Category: Corruption

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  • Malad में फर्जी कॉल सेंटर का भंडाफोड़, विदेशियों को बैन दवाइयां बेचने वाले 5 गिरफ्तार

    Malad में फर्जी कॉल सेंटर का भंडाफोड़, विदेशियों को बैन दवाइयां बेचने वाले 5 गिरफ्तार

    मुंबई के मालाड स्थित चिनचोली बंदर में चल रहे एक फर्जी कॉल सेंटर पर पुलिस ने छापा मारकर पाँच लोगों को गिरफ्तार किया। आरोपी विदेशों में बैन दवाओं की सप्लाई का झांसा देकर भारी रकम वसूल रहे थे। पुलिस ने IT Act, BNS और टेलीग्राफ एक्ट की धाराओं में मामला दर्ज किया है।

    मुंबई: मालाड इलाके में बांगुर नगर पुलिस ने एक बड़े फर्जीवाड़े का पर्दाफाश करते हुए पाँच लोगों को गिरफ्तार किया है। ये आरोपी एक अवैध कॉल सेंटर चलाकर अमेरिका सहित कई देशों के ग्राहकों को बैन दवाइयां भेजने का दावा करते थे और उनसे भारी रकम वसूलते थे। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ IT Act और नई दंड संहिता (BNS) की कई धाराओं में केस दर्ज किया है।

    Malad में चल रहा था अवैध कॉल सेंटर, विदेशी ग्राहकों को बनाया जा रहा था निशाना

    मुंबई के चिंचोली बंदर, मालाड स्थित एक ऑफिस में यह फर्जी कॉल सेंटर ऑपरेट किया जा रहा था। गिरफ्तार आरोपी खुद को विदेशी ऑनलाइन फार्मेसी कंपनियों का प्रतिनिधि बताकर विदेशी ग्राहकों से संपर्क करते थे।

    वे ग्राहक को कहते थे कि उनके लिए ऐसी दवाइयां उपलब्ध हैं जो आमतौर पर बैन हैं या ऑनलाइन बेचना गैरकानूनी है। इसी बहाने उनसे डॉलर में भुगतान भी ले लिया जाता था।

    गिरफ्तार आरोपियों की पहचान

    पुलिस के अनुसार पकड़े गए पाँच आरोपी—

    • अयूब शेख (30)
    • फैजान भलीम (27)
    • फारुख शेख (29)
    • मोइन अहमद शेख (32)
    • ज़ीशान नासिर अंसारी (22)

    ये सभी मिलकर लंबे समय से ये फर्जीवाड़ा चला रहे थे।
    ये सभी मिलकर अमेरिका सहित कई देशों के लोगों को फंसाकर लाखों की ठगी कर रहे थे।

    कैसे करते थे ठगी? पुलिस ने खोला पूरा खेल

    • संदिग्ध वेबसाइट या डेटा के जरिए विदेशी ग्राहकों तक पहुँच बनाना
    • खुद को इंटरनेशनल ऑनलाइन फार्मेसी का अधिकारी बताना
    • मेडिकल कंसल्टेशन का झांसा देना
    • “बैन मेडिसिन उपलब्ध” कहकर ऑनलाइन पेमेंट वसूलना
    • पैसे लेने के बाद उत्पाद न भेजना

    यह पूरा नेटवर्क फार्मा से जुड़े अवैध कारोबार + साइबर फ्रॉड का कॉम्बिनेशन था।

    कौन-कौन सी धाराओं में केस दर्ज?

    बांगुर नगर पुलिस ने मामला दर्ज किया है—

    • BNS की धाराएँ 318(4), 319(2), 3(5)
    • IT Act 2000 की धाराएँ 66(A), 66(D), 75
    • Indian Telegraph Act की धारा 20

    पाँचों आरोपियों को 15 दिसंबर तक पुलिस कस्टडी में भेजा गया है।

    मालाड और मुंबई में बढ़ते साइबर फ्रॉड को लेकर पुलिस अलर्ट

    इस तरह के कॉल सेंटर लगातार मुंबई के कई इलाकों में पकड़े जा रहे हैं। विदेशी ग्राहकों को निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि—

    • वे दवाओं की कीमत ज़्यादा चुकाते हैं
    • वे शिकायत भारत में दर्ज नहीं करा पाते
    • वेरिफिकेशन की प्रक्रिया मुश्किल होती है

    पुलिस अब इस रैकेट से जुड़े और लोगों की तलाश कर रही है।


    FAQ

    1. क्या गिरफ्तार कॉल सेंटर वास्तव में दवाइयां सप्लाई करता था?

    नहीं, आरोपी सिर्फ भुगतान लेते थे और बाद में उत्पाद नहीं भेजते थे। यह पूरा रैकेट फर्जीवाड़ा था।

    2. क्या ग्राहकों को किसी तरह की मेडिकल प्रिस्क्रिप्शन की सुविधा दी जाती थी?

    वे खुद को इंटरनेशनल फार्मेसी बताकर नकली कंसल्टेशन की बात करते थे, जो पूरी तरह अवैध था।

    3. क्या इस रैकेट में और लोग शामिल हो सकते हैं?

    पुलिस के अनुसार यह एक बड़ा नेटवर्क हो सकता है, जिसकी जाँच जारी है।

    4. क्या विदेशी ग्राहक भारत में केस दर्ज कर सकते हैं?

    तकनीकी रूप से हाँ, लेकिन शिकायत प्रक्रिया जटिल होने के कारण अक्सर ठगी की रिपोर्ट नहीं होती।

  • मालवनी में अनधिकृत टर्फ पर रोक — नागरिकों के आंदोलन को बड़ी जीत

    मालवनी में अनधिकृत टर्फ पर रोक — नागरिकों के आंदोलन को बड़ी जीत

    मालाड–मालवनी के सार्वजनिक मैदान पर बनाए जा रहे अवैध टर्फ पर प्रशासन ने तत्काल रोक लगा दी है। यह फैसला स्थानीय नागरिकों, संस्थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लंबे संघर्ष और आंदोलन के बाद आया।

    मुंबई: मालाड़ पश्चिम के मालवनी गेट नंबर 8 स्थित में बस डेपो के पास, म्हाडा के सार्वजनिक खेल मैदान पर बन रहे अनधिकृत टर्फ को लेकर स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के संयुक्त आंदोलन को बड़ी सफलता मिली है। लगातार विरोध, शिकायतों और प्रशासनिक स्तर पर किए गए दबाव के बाद टर्फ निर्माण के कार्य को तत्काल प्रभाव से स्थगित कर दिया गया है। नागरिकों ने घोषणा की है कि मैदान पूरी तरह बच्चों, खिलाड़ियों और जनता के लिए खुला होने तक आंदोलन जारी रहेगा।

    🔹 प्रदर्शन के बाद रोक — आंदोलन बना निर्णायक

    मालाड–मालवनी के खुले सार्वजनिक मैदान पर कुछ लोगों द्वारा चुपचाप टर्फ निर्माण शुरू किया गया था, जिसकी जानकारी मिलते ही नागरिकों ने विरोध दर्ज कराया। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, म्हाडा, बीएमसी और सभी संबंधित विभागों को लिखित शिकायत देना शुरू किया और नियमित फ़ॉलोअप लिया।
    इसी फ़ॉलोअप के बाद सरकार ने विवादित टर्फ निर्माण कार्य पर तत्काल रोक लगाने का आदेश जारी किया।

    🔹 धमकियों के बावजूद संघर्ष जारी रखा

    सामाजिक कार्यकर्ताओं को आंदोलन रोकने के लिए कथित तौर पर झूठे फौजदारी मामलों में फंसाने की धमकियाँ भी दी गईं, लेकिन आंदोलनकारियों ने पीछे हटने से इंकार कर दिया। उनके साहस और नेतृत्व से स्थानीय युवाओं का मनोबल बढ़ा और आंदोलन व्यापक हो गया।

