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मराठा आरक्षण आंदोलन से दक्षिण मुंबई में यातायात ठप हो गया है। कारोबारियों का कहना है कि भीड़ और अफरा-तफरी से व्यापार पर गहरा असर पड़ा है, सरकार से हस्तक्षेप की मांग।
मुंबई: मराठा आरक्षण की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन का असर अब व्यापारियों और कारोबार पर गहराई से दिखाई देने लगा है। दक्षिण मुंबई के आज़ाद मैदान में मनोज जरांगे के नेतृत्व में हो रहे आंदोलन के कारण सड़कों पर भारी भीड़ और ट्रैफिक जाम ने कारोबारी गतिविधियों को ठप कर दिया है। Mumbai businessmen suffer huge losses due to Maratha reservation movement
फेडरेशन ऑफ रिटेल ट्रेडर्स वेलफेयर एसोसिएशन (FRTWA) के अध्यक्ष वीरन शाह ने कहा कि “आज़ाद मैदान के आसपास का इलाका पूरी तरह से अव्यवस्थित हो चुका है। सड़कों पर जाम, पुलिस की नाकाबंदी और बढ़ती भीड़ के चलते कारोबारियों को भारी नुकसान हो रहा है। अगर यह स्थिति लंबे समय तक रही तो व्यापार पर गहरा संकट खड़ा हो सकता है।” Mumbai businessmen suffer huge losses due to Maratha reservation movement
आंदोलन से शहर की रफ्तार थमी
पिछले दो दिनों से मुंबई लगातार बारिश और मराठा आंदोलन की वजह से जाम की मार झेल रही है। खासकर CST, फोर्ट, मरीन लाइन्स और कोलाबा जैसे इलाकों में ट्रैफिक जाम और दुकानों पर कम ग्राहकों की आवक ने कारोबारियों को चिंता में डाल दिया है। छोटे व्यापारियों का कहना है कि भीड़ और अव्यवस्था के कारण लोग खरीदारी के लिए बाजार तक नहीं पहुँच पा रहे हैं। Mumbai businessmen suffer huge losses due to Maratha reservation movement
व्यापारियों का सरकार से निवेदन
FRTWA समेत कई व्यापारी संगठनों ने सरकार से अपील की है कि स्थिति को सामान्य करने के लिए तुरंत हस्तक्षेप किया जाए। उनका कहना है कि आंदोलनकारियों की मांगें जायज़ हो सकती हैं लेकिन इस दौरान दैनिक जीवन और आर्थिक गतिविधियों को ठप होने से रोकना भी ज़रूरी है।Mumbai businessmen suffer huge losses due to Maratha reservation movement
वीरन शाह ने साफ कहा कि “हम सरकार से अनुरोध करते हैं कि आंदोलन को संवाद और चर्चा के ज़रिए हल किया जाए। व्यापारी और आम जनता रोज़ाना लाखों का नुकसान झेल रही है। सिर्फ यातायात ही नहीं बल्कि होटलों, रेस्टोरेंट्स और रिटेल दुकानों की बिक्री भी बुरी तरह प्रभावित हुई है।” Mumbai businessmen suffer huge losses due to Maratha reservation movement
व्यापारियों का कहना है कि इस आंदोलन से रोज़ाना करोड़ों रुपये का नुकसान हो रहा है। कई व्यापारी संगठनों ने अंदेशा जताया है कि अगर आने वाले दिनों में आंदोलन और तेज़ हुआ तो दक्षिण मुंबई की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती है।Mumbai businessmen suffer huge losses due to Maratha reservation movement
नतीजा
मराठा आरक्षण आंदोलन जहां एक तरफ समुदाय के अधिकारों की लड़ाई है, वहीं दूसरी ओर इसका असर मुंबई के आम नागरिकों और व्यापार पर भी साफ देखा जा रहा है। सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक तरफ आंदोलनकारियों की मांगों को पूरा करना और दूसरी ओर शहर की आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों को सुचारू बनाए रखना। Mumbai businessmen suffer huge losses due to Maratha reservation movement
मराठा आरक्षण आंदोलन में मनोज जारंगे पाटिल को विधायकों और सांसदों का बड़ा समर्थन मिल रहा है। मुंबई की ओर रैली से सरकार पर दबाव बढ़ा।
महाराष्ट्र: मराठा आरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे मनोज जारंगे पाटिल का आंदोलन अब और तेज़ हो गया है। “चलो मुंबई” के नारे के बाद पूरे महाराष्ट्र में मराठा समाज बड़ी संख्या में उनके साथ खड़ा हो रहा है। खास बात यह है कि पहले चुप रहने वाले विधायक और सांसद अब समर्थन जताने के लिए आगे आने लगे हैं। Manoj Jarange movement got the support of MLAs and MPs
जारंगे की यह स्पष्ट चेतावनी कि “जो विधायक और सांसद मराठा समाज के साथ नहीं होंगे, उन्हें जनता कभी माफ नहीं करेगी”, नेताओं पर दबाव डालने लगी है। नतीजा यह हुआ कि अब विभिन्न राजनीतिक दलों के जनप्रतिनिधि खुले तौर पर जारंगे के आंदोलन में शामिल हो रहे हैं। Manoj Jarange movement got the support of MLAs and MPs
बीड जिले से बढ़ा समर्थन
बीड के विधायक संदीप क्षीरसागर ने अंतरवली सराटी जाकर मनोज जारंगे से मुलाकात की और आंदोलन का समर्थन किया। इतना ही नहीं, वे मराठा युवकों के साथ रैली में भी शामिल हुए। बीड से ही सांसद बजरंग सोनवणे और माजलगांव के विधायक प्रकाश सोलंके ने भी आंदोलन को समर्थन देने का ऐलान किया है। Manoj Jarange movement got the support of MLAs and MPs
