मुंबई के मालाड में महाराष्ट्र साइबर ने 20 हजार से अधिक बाल यौन शोषण तस्वीरें और वीडियो मिलने पर 49 वर्षीय व्यक्ति को गिरफ्तार किया। फॉरेंसिक जांच जारी है।
मुंबई: मालाड पश्चिम में महाराष्ट्र साइबर पुलिस ने बाल यौन शोषण से जुड़ी 20 हजार से अधिक तस्वीरें और वीडियो रखने के आरोप में 49 वर्षीय व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। आरोपी की पहचान सैफुद्दीन जमीर उद्दीन मलिक के रूप में हुई है। उसके मोबाइल फोन से कथित तौर पर इतनी बड़ी संख्या में आपत्तिजनक डिजिटल सामग्री मिलने के बाद अब पुलिस इसकी उत्पत्ति, डाउनलोड करने के तरीके और संभावित ऑनलाइन प्रसार की जांच कर रही है।
यह कार्रवाई महाराष्ट्र साइबर की तीन विशेष इकाइयों की डिजिटल निगरानी और तकनीकी जांच के बाद की गई। मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS), पॉक्सो अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई है।
डिजिटल निगरानी से मालाड के आरोपी तक पहुंची पुलिस
सैफुद्दीन जमीर उद्दीन मलिक मालाड पश्चिम का निवासी है। महाराष्ट्र साइबर की विशेष इकाइयां साइबर अपराधों के जरिए महिलाओं और बच्चों के शोषण से संबंधित गतिविधियों पर लगातार नजर रख रही थीं। इसी दौरान डिजिटल खुफिया जानकारी के आधार पर एक व्यक्ति द्वारा बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री डाउनलोड करने और अपने पास रखने की जानकारी मिली।
इसके बाद साइबर अधिकारियों ने तकनीकी विश्लेषण और डिजिटल खुफिया उपकरणों की मदद से संदिग्ध गतिविधियों का पता लगाया। जांच के दौरान उसकी पहचान सैफुद्दीन जमीर उद्दीन मलिक के रूप में स्थापित की गई और उसे मालाड से गिरफ्तार कर लिया गया।
इस कार्रवाई में महाराष्ट्र साइबर की तीन विशेष इकाइयों की भूमिका रही। इनमें साइबर क्राइम प्रिवेंशन अगेंस्ट वुमेन एंड चिल्ड्रेन (CCPWC), ऑनलाइन क्राइम्स अगेंस्ट वुमेन एंड चिल्ड्रेन (OCWC) और टैक्टिकल रिस्पॉन्स अगेंस्ट साइबर चाइल्ड एक्सप्लॉइटेशन (TRACE) शामिल हैं।
मोबाइल से मिलीं 20 हजार से अधिक तस्वीरें और वीडियो
जांच के दौरान आरोपी के मोबाइल फोन से 20 हजार से अधिक तस्वीरें और वीडियो मिलने की जानकारी सामने आई है। ये फाइलें बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से संबंधित सामग्री बताई गई हैं। इस तरह की सामग्री के लिए चाइल्ड सेक्सुअल एक्सप्लॉइटेशन एंड एब्यूज मटेरियल (CSEAM) शब्द का इस्तेमाल किया जाता है।
पुलिस अब डिजिटल फॉरेंसिक जांच के जरिए यह पता लगाने में जुटी है कि ये फाइलें कहां से प्राप्त की गई थीं, किस माध्यम से डाउनलोड हुईं और क्या आरोपी ने इन्हें किसी अन्य व्यक्ति या ऑनलाइन मंच पर साझा भी किया था।
जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी है कि इस गतिविधि में किसी दूसरे व्यक्ति या ऑनलाइन नेटवर्क की भूमिका तो नहीं थी। फिलहाल आरोपी के पास से मिली फाइलों की संख्या को पीड़ित बच्चों की संख्या नहीं माना जा सकता। दोनों अलग-अलग बातें हैं और इसकी पुष्टि फॉरेंसिक जांच के बाद ही हो सकती है।
FIR में BNS, POCSO और IT Act की धाराएं दर्ज
महाराष्ट्र साइबर के नोडल साइबर पुलिस स्टेशन में इस मामले में एफआईआर संख्या 88/2026 दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। इसमें भारतीय न्याय संहिता की धारा 294, पॉक्सो अधिनियम की धारा 15 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67(B) शामिल हैं।
पॉक्सो अधिनियम की धारा 15 बच्चों से संबंधित यौन शोषण सामग्री को रखने और उसके इस्तेमाल से जुड़ी अलग-अलग परिस्थितियों में दंड का प्रावधान करती है। इसमें सामग्री को प्रसारित करने के उद्देश्य से रखने और व्यावसायिक उद्देश्य से रखने के लिए अलग सजा निर्धारित है।
वहीं सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67(B) बच्चों को यौन गतिविधियों में दर्शाने वाली इलेक्ट्रॉनिक सामग्री को बनाने, एकत्र करने, डाउनलोड करने, प्रकाशित करने, वितरित करने और प्रसारित करने जैसे कृत्यों को अपराध के दायरे में लाती है। पहली दोषसिद्धि पर अधिकतम पांच वर्ष की जेल और 10 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। दोबारा दोषसिद्धि होने पर अधिकतम सात वर्ष की जेल और 10 लाख रुपये तक जुर्माना हो सकता है।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 294 भी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अश्लील सामग्री के प्रकाशन, वितरण और प्रसार से संबंधित प्रावधान है।