    🔹 राजनीतिक और सामाजिक संगठनों का समर्थन

    आंदोलन की ताकत लोगों के एकजुट होने से और बढ़ी।
    मुख्य रूप से— सामाजिक कार्यकर्ताओं ने म्हाडा कार्यालय और पुलिस स्टेशन में जाकर मजबूती से आपत्ति दर्ज की। संगठनों और नागरिकों के दबाव के बाद प्रशासन को तत्काल कार्रवाई करने पर मजबूर होना पड़ा।

    🔹 म्हाडा का सख्त संदेश — ‘एक ईंट भी रखी तो कार्रवाई’

    प्रशासन ने चेतावनी दी है कि भविष्य में मैदान पर एक ईंट भी रखी गई तो एमआरटीपी कानून लागू करके तुरंत कार्रवाई की जाएगी।
    लेकिन इसी बीच नागरिकों ने स्पष्ट कहा है कि—
    📌 मैदान पूरी तरह बच्चों और खिलाड़ियों के लिए वापस खुलने तक संघर्ष जारी रहेगा।


    ❓ FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

    Q1: मालवनी में टर्फ किस वजह से विवाद में था?
    टर्फ सार्वजनिक खेल मैदान पर बिना अनुमति और बिना नोटिस के बनाया जा रहा था, इसलिए स्थानीय लोगों ने उसे अवैध बताया।

    Q2: टर्फ निर्माण पर रोक क्यों लगाई गई?
    नागरिकों व सामाजिक संगठनों के विरोध, शिकायतों और आंदोलन के बाद प्रशासन ने कार्य रोकने का आदेश दिया।

    Q3: क्या यह मामला अब पूरी तरह खत्म हो गया है?
    प्रशासन ने रोक तो लगाई है, लेकिन नागरिकों का कहना है कि मैदान पूरी तरह बच्चों और खिलाड़ियों के लिए खुलने तक आंदोलन जारी रहेगा।

    Q4: टर्फ शुरू करने वालों पर कोई कानूनी कार्रवाई होगी?
    प्रशासन के अनुसार, यदि अब मैदान पर कोई निर्माण कार्य शुरू हुआ तो एमआरटीपी कानून के तहत तुरंत कार्रवाई की जाएगी।

  • एनयूएचएम कर्मचारियों को सीधे BMC में शामिल करने की मांग तेज

    एनयूएचएम कर्मचारियों को सीधे BMC में शामिल करने की मांग तेज

    मुंबई में राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य अभियान (NUHM) के 1200 कर्मचारियों ने बीएमसी में सीधी नियुक्ति की मांग उठाई। ठेकेदार पर वेतन, सुविधाओं और भत्तों में लापरवाही के आरोप।

    मुंबई: बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के अधीन राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य अभियान (NUHM) में 2016 से काम कर रहे करीब 1200 कर्मचारियों ने ठेकेदार डी.एस. इंटरप्रायज़ेस को हटाकर उन्हें सीधे बीएमसी के पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट में शामिल करने की मांग की है। कर्मचारियों का आरोप है कि वर्षों की सेवा के बावजूद उन्हें न वेतनवृद्धि, न पीएफ, न मेडिकल सुविधा और न ही कोरोना काल में मिला भत्ता नही दिया गया है।

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    क्या है पूरा मामला?

    महाराष्ट्र सरकार के स्वास्थ्य विभाग की ओर से पूरे राज्य में एनयूएचएम चलाया जाता है। मुंबई में यह सभी कर्मचारी बीएमसी के अधीन स्वास्थ्य सेवाओं में तैनात हैं।

    लेकिन दूसरी महानगरपालिकाओं की तरह सीधे नियुक्ति करने की बजाय बीएमसी ने डी.एस. इंटरप्रायज़ेस नामक ठेकेदार को जिम्मेदारी दी, जिसने निविदा के अनुसार कर्मचारी रखे।

    कर्मचारियों का कहना है कि—

    • 2016 से लगातार स्वास्थ्य सेवाओं में योगदान
    • कोरोना महामारी में राउंड द क्लॉक काम
    • कम वेतन में मुंबई जैसे महंगे शहर में गुज़ारा बेहद मुश्किल
    • ठेकेदार की ओर से किसी भी प्रकार की सहयोग सुविधा नहीं
    • मासिक खर्च, बच्चों की पढ़ाई और चिकित्सा खर्च पूरा करना कठिन

    सुविधाओं को लेकर गंभीर आरोप

    कर्मचारियों ने बताया कि डी.एस. इंटरप्रायज़ेस ने श्रम कानून और कॉन्ट्रैक्ट शर्तों का पालन नहीं किया।

    कर्मचारियों को नहीं मिल रही ये सुविधाएँ—

    • वेतनवृद्धि
    • प्रसूति अवकाश
    • पीएफ (Provident Fund)
    • स्वास्थ्य बीमा योजना
    • कोरोना भत्ता (विशेषकर डेटा ऑपरेटरों के लिए)

    कर्मचारियों ने कहा कि कोरोना के दौरान कई साथी बीमार हुए, फिर भी प्रशासन और ठेकेदार की ओर से न कोई आर्थिक सहायता और न ही विशेष सुविधा दी गई।

    ‘मुंबई में इतने कम वेतन में जीना मुश्किल’

    कर्मचारियों का कहना है कि मुंबई जैसे महंगे शहर में इतनी कम तनख्वाह पर परिवार चलाना लगभग नामुमकिन हो रहा है। हर महीने—

    • घर किराया
    • बच्चों की फीस
    • मेडिकल खर्च
    • रोजमर्रा का खर्च

    इन सबके बीच गुज़ारा मुश्किल होता जा रहा है।

    यूनियन की मांग— बीएमसी में सीधी नियुक्ति

    म्युनिसिपल कर्मचारी कामगार सेना द्वारा उठाई गई मुख्य मांग—

    ठेकेदार हटाकर 1200 कर्मचारियों को बीएमसी के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग में सीधे शामिल किया जाए।

    यूनियन का कहना है कि कर्मचारियों ने हमेशा ईमानदारी से काम किया है, इसलिए उन्हें स्थाई या कम से कम सीधे नगरपालिका ढांचे में शामिल किया जाना चाहिए।


    FAQ

    Q1. एनयूएचएम कर्मचारी बीएमसी से क्या मांग कर रहे हैं?

    वे चाहते हैं कि ठेकेदार को हटाकर उन्हें सीधे बीएमसी के पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट में शामिल किया जाए।

    Q2. कर्मचारियों की मुख्य शिकायतें क्या हैं?

    पीएफ, मेडिकल सुविधा, वेतनवृद्धि, प्रसूति अवकाश और कोरोना भत्ता जैसी मूलभूत सुविधाएँ न मिलना।

    Q3. कितने कर्मचारी इस अभियान के तहत काम करते हैं?

    करीब 1200 कर्मचारी 2016 से लगातार सेवा दे रहे हैं।

    Q4. कोरोना काल में उन्हें क्या दिक्कतें आईं?

    उन्होंने बिना रुके काम किया लेकिन कोरोना भत्ता नहीं मिला, और बीमारी के समय सहायता भी नहीं मिली।

  • कांदिवली में मनपा अभियंता अभय जगताप पर सवाल — अवैध निर्माण पर कार्रवाई से क्यों कर रहे हैं इंकार?

    कांदिवली में मनपा अभियंता अभय जगताप पर सवाल — अवैध निर्माण पर कार्रवाई से क्यों कर रहे हैं इंकार?

    मुंबई के कांदिवली (पश्चिम) आर/दक्षिण वार्ड में प्रभारी अभियंता अभय जगताप पर गंभीर आरोप लगे हैं। स्थानीय नागरिकों और विधायक के आदेश के बावजूद अवैध निर्माण पर कार्रवाई न करने से लोग नाराज़ हैं। सवाल उठ रहा है — क्या कानून से ऊपर हैं कार्यकारी अभियंता एवं डी. ओ. अभय जगताप?

