मुंबई के मालाड स्थित इनऑर्बिट मॉल में नमाज कक्ष को लेकर विवाद। सकल हिंदू समाज के विरोध और उसे हटाए जाने के दावे के बीच धार्मिक स्वतंत्रता और समान अधिकारों पर सवाल।
मुंबई: मालाड स्थित इनऑर्बिट मॉल में नमाज पढ़ने के लिए उपलब्ध एक कमरे को लेकर उठा विवाद अब धार्मिक स्वतंत्रता, समान अधिकार और देश के सामाजिक माहौल से जुड़े कई सवाल खड़े कर रहा है। सवाल यह है कि अगर कोई व्यक्ति किसी शांत जगह पर बैठकर अपने धर्म के अनुसार इबादत करता है और इससे किसी दूसरे व्यक्ति को कोई परेशानी नहीं होती, तो उसे लेकर इतना विरोध क्यों होना चाहिए? क्या भारत में एकांत में नमाज पढ़ना अपराध हो गया है? क्या किसी व्यावसायिक परिसर में लोगों की सुविधा के लिए नमाज की व्यवस्था करना अपने आप में गलत है?
इस विवाद की शुरुआत दो हिजाब पहनी लड़कियों के एक वीडियो से हुई। दोनों लड़कियां इनऑर्बिट मॉल में मौजूद नमाज कक्ष दिखाते हुए बता रही थीं कि वहां पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग जगह है। वुजू के लिए भी व्यवस्था उपलब्ध है। वीडियो में उन्होंने यह भी बताया कि आसपास मस्जिद दूर होने के कारण कई लोगों को समय पर नमाज पढ़ने में परेशानी होती है और मॉल में उपलब्ध यह सुविधा उनके लिए उपयोगी हो सकती है।
यह वीडियो सामने आने के बाद नमाज की सुविधा को लेकर सोशल मीडिया पर विरोध शुरू हो गया। लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल उठता है कि किसी व्यक्ति को अपने धर्म के अनुसार प्रार्थना करने के लिए शांत जगह मिलना दूसरे धर्म के लोगों के अधिकारों के खिलाफ कैसे हो सकता है?
वीडियो सामने आने के बाद सकल हिंदू समाज ने उठाए सवाल
30 अक्टूबर 2026 को सकल हिंदू समाज मुंबई ने इस वीडियो को सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा किया। संगठन ने सवाल उठाया कि सभी धर्मों के लोगों के आने-जाने वाले मॉल में नमाज के लिए अलग जगह क्यों बनाई गई है। संगठन की पोस्ट में यह भी पूछा गया कि क्या उसी मॉल में हिंदू पूजा-पाठ कर सकते हैं। इसके साथ मुंबई के पाकिस्तान बनने जैसी टिप्पणी भी की गई।
इसके बाद संगठन ने मॉल में विरोध प्रदर्शन किया और नमाज कक्ष को हटाने की मांग की। 31 अक्टूबर को संगठन की ओर से एक और वीडियो साझा किया गया, जिसमें कमरे की पहले और बाद की स्थिति दिखाते हुए दावा किया गया कि विरोध के बाद नमाज कक्ष को तोड़ दिया गया है। वीडियो में फर्श की टूटी टाइलें और बदली हुई जगह दिखाई गई।
हालांकि, इस वीडियो से कमरे को तोड़े जाने की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। स्थानीय पुलिस और मॉल प्रबंधन से संपर्क करने की कोशिशों के बावजूद इस मामले में आधिकारिक जवाब सामने नहीं आया। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि कमरे को वास्तव में किसने हटाया, इसका फैसला किसने लिया और इसके पीछे क्या आधिकारिक कारण था।
नमाज से किसी दूसरे धर्म को क्या नुकसान?
इस पूरे विवाद में सबसे जरूरी सवाल यही है कि अगर मॉल में नमाज पढ़ने के लिए एक अलग कमरा उपलब्ध था, तो उससे किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति को क्या नुकसान हो रहा था? क्या वहां किसी को नमाज पढ़ने के लिए मजबूर किया जा रहा था? क्या दूसरे धर्म के लोगों को मॉल में आने से रोका गया था? क्या किसी की पूजा या प्रार्थना में बाधा डाली गई थी? सामने आई जानकारी में ऐसी किसी घटना का उल्लेख नहीं है।
किसी मॉल में अलग-अलग धर्मों के लोग आते हैं। वहां काम करने वाले कर्मचारियों में भी अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं के लोग हो सकते हैं। ग्राहक हों या कर्मचारी, किसी को भी अपनी धार्मिक जरूरत के अनुसार कुछ समय शांत जगह पर बिताने की आवश्यकता हो सकती है। मॉल में ऐसी सुविधा उपलब्ध कराने का उद्देश्य लोगों को सुविधा देना हो सकता है, न कि किसी दूसरे धर्म पर कोई दबाव बनाना।
अगर किसी सुविधा के इस्तेमाल, निर्माण या प्रबंधन को लेकर नियमों का सवाल है, तो उसकी जांच दस्तावेजों और संबंधित अधिकारियों के माध्यम से होनी चाहिए। लेकिन केवल यह देखकर कि वहां मुस्लिम लोग नमाज पढ़ रहे हैं, किसी सुविधा को विवाद का विषय बना देना एक अलग तरह का सवाल खड़ा करता है।
क्या भारत में नमाज पढ़ना अपराध है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 सभी व्यक्तियों को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और धार्मिक आचरण करने की स्वतंत्रता देता है। यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य जैसी संवैधानिक सीमाओं के अधीन है। इसका अर्थ है कि शांतिपूर्ण धार्मिक आचरण को केवल किसी व्यक्ति या संगठन की आपत्ति के आधार पर अपराध नहीं माना जा सकता।
इन सवालों का जवाब नियमों और प्रमाणों के आधार पर मिलना चाहिए। किसी धार्मिक समुदाय को निशाना बनाने वाली भाषा, विरोध के दबाव या सोशल मीडिया अभियान को किसी सुविधा की वैधता का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।
क्या धार्मिक सुविधाओं पर आपत्ति केवल एक समुदाय तक सीमित है?
