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मुंबई महापौर रितू तावडे के सोशल मीडिया प्रबंधन पर 25 लाख रुपये के प्रस्ताव से विवाद बढ़ा। किशोरी पेडणेकर ने सवाल उठाए, अब स्थायी समिति ने प्रस्ताव खारिज कर दिया।
मुंबई:मुंबई महानगरपालिका में महापौर रितू तावडे के कार्यालय के सोशल मीडिया प्रबंधन को लेकर शुरू हुआ 25 लाख रुपये से ज्यादा का विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। जिस प्रस्ताव को लेकर विपक्ष ने मनपा के पैसों के इस्तेमाल पर सवाल उठाए थे, उसे स्थायी समिति ने अब आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया है।
मामला सिर्फ 25 लाख रुपये का नहीं था। सवाल यह भी उठा कि जब मनपा के पास पहले से जनसंपर्क विभाग और सोशल मीडिया व्यवस्था मौजूद है, तो महापौर कार्यालय के लिए अलग से इतनी बड़ी रकम की जरूरत क्यों पड़ी?
क्या था पूरा मामला?
मनपा में महापौर कार्यालय के सोशल मीडिया प्रबंधन से जुड़ा 25 लाख 12 हजार 786 रुपये का प्रस्ताव सामने आया था। यह रकम 1 अगस्त 2026 से 31 जुलाई 2027 तक एक साल की अवधि के लिए बताई गई थी।
प्रस्ताव में महापौर कार्यालय की बैठकों, दौरे, निरीक्षण और दूसरे आधिकारिक कार्यक्रमों की जानकारी सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंचाने के लिए व्यवस्था की बात थी।
मामले ने तब राजनीतिक रंग पकड़ लिया, जब यह सवाल उठने लगा कि क्या मुंबईकरों से मिलने वाले टैक्स का पैसा महापौर की सोशल मीडिया मौजूदगी और प्रचार पर खर्च किया जा रहा है।
किशोरी पेडणेकर ने उठाए सवाल
मुंबई मनपा में विपक्ष की नेता किशोरी पेडणेकर ने इस मुद्दे पर महापौर और सत्ताधारी भाजपा पर तीखा हमला बोला।
पेडणेकर का कहना था कि मुंबईकर टैक्स इसलिए नहीं देते कि उनकी मेहनत की कमाई सोशल मीडिया प्रचार पर खर्च हो। उनके मुताबिक शहर में सड़कें, गड्ढे, कचरा, नालियों और नालों की सफाई, ट्रैफिक और दूसरी बुनियादी नागरिक सुविधाओं से जुड़े सवाल अब भी मौजूद हैं।
ऐसे में सोशल मीडिया प्रबंधन पर लाखों रुपये खर्च करने की जरूरत पर उन्होंने सवाल खड़ा किया।
विपक्ष की आपत्ति का सीधा सवाल यही था—जब मनपा के पास पहले से जनसंपर्क और सोशल मीडिया का ढांचा है, तो महापौर कार्यालय के लिए अलग खर्च क्यों?
लेकिन महापौर रितू तावडे का पक्ष क्या है?
विवाद बढ़ने के बाद महापौर रितू तावडे ने सफाई दी कि इस पूरे मामले में उनकी तरफ से किसी एजेंसी को चुनने या ठेका देने में कोई दखल नहीं है।
उनके मुताबिक, मनपा में सोशल मीडिया से जुड़ी एजेंसी पहले से काम कर रही है और पिछले करीब दो वर्षों से मनपा के सोशल मीडिया काम को संभाल रही है। महापौर ने यह भी कहा कि उनके कार्यालय से संबंधित तकनीकी जरूरतों के लिए कुछ कर्मचारियों की व्यवस्था की बात कही गई थी, जिसे लेकर उन्होंने पत्र दिया था।
महापौर ने यह आरोप भी लगाया कि उनके नाम को इस मामले में राजनीतिक विवाद खड़ा करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
25 लाख का मतलब महापौर की निजी प्रसिद्धि के लिए अलग एजेंसी नहीं?
मनपा और महापौर कार्यालय की सफाई के मुताबिक, 25 लाख रुपये किसी नई अलग एजेंसी को सिर्फ महापौर की निजी प्रसिद्धि के लिए देने का मामला नहीं था। मनपा के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म संभालने वाली Runtime Solutions Private Limited को ही एक साल के लिए काम जारी रखने का प्रस्ताव था और उसी व्यवस्था के तहत महापौर कार्यालय के सोशल मीडिया काम को भी संभाला जाना था।
यानी विपक्ष ने जिस खर्च को महापौर की सोशल मीडिया प्रसिद्धि से जोड़कर सवाल उठाया, मनपा का पक्ष यह है कि यह मनपा की मौजूदा सोशल मीडिया व्यवस्था से जुड़ा खर्च था, न कि महापौर के लिए अलग नई प्रचार एजेंसी की नियुक्ति।
फिर विवाद इतना बढ़ा क्यों?
विवाद इसलिए बड़ा क्योंकि प्रस्ताव में महापौर कार्यालय के सोशल मीडिया प्रबंधन के लिए 25 लाख 12 हजार 786 रुपये की रकम साफ तौर पर सामने आई।
रिपोर्टों के मुताबिक यह खर्च करीब 2.09 लाख रुपये प्रति महीने और लगभग 6,900 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से बैठता था। प्रस्ताव में महापौर के आधिकारिक कार्यक्रमों, बैठकों, निरीक्षण दौरों और सार्वजनिक गतिविधियों की जानकारी सोशल मीडिया पर पहुंचाने की बात थी।
इसके बाद विपक्ष ने सवाल किया कि मनपा के पास पहले से जनसंपर्क विभाग और केंद्रीय सोशल मीडिया व्यवस्था होने के बावजूद इस तरह का अतिरिक्त खर्च जरूरी क्यों है।
अब आया सबसे बड़ा मोड़
इस पूरे विवाद का फिलहाल सबसे अहम अपडेट यह है कि स्थायी समिति ने 25 लाख रुपये वाले इस प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ाया।
21 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक स्थायी समिति की बैठक में प्रस्ताव को ‘नॉट टेकन’ घोषित कर दिया गया। यानी जिस प्रस्ताव को लेकर पिछले दिनों सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हुए थे, वह फिलहाल मंजूरी की दिशा में आगे नहीं गया।
बताया गया कि विवाद बढ़ने के बाद महापौर ने भी अपनी स्थिति साफ करते हुए कहा था कि स्थायी समिति के सामने आने वाले प्रस्ताव उनकी व्यक्तिगत अनुमति से नहीं आते और अगर उन्हें पहले से इसकी जानकारी होती तो वह इस प्रस्ताव को रोकने की कोशिश करतीं।
इस विवाद ने मनपा के खर्च को लेकर एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है।
मुंबई जैसे शहर में जहां सड़क, गड्ढे, सफाई, नाले, ट्रैफिक और दूसरी नागरिक सुविधाएं लगातार लोगों की रोजमर्रा की परेशानी बनी रहती हैं, वहां सोशल मीडिया और प्रचार से जुड़े खर्च की जरूरत और उसका फायदा जनता को कितना मिलेगा—इसका हिसाब साफ होना जरूरी है।
दूसरी तरफ मनपा का कहना है कि यह कोई नई अलग प्रचार एजेंसी नियुक्त करने का मामला नहीं था, बल्कि पहले से चल रही मनपा की सोशल मीडिया व्यवस्था से जुड़ा काम था।
फिलहाल 25 लाख 12 हजार 786 रुपये का विवादित प्रस्ताव स्थायी समिति में आगे नहीं बढ़ा है। लेकिन इस पूरे मामले ने एक सवाल जरूर छोड़ दिया है—मुंबईकरों के टैक्स से होने वाले हर खर्च की प्राथमिकता आखिर तय कैसे होनी चाहिए?
एक नजर में
मामला
जानकारी
विवाद
महापौर कार्यालय के सोशल मीडिया प्रबंधन का खर्च
प्रस्तावित रकम
25 लाख 12 हजार 786 रुपये
अवधि
1 अगस्त 2026 से 31 जुलाई 2027
एजेंसी
Runtime Solutions Private Limited
मुख्य आपत्ति
मनपा के मौजूदा सोशल मीडिया और जनसंपर्क ढांचे के बावजूद खर्च
विपक्ष का रुख
मुंबईकरों के टैक्स के पैसे के इस्तेमाल पर सवाल
महापौर का पक्ष
अलग नई प्रचार एजेंसी नहीं, प्रक्रिया में उनका हस्तक्षेप नहीं
मुंबई में प्याज 59% महंगा, लासलगांव में भाव ₹4,251 क्विंटल पार। जानिए ₹35 वाला प्याज कहां मिलेगा, कांदा एक्सप्रेस से मुंबई को कब राहत मिलेगी और आगे क्या होगा।
मुंबई: रसोई में प्याज एक बार फिर जेब पर भारी पड़ने लगा है। देश में प्याज का औसत खुदरा भाव एक साल में करीब 59 प्रतिशत बढ़कर ₹43.53 किलो पहुंच गया है। एक साल पहले यही भाव ₹27.37 किलो था। थोक भाव भी ₹21.23 से बढ़कर ₹35.58 किलो हो चुका है।
लेकिन मुंबई के ग्राहक के लिए असली सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि देश में प्याज कितना महंगा हुआ। बड़ा सवाल यह है कि जब देश में प्याज का कुल उत्पादन पिछले साल के लगभग बराबर रहने का अनुमान है, तब नासिक के लासलगांव में भाव ₹4,251 क्विंटल के पार कैसे पहुंच गया? और सरकार की ‘कांदा एक्सप्रेस’ से मुंबई को कब राहत मिलेगी?
लासलगांव में प्याज के भाव ने पकड़ी तेज रफ्तार
25 अगस्त को नासिक के लासलगांव थोक बाजार में प्याज का औसत भाव करीब ₹4,251 प्रति क्विंटल यानी लगभग ₹42.51 किलो पहुंच गया। अच्छी गुणवत्ता वाला प्याज करीब ₹50 किलो तक बताया गया है। इसी दौरान पिंपलगांव एपीएमसी में औसत भाव करीब ₹4,400 प्रति क्विंटल रहा।
सबसे ज्यादा चिंता वाली बात सिर्फ भाव नहीं, बल्कि मंडी में पहुंचने वाले प्याज की मात्रा है। लासलगांव में रोजाना की आवक पिछले कुछ हफ्तों में करीब 15,000 क्विंटल से घटकर लगभग 9,000 क्विंटल रह गई। 25 अगस्त को करीब 10,220 क्विंटल की आवक दर्ज हुई।
यानी बाजार में सालाना उत्पादन की बात अलग है, लेकिन इस समय मंडी में रोज कितना प्याज पहुंच रहा है, यह कीमत तय करने में ज्यादा अहम हो गया है।
पैदावार लगभग उतनी ही, फिर प्याज महंगा क्यों?
यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है।
केंद्र सरकार के दूसरे अग्रिम अनुमान के मुताबिक 2025-26 में प्याज का उत्पादन करीब 307.37 लाख टन रहने का अनुमान है। 2024-25 में यह 307.67 लाख टन था। यानी कुल सालाना उत्पादन में बहुत बड़ा अंतर नहीं है। सरकार ने जुलाई में भी कहा था कि देश में प्याज की उपलब्धता को लेकर तत्काल कोई बड़ी कमी नहीं है।
फिर कीमत इतनी तेजी से क्यों बढ़ी?
क्योंकि पूरे साल में पैदा होने वाला प्याज और किसी खास समय मंडी में उपलब्ध प्याज एक ही बात नहीं है।
इस समय लासलगांव में मुख्य रूप से मार्च-अप्रैल में निकाली गई गर्मी की फसल आ रही है। किसानों ने इस फसल को स्टोर करके रखा था। इसकी सामान्य भंडारण अवधि करीब पांच से छह महीने होती है। अब नई खरीफ फसल की बड़ी आवक अक्टूबर के मध्य से पहले शुरू होने की उम्मीद नहीं है।
यानी अगस्त से अक्टूबर के बीच बाजार को पुराने स्टॉक की आवक पर काफी निर्भर रहना पड़ रहा है। अगर किसान कम प्याज मंडी में लाता है और नई फसल की आवक देर से होती है, तो कुल सालाना उत्पादन पर्याप्त होने के बावजूद तत्काल उपलब्धता कम पड़ सकती है।
बारिश, खरीफ फसल और कम आवक ने बढ़ाया दबाव
लासलगांव एपीएमसी से जुड़ी जानकारी के मुताबिक बारिश और खेतों में खरीफ फसल से जुड़े काम के कारण कई किसान फिलहाल अपना स्टॉक मंडी में नहीं ला रहे हैं। जिन किसानों को तत्काल पैसों की जरूरत है, उनकी तरफ से ज्यादा आवक हो रही है।
अगस्त के मध्य में भी व्यापारियों ने दक्षिण भारत से आने वाली खरीफ प्याज की फसल में देरी को कीमत बढ़ने की एक वजह बताया था। देर से बुआई के कारण नई फसल की आवक आगे खिसकने की आशंका ने बाजार में तेजी को बढ़ाया।
इसलिए मौजूदा तेजी को सिर्फ ‘प्याज कम पैदा हुआ’ कहकर समझना सही नहीं होगा। इसमें मौसम, फसल चक्र, मंडी आवक, भंडारण, मांग और आपूर्ति की टाइमिंग सभी का असर है।
मुंबई में ग्राहक को कितना प्याज मिल रहा है?
यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा। देश का ₹43.53 किलो औसत खुदरा भाव मुंबई का भाव नहीं है।
मुंबई क्षेत्र के उपलब्ध मंडी आंकड़ों में अगस्त के दौरान प्याज के थोक भाव अलग-अलग श्रेणियों में करीब ₹28 से ₹38 किलो के बीच रहे, जबकि शहर की खुदरा जानकारी में मुंबई में प्याज करीब ₹52–58 किलो तक पहुंचने की बात सामने आई। अलग-अलग गुणवत्ता, तारीख और इलाके के कारण दुकानों पर भाव इससे अलग भी हो सकता है।
यानी लासलगांव से निकलने के बाद प्याज की कीमत मुंबई तक आते-आते सिर्फ खरीद भाव से तय नहीं होती। परिवहन, लोडिंग-अनलोडिंग, छंटाई, पैकिंग, खराबा, मंडी खर्च और खुदरा कारोबार की लागत भी जुड़ती है।
आरबीआई के एक अध्ययन में प्याज की मूल्य श्रृंखला का आकलन करते हुए पाया गया था कि उपभोक्ता द्वारा खर्च किए गए हर ₹1 में किसान की औसत हिस्सेदारी करीब 36 पैसे थी। यह पुराना औसत अध्ययन है और इसे आज के मुंबई भाव पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन इससे यह जरूर समझ आता है कि दुकान पर ग्राहक जो पूरा पैसा देता है, वह सीधे किसान तक नहीं पहुंचता।
बढ़ती कीमतों के बीच केंद्र ने नासिक से बड़े उपभोग केंद्रों तक बफर स्टॉक का प्याज रेल के जरिए भेजना शुरू किया है। इसे ‘कांदा एक्सप्रेस’ नाम दिया गया है।
केंद्रीय उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे के मुताबिक शुरुआती तौर पर चेन्नई, मदुरै, दिल्ली, एर्नाकुलम और गुवाहाटी को प्याज भेजा जा रहा है। इन खेपों के 26 अगस्त तक संबंधित केंद्रों पर पहुंचने की उम्मीद है। बाजार की जरूरत के हिसाब से आगे दूसरे शहरों को भी जोड़ा जा सकता है।
यहां मुंबई के लोगों के लिए सबसे जरूरी बात सामने आती है।
मुंबई अभी शुरुआती पांच केंद्रों में नहीं
25 अगस्त तक उपलब्ध जानकारी के मुताबिक मुंबई को ‘कांदा एक्सप्रेस’ के शुरुआती पांच केंद्रों में शामिल नहीं किया गया है।
इसलिए अभी यह कहना सही नहीं होगा कि मुंबई में सरकारी ₹35 किलो वाला प्याज दुकानों पर मिलना शुरू हो गया है।
अगर मुंबई में कीमतों का दबाव बना रहता है तो आगे शहर को इस व्यवस्था में शामिल किया जा सकता है, लेकिन फिलहाल ऐसी घोषणा नहीं हुई है।
₹35 किलो वाला प्याज आखिर कहां मिलेगा?
सरकार चुनिंदा उपभोग केंद्रों में बफर स्टॉक का प्याज करीब ₹35 किलो की दर से उपलब्ध कराने की तैयारी कर रही है। इसकी बिक्री एनसीसीएफ और नेफेड के जरिए की जानी है।
लेकिन ₹35 किलो को पूरे देश का नया खुदरा भाव समझना गलत होगा।
यह सरकारी बफर स्टॉक से होने वाली नियंत्रित बिक्री है, जिसका मकसद उन बाजारों में अतिरिक्त प्याज पहुंचाना है जहां कीमतों पर ज्यादा दबाव है।
इसलिए मुंबई के ग्राहक के लिए फिलहाल सवाल यह नहीं है कि ‘₹35 का प्याज पूरे मुंबई में कब मिलेगा’, बल्कि यह है कि सरकार मुंबई को अपने अगले वितरण केंद्रों में कब शामिल करती है।
सरकार के पास कितना प्याज है?
केंद्र के मुताबिक इस साल करीब 1.21 लाख टन प्याज का बफर स्टॉक उपलब्ध है। सरकार का कहना है कि घरेलू जरूरत के लिए कुल उपलब्धता पर्याप्त है और जरूरत पड़ने पर बफर स्टॉक को चरणबद्ध तरीके से बाजार में उतारा जाएगा।
इसका मतलब यह नहीं है कि बाजार में प्याज की कोई समस्या ही नहीं है। सरकार के पास स्टॉक होना और हर शहर की मंडी में उसी समय पर्याप्त प्याज पहुंचना दो अलग बातें हैं।
इसी वजह से सरकार बफर स्टॉक को एक साथ पूरे बाजार में छोड़ने के बजाय कीमत और स्थानीय उपलब्धता के हिसाब से अलग-अलग केंद्रों तक भेजने की रणनीति अपना रही है।
2024-25 में करीब 14 रेल रेक के जरिए लगभग 12,000 टन बफर प्याज पांच शहरों तक भेजा गया था।
2025-26 में इसका पैमाना बढ़कर करीब 86 रेक और लगभग 88,000 टन प्याज तक पहुंच गया, जिसे 16 बड़े शहरों तक भेजा गया।
इसका मकसद साफ है—जहां प्याज का स्टॉक ज्यादा है वहां से उसे उन बड़े बाजारों तक जल्दी पहुंचाना जहां कीमत ज्यादा है।
फिर नासिक में दिल्ली से ज्यादा भाव क्यों?
यहीं सरकार की चिंता भी सामने आई है।
केंद्रीय उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे ने कहा है कि नासिक की मंडी में प्याज का भाव दिल्ली से ज्यादा होना सामान्य स्थिति नहीं है। उन्होंने ऐसे हालात में कार्टेलाइजेशन और सट्टेबाजी की भूमिका की आशंका भी जताई है।
हालांकि इसे व्यापारियों पर साबित आरोप के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यह सरकार की ओर से जताई गई आशंका है।
दूसरी तरफ मंडी से जुड़ी जानकारी में कम आवक और मजबूत मांग को कीमत बढ़ने की बड़ी वजह बताया गया है। इसलिए बाजार की मौजूदा तेजी में आपूर्ति की कमी, कम आवक और व्यापारिक गतिविधियों—तीनों पर नजर रखना जरूरी है।
सरकारी खरीद का आंकड़ा भी क्यों अहम है?
केंद्र ने 2026-27 के लिए नेफेड और एनसीसीएफ को कुल 2 लाख टन प्याज खरीदने का लक्ष्य दिया था। दोनों एजेंसियों के लिए एक-एक लाख टन का लक्ष्य रखा गया।
25 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों एजेंसियां मिलकर अब तक करीब 1.15 लाख टन गर्मी की फसल खरीद पाई हैं। इसमें नेफेड की खरीद करीब 56,000 टन और एनसीसीएफ की करीब 59,000 टन बताई गई।
जुलाई के अंत में केंद्र ने खरीद दर बढ़ाकर ₹2,335 प्रति क्विंटल यानी ₹23.35 किलो की थी। लेकिन किसान संगठनों ने इस दर को भी कम बताया। ग्रेड-ए प्याज और 45 से 65 मिलीमीटर आकार की गुणवत्ता शर्तों को लेकर भी किसानों ने आपत्ति जताई थी।
यानी सरकार के सामने एक साथ दो चुनौती हैं—बफर स्टॉक बनाना और किसानों से ऐसी कीमत पर खरीद करना जिससे उन्हें बाजार में राहत मिले।
किसान को महंगे प्याज का कितना फायदा?
यह मान लेना गलत होगा कि मुंबई में प्याज महंगा होने का मतलब किसान भी उसी अनुपात में कमा रहा है।
महाराष्ट्र के प्याज किसान लंबे समय से कम भाव और बढ़ती लागत की शिकायत करते रहे हैं। किसान संगठन के अध्यक्ष भारत दिघोले ने सरकार से कम से कम ₹3,000 प्रति क्विंटल खरीद भाव और पहले कम कीमत पर प्याज बेच चुके किसानों के लिए ₹1,500 प्रति क्विंटल सहायता की मांग की थी।
दिघोले के मुताबिक प्याज की उत्पादन लागत ₹2,000 प्रति क्विंटल से ऊपर पहुंच चुकी है और भंडारण के दौरान करीब 30 प्रतिशत तक नुकसान होने से किसान को बाजार में दिखने वाले ऊंचे भाव का पूरा फायदा नहीं मिलता।
यानी कुछ महीने पहले किसान कम भाव से परेशान था और अब कम मंडी आवक के कारण ग्राहक महंगा प्याज खरीद रहा है।
मई से अगस्त तक पूरी तस्वीर कैसे बदली?
मई-जून में प्याज के भाव गिरने के दौरान किसानों ने लागत के आसपास भी भाव नहीं मिलने की शिकायत की थी। उस समय महाराष्ट्र के किसान संगठनों ने करीब ₹30 किलो का न्यूनतम भाव मांगा था।
महाराष्ट्र सरकार ने भी केंद्र के सामने नेफेड और एनसीसीएफ की खरीद बढ़ाने, किसानों से सीधे खरीद करने और ग्रेडिंग में पारदर्शिता लाने जैसे मुद्दे रखे थे।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उस समय बताया था कि केंद्र ने मशीन आधारित ग्रेडिंग की दिशा में कदम उठाने और प्याज पर निर्यात प्रतिबंध या अतिरिक्त निर्यात शुल्क नहीं लगाने का भरोसा दिया था।
अब अगस्त में तस्वीर पलट गई है। मंडियों में आवक कमजोर हुई, नई खरीफ फसल अभी दूर है और उपभोक्ता बाजार में कीमत बढ़ गई।
यही प्याज बाजार की सबसे बड़ी समस्या है—भाव में तेज उतार-चढ़ाव।
आम परिवार की रसोई पर क्या असर?
प्याज रोजमर्रा के खाने का हिस्सा है, इसलिए इसकी कीमत बढ़ने का असर सीधे किराने के बजट पर पड़ता है। कम आय वाले परिवारों पर इसका असर ज्यादा हो सकता है, क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा खाने-पीने पर खर्च होता है।
जुलाई 2026 में देश की खुदरा महंगाई 4.45 प्रतिशत और खाद्य महंगाई 5.52 प्रतिशत थी। इसी महीने प्याज की सालाना महंगाई दर 22.54 प्रतिशत दर्ज हुई।
अगर प्याज की तेजी लंबे समय तक बनी रहती है तो घरों के अलावा होटल, ढाबे और छोटे खाद्य कारोबार पर भी लागत का दबाव बढ़ सकता है। खासकर उन चीजों में जहां प्याज का इस्तेमाल ज्यादा होता है।
आरबीआई के अध्ययन भी बताते हैं कि प्याज, टमाटर और आलू जैसी रोजमर्रा की सब्जियों की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव खाद्य महंगाई को अस्थिर कर सकता है और इसका असर कम आय वाले परिवारों पर ज्यादा पड़ सकता है।
त्योहारी मौसम से पहले सिर्फ प्याज ही चिंता नहीं बढ़ा रहा है। चीनी के भाव में भी तेजी दर्ज हुई है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 20 जुलाई को चीनी का औसत भाव ₹48.18 किलो था, जो 20 अगस्त को बढ़कर ₹55.70 किलो हो गया।
केंद्र सरकार ने कहा है कि चीनी की मौजूदा तेजी को सिर्फ इथेनॉल के लिए चीनी डायवर्ट किए जाने से जोड़ना सही नहीं है। सरकार के मुताबिक इथेनॉल के लिए डायवर्ट होने वाली चीनी की हिस्सेदारी 2022-23 के करीब 12 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में करीब 9 प्रतिशत हुई है।
सरकार ने चीनी की तेजी के पीछे कम घरेलू उत्पादन, त्योहारों से पहले बढ़ी मांग, मौसम से गन्ने को नुकसान, वैश्विक आपूर्ति में कमी और कुछ क्षेत्रों में सट्टेबाजी व जमाखोरी जैसे कारणों का भी जिक्र किया है।
यानी आने वाले त्योहारों से पहले घर के बजट पर प्याज और चीनी दोनों का दबाव देखने को मिल रहा है।
फिलहाल मुंबई में ₹35 किलो वाला सरकारी प्याज मिलने की कोई घोषित व्यवस्था नहीं है। ‘कांदा एक्सप्रेस’ की शुरुआती सूची में मुंबई शामिल नहीं है। सरकार ने फिलहाल चेन्नई, मदुरै, दिल्ली, एर्नाकुलम और गुवाहाटी को शुरुआती केंद्र बनाया है और जरूरत के मुताबिक आगे दूसरे शहर जोड़ने की बात कही है।
इसलिए मुंबई में प्याज की कीमत नीचे आने का सबसे बड़ा संकेत सिर्फ ‘कांदा एक्सप्रेस’ नहीं होगा। असली नजर नासिक-लासलगांव की आवक, वाशी और मुंबई की मंडियों के भाव, नई खरीफ फसल की एंट्री और केंद्र की अगली आपूर्ति योजना पर रहेगी।
फिलहाल तस्वीर इतनी साफ है कि देश में प्याज की सालाना पैदावार में कोई बड़ी कमी नहीं बताई जा रही, लेकिन अगस्त के इस दौर में मंडियों में उपलब्ध माल की आवक घट गई है और नई खरीफ फसल अभी बाजार से दूर है। इसी बीच कीमत बढ़ी है।
सरकार बफर स्टॉक और ‘कांदा एक्सप्रेस’ के जरिए इस दबाव को कम करने की कोशिश कर रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकारी प्याज मुंबई तक कब पहुंचेगा और लासलगांव की घटती आवक कब दोबारा रफ्तार पकड़ेगी।
मुंबई में मराठी नियम के विरोध में ऑटो चालकों के वर्ग की 3 दिन की हड़ताल शुरू, कांदिवली में सड़क रोकी गई। जानिए नियम, नोटिस, यात्रियों पर असर और आगे क्या होगा।
मुंबई: महाराष्ट्र में ऑटो-रिक्शा, टैक्सी और ऐप बेस्ड कैब चालकों के लिए मराठी भाषा की working knowledge अनिवार्य किए जाने के बाद विवाद अब सड़क तक पहुंच गया है। सोमवार को मुंबई के कांदिवली इलाके में ऑटो चालकों के एक वर्ग ने इसके विरोध में प्रदर्शन किया और तीन दिन की हड़ताल शुरू करने का ऐलान किया।
कांदिवली लिंक रोड पर चालकों ने अपनी गाड़ियां रोककर प्रदर्शन किया, जिससे कुछ समय के लिए ट्रैफिक भी प्रभावित हुआ। इस विरोध के बीच मुंबई और MMR के कई हिस्सों में ऑटो और टैक्सी की availability पर भी असर देखने को मिला। खासकर residential areas से railway stations तक जाने वाले feeder routes पर commuters को परेशानी हुई।
लेकिन इस पूरे विवाद की शुरुआत आज के प्रदर्शन से नहीं हुई। पिछले कुछ दिनों से RTO की Marathi checking और drivers को दिए जा रहे notices के बाद नाराजगी लगातार बढ़ रही थी।
कांदिवली में सड़क पर क्यों उतरे ऑटो चालक?