    मुंबई: कांदिवली (पश्चिम) में स्थित मनपा आर/दक्षिण वार्ड कार्यालय में तैनात (प्रभारी) कार्यकारी अभियंता एवं डी.ओ. अभय जगताप पर स्थानीय नागरिकों और समाजसेवियों ने गंभीर आरोप लगाए हैं।
    निवासियों का आरोप है कि वार्ड के अंतर्गत आने वाले सागवाडी आदिवासी पाड़ा, समाज मंदिर के पास अवैध निर्माण होने के बावजूद, जगताप कार्रवाई से बच रहे हैं।

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    लोगों का कहना है कि उन्होंने सार्वजनिक शौचालय और बोरिंग के लिए मांग की थी, जिसको लेकर 10 लाख रुपये सरकारी फंड भी पास किया गया। लेकिन उस पर कुछ लोगों ने तीन अवैध कमरे बना लिए। विधायक और सहाय्यक आयुक्त के आदेश के बाद भी तोड़क कार्रवाई नहीं की गई, जिससे नागरिकों में नाराज़गी है।

    सार्वजनिक शौचालय के लिए दी गई भूमि पर हुआ कब्ज़ा

    स्थानीय नागरिकों ने बताया कि क्षेत्र में शौचालय की सुविधा नहीं होने के कारण उन्हें काफी परेशानी होती है। इसी वजह से गुरुचरण की भूमि पर शौचालय निर्माण के लिए आवेदन किया गया था। लेकिन कुछ अराजक तत्वों ने मौके का फायदा उठाकर वहाँ तीन अवैध रूम बना लिए।

    नागरिकों ने इस संबंध में तत्कालीन सहाय्यक आयुक्त मनीष साल्वे को पत्र लिखा और अवैध निर्माण हटाने की मांग की। इसके साथ ही, विधायक योगेश सागर ने भी मनपा को पत्र भेजकर कार्रवाई का अनुरोध किया।

    अभय जगताप पर मिलीभगत के आरोप

    स्थानीय लोगों का कहना है कि (प्रभारी) कार्यकारी अभियंता एवं डी.ओ. अभय जगताप ने वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों की जानबूझकर अवहेलना की है। आरोप है कि उन्होंने अवैध निर्माणकर्ताओं से पैसे लेकर कार्रवाई रोक दी है। स्थानीयों के अनुसार, जगताप का रवैया मनमाना है और वे कहते हैं —

    “मेरी मर्जी है, कोई काम करूं या न करूं। मेरा क्या बिगाड़ लेंगे अधिकारी या विधायक?”

    यह बात न केवल प्रशासनिक अनुशासनहीनता को दर्शाती है बल्कि मनपा की साख पर भी सवाल उठाती है।

    सहाय्यक आयुक्त और विधायक के आदेशों की अनदेखी

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    सूत्रों के मुताबिक, विधायक योगेश सागर ने खुद सहाय्यक आयुक्त से फोन पर बात कर कार्रवाई के निर्देश दिए, लेकिन कोई कदम नहीं उठाया गया।
    अभय जगताप का कहना है कि यह मामला अब वर्तमान सहाय्यक अभियंता शिशिर खोखले या पूर्व अभियंता ब्रह्मणकार को देखना चाहिए। जबकि ब्रह्मणकर का तबादला हो चुका है।
    हालांकि जगताप का यह बयान जिम्मेदारी से बचने की कोशिश मानी जा रही है।

    स्थानीय समाज का विरोध — कार्रवाई की मांग

    इस पूरे मामले में आदिवासी समाज और स्थानीय महिलाएं खुलकर विरोध में उतर आई हैं।
    चंदू बंजारा, गोपाल, अजय, कमल काली, दिनेश और कई अन्य लोगों ने पत्रकार को बुलाकर आदिवासी समाज मंदिर के पास बने अवैध निर्माण के खिलाफ अपनी बात रखी।
    उनका कहना है कि अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई तो वे मनपा कार्यालय के बाहर प्रदर्शन करेंगे।
    इसी सिलसिले में अखिल भारतीय मानवाधिकार नागरिक विकल्प के मुंबई उपाध्यक्ष राजेश किसन मंजाळ से मुलाकात की तो उन्होंने और भी चौकाने वाला खुलासा किया मनपा आर/ दक्षिण विभाग के इमारत व कारखाना विभाग की ओर से शिकायत क्रमांक RS/022/14- 12 – 2024/333 से संबंधित राजेश पवार के खिलाफ नोटिस क्रमांक RS/DO1RS/022/351-MMC ACT/RS333NO1/16-12-2024 जारी किया गया है। इससे साफ जाहिर होता है कि भ्रष्ट प्रभारी कार्यकारी अभियंता एवं डी.ओ. अभय जगताप ने यहां रिश्वतखोरी की हुई है।

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    निवासियों ने मांग की है कि

    “सबसे पहले भ्रष्ट प्रभारी कार्यकारी अभियंता एवं डी.ओ. अभय जगताप के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो और फिर अवैध निर्माण पर बुलडोजर चले।”

    कनिष्ठ अभियंता पर भी सवाल — ‘जगताप से क्यों डरते हैं अधिकारी?’

    सूत्र बताते हैं कि जब से अभय जगताप प्रभारी डी.ओ. बने हैं, वे अपने अधीनस्थ अधिकारियों को धमकाते और दबाव डालते हैं।
    कई अधिकारी उनके खिलाफ बोलने से डरते हैं।
    स्थानीयों का कहना है कि तत्कालीन कनिष्ठ अभियंता नितिन ठाकुर ही इस मामले की सच्चाई बता सकते हैं कि आखिर “जगताप का डर” इतना क्यों है? लेकिन उनका भी तबादला हो गया है।


    FAQ

    Q1. मामला किस इलाके का है?
    A1. कांदिवली (पश्चिम) आर/दक्षिण वार्ड, पटेल नगर रोड नंबर 4 का मामला है।
    Q2. विवाद किस बात को लेकर है?
    A2. नागरिकों द्वारा दी गई भूमि पर अवैध निर्माण हुआ है, जिस पर कार्रवाई नहीं की गई।
    Q3. किस अधिकारी पर आरोप लगे हैं?
    A3. प्रभारी कार्यकारी अभियंता एवं डी.ओ. अभय जगताप पर।
    Q4. क्या विधायक और मनपा अधिकारी इस मामले में शामिल हुए?
    A4. हाँ, विधायक योगेश सागर और तत्कालीन सहाय्यक आयुक्त मनीष साल्वे दोनों ने कार्रवाई का आदेश दिया था।
    Q5. नागरिकों की क्या मांग है?
    A5. अभय जगताप के खिलाफ जांच और दंडात्मक कार्रवाई, साथ ही अवैध निर्माण का तुरंत तोड़फोड़ अभियान।

  • दहिसर का रिटायर्ड पुलिस अधिकारी पासपोर्ट फर्जीवाड़े में गिरफ्तार

    दहिसर का रिटायर्ड पुलिस अधिकारी पासपोर्ट फर्जीवाड़े में गिरफ्तार

    मुंबई के दहिसर पुलिस स्टेशन में दर्ज पासपोर्ट फर्जीवाड़े के मामले में एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी को गिरफ्तार किया गया है। आरोप है कि उन्होंने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट की मंजूरी दी।

    मुंबई: दहिसर पुलिस ने एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी संजय जगताप को पासपोर्ट से जुड़ी धोखाधड़ी के मामले में गिरफ्तार किया है। दहिसर पुलिस स्टेशन में दर्ज मामले मे गिरफ्तार आरोपी पर यह आरोप है कि उन्होंने एक व्यक्ति से पासपोर्ट प्रक्रिया में मदद का झांसा देकर धोखाधड़ी की।

