कांदिवली भूखंड मामला: 21 साल बाद म्हाडा को कब्जा देने का आदेश

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कांदिवली के चारकोप में 2005 से लंबित भूखंड कब्जे के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने म्हाडा को चार सप्ताह में कब्जा सौंपने का आदेश दिया।

मुंबई: कांदिवली पश्चिम के चारकोप में आवंटित भूखंड का कब्जा पाने के लिए 21 साल से इंतजार कर रहे आवंटी को बॉम्बे हाईकोर्ट ने बड़ी राहत दी है। हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र गृहनिर्माण व क्षेत्र विकास प्राधिकरण (म्हाडा) को भूखंड का वास्तविक कब्जा चार सप्ताह के भीतर सौंपने का निर्देश दिया है। अदालत ने इतने लंबे समय तक संपत्ति के कब्जे से वंचित रखने को न्याय का मजाक बताते हुए प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की।

न्यायमूर्ति मकरंद कर्णिक और न्यायमूर्ति संदेश पाटील की खंडपीठ ने राजेश तानाजी बचाव की रिट याचिका क्रमांक 2283/2021 पर 26 अक्टूबर 2026 को यह फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि म्हाडा द्वारा निष्पादित पंजीकृत लीज डीड को किसी सक्षम न्यायालय ने रद्द नहीं किया है। ऐसे में आवंटी को भूखंड का कब्जा देने से रोकने का उचित आधार नहीं बनता।

2005 में लीज डीड, लेकिन नहीं मिला भूखंड का कब्जा

यह मामला कांदिवली पश्चिम के चारकोप स्थित आरएससी-11 इलाके के भूखंड क्रमांक 100 से जुड़ा है। इसका क्षेत्रफल 76.75 वर्ग मीटर है। म्हाडा ने खुले भूखंडों के आवंटन के लिए विज्ञापन जारी किया था, जिसके बाद राजेश तानाजी बचाव ने आवेदन किया और उन्हें यह भूखंड आवंटित हुआ।

आवंटन के बाद निर्धारित प्रीमियम और लीज किराये की रकम स्वीकार कर म्हाडा ने 27 अक्टूबर 2005 को उनके पक्ष में पंजीकृत लीज डीड निष्पादित की। इसके बावजूद उन्हें भूखंड का वास्तविक और भौतिक कब्जा नहीं मिला।

कब्जा पाने के लिए लगातार प्रयास करने और संबंधित प्राधिकरणों से पत्राचार करने के बाद भी समस्या का समाधान नहीं हुआ। आखिरकार राजेश बचाव ने 2021 में बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

CRZ का हवाला देकर म्हाडा ने रोका था कब्जा

हाईकोर्ट में म्हाडा की ओर से दलील दी गई कि संबंधित भूखंड समुद्र तटीय नियमन क्षेत्र (CRZ) में आता है। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े पुराने न्यायिक आदेशों के कारण वहां विकास कार्य करना संभव नहीं है। इसलिए भूखंड का कब्जा सौंपने में कानूनी अड़चन है।

म्हाडा ने यह भी दावा किया कि मूल आवंटी ने भूखंड किसी तीसरे व्यक्ति को हस्तांतरित कर दिया है। इस आधार पर भी याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाया गया।

हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में म्हाडा का 4 अगस्त 2021 का एक पत्र पेश किया गया। इस पत्र में प्राधिकरण ने संबंधित भूखंड को CRZ प्रभावित क्षेत्र में नहीं आने की बात कही थी। इससे म्हाडा की बाद की दलील पर सवाल खड़ा हुआ।

अदालत ने क्यों खारिज की म्हाडा की दलील?