प्रदर्शन कर रहे गैर-मराठी भाषी चालकों का कहना है कि सरकार का नया नियम उनके लिए परेशानी बढ़ा रहा है। उनका कहना है कि कई चालक उम्रदराज हैं, कम पढ़े-लिखे हैं और सालों से मुंबई में ऑटो चलाकर अपना घर चला रहे हैं। ऐसे में अचानक language test और कार्रवाई का दबाव उनके लिए मुश्किल पैदा कर रहा है।
कांदिवली में प्रदर्शन कर रहे एक चालक ने कहा, “हम 55-60 साल के हैं। हम कभी स्कूल नहीं गए। हम मराठी कैसे बोल सकते हैं? अगर हम पढ़े-लिखे होते, तो ऑफिस में बैठकर काम कर रहे होते।”
चालक का कहना था कि कई लोग टूटी-फूटी मराठी बोलने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उन्हें समय देने के बजाय कार्रवाई का डर दिखाया जा रहा है। प्रदर्शनकारियों ने यह भी सवाल उठाया कि अगर उन पर हजारों रुपये का आर्थिक बोझ आया तो वे उसे कैसे संभालेंगे।
क्या पूरे मुंबई के ऑटो बंद हैं?
यहां एक बात समझना जरूरी है। यह पूरे मुंबई के सभी ऑटो और टैक्सी चालकों की आधिकारिक हड़ताल नहीं बताई गई है। विरोध में चालकों का एक वर्ग शामिल है और कुछ transport representatives ने भी कहा है कि शहरव्यापी union strike call नहीं दिया गया है।
यानी मुंबई में हर जगह ऑटो बंद हैं, ऐसा मानना सही नहीं होगा। हालांकि जहां drivers protest या checking से बचने के लिए routes बदल रहे हैं, वहां availability पर असर पड़ रहा है।
यात्रियों के लिए परेशानी क्यों बढ़ी?
मुंबई में ऑटो और टैक्सी सिर्फ point-to-point travel का साधन नहीं हैं। बड़ी संख्या में लोग residential areas से railway stations तक पहुंचने के लिए इन पर निर्भर रहते हैं।
सोमवार को मुंबई महानगर में ऐसे feeder routes पर ऑटो और टैक्सी की कमी महसूस हुई। सुबह के समय office जाने वाले लोगों और railway station तक पहुंचने वाले commuters को ज्यादा परेशानी हुई। कुछ drivers RTO checking वाले प्रमुख रास्तों से बचने के लिए internal और residential roads की तरफ जाने लगे, जिससे सामान्य यात्रियों के लिए भी availability प्रभावित हुई।
कांदिवली लिंक रोड पर प्रदर्शन के दौरान traffic movement भी प्रभावित हुआ। प्रदर्शन स्थल सड़क पर करीब 20 मिनट तक disruption रहा।
आखिर मराठी का नया नियम है क्या?
महाराष्ट्र सरकार ने commercial passenger transport drivers के लिए working knowledge of Marathi को जरूरी किया है। इसके दायरे में ऑटो-रिक्शा और टैक्सी के साथ app-based commercial cabs भी आते हैं।
RTO अब drivers की रोजमर्रा के passenger communication से जुड़ी मराठी समझ और बोलने की क्षमता check कर रहा है। इसमें destination बताना, fare और travel time समझना, route से जुड़े सवालों का जवाब देना और UPI payment जैसी सामान्य बातचीत शामिल हो सकती है।
महाराष्ट्र मोटर वाहन विभाग की वेबसाइट पर 14 अगस्त 2026 को महाराष्ट्र मोटर वाहन नियमों में किए गए संशोधन की अधिसूचना भी दर्ज है।
मराठी नहीं आई तो क्या कार्रवाई होगी?
यही इस विवाद का सबसे बड़ा हिस्सा है।
RTO की checking में जिस driver को working Marathi knowledge में कमी मिलती है, उसे तुरंत licence छीनने की प्रक्रिया में नहीं डाला जाता। मौजूदा व्यवस्था के मुताबिक पहले show-cause notice दिया जाता है और driver को एक महीने का समय दिया जाता है कि वह जरूरी Marathi knowledge हासिल करे।
इसके बाद भी नियम का पालन नहीं होने पर badge को तीन महीने तक suspend किया जा सकता है। लगातार नियम नहीं मानने पर आगे cancellation जैसी कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है।
इसलिए प्रदर्शन कर रहे चालकों की ओर से बताए जा रहे ₹15,000-20,000 के जुर्माने को सीधे सरकारी तय fine के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। चालकों ने आर्थिक दंड को लेकर अपनी चिंता और संभावित financial burden की बात कही है, जबकि सरकार की बताई गई मौजूदा प्रक्रिया में पहले notice और compliance का समय दिया जा रहा है।
RTO की checking में अब तक क्या हुआ?
20 अगस्त से महाराष्ट्र में RTO की flying squads ने ऑटो और टैक्सी चालकों की practical Marathi checking शुरू की।
पहले दिन पूरे महाराष्ट्र में 8,217 drivers की जांच हुई। इनमें Mumbai region में 3,995 drivers शामिल थे और 604 को notice जारी किया गया। इन drivers को Marathi सीखने के लिए एक महीने का समय दिया गया।
इसके बाद दो दिनों के आंकड़ों में MMR में करीब 7,937 drivers की checking और 1,326 notices की जानकारी सामने आई। यही कार्रवाई अब drivers के विरोध का बड़ा कारण बन रही है।
RTO की checking में drivers से classroom-style लिखित परीक्षा नहीं ली जा रही, बल्कि रोज की passenger बातचीत के आधार पर उनकी functional Marathi देखी जा रही है।
सरकार का कहना क्या है?
सरकार का तर्क है कि public transport में driver और passenger के बीच basic communication होना जरूरी है। इसी वजह से working Marathi knowledge को requirement बनाया गया है।
Transport Minister Pratap Sarnaik ने भी इस policy का बचाव किया है। सरकार की तरफ से यह कहा गया है कि requirement का उद्देश्य drivers से साहित्यिक या कठिन Marathi लिखवाना नहीं, बल्कि passenger से basic बातचीत करने लायक भाषा की जानकारी सुनिश्चित करना है।
नए badges और permits के मामले में Marathi verification को और formal बनाया गया है। 20 अगस्त से नए auto-rickshaw, taxi और aggregator cab 3badges के लिए practical verification process को video-record करने की व्यवस्था भी लागू की गई है।
क्या सरकार ने drivers को Marathi सिखाने की कोशिश नहीं की?
ऐसा नहीं है। सरकार की तरफ से drivers के लिए Marathi communication training programme चलाया गया था।
Transport officials के मुताबिक बड़ी संख्या में auto और taxi drivers ने training पूरी की है। करीब 1.65 लाख drivers के training complete करने की जानकारी सामने आई है।
हालांकि दूसरी तरफ drivers और unions का कहना है कि इतनी बड़ी workforce के लिए training व्यवस्था और समय पर्याप्त नहीं रहा। Mumbai Autorickshaw-Taximens Union ने deadline बढ़ाने की मांग भी उठाई थी।
यहीं से विवाद का दूसरा पहलू सामने आता है। सरकार कह रही है कि drivers को Marathi सीखने का मौका दिया गया, जबकि drivers का सवाल है कि जिन लोगों की उम्र ज्यादा है और जिन्होंने formal education नहीं ली, उनके लिए language requirement को practical तरीके से पूरा करने के लिए पर्याप्त support और समय मिला या नहीं।
RTO की लाइन में खड़े होने से driver की कमाई पर भी असर
Marathi checking के साथ एक और समस्या सामने आई है। RTO office में certificate और verification के लिए लगने वाली लंबी queues के कारण drivers को कई घंटे काम से बाहर रहना पड़ रहा है।
कुछ drivers ने शिकायत की कि RTO के चक्कर में उनकी रोज की कमाई प्रभावित हो रही है। रिपोर्टों में drivers की तरफ से करीब ₹500-700 तक daily earning loss की बात सामने आई है।
यानी विवाद सिर्फ language सीखने तक सीमित नहीं है। एक driver के लिए training, RTO visit, checking और certificate process का मतलब कई बार उस दिन की कमाई का नुकसान भी है।
क्या Ola-Uber और Rapido drivers पर भी नियम लागू है?
हां। यह नियम सिर्फ traditional black-yellow taxi या auto तक सीमित नहीं है। App-based commercial cabs भी इसके दायरे में हैं।
मुंबई एयरपोर्ट पर भी aggregator cab drivers के एक वर्ग ने इससे जुड़े मुद्दों को लेकर protest किया था। वहां drivers ने Marathi requirement के साथ fare regulation और app-based taxi operations से जुड़े दूसरे मुद्दे भी उठाए थे।
इससे साफ है कि language issue के साथ drivers की दूसरी आर्थिक और operational परेशानियां भी जुड़ी हुई हैं।
2017 में Bombay High Court ने Marathi rule पर क्या कहा था?
इस विवाद का एक पुराना legal background भी है।
2017 में Bombay High Court ने उस समय के Maharashtra government’s rule को रद्द कर दिया था जिसमें नए auto-rickshaw permits के लिए Marathi knowledge को condition बनाया गया था। Court के सामने उस समय यह सवाल था कि Motor Vehicles Act और मौजूदा rules के तहत सरकार ऐसी permit condition लगा सकती है या नहीं।
लेकिन 2026 की स्थिति को उसी फैसले के बराबर नहीं माना जा सकता। इस बार Maharashtra government ने motor vehicle rules में amendments के जरिए working Marathi knowledge से जुड़ी व्यवस्था को नए legal framework में शामिल किया है।
इसलिए 2017 का फैसला सामने आने के बावजूद मौजूदा 2026 rule की legal स्थिति अलग आधार पर तय होगी।
क्या driver High Court जा सकते हैं?
