रियाद एयरपोर्ट पर हमलों से सऊदी की सुरक्षा पर सवाल, हूतियों से दोहरा मोर्चा

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सऊदी अरब में रियाद एयरपोर्ट पर हमलों, हूतियों की सैन्य क्षमता, 83.2 अरब डॉलर के रक्षा बजट, ईरान की भूमिका और भारत पर असर की पूरी जानकारी।

सऊदी अरब: 12 अक्टूबर 2026 को सऊदी अरब की राजधानी रियाद के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर लगातार हमलों के बाद हवाई सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। 10 अक्टूबर के हमले में 13 लोगों की मौत और 300 से अधिक लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई, जबकि 11 अक्टूबर को हुए दूसरे हमले में एक व्यक्ति की मौत और 11 लोग घायल हुए। इस घटनाक्रम ने सऊदी अरब की एयर डिफेंस, नागरिक ठिकानों की सुरक्षा और यमन में जारी संघर्ष को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

रियाद एयरपोर्ट पर लगातार हमले, उड़ानों पर बड़ा असर

रियाद के एयरपोर्ट पर हमलों के बाद सऊदी अरब में हवाई यातायात लगभग ठप होने की स्थिति में पहुंच गया। 11 अक्टूबर को एयरपोर्ट की निर्धारित उड़ानों में से 99.7 प्रतिशत रद्द हुईं। 12 अक्टूबर के लिए भी बड़ी संख्या में उड़ानें रद्द होने का अनुमान था। Lufthansa ने रियाद की उड़ानें 16 अक्टूबर तक और Air France-KLM ने महीने के अंत तक निलंबित करने की घोषणा की थी।

हमलों के बाद टर्मिनल और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा जांच शुरू की गई। एयरपोर्ट की स्थिति और उड़ानों की बहाली को लेकर अंतिम जानकारी संबंधित अधिकारियों की नई घोषणाओं पर निर्भर करेगी।

83.2 अरब डॉलर का रक्षा बजट, फिर भी क्यों बढ़ी चुनौती?

सऊदी अरब ने 2025 में सैन्य खर्च पर करीब 83.2 अरब डॉलर खर्च किए। Stockholm International Peace Research Institute (SIPRI) के अनुसार, इस खर्च के साथ सऊदी अरब दुनिया का आठवां सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश रहा। उसका सैन्य खर्च 2024 की तुलना में 1.4 प्रतिशत बढ़ा था।

सऊदी अरब के पास F-15 फाइटर जेट, यूरोफाइटर टाइफून, Patriot और THAAD जैसे आधुनिक रक्षा सिस्टम हैं। इसके बावजूद लगातार हमले यह दिखाते हैं कि महंगे हथियारों की मौजूदगी से पूरे देश की सुरक्षा की गारंटी नहीं मिलती।

इसका एक कारण हमलों और बचाव की लागत में अंतर है। कम लागत वाले ड्रोन या मिसाइल को रोकने के लिए महंगे इंटरसेप्टर इस्तेमाल करने पड़ सकते हैं। इसके अलावा, बड़े क्षेत्र में एयरपोर्ट, तेल प्रतिष्ठानों, शहरों और सैन्य ठिकानों की एक साथ सुरक्षा करना आसान नहीं होता।

सऊदी की मिसाइल रक्षा को ईरान की तरफ से आने वाले खतरों के साथ-साथ यमन की दिशा से होने वाले हमलों का भी सामना करना पड़ रहा है। इससे रक्षा संसाधनों के वितरण और इंटरसेप्टर की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है।

हूतियों के खिलाफ युद्ध में सऊदी को क्यों मिल रही है चुनौती?

यमन में सक्रिय हूती आंदोलन ईरान से समर्थन प्राप्त करता है और लंबे समय से सऊदी अरब के साथ संघर्ष में शामिल रहा है। हूती पारंपरिक सेना की तरह केवल आमने-सामने की लड़ाई पर निर्भर नहीं हैं। वे मिसाइल, ड्रोन और स्थानीय भूगोल का इस्तेमाल करके विरोधी पक्ष पर दबाव बनाते हैं।

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यमन का पहाड़ी इलाका, बिखरे हुए मोर्चे और स्थानीय गुटों के बीच समन्वय की समस्याएं सैन्य अभियान को जटिल बनाती हैं। सऊदी अरब ने लंबे समय तक हवाई हमलों और यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के समर्थक बलों पर भरोसा किया है। लेकिन केवल हवाई हमलों से किसी विरोधी समूह का क्षेत्रीय नियंत्रण समाप्त करना मुश्किल हो सकता है।

सितंबर में यमन के पश्चिमी तट पर हूतियों की बढ़त के बाद सऊदी समर्थित बलों ने जवाबी अभियान चलाया। मोखा बंदरगाह और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास की स्थिति इस संघर्ष को और महत्वपूर्ण बनाती है। यह समुद्री मार्ग लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए अहम है।