खंडपीठ ने पाया कि 27 अक्टूबर 2005 को निष्पादित पंजीकृत लीज डीड को किसी सक्षम न्यायालय ने रद्द या अवैध घोषित नहीं किया है। म्हाडा भी इस दस्तावेज के निष्पादन से इनकार नहीं कर रहा था।

अदालत ने यह भी पाया कि भूखंड को किसी तीसरे व्यक्ति को हस्तांतरित किए जाने के दावे के समर्थन में म्हाडा के पास कोई ठोस दस्तावेज नहीं था। केवल इस तरह की आपत्ति के आधार पर आवंटी को लंबे समय तक कब्जे से वंचित रखना उचित नहीं है।

खंडपीठ ने कहा कि यदि भविष्य में तीसरे पक्ष को हस्तांतरण से संबंधित ठोस प्रमाण सामने आते हैं, तो म्हाडा कानून के अनुसार उचित कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र रहेगा।

चारकोप में मैंग्रोव और पर्यावरणीय प्रतिबंधों का पुराना विवाद

चारकोप का यह मामला मुंबई में म्हाडा की पुरानी भूखंड आवंटन योजनाओं और मैंग्रोव संरक्षण से जुड़े कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि में भी महत्वपूर्ण है।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 6 अक्टूबर 2005 को मैंग्रोव क्षेत्रों के आसपास 50 मीटर के बफर क्षेत्र में निर्माण गतिविधियों पर अंतरिम रोक लगाई थी। इसके बाद 29 जुलाई 2015 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने बॉम्बे एनवायरनमेंट एक्शन ग्रुप बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले में म्हाडा की विभिन्न भूखंड योजनाओं और पर्यावरणीय प्रतिबंधों पर विचार किया था।

इसके बाद 25 फरवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश में भी चारकोप स्थित म्हाडा लेआउट के संबंध में यथास्थिति बनाए रखने का उल्लेख आया था। इसी पर्यावरणीय पृष्ठभूमि का हवाला म्हाडा ने मौजूदा मामले में दिया।

हालांकि, मौजूदा याचिका में हाईकोर्ट ने यह तय नहीं किया कि संबंधित भूखंड CRZ बफर क्षेत्र में आता है या नहीं। अदालत ने केवल भूखंड के कब्जे से जुड़े विवाद पर फैसला दिया है।

कब्जा देने का आदेश, लेकिन निर्माण की अनुमति नहीं

इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भूखंड का कब्जा सौंपने और उस पर निर्माण करने की अनुमति को अदालत ने अलग-अलग विषय माना है।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि इस याचिका में भूखंड पर निर्माण की अनुमति का प्रश्न तय नहीं किया जा रहा है। साथ ही, CRZ बफर क्षेत्र से जुड़े विवाद पर भी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया गया है।

इसका मतलब है कि राजेश बचाव को भूखंड का कब्जा मिलने के बाद भी निर्माण के लिए लागू पर्यावरणीय नियमों और संबंधित प्राधिकरणों की आवश्यक अनुमतियों का पालन करना होगा।

म्हाडा को चार सप्ताह में कब्जा सौंपने का निर्देश

बॉम्बे हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए म्हाडा को भूखंड क्रमांक 100 का वास्तविक कब्जा सौंपने का आदेश दिया। इसके लिए आदेश की प्रति प्रतिवादी क्रमांक 1 के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की तारीख से चार सप्ताह की समयसीमा निर्धारित की गई है।

फैसला सुनाए जाने के बाद म्हाडा के वकील ने आदेश पर रोक लगाने की मांग भी की, लेकिन खंडपीठ ने इसे स्वीकार नहीं किया।

यह फैसला उन नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण है जिन्हें सरकारी प्राधिकरण से भूखंड का आवंटन और पंजीकृत लीज डीड मिलने के बावजूद वास्तविक कब्जा नहीं मिल पाया है। हालांकि, प्रत्येक मामले में आवंटन की शर्तें, पर्यावरणीय स्थिति और संबंधित कानूनी आदेश अलग हो सकते हैं।

3 नवंबर 2026 तक इस भूखंड का वास्तविक कब्जा सौंपे जाने की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। फिलहाल हाईकोर्ट का आदेश म्हाडा को निर्धारित समयसीमा में कब्जा देने का निर्देश देता है।

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