मुंबई के गोरेगांव में रिडेवलपमेंट में देरी के मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने बिल्डर की याचिका खारिज की। जानें सोसायटी का केस, मुआवजे की शर्त और फैसला।
मुंबई: गोरेगांव में हाउसिंग सोसायटी के पुनर्विकास में देरी को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट ने बिल्डर कुमार अर्बन डेवलपमेंट प्राइवेट लिमिटेड को बड़ा झटका दिया है। न्यायमूर्ति आरती अरुण साठे की पीठ ने सेटलमेंट के फैसले को चुनौती देने वाली कंपनी की याचिका खारिज कर दी। यह मामला उन हाउसिंग सोसायटियों के लिए अहम है, जहां बिल्डर तय समय पर पुनर्विकास का काम पूरा नहीं करते और फ्लैट मालिकों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है।
यह विवाद गोरेगांव पश्चिम की “जल रत्न दीप को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी लिमिटेड” और बिल्डर के बीच हुए पुनर्विकास समझौते से जुड़ा है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने 23 अक्टूबर 2026 को इस मामले में फैसला सुनाया।
2011 में हुआ था पुनर्विकास का समझौता
जल रत्न दीप को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी ने 12 जनवरी 2011 को “कुमार अर्बन डेवलपमेंट प्राइवेट लिमिटेड” के साथ पुनर्विकास समझौता किया था। इसमें तय किया गया था कि निर्धारित समय में काम पूरा नहीं होने पर अनुबंध की शर्तों के अनुसार बिल्डर को सोसायटी को मुआवजा देना होगा।
समझौते की धारा 26 में पात्र देरी के लिए हर सप्ताह 10 लाख रुपये के लिक्विडेटेड डैमेजेज का प्रावधान था। इसका मतलब है कि एग्रीमेंट में संभावित नुकसान के लिए पहले से एक रकम तय की गई थी, जिसकी वसूली लागू कानूनी शर्तों और मामले की परिस्थितियों के अधीन होती है।
काम में देरी को लेकर विवाद बढ़ने के बाद मामला सेटलमेंट तक पहुंचा। सेटलमेंट ने बिल्डर की देरी के लिए मुआवजे का आदेश दिया। इसके बाद कंपनी ने सेटलमेंट एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत बॉम्बे हाई कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी।
मुआवजे की रकम को लेकर क्या है मामला?
इस केस में मुआवजे की कैलकुलेशन महत्वपूर्ण है। यदि 62 सप्ताह की देरी पर हर सप्ताह 10 लाख रुपये की दर से कैलकुलेट की जाए, तो कुल रकम 6.20 करोड़ रुपये होती है। हालांकि, इस मामले के उपलब्ध कानूनी विवरण में सेटलमेंट द्वारा समायोजन के बाद 2.67 करोड़ रुपये का मुआवजा तय किए जाने का उल्लेख भी है।
हाई कोर्ट ने बिल्डर की याचिका क्यों खारिज की?
मामले में मुख्य सवाल यह था कि क्या एग्रीमेंट में तय मुआवजे की शर्त को चुनौती देकर सेटलमेंट के फैसले को रद्द कराया जा सकता है।
भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 74 के तहत एग्रीमेंट उल्लंघन होने पर उचित मुआवजे का सवाल उठता है। एग्रीमेंट में किसी निश्चित रकम का उल्लेख होने भर से हर परिस्थिति में पूरी रकम अपने आप देय नहीं हो जाती। वहीं, सेटलमेंट एवं सुलह अधिनियम की धारा 34 के तहत अदालत सेटलमेंट पुरस्कार को केवल निर्धारित कानूनी आधारों पर ही रद्द कर सकती है।
इस मामले में हाई कोर्ट ने बिल्डर की चुनौती स्वीकार नहीं की और सेल्टलमेंट के फैसले को बरकरार रखा। इससे स्पष्ट होता है कि एग्रीमेंट में तय शर्तों और सेटलमेंट के निष्कर्षों को चुनौती देने के लिए केवल असहमति पर्याप्त नहीं है; कानूनी आधार भी जरूरी होता है।
मुंबई की दूसरी हाउसिंग सोसायटियों के लिए क्या मायने हैं?
मुंबई में पुरानी इमारतों का रिडेवलपमेंट कई सोसायटियों के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है। ऐसे प्रोजेक्ट में देरी होने पर फ्लैट मालिकों को वैकल्पिक आवास, किराए और अपने नए घर का कब्जा मिलने को लेकर परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
इस फैसले से सोसायटियों के लिए कुछ महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं:
- पुनर्विकास समझौते में काम पूरा करने की समय-सीमा और देरी पर मुआवजे की शर्त स्पष्ट होनी चाहिए।
- बिल्डर की ओर से हुई देरी, दिए गए नोटिस और निर्माण की प्रगति से जुड़े दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए।
- विवाद होने पर सोसायटी को एग्रीमेंट की शर्तों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उचित कानूनी उपाय तलाशने चाहिए।
- मुआवजे का फैसला आने का अर्थ यह नहीं है कि पुनर्विकास का काम अपने आप पूरा हो जाएगा या सोसायटी को तत्काल भुगतान मिल जाएगा।
इससे पहले भी मुंबई में पुनर्विकास को लेकर अलग-अलग कानूनी विवाद सामने आए हैं। गोरेगांव “जय भुवन को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी” और “कुंदनमल कोठारी” से जुड़े मामले में किराए और छत संबंधी दावों को सेटलमेंट के लिए भेजने का सवाल उठा था। वहीं, अराम नगर “मीना को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी” और “परिनी अराम नगर मीना रीडेवलपमेंट प्राइवेट लिमिटेड” से जुड़े विवाद में नए डेवलपर के जरिए पुनर्विकास आगे बढ़ाने का मुद्दा सामने आया। “संगत सदन को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी” और “गिनी ग्लोबल नेक्स्ट एलएलपी” से जुड़े मामले में भी पुनर्विकास जारी रखने के अधिकार पर विवाद हुआ था। ये अलग मामले हैं, लेकिन बताते हैं कि पुनर्विकास विवाद में मुआवजे के साथ-साथ किराया, एग्रीमेंट और प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने का अधिकार भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
अब आगे क्या होगा?
जल रत्न दीप सोसायटी के मामले में हाई कोर्ट द्वारा बिल्डर की याचिका खारिज किए जाने के बाद सेटलमेंट का फैसला बरकरार है। अदालत ने कोर्ट में जमा राशि को फैसला अपलोड होने के एक महीने के भीतर जारी करने का निर्देश भी दिया।
इस मामले का मुख्य संदेश यह है कि पुनर्विकास समझौते में तय समय-सीमा और देरी के लिए मुआवजे की शर्तें महत्वपूर्ण हैं। लेकिन किसी सोसायटी को कितना मुआवजा मिलेगा और वह रकम कब प्राप्त होगी, यह एग्रीमेंट, सेटलमेंट के फैसले और आगे की कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