विरोध कर रहे drivers और unions की तरफ से legal challenge की संभावना भी सामने आई है। Mumbai Rickshawmen’s Union के प्रतिनिधियों ने कहा है कि drivers High Court का रुख करने पर विचार कर रहे हैं।
उनकी मुख्य आपत्ति language requirement से ज्यादा उसके implementation को लेकर है। उनका कहना है कि पर्याप्त training और समय के बिना compliance का दबाव livelihood पर असर डाल सकता है।
अगर मामला court तक जाता है तो आगे यह सवाल महत्वपूर्ण होगा कि working Marathi knowledge की requirement को किस तरीके से लागू किया जाए और drivers को compliance के लिए कितना practical support दिया जाए।
Pune में भी दिख रहा है असर
मामला सिर्फ मुंबई तक सीमित नहीं है। पुणे में भी Marathi requirement को लेकर कुछ auto drivers में चिंता और विरोध सामने आया है।
वहां passengers के साथ trip refusal जैसी पुरानी शिकायतें भी जारी हैं। यानी सरकार की कोशिश जहां language communication बेहतर करने की है, वहीं ground पर passenger service से जुड़े दूसरे सवाल अभी भी बने हुए हैं।
मुंबई में language और livelihood का सवाल एक साथ जुड़ गया है।
एक तरफ local language जानने से passenger और driver के बीच communication आसान हो सकता है। Destination, fare, route, emergency situation या किसी समस्या के समय basic Marathi समझना passenger के लिए मददगार हो सकता है।
दूसरी तरफ बड़ी संख्या में drivers ऐसे हैं जिनकी रोज की कमाई उनके driving work पर निर्भर है। अगर language compliance की प्रक्रिया में उन्हें बार-बार RTO जाना पड़े, route बदलना पड़े या badge suspension का डर बना रहे, तो इसका सीधा असर उनकी income पर पड़ सकता है।
इसका असर commuters पर भी वापस आता है। अगर बड़ी संख्या में drivers सड़क से कम हो जाते हैं तो railway station तक पहुंचने, short-distance travel और peak-hour commute में passengers को ज्यादा इंतजार करना पड़ सकता है।
यही वजह है कि यह मामला सिर्फ Marathi सीखने या नहीं सीखने का सवाल नहीं रह गया है। अब इसके साथ driver की रोजी-रोटी, passenger की सुविधा और public transport की availability भी जुड़ गई है।
अगले तीन दिन मुंबई के लिए क्यों अहम?
ऑटो चालकों के एक वर्ग ने तीन दिन की हड़ताल की बात कही है। ऐसे में आने वाले दिनों में इसका असर किस हद तक बढ़ता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कितने drivers protest में शामिल होते हैं और RTO की checking किस तरह जारी रहती है।
अगर ज्यादा drivers routes से दूर रहते हैं तो railway stations के feeder routes, residential pockets और peak office hours में auto availability प्रभावित हो सकती है।
दूसरी तरफ अगर सरकार और driver representatives के बीच कोई बातचीत या राहत की व्यवस्था सामने आती है तो स्थिति बदल सकती है।
फिलहाल कांदिवली का विरोध यह संकेत दे रहा है कि Marathi language rule को लेकर drivers की नाराजगी खत्म नहीं हुई है। RTO की checking, notices, training का सवाल, रोज की कमाई और proposed legal challenge अब इस पूरे विवाद के अगले चरण को तय करेंगे।
गोरेगांव वेस्ट में Shree Modern Dairy के दूध को गर्म करने पर रबर जैसी सख्त चीज बनने की शिकायत हुई है। FDA से सैंपल टेस्ट की मांग की गई है। पूरी खबर जानें।
मुंबई: गोरेगांव वेस्ट के S.V. Road स्थित Shree Modern Dairy से खरीदे गए दूध को लेकर एक consumer ने गंभीर शिकायत की है। शिकायतकर्ता के मुताबिक, यह दूध Shop No. 2, 7/2, Geet Govind Building, Jawahar Nagar, Opposite Cinemax Theatre, Swami Vivekanand Road, Goregaon West, Mumbai-400104 स्थित डेयरी से खरीदा गया था। घर लाकर दूध गर्म करने के बाद उसमें कुछ हिस्सा रबर जैसी सख्त स्थिति में बदलने का दावा किया गया है। मामले की शिकायत Food and Drug Administration (FDA) और मुंबई महानगरपालिका के P/South विभाग के Medical Officer of Health (MOH) के पास करने की बात कही गई है।
शिकायतकर्ता के मुताबिक, दूध खरीदने के बाद उसे घर लाकर सामान्य तरीके से गर्म किया गया था। गर्म करने के दौरान दूध में असामान्य बदलाव दिखाई दिया और उसके कुछ घटक रबर जैसी कठोर स्थिति में आ गए। इसके बाद इस मामले की जानकारी Shree Modern Dairy को दी गई।
इसके बाद डेयरी का एक कर्मचारी शिकायतकर्ता के घर पहुंचा और वहां खराब हुए दूध को प्रत्यक्ष देखा। शिकायतकर्ता का कहना है कि इस पूरी मुलाकात का video उसके पास सुरक्षित है। इसके अलावा दूध की photographs, packet और बचा हुआ milk sample भी सुरक्षित रखा गया है।
यही वजह है कि अब मामला सिर्फ consumer complaint तक सीमित नहीं है। शिकायतकर्ता चाहता है कि मौजूद sample को official तरीके से जांच के लिए लिया जाए और laboratory report के जरिए पता लगाया जाए कि आखिर दूध में ऐसा बदलाव क्यों आया।
असली सवाल: दूध में ऐसा बदलाव आखिर क्यों हुआ?
दूध गर्म करने के बाद रबर जैसी सख्त चीज दिखाई देने का मतलब अपने-आप यह साबित नहीं करता कि उसमें रबर या plastic मिलाया गया था। बिना laboratory testing के किसी मिलावट या chemical की मौजूदगी का दावा करना जल्दबाजी होगी।
दूध की quality पर असर storage, temperature control, contamination, microbial activity, processing या दूसरे कारणों से भी पड़ सकता है। इस मामले में सही कारण तभी सामने आएगा जब sample की scientific जांच होगी।
इसीलिए complaint में FDA से दूध का sample लेकर उसकी quality और safety की जांच करने की मांग की गई है।
इस मामले में सबसे अहम चीज milk sample है। अगर sample official जांच के लिए लिया जाता है तो उसकी laboratory examination से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि दूध applicable food-safety standards के मुताबिक था या नहीं।
जांच के दौरान दूध की composition, microbiological safety, possible adulteration और दूसरे applicable safety parameters जैसे पहलुओं को देखा जा सकता है। इसके साथ storage और handling conditions की भी जांच महत्वपूर्ण हो सकती है।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि दूध गर्म करने के बाद कैसा दिखा, बल्कि यह भी पता करना जरूरी है कि वह consumer तक पहुंचने से पहले किस तरह store और handle हुआ था।
दूध दुकान से घर तक कैसे पहुंचा, यह भी अहम सवाल
Milk quality की जांच में उसकी पूरी journey महत्वपूर्ण हो सकती है। दूध खरीदते समय वह chilled था या नहीं, घर पहुंचने में कितना समय लगा, खरीदने के बाद उसे किस temperature पर रखा गया और कितनी देर बाद boil किया गया—ये details investigation में मदद कर सकती हैं।
प्राप्त वीडियो से मिली जानकारी के मुताबिक दूध dairy की तरफ से अलग प्लास्टिक की pouch में भरकर दिया गया था तो source, filling और packaging process की भी जांच की जरूरत हो सकती है।
शिकायतकर्ता ने एक और point उठाया है। उसका कहना है कि dairy की मशीन पर “प्लास्टिक पिशवी मागू नका” लिखा हुआ है, जबकि दूध plastic bags में दिया जा रहा है।
हालांकि सिर्फ plastic pouch में दूध मिलना अपने-आप में illegal होने का सबूत नहीं है। Milk packaging के लिए food-grade plastic pouches का इस्तेमाल कई परिस्थितियों में किया जाता है।
इसलिए यहां असली सवाल यह है कि इस्तेमाल की जा रही pouch food-grade है या नहीं और क्या वह लागू packaging तथा plastic-waste rules के मुताबिक है।
मशीन पर लिखे message और इस्तेमाल हो रही milk pouch के बीच क्या संबंध है, यह भी मौके की जांच के बाद ही साफ हो सकता है।
Goregaon में पहले भी सामने आ चुका है milk safety का बड़ा मामला
इस complaint के बीच Goregaon West में सामने आया हालिया milk-tampering case भी लोगों का ध्यान खींच रहा है। 15 जुलाई 2026 को Mumbai Crime Branch Unit 11 और FDA की joint कार्रवाई में branded milk pouches के साथ कथित छेड़छाड़ का मामला सामने आया था।
उस कार्रवाई में 558 litres दूध और 822 milk pouches जब्त कर नष्ट किए गए थे। पुलिस के मुताबिक आरोपियों ने original milk pouches को खोलकर उसमें contaminated water मिलाया और उन्हें दोबारा seal करके बेचने का कथित तरीका अपनाया था।
इस मामले में Krishna Venkayya Lingampally और Ravi Kanahya Patipaka को गिरफ्तार किया गया था। कार्रवाई Mumbai Police Commissioner Deven Bharti और Joint Commissioner of Police (Crime) Anil Kumbhare की supervision में हुई थी, जबकि Assistant Police Inspector Bansode ने आगे की जांच संभाली थी।
यह पुराना मामला और Shree Modern Dairy से जुड़ी मौजूदा consumer complaint अलग-अलग घटनाएं हैं। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर दोनों के बीच कोई connection सामने नहीं आया है।
इस शिकायत में consumer के पास क्या evidence है?
शिकायतकर्ता के मुताबिक उसके पास:
खराब हुए दूध का sample
दूध का packet
दूध की photographs
डेयरी कर्मचारी के घर आने का video
डेयरी कर्मचारी द्वारा खराब दूध को प्रत्यक्ष देखने की जानकारी
मौजूद है।
ऐसे evidence की वजह से laboratory testing और official inspection से मामले की स्थिति ज्यादा साफ हो सकती है।
शिकायतकर्ता ने FDA और BMC P/South विभाग से मांग की है कि मामले की तत्काल जांच की जाए।
उसकी प्रमुख मांगों में दूध का sample official custody में लेकर laboratory testing कराना, दूध की quality और safety verify करना, संबंधित dairy premises का inspection करना और अगर कोई food-safety violation सामने आता है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमों के तहत कार्रवाई करना शामिल है।
इसके साथ यह भी देखा जाना जरूरी है कि संबंधित dairy का food business registration/licence, milk handling process, storage व्यवस्था और packaging व्यवस्था applicable rules के मुताबिक है या नहीं।
अगर आपके घर में भी दूध गर्म करने पर ऐसा बदलाव दिखे तो क्या करें?
ऐसी स्थिति में सबसे पहले उस दूध को consume करने से बचना चाहिए। दूध या packet को तुरंत फेंकने के बजाय उसे सुरक्षित रखना ज्यादा useful हो सकता है।
Packet की clear photographs लें और उस पर लिखे batch number, packing date, use-by date, MRP और manufacturer की details record करें। अगर purchase bill या digital payment proof है तो उसे भी संभालकर रखें।
दूध गर्म करने से पहले और बाद में जो बदलाव दिखाई दिया हो, उसका photo या video भी evidence के तौर पर रखा जा सकता है। इसके बाद seller या dairy को complaint करने के साथ food-safety authority के पास शिकायत की जा सकती है।
फिलहाल इस complaint के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि दूध में रबर, plastic या कोई खास chemical मिला हुआ था। शिकायत में दिखाई गई असामान्य स्थिति की पुष्टि laboratory testing से ही हो सकती है।
अगर official sample की जांच होती है तो report यह समझने में अहम होगी कि दूध वास्तव में substandard, unsafe या adulterated था या फिर बदलाव के पीछे कोई दूसरा कारण था।
इसलिए अब पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है—Shree Modern Dairy से खरीदे गए इस दूध के sample की जांच में आखिर क्या सामने आता है?
Indian FastTrack इस मामले में FDA, BMC P/South और Shree Modern Dairy की आधिकारिक प्रतिक्रिया मिलने पर खबर को update करेगा।
मुंबई लोकल यात्रियों के लिए जरूरी अपडेट: दिवा स्टेशन पर FOB काम के चलते 21/22, 22/23 और 23/24 अगस्त की रात कलवा-डोंबिवली रूट पर बदलाव रहेगा। जानें रूट डिटेल!