धाराशिव के विधायक कैलास पाटिल ने फेसबुक पोस्ट कर जारंगे के आंदोलन को जॉइन करने की अपील की है। ओमराजे निंबालकर ने भी सरकार से अपील की है कि मराठा समाज की मांगों को तुरंत सुलझाया जाए। Manoj Jarange movement got the support of MLAs and MPs
राज्य के अन्य हिस्सों में भी नेताओं की ओर से समर्थन मिलने लगा है। एनसीपी (शरद पवार गुट), एनसीपी (अजित पवार गुट), शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) और कांग्रेस—all पार्टियों ने आंदोलन को समर्थन दिया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता बालासाहेब थोरात ने भी मराठा समाज की मांगों को जायज़ बताते हुए आंदोलन के पक्ष में आवाज़ उठाई। Manoj Jarange movement got the support of MLAs and MPs
गाँवों से उमड़ा जनसैलाब
सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, सामाजिक स्तर पर भी आंदोलन को भारी समर्थन मिल रहा है। महाराष्ट्र के अलग-अलग ज़िलों से मराठा समाज के लोग ट्रैक्टर, बस और गाड़ियों में भरकर मुंबई की ओर रवाना हो गए हैं। कई गांवों के युवा अपने गाँव के बैनर और झंडे लेकर जारंगे की रैली में शामिल हो रहे हैं। Manoj Jarange movement got the support of MLAs and MPs
सरकार पर बढ़ता दबाव
जारंगे के आंदोलन को मिल रहा राजनीतिक और सामाजिक समर्थन सरकार के लिए चुनौती बन गया है। नेताओं का झुकाव और जनता का बढ़ता दबाव यह साफ दिखा रहा है कि अगर सरकार ने जल्द ही ठोस समाधान नहीं निकाला, तो मुंबई में बड़ा जनसैलाब खड़ा हो सकता है। Manoj Jarange movement got the support of MLAs and MPs
बृहन्मुंबई महानगर पालिका कार्यालय (BMC) चुनाव 2025 से पहले कांग्रेस को बड़ा झटका। महेंद्र मुंगेकर, उनकी पत्नी पल्लवी मुंगेकर और सैकड़ों कार्यकर्ता कांग्रेस छोड़कर शिंदे शिवसेना में शामिल हुए। जानें पूरी खबर और राजनीतिक असर।
मंत्रालय प्रतिनिधि मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा उलटफेर हुआ है। मुंबई कांग्रेस के दिग्गज नेता और सांसद व मुंबई कांग्रेस महासचिव वर्षा गायकवाड़ के करीबी माने जाने वाले महेंद्र मुंगेकर ने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा देकर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना (शिंदे गुट) का दामन थाम लिया है।
मुंगेकर के साथ उनकी पत्नी और पूर्व नगरसेविका पल्लवी मुंगेकर और सैकड़ों समर्थक भी कांग्रेस से अलग होकर शिवसेना में शामिल हो गए। यह घटनाक्रम ऐसे समय पर सामने आया है जब बृहन्मुंबई महानगर पालिका (BMC) के चुनाव सिर पर हैं।
मुंबई कांग्रेस को लगा करारा झटका
महेंद्र मुंगेकर का कांग्रेस छोड़ना पार्टी के लिए बड़ा नुकसान माना जा रहा है। वे लंबे समय से वर्षा गायकवाड़ के बेहद करीबी और संगठनात्मक फैसलों में सक्रिय भूमिका निभाने वाले नेता रहे हैं।
मुंबई कांग्रेस की राजनीति में उनका नाम बड़े चेहरे के रूप में लिया जाता था। स्थानीय स्तर पर उनकी पकड़ मजबूत रही है और वे पार्टी की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा रहे हैं।
कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि मुंगेकर के जाने से पार्टी न केवल संगठनात्मक रूप से कमजोर होगी बल्कि आगामी बीएमसी चुनावों में भी इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
शिवसेना (शिंदे गुट) की चुनावी रणनीति को मिला बल
एकनाथ शिंदे की शिवसेना फिलहाल मुंबई में अपनी पकड़ और मजबूत करने के मूड में है। बीएमसी चुनाव 2025 को लेकर पार्टी लगातार नए-नए नेताओं और कार्यकर्ताओं को जोड़ रही है।
महेंद्र मुंगेकर के जुड़ने से शिवसेना को स्थानीय नेटवर्क और कांग्रेस से असंतुष्ट वोटरों तक पहुंचने में मदद मिलेगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शिंदे गुट आने वाले दिनों में मुंगेकर को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप सकता है ताकि कांग्रेस के वोट बैंक को सीधे तौर पर चुनौती दी जा सके।
पिछले कुछ समय से महाराष्ट्र कांग्रेस में आंतरिक मतभेद और असंतोष की खबरें सामने आती रही हैं। महेंद्र मुंगेकर जैसे बड़े नेता का जाना इस बात का सबूत माना जा रहा है कि पार्टी की जमीनी पकड़ कमजोर होती जा रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि कांग्रेस के कई नेता खुद को पार्टी संगठन में दरकिनार महसूस कर रहे हैं। यही वजह है कि वे चुनाव से पहले विकल्प तलाशने में जुटे हैं।
बीएमसी चुनाव 2025 पर असर
बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) एशिया की सबसे अमीर नगरपालिका मानी जाती है और यहां के चुनाव हमेशा बेहद अहम होते हैं।
कांग्रेस को उम्मीद थी कि मुंबई कांग्रेस का नेटवर्क और पुराने नेता पार्टी को मजबूती देंगे।
लेकिन महेंद्र मुंगेकर के जाने से कांग्रेस की रणनीति को बड़ा झटका लगा है।
अब शिंदे गुट इस मौके का फायदा उठाकर कांग्रेस के वोट बैंक को अपने पाले में करने की कोशिश करेगा।
