलन?

    यह विरोध आज से शुरू नहीं हुआ।

    प्रभावित परिवारों ने पिछले कई महीनों में अलग-अलग तरीकों से अपनी बात सरकार तक पहुंचाई।

    Protest-against-Ken-Betwa-news-Chhatarpur

    जल सत्याग्रह

    प्रदर्शनकारियों ने पानी में खड़े होकर अपना विरोध जताया।

    चिता आंदोलन

    आदिवासी महिलाओं ने symbolic चिताओं पर लेटकर protest किया। इसका संदेश था कि जमीन और livelihood छिनने के बाद उनके सामने जिंदगी और मौत जैसा सवाल खड़ा हो गया है।

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    Hunger Strike

    इसके बाद भूख हड़ताल शुरू हुई, जो कई दिनों तक चली।

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    Chulha Bandh

    जुलाई में protest का एक और symbolic तरीका सामने आया—Chulha Bandh। यानी खाना बनाना तक बंद कर विरोध जताया गया।

    Protest-against-Ken-Betwa-Project-MP-Chhatarpur

    आंदोलन में महिलाओं की बड़ी भागीदारी ने इसे और गंभीर बना दिया।

    19 जुलाई को police action के बाद विवाद और बढ़ा

    जुलाई में आंदोलन उस समय और बड़ा मुद्दा बन गया जब प्रशासन और पुलिस ने protest site खाली कराया।

    19 जुलाई को प्रदर्शनकारियों को आंदोलन स्थल से हटाया गया। इसके बाद protesters की तरफ से police action पर सवाल उठाए गए।

    राहुल गांधी ने भी इस कार्रवाई की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण protest को दबाया गया।

    हालांकि police और administration का पक्ष अलग है, इसलिए इस मामले में दोनों पक्षों के दावों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

    राहुल गांधी पहले भी उठा चुके हैं मुद्दा

    राहुल गांधी का यह इस मुद्दे पर पहला intervention नहीं है।

    7 अगस्त को Lok Sabha में भी Ken-Betwa project से जुड़े tribal displacement और rehabilitation का मुद्दा उठाया गया था।

    केंद्र के Tribal Affairs Ministry ने बताया कि इस विषय से जुड़ी complaints और representations मिली हैं और उन्हें मध्य प्रदेश सरकार को action और response के लिए भेजा गया है।

    इसके बाद 13 अगस्त को राहुल गांधी ने प्रभावित परिवारों के delegation से मुलाकात की।

    और अब 19 अगस्त को एक बार फिर उन्होंने सार्वजनिक तौर पर इस संघर्ष को समर्थन दिया है।

    इससे साफ है कि Ken-Betwa का tribal displacement issue अब local protest से निकलकर national political debate का हिस्सा बन चुका है।

    सिर्फ जमीन नहीं, जंगल और पर्यावरण का भी सवाल

    केन-बेतवा project का दूसरा बड़ा विवाद environmental impact को लेकर है।

    Project के लिए forest land diversion और Panna Tiger Reserve के आसपास के ecological impact को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।

    पर्यावरण को लेकर concerns में forest habitat, wildlife movement और river ecosystem शामिल हैं।

    दूसरी तरफ project को जरूरी environmental और forest clearances मिल चुकी हैं और सरकार mitigation measures तथा project benefits पर जोर देती रही है।

    इसलिए सवाल यह नहीं है कि सिर्फ “project सही है या गलत?”

    सवाल यह है—

    “बुंदेलखंड को पानी देने वाली इस project के साथ जंगल और wildlife पर पड़ने वाले असर को कितना कम किया जा सकता है?”

    बुंदेलखंड को project से क्या फायदा मिलेगा?

    सरकार का तर्क है कि बुंदेलखंड लंबे समय से पानी की कमी से जूझता रहा है।

    Ken-Betwa project से:

    • irrigation coverage बढ़ेगा
    • किसानों को पानी मिलेगा
    • drinking water supply बेहतर होगी
    • water-stressed गांवों को फायदा मिलेगा
    • hydropower और दूसरे energy benefits मिलेंगे

    सरकार इसे बुंदेलखंड की water security से जोड़कर देख रही है।

    लेकिन प्रभावित परिवारों के लिए सवाल है—

    “अगर बुंदेलखंड को पानी मिलेगा, तो जिस जमीन पर हम रहते हैं, वहां रहने वाले लोगों का भविष्य भी सुरक्षित होगा या नहीं?”

    मुआवजा मिलना और जिंदगी दोबारा बसना एक बात नहीं

    यही इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी मानवीय तस्वीर है।

    एक किसान के लिए जमीन सिर्फ जमीन नहीं होती।

    उसी जमीन से:

    खेती → income → पशुपालन → घर → परिवार का future

    जुड़ा होता है।

    आदिवासी परिवारों के लिए जंगल और आसपास के natural resources भी रोजमर्रा की livelihood का हिस्सा हो सकते हैं।

    ऐसे में compensation मिलने के बाद भी असली सवाल रहता है—

    नया घर कहां होगा? खेती कैसे होगी? रोजगार कहां मिलेगा? बच्चों की पढ़ाई कैसे चलेगी? पानी और healthcare की सुविधा कैसी होगी?

    यही वजह है कि rehabilitation को सिर्फ bank account में पहुंची रकम से नहीं, बल्कि विस्थापित परिवार की नई जिंदगी कितनी स्थिर हुई, इससे भी देखा जाता है।

    देश में अकेला नहीं है Ken-Betwa विवाद

    भारत के अलग-अलग हिस्सों में बड़े dams, mining और infrastructure projects को लेकर tribal displacement और rehabilitation के सवाल उठते रहे हैं।

    राजस्थान के Mahi Bajaj Sagar से जुड़े मामलों में भी displaced families के rehabilitation और दोबारा विस्थापन की चिंता सामने आई है।

    छत्तीसगढ़ के Hasdeo क्षेत्र में mining, forest rights और tribal communities के अधिकारों को लेकर विरोध जारी रहा है।

    इन सभी मामलों में एक common सवाल सामने आता है—

    क्या development project की planning जितनी मजबूत होती है, उतनी ही मजबूत प्रभावित लोगों को बसाने की planning भी होती है?

    अब आगे क्या होगा?

    अब केन-बेतवा विवाद में सबसे ज्यादा नजर 14 गांवों के fresh survey पर रहेगी।

    देखना होगा कि दोबारा verification में कितने नए eligible families या assets सामने आते हैं और compensation तथा rehabilitation से जुड़े pending मामलों का क्या होता है।

    दूसरी तरफ आदिवासी संगठनों की मांगें और तेज होती हैं या सरकार के साथ बातचीत का रास्ता निकलता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।

    राहुल गांधी के समर्थन से इस आंदोलन को political momentum मिला है, जबकि केंद्र ने अपने ताजा आंकड़ों के जरिए compensation process पर अपना पक्ष सामने रखा है।

    लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल अभी भी वही है—

    “93% से ज्यादा मुआवजा दिया जा चुका है, फिर भी आदिवासी सड़क पर क्यों हैं?”

    इस सवाल का जवाब सिर्फ compensation के आंकड़े में नहीं, बल्कि जमीन, rehabilitation, livelihood, जंगल और प्रभावित परिवारों की वास्तविक जिंदगी में छिपा है।