ईरान के फर्स में 7.5 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस मिली है। 5.7 Tcf गैस निकाली जा सकती है, लेकिन युद्ध और प्रतिबंधों के बीच चुनौती उत्पादन की है।
नई दिल्ली: ईरान ने दक्षिणी फर्स प्रांत में एक नए गैस फील्ड की खोज का ऐलान किया है। यहां 7.5 ट्रिलियन क्यूबिक फीट से ज्यादा प्राकृतिक गैस होने का अनुमान है। ईरान के तेल मंत्री मोहसेन पाकनेजाद के मुताबिक इसमें से करीब 5.7 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस निकाली जा सकती है। यह खोज ऐसे समय हुई है जब ईरान का ऊर्जा सेक्टर युद्ध, अमेरिकी प्रतिबंधों और क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे के दबाव से गुजर रहा है।
नई खोज को तख्तेह गैस फील्ड बताया गया है। ईरानी नेशनल ऑयल कंपनी के अन्वेषण निदेशक सैयद मोहिउद्दीन जाफरी के मुताबिक यह फील्ड फर्स में खोंज शहर से करीब 10 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में है और पुराने शनुल व होमा गैस फील्ड से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित है।
जमीन के करीब नहीं, करीब 5 किलोमीटर नीचे मिली गैस
तख्तेह फील्ड का ढांचा करीब 50 किलोमीटर लंबा और 4 किलोमीटर चौड़ा बताया गया है। यहां गैस तक पहुंचने के लिए करीब 5 किलोमीटर गहराई तक खोजी ड्रिलिंग की गई। ड्रिलिंग के दौरान करीब 450 मीटर मोटी गैस वाली परत मिली। जाफरी के मुताबिक इस इलाके की भूगर्भीय बनावट काफी जटिल है और इसमें कई जगह परतों की दोहराव वाली संरचना और फॉल्टिंग की वजह से खोज का काम आसान नहीं था।
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इस एक खोजी कुएं तक पहुंचने में करीब 17 महीने लगे। यानी खबर में जिस गैस को लेकर अरबों डॉलर की बात हो रही है, वह अभी जमीन से निकालकर बाजार में पहुंच चुकी गैस नहीं है। पहले फील्ड को विकसित करना, कुएं तैयार करना, गैस को प्रोसेस करना और उसे इस्तेमाल या सप्लाई के लिए नेटवर्क से जोड़ना होगा।
7.5 Tcf में से 5.7 Tcf ही निकाली जा सकती है
ईरानी अधिकारियों के मुताबिक फील्ड में मौजूद कुल गैस 7.5 ट्रिलियन क्यूबिक फीट से ज्यादा है, जबकि करीब 5.7 ट्रिलियन क्यूबिक फीट को recoverable माना गया है। यानी जमीन के नीचे मौजूद पूरी गैस को निकाल पाना संभव नहीं माना जा रहा है।
5.7 Tcf को आसान भाषा में देखें तो यह करीब 161 अरब घन मीटर गैस के बराबर है। ईरान का कहना है कि recoverable मात्रा दक्षिण पार्स गैस फील्ड के एक standard phase से करीब 15 साल के उत्पादन के बराबर है। इसका मतलब पूरे ईरान की 15 साल की गैस जरूरत नहीं है, बल्कि दक्षिण पार्स के एक चरण के उत्पादन से की गई तुलना है।
गैस की खासियत भी कम नहीं
इस खोज की एक खास बात यह है कि यहां मिली गैस को sweet gas बताया गया है। इसका मतलब ऐसी गैस से है जिसमें sour gas की तुलना में हाइड्रोजन सल्फाइड जैसे घटक बहुत कम होते हैं। ईरानी अधिकारियों के मुताबिक इसे sweetening की अलग प्रक्रिया से गुजारने की जरूरत नहीं होगी, जिससे development और processing की राह कुछ छोटी हो सकती है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि गैस तुरंत बाजार में आ जाएगी। फील्ड की गहराई, जटिल भूगर्भीय संरचना, उत्पादन कुओं और बाकी बुनियादी सुविधाओं की जरूरत फिर भी बनी रहेगी।