बीजेपी पहले से ही शिंदे गुट की सहयोगी है। ऐसे में दोनों दलों की एकजुटता कांग्रेस और उद्धव ठाकरे गुट के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
राजनीतिक विश्लेषण
1. कांग्रेस की कमजोरी: मुंगेकर के कांग्रेस छोड़ने से यह संदेश गया है कि पार्टी अपने ही बड़े नेताओं को संभाल नहीं पा रही है।
2. शिंदे गुट का आत्मविश्वास: बीएमसी चुनाव से पहले लगातार नेताओं का पार्टी में आना यह दर्शाता है कि शिंदे गुट खुद को आक्रामक मोड में लेकर चल रहा है।
3. गठबंधन की राजनीति: बीजेपी-शिंदे गुट की जोड़ी बनाम कांग्रेस-उद्धव ठाकरे गुट की लड़ाई और ज्यादा दिलचस्प होती जा रही है।
आगे की राह
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले हफ्तों में और भी कांग्रेस नेता शिंदे गुट या बीजेपी का रुख कर सकते हैं। बीएमसी चुनाव में अब मुकाबला सीधा और कड़ा होने की संभावना है।
मुंबई की राजनीति में यह साफ हो गया है कि सत्ता पक्ष (शिंदे-बीजेपी गठबंधन) कोई भी मौका गंवाना नहीं चाहता और विपक्ष की कमजोरी का भरपूर फायदा उठा रहा है।
महेंद्र मुंगेकर का कांग्रेस छोड़ना और शिंदे शिवसेना में शामिल होना न सिर्फ कांग्रेस के लिए बड़ा झटका है बल्कि यह आने वाले बीएमसी चुनाव 2025 के लिए राजनीतिक समीकरण बदलने वाला कदम है।
मुंबई की सियासत में इस घटनाक्रम से साफ हो गया है कि शिंदे गुट अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए आक्रामक रणनीति अपना रहा है, जबकि कांग्रेस के सामने अब अपनी साख बचाने की चुनौती है।
मुंबई BEST क्रेडिट सोसायटी चुनाव में ठाकरे गठबंधन को बड़ा झटका। शशांक राव पैनल ने 14 सीटें जीतीं, जबकि बीजेपी नेताओं का पैनल 7 सीटों पर विजयी रहा।
मंत्रालय प्रतिनिधि मुंबई: मुंबई BEST क्रेडिट सोसायटी चुनाव में ठाकरे गठबंधन को बड़ा झटका लगा है। नौ साल बाद हुए इस चुनाव में शशांक राव पैनल ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 21 में से 14 सीटों पर जीत हासिल की। वहीं, बीजेपी नेताओं प्रसाद लाड और प्रवीण डेरेकर के नेतृत्व वाला ‘सहकार समृद्धि’ पैनल 7 सीटों पर विजयी रहा। चौंकाने वाली बात यह रही कि उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के ‘उत्कर्ष पैनल’ को एक भी सीट नहीं मिली। Mumbai BEST Credit Society Election: Setback for Thackeray panel, BJP-backed panel wins
ठाकरे ब्रांड को झटका, विपक्ष के तंज
इस हार पर विपक्षी नेताओं ने ठाकरे परिवार पर निशाना साधा। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा, “लोगों ने ठाकरे ब्रांड को नकार दिया है। जिन्होंने EVM पर सवाल उठाए थे, उन्हें जनता ने करारा जवाब दिया है।” वहीं उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने तंज कसते हुए कहा कि “जो काम करते हैं उन्हें मौका मिलेगा, और जो घर पर बैठते हैं उन्हें जनता घर पर ही बैठा देगी।”
चुनाव जीतने के बाद शशांक राव ने कहा कि यह जीत BEST कर्मचारियों की आवाज है। उन्होंने शिवसेना (UBT) पर आरोप लगाते हुए कहा कि “ठाकरे पैनल ने कर्मचारियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया, प्राइवेटाइजेशन की नीति अपनाई और ग्रेच्युटी फंड का गलत इस्तेमाल किया। कर्मचारियों की भर्तियां सालों से लंबित थीं और सातवें वेतन आयोग का लाभ भी नहीं मिला। यही वजह रही कि इस बार कर्मचारियों ने बदलाव का मन बनाया।”
हर साल पुणे का गणेशोत्सव देश-विदेश से आए भक्तों के आकर्षण का केंद्र रहता है। रोज़ाना लाखों लोग मंडपों और पंडालों में गणपति बाप्पा के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस बार पुलिस ने सुरक्षा के लिए हजारों अधिकारियों और कर्मचारियों को पूरे शहर में तैनात किया है।
AI कैमरों से स्मार्ट निगरानी
शहर के प्रमुख चौक, मंडप, रेलवे स्टेशन, एसटी स्टैंड और भीड़भाड़ वाले इलाकों में 2,886 हाई डेफिनेशन AI कैमरे लगाए गए हैं। इसके अलावा पहले से मौजूद 1,341 कैमरों को अपग्रेड किया गया है। ये कैमरे नाइट विज़न, फेस रिकग्निशन और एडवांस वीडियो एनालिटिक्स तकनीक से लैस हैं, जिससे किसी भी संदिग्ध व्यक्ति की पहचान तुरंत संभव होगी। Ganeshotsav 2025 Pune: Hi-tech police arrangements, surveillance with AI cameras, drones and IP speakers
शहर में लगाए गए 200 IP स्पीकर्स पुलिस और नागरिकों के बीच त्वरित संवाद का माध्यम बनेंगे। अचानक किसी भी स्थिति—जैसे भगदड़, ट्रैफिक जाम या आपातकाल—में पुलिस इन स्पीकर्स से जनता को तुरंत गाइड कर सकेगी।
ड्रोन से आसमान से सुरक्षा
इस साल का एक और बड़ा आकर्षण होगा ड्रोन गश्त। गणेश जुलूस के रूट्स और भीड़ वाले इलाकों पर ड्रोन कैमरे तैनात रहेंगे। ड्रोन से ली गई तस्वीरें सीधे पुलिस कंट्रोल रूम में पहुंचेंगी, जिससे संदिग्ध हरकतों पर तुरंत कार्रवाई की जा सकेगी।