मुंबई: मुंबई की लोकल से देर रात सफर करने वाले यात्रियों के लिए जरूरी अपडेट है। दिवा स्टेशन पर फुट ओवर ब्रिज यानी FOB के निर्माण कार्य के चलते मध्य रेल ने 21/22, 22/23 और 23/24 अगस्त की रात विशेष ट्रैफिक और पावर ब्लॉक लेने का फैसला किया है। यह ब्लॉक रात 1:20 बजे से सुबह 3:20 बजे तक रहेगा।
इस दौरान कलवा और डोंबिवली के बीच अप और डाउन स्लो लाइन पर लोकल ट्रेन की आवाजाही प्रभावित रहेगी। इसलिए अगर आप रात की आखिरी लोकल या देर रात की यात्रा करने वाले हैं, तो घर से निकलने से पहले अपनी ट्रेन का रूट और ठहराव जरूर चेक कर लें।
इस block का मकसद निर्माण कार्य को सुरक्षित तरीके से पूरा करना है, इसलिए देर रात के उस समय में संबंधित स्लो लाइन पर ट्रेन संचालन को नियंत्रित किया जाएगा।
Kasara और Karjat जाने वाली इन दो लोकल का रूट बदलेगा
ब्लॉक के दौरान CSMT से चलने वाली दो रात की उपनगरीय ट्रेनों पर खास असर पड़ेगा।
CSMT से रात 12:08 बजे कसारा जाने वाली लोकल को ठाणे और कल्याण के बीच डाउन फास्ट लाइन से डायवर्ट किया जाएगा।
इसी तरह CSMT से रात 12:12 बजे कर्जत जाने वाली लोकल को भी ठाणे और कल्याण के बीच डाउन फास्ट लाइन से चलाया जाएगा।
इस बदलाव की वजह से दोनों ट्रेनें ठाकुर्ली और कोपर स्टेशन पर नहीं रुकेंगी।
यानी अगर आपका उतरने का स्टेशन ठाकुर्ली या कोपर है और आप इन दोनों रात की लोकल में सफर करने वाले हैं, तो इस बदलाव को नजरअंदाज न करें।
इन दोनों स्टेशनों पर ट्रेन का halt नहीं होने की वजह से यात्रियों को अपनी यात्रा पहले से plan करनी होगी।
खासकर देर रात ऑफिस, होटल, दुकान, हॉस्पिटल या दूसरे काम से घर लौटने वाले यात्रियों को यह देखना जरूरी है कि जिस लोकल में वे सवार होने वाले हैं, उसमें ठाकुर्ली या कोपर का ठहराव है या नहीं।
सिर्फ “कसारा लोकल” या “कर्जत लोकल” देखकर ट्रेन में न चढ़ें। 21/22, 22/23 और 23/24 अगस्त की रात के इस block के दौरान संबंधित ट्रेन का route बदल रहा है।
क्या कलवा-डोंबिवली की सभी लोकल बंद रहेंगी?
नहीं। इस जानकारी का मतलब यह नहीं है कि तीनों रातों में कलवा और डोंबिवली के बीच चलने वाली हर लोकल पूरी तरह बंद रहेगी।
मुख्य असर रात 1:20 बजे से सुबह 3:20 बजे के block window में अप और डाउन स्लो लाइन पर रहेगा। वहीं CSMT-कसारा और CSMT-कर्जत की ऊपर बताई गई दोनों services को अलग route से चलाया जाएगा।
इसलिए यात्रियों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि वे अपनी specific train का running status और route देखकर ही स्टेशन के लिए निकलें।
सुबह की पहली लोकल को लेकर क्या करें?
ब्लॉक सुबह 3:20 बजे तक निर्धारित है। लेकिन अगर आप सुबह की शुरुआती लोकल पकड़ने वाले हैं, तो स्टेशन पहुंचने से पहले live running status और रेलवे की announcement जरूर check करें।
निर्माण कार्य पूरा होने के बाद traffic normal करने की प्रक्रिया भी जरूरी होती है, इसलिए सिर्फ block खत्म होने का समय देखकर यह मान लेना सही नहीं होगा कि हर ट्रेन बिल्कुल उसी समय अपने normal schedule पर आ जाएगी।
इस विशेष block की उपलब्ध जानकारी में मुख्य बदलाव suburban local services से जुड़ा है। इसलिए अगर आप Mail या Express ट्रेन से सफर करने वाले हैं, तो अपनी specific train का status अलग से check करें।
किसी दूसरी train के timetable को देखकर अपनी यात्रा का फैसला न करें।
देर रात सफर करने वालों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
अगर आपकी यात्रा 1:20 बजे से 3:20 बजे के बीच या उसके आसपास है, तो स्टेशन निकलने से पहले कुछ मिनट निकालकर train status check करना बेहतर रहेगा।
अपनी ट्रेन का destination, route और बीच में आने वाले station जरूर देख लें।
ठाकुर्ली या कोपर जाना है तो खास तौर पर यह confirm करें कि आपकी ट्रेन वहां रुक रही है या नहीं।
अगर रात की यात्रा के लिए कोई alternative transport लेना पड़े, तो official railway information और available public transport को देखकर ही फैसला करें।
अकेले सफर करने वाले यात्रियों, खासकर महिलाओं के लिए देर रात route change होने पर बिना जानकारी के किसी अनजान जगह उतरने से बचना ज्यादा जरूरी है। मुंबई suburban railway से जुड़े gender studies में भी station access, safety और सुविधाओं को women commuters के लिए महत्वपूर्ण travel concerns माना गया है।
यात्रियों को असुविधा क्यों झेलनी पड़ रही है?
देर रात का यह block कुछ यात्रियों के लिए परेशानी वाला जरूर हो सकता है, खासकर उन लोगों के लिए जिनकी shift देर रात खत्म होती है या जिन्हें रात की आखिरी local से घर पहुंचना होता है।
लेकिन यह block दिवा स्टेशन के infrastructure work को सुरक्षित तरीके से पूरा करने के लिए लिया जा रहा है। रात के समय traffic और passenger movement comparatively कम होने की वजह से ऐसे कामों के लिए night block लिया जाता है।
इसलिए अगले तीन रात देर से सफर करने वाले passengers के लिए सबसे जरूरी चीज है कि वे अपनी ट्रेन की जानकारी पहले से check करके निकलें।
दिवा स्टेशन पर काम पूरा होने के बाद क्या फायदा होगा?
FOB जैसे infrastructure work का सीधा मकसद स्टेशन पर passengers की movement को बेहतर बनाना है। रेलवे की मौजूदा station-upgradation policy में wider FOB, बेहतर connectivity, passenger movement और accessibility पर जोर दिया जा रहा है।
दिवा जैसे busy suburban station पर infrastructure का काम पूरा होने के बाद यात्रियों के लिए platform से आने-जाने की सुविधा बेहतर होने की उम्मीद है।
फिलहाल इस काम को पूरा करने के लिए 21/22, 22/23 और 23/24 अगस्त की रात में विशेष block रखा गया है।
निकलने से पहले यह जरूर check करें
रात की यात्रा है तो सबसे पहले अपनी specific local का running status देखें।
अगर आप Kasara या Karjat जाने वाली रात की local पकड़ रहे हैं, तो route diversion ध्यान में रखें।
ठाकुर्ली या कोपर उतरना है तो खास तौर पर train का halt confirm करें।
रात 1:20 से 3:20 बजे के बीच यात्रा है तो block window को ध्यान में रखकर निकलें।
स्टेशन पर पहुंचने के बाद announcement और display board पर latest update जरूर देखें।
मध्य रेल का यह night block तीन रातों के लिए है, लेकिन इसका असर हर यात्री पर एक जैसा नहीं होगा। इसलिए “लोकल बंद है” मानकर परेशान होने के बजाय अपनी specific train, destination और timing check करना सबसे सही तरीका रहेगा।
मुंबई के मालाड वेस्ट स्थित Hotel Radha की किचन में जिंदा चूहे और कॉकरोच मिले। FDA ने फूड लाइसेंस तत्काल सस्पेंड कर खाने की बिक्री, स्टोरेज और सप्लाई भी रोक दी
मुंबई: मालाड वेस्ट स्थित Hotel Radha की किचन में जिंदा चूहे और कॉकरोच मिलने के बाद महाराष्ट्र FDA ने होटल का फूड बिजनेस लाइसेंस तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया है। 18 अगस्त को हुई जांच में किचन की सफाई, ड्रेनेज, स्टोरेज और फूड हैंडलिंग को लेकर कई गंभीर खामियां सामने आईं।
मालाड के Hotel Radha में FDA की अचानक जांच
FDA ने 18 अगस्त को मालाड वेस्ट स्थित Hotel Radha की किचन की जांच की। जांच के दौरान अधिकारियों को किचन में जिंदा चूहे और कॉकरोच मिले। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ चूहे छत के पास दिखाई दिए, जबकि कुछ खुले ड्रेनेज के रास्ते किचन में आते मिले।
किचन के ड्रेनेज खुले और खराब हालत में पाए गए। इससे चूहों और दूसरे कीड़ों के अंदर आने का रास्ता बना हुआ था।
फूड तैयार करने वाले उपकरणों पर कॉकरोच मिले। रिपोर्ट के मुताबिक dough-mixing machine पर भी कॉकरोच दिखाई दिए। काउंटर और बर्तन गंदे थे, जबकि कई बर्तनों पर जंग के निशान मिले।
टोस्टर के ऊपर रखा था खुला Dustbin
जांच के दौरान एक और चौंकाने वाली बात सामने आई। किचन में खुला dustbin रखा हुआ था और उसके ठीक ऊपर toaster रखा था, जहां खाना तैयार किया जा रहा था।
इसके अलावा कुछ food items धूल और गंदगी के बीच रखे मिले। स्टोरेज बॉक्स और कंटेनर भी साफ नहीं थे। इससे food storage और handling को लेकर भी सवाल उठे।
FDA ने Hotel Radha का फूड लाइसेंस क्यों सस्पेंड किया?
इन गंभीर food safety और hygiene violations के बाद FDA ने Food Safety and Standards Act, 2006 के Section 32(3) के तहत Hotel Radha का food business licence तत्काल प्रभाव से suspend कर दिया।
आदेश के तहत 18 अगस्त से होटल में food की manufacturing, storage, sale और distribution से जुड़ी गतिविधियां रोक दी गई हैं। यानी कार्रवाई सिर्फ warning या सफाई के निर्देश तक सीमित नहीं रही, बल्कि होटल के food business पर तत्काल रोक लगाई गई है।
क्या Hotel Radha में अभी खाना मिल सकता है?
FDA के suspension order के मुताबिक food की manufacturing, storage, sale और distribution वाली गतिविधियां रोकने का आदेश दिया गया है।
इसलिए फिलहाल Hotel Radha के food business को लेकर FDA का suspension लागू है। होटल की बाकी सेवाओं पर क्या असर है, यह food licence suspension से अलग विषय है और उपलब्ध FDA कार्रवाई में मुख्य रोक food-related activities पर है।
क्या Hotel Radha का लाइसेंस हमेशा के लिए रद्द हुआ है?
नहीं। यहां suspension और cancellation को अलग समझना जरूरी है।
FDA ने Hotel Radha का food business licence suspend किया है। उपलब्ध कार्रवाई में licence को हमेशा के लिए cancel करने की बात नहीं कही गई है। आगे compliance और FDA की कार्रवाई के बाद स्थिति में बदलाव हो सकता है।
क्या Hotel Radha का खाना खाने से किसी के बीमार होने की पुष्टि हुई?
अभी सामने आई FDA कार्रवाई में किसी ग्राहक के बीमार होने की पुष्टि नहीं की गई है।
जांच में किचन की hygiene, pest control, drainage, storage और food handling से जुड़ी गंभीर कमियां सामने आई हैं। इसलिए इसे food safety risk के तौर पर देखा गया है, लेकिन बिना मेडिकल या laboratory confirmation के यह कहना सही नहीं होगा कि होटल का खाना खाने से किसी व्यक्ति को बीमारी हुई।
Hotel Radha पर हुई कार्रवाई अकेली कार्रवाई नहीं है। महाराष्ट्र FDA ने हाल की statewide inspection drive में 31 hotels, restaurants, roadside eateries और दूसरे food establishments की जांच की।
इस कार्रवाई में 22 establishments को improvement notices दिए गए, जबकि पांच food business licences suspend किए गए। करीब 25 लाख रुपये के banned और दूसरे food products जब्त किए गए। 10 लोगों की गिरफ्तारी, आठ FIR और छह establishments को seal किए जाने की जानकारी भी FDA कार्रवाई के बाद सामने आई है।
इसी अभियान के दौरान Hotel Radha, Malad West का नाम भी उन establishments में शामिल रहा जिनका food business licence suspend किया गया। FDA ने इस अभियान को “Safe Food, Safe Maharashtra” के तहत चलाया है।
FDA की हालिया inspections में सिर्फ kitchen की सफाई ही नहीं, बल्कि food storage, temperature control, waste disposal, pest control और food handling जैसी चीजों को भी देखा जा रहा है।
Hotel Radha के मामले में खुले drains, rodents, cockroaches, गंदे utensils, जमा पानी, grease, खराब storage और खुले dustbin जैसी कई कमियां एक साथ सामने आईं।
मालाड में इससे पहले भी food safety पर कार्रवाई
मालाड वेस्ट में इससे पहले FDA ने Blinkit के एक dark store पर भी food safety violations को लेकर कार्रवाई की थी। 7 अगस्त की inspection के बाद वहां cockroaches, expired food, floor पर रखे food items और storage तथा pest-control से जुड़ी कमियां सामने आने की रिपोर्ट आई थी। उस facility का food licence भी suspend किया गया था।
ऐसे में मालाड में लगातार सामने आ रही food safety कार्रवाई ने restaurants और food-storage facilities की hygiene व्यवस्था पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।
Restaurant में खाना खाने से पहले ग्राहक क्या देखें?
