Cheque Bounce Case: सजा के बाद समझौते से खत्म हुई Conviction, Bombay HC के फैसले का असर

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Cheque Bounce Case में समझौते के बाद दोषसिद्धि खत्म करने का रास्ता कैसे खुलता है? Bombay HC के 2019 फैसले और 2026 के Supreme Court आदेश से समझिए।

मुंबई:* चेक बाउंस मामले में दोषसिद्धि के बाद भी समझौते से राहत मिल सकती है। बॉम्बे हाई कोर्ट के 4 अक्टूबर 2019 के एक फैसले में ललिता कमल व्यास की दोषसिद्धि और उसके खिलाफ पारित निचली अदालतों के आदेश रद्द कर दिए गए थे। इस पुराने फैसले की कानूनी अहमियत अब इसलिए फिर सामने आती है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 2025 और 2026 में भी चेक अनादरण के मामलों में दोषसिद्धि के बाद समझौते को स्वीकार करते हुए राहत दी है।**

ललिता कमल व्यास मामले में क्या हुआ था?

ललिता कमल व्यास को मुंबई के अंधेरी स्थित 48वें महानगरीय मजिस्ट्रेट न्यायालय ने परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत दोषी ठहराया था। यह मामला C.C. No. 4281/SS/2017 से संबंधित था। 8 मार्च 2018 के इस आदेश को चुनौती दी गई, लेकिन 19 जनवरी 2019 को सत्र न्यायालय ने भी दोषसिद्धि को बरकरार रखा। इसके बाद मामला बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा।

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता और ललिता कमल व्यास के बीच विवाद आपसी समझौते से समाप्त हो गया। दोनों पक्षों ने 1 अक्टूबर 2019 को समझौता शर्तें और सहमति पत्र तैयार किया। शिकायतकर्ता की ओर से शपथपत्र भी दिया गया, जिसमें उसने आरोपी के खिलाफ आगे कोई शिकायत या दावा नहीं होने की बात कही।

शिकायतकर्ता अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुआ और समझौते की पुष्टि की। इसके बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने निचली अदालत और सत्र न्यायालय के आदेशों को रद्द करते हुए ललिता कमल व्यास को धारा 138 के अपराध से बरी कर दिया। यह फैसला न्यायमूर्ति एस.एस. शिंदे ने 4 अक्टूबर 2019 को सुनाया था।

क्या दोषसिद्धि के बाद भी चेक बाउंस मामले में समझौता हो सकता है?

यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है।

परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 147 के तहत धारा 138 का अपराध समझौते के जरिए समाप्त किया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि मामला केवल इसलिए खत्म होने की संभावना से बाहर नहीं हो जाता कि आरोपी को पहले ही दोषी ठहराया जा चुका है।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच निजी समझौता होते ही दोषसिद्धि अपने आप समाप्त हो जाती है। समझौते को न्यायिक प्रक्रिया के तहत स्वीकार किया जाना जरूरी है और अदालत के सामने पक्षों की सहमति तथा समझौते की शर्तों को रिकॉर्ड पर लाना महत्वपूर्ण होता है।

2025 में सुप्रीम कोर्ट ने भी यही सिद्धांत दोहराया

इस कानूनी स्थिति को अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने और स्पष्ट किया।

Gian Chand Garg बनाम Harpal Singh मामले में आरोपी को धारा 138 के तहत दोषी ठहराया गया था। निचली अदालत की दोषसिद्धि को अपीलीय अदालत ने बरकरार रखा और पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका भी खारिज हो गई। इसके बाद 6 अप्रैल 2025 को शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच समझौता हुआ।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 147 के कारण धारा 138 का अपराध समझौते योग्य है और पक्षों के स्वैच्छिक समझौते की स्थिति में कार्यवाही को उचित चरण पर समाप्त किया जा सकता है। अदालत ने शिकायतकर्ता द्वारा पूर्ण और अंतिम समझौते के रूप में राशि स्वीकार किए जाने के बाद दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया।

2026 का सुप्रीम कोर्ट फैसला: जेल जाने के बाद भी मिली राहत

इस कानूनी स्थिति का सबसे ताजा और महत्वपूर्ण उदाहरण Parsharvanath Weld Wires Pvt. Ltd. बनाम State of Chhattisgarh है।

इस मामले में धारा 138 के तहत दोषसिद्धि के बाद आरोपी को एक वर्ष के साधारण कारावास और शिकायतकर्ता को 28 लाख रुपये मुआवजा देने की सजा मिली थी। सत्र न्यायालय और बाद में हाई कोर्ट ने भी दोषसिद्धि को बरकरार रखा।

