BJP की ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ पदयात्रा के बीच सवाल उठ रहे हैं कि सरकार जनता के विरोध, बेरोजगारी, महंगाई और घरेलू बचत जैसे मुद्दों पर कितनी जवाबदेह है।
नई दिल्ली: देश में लोकतंत्र, चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची को लेकर सियासी बहस तेज है। विपक्षी INDIA गठबंधन की ओर से 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली आयोजित करने की तैयारी के बीच भारतीय जनता पार्टी ने भी अपना अभियान शुरू किया है। BJP ने ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ के नारे के साथ देशभर में पदयात्रा और जनसंपर्क कार्यक्रमों की शुरुआत की है। भाजपा पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन ने 28 अक्टूबर को दिल्ली के चांदनी चौक में पदयात्रा का नेतृत्व किया। BJP का कहना है कि इस अभियान के जरिए विपक्ष के आरोपों का जवाब दिया जाएगा और चुनावी प्रक्रिया तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता का भरोसा मजबूत किया जाएगा।
लेकिन इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के बीच एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या रैलियों और पदयात्राओं से ही जनता का भरोसा हासिल किया जा सकता है? क्या सरकार में बैठी राजनीतिक दल की रैली यह साबित कर सकती है कि सरकार सही है और विपक्ष गलत? लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को अपना पक्ष रखने और विरोध करने का पूरा अधिकार है, लेकिन जनता को भी सरकार से सवाल पूछने और अपने मुद्दों पर जवाब मांगने का अधिकार है।
आज आम नागरिकों के सामने रोजगार, महंगाई, आमदनी, बचत, शिक्षा और भविष्य की सुरक्षा जैसे कई सवाल हैं। ऐसे में लोकतंत्र बचाने की राजनीतिक मुहिम के साथ यह चर्चा भी जरूरी है कि आम जनता की रोजमर्रा की समस्याओं पर सरकार की प्राथमिकता क्या है?
जब प्रधानमंत्री की अपील पर देश एक साथ आया, तो जनता की आवाज क्यों नहीं सुनी जाती?
कोरोना महामारी के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से कई बार सामूहिक अपील की थी। 22 मार्च 2020 को जनता कर्फ्यू के दौरान शाम 5 बजे स्वास्थ्यकर्मियों और आवश्यक सेवाओं से जुड़े लोगों के सम्मान में ताली बजाने, थाली बजाने और घंटियां बजाने की अपील की गई थी। इसके बाद 5 अप्रैल 2020 को रात 9 बजे नौ मिनट तक घरों की लाइट बंद कर दीपक, मोमबत्ती, टॉर्च या मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाने का आह्वान किया गया था।
इन अपीलों का मकसद कोरोना संकट के दौरान एकजुटता और सेवा में जुटे लोगों के प्रति आभार व्यक्त करना था। देशभर में बड़ी संख्या में लोगों ने इन कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। यह दिखाता है कि प्रधानमंत्री की अपील देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच सकती है और करोड़ों लोग एक ही समय पर किसी सार्वजनिक आह्वान में शामिल हो सकते हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब सरकार देशभर में किसी संदेश को पहुंचाने और लोगों को एक साथ जोड़ने की क्षमता रखती है, तो बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, सरकारी भर्ती और नागरिकों की शिकायतों जैसे मुद्दों पर भी इतनी ही गंभीरता क्यों नहीं दिखाई जाती?
जनता को केवल अपील और संदेश नहीं, बल्कि अपनी समस्याओं का समाधान भी चाहिए।
नोटबंदी के फैसले पर भी जनता आज तक सवाल पूछती है
8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 और 1,000 रुपये के पुराने नोटों को आधी रात से कानूनी रूप से अमान्य करने का ऐलान किया था। सरकार ने इस फैसले के पीछे काले धन, नकली नोटों और आतंकवाद की फंडिंग पर रोक लगाने जैसे उद्देश्य बताए थे।

इस फैसले के बाद आम नागरिकों को पुराने नोट जमा कराने और नकदी प्राप्त करने के लिए बैंकों तथा एटीएम के बाहर लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ा। छोटे कारोबारियों, दैनिक मजदूरी करने वालों और नकदी पर निर्भर लोगों को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
यहां सवाल किसी एक फैसले का समर्थन या विरोध करने का नहीं, बल्कि सरकार की जवाबदेही का है। जब सरकार देश की पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला बड़ा फैसला ले सकती है और जनता से उसका पालन करवा सकती है, तो उस फैसले के परिणामों पर जनता के सवालों का जवाब देना भी उसकी जिम्मेदारी है।
क्या किसी बड़े सरकारी फैसले की सफलता केवल उसके ऐलान से तय होनी चाहिए, या उसके वास्तविक परिणामों और आम लोगों पर पड़े प्रभाव का भी हिसाब होना चाहिए?