बाहर से restaurant कितना भी साफ और अच्छा दिखे, असली food safety kitchen के अंदर की व्यवस्था पर depend करती है।
ग्राहक restaurant में food licence/FSSAI details देख सकते हैं। अगर किसी जगह पर खुले में रखा खाना, गंदे utensils, cockroaches, rats, खराब storage या दूसरी गंभीर hygiene problem दिखाई देती है तो उसकी शिकायत food safety authorities तक की जा सकती है।
Hotel Radha पर हुई कार्रवाई ने एक बार फिर यही सवाल सामने ला दिया है कि restaurant की table और kitchen के बीच food safety की असली तस्वीर क्या है।
फिलहाल FDA की कार्रवाई के बाद Hotel Radha का food business licence suspend है और food की manufacturing, storage, sale और distribution पर रोक लागू है। आगे होटल की compliance और FDA की अगली कार्रवाई से ही पता चलेगा कि licence कब बहाल होता है।
प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में 41 FIR, 178 ट्रेनिंग सेंटर ब्लैकलिस्ट और 34 लाख भुगतान अटके। CAG की रिपोर्ट में सामने आईं गंभीर अनियमितताएं।
नई दिल्ली:प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना यानी युवाओं को skill training देकर job और self-employment के मौके देने वाली देश की बड़ी सरकारी schemes में से एक अब गंभीर सवालों के घेरे में है। CAG की audit findings से लेकर 2026 में दर्ज हुई 41 FIR, 178 Training Centres की blacklisting और NSDC के करीब 20 current और former employees को भेजे गए show-cause notices तक, इस पूरी scheme को लेकर लगातार कार्रवाई सामने आ रही है।
सबसे बड़ा सवाल उन युवाओं का है जिन्होंने इस scheme के तहत training ली, certificate हासिल किया और payment या job का इंतजार किया। क्या training सही तरीके से हुई? क्या beneficiary का record सही था? Payment क्यों अटका? और certificate मिलने के बाद नौकरी कितनों को मिली?
41 FIR और 178 Training Centres पर कार्रवाई
2026 में सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना से जुड़े मामलों में 167 cases को FIR के लिए identify किया गया और 41 FIR दर्ज की गईं।
वहीं प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना 4.0 के तहत 178 Training Centres को blacklist किया गया। इन centres के खिलाफ आगे की payments रोकने और नियमों के उल्लंघन से जुड़े payments की recovery शुरू करने के निर्देश दिए गए।
हालांकि यहां यह समझना जरूरी है कि FIR दर्ज होना किसी मामले में आरोप या investigation की शुरुआत है, conviction नहीं। इसी तरह 178 blacklisted centres को सीधे 178 “fake centres” कहना भी सही नहीं होगा। Blacklisting scheme guidelines और inspection findings के आधार पर की गई कार्रवाई है।
34 लाख से ज्यादा candidates का payment क्यों अटका?
इस पूरी कहानी का सबसे सीधा असर उन candidates पर पड़ता है जिन्होंने training पूरी की लेकिन उनका payment नहीं पहुंचा।
CAG के मुताबिक प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के दूसरे और तीसरे phase में 34 लाख candidates के DBT payments outstanding थे।
पहले phase में भी करीब ₹40 करोड़ की DBT राशि incorrect या incomplete bank और Aadhaar details की वजह से beneficiaries तक नहीं पहुंच सकी थी।
यानी अगर किसी candidate ने training और certification पूरा किया है, लेकिन उसके खाते में पैसा नहीं आया, तो सिर्फ “payment pending” देखकर मामला खत्म नहीं होता। Bank details, Aadhaar linking और beneficiary record में mismatch भी इसकी वजह हो सकता है।
CAG audit में bank details की जांच के दौरान एक और बड़ी गड़बड़ी सामने आई।
प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के दूसरे और तीसरे phase के data में 12,122 unique bank accounts ऐसे पाए गए जो एक से ज्यादा candidates के लिए इस्तेमाल हुए थे।
इन accounts से कुल 52,381 candidates जुड़े हुए थे।
सबसे चौंकाने वाला मामला एक ऐसे account का था जिसे 2,106 candidates के records में इस्तेमाल किया गया था।
कुछ records में 11111111111, zeros, blank और दूसरे apparently invalid entries भी मिले।
इसका मतलब यह नहीं कि इन सभी candidates को fake घोषित कर दिया गया। लेकिन beneficiary और payment data की verification system पर गंभीर सवाल जरूर खड़े हुए। CAG ने कहा कि उपलब्ध bank-account data से beneficiaries की identity को लेकर पर्याप्त assurance नहीं मिल रही थी।
CAG की जांच में कुछ Training Centres physical inspection के दौरान बंद मिले।
कुछ जगह training records और ground reality के बीच mismatch भी सामने आया। Candidate photographs के repeat होने और attendance तथा identity verification में gaps की findings भी सामने आईं।
यानी सवाल यह भी है कि जिस candidate के नाम पर training और certification का record बना, क्या वह candidate वास्तव में उस training में मौजूद था?
यहां भी हर irregular record को सीधे fake candidate मानना सही नहीं है। Audit findings मुख्य रूप से verification और monitoring system में मौजूद कमजोरियों की तरफ इशारा करती हैं।
“Ghost Candidate” का मतलब क्या है?
अगर किसी व्यक्ति का नाम scheme के record में मौजूद है, लेकिन उसकी identity, attendance, bank details या training participation properly verify नहीं हो पाती, तो मामला questionable या ghost beneficiary verification तक पहुंच सकता है।
CAG ने candidate eligibility को लेकर भी सवाल उठाए।
कुछ records में age, education और दूसरे eligibility criteria की proper checking नहीं होने की बात सामने आई।
यानी scheme में सिर्फ यह देखना काफी नहीं था कि candidate का नाम system में दर्ज है। यह भी जरूरी था कि वह candidate scheme के लिए eligible था और उसकी identity सही तरीके से verify हुई थी।
Certificate मिला, लेकिन नौकरी कितनों को मिली?
प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का असली मकसद सिर्फ training और certificate देना नहीं था। इसका final outcome रोजगार और बेहतर income से जुड़ा था।
लेकिन CAG की audit में पुराने phases के Short Term Training component में certified candidates की placement करीब 41 प्रतिशत के आसपास पाई गई।
सरकार की बाद की reporting में PMKVY 3.0 तक reported placement करीब 43 प्रतिशत बताई गई।
इसका सीधा मतलब है कि training या certificate और actual job एक ही चीज नहीं हैं।
यही वजह है कि किसी भी candidate के लिए सबसे जरूरी सवाल यह होना चाहिए कि course पूरा करने के बाद उसे वास्तव में job या self-employment का फायदा मिला या नहीं।
कुछ बड़े Training Providers में placement 10% से भी कम
CAG की detailed जांच में training providers के performance में काफी बड़ा difference सामने आया।
Top training providers में भी 114 providers ऐसे पाए गए जिनका placement rate 10 प्रतिशत से कम था।
इन providers ने करीब 5.88 लाख candidates को certify किया, लेकिन लगभग 20,000 candidates ही placement तक पहुंच पाए।
इससे साफ होता है कि सिर्फ overall placement percentage देखने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। अलग-अलग Training Providers का actual performance काफी अलग रहा।
Training Providers को इतने बड़े targets कैसे मिले?
CAG ने Training Providers को मिले targets और certifications को भी examine किया।
PMKVY 2.0 में top 10 प्रतिशत Training Providers ने करीब 83 प्रतिशत batches और 85.61 प्रतिशत certifications संभालीं।
PMKVY 3.0 में top 10 प्रतिशत providers ने करीब 82 प्रतिशत batches और 85.31 प्रतिशत certifications संभालीं।
इसके मुकाबले bottom 50 प्रतिशत providers का share काफी कम था।
इससे यह सवाल उठता है कि scheme के बड़े targets कुछ Training Providers के पास इतने concentrated क्यों हुए और उनके performance की monitoring कितनी प्रभावी थी।
प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का Recognition of Prior Learning यानी RPL component उन लोगों की existing skills को certify करने के लिए है जो पहले से किसी trade या काम में skilled हैं।
CAG ने RPL-BICE component में भी कई irregularities दर्ज कीं।
एक मामले में Radiate Designs ने करीब 15,218 candidates को certify किया था। CAG के मुताबिक company 2014-15 के बाद ROC returns file नहीं कर रही थी और ROC records में struck off थी। Audit team को दिए गए address पर एक shop मिली, जहां company का visible signboard नहीं था।
CAG ने इस तरह के records के आधार पर certification process की verification पर सवाल उठाए।
एक दूसरे fitness trainer से जुड़े case में 10,000 candidates की placement और 30,000 employees की capacity का दावा किया गया था, जबकि संबंधित gyms में Ministry के records के अनुसार employees की संख्या काफी कम थी।
Jharkhand में 8,922 certifications में से 7,145 East Singhbhum में और Rajasthan में सभी 5,444 certifications Churu district में concentrated थीं।
Audit ने employee-employer relationship की proper verification के बिना certifications किए जाने पर सवाल उठाए।
CAG की मुख्य audit findings प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के पहले तीन phases से जुड़ी हैं। PMKVY 4.0 बाद में शुरू हुई और इसमें technology-based verification को मजबूत किया गया है।
लेकिन CAG ने PMKVY 4.0 के उपलब्ध data की भी कुछ जांच की।
इसमें:
175 invalid mobile numbers
2,263 repeated mobile numbers
करीब 2.72 लाख null email addresses
करीब 3.08 लाख repeated email addresses
मिले।
इन आंकड़ों का मतलब यह नहीं कि इतने candidates fake थे। लेकिन इससे यह जरूर पता चलता है कि digital system में भी data validation को लगातार मजबूत रखने की जरूरत है।
अब सरकार ने क्या बदला?
PMKVY 4.0 में beneficiary verification और monitoring के लिए कई technology-based controls बढ़ाए गए हैं।
PMKVY 4.0 में AI, drones, robotics, green energy, semiconductor manufacturing और दूसरे new-age sectors से जुड़े courses पर भी ज्यादा focus किया जा रहा है।
जून 2026 तक सरकार के मुताबिक PMKVY 4.0 के तहत 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 738 जिलों में 28.17 लाख candidates train किए जा चुके थे। इसके implementation ecosystem में 16,900 से ज्यादा institutions और 6,800 से ज्यादा Skill Hubs शामिल थे।
PMKVY 4.0 को लेकर सरकार के आंकड़े क्या कहते हैं?
पुरानी phases की CAG findings के बावजूद PMKVY 4.0 के impact को लेकर सरकार ने positive results भी जारी किए हैं।
29 जुलाई 2026 को सरकार ने independent impact evaluation का हवाला देते हुए बताया कि Short Term Training candidates में employed और self-employed लोगों का combined share training से पहले 26.6 प्रतिशत था, जो training के बाद 45.4 प्रतिशत हो गया।
यानी 18.8 percentage points का increase दर्ज किया गया।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 41.4 प्रतिशत STT candidates और 48.9 प्रतिशत RPL candidates ने training और certification के बाद income बढ़ने की बात भी बताई।
इसलिए आज की स्थिति को सिर्फ पुरानी CAG findings से देखना पूरी तस्वीर नहीं देगा। पुराने phases में गंभीर implementation problems सामने आईं, जबकि PMKVY 4.0 को लेकर सरकार के पास employment और income outcomes में improvement का evaluation data भी है।
अगर आपने PMKVY की training ली है तो ये 8 चीजें check करें
1. Certificate: आपका certificate official record में मौजूद है या नहीं।
2. Training Centre: जिस centre से आपने course किया, उसकी status क्या है।
3. Attendance: आपकी training attendance सही दर्ज है या नहीं।
4. Aadhaar/e-KYC: आपकी identity details सही हैं या नहीं।
5. Bank Account: आपके नाम से सही bank details linked हैं या नहीं।
6. DBT Payment: payment मिला, pending है या transaction fail हुआ।
7. Placement: अगर placement का दावा किया गया था तो employer और job details verify करें।
8. Complaint: अगर आपके नाम पर ऐसी training या certification दिखाई दे रही है जो आपने की ही नहीं, या payment/identity में गलती है, तो official grievance mechanism पर complaint करें।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने Training Centres blacklist हुए या कितनी FIR दर्ज हुईं।
आगे यह देखना ज्यादा जरूरी होगा कि:
41 FIR की investigation कहां तक पहुंचती है?
178 blacklisted centres में recovery कितनी होती है?
34 लाख pending payments में कितने candidates को पैसा मिलता है?
NSDC के जिन करीब 20 current और former employees को notices दिए गए हैं, उनके खिलाफ आगे क्या action होता है?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या PMKVY 4.0 में technology-based safeguards पुराने loopholes को वास्तव में बंद कर पाते हैं?