    शिकायत के अनुसार, आरोपी ने बिना उचित दस्तावेजों की जांच किए पासपोर्ट आवेदन को स्वीकृत कर दिया। बाद में जब जांच हुई तो जमा किए गए दस्तावेज फर्जी पाए गए, जिसके बाद पीड़ित ने पुलिस से शिकायत दर्ज कराई।

    एफआईआर में गंभीर धाराएं

    जांच के बाद 26 मार्च 2025 को आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 465, 467, 468, 471, 120(B) के तहत दर्ज हुआ है। इसके अलावा, पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 12 भी इसमें जोड़ी गई है।

    रिटायर्ड पुलिसकर्मी का नाम आया सामने

    जांच के दौरान यह सामने आया कि आरोपी हेड कॉन्स्टेबल संजय जगताप थे, जो उस समय दहिसर पुलिस स्टेशन में तैनात थे। बाद में उनकी मालाड पुलिस स्टेशन में बदली हो गई। महत्वपूर्ण बात यह है कि जगताप 31 अक्टूबर 2025 को सेवानिवृत्त हुए, और सेवानिवृत्ति के कुछ ही दिनों बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

    जमानत याचिका खारिज, पुलिस हिरासत में भेजा गया

    आरोपी ने गिरफ्तारी से पहले हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के लिए आवेदन दिया था, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
    इसके बाद 4 नवंबर 2025 को पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और अदालत में पेश किया।
    कोर्ट ने आरोपी को पुलिस हिरासत में भेज दिया है।

    पुलिस कर रही है आगे की जांच

    मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) और पासपोर्ट प्राधिकरण मिलकर यह जांच कर रहे हैं कि क्या इस घोटाले में अन्य लोग भी शामिल हैं।
    साथ ही, पासपोर्ट जारी करने में इस्तेमाल किए गए फर्जी दस्तावेजों की तकनीकी जांच भी की जा रही है।


    FAQ

    Q1. यह मामला कब दर्ज किया गया था?
    यह मामला 26 मार्च 2025 को दहिसर पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया।
    Q2. आरोपी कौन है?
    सेवानिवृत्त पुलिस हेड कॉन्स्टेबल संजय जगताप, जो पहले दहिसर थाने में तैनात थे।
    Q3. किस आधार पर गिरफ्तारी हुई?
    आरोपी ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट आवेदन मंजूर किया था।
    Q4. कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
    कोर्ट ने आरोपी को 6 नवंबर तक पुलिस हिरासत में भेजा है।
    Q5. क्या आरोपी को जमानत मिली?
    नहीं, उनकी अग्रिम जमानत याचिका हाई कोर्ट ने खारिज कर दी थी।

  • बॉम्बे हाईकोर्ट में महाराष्ट्र सरकार का बयान: दिव्यांगों को दिए गए “खराब ई-रिक्शा” की होगी जांच

    बॉम्बे हाईकोर्ट में महाराष्ट्र सरकार का बयान: दिव्यांगों को दिए गए “खराब ई-रिक्शा” की होगी जांच

    महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट को आश्वासन दिया है कि वह दिव्यांग व्यक्तियों को दिए गए ई-रिक्शों की तकनीकी जांच करवाएगी। कई लाभार्थियों ने आरोप लगाया था कि सरकार की योजना के तहत मिले वाहन “खराब” और “असुरक्षित” हैं।

    मुंबई: महाराष्ट्र सरकार के समाज कल्याण विभाग की एक योजना के तहत दिव्यांग लोगों को ई-रिक्शा (e-rickshaw) दिए गए थे ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।
    लेकिन अब इन वाहनों की गुणवत्ता और सुरक्षा पर सवाल उठ गए हैं।

    लगभग 115 दिव्यांग लाभार्थियों ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि उन्हें जो ई-रिक्शे मिले हैं, वो “खराब हालत में” हैं और चलाने के लायक नहीं हैं।
    इन शिकायतों के बाद कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा — और अब सरकार ने कहा है कि वह तकनीकी जांच कराएगी और रिपोर्ट पेश करेगी।

    योजना की शुरुआत और खर्च

    इस योजना की शुरुआत 10 जून 2019 को समाज न्याय विभाग (Social Justice Department) के एक सरकारी निर्णय (GR) से हुई थी।
    इस योजना के तहत लगभग 800 ई-रिक्शे दिव्यांग व्यक्तियों को 20 करोड़ रुपये की लागत से बांटे गए थे।
    योजना का नाम था —
    “Green Energy Powered Environment-Friendly Mobile Shop for Disabled Persons to Become Self-Reliant”

    लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कई वाहन तकनीकी रूप से दोषपूर्ण हैं और इनमें सुरक्षा संबंधी खामियां हैं।

    कोर्ट में क्या हुआ?

    15 अक्टूबर को जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और जस्टिस संदीश डी. पाटिल की डिवीजन बेंच ने इस मामले की सुनवाई की।
    याचिकाकर्ताओं की तरफ से वकील असीम सरोदे और श्रिय आळवे ने कहा कि सरकार ने उन्हें “डिफेक्टिव” यानी खराब वाहन देकर उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया है।

    उन्होंने यह भी मांग की कि

    • एक स्वतंत्र जांच एजेंसी नियुक्त की जाए,
    • और सरकारी खरीद प्रक्रिया (procurement process) की जांच की जाए ताकि यह पता चल सके कि क्या ई-रिक्शा की खरीद में गड़बड़ी हुई थी।

    सरकार और कंपनी का जवाब

    सरकार की ओर से एडिशनल गवर्नमेंट प्लीडर भूपेश सामंत ने कोर्ट को बताया कि
    Maharashtra State Handicapped Finance and Development Corporation (MSHFDC) हर जिले में एक तकनीकी अधिकारी नियुक्त करेगी जो इन ई-रिक्शों की जांच करेगा।

    वहीं, सप्लायर कंपनी Mac Auto India ने भी कहा कि वह सिर्फ इन 115 याचिकाकर्ताओं के नहीं, बल्कि सभी लाभार्थियों के वाहनों की मरम्मत या जांच करेगी।

    कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि वह तकनीकी रिपोर्ट नवंबर 19, 2025 तक पेश करे और इस पूरी जांच में सोशल जस्टिस डिपार्टमेंट पूरा सहयोग करे।

    आरोप क्या हैं?

    • याचिकाकर्ताओं ने कहा कि ई-रिक्शे कमज़ोर बॉडी और घटिया पार्ट्स से बने हैं।
    • कई वाहनों की बैटरी और मोटर कुछ ही महीनों में फेल हो गई।
    • सरकार ने बाजार मूल्य से अधिक दरों पर खरीदारी की है।
    • कोई बाद की सर्विस या मेंटेनेंस सपोर्ट नहीं दिया गया।

    अदालत की टिप्पणी

    कोर्ट ने पहले ही 3 अक्टूबर को कहा था कि याचिकाकर्ताओं की शिकायतें गंभीर और सटीक लगती हैं।
    अब अदालत इस बात पर नज़र रखेगी कि सरकार और कंपनी जांच में पारदर्शिता बरतती है या नहीं।

    दिव्यांगों की पीड़ा

    दिव्यांग लोगों का कहना है कि ये ई-रिक्शे आजीविका का एकमात्र साधन हैं।
    “खराब वाहन” मिलने की वजह से उनकी रोज़मर्रा की कमाई ठप पड़ गई है।
    कई लोगों को कर्ज चुकाने में मुश्किल हो रही है क्योंकि उन्होंने वाहन पर लोन लिया था।


    FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

    Q1. मामला किस बारे में है?
    ➡️ दिव्यांग लाभार्थियों को सरकार की योजना के तहत दिए गए ई-रिक्शे खराब निकले, जिस पर बॉम्बे हाईकोर्ट में मामला चल रहा है।

    Q2. कितने लोगों ने याचिका दायर की है?
    ➡️ लगभग 115 दिव्यांग व्यक्तियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है।