गैस के साथ मिला एक और बड़ा संसाधन
तख्तेह फील्ड सिर्फ प्राकृतिक गैस तक सीमित नहीं है। यहां करीब 27 मिलियन बैरल गैस condensate होने का अनुमान दिया गया है, जिसमें करीब 20 मिलियन बैरल recoverable बताया गया है। इसे पेट्रोकेमिकल और रिफाइनिंग सेक्टर में इस्तेमाल किया जा सकता है या भविष्य में निर्यात किया जा सकता है।
इसी गैस और condensate की आर्थिक अहमियत को लेकर ईरानी अधिकारियों ने अरबों डॉलर का अनुमान सामने रखा है। अलग-अलग रिपोर्टिंग में करीब 40 से 45 अरब डॉलर तक का आंकड़ा आया है। इसे तत्काल होने वाली कमाई समझना सही नहीं होगा। यह जमीन के नीचे मौजूद संसाधनों की अनुमानित आर्थिक कीमत से जुड़ा आंकड़ा है।
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फिर ईरान के लिए यह खोज इतनी बड़ी क्यों है?
सवाल यह है कि जब ईरान के पास पहले से ही दुनिया के सबसे बड़े गैस भंडारों में से एक है, तो नई खोज इतनी अहम क्यों हो गई?
इसका जवाब ईरान की मौजूदा गैस स्थिति में छिपा है। देश का सबसे बड़ा गैस स्रोत दक्षिण पार्स है, जो ईरान और कतर के बीच साझा समुद्री गैस क्षेत्र है। दक्षिण पार्स ईरान की गैस उत्पादन व्यवस्था का करीब 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा देता है और यहां से मिलने वाली ज्यादातर गैस देश के अंदर ही इस्तेमाल होती है।
यानी ईरान के पास जमीन के नीचे संसाधन बहुत हैं, लेकिन उन्हें लगातार उत्पादन में बदलना अलग चुनौती है।
युद्ध ने पुरानी परेशानी और बढ़ा दी
ईरान की गैस व्यवस्था पर हाल के महीनों में युद्ध का असर भी पड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक युद्ध शुरू होने के बाद ईरान की गैस उत्पादन क्षमता में करीब 230 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन की कमी आई थी। जुलाई में अधिकारियों ने आने वाले महीनों में करीब 100 मिलियन घन मीटर प्रतिदिन क्षमता वापस लाने की बात कही थी।
यही वजह है कि तख्तेह की खोज को सिर्फ नई गैस मिलने की खबर के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। ईरान को पहले मौजूदा गैस ढांचे को संभालना है और उसके बाद नई खोज को production में बदलना होगा।
यह पहली बड़ी खोज भी नहीं है
तख्तेह से पहले अक्टूबर 2025 में ईरान ने दक्षिणी इलाके में पाजन गैस फील्ड की खोज की थी। वहां करीब 10 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस होने और लगभग 7 ट्रिलियन क्यूबिक फीट recoverable होने का अनुमान दिया गया था। उस समय ईरान ने production शुरू होने में करीब 40 महीने लगने का अनुमान बताया था।
इससे साफ है कि ईरान दक्षिणी इलाकों में नए gas resources खोजने पर लगातार काम कर रहा है। तख्तेह की खोज उसी बड़े exploration push की अगली कड़ी के रूप में सामने आई है।
लेकिन असली सवाल है—गैस निकलेगी कब?