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वाले छात्रों और युवाओं के साथ क्या हुआ?
लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और अपनी मांग रखने का अधिकार महत्वपूर्ण है। जंतर-मंतर लंबे समय से छात्रों, सामाजिक संगठनों, कर्मचारियों और आम नागरिकों के विरोध-प्रदर्शन का प्रमुख स्थान रहा है।
अक्टूबर 2026 में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान दिल्ली में पुलिस ने बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। NDTV की 3 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने करीब 1,000 लोगों को हिरासत में लिया था। पुलिस का कहना था कि प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं ली गई थी और नई दिल्ली जिले में निषेधाज्ञा लागू थी।
इसके अलावा, 10 और 11 अक्टूबर के दौरान युवा प्रदर्शनकारियों के विरोध को रोकने और हिरासत में लेने की घटनाओं पर भी सवाल उठे। Associated Press ने अपनी रिपोर्ट में हजारों लोगों को हिरासत में लिए जाने, प्रदर्शन स्थल की ओर जाने वाले रास्तों पर रोक और पुलिस की कार्रवाई का विवरण दिया। वहीं Amnesty International ने 14 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की कोशिश करने वाले Cockroach Janta Party के नेताओं की गिरफ्तारी और विरोध स्थल के दर्जे में बदलाव पर चिंता जताई।
यहां पुलिस का पक्ष और प्रदर्शनकारियों के आरोप दोनों सामने रखना जरूरी है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन उन अधिकारों का इस्तेमाल किस परिस्थिति में और किस सीमा तक किया गया, यह भी सार्वजनिक जवाबदेही का विषय है।
यदि कोई प्रदर्शन शांतिपूर्ण है, तो क्या उसे अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलना चाहिए? यदि किसी प्रदर्शन में हिंसा या कानून का उल्लंघन हुआ है, तो उसकी स्पष्ट जानकारी और कार्रवाई का आधार जनता के सामने क्यों नहीं रखा जाना चाहिए?
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार असीमित नहीं है, लेकिन कानून-व्यवस्था के नाम पर शांतिपूर्ण असहमति की जगह भी खत्म नहीं होनी चाहिए। सरकार और प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि विरोध-प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थानों और अनुमति की व्यवस्था में बदलाव किस आधार पर किए जा रहे हैं।
क्या राजनीतिक रैलियों से बेरोजगार युवाओं की समस्या हल होगी?
देश में बेरोजगारी और रोजगार की गुणवत्ता युवाओं के लिए बड़े मुद्दे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, PLFS 2025 में 15 से 29 वर्ष के युवाओं की बेरोजगारी दर 9.9 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि 2024 में यह 10.3 प्रतिशत थी। शहरी युवाओं में यह दर 13.6 प्रतिशत रही।
सरकारी आंकड़ों में सुधार दर्ज होना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर युवा को रोजगार मिल गया है या नौकरी की तलाश कर रहे सभी लोगों की परेशानी समाप्त हो गई है। बड़ी संख्या में युवा सरकारी भर्तियों, प्रतियोगी परीक्षाओं, निजी नौकरियों और स्थायी रोजगार के अवसरों का इंतजार कर रहे हैं।

कई युवा वर्षों तक परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। भर्ती प्रक्रिया में देरी, परीक्षा रद्द होने, पेपर लीक के आरोप और नियुक्तियों में लंबा इंतजार उनके भविष्य को प्रभावित करते हैं। दूसरी ओर, निजी क्षेत्र में नौकरी मिलने के बाद भी कम वेतन, अस्थायी रोजगार और नौकरी की सुरक्षा का सवाल बना रहता है।
ऐसे में राजनीतिक दलों को केवल लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया पर बयान देने के बजाय यह भी बताना चाहिए कि युवाओं के लिए स्थायी और सम्मानजनक रोजगार के अवसर बढ़ाने की उनकी ठोस योजना क्या है।
GDP की वृद्धि के साथ आम परिवार की आर्थिक स्थिति पर भी चर्चा जरूरी
भारत की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को लेकर सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अपने-अपने अनुमान हैं। अक्टूबर 2026 में Reuters के अर्थशास्त्रियों के सर्वे में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की GDP वृद्धि दर 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि देश की GDP खत्म होती जा रही है।