    Q3. योजना कब शुरू हुई थी?
    ➡️ यह योजना 10 जून 2019 को समाज न्याय विभाग के आदेश से शुरू की गई थी।

    Q4. क्या सरकार ने जांच के लिए हामी भरी है?
    ➡️ हां, महाराष्ट्र सरकार ने कहा है कि वह सभी ई-रिक्शों की तकनीकी जांच करवाएगी।

    Q5. अगली सुनवाई कब होगी?
    ➡️ अगली सुनवाई 19 नवंबर 2025 को निर्धारित की गई है।

  • गोरगांव में पानी की किल्लत पर उद्धव सेना का ‘बाल्टी मोर्चा’, नगर निगम को दी चेतावनी

    गोरगांव में पानी की किल्लत पर उद्धव सेना का ‘बाल्टी मोर्चा’, नगर निगम को दी चेतावनी

    गोरगांव पश्चिम में पानी की किल्लत से परेशान लोगों ने उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना के साथ मिलकर ‘बाल्टी मोर्चा’ निकाला। मोर्चे में बड़ी संख्या में नागरिकों ने हिस्सा लिया और BMC को चेतावनी दी कि अगर पानी की समस्या हल नहीं हुई तो आंदोलन और तेज होगा।

    मुंबई: गोरगांव (पश्चिम) में लगातार बढ़ती पानी की किल्लत को लेकर उद्धव ठाकरे गट की शिवसेना (UBT) ने रविवार को एक ज़ोरदार ‘बाल्टी मोर्चा’ निकाला। यह मोर्चा प्रभाग क्रमांक 52 में पानी की कमी के विरोध में संदीप गाढवे की अगुवाई में आयोजित किया गया। इस दौरान नागरिकों ने खाली बाल्टियां लेकर BMC के खिलाफ नारे लगाए और प्रशासन को चेतावनी दी कि अगर जल्द समाधान नहीं मिला, तो आंदोलन और उग्र होगा।

    💧 ‘पानी आमचा हक्काचा, नाही कोणाच्या बापाचा’ — नारों से गूंजा इलाका

    मोर्चे में शामिल नागरिकों ने “पानी आमचा हक्काचा, नाही कोणाच्या बापाचा!” और “आमच्या मागण्या पूर्ण करा!” जैसे नारे लगाते हुए विरोध जताया।
    आंदोलन के दौरान दीपक परब नामक नागरिक ने BMC के गेट के सामने प्रतीकात्मक रूप से नहा कर प्रशासन पर तंज कसा।

    मोर्चा खत्म होने के बाद संदीप गाढवे के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने सहायक आयुक्त अजय पाटणे से मुलाकात की और इलाके में चल रही पानी की समस्या पर चर्चा की।

    🏘️ नागरिकों की मुख्य मांगें क्या हैं?

    1. बंगाली कंपाउंड इलाके में कम दबाव से आने वाले पानी की समस्या का तुरंत समाधान किया जाए।
    2. पानी छोड़ने का समय घटाने का निर्णय वापस लिया जाए और पुरानी टाइमिंग बहाल की जाए।
    3. कन्यापाड़ा इलाके में दलालों के ज़रिए नल कनेक्शन के लिए वसूली की जा रही है — उसकी जांच की जाए।
    4. इलाके के बिल्डरों को कैसे और कितना पानी दिया जा रहा है, इसकी गहराई से जांच हो।
    5. आरे कॉलोनी यूनिट 32 का पंप शुरू किया जाए ताकि यूनिट 31 और 32 के नागरिकों को राहत मिल सके।
    6. साईबाबा कॉम्प्लेक्स की साई सदन इमारत में चल रही पानी की समस्या का स्थायी समाधान निकाला जाए।

    👥 मोर्चे में किसने लिया हिस्सा?

    इस आंदोलन में कई स्थानीय नेता और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए, जिनमें—
    पूर्व नगरसेविका सुगंधा शेट्टी, दीपक परब, निलाक्षी भाबळ, विनायक ताटे, स्वाती शिर्के, सचिन सावंत, सुभाष जाधव, विजय मांजळकर, कुबेर लाड, शांताराम सावंत, विरेंद्र सोनावने और वर्षा पवार समेत बड़ी संख्या में शिवसैनिक, युवासेना और महिला सेना की कार्यकर्ता मौजूद थीं।

    गोकुलधाम, बंगाली कंपाउंड, कन्यापाड़ा, साईबाबा कॉम्प्लेक्स, आरे कॉलोनी और बंजारी पाड़ा जैसे इलाकों के नागरिकों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

    🏛️ शिवसेना (UBT) का संदेश प्रशासन को

    संदीप गाढवे ने मीडिया से बातचीत में बताया

    “अब BMC को भी समझना चाहिए कि पानी कोई मेहरबानी नहीं, बल्कि नागरिकों का हक है। अगर जल्द समाधान नहीं निकला तो शिवसेना (UBT) सड़कों पर उतरने से पीछे नहीं हटेगी।”


    FAQ सेक्शन

    Q1. गोरगांव में उद्धव सेना का बाल्टी मोर्चा क्यों निकाला गया?
    👉 पानी की किल्लत और कम दबाव से पानी आने की समस्या के विरोध में यह मोर्चा आयोजित किया गया।

    Q2. इस आंदोलन का नेतृत्व किसने किया?
    👉 प्रभाग 52 के शाखा प्रमुख संदीप गाढवे ने आंदोलन का नेतृत्व किया।

    Q3. नागरिकों की मुख्य मांग क्या है?
    👉 नियमित और पर्याप्त पानी आपूर्ति शुरू करना और दलालों द्वारा नल कनेक्शन में की जा रही वसूली की जांच करना।

    Q4. प्रशासन से कौन मिला?
    👉 एक शिष्टमंडल ने सहायक आयुक्त अजय पाटणे से मुलाकात की और समस्या पर चर्चा की।

  • दो बातें न्याय और अवसरवाद की: पेट्रोल-डीजल की लूट से लेकर दलितों पर अत्याचार तक — सवालों में घिरी सरकार और मायावती की चुप्पी

    दो बातें न्याय और अवसरवाद की: पेट्रोल-डीजल की लूट से लेकर दलितों पर अत्याचार तक — सवालों में घिरी सरकार और मायावती की चुप्पी

    भारत में पेट्रोल और रसोई गैस के बढ़ते दामों पर जनता सवाल उठा रही है। वहीं दलितों पर हो रहे अत्याचारों पर बसपा सुप्रीमो मायावती की चुप्पी भी चर्चा में है। सरकार की नीतियों और विपक्ष की चुप्पी पर उठे दो बड़े सवाल।

    मुंबई: भारत में लगातार बढ़ते पेट्रोल और रसोई गैस के दामों ने आम जनता की कमर तोड़ दी है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम घटे हैं, तो घरेलू बाजार में राहत क्यों नहीं मिल रही? वहीं दूसरी ओर, दलितों पर हो रहे अत्याचार और दलित अधिकारियों की आत्महत्याओं जैसे गंभीर मामलों पर बसपा सुप्रीमो मायावती की चुप्पी भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। ऐसे में जनता के बीच दो बड़े सवाल गूंज रहे हैं — एक न्याय और लूट के नाम पर सरकार की नीतियों पर, और दूसरा अवसरवाद की राजनीति पर।

    💸 पहली बात – पेट्रोल-डीजल के नाम पर लूट, जनता परेशान

    देश में पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं जबकि सरकार दावा करती है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम घटे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि भूटान में पेट्रोल ₹65 लीटर है और भारत में ₹105।

    केंद्र सरकार भारत से पेट्रोल और डीजल भूटान जैसे देशों को सस्ता भेजती है, जबकि अपने ही नागरिकों पर टैक्स का बोझ बढ़ाती है।
    असल में, विशेषज्ञों का कहना है कि पेट्रोल भारत में मात्र ₹35 प्रति लीटर पड़ता है, बाकी रकम टैक्स और सेस के रूप में जनता से वसूली जाती है।

    🏦 कांग्रेस के जमाने में तेल महंगा, लेकिन जनता पर बोझ कम

    कांग्रेस सरकार के वक्त जब कच्चा तेल $110 प्रति बैरल था, तब पेट्रोल ₹65 और रसोई गैस ₹550 में मिलती थी।
    आज कच्चा तेल सिर्फ $70 प्रति बैरल है, फिर भी पेट्रोल ₹105 और गैस ₹1200 से ऊपर क्यों है?