महाराष्ट्र के साथ-साथ तेलंगाना के नगरपालिकाओं ने 15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मांस की दुकानें और बूचड़खानों को बंद करने का निर्देश जारी किया है। इसको लेकर देशभर में विपक्षी नेता हंगामा कर रहे हैं। तेलंगाना हाईकोर्ट ने तो नगर पालिका प्रशासन से स्पष्टीकरण मांगा है।
डिजिटल डेस्क मुंबई: 15 अगस्त को सरकार द्वारा मांस की दुकानों को बंद करने को लेकर जारी फैसले के खिलाफ देशभर में हंगामा हो रहा है। महाराष्ट्र में नागपुर, नासिक, मालेगांव, छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) और कल्याण-डोंबिवली के साथ-साथ तेलंगाना के नगर पालिका अपने अधिकार क्षेत्र के बूचड़खानों और मांस की दुकानों को 15 अगस्त के दिन बंद रखने का निर्देश जारी किया है। इस मुद्दे को लेकर विपक्षी नेताओं के हंगामे के बीच महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार खुद आश्चर्य जता रहे हैं। राज ठाकरे ने तो यहां तक कह दिया, कि सरकार को लोगों के खान-पान तय करने का अधिकार नहीं है। हम देश की स्वतंत्रता का पर्व मना रहे हैं। The government has no right to decide the food habits of the people, There was uproar across the country on the meat ban on 15 August
मनसे का विरोध
गुरुवार को महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे ने स्वतंत्रता दिवस पर राज्य में कुछ नगर पालिका द्वारा मांस की बिक्री पर लगाए गए प्रतिबंध का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि सरकार को लोगों का खान-पान नहीं निर्धारित करना चाहिए। राज ने मुंबई में संवाददाताओं से कहा कि नगर पालिकाओं को इस तरह का प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं है।
सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, ‘गोश्त खाने और स्वतंत्रता दिवस में क्या रिश्ता है। तेलंगाना में 99 प्रतिशत लोग गोश्त खाते हैं। ओवैसी ने इस फैसले को लोगों की स्वतंत्रता, निजता, आजीविका, संस्कृति, पोषण और धर्म के अधिकारों का उल्लंघन करने वाला फैसला बताया है।’
तेलंगाना हाईकोर्ट ने मांगा जवाब
तेलंगाना में यह मामला हाईकोर्ट तक जा पहुंचा है। तेलंगाना हाई कोर्ट ने ग्रेटर हैदराबाद महानगर पालिका (जीएचएमसी) से स्वतंत्रता दिवस पर मांस की दुकानों और बूचड़खानों को बंद रखने के उसके आदेश के संबंध में स्पष्टीकरण मांगा है। तेलंगाना सरकार के इस आदेश के खिलाफ लगाई गई याचिका में कहा गया है कि यह आदेश मनमाना है। अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 19(1)(जी) (किसी भी पेशे को अपनाने का अधिकार) का उल्लंघन करता है। हाईकोर्ट के जस्टिस विजयसेन रेड्डी इस मामले की सुनवाई कर रहे हैं।
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने कहा, “मैंने टीवी पर खबर देखी, श्रद्धा का प्रश्न होता है तो इस तरह बंदी लगाई जाती है। आषाढ़ी एकादशी, महावीर जयंती जैसे अवसरों पर यह निर्णय लिया जा सकता है। अगर हम कोकण में जाएं तो वहां हर सब्जी में सूखी मछली डालकर पकाया जाता है। ऐसी बिना कारण के खाने पीने की चीजों पर रोक लगाना ठीक नहीं है। अगर भावनात्मक मुद्दा हो तो उस समय के लिए बंदी लगाई जाए तो लोग समझ सकते हैं। लेकिन, 15 अगस्त को महाराष्ट्र में बंदी लगाना उचित नहीं है। मैं इस बारे में जानकारी लूंगा।
दुनिया की निगाहों में भारत की गवाही और भारत के बीच हुए लगातार आतंकी हमलों पर विदेश नीति और संसद में खड़े होकर छपरी और टपरी जैसे भाषण कि “पहले मुझसे निपटो फिर मोदीजी का नाम लो।” और पाकिस्तानी हमले पर ट्रम्प का सीजफायर। भारत ने स्वार्थवश खुद हमला कराया होगा जिससे सबूत ही नहीं दे पा रहा।
डिजिटल डेस्क नई दिल्ली: संसद का मानसून सत्र चल रहा। बिहार में वोट काटने का खेल चुनाव आयोग खेल रहा। रोहिंग्या बांग्लादेश और नेपाली के नाम पर लाखों नाम काट डाले गए। blo लोगों के घर जाकर सत्यापन करने की जगह ऑफिस में बैठकर फॉर्म में नाम लिखकर खुद ही वोटर के हस्ताक्षर कर रहे। विपक्षी उनके वोटरों के नाम काटने के आरोप लगाए। पत्रकार अजीत अंजुम ने मोबाइल द्वारा चुनाव आयोग के खेल को सबूत सहित सार्वजनिक किया तो उनपर एफआईआर कर दी गई यानी सच दिखाने का दंड दिया गया।
लोकतंत्र का हिस्सा
संसद में ऑपरेशन सिंदूर की चर्चा में सत्ता विपक्ष में वाक्युद्ध चल ही रहा था, कि सीजफायर की भी बात हुई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 25 बार कहे गये वक्तव्य, कि “हमने ट्रेड की धमकी देकर युद्ध रुकवा दी।” पर विपक्ष ने हमला बोला। यही जीवंत लोकतंत्र है। ट्रंप ने खुद अपने एक्स हैंडल पर शाम 5.35 पर सीजफायर की घोषणा की। भारत की तरफ से नहीं। संसद में सत्ता ने उत्तर नहीं दिया। विपक्ष मांग करता रहा कि पीएम आकर कहें कि ट्रंप ने वॉर नहीं रुकवाई। रक्षामंत्री ने कहा पीओके लेना हमारा मकसद नहीं फिर भाजपा ने बार बार कांग्रेस और नेहरू पर आरोप क्यों लगाए?