लेकिन GDP की वृद्धि और आम परिवार की आर्थिक स्थिति एक ही बात नहीं हैं। किसी देश की अर्थव्यवस्था बढ़ सकती है, फिर भी कई परिवारों को अपनी आय, खर्च, कर्ज और बचत के बीच संतुलन बनाने में परेशानी हो सकती है।
महंगाई के कारण घर का बजट प्रभावित होता है। किराया, बच्चों की पढ़ाई, इलाज, यात्रा और रोजमर्रा की जरूरतों पर खर्च बढ़ने से परिवारों के पास बचत के लिए कम पैसा बच सकता है। छोटे कारोबारियों और मध्यम वर्ग के लिए भी आमदनी और खर्च का संतुलन एक बड़ी चुनौती हो सकता है।
घरेलू बचत को लेकर सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 में परिवारों की कुल बचत में वृद्धि दर्ज हुई। वित्त मंत्रालय की ओर से संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, घरेलू बचत 2022-23 के 52.25 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 69.01 लाख करोड़ रुपये हुई। वहीं घरेलू देनदारियां 2023-24 के 18.8 लाख करोड़ रुपये से घटकर 2024-25 में 15.7 लाख करोड़ रुपये दर्ज की गईं।
इसलिए यह दावा करना भी सही नहीं होगा कि देश की कुल घरेलू बचत लगातार घट रही है। लेकिन राष्ट्रीय स्तर के आंकड़े हर परिवार की आर्थिक स्थिति नहीं बताते। सवाल यह है कि क्या आम परिवार अपनी आय से घर चलाने, बच्चों की शिक्षा, इलाज और भविष्य के लिए पर्याप्त बचत कर पा रहा है? क्या कम और मध्यम आय वाले परिवारों की आर्थिक सुरक्षा मजबूत हो रही है?
सोना खरीदने की क्षमता, बैंक में जमा बचत और रोजमर्रा के खर्च जैसे मुद्दों को भी इसी व्यापक आर्थिक चर्चा का हिस्सा बनाना चाहिए। सरकार को केवल GDP की वृद्धि नहीं, बल्कि आम नागरिक की क्रय शक्ति और आर्थिक सुरक्षा पर भी ध्यान देना होगा।
योजनाओं का प्रचार जनता तक पहुंच सकता है, तो शिकायतों का जवाब क्यों नहीं?
केंद्र और राज्य सरकारें अपनी योजनाओं के प्रचार के लिए विज्ञापन, सोशल मीडिया, सरकारी कार्यक्रम, जनसभाएं और जनसंपर्क अभियान चलाती हैं। सरकारी योजनाओं की जानकारी देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाने के लिए बड़े स्तर पर प्रयास किए जाते हैं।

ऐसे में सवाल है कि जब सरकार किसी योजना का प्रचार करके उसे जनता तक पहुंचा सकती है, तो योजना का लाभ नहीं मिलने वाले लोगों की शिकायतों के समाधान के लिए भी क्या उतनी ही प्रभावी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए?
कई बार नागरिकों को सरकारी योजना की पात्रता, आवेदन, दस्तावेज, लाभार्थी सूची और भुगतान से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने में परेशानी होती है। किसी योजना का प्रचार होना और उसका लाभ सही पात्र व्यक्ति तक पहुंचना दो अलग-अलग बातें हैं।
सरकार को यह भी बताना चाहिए कि कितने पात्र लोगों को योजनाओं का लाभ मिला, कितने आवेदन लंबित हैं और शिकायतों के निपटारे में कितना समय लग रहा है।
क्या लोकतंत्र केवल चुनाव और रैलियों तक सीमित है?
लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव कराना, राजनीतिक सभाएं करना या किसी दल के समर्थन में रैली निकालना नहीं है। लोकतंत्र में जनता को सरकार चुनने के साथ-साथ उससे सवाल पूछने, नीतियों की आलोचना करने और अपनी समस्याओं को सामने रखने का अधिकार भी है।

BJP का ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान विपक्ष के SIR संबंधी आरोपों का जवाब देने और अपनी राजनीतिक स्थिति स्पष्ट करने का प्रयास है। दूसरी ओर, विपक्ष चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची में बदलाव को लेकर सवाल उठा रहा है। दोनों पक्षों को अपने दावों के समर्थन में तथ्य और प्रमाण जनता के सामने रखने चाहिए।
लेकिन इस राजनीतिक बहस के बीच आम जनता के मुद्दे पीछे नहीं छूटने चाहिए। जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसकी नौकरी, आमदनी, बचत, शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य से जुड़े सवालों पर सरकार क्या कर रही है।
रैली निकालना राजनीतिक अधिकार है, विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है और सरकार से जवाब मांगना नागरिकों का अधिकार है। इनमें से किसी एक अधिकार को दूसरे के खिलाफ खड़ा नहीं किया जाना चाहिए।
सरकार से जनता के ये सवाल जवाब मांगते हैं
- जब प्रधानमंत्री की अपील पर देशभर में करोड़ों लोगों तक संदेश पहुंच सकता है, तो आम जनता की शिकायतों के समाधान के लिए ऐसी प्रभावी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जाती?
