मुंबई के मालाड में फर्जी CID अधिकारी बनकर व्यापारी से ₹26.5 लाख की कथित ठगी हुई। पुलिस ने बैंक खाते की भूमिका के आरोप में बाप-बेटे को गिरफ्तार किया।
मुंबई: मालाड में 55 वर्षीय कपड़ा व्यापारी धनेश शाह से ₹26.5 लाख की कथित साइबर ठगी के मामले में उत्तर क्षेत्रीय साइबर सेल ने बाप-बेटे को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि ठगों ने खुद को CID अधिकारी बताकर व्यापारी को गंभीर आपराधिक मामले में फंसाने और गिरफ्तार करने की धमकी दी। जांच में अतुल गायकवाड़ और उनके बेटे विनीत गायकवाड़ से जुड़े एक कथित फर्जी कंपनी के बैंक खाते की भूमिका सामने आई, जिसका इस्तेमाल ठगी की रकम प्राप्त करने के लिए किया गया था।
गिरफ्तार आरोपियों की पहचान अतुल गायकवाड़ (48) और विनीत गायकवाड़ (24) के रूप में हुई है। पुलिस के मुताबिक, दोनों ने कथित साइबर अपराधियों को बैंक खाते की जानकारी उपलब्ध कराई थी, ताकि ठगी से हासिल रकम उसमें जमा की जा सके। मामले में कंपनी के निदेशकों के रूप में अतुल, उनकी पत्नी और विनीत के नाम सामने आए हैं।
फर्जी CID अधिकारी बनकर व्यापारी को गिरफ्तारी की धमकी
शिकायत के मुताबिक, मालाड में Shraddha Garments चलाने वाले धनेश शाह को 27 अगस्त 2026 को एक व्यक्ति का फोन आया। कॉल करने वाले ने खुद को CID अधिकारी बताया और दावा किया कि आदिल गौर नाम के व्यक्ति के घर पर हुई छापेमारी के दौरान शाह का आधार कार्ड मिला है।
आदिल गौर को पुलवामा आतंकी हमले से जुड़े एक आरोपी के रूप में पेश करते हुए कॉल करने वाले ने शाह को कथित तौर पर ₹95 करोड़ के घोटाले से जोड़ने की कोशिश की। उसे बताया गया कि उसकी पहचान का इस्तेमाल कर एक बैंक खाता खोला गया था, जिसके जरिए ₹7 करोड़ के लेन-देन हुए थे।
शाह पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने खाता खुलवाने में मदद करने के बदले ₹5 लाख और 15 प्रतिशत कमीशन लिया था। व्यापारी ने किसी तरह के संबंध से इनकार किया, लेकिन कथित ठगों ने गिरफ्तारी का डर दिखाकर उस पर दबाव बनाए रखा।
वीडियो कॉल पर पूछताछ, परिवार और बैंक खातों की जानकारी मांगी
ठगी को असली जांच जैसा दिखाने के लिए कथित आरोपियों ने वीडियो कॉल के जरिए पूछताछ की। इस दौरान शाह से उनके परिवार के सदस्यों, बैंक खातों, सोने और निवेश से जुड़ी जानकारी मांगी गई।
उन्हें सुप्रीम कोर्ट और मुंबई क्राइम ब्रांच के वरिष्ठ अधिकारियों के कथित हस्ताक्षर वाले दस्तावेज भी भेजे गए। इन दस्तावेजों का उद्देश्य आरोपों को विश्वसनीय दिखाना और व्यापारी के मन में गिरफ्तारी का डर पैदा करना बताया गया है।
इसके बाद शाह को परिवार का सोना गिरवी रखने और निर्धारित बैंक खाते में पैसे ट्रांसफर करने के लिए कहा गया। कथित ठगों ने आश्वासन दिया कि जांच पूरी होने के बाद रकम वापस कर दी जाएगी।
गिरफ्तारी के डर से शाह ने निर्देशों का पालन किया और कुल ₹26.5 लाख ट्रांसफर कर दिए। बाद में जब कॉल करने वालों ने जवाब देना बंद कर दिया और रकम वापस नहीं मिली, तब उन्होंने पुलिस से संपर्क किया।
बैंक खाते की जांच में सामने आई बाप-बेटे की कथित भूमिका
शिकायत मिलने के बाद पुलिस और साइबर सेल ने रकम के लेन-देन की जांच शुरू की। जांच के दौरान ट्रांसफर की गई राशि का संबंध गायकवाड़ परिवार से जुड़े एक निजी बैंक खाते से मिला।