संसद में होती है गुंडो की भाषा
पहलगाम में कथित तौर पर पाकिस्तानी आतंकी आए और धर्म पूछकर मारा जिसके प्रमाण नहीं। संसद के मानसून सत्र के समय ही सेना ने घोषित किया कि मुठभेड़ में सारे आतंकी मारे गए। इससे पूर्व जिन कथित आतंकियों के स्क्रेच जारी किए गए गवाह ने उसे गलत कहा। अहम बात यह कि सत्ता के दंभ में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा, “पहले मुझसे निपटो फिर मोदीजी का नाम लो।” क्या ऐसे स्पीकर और राज्यसभा के सभापति सदन की मर्यादा बचाने की कोशिश करेंगे? “मुझसे निपट लो।” क्यों भाई पीएम हो क्या? ऐसी भाषा किसी गली का गुंडा या फिर माफिया ही बोल सकता है। लेकिन विपक्ष को टोकने वाले सत्ता की असंसदीय भाषा की अनसुनी करते हुए पद की गरिमा खो चुके हैं।
मोदी सरकार वर्तमान में अपने से संबंधित बात पर चर्चा करने से भागती है। मोदी दिल्ली में ही है लेकिन सदन में आ नहीं सकते। ऐसा मणिपुर मामले में किया था। अंतिम समय में आए भी तो क्या कुछ कहा दुनिया जानती है। प्रधानमंत्री होने के नाते कभी मणिपुर गए ही नहीं। इसी तरह उरी, पठानकोट, पुलवामा और पहलगाम भी नहीं गए। यह सही है कि पहलगाम में आतंकी हमला हुआ। 27 भारतीयों को जान गंवानी पड़ी। विपक्ष सवाल पूछता रहा, सवा सौ किलोमीटर दूर पाकिस्तानी आतंकवादी कैसे आए? लोगों से कथित रूप से धर्म पूछा। पेंट खुलवाकर देखा कौन सा धर्म है। बीजेपी के मंत्रियों में तनिक भी विधवा हुई महिलाओं के प्रति सम्मान भाव नहीं देखा गया। बड़ी बेशर्मी से कहा गया, महिलाओं में वीरांगना भाव नहीं था। एक ने तो कर्नल सोफिया के लिए आतंकवादियों की बहन तक कह दिया। यही है इनका सेना के प्रति सम्मान भाव।
कांग्रेस पर सवाल उठाने का नतीजा
अब सेशन में ऑपरेशन सिंदूर पर सवाल जवाब हो रहे हैं। इसी बीच उन दरिंदे आतंकवादियों को सेना द्वारा मुठभेड़ में मारे जाने की बात कही गई। यहां टाइमिंग का सवाल जरूर उठता है। विपक्ष के प्रधान की पुलवामा में उपयुक्त आरडीएक्स कहां से आया सत्ता के पास कोई उत्तर है ही नहीं। कांग्रेस फोबिया से पीड़ित बीजेपी सरकार ने मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया। मुंबई आतंकी हमले का आरोप लगाकर अपने आरोप ढकने और जायज़ ठहराने की नाकाम कोशिश की। जिस पर प्रियंका गांधी ने आड़े हाथों लेते हुए जवाब दिया। मुंबई हमले के सारे आतंकियों को भून दिया गया। एक जीवित आतंकी कसाब को पकड़कर फांसी दी गई। जिसे दुनिया ने देखा और भारत के साथ पूरी दुनिया खड़ी दिखाई दी। आतंकवाद की सर्वत्र आलोचना की गई।
यही नहीं कांग्रेस में दायित्वबोध जवाबदेही होने के कारण महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने इस्तीफा दिया और गृहमंत्री ने खुद को दोषी समझकर इस्तीफा दे दिया। लेकिन यह भूल गई प्रियंका कि बीजेपी में दायित्व बोध जवाबदेही और इस्तीफा देने की समझ है ही नही। अगर नैतिकता होती तो मणिपुर मामले में इस्तीफा दिया गया होता। उरी, पठानकोट और पुलवामा की असफलता पर इस्तीफे की झड़ी लग गई होती। प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन से इस्तीफा मांगने वाले क्यों नहीं अपने गृह मंत्री, रक्षा मंत्री और प्रधानमंत्री से इस्तीफा देने की मांग करते?
सरकार ने दिया सेना को धोखा
इस्तीफा तो विदेश मंत्री को भी देना चाहिए था कि उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर शुरू होने के पूर्व पाकिस्तान को सूचना दे दी, जिससे हमारे विमान मार गिराए गए। पीएम मोदी से इस गलत बयानी और प्रचार पर इस्तीफा मांगते कि उन्होंने दावा किया था सेना को खुली छूट दी है समय और स्थान सेना तय करे जबकि फौजी अधिकारियों ने बार बार मोदी के दावे की पोल खोली है। यही नहीं एयर मार्शल भी कह चुके हैं कि “जब समय पर सप्लाई नहीं कर सकते तो वादा क्यों करते हो?”
आज तक सत्ता का कोई भी उन मारे गए पर्यटकों के घर जाने की जरूरत नहीं समझी जब कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी जाकर उनके जख्मों पर मरहम लगा चुके हैं। राहुल गांधी की राजनीति सर्व ग्राही है। इसीलिए वे मणिपुर जाकर पीड़ितों के ज़ख्म सहला चुके हैं उनके विपरीत पीएम मोदी शहीदों के नाम पर वोट ही नहीं मांगे बल्कि कानून नियम के विरुद्ध सेना की वर्दी पहनकर ऑपरेशन सिंदूर की सफलता का श्रेय लेते हुए अपनी फोटो डालकर पोस्टर चिपकवा चुके हैं। पाकिस्तान के दो टुकड़े करने और 95 हजार सैनिकों के आत्मसमर्पण की सफलता का श्रेय लेने की कोशिश इंदिरा गांधी ने कभी भी नहीं की।
टैक्स का बोझ सुविधा के नाम पर भ्रष्टाचार
दरअसल हिंदू-मुस्लिम कर चुनाव आयोग द्वारा छल कपट और गलत काम कराकर चुनाव जीतना ही मोदी का एकमात्र लक्ष्य है। फर्जी वोटर बढ़वाकर हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली चुनाव जीतने के बाद बिहार में वोटरों को बाहर करने का खेल चुनाव आयोग खेल रहा है। मोदी सरकार अपने 11 साल के शासन में किए गए कार्य पर वोट मांगने की हिम्मत कर ही नहीं सकते। क्योंकि किसान, मजदूर, युवाओं, छात्रों, गृहिणियों के जीवन को दूभर बना दिया है। टैक्स का इतना भार दुनिया के किसी भी देश में नहीं है। सुविधा के नाम पर सर्वत्र भ्रष्टाचार ही हुआ है।
सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे ताकि गरीबों के बच्चे पढ़ न सकें। परीक्षा में अनियमितता के विरोध में छात्र हितों के खातिर जब शिक्षक दिल्ली में रैली कर रहे थे तब पुलिस द्वारा शिक्षकों को घसीट कर बस में जबरन बिठाकर दूर ले जाकर छोड़ा गया। इस कार्य में दिल्ली पुलिस सिद्धहस्त है, जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी से न्याय मांगने महिला पहलवान जब दिल्ली के जंतर मंतर पर रैली निकाले हुए धरने पर बैठी थी तब भी अमित शाह के आदेश पर उन्हें घसीटा और बसों में जबरन लादकर दूर ले जाकर छोड़ा गया था।
विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था होने दावा?