    सरकार ने हाल ही में ₹200 कम करके राहत का ढोंग किया, लेकिन असल में यह जनता को बेवकूफ़ बनाने की कोशिश लगती है।

    ⚙️ एथेनॉल की मिलावट – जनता के साथ धोखाधड़ी?

    सरकार बिना जनता को बताए पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिला रही है, और उसे उसी रेट पर बेच रही है।
    यह फैसला जनता के लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है क्योंकि एथेनॉल के कारण वाहनों की माइलेज घट रही है, और इंजन पार्ट्स जल्दी खराब हो रहे हैं।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक अगस्त में वाहन रखरखाव खर्च 28% था, जो अक्टूबर में बढ़कर 52% हो गया है।
    पुरानी गाड़ियां एथेनॉल के लिए बनी ही नहीं हैं, लेकिन सरकार ने शुद्ध पेट्रोल (Pure Petrol) का विकल्प ही खत्म कर दिया है।

    🚘 नेताओं के शाही काफिले और जनता की जेब पर वार

    जनता हर दिन महंगे पेट्रोल से परेशान है, लेकिन नेता और मंत्री सरकारी वाहनों में शाही अंदाज़ में घूम रहे हैं।
    कई नेता 20-25 गाड़ियों के काफिले में जनता के टैक्स का पेट्रोल उड़ाते हैं और खुद को जनता का सेवक कहते हैं।

    क्या यही है लोकतंत्र? जनता को त्याग करने की सलाह देने वाले नेता खुद ऐश कर रहे हैं।

    🧾 सरकार को जवाब देना होगा – एथेनॉल मिलावट से किसे फायदा?

    जनता का आरोप है कि एथेनॉल से जो मुनाफा हो रहा है, उसका फायदा मंत्रियों के बेटों और निजी कंपनियों को मिल रहा है
    क्या जनता का गला घोंटकर बेटों को अरबपति बनाना जनसेवा है? सरकार ने बिना पूर्व सूचना पेट्रोल में एथेनॉल मिलाकर पारदर्शिता की हत्या की है।

    दूसरी बात – मायावती की चुप्पी और दलितों पर अत्याचार

    जहां एक ओर देश में दलितों पर अत्याचार बढ़ रहे हैं, वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती पर चुप्पी साधने के आरोप लग रहे हैं।

    दलित IAS अफसर आत्महत्या कर रहे हैं, गरीब दलितों की पीट-पीट कर हत्याएं हो रही हैं, लेकिन मायावती का कोई बयान सामने नहीं आता।

    ⚖️ राजनीति या अवसरवाद? बीजेपी की तारीफ में व्यस्त मायावती

    बीजेपी सरकार, खासकर उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ की मायावती बार-बार प्रशंसा करती हैं।
    कभी भाजपा को कोसने वाली मायावती आज भाजपा की मौन सहयोगी बन चुकी हैं।

    वहीं, इंडिया एलायंस संविधान और लोकतंत्र बचाने की लड़ाई लड़ रहा है, लेकिन मायावती हर सीट पर चुनाव लड़कर विपक्ष को कमजोर कर रही हैं।

    💬 दलितों के मुद्दों पर मायावती की खामोशी क्यों?

    डॉ. आंबेडकर और कांशीराम की विचारधारा पर राजनीति करने वाली मायावती आज उन्हीं के नाम पर राजनैतिक सौदेबाजी कर रही हैं।
    राहुल गांधी जहां हर दलित पीड़ित परिवार से मिल रहे हैं, वहीं मायावती मौन साधे हैं।

    राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि मायावती की चुप्पी उनकी अवैध संपत्ति बचाने की रणनीति है।
    उन्हें डर है कि अगर उन्होंने सरकार के खिलाफ बोला तो सीबीआई और ईडी उनके पीछे लग जाएगी।

    🗣️ जनता पूछ रही है – क्या यही लोकतंत्र है?

    जब आम जनता महंगाई से कराह रही है, और दलित समाज अन्याय झेल रहा है, तब बड़े नेता और सरकार दोनों मौन हैं।
    जनता पूछ रही है —

    “क्या अब लोकतंत्र सिर्फ सत्ता और धन बचाने का माध्यम बन गया है?”


    FAQ सेक्शन

    Q1. भूटान में पेट्रोल सस्ता और भारत में महंगा क्यों है?
    👉 भारत में टैक्स और सेस बहुत ज्यादा है, जिससे कीमतें 100 रुपए पार हैं।

    Q2. क्या एथेनॉल मिलावट से वाहनों को नुकसान होता है?
    👉 हां, खासकर पुरानी गाड़ियों में माइलेज घटती है और पार्ट्स जंग लगते हैं।

    Q3. मायावती दलित मुद्दों पर चुप क्यों हैं?
    👉 राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, वे सरकार से टकराव से बचना चाहती हैं।

    Q4. क्या सरकार जनता को सस्ते तेल का फायदा देती है?
    👉 नहीं, सरकार कम कीमत पर कच्चा तेल खरीदकर भी टैक्स बढ़ाकर जनता को राहत नहीं देती।

    Q5. क्या एथेनॉल मुनाफा राजनीतिक परिवारों को जा रहा है?
    👉 आरोप यही हैं कि एथेनॉल कंपनियों से राजनीतिक संबंध जुड़े हैं।

  • कांदीवली पश्चिम: मनपा अभियंता पंकज पाचर्ने पर चार मंजिला अवैध गाला निर्माण और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप

    कांदीवली पश्चिम: मनपा अभियंता पंकज पाचर्ने पर चार मंजिला अवैध गाला निर्माण और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप

    कांदीवली के शांति नगर में चार मंजिला अवैध गाला निर्माण की कहानी; आरोप है कि मनपा के भ्रष्ट कनिष्ठ अभियंता पंकज पाचर्ने निर्माण कराने वालों से वसूली करते हैं, शिकायत करने वालों को धमकाया जाता है। क्या वॉर्ड ऑफिसर आरती गोळेकर और डीएमसी संजय कुर्हाड़े इस पर कानूनी कार्रवाई करेंगे?

    मुंबई: शांति नगर, गली नंबर-2, कांदीवली (पश्चिम) मुंबई – 400067 में ग्राउंड प्लस तीन (चार मंजिला) बड़ा कॉमर्शियल गाला लगभग तैयार हो चुका है, जो स्थानीय लोगों और प्रशासनिक मानकों की चिंता का विषय बन गया है। आरोप है कि यह सभी निर्माण कार्य मनपा के इमारत व कारखाना विभाग के भ्रष्ट कनिष्ठ अभियंता पंकज पाचर्ने की विशेष कृपा से किया गया है। विभागीय कार्रवाई न होने के कारण शिकायतकर्ता और निवासियों में भारी नाराज़गी है।

    अवैध गाला निर्माण के आरोप

    स्थानीय लोगों का कहना है कि इस गाले का निर्माण शुरुआत से ही नियमों का उल्लंघन करते हुए हुआ है। भूमि स्वामित्व, नक्शे की मंजूरी, निर्माण परमिट — इन सभी की आधिकारिक ऑनलाइन-रिकॉर्ड या कागज़ी अनुमति नहीं मिली है या यदि मिली है, तो विकल्पों एवं प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है।