तख्तेह से recoverable गैस की मात्रा सामने आ चुकी है, लेकिन इसके commercial production की कोई साफ तारीख ईरान ने अभी घोषित नहीं की है। फील्ड को production तक पहुंचाने के लिए नए कुएं, processing facilities, gathering system, pipelines और दूसरी जरूरी सुविधाएं तैयार करनी होंगी।
ईरान पहले से ही sanctions, निवेश की कमी और technology restrictions जैसी परेशानियों से जूझ रहा है। ऐसे में नई खोज को वास्तविक production में बदलना सिर्फ drilling का मामला नहीं होगा।
यानी जमीन के नीचे गैस मिलना पहला कदम है, उससे लगातार उत्पादन शुरू करना अगली बड़ी परीक्षा है।
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इस वक्त दुनिया के गैस बाजार में भी बड़ा बदलाव
तख्तेह की खोज ऐसे समय सामने आई है जब Strait of Hormuz की वजह से पूरी दुनिया का energy market दबाव में है।
26 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले छह महीनों में कतर की LNG exports करीब 96 प्रतिशत तक गिर गईं। पिछले साल की समान अवधि में जहां 509 Qatari LNG shipments हुई थीं, वहीं इस बार सिर्फ 18 shipments हुईं। युद्ध से पहले कतर दुनिया की करीब 20 प्रतिशत LNG supply देता था।
इसका असर सिर्फ कतर तक सीमित नहीं है। Hormuz से होकर गुजरने वाली energy supply में रुकावट ने एशिया के खरीदारों को दूसरे suppliers की तरफ देखने पर मजबूर किया है।
भारत के लिए इसका क्या मतलब है?
भारत के लिए यह हिस्सा और ज्यादा अहम है क्योंकि देश की LNG supply में कतर की बड़ी भूमिका रही है।
26 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक अगस्त में भारत को कतर से LNG imports शून्य तक पहुंच गए, जबकि अमेरिका से LNG supply करीब 0.75 मिलियन टन रही। लंबी दूरी से आने वाली supply के कारण भारत की import cost बढ़ने की आशंका भी जताई गई है।
भारत की energy dependence सिर्फ LNG तक सीमित नहीं है। Hormuz के रास्ते से आने वाली तेल, LNG और LPG supply में किसी भी लंबे disruption का असर import bill और energy prices पर पड़ सकता है। हाल में भारत ने Middle East पर निर्भरता घटाने के लिए दूसरे देशों से energy sourcing बढ़ाने की कोशिश भी की है।
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क्या भारत को अब ईरान से सस्ती गैस मिलेगी?
तख्तेह से भारत के लिए किसी direct gas supply agreement की घोषणा नहीं हुई है। ईरान को पहले इस गैस को commercial production में लाना होगा और फिर infrastructure, investment, sanctions तथा international trade की अड़चनों से निपटना होगा।
इसलिए इस खोज का भारत पर immediate फायदा किसी नई gas supply के रूप में नहीं दिख रहा है। इसका असर फिलहाल Middle East की energy supply और global LNG market में बदलाव के जरिए समझना ज्यादा सही होगा।
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आगे क्या बदलेगा?
ईरान के लिए तख्तेह की खोज निश्चित तौर पर बड़ा energy asset है। 7.5 ट्रिलियन क्यूबिक फीट से ज्यादा गैस, करीब 5.7 Tcf recoverable volume और condensate के बड़े भंडार ने देश की future energy potential को और बढ़ाया है।
लेकिन इस कहानी का अगला अध्याय अब जमीन के नीचे नहीं, जमीन के ऊपर लिखा जाएगा।
ईरान कितनी तेजी से इस field को develop करता है, युद्ध से प्रभावित energy infrastructure कितनी जल्दी मजबूत होता है, sanctions के बीच investment और technology का इंतजाम कैसे होता है और Hormuz के रास्ते regional energy trade कब सामान्य होता है—इन सवालों पर तय होगा कि आज मिला यह गैस भंडार आने वाले वर्षों में वास्तव में कितनी आर्थिक और ऊर्जा ताकत में बदल पाता है।
फिलहाल इतना साफ है कि ईरान ने गैस का बड़ा भंडार जरूर खोज लिया है, लेकिन अरबों डॉलर की संभावित दौलत को असली कमाई में बदलने की राह अभी बाकी है।