दिल्ली पुलिस वही है जो हाईकोर्ट के जस्टिस वर्मा के घर आग लगने से जली झुलसी नोटो की गाड़ियों के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज नहीं कर सकी। जांच करना तो बड़ी दूर की बात, जिस राष्ट्र में शिक्षकों को अपमानित किया जाए। उन्हें घसीटकर बसों में ठूंसा जाए। प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक कर चालीस पचास लाख रुपयों में बेचा जाए। सड़कें पहली ही बरसात में बहने लगें। पुल बनते समय या उदघाटन के पहले ही जल समाधि लेने लगें। ये सारे करतूतें भ्रष्टाचार सामने दिखता ही नहीं बल्कि चीख-चीख कर बोलता भी है। उस देश को वहां की सरकार जो विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था होने का दावा करे, जहां की अस्सी करोड़ जनता को गरीबी रेखा से नीचे रखने का षडयंत्र रचा जाए, क्या कहा जा सकता है?
ऐसी विदेशनीति को क्या कहा जाए कि अरबों रुपए जनता के पैसे फूंककर विश्व की यात्रा की जाए। लेकिन पाकिस्तान युद्ध के समय दुनिया का एक भी देश खुलकर भारत के साथ नहीं आए। अमेरिका का राष्ट्रपति धमकी देता रहे। राष्ट्र को अपमानित करता रहे लेकिन सत्ता में हिम्मत नहीं जो कह सके ट्रंप झूठ बोल रहा है। उसी ट्रंप ने रूस से तेल खरीदना बंद करा दे जबकि हमारा पड़ोसी चीन अमेरिका के आंखों में आँखें डालकर जवाब देता हो। सबसे विश्वसनीय देश रूस को भी दूर कर दे ऐसी विदेशनीति जो अमेरिका की गोद में बैठी हो क्या कहा जाएगा?
दुनिया की निगाहों में भारत?
भारत ने डेलिगेशन भेजे बताने के लिए कि पाकिस्तान ने पहलगाम में आतंकी हमला करके 27 बेकसूरों को गोली मारकर हत्या कर दी, जिसके लिए जीरो टॉलरेंस अपनाकर हमने पाकिस्तानी आतंकवादियों के अड्डों पर सीमित हमले कर सौ आतंकियों को मार गिराया। लेकिन कोई राष्ट्र यकीन नहीं कर रहा। क्योंकि हमारे पास कोई सबूत नहीं जैसा कि मणिशंकर ने कहा है जिसका अर्थ दुनिया समझती है भारत ने स्वार्थवश खुद हमला कराया होगा जिससे सबूत नहीं दे पा रहा। मुंबई हमले में कसाब को जिंदा सबूत दिखाया गया था। यानी पाकिस्तानी आतंकवाद की गुहार कोई सुनने के लिए तैयार नहीं उलटे ट्रंप हम पर 25% टैरिफ और रूस से तेल खरीदने पर 100% पेनल्टी लगाने की घोषणा कर दी। संसद में भले दावा किया गया हो कि पाकिस्तानी आतंकियों को सेना ने मार गिराया है। दुनिया की निगाहों में भारत झूठ बोल रहा।
मुंबई के पक्षी प्रेमियों को राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राहत की खबर सुनाईं है। कबूतरों को दाना डालने के खिलाफ हो रही कार्रवाई को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। मुख्यमंत्री के इस पहल से कबूतरों के संरक्षण की मांग कर रहे कबूतरप्रेमियों को बड़ी राहत मिली है।
मंत्रालय प्रतिनिधि मुंबई: शहर में कबूतरखानों को लेकर पिछले कुछ दिनों से चल रहा विवाद अब थमता हुआ नजर आ रहा है। बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद कबूतरखानों के खिलाफ मुंबई महानगरपालिका (BMC) द्वारा शुरू की गई कार्रवाई अब थम सकती है। दरअसल मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने आज इस मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण बैठक की और उन्होंने शहर में कबूतरखानों को अचानक बंद करने के कदम को उचित नहीं माना।
मंत्रालय में हुए उच्चस्तरीय बैठक
मंत्रालय में मंगलवार को हुई उच्चस्तरीय बैठक में सीएम फडणवीस ने कहा, कि “कबूतर-खानों यानी पक्षियों को दाना डालने की जगह को अचानक बंद करना कोई समस्या का समाधान नहीं है।” उन्होंने इस बात पर जोर दिया, कि यदि कबूतरों के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो रही हैं, तो उन पर वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है, न कि सीधे प्रतिबंध लगा देना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया, कि “कबूतरों को दाना डालने के लिए एक निर्धारित समय तय किया जा सकता है।”
सीएम फडणवीस की अध्यक्षता में हुई बैठक में उपमुख्यमंत्री अजित पवार, वन मंत्री गणेश नाइक, मंत्री गिरीश महाजन और मंत्री मंगलप्रभात लोढ़ा भी उपस्थित थे। बैठक के दौरान फडणवीस ने कहा कि कबूतरों की विष्ठा से होने वाली गंदगी की सफाई के लिए विशेष तकनीक का उपयोग किया जाना चाहिए। कबूतरखानों से नागरिकों को कोई परेशानी न हो, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए। Pigeon houses will open again in Mumbai! CM Fadnavis gave instructions
बीजेपी विधायक एवं मंत्री मंगलप्रभात लोढ़ा ने मीडिया से बात करते हुए कहा, कि सरकार कबूतरखानों को अचानक बंद करने के पक्ष में नहीं है और बॉम्बे हाईकोर्ट में सरकार पक्ष रखेगी। जो कबूतरखाने प्लास्टिक शीट से ढंककर बंद किए गए है, उन्हें जल्द ही फिर से खोला जाएगा। उन्होंने बताया कि कबूतरों को अब नियंत्रित ढंग से ही दाना दिया जाएगा, जिससे नागरिकों को कोई असुविधा न हो। कबूतरों की विष्ठा की सफाई के लिए ‘टाटा’ कंपनी द्वारा निर्मित एक विशेष मशीन का उपयोग किया जाएगा। इसके लिए एक विशेष समिति का गठन भी किया जाएगा।
FIR दर्ज करने का दिया था आदेश
