Gokul Election Results 2026 में सतेज पाटील की आघाड़ी की बड़ी जीत, फेरमतगणना का विवाद, शौमिका महाडिक और नविद मुश्रीफ की हार और दूध उत्पादकों पर असर जानें।
महाराष्ट्र: कोल्हापुर के गोकुळ दूध संघ चुनाव में सतेज पाटील की राजर्षि शाहू शेतकरी समविचारी आघाड़ी ने महायुति को बड़ा झटका दिया है। चुनाव के अंतिम नतीजों में आघाड़ी को 16 और महायुति को 9 सीटें मिलने का दावा सामने आया है।
25 संचालक पदों के लिए हुए इस चुनाव में नविद मुश्रीफ और शौमिका महाडिक जैसे प्रमुख चेहरों की हार ने राजनीतिक चर्चा तेज कर दी है। अब सबकी नजर नए संचालक मंडल, अध्यक्ष पद के चयन और दूध उत्पादकों से किए गए वादों पर है।
गोकुळ चुनाव में कैसे बदला नतीजों का गणित?
18 अक्टूबर 2026 को मतदान के बाद 19 अक्टूबर को मतगणना हुई। शुरुआती रुझानों में महायुति के कई उम्मीदवार आगे चल रहे थे, लेकिन बाद की मतगणना में सतेज पाटील की आघाड़ी ने बढ़त बनाई।
मतगणना के दौरान कुछ सीटों पर करीबी मुकाबला हुआ। अमर पाटील और सचिन घोरपडे से जुड़े मुकाबले में फेरमतगणना के बाद नतीजे में बदलाव की जानकारी सामने आई। इसी घटनाक्रम ने चुनाव के अंतिम आंकड़ों को लेकर चर्चा बढ़ा दी।
नविद मुश्रीफ, शौमिका महाडिक समेत कई दिग्गजों को झटका
गोकुळ चुनाव के सबसे चर्चित नतीजों में महाराष्ट्र के चिकित्सा शिक्षा मंत्री हसन मुश्रीफ के बेटे और गोकुळ के निवर्तमान अध्यक्ष नविद मुश्रीफ की हार शामिल है। ओबीसी वर्ग में सतेज पाटील की आघाड़ी के शशिकांत शामराव खोत ने उन्हें 69 वोटों से हराया।
शौमिका महाडिक को भी करीबी मुकाबले में हार का सामना करना पड़ा। नतीजों में उनकी हार का अंतर सात वोट बताया गया है। गोकुळ के पूर्व अध्यक्ष अरुण डोंगळे और विश्वास पाटील को भी हार का सामना करना पड़ा। इन नतीजों ने चुनाव को सिर्फ दो पैनल की लड़ाई तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जिले के सहकारी क्षेत्र में पुराने नेतृत्व की पकड़ पर भी सवाल खड़े किए।
मुख्यमंत्री से लेकर विधायकों तक, महायुति की पूरी ताकत के बावजूद मुकाबला
महायुति समर्थित छत्रपति शाहू शेतकरी विकास आघाड़ी के पक्ष में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, मंत्रियों, सांसदों और विधायकों ने प्रचार किया था। दूसरी ओर, सतेज पाटील ने राजू शेट्टी और गणपतराव पाटील सहित समविचारी नेताओं के साथ अपना पैनल तैयार किया।
चुनाव में स्थानीय सहकारी संस्थाओं पर कोल्हापुर का नियंत्रण बनाए रखने का मुद्दा भी अहम रहा। सतेज पाटील की रणनीति में स्थानीय नेतृत्व और दूध उत्पादकों के हितों को प्रमुखता दी गई।
गोकुळ चुनाव में कितना हुआ मतदान?
गोकुळ की 25 संचालक सीटों के लिए 18 अक्टूबर को मतदान हुआ था। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, कुल 5,416 मतदाताओं में से 5,414 ने मतदान किया। इस तरह मतदान लगभग 99.96 प्रतिशत रहा।
यह आम जनता की सीधी विधानसभा जैसी चुनाव प्रक्रिया नहीं थी। गोकुळ की सहकारी व्यवस्था में पात्र प्रतिनिधियों और मतदाताओं के वोट से संचालक चुने जाते हैं। इसलिए इस नतीजे का सबसे सीधा असर कोल्हापुर के सहकारी दुग्ध क्षेत्र और उससे जुड़े राजनीतिक समीकरणों पर पड़ता है।
दूध उत्पादकों को अब किस फैसले का इंतजार?
गोकुळ चुनाव में दूध उत्पादकों के लिए दूध की कीमत बढ़ाने और पशुखाद्य सस्ता करने के वादे भी चर्चा में रहे। सतेज पाटील की आघाड़ी ने भैंस के दूध पर 5 रुपये प्रति लीटर और गाय के दूध पर 2 रुपये प्रति लीटर बढ़ोतरी का वादा किया था। साथ ही पशुखाद्य के प्रति बोरे पर 100 रुपये की कटौती और दूध संकलन को 20 लाख लीटर से बढ़ाकर 30 लाख लीटर प्रतिदिन करने का लक्ष्य भी सामने रखा गया था।

महायुति ने भी दूध की कीमत बढ़ाने का वादा किया था। उसके घोषणापत्र में भैंस के दूध पर 7 रुपये और गाय के दूध पर 3 रुपये प्रति लीटर बढ़ोतरी की बात कही गई थी।
ये चुनावी वादे हैं, अब नए संचालक मंडल के सामने इन घोषणाओं को अमल में लाने, दूध उत्पादकों के भुगतान, पशुखाद्य की लागत और दूध संकलन क्षमता से जुड़े सवालों का जवाब देने की चुनौती होगी।
गोकुळ की 2025-26 की अस्थायी आर्थिक जानकारी के अनुसार, संस्था का कारोबार लगभग 4,185 करोड़ रुपये रहा। इतने बड़े सहकारी कारोबार में दूध खरीद दर, पशुखाद्य की कीमत और प्रसंस्करण क्षमता से जुड़े फैसले हजारों उत्पादकों की आय को प्रभावित कर सकते हैं।
गोकुळ का अगला अध्यक्ष कौन होगा?
सतेज पाटील ने चुनाव प्रचार के दौरान बहुमत मिलने पर शशिकांत पाटील चुयेकर को अध्यक्ष बनाने की घोषणा की थी। लेकिन चुनाव में जीत और अध्यक्ष पद पर औपचारिक चयन अलग प्रक्रियाएं हैं। नए संचालक मंडल की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही अध्यक्ष के नाम पर अंतिम स्थिति स्पष्ट होगी।
फिलहाल गोकुळ चुनाव का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सहकारी क्षेत्र में स्थानीय नेतृत्व, प्रतिनिधियों का समर्थन और दूध उत्पादकों के आर्थिक हित निर्णायक मुद्दे बने हुए हैं। अब सतेज पाटील के नेतृत्व वाली आघाड़ी के सामने चुनावी जीत को संस्था के कामकाज और दूध उत्पादकों के लिए ठोस फैसलों में बदलने की जिम्मेदारी होगी।