प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का असली test यही है कि government records में कितने candidates trained और certified दिखते हैं, इससे आगे जाकर कितने युवाओं को वास्तव में skill, payment, job और बेहतर income मिलती है।
CAG की findings ने पुराने system की कई कमजोरियां सामने रख दी हैं। 2026 की FIR और blacklisting के जरिए कार्रवाई भी चल रही है। वहीं PMKVY 4.0 के नए evaluation में employment और income outcomes में improvement का दावा किया गया है।
अब नजर इस बात पर है कि पुरानी गलतियों से सीखकर मौजूदा system कितना मजबूत हुआ है और scheme से जुड़े युवाओं को उसका वास्तविक फायदा कितना मिल रहा है।
मुंबई में FDA का बड़ा एक्शन, Zepto समेत 5 फूड आउटलेट्स के लाइसेंस सस्पेंड। Prince of Wales, Cafe Sifarish और Otters Club में मिलीं खामियां।
मुंबई: मुंबई में Food and Drug Administration (FDA) ने फूड सेफ्टी और हाइजीन नियमों को लेकर बड़ा एक्शन लिया है। जांच के दौरान साफ-सफाई, फूड स्टोरेज, तापमान कंट्रोल, कीट नियंत्रण और फूड हैंडलिंग से जुड़ी गंभीर कमियां मिलने के बाद मुंबई के कई फूड एस्टेब्लिशमेंट के लाइसेंस या रजिस्ट्रेशन सस्पेंड कर दिए गए हैं।
बांद्रा के Otters Club में फूड आइटम्स के गलत तरीके से स्टोरेज और रखरखाव से जुड़ी कमियां सामने आईं। जांच के दौरान FDA ने यह भी पाया कि Punjab Sind Dairy से सप्लाई किया गया analogue paneer ‘regular paneer’ के तौर पर serve किया जा रहा था।
खार वेस्ट के Prince of Wales Restaurant में खाने के तापमान को सही तरीके से maintain करने, स्टोरेज, equipment cleaning और pest control से जुड़ी कमियां मिलीं।
वहीं, Andheri West के Cafe Sifarish में food storage और temperature control की पर्याप्त व्यवस्था नहीं मिली। कर्मचारियों की personal hygiene से जुड़ी सुविधाओं में भी कमी पाई गई। FDA की तरफ से सुधार नोटिस दिए जाने के बावजूद कैफे ने तय समय के अंदर compliance report जमा नहीं की।
Zepto के चेंबूर आउटलेट में भी तापमान का मामला
चेंबूर के Zepto Limited outlet में जांच के दौरान chilled और frozen food के temperature को लेकर भी सवाल उठे।
FDA के मुताबिक, जांच के समय non-veg chilled food का temperature 9°C, जबकि frozen food का temperature -11°C पाया गया। FDA ने कहा कि दोनों food categories निर्धारित temperature से ज्यादा temperature पर रखी गई थीं।
दहिसर के Daily Fresh Bakers पर भी FDA की कार्रवाई हुई है।
‘Safe Food, Safe Maharashtra’ अभियान के तहत एक्शन
यह कार्रवाई महाराष्ट्र FDA आयुक्त तुकाराम मुंढे के ‘Safe Food, Safe Maharashtra’ अभियान के तहत की गई है। इस अभियान में restaurants, food establishments और दूसरे food businesses की जांच की जा रही है।
मुंबई में कार्रवाई के साथ-साथ पुणे में भी FDA ने इसी अभियान के तहत बड़ा एक्शन लिया है।
Burger King पर भी FDA की कार्रवाई
11 अगस्त से 14 अगस्त 2026 के बीच ‘Safe Food, Safe Drug, Safe Maharashtra’ अभियान के तहत पुणे FDA डिवीजन ने hotels, restaurants, e-commerce establishments और dairies का special inspection किया।
इस दौरान गंभीर अस्वच्छ परिस्थितियां और food safety standards से जुड़े उल्लंघन मिलने के बाद 16 establishments के licence या registration तत्काल प्रभाव से suspend किए गए।
इसी कार्रवाई के दौरान पुणे के Camp इलाके में 1992 से चल रहे पुराने Burger King outlet पर भी FDA ने कार्रवाई की।
FDA की कार्रवाई पर उठ रहे सवाल
मुंबई और पुणे में लगातार हो रही कार्रवाई के बीच कुछ लोगों ने FDA के तरीके को लेकर ‘पहले कार्रवाई, बाद में बात’ वाले रवैये पर सवाल भी उठाए हैं। हालांकि FDA का कहना है कि कार्रवाई food safety और hygiene standards में मिली कमियों के आधार पर की जा रही है।
फिलहाल मुंबई में Zepto समेत इन food establishments पर FDA की कार्रवाई के बाद food storage, temperature control और hygiene standards को लेकर फिर चर्चा तेज हो गई है।
कांदिवली के Rock Highland टावर पर ₹62 करोड़ के सरकारी बकाये से रोक लगी। 105 खरीदारों और 500+ residents पर क्या असर होगा, जानिए पूरा मामला।
मुंबई: कांदिवली वेस्ट के चारकोप से इस वक्त रियल एस्टेट से जुड़ी बड़ी खबर सामने आई है। यहां Rock Highland के 39-मंजिला के तौर पर marketed किए जा रहे under-construction residential tower का काम सरकारी जमीन से जुड़े करीब ₹62 करोड़ के revenue dues के विवाद में रोक दिया गया है।
इस फैसले का असर सिर्फ construction site तक सीमित नहीं है। करीब 105 prospective homebuyers के लिए अब possession, construction और उनके लगाए पैसे को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। वहीं, उसी बड़े land parcel पर बनी 11 existing buildings में रहने वाले 500 से ज्यादा residents भी जमीन के lease और ownership status को लेकर चिंता में आ गए हैं।
मामला उस जमीन की lease और उसके बाद हुए development से जुड़ा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, करीब 5 एकड़ जमीन 1957 में अखंड शिवर पाटिल को खेती के इस्तेमाल के लिए 999 साल की lease पर दी गई थी। बाद में खेती के अलावा दूसरे इस्तेमाल की अनुमति से जुड़े payments किए गए।
विवाद तब सामने आया जब revenue authorities ने जमीन के actual development और government-owned parcel के area को लेकर सवाल उठाए। आरोप है कि development करीब 7.4 एकड़ के बड़े parcel पर हुआ, जबकि original lease करीब 5 एकड़ की थी।
यानी विवाद का एक बड़ा हिस्सा करीब 2.4 एकड़ अतिरिक्त जमीन के इस्तेमाल से जुड़ता है।
इसी जमीन पर Power of Attorney holder के तौर पर काम कर रहे Ravi Group से जुड़ी development activities के तहत पहले Rock Enclave की 11 buildings बनीं और बाद में Rock Highland tower का construction शुरू हुआ।
Collector की तरफ से developer पर करीब ₹62 करोड़ की demand रखी गई है। इसमें lease से जुड़े पुराने dues, interest और करीब 2.4 एकड़ जमीन के occupation/regularisation से जुड़े charges शामिल बताए जा रहे हैं।
करीब 2.4 एकड़ जमीन के occupation/regularisation से जुड़े charges
अन्य संबंधित revenue charges
इस रकम का exact head-wise breakup सामने आने पर यह साफ होगा कि principal dues और interest में कितना-कितना पैसा शामिल है।
Collector ने क्या आदेश दिया?
Mumbai Suburban Collector Saurabh Katiyar ने निर्देश दिया है कि संबंधित dues clear होने तक नए tower का construction आगे नहीं बढ़ाया जाए।
यानी फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि developer और government के बीच ₹62 करोड़ की demand का dispute कब और कैसे resolve होता है।
यह मामला शिकायतकर्ता Reji Abraham की ओर से government revenue के कथित नुकसान की शिकायत के बाद सामने आया था। मामला कई साल तक government level पर pending रहने के बाद Collector की कार्रवाई तक पहुंचा।
Developer ने Collector की demand और construction रोकने के फैसले को challenge किया है।
Ravi Group से जुड़े Jayesh Shah का कहना है कि करीब ₹62 करोड़ की demand लागू नहीं होती, क्योंकि जमीन के non-agricultural use से जुड़े जरूरी payments पहले ही किए जा चुके हैं।
Developer ने यह भी दावा किया है कि action एक RTI activist की शिकायत और दबाव के बाद लिया गया।
यानी फिलहाल government और developer की तरफ से जमीन के dues को लेकर दो अलग-अलग positions सामने हैं।
Developer ने Collector के action को court में challenge किया है। हालांकि, सिर्फ court में challenge किए जाने का मतलब यह नहीं है कि construction पर लगी रोक अपने आप हट गई है। इस मामले में court का current interim order और आगे की hearing स्थिति सबसे अहम होगी।
Rock Highland का MahaRERA registration number P51800049632 है। RERA record में project का promoter Rock Estates दर्ज है।
RERA-linked project details के मुताबिक project:
Kandivali West के CTS No. 1A/1, Village Kandivali में है
February 2023 में registered हुआ
RERA completion date 30 December 2026 दर्ज है
Project में करीब 199 residential units का record सामने आता है
यहीं एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है।
मीडिया reports में करीब 105 prospective buyers के प्रभावित होने की बात कही जा रही है, जबकि RERA-linked data में project की total inventory इससे काफी ज्यादा है। इसलिए 105 का आंकड़ा किस category के buyers को दर्शाता है—booked flats, affected allottees या prospective purchasers—इसे current RERA records से साफ करना जरूरी है।
39 मंजिल या 38 मंजिल?
Project की अलग-अलग marketing और property listings में floor configuration को लेकर भी फर्क दिखाई देता है।
कुछ marketing material इसे 39-storey project बताता है, जबकि कुछ records और property listings में 38 floors या अलग configuration दिखाई देता है।
इसलिए फिलहाल इसे 39-मंजिला के तौर पर marketed Rock Highland tower के रूप में समझना ज्यादा सुरक्षित है। Final sanctioned configuration संबंधित approved plan और Collector record से स्पष्ट होगी।
यह सवाल हर existing buyer के लिए सबसे important है।
अगर project में लंबे समय तक delay होता है या promoter की contractual/RERA obligations प्रभावित होती हैं, तो buyer के पास applicable RERA provisions के तहत remedies का सवाल उठ सकता है।
लेकिन “हर buyer को तुरंत पूरा पैसा वापस मिलेगा” ऐसा कहना सही नहीं होगा।
Refund, interest या compensation का अधिकार circumstances, agreement और competent authority/court के order पर depend करेगा।
इसलिए buyer को सबसे पहले अपने Agreement for Sale और current MahaRERA project status की जांच करनी चाहिए।
Leasehold जमीन पर flat खरीदने वालों के लिए क्या जरूरी है?
Rock Highland का विवाद सिर्फ construction का नहीं है। इसकी जड़ leasehold land से जुड़ी है।
RERA के तहत leasehold land पर project होने की स्थिति में promoter को lease से जुड़ी जानकारी और compliance maintain करनी होती है। RERA Section 11(4)(c) में lease certificate, lease period और leasehold land से जुड़े dues/charges की स्थिति से संबंधित requirements दी गई हैं।
इसका मतलब buyer के लिए एक बेहद जरूरी सवाल है:
क्या project की lease से जुड़े government dues और required certificates अभी पूरी तरह clear और valid हैं?
यही वह document है जिसे buyer को developer से मांगकर देखना चाहिए।
999 साल की lease का मतलब क्या flat की जमीन आपकी नहीं है?
999-year lease सुनने में ownership जैसा लग सकता है, लेकिन leasehold और freehold एक चीज नहीं हैं।
Leasehold arrangement में जमीन के underlying rights और leaseholder के rights अलग हो सकते हैं।
इसीलिए 1957 की original lease deed, बाद के assignments, development rights और government revenue records इस मामले में बहुत महत्वपूर्ण हैं।
Buyer के लिए सिर्फ builder का brochure देखना पर्याप्त नहीं है।
अगर original lease करीब 5 acres की थी और development करीब 7.4 acres के government-owned parcel से जुड़ा है, तो अतिरिक्त 2.4 acres का legal status समझना जरूरी है।
यही वजह है कि revenue authorities की करीब ₹62 करोड़ की demand में land occupation/regularisation से जुड़े charges का भी उल्लेख सामने आया है।
इसलिए मामला सिर्फ यह नहीं है कि:
“बिल्डर पर ₹62 करोड़ बकाया है।”
असली सवाल है:
“जिस जमीन पर development हुआ, उसका पूरा legal और revenue trail क्या है?”
इसके लिए CTS records, Property Card, original lease deed, mutation entries और development documents महत्वपूर्ण होंगे।
फिलहाल ऐसा कहना सही नहीं होगा कि 500+ residents के flats पर कोई सीधा खतरा पैदा हो गया है।
लेकिन अगर government dispute उसी land parcel के underlying lease/title से जुड़ा है, तो residents के लिए अपने documents की स्थिति समझना जरूरी हो जाता है।
खासकर:
Property Card + Lease Deed + Conveyance/Deemed Conveyance + Society records
की जांच महत्वपूर्ण होगी।
क्या resale या redevelopment पर असर पड़ सकता है?