मुंबई शहर में 51 ‘कबूतर खाने’ यानी पक्षियों को दाना डालने की जगह हैं। कुछ दिन पहले बॉम्बे हाईकोर्ट ने कबूतरों के झुंड को दाना डालने को ‘सार्वजनिक उपद्रव’ करार देते हुए बृहन्मुंबई महानगर पालिका (BMC) को ऐसे लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश दिया था। बीएमसी ने दादर का मशहूर ‘कबूतर खाना’ बंद कर दिया और उसे प्लास्टिक के तिरपाल से ढक दिया। इसके बाद शहर के कुछ हिस्सों में पक्षी प्रेमियों और जैन समुदाय के लोगों ने नाराजगी जताते हुए प्रदर्शन भी किए। हालांकि अब सीएम फडणवीस की इस पहल से कबूतरप्रेमियों को बड़ी राहत मिली है।
महाराष्ट्र सरकार की “लाडकी बहन योजना” के तहत राज्य की लाखों महिलाओं के लिए रक्षाबंधन से पहले बड़ी खुशखबरी है। जुलाई महीने की 13वीं किस्त यानी 1500 रुपये बैंक खातों में 9 अगस्त 2025 से पहले जमा किए जाएंगे। हालांकि की देरी हुई है लेकिन योजना को फिर एकबार जारी रखा गया है।
मंत्रालय प्रतिनिधि मुंबई: महाराष्ट्र सरकार की “लाडकी बहन योजना” के तहत राज्य की लाखों महिलाओं के लिए रक्षाबंधन से पहले बड़ी खुशी की खबर है। जुलाई महीने की 13वीं किस्त 1500 रुपये की पात्र महिलाओं के बैंक खातों में 9 अगस्त 2025 से पहले जमा कर दिए जाएंगे। महिला एवं बाल विकास मंत्री आदिती तटकरे ने हाल ही में इसको लेकर जानकारी साझा करते हुए बताया कि रक्षाबंधन की पूर्व संध्या पर महिलाओं के खातों में पैसे जमा कर दिए जाएंगे। एक जानकारी के मुताबिक किस्तों के पैसे जारी करने में देरी हुई है। यह देरी इसलिए हुई क्यों कि योजना का लाभ उठाने के लिए लाखों लोगों ने फर्जी तरीके से लाभ उठा लिया था। उसकी जांच मे देरी के कारण पात्र महिलाओं को इंतजार करना पड़ा। Ladki Bahin Yojana: Though late, but good news for Ladki Bahin Yojana holders!
योजना में पात्रता और लाभ
महाराष्ट्र सरकार की ओर से “माझी लाडकी बहन योजना” 21 से 65 वर्षीय महिलाओं के लिए चलाई जा रही है। योजना की शुरुआत से अब तक पात्र महिलाओं को 1500 रुपये प्रति माह की दर से अबतक 12 किस्तें दी जा चुकी हैं। सरकारी घोषणा के मुताबिक, अब 13वीं किस्त की राशि जारी किए जायेगी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य राज्य की महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है, ताकि वे अपने जरूरतों के खर्चों को आत्मनिर्भरता से पूरा कर सकें।
Ladki Bahin Yojana में मिले फर्जी खाते
हालांकि, इस बार सभी महिलाओं को किस्त नहीं मिलेगी। सरकार की जांच में सामने आया है कि 26.34 लाख लोगों ने फर्जी तरीके से योजना का लाभ उठाया है। जिनमें से करीब 14,000 पुरुष भी शामिल थे। ऐसे सभी फर्जी लाभार्थियों को लाभार्थी सूची से हटा दिया गया है। सरकार ने स्पष्ट किया, कि आगे से केवल योग्य और सत्यापित महिलाओं को ही योजना का लाभ मिलेगा। यदि कोई व्यक्ति गलत जानकारी देकर इस योजना का लाभ लेता है, तो उस पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। Ladki Bahin Yojana: Though late, but good news for Ladki Bahin Yojana holders!
जिन महिलाओं को किस्त मिलने वाली है, वे अपना खाता बैलेंस निम्नलिखित तरीकों से जांच सकते हैं:
ATM मशीन के जरिए पता कर सकते हैं।
बैंक शाखा कार्यालय जाकर पूछताछ की जा सकती है।
मोबाइल बैंकिंग ऐप से बेलेंस चेक कर सकते हैं।
कस्टमर केयर नंबर पर कॉल करके भी पता कर सकते हैं।
आपको जानकारी देते हुए बता दें, कि लाडकी बहन योजना की राशि DBT के माध्यम से सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में ट्रांसफर की जाती है।
करोड़ों महिलाओं को मिल रहा है योजना का लाभ
महाराष्ट्र सरकार की ओर से जारी “माझी लाडकी बहन योजना” के तहत पहले करीब 2.5 करोड़ महिलाओं को लाभ मिल रहा था, लेकिन जांच में गड़बड़ियां सामने आने के बाद आंकड़ा करीब सवा दो करोड़ हो गया। लेकिन इसके बाद एक बार फिर 26.34 लाख फर्जी नामों को हटाया गया, जिससे यह आंकड़ा अब घटकर करीब 2 करोड़ होने की जानकारी मिल रही है। हालांकि सरकार का लक्ष्य है कि हर पात्र महिला तक यह सहायता समय पर पहुंचे, ताकि कोई भी जरूरतमंद महिला इस योजना से वंचित न रह जाए। Ladki Bahin Yojana: Though late, but good news for Ladki Bahin Yojana holders!
महाराष्ट्र के मालेगांव में 29 सितम्बर 2008 को हुए बम धमाके के आरोप में गिरफ्तार 7 अभियुक्तों को विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। इसमें जांच एजंसियों की चूक प्रकाश में आते ही हाईकोर्ट के वकील नितिन सातपुते ने जनहित याचिका दायर करने का फैसला किया है। अदालत ने यह भी कहा, “सबूतों के साथ छेड़छाड़ हुई है।”
मुंबई: देश के बड़े आतंकी हमले में शुमार मालेगांव ब्लास्ट का मामला मुंबई की विशेष एनआईए अदालत में खत्म हो चुका है। आखिरकार 17 सालों बाद फैसला आता है कि गिरफ्तार 7 अभियुक्तों के खिलाफ जांच एजेंसियां सबूत पेश करने में विफल साबित हुई। जबकि सरकारी वकील अविनाश रसाल ने बताया, कि सुनवाई के दौरान कुल 324 गवाहों से पूछताछ की गई थी। जिनमें से 34 गवाह मुकर गए। अदालत ने सभी मुख्य अभियुक्त बीजेपी की पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत 7 लोगों को बरी कर दिया। इसमें जांच एजंसियों की गलतियों के खिलाफ एडवोकेट नितिन सातपुते ने जनहित याचिका दायर करने का फैसला किया है।
अगर हेमंत करकरे होते तो, ..