हालांकि, एफआईआर में इन धाराओं का दर्ज होना दोषसिद्धि नहीं है। पॉक्सो की धारा 15 के तहत कौन-सी उपधारा लागू होगी, यह संबंधित आरोपों और जांच में सामने आने वाले तथ्यों पर निर्भर करेगा।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी डिजिटल सामग्री के मामलों में महत्वपूर्ण
बाल यौन शोषण सामग्री से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट का 23 सितंबर 2024 का फैसला महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ है। Just Rights for Children Alliance बनाम S. Harish मामले में अदालत ने पॉक्सो अधिनियम की धारा 15 की व्याख्या करते हुए डिजिटल सामग्री के कब्जे और नियंत्रण से जुड़े पहलुओं को स्पष्ट किया था।
इस फैसले में अदालत ने बताया कि डिजिटल सामग्री के मामलों में केवल भौतिक रूप से किसी वस्तु का पास होना ही महत्वपूर्ण नहीं है। किसी डिजिटल सामग्री पर व्यक्ति का नियंत्रण और उससे संबंधित परिस्थितियां भी कानूनी जांच का हिस्सा हो सकती हैं।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चों से संबंधित यौन शोषण सामग्री को केवल अश्लील तस्वीरों के रूप में देखने के बजाय उसके पीछे मौजूद शोषण और पीड़ित बच्चों के अधिकारों को ध्यान में रखना जरूरी है। इसी कारण चाइल्ड पोर्नोग्राफी के बजाय चाइल्ड सेक्सुअल एक्सप्लॉइटेशन एंड एब्यूज मटेरियल (CSEAM) शब्दावली को प्राथमिकता दी जाती है।
महाराष्ट्र में पहले भी सामने आया था ऐसा साइबर अपराध
महाराष्ट्र में बच्चों के यौन शोषण से संबंधित डिजिटल सामग्री के मामलों में यह पहली कार्रवाई नहीं है। जून 2026 में नवी मुंबई के बेलापुर इलाके में महाराष्ट्र साइबर ने 18 वर्षीय आदिराज राजेंद्र बैत को गिरफ्तार किया था।
उस मामले में आरोपी पर टेलीग्राम के जरिए ऐसी सामग्री बेचने और प्रसारित करने का आरोप था। जांच में डिजिटल गतिविधियों के साथ यूपीआई आईडी की भी पड़ताल की गई थी। आरोपी का मोबाइल फोन जब्त कर फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया था। उसे आगे की जांच के लिए नवी मुंबई के एनआरआई पुलिस स्टेशन को सौंपा गया था।
राष्ट्रीय स्तर पर भी इस तरह की गतिविधियों को लेकर चिंता बनी हुई है। जून 2026 में सामने आई एक सरकारी रिपोर्ट में टेलीग्राम के कुछ समूहों और चैनलों के जरिए बाल यौन शोषण सामग्री के प्रसार को लेकर चिंता जताई गई थी। जनवरी से मई 2026 के दौरान टेलीग्राम से संबंधित 1,556 शिकायतों का भी उल्लेख हुआ था। यह अलग राष्ट्रीय संदर्भ है और मालाड मामले में टेलीग्राम के इस्तेमाल की अभी पुष्टि नहीं हुई है।
महाराष्ट्र साइबर ने बताया, लाखों साइबर शिकायतों पर हुई कार्रवाई
महाराष्ट्र साइबर के अनुसार, अब तक 5.67 लाख साइबर टिपलाइन रिपोर्टों और 31 हजार ऑनलाइन बाल शोषण संबंधी शिकायतों पर कार्रवाई की गई है।
ये आंकड़े ऑनलाइन अपराधों की निगरानी और बच्चों की डिजिटल सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों को दर्शाते हैं। हालांकि, शिकायतों और टिपलाइन रिपोर्टों पर कार्रवाई का अर्थ यह नहीं है कि सभी मामलों में आरोपी गिरफ्तार हुए हैं या अपराध अदालत में साबित हो चुके हैं।
महाराष्ट्र साइबर ने नागरिकों से अपील की है कि वे इंटरनेट पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी किसी भी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी संबंधित अधिकारियों को दें।
इसके लिए राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल www.cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज की जा सकती है। साइबर अपराध से संबंधित सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर 1930 भी उपलब्ध है।
फिलहाल मालाड के आरोपी के मोबाइल से मिली सामग्री की फॉरेंसिक जांच जारी है। पुलिस का अगला महत्वपूर्ण कदम यह पता लगाना है कि सामग्री कहां से आई, क्या उसे आगे साझा किया गया और इस गतिविधि में किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका रही है या नहीं।