मामला यहां तक पहुंच गया कि कंपनी के निदेशक को 23 अप्रैल 2026 को सजा भुगतने के लिए जेल भेज दिया गया। इसके केवल दो दिन बाद, 25 अप्रैल को दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया। समझौते के तहत शिकायतकर्ता को 30 लाख रुपये देकर पूरे विवाद का अंतिम निपटारा किया गया।

निचली अदालत और हाई कोर्ट ने अंतिम दोषसिद्धि के बाद मामले को दोबारा खोलने पर राहत देने से इनकार किया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 को समझौता स्वीकार करते हुए धारा 138 के अपराध को समझौते के जरिए समाप्त किया और दोषसिद्धि तथा सजा को रद्द कर दिया। अदालत ने केंद्रीय जेल, रायपुर के अधीक्षक को आरोपी को तत्काल रिहा करने का निर्देश भी दिया।

इसका सीधा मतलब क्या है?

इन फैसलों से यह स्पष्ट होता है कि चेक बाउंस मामले में दोषसिद्धि हो जाने के बाद भी समझौते का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं होता।

लेकिन इसे स्वतः मिलने वाली राहत नहीं माना जा सकता। शिकायतकर्ता की स्वैच्छिक सहमति, समझौते की वास्तविक शर्तें, भुगतान और मामले की न्यायिक स्थिति जैसे पहलू महत्वपूर्ण होते हैं। अदालत ही यह तय करती है कि समझौते को स्वीकार कर दोषसिद्धि और सजा समाप्त की जा सकती है या नहीं।

2025 के Gian Chand Garg फैसले और 2026 के Parsharvanath Weld Wires फैसले ने इस बात को और मजबूत किया है कि केवल इस आधार पर समझौते को अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि धारा 138 के मामले में दोषसिद्धि पहले ही अंतिम स्तर तक पहुंच चुकी है।

ललिता कमल व्यास के फैसले की आज क्यों चर्चा हो रही है?

ललिता कमल व्यास का मामला स्वयं 2026 का नया फैसला नहीं है। बॉम्बे हाई कोर्ट का मूल निर्णय 4 अक्टूबर 2019 का है। हाल में कानूनी वेबसाइटों पर इस पुराने फैसले को दोबारा प्रकाशित या सूचीबद्ध किए जाने के कारण यह मामला फिर सामने आया है।

इसकी मौजूदा प्रासंगिकता इसलिए है क्योंकि 2025 और 2026 में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने उसी व्यापक कानूनी सिद्धांत को आगे स्पष्ट किया है—यानी धारा 138 के मामले में स्वैच्छिक समझौते के बाद, उचित न्यायिक प्रक्रिया के जरिए दोषसिद्धि और सजा समाप्त की जा सकती है।

क्या हर चेक बाउंस मामले में समझौते के बाद सजा खत्म हो जाएगी?

नहीं। ऐसा कोई स्वतः लागू होने वाला नियम नहीं है।

समझौता होने के बाद भी उसे अदालत के समक्ष उचित तरीके से प्रस्तुत करना और न्यायिक आदेश प्राप्त करना जरूरी है। इसके अलावा, समझौते की शर्तें पूरी हुई हैं या नहीं और शिकायतकर्ता की सहमति वास्तविक और स्वैच्छिक है या नहीं, यह भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

इसलिए धारा 138 के किसी मामले में केवल निजी समझौता हो जाने को अपने आप दोषसिद्धि समाप्त होने के बराबर नहीं माना जाना चाहिए।

आम लोगों के लिए क्या मायने रखता है?

चेक अनादरण के मामलों में मुकदमा लंबा चलने के बावजूद विवाद को समझौते से समाप्त करने का रास्ता उपलब्ध रह सकता है। यहां तक कि दोषसिद्धि के बाद भी अदालत के समक्ष समझौते के आधार पर राहत मांगी जा सकती है।

ललिता कमल व्यास का 2019 का बॉम्बे हाई कोर्ट फैसला और 2025-26 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले मिलकर यह दिखाते हैं कि धारा 138 के मामलों में समझौता केवल मुकदमे की शुरुआती अवस्था तक सीमित विकल्प नहीं है।

हालांकि, अंतिम राहत अदालत के आदेश पर निर्भर करती है और प्रत्येक मामले के तथ्य तथा समझौते की शर्तें अलग हो सकती हैं।

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