ईरान की भूमिका और क्षेत्रीय देशों की प्रतिक्रिया

सऊदी अरब और ईरान के बीच तनाव को हूती संघर्ष से अलग करके नहीं देखा जा सकता, लेकिन दोनों को एक ही सैन्य घटना मानना भी सही नहीं होगा। हूतियों को ईरान का समर्थन प्राप्त है, मगर किसी विशेष हमले को सीधे ईरान द्वारा अंजाम दिया गया हमला नहीं कहा जा सकता।

12 अक्टूबर को तुर्किये, पाकिस्तान, मिस्र और सऊदी अरब ने रियाद एयरपोर्ट पर हुए हमलों की निंदा की। इन देशों ने सऊदी अरब के समर्थन और हमलों को रोकने के लिए वैध कदम उठाने के अधिकार की बात कही।

तुर्किये और पाकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग को मजबूत करने पर भी चर्चा हुई। हालांकि, तुर्किये की ओर से सैनिक भेजने या आक्रामक अभियान में शामिल होने की पुष्टि नहीं की गई। रक्षात्मक और तकनीकी सहयोग की बात सामने आई।

दूसरी ओर, ईरान ने सऊदी अरब और हूतियों के बीच बातचीत कराने में मदद की पेशकश की। इससे साफ है कि क्षेत्रीय संघर्ष के बीच सैन्य दबाव और कूटनीतिक प्रयास दोनों जारी हैं।

तेल, व्यापार और सऊदी की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?

सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था में तेल का महत्वपूर्ण स्थान है। इसलिए तेल प्रतिष्ठानों, एयरपोर्ट और समुद्री मार्गों पर बढ़ता खतरा केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक चिंता भी है।

12 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी दर्ज की गई। Brent क्रूड 105.48 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी WTI क्रूड 92.44 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा। व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष और टैंकरों पर हमलों ने बाजार की चिंताएं बढ़ाई हैं।

बाब-अल-मंदेब के आसपास तनाव बढ़ने पर जहाजों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़ सकते हैं। इससे माल ढुलाई, ईंधन और बीमा की लागत बढ़ सकती है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए लंबे समय तक ऊंची कीमतें आयात बिल और आर्थिक दबाव बढ़ा सकती हैं। हालांकि, भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के साथ-साथ रुपये की विनिमय दर, करों और घरेलू नीतियों पर भी निर्भर करती हैं।

सुरक्षा संकट का असर सऊदी अरब के निवेश और पर्यटन से जुड़े लक्ष्यों पर भी पड़ सकता है। रियाद में आयोजित World Petroleum Congress के दौरान कुछ बड़ी ऊर्जा कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों की भागीदारी प्रभावित होने की जानकारी सामने आई। इससे अंतरराष्ट्रीय आयोजनों और निवेशकों के भरोसे पर संभावित असर का सवाल भी उठता है।

भारतीय नागरिकों के लिए क्या स्थिति है?

रियाद एयरपोर्ट हमले में एक भारतीय नागरिक की मौत हुई और कई अन्य भारतीय घायल हुए। भारतीय दूतावास स्थानीय अधिकारियों और अस्पतालों के संपर्क में रहा तथा प्रभावित परिवारों को सहायता देने की बात कही गई।

सऊदी अरब में रहने वाले भारतीय नागरिकों और वहां यात्रा करने वालों को स्थानीय प्रशासन तथा भारतीय दूतावास की एडवाइजरी का पालन करने को कहा गया है। रियाद जाने या वहां से उड़ान भरने वाले यात्रियों को एयरपोर्ट के लिए रवाना होने से पहले अपनी एयरलाइन से उड़ान की स्थिति की पुष्टि करने को कहा गया है।

आगे क्या हो सकता है?

सऊदी अरब के सामने फिलहाल तीन बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, एयरपोर्ट और अन्य महत्वपूर्ण नागरिक ठिकानों की सुरक्षा मजबूत करना। दूसरी, यमन में हूतियों की सैन्य क्षमता और क्षेत्रीय बढ़त को सीमित करना। तीसरी, ईरान के साथ व्यापक तनाव को नियंत्रित करते हुए संघर्ष को और फैलने से रोकना।

यदि हमले जारी रहते हैं, तो हवाई सेवाओं, समुद्री व्यापार और ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर, क्षेत्रीय देशों के बीच रक्षा सहयोग और कूटनीतिक बातचीत से तनाव कम करने का रास्ता भी निकल सकता है।

सऊदी अरब का बड़ा रक्षा बजट उसकी सैन्य क्षमता को दिखाता है, लेकिन यमन का लंबा युद्ध यह भी बताता है कि आधुनिक हथियार अकेले निर्णायक जीत सुनिश्चित नहीं करते। फिलहाल रियाद एयरपोर्ट की सुरक्षा, उड़ानों की बहाली और यमन में सैन्य घटनाक्रम पर आगे की स्थिति निर्भर करेगी।

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