- नोटबंदी जैसे बड़े फैसले के वास्तविक परिणामों और आम नागरिकों पर पड़े प्रभाव का निष्पक्ष मूल्यांकन जनता के सामने किस तरह रखा गया?
- जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वाले छात्रों और युवाओं को हिरासत में लेने तथा प्रदर्शन स्थल पर प्रतिबंधों के पीछे प्रशासन का स्पष्ट आधार क्या था?
- शांतिपूर्ण प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था की स्थिति में अंतर तय करने के लिए पुलिस की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित की जाएगी?
- सरकारी भर्तियों में देरी, परीक्षा विवाद और युवाओं के रोजगार से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए क्या समयबद्ध योजना है?
- GDP की वृद्धि के साथ आम परिवारों की आय, बचत और क्रय शक्ति मजबूत करने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है?
- सरकारी योजनाओं के प्रचार के साथ पात्र लाभार्थियों तक वास्तविक लाभ पहुंचाने और शिकायतों के निपटारे की निगरानी कैसे की जा रही है?
- क्या सरकार विपक्ष और नागरिक संगठनों के सवालों का जवाब राजनीतिक आरोपों के बजाय दस्तावेजों, आंकड़ों और सार्वजनिक संवाद के माध्यम से देगी?
जनता को नारों से आगे जवाब चाहिए
देश में राजनीतिक दलों के बीच लोकतंत्र, चुनावी प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर बहस जारी है। BJP अपनी पदयात्रा के जरिए विपक्ष के आरोपों का जवाब देना चाहती है, जबकि विपक्ष भी रैली और विरोध-प्रदर्शन के माध्यम से अपने सवाल उठा रहा है। यह राजनीतिक गतिविधियां लोकतंत्र का हिस्सा हैं।
लेकिन आम नागरिक के लिए सबसे जरूरी सवाल यह है कि उसकी जिंदगी में क्या बदलाव आ रहा है। क्या युवा को रोजगार मिल रहा है? क्या परिवार अपनी आमदनी से सम्मानजनक जीवन जी पा रहा है? क्या छोटे कारोबारियों को राहत मिल रही है? क्या सरकारी योजनाओं का लाभ सही लोगों तक पहुंच रहा है? क्या छात्र और नागरिक बिना डर के अपनी बात रख सकते हैं?
सरकार और विपक्ष दोनों को यह समझना होगा कि जनता केवल राजनीतिक नारों से संतुष्ट नहीं हो सकती। लोकतंत्र में भरोसा तभी मजबूत होता है जब सत्ता में बैठे लोग सवालों का जवाब दें, विपक्ष तथ्यों के साथ अपनी बात रखे और नागरिकों की समस्याओं को राजनीतिक बहस से ऊपर प्राथमिकता मिले।
आखिरकार, लोकतंत्र बचाने का दावा केवल रैलियों और पदयात्राओं से नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों की रक्षा, जवाबदेही, रोजगार, आर्थिक सुरक्षा और नागरिकों की आवाज सुनने से मजबूत होता है। देश की जनता को यह जानना है कि राजनीतिक दलों की इस बहस के बीच उसके वास्तविक मुद्दों पर काम कब और कैसे होगा।
Official Sources & Reports
- प्रधानमंत्री का 22 मार्च 2020 का राष्ट्र के नाम संबोधन — PM India
- प्रधानमंत्री का 5 अप्रैल 2020 का संबोधन — PM India
- 8 नवंबर 2016 का नोटबंदी संबंधी संबोधन — PM India
- PLFS Annual Report 2025 — Press Information Bureau
- घरेलू बचत और देनदारियों पर संसद में दिया गया जवाब — लोकसभा दस्तावेज
- BJP की ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ पदयात्रा — NDTV
- जंतर-मंतर प्रदर्शन में हिरासत — NDTV, 3 अक्टूबर 2026
- जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई — Amnesty International, 14 अक्टूबर 2026
- छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई — Human Rights Watch
- भारत की आर्थिक वृद्धि पर अर्थशास्त्रियों का सर्वे — Reuters, 27 अक्टूबर 2026
प्रकाशन से पहले संपादकीय नोट: जंतर-मंतर से जुड़ी अक्टूबर की अलग-अलग घटनाओं को लेख में अलग संदर्भों के साथ रखा गया है। पुलिस के अनुमति और कानून-व्यवस्था संबंधी पक्ष तथा मानवाधिकार संगठनों की आपत्तियां दोनों शामिल हैं। इससे लेख में तथ्य और विश्लेषण अलग बने रहते हैं।