मुंबई में धार्मिक स्थलों और सुविधाओं को लेकर पहले भी विवाद सामने आए हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल-2 के पास स्थित एक मस्जिदनुमा ढांचे को लेकर भाजपा नेता किरीट सोमैया ने सवाल उठाए थे। उन्होंने दावा किया था कि संबंधित ढांचे के लिए अनुमति नहीं ली गई है और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी हैं।
सितंबर 2026 में मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण (MMRDA) के पत्र का हवाला देते हुए सोमैया ने कहा था कि ढांचे के लिए अनुमति नहीं दी गई थी और मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड (MIAL) को नियमानुसार कार्रवाई करने के लिए कहा गया था। दूसरी ओर, मस्जिद से जुड़े लोगों ने आरोपों पर आपत्ति जताई थी और ढांचे को वैध बताया था।
हवाई अड्डे का मामला और इनऑर्बिट मॉल का मामला कानूनी रूप से एक जैसे नहीं हैं। दोनों जगहों की जमीन, अनुमति, निर्माण और प्रबंधन से जुड़े तथ्य अलग-अलग हैं। इसलिए एक मामले के आरोपों को दूसरे मामले का प्रमाण नहीं माना जा सकता। फिर भी, मुंबई में मुस्लिम धार्मिक सुविधाओं को लेकर लगातार सामने आ रहे विवादों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हर मामले में एक समान नियम और निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई जा रही है।
मॉल प्रबंधन और पुलिस को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए
इनऑर्बिट मॉल का संचालन और प्रबंधन करने वाली कंपनी की ओर से अब तक इस विवाद पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। यह स्पष्ट होना बाकी है कि नमाज कक्ष मॉल के कर्मचारियों के लिए बनाया गया था या ग्राहकों के लिए भी उपलब्ध था। यह भी सामने नहीं आया है कि उसे हटाने का फैसला मॉल प्रबंधन ने लिया या किसी अन्य कारण से ऐसा हुआ।
मुंबई पुलिस की ओर से भी इस मामले में कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि क्या इस संबंध में कोई शिकायत दर्ज हुई, क्या किसी तरह की जांच हुई और क्या कमरे को हटाने के लिए कोई प्रशासनिक या कानूनी निर्देश दिया गया था।
सवाल सिर्फ एक कमरे का नहीं, समान अधिकारों का है
इस विवाद को केवल नमाज कक्ष के निर्माण या उसे हटाने तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। असली सवाल यह है कि क्या किसी व्यक्ति को शांतिपूर्वक अपने धर्म का पालन करने की सुविधा मिलनी चाहिए या नहीं। अगर किसी सुविधा में कानूनी या प्रशासनिक कमी है, तो उसका समाधान नियमों के तहत किया जा सकता है। लेकिन किसी समुदाय की धार्मिक पहचान को ही विवाद का आधार बना देना सामाजिक सौहार्द के लिए ठीक नहीं है।
भारत में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और दूसरे धर्मों के लोग साथ रहते हैं। हर व्यक्ति को अपने धर्म के अनुसार पूजा, प्रार्थना या इबादत करने की स्वतंत्रता है, बशर्ते वह कानून और सार्वजनिक व्यवस्था का पालन करे। किसी एक समुदाय की धार्मिक जरूरत को संदेह की नजर से देखना और दूसरे समुदाय की जरूरत को सामान्य मानना समानता की भावना के अनुरूप नहीं होगा।
इनऑर्बिट मॉल में नमाज कक्ष को लेकर उठे विवाद का जवाब विरोध के नारों से नहीं, बल्कि तथ्यों और पारदर्शी कार्रवाई से मिलना चाहिए। अगर वहां कोई नियम टूटा था, तो उसे स्पष्ट किया जाए। और अगर लोग बिना किसी को परेशान किए शांतिपूर्वक नमाज पढ़ रहे थे, तो यह भी बताया जाना चाहिए कि उनकी सुविधा पर आपत्ति का ठोस आधार क्या था।
आखिर एक ही सवाल है—जब किसी की इबादत से दूसरे व्यक्ति को कोई नुकसान नहीं पहुंच रहा, तो उसे रोकने की मांग क्यों? क्या धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार केवल कागजों तक सीमित रहना चाहिए, या देश के हर नागरिक को उसका सम्मान भी मिलना चाहिए?