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    अवैध निर्माण की तस्वीर
    • निर्माण अनुमति और परमिट: स्थानीय निवासियों द्वारा आरोप लग रहे हैं कि इमारत का नक्शा और निर्माण परमिट मानसून, भू-परिमाण, इमारत सुरक्षा आदि नियमों के अनुरूप नहीं हैं।
    • एनओसी एवं विभागीय निगरानी: इमारत व कारखाना विभाग या अन्य संबंधित विभागों द्वारा कोई सार्वजनिक सूचना नहीं आई कि कार्रवाई होगी। शिकायतों पर मौखिक प्रतिक्रियाएँ तो मिलीं, लेकिन लिखित शिकायत का क्या हुआ, इसकी जानकारी नहीं है।

    भ्रष्टाचार के आरोप और वसूली की कथाएँ

    स्थानीयों और शिकायतकर्ताओं ने जो कहानी बयान की है, उसके मुताबिक:

    • विशेष कृपा — लोगों का आरोप है कि अभियंता पंकज पाचर्ने इन अवैध गाला ठेकेदारों को संरक्षण देते हैं, और इसके बदले में मनमानी रकम लेते हैं।
    • वसूली का तरीका: यदि कोई स्थानीय मौखिक रूप से शिकायत करता है, तो अभियंता लिखित शिकायत की सलाह देते हैं और फिर शिकायत दर्ज कराते समय शिकायतकर्ता का नाम-पता ठेकेदारों को दे दिया जाता है।
    • धमकियाँ और डर: शिकायतकर्ता कहते हैं कि नाम पता निकल जाने से उन्हें जान-माल का खतरा रहता है, जिससे लोग शिकायत करने से डरते हैं।
    • कार्रवाई नहीं: शिकायत की लिखित प्रति ठेकेदार को दिखा कर वसूली की जाती है, लेकिन विभागीय कार्रवाई नहीं होती, न तो मुआवज़ा होता है, न विधिक प्रक्रिया पूरी होती है।

    प्रभावित लोग और सामाजिक प्रतिक्रिया

    यहां के स्थानीय निवासी, दुकानदार और मिडिल-क्लास परिवार जिन्होंने इन इलाकों में invest किया है या किराये पर रहते हैं, वे प्रभावित हैं:

    • रिहायशी जीवन पर असर: भू-संवर्धन, सड़क रोक, धूल-गंदगी, संसाधनों की कमी जैसे समस्याएँ बढ़ी हैं।
    • भय और असुरक्षा: नाम-पता फँस जाने की आशंका लोगों को बाधित करती है कि वे खुलकर आवाज़ नहीं उठा सकें।
    • आलोचना सार्वजनिक स्तर पर: सामाजिक मीडिया, स्थानीय सभाएँ, मोहल्ले की मीटिंग्स हो रही हैं, जहाँ लोग विभाग और मनपा सहित जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब चाहते हैं।

    जिम्मेदार अधिकारी कौन हैं?

    • पंकज पाचर्ने, इमारत व कारखाना विभाग, कनिष्ठ अभियंता, आर/दक्षिण वॉर्ड, कांदीवली (पश्चिम) — मुख्य आरोपों में आ रहा है कि उन्होंने यह अवैध गाला निर्माण अनुमति के बिना कराया है, संरक्षण दिया है और रकम वसूली की है।
    • वॉर्ड ऑफिसर आरती गोळेकर — क्या इन शिकायतों की जानकारी उन्हें है, और उन्होंने किन जांच निर्देश दिए हैं?
    • डीएमसी संजय कुर्हाड़े — मनपा के उच्च पदस्थ अधिकारी, जिनसे जवाबदेही की उम्मीद की जाती है कि वे इस मामले में आधिकारिक कार्रवाई initiate करें।

    कानूनी और प्रशासनिक स्थिति

    • विधि-विचार: अगर शिकायतकर्ता लिखित शिकायत कर दें, तो इसके आधार पर विभागीय जांच हो सकती है। लेकिन आरोप है कि शिकायत करते ही नाम पता सार्वजनिक हो जाता है।
    • आरोपों की जांच: निवासियों का कहना है कि कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई; मनपा ने कोई आधिकारिक नोटिस जारी नहीं किया; विभाग ने सार्वजनिक सूचना नहीं दी।
    • न्यायालय और अन्य संस्थाएँ: अगर मनपा या विभाग कार्रवाई नहीं करते हैं, तो निवासियों को कानूनी रास्ते अपनाने पड़ सकते हैं — RTI, प्रशासनिक याचिकाएँ, सार्वजनिक मामले (public interest litigation) आदि।

    क्या किया जाना चाहिए? सुझाव और अपेक्षित कार्रवाई

    • तत्काल विभागीय जांच: मनपा प्रशासन को चाहिए कि वे इस मामले की निष्पक्ष जांच करें, कनिष्ठ अभियंता पंकज पाचर्ने सहित सभी दोषियों का पता लगाएं।
    • नाम-पता की सुरक्षा: शिकायतकर्ताओं की पहचान गोपनीय रखी जानी चाहिए; धमकियों की शिकायत पर सुरक्षा सुनिश्चित हो।
    • परमिट एवं नक्शों का सार्वजनिक खुलापन: इमारतों के नक्शे, अनुमति दस्तावेज़ सार्वजनिक हों ताकि नागरिक देख सकें कि क्या नियमों का उल्लंघन हुआ है।
    • दंडात्मक कार्रवाई: यदि जांच में दोष सिद्ध होता है, तो अभियंता के खिलाफ विभागीय, पुलिस या एंटी-करप्शन ब्यूरो के तहत कार्रवाई हो; संभव हो तो अभियोजन हो।
    • स्थानीय निगरानी समिति: मोहल्ले के नागरिकों को शामिल कर एक निगरानी या शिकायत मंच बने जो समय-समय पर कार्रवाई रिपोर्ट मांगे।

    निष्कर्ष

    भ्रष्टाचार न सिर्फ व्यक्तिगत दोष है, बल्कि सामाजिक और विकासात्मक बाधा है। यदि मनपा विभाग ऐसे मामलों के खिलाफ सख्त कदम उठाए, तो लोग यह विश्वास कर पाएँगे कि अधिकार व्यवस्था उनकी सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करती है। कांदीवली के इस मामले में जवाबदेही की लकीर स्पष्ट होनी चाहिए — वरना स्थानीय लोगों के विश्वास की नींव हिल जाएगी।


    FAQ सेक्शन

    1. प्रश्न: क्या यह गाला कानूनी अनुमति के बिना बनाया गया है?
      उत्तर: शिकायतकर्ताओं का दावा है कि अनुमति और परमिट नियमों के अनुरूप नहीं है, किश्तों में वसूली हुई है, और विभागीय प्रक्रिया पूरी नहीं हुई।
    2. प्रश्न: अभियंता पंकज पाचर्ने पर क्या ठोस साक्ष्य हैं?
      उत्तर: अब तक स्थानीय लोगों की शिकायतें, लिखित/मौखिक विवरण हैं; विभागीय रिकॉर्ड की जांच और दस्तावेज़ों की पुष्टि ज़रूरी है।
    3. प्रश्न: शिकायत करने वालों को डर क्यों लगता है?
      उत्तर: शिकायतकर्ता कहते हैं कि उनका नाम-पता ठेकेदारों को दे दिया जाता है, जिससे जान-माल का संकट हो सकता है, इसलिए लोग लिखित शिकायत नहीं करते हैं।
    4. प्रश्न: विभागीय कार्रवाई कब होगी?
      उत्तर: अभी तक कोई सार्वजनिक सूचना नहीं आई कि कार्रवाई चल रही है। यदि मनपा प्रशासन सचमुच जवाबदेह है, तो जल्द जांच शुरू होगी।
    5. प्रश्न: नागरिक क्या कर सकते हैं?
      उत्तर: लिखित शिकायत करें, RTI आवेदन करें; स्थानीय प्रशासन और मीडिया को जानकारी दें; यदि ज़रूरत हो तो न्यायालय में याचिका दाखिल करें।
  • चुनाव आयोग की आज़ादी पर सवाल: लोकतंत्र में ‘फेयर गेम’ की बहस फिर तेज़

    चुनाव आयोग की आज़ादी पर सवाल: लोकतंत्र में ‘फेयर गेम’ की बहस फिर तेज़

    मोदी सरकार और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के टकराव के बीच चुनाव आयोग की भूमिका पर नए सवाल उठ रहे हैं। क्या लोकतंत्र में पारदर्शिता खतरे में है या विपक्ष की सियासत सिर्फ आरोपों का खेल खेल रही है?