अगर land/lease dispute लंबे समय तक unresolved रहता है तो future property transactions में buyers, banks और legal teams ज्यादा documents मांग सकते हैं।
इससे resale, mortgage या redevelopment जैसे मामलों में additional legal scrutiny की संभावना हो सकती है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर existing flat की resale automatically बंद हो जाएगी।
असल असर इस बात पर depend करेगा कि dispute का exact land area और existing societies के legal documents से क्या संबंध निकलता है।
देश के दूसरे शहरों में ऐसे मामले पहले भी buyers को प्रभावित कर चुके हैं
यह सिर्फ मुंबई की समस्या नहीं है।
Greater Noida में जून 2026 में 14 developers के खिलाफ करीब ₹315.5 करोड़ के land dues की recovery के लिए कार्रवाई की गई। इससे करीब 8,856 homebuyers से जुड़े registration और possession issues सामने आए।
यानी एक बात साफ है:
Developer और government authority के बीच land dues का dispute आखिरकार homebuyer तक पहुंच सकता है।
Greater Noida में stalled projects को revive करने के लिए dues restructuring और relief mechanisms भी इस्तेमाल किए गए हैं।
एक अन्य stalled project, Antriksh Valley, में करीब ₹45 करोड़ के land dues और दूसरे liabilities resolve होने के बाद project revival के लिए करीब ₹115 करोड़ तक SWAMIH funding sanction हुई।
मुंबई में भी Nirmal Lifestyle, Mulund जैसे मामले में government premium dues और stalled construction के कारण homebuyers की परेशानी सामने आ चुकी है।
इससे यह भी साफ होता है कि government dues वाला project हमेशा permanently बंद हो जाए, ऐसा जरूरी नहीं है। कई मामलों में dues resolution और financing के बाद construction दोबारा शुरू हुआ है।
Maharashtra में leasehold land पर अभी इतनी चर्चा क्यों?
इस पूरे मामले का एक broader Maharashtra context भी है।
2026 में Maharashtra government ने government leasehold land records को लेकर statewide overhaul शुरू किया है। नई व्यवस्था में government को land record में “Occupant” और leaseholder को “Other Rights” category में दर्ज करने की दिशा में बदलाव किया गया है।
इसका मकसद government-owned leasehold land पर ownership को लेकर confusion और गलत claims को कम करना है।
मुंबई में हजारों cooperative housing societies leasehold/collector land पर बनी हैं। इसलिए lease status, property records और redevelopment rights का सवाल सिर्फ Kandivali तक सीमित नहीं है।
Rock Highland मामले में अब तीन चीजें सबसे ज्यादा important हैं:
₹62 करोड़ की demand
क्या developer इसे pay करेगा, challenge करेगा या government के साथ कोई legal resolution निकलेगा?
Court का फैसला
Developer की challenge petition में court क्या interim या final order देता है?
Land records
5-acre original lease, disputed 2.4-acre portion और 7.4-acre development parcel का exact legal connection क्या है?
इन तीनों का जवाब मिलने के बाद ही यह साफ होगा कि 105 reported buyers और 500+ existing residents के लिए यह dispute कितना बड़ा बन सकता है।
फिलहाल इतना जरूर है कि कांदिवली का यह मामला सिर्फ एक under-construction tower रुकने की खबर नहीं है। यह सवाल सीधे उस जमीन के lease rights, government revenue, developer approvals और homebuyers के future से जुड़ गया है।
और जब तक ₹62 करोड़ के dispute और जमीन के legal status पर पूरी clarity नहीं आती, Rock Highland के buyers के लिए सबसे जरूरी बात यही है—अपने documents check करें, MahaRERA status देखें और Collector तथा court proceedings की latest update पर नजर रखें।
केन-बेतवा परियोजना पर आदिवासी सत्याग्रह के बीच राहुल गांधी का समर्थन, 93% मुआवजे के सरकारी दावे और 14 गांवों के नए सर्वे से जुड़े सवाल जानिए।
भोपाल/छतरपुर:केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर बुंदेलखंड में आदिवासी परिवारों का संघर्ष एक बार फिर तेज हो गया है। 19 अगस्त 2026 को राहुल गांधी ने आंदोलन कर रहे आदिवासी भाई-बहनों से मुलाकात कर उनकी समस्याएं, मांगें और आपबीती सुनी और इस लड़ाई में उनके साथ खड़े रहने का भरोसा दिया।
राहुल गांधी ने कहा कि सालों से अपने अधिकारों के लिए अन्याय और अत्याचार सह रहे बुंदेलखंड के निवासी सम्मान और समर्थन के हकदार हैं। उन्होंने साफ कहा कि आदिवासी भाई-बहनों की इस लड़ाई में वह और कांग्रेस उनके साथ हैं।
लेकिन इस पूरी खबर में सबसे बड़ा सवाल राहुल गांधी का समर्थन नहीं, बल्कि यह है—
जब सरकार खुद दावा कर रही है कि प्रभावित परिवारों को 93.78% rehabilitation compensation दिया जा चुका है, तो फिर आदिवासी परिवार अभी भी सत्याग्रह क्यों कर रहे हैं?
यही सवाल अब केन-बेतवा परियोजना के पूरे विवाद के केंद्र में आ गया है।
केन-बेतवा लिंक परियोजना का मकसद केन नदी के पानी को बेतवा नदी बेसिन तक पहुंचाना है। इसमें दाउधन बांध और करीब 221 किलोमीटर की link canal सहित कई बड़े infrastructure works शामिल हैं।
सरकार का कहना है कि यह project बुंदेलखंड के लंबे समय से चले आ रहे water crisis को कम करने में मदद करेगा। सिंचाई का विस्तार होगा, किसानों को पानी मिलेगा और मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में drinking water supply बेहतर होगी।
सरकारी project details के मुताबिक लाखों हेक्टेयर जमीन को irrigation coverage देने और लाखों लोगों तक drinking water पहुंचाने का target है।
यानी एक तरफ सरकार इसे बुंदेलखंड के लिए पानी और विकास की बड़ी योजना बता रही है, वहीं दूसरी तरफ project area में रहने वाले परिवारों का सवाल है—
“विकास होगा, लेकिन हमारी जमीन और हमारी जिंदगी का क्या होगा?”
प्रदर्शन कर रहे परिवारों की शिकायत सिर्फ इतनी नहीं है कि उन्हें compensation नहीं चाहिए।
उनकी मांग है कि अगर project की वजह से उन्हें अपनी जमीन, घर और livelihood छोड़ना पड़ रहा है, तो rehabilitation ऐसा होना चाहिए जिससे विस्थापन के बाद उनकी जिंदगी दोबारा खड़ी हो सके।
आंदोलन में मुख्य तौर पर इन सवालों को उठाया गया है—
कौन-कौन से परिवार वास्तव में project से प्रभावित हैं?
क्या सभी eligible परिवारों के नाम rehabilitation list में हैं?
जमीन और मकान का assessment सही हुआ है या नहीं?
compensation कितना और किस आधार पर मिल रहा है?
rehabilitation के बाद खेती और रोजगार का क्या होगा?
जंगल और natural resources पर निर्भर परिवारों का क्या होगा?
नए स्थान पर घर, पानी, स्कूल और healthcare की व्यवस्था कैसी होगी?
यानी मामला सिर्फ “पैसा कितना मिला” का नहीं है।
मामला यह भी है कि “पैसा मिलने के बाद जिंदगी कैसे चलेगी?”
इसी बीच केंद्र सरकार ने 19 अगस्त को केन-बेतवा परियोजना से जुड़े compensation और rehabilitation के आंकड़े सामने रखे हैं।
सरकार के मुताबिक 5,039 project-affected families को rehabilitation के लिए चिन्हित किया गया है। इनके लिए ₹629.87 करोड़ के awards बनाए गए थे, जिसमें से ₹590.74 करोड़ यानी 93.78% भुगतान किया जा चुका है।
कृषि भूमि से जुड़े 10,913 प्रभावित व्यक्तियों के लिए ₹360.66 करोड़ के awards बताए गए हैं। इनमें ₹320.45 करोड़ यानी 88.85% रकम का भुगतान होने की जानकारी दी गई है।
आवासीय संपत्तियों के compensation में भी करीब 94% payment का सरकारी दावा है।
सरकार का कहना है कि जिन मामलों में payment बाकी है, वहां जरूरी legal और administrative formalities पूरी होने के बाद भुगतान किया जाएगा और land records की verification भी जारी है।
लेकिन फिर वही सवाल—
अगर इतना बड़ा हिस्सा भुगतान हो चुका है, तो आंदोलन खत्म क्यों नहीं हुआ?
किसी परिवार का नाम compensation list में होना और हर प्रभावित व्यक्ति की वास्तविक जरूरत पूरी होना एक ही बात नहीं है।
आंदोलन से जुड़े लोगों ने eligibility, beneficiary criteria, compensation calculation और rehabilitation package को लेकर सवाल उठाए हैं।
कुछ प्रदर्शनकारियों की मांग है कि rehabilitation benefits तय करते समय परिवार में मौजूद eligible adult members और उनकी वास्तविक livelihood जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाए।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि “एक परिवार को कितना मिला?”
सवाल यह भी है—
“उस परिवार में कितने लोग अपनी आजीविका के लिए उसी जमीन पर depend थे?”
14 गांवों में फिर से survey क्यों कराया जा रहा है?
इस विवाद के बीच एक बड़ा administrative development सामने आया है।
छतरपुर प्रशासन ने 14 प्रभावित गांवों में fresh survey का आदेश दिया है।
इन गांवों में Sukwaha, Bhaurkhuwa, Ghughri, Naiguwan, Kakra, Kadwara, Palkoha, Kharyani, Dhodhan, Mainari, Kupi, Shahpura, Basudha और Dugaria शामिल हैं।
Fresh verification में जमीन, मकान, पेड़, दूसरी assets और प्रभावित परिवारों की जानकारी दोबारा देखी जा रही है।
इसका मकसद यह पता लगाना है कि कोई eligible परिवार या asset compensation और rehabilitation process से बाहर तो नहीं रह गया।
यही fresh survey अब आंदोलनकारियों की मांग और सरकार के आंकड़ों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है।
प्रभावित परिवारों ने पिछले कई महीनों में अलग-अलग तरीकों से अपनी बात सरकार तक पहुंचाई।
जल सत्याग्रह
प्रदर्शनकारियों ने पानी में खड़े होकर अपना विरोध जताया।
चिता आंदोलन
आदिवासी महिलाओं ने symbolic चिताओं पर लेटकर protest किया। इसका संदेश था कि जमीन और livelihood छिनने के बाद उनके सामने जिंदगी और मौत जैसा सवाल खड़ा हो गया है।
Hunger Strike
इसके बाद भूख हड़ताल शुरू हुई, जो कई दिनों तक चली।
Chulha Bandh
जुलाई में protest का एक और symbolic तरीका सामने आया—Chulha Bandh। यानी खाना बनाना तक बंद कर विरोध जताया गया।
आंदोलन में महिलाओं की बड़ी भागीदारी ने इसे और गंभीर बना दिया।
राहुल गांधी का यह इस मुद्दे पर पहला intervention नहीं है।
7 अगस्त को Lok Sabha में भी Ken-Betwa project से जुड़े tribal displacement और rehabilitation का मुद्दा उठाया गया था।
केंद्र के Tribal Affairs Ministry ने बताया कि इस विषय से जुड़ी complaints और representations मिली हैं और उन्हें मध्य प्रदेश सरकार को action और response के लिए भेजा गया है।
इसके बाद 13 अगस्त को राहुल गांधी ने प्रभावित परिवारों के delegation से मुलाकात की।
और अब 19 अगस्त को एक बार फिर उन्होंने सार्वजनिक तौर पर इस संघर्ष को समर्थन दिया है।
इससे साफ है कि Ken-Betwa का tribal displacement issue अब local protest से निकलकर national political debate का हिस्सा बन चुका है।
भारत के अलग-अलग हिस्सों में बड़े dams, mining और infrastructure projects को लेकर tribal displacement और rehabilitation के सवाल उठते रहे हैं।
राजस्थान के Mahi Bajaj Sagar से जुड़े मामलों में भी displaced families के rehabilitation और दोबारा विस्थापन की चिंता सामने आई है।
छत्तीसगढ़ के Hasdeo क्षेत्र में mining, forest rights और tribal communities के अधिकारों को लेकर विरोध जारी रहा है।
इन सभी मामलों में एक common सवाल सामने आता है—
क्या development project की planning जितनी मजबूत होती है, उतनी ही मजबूत प्रभावित लोगों को बसाने की planning भी होती है?
अब आगे क्या होगा?
अब केन-बेतवा विवाद में सबसे ज्यादा नजर 14 गांवों के fresh survey पर रहेगी।
देखना होगा कि दोबारा verification में कितने नए eligible families या assets सामने आते हैं और compensation तथा rehabilitation से जुड़े pending मामलों का क्या होता है।
दूसरी तरफ आदिवासी संगठनों की मांगें और तेज होती हैं या सरकार के साथ बातचीत का रास्ता निकलता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
राहुल गांधी के समर्थन से इस आंदोलन को political momentum मिला है, जबकि केंद्र ने अपने ताजा आंकड़ों के जरिए compensation process पर अपना पक्ष सामने रखा है।
लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल अभी भी वही है—
“93% से ज्यादा मुआवजा दिया जा चुका है, फिर भी आदिवासी सड़क पर क्यों हैं?”
इस सवाल का जवाब सिर्फ compensation के आंकड़े में नहीं, बल्कि जमीन, rehabilitation, livelihood, जंगल और प्रभावित परिवारों की वास्तविक जिंदगी में छिपा है।