पुलिस के अनुसार, अतुल और विनीत ने कथित तौर पर एक फर्जी कंपनी के नाम पर बैंक खाता खुलवाने और उसकी जानकारी साइबर अपराधियों तक पहुंचाने में मदद की थी। इस खाते का इस्तेमाल ठगी से प्राप्त रकम हासिल करने के लिए किया गया।
जांच में विनीत गायकवाड़ को पहले गिरफ्तार किया गया, जिसके बाद उसके पिता अतुल गायकवाड़ को भी गिरफ्तार किया गया। पुलिस को संदेह है कि खाते की सुविधा उपलब्ध कराने के बदले आरोपियों को कमीशन मिलता था।
हालांकि, कंपनी का पूरा विवरण, खाते में जमा रकम का आगे कहां ट्रांसफर हुआ, कितनी राशि फ्रीज या बरामद की गई और क्या अन्य लोग भी इस नेटवर्क में शामिल थे, इन सवालों पर अभी स्पष्ट जानकारी सामने आना बाकी है।
मुंबई में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी के अन्य मामले
मुंबई में सरकारी जांच एजेंसियों का नाम लेकर लोगों को डराने और पैसे ट्रांसफर करवाने के दूसरे मामले भी सामने आए हैं।
सितंबर 2026 में दहिसर के एक 68 वर्षीय व्यक्ति से कथित डिजिटल अरेस्ट के जरिए ₹1.12 करोड़ की ठगी के मामले में छह लोगों की गिरफ्तारी किया गया था। जांच में बैंक खातों और SIM कार्ड के जरिए रकम प्राप्त करने तथा आगे भेजने की कथित भूमिका की पड़ताल की गई थी।
अक्टूबर 2026 में महाराष्ट्र साइबर की तकनीकी जांच और दिल्ली पुलिस के साथ समन्वय से एक अन्य महिला को कथित डिजिटल अरेस्ट से बचाने की जानकारी भी सामने आई। उस मामले में महिला पहले ही ₹27 लाख ट्रांसफर कर चुकी थी।
इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि साइबर ठगी में केवल फर्जी कॉल ही नहीं, बल्कि बैंक खातों, डिजिटल लेन-देन और कथित सरकारी दस्तावेजों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है।
डिजिटल अरेस्ट की धमकी मिले तो क्या करें?
किसी व्यक्ति का खुद को पुलिस, CID, क्राइम ब्रांच या दूसरी जांच एजेंसी का अधिकारी बताना उसकी पहचान का प्रमाण नहीं है। भारत में डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है। इसलिए वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी की धमकी देकर पैसे मांगने वालों के निर्देशों का पालन नहीं करना चाहिए।
अगर कोई व्यक्ति जांच के नाम पर बैंक खाते, OTP, पासवर्ड, निवेश या परिवार की संपत्ति की जानकारी मांगता है, तो उसकी पहचान संबंधित एजेंसी के आधिकारिक संपर्क माध्यम से सत्यापित करें। किसी भी कथित जांच को पूरा करने या गिरफ्तारी से बचने के लिए पैसे ट्रांसफर न करें।
अगर साइबर ठगी हो चुकी है, तो तुरंत 1930 पर कॉल करें और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल https://cybercrime.gov.in/ पर शिकायत दर्ज करें। बैंक ट्रांजैक्शन की जानकारी, UTR नंबर, कॉल रिकॉर्ड और मैसेज को सुरक्षित रखना भी जांच में मददगार हो सकता है।
पुलिस जांच जारी
मामले में धोखाधड़ी, जबरन वसूली और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम से संबंधित प्रावधानों के तहत केस दर्ज किया गया है। आरोपियों की गिरफ्तारी और बैंक खाते की कथित भूमिका की जांच के बाद अब यह पता लगाना महत्वपूर्ण हो गया है, कि ठगी की रकम का आगे क्या हुआ और क्या इस मामले में अन्य लोग भी शामिल थे।