    लोकतंत्र या नियंत्रण?

    देश में लोकतंत्र के नाम पर सत्ता की बढ़ती पकड़ को लेकर बहस एक बार फिर तेज़ हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को दरकिनार करते हुए सरकार द्वारा बनाए गए नए कानूनों ने विपक्ष ही नहीं, बल्कि आम जनता में भी चिंता बढ़ा दी है।
    पहले दिल्ली सरकार के प्रशासनिक अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनी हुई सरकार के पक्ष में फैसला दिया, मगर केंद्र ने संसद में बहुमत के आधार पर नया कानून बनाकर सारे अधिकार उपराज्यपाल को दे दिए। सवाल ये उठता है — क्या यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया है या सत्ता का केंद्रीकरण?

    Questions-on-the-independence-of-the-Election-Commission-The-debate-on-fair-play-in-democracy-intensifies-again-1

    सुप्रीम कोर्ट की बेंच और सरकार का टकराव

    चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने साफ कहा था कि प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश – तीनों मिलकर नियुक्ति करेंगे ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
    लेकिन सरकार ने इस आदेश को बदलते हुए नया कानून पास किया — जिसमें सीजेआई को हटाकर प्रधानमंत्री, उनके नामित मंत्री और नेता प्रतिपक्ष को शामिल किया गया।
    यहां भी बहुमत का समीकरण साफ दिखाई देता है – दो वोट सरकार के पक्ष में और एक विपक्ष का। ऐसे में नियुक्ति का फैसला पहले से तय माना जा रहा है।

    चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल

    देश के लोकतंत्र का स्तंभ माने जाने वाले चुनाव आयोग पर भी अब गंभीर आरोप लग रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि आयोग अब “स्वतंत्र संस्था” नहीं रह गई, बल्कि “सरकार की सुविधा आयोग” बन चुकी है।
    कई मामलों में आयोग पर वोटर लिस्ट से नाम काटने, फर्जी मतदाता जोड़ने और CCTV फुटेज न देने के आरोप हैं।
    खासकर बिहार में लाखों वोटर लिस्ट से नाम काटे जाने का मामला सुर्खियों में है। विपक्ष का दावा है कि इनमें ज़्यादातर नाम सीमावर्ती मुस्लिम इलाकों के मतदाताओं के हैं।

    ईवीएम पर फिर उठे सवाल

    वोटिंग मशीन यानी EVM को लेकर भी विवाद फिर से गर्म है। कभी बीजेपी खुद कांग्रेस पर ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप लगाती थी, लेकिन अब विपक्ष बीजेपी पर यही आरोप दोहरा रहा है।
    अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप, एलन मस्क और जापान की तकनीकी कंपनियों ने भी कहा कि कोई भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस पूरी तरह “हैक-प्रूफ” नहीं होती।
    फिर सवाल उठता है — जब मोबाइल, सैटेलाइट और अंतरिक्ष यान को कंट्रोल किया जा सकता है, तो EVM क्यों नहीं?

    बिहार का वोटर डेटा विवाद

    बिहार में चुनाव आयोग ने SIR सिस्टम लागू कर लगभग 65 लाख वोटरों के नाम हटाए। आयोग का कहना है कि ये नाम डुप्लीकेट या फर्जी थे, जबकि विपक्ष का आरोप है कि यह “टारगेटेड वोट डिलीशन” है।
    कई इलाकों में मृत मतदाताओं के नाम हटाने के बहाने असली मतदाताओं को लिस्ट से बाहर कर दिया गया।
    विपक्षी नेताओं का कहना है कि बिना आधार कार्ड, बिना नागरिकता सत्यापन और बिना जांच के इतने नाम कैसे जोड़े या हटाए जा सकते हैं?

    संसद में बने विवादित कानून

    सरकार ने संसद से ऐसा कानून पास किया जिसके तहत चुनाव आयोग की किसी भी कार्रवाई को लेकर कोई कोर्ट, चाहे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट, मामला नहीं सुन सकता
    यानी आयोग चाहे जितनी मनमानी करे, उस पर न्यायिक रोक संभव नहीं।
    विपक्ष का कहना है कि यही असली “लोकतंत्र की हत्या” है — जब जनता के पास न्याय की अपील का अधिकार ही नहीं बचेगा।

    विपक्ष को खत्म करने की साजिश?

    हाल में विपक्षी नेताओं के जेल जाने की घटनाओं ने इस बहस को और हवा दी है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और राज्यसभा सांसद संजय सिंह के खिलाफ कार्रवाई को विपक्ष “राजनीतिक बदला” बता रहा है।
    नए कानून में यह प्रावधान है कि अगर कोई मुख्यमंत्री या मंत्री तीन महीने से ज़्यादा जेल में रहता है, तो उसका पद स्वतः समाप्त माना जाएगा।
    विपक्षी दलों का आरोप है कि इसी का फायदा उठाकर सरकार सत्ता में बैठे विपक्षी मुख्यमंत्रियों को हटाने की साजिश रच रही है।

    क्या भारत लोकतंत्र से राजतंत्र की ओर?

    राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर यही रफ्तार रही तो भारत में चुनाव सिर्फ “औपचारिक प्रक्रिया” बनकर रह जाएंगे।
    जब सरकार खुद ही चुनाव आयोग, प्रशासन और कानून को नियंत्रित करेगी, तो चुनाव का मतलब क्या बचेगा?
    कई विपक्षी नेताओं ने व्यंग्य में कहा कि “अब तो प्रधानमंत्री अपने उत्तराधिकारी का नाम कागज़ पर लिखेंगे और वही बाद में घोषित हो जाएगा — जैसे किसी संगठन का प्रमुख तय होता है।”

    जनता का सवाल: भरोसा किस पर करें?

    जनता अब यह सोचने पर मजबूर है कि अगर न्यायपालिका के आदेश, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और विपक्ष की आवाज़ — तीनों पर अंकुश लग जाए, तो लोकतंत्र का अस्तित्व कहाँ बचेगा?
    अब ज़रूरत है कि पारदर्शिता और जवाबदेही को फिर से प्राथमिकता दी जाए। लोकतंत्र सिर्फ चुनाव का नाम नहीं, बल्कि जनता की आस्था और विश्वास का प्रतीक है।


    FAQ

    Q1. क्या सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के नियम बदले थे?
    हाँ, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नियुक्ति में सीजेआई, प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष शामिल हों।

    Q2. सरकार ने इस आदेश को कैसे बदला?
    सरकार ने संसद में नया कानून पारित कर सीजेआई को हटाकर एक केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया।

    Q3. क्या ईवीएम को हैक किया जा सकता है?
    तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि कोई भी इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम 100% सुरक्षित नहीं होता, इसलिए पारदर्शिता के उपाय ज़रूरी हैं।

    Q4. क्या बिहार में वाकई लाखों वोटर हटाए गए?
    हाँ, SIR सिस्टम के तहत लाखों नाम हटाए गए, जिनमें विपक्ष का दावा है कि बड़ी संख्या मुस्लिम मतदाताओं की है।

    Q5. क्या यह सब लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है?
    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर संस्थाओं की स्वतंत्रता पर दबाव जारी रहा, तो लोकतंत्र का स्वरूप प्रभावित हो सकता है।