शुक्रवार को एडवोकेट नितिन सातपुते ने बताया कि “मालेगांव बम विस्फोट कांड का फैसला निराशाजनक है। शहीद हेमंत करकरे जैसे कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी ने उचित जाँच के बाद मामला दर्ज किया था। लेकिन बाद में क्या हुआ, यह सभी जानते हैं। अगर शहीद हेमंत करकरे आज हमारे बीच होते, और इस तरह का फैसला सामने आता, तो सही माना जाता। लेकिन इस वक्त जांच एजंसियों की गलतियों पर पूरे देश को शक हो रहा है। इसके साथ ही जिन्होंने नतीजे आने से पहले ही प्रज्ञा सिंह ठाकुर को सांसद बना दिया, उसी विचारधारा के लोग आज देश और प्रदेश में सत्ता में हैं।”
आरोपी बन गई सांसद
उन्होंने सवाल करते हुए कहा कि “यह स्पष्ट है कि आज के परिणामों में उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही जिन्होंने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को सांसद बनाया और अब क्या महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट जाएगी? ये भी एक बड़ा सवाल है। आज के फैसले से साफ़ हो गया है कि सबूत होने पर भी आरोपी बरी हो जाते हैं। तो क्या न्याय धर्म के आधार पर हो रहा है?” इसके साथ ही मामले को लेकर विशेष अदालत के न्यायाधीश एके लाहोटी ने सभी अभियुक्तों को निर्दोष करार देते हुए कहा, “यह एक अत्यंत गंभीर मामला है जिसमें नागरिकों की जान गई। लेकिन अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने के लिए निर्णायक सबूत पेश नही कर पाई।”
29 सितम्बर 2008 को मालेगांव के व्यस्त भिकू चौक के पास एक मोटरसाइकिल में बम धमाका हुआ था। जिस वक्त लोग पास की मस्जिद में नमाज़ के लिए इकट्ठा हो रहे थे। इस विस्फोट में 92 लोग घायल हो गए और 7 लोगों की मौत हो गई। इस आतंकी हमले में “आरडीएक्स” विस्फोटक का इस्तेमाल हुआ लेकिन जांच एजेंसियां उसका स्त्रोत सिद्ध नही कर पाई। यहां तक कि 14 लोगों की गिरफ्तारी में मुख्य अभियुक्त साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के साथ पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, रिटायर्ड मेजर रमेश उपाध्याय, अजय राहिरकर, सुधाकर चतुर्वेदी, समीर कुलकर्णी और सुधाकर द्विवेदी के खिलाफ मकोका के तहत मुकदमे दर्ज किए गए थे। इनके खिलाफ साज़िश रचने से लेकर विस्फोट हासिल करने और कई लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराने जैसे गंभीर आरोप लगे थे।
मुकदमा खड़ा ही गलत तरीके से किया गया।
इसमें साल 2008 में एंटी टेरेरिजम स्कॉड (ATS) ने शुरूआती जांच के दौरान कुल 14 लोगों को गिरफ्तार किया था। एटीएस ने मामले को गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) को सौपने से पहले दो चार्जशीट दाखिल की थी। इसके बाद एनआईए ने 2016 में एक पूरक आरोप पत्र दाखिल किया था। लेकिन 31 जुलाई को अदालत के फैसले मे सामने आया कि सभी साक्षों और गवाहों के आधार पर जो मुकदमा खड़ा हुआ, वह अभियुक्तों का दोष साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
जांच एजेंसियों का कहना था कि इस घटना से पहले एक बड़ी साजिश रची गई थी। जिसके तहत इंदौर, उज्जैन, पुणे जैसे अलग-अलग जगहों पर इन सभी अभियुक्तों की बैठकें हुईं और वहीं साज़िश रची गई। लेकिन अदालत ने कहा, बैठकों के कोई विश्वसनीय सबूत नहीं मिले। कहा, कि भले ही अभियुक्तों के बीच कुछ आर्थिक लेन-देन के सबूत पेश किए गए, लेकिन यह साबित नहीं हो सका, कि वह पैसे किसी हिंसक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल हुआ।
सबूतों के साथ छेड़छाड़
अदालत ने यह भी कहा, कि अभियुक्तों और उनके संबंधित लोगों के कॉल रिकार्ड निकालते समय जरूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। इसके लिए जरूरी अनुमति भी नहीं ली गई। अदालत ने यह भी कहा, कि “सबूतों के साथ छेड़छाड़ हुई है।” अदालत ने कहा, “कुल मिलाकर सरकारी पक्ष विश्वसनीय साक्ष्य पेश करने में असफल रहा और केवल संदेह के आधार पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। भले ही यह गंभीर अपराध हो, लेकिन सबूतों के अभाव में अभियुक्तों को संदेह का लाभ देना पड़ रहा है।” ऐसा कहते हुए अदालत ने सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया।
जांच एजेंसियों ने की आरोपियों की मदद
उच्च न्यायलय के वकील नितिन सातपुते ने आरोप लगाते हुए कहा, की जाँच एजेंसी ने जानबूझकर जाँच में चूक की है, जानबूझकर पर्याप्त सबूत नहीं जुटाए हैं और दोषपूर्ण आरोपपत्र दायर किया है ताकि मालेगांव बम विस्फोट मामले में आरोपियों की मदद की जा सके, उन्हें बचाया जा सके, उनकी रक्षा की जा सके। उस पुलिस अधिकारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए जिसने किसी के इशारे पर सभी आरोपियों को बचाने के लिए ठीक से जाँच नहीं की, जिसके परिणामस्वरूप विशेष अदालत के न्यायाधीश लखोटी ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। मैं इन जाँच एजेंसियों के खिलाफ जनहित याचिका दायर करने जा रहा हूँ। How did all the accused in Malegaon blast get acquitted? Preparation of PIL against the investigating agencies