Om Birla News: ज्ञानेश कुमार को हटाने के नए प्रस्ताव, पुराने नोटिस, संवैधानिक प्रक्रिया और SIR विवाद से जुड़े अहम सवालों के जवाब जानें।
नई दिल्ली: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए नए प्रस्ताव की संभावना पर कहा है कि कोई औपचारिक नोटिस मिलने पर निर्धारित नियमों और प्रक्रिया के अनुसार निर्णय लिया जाएगा। यह बयान ऐसे समय आया है, जब Special Intensive Revision (SIR) को लेकर विपक्ष चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहा है और ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग कर रहा है।
फिलहाल, ओम बिरला के बयान का मतलब यह नहीं है कि ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया है। नए नोटिस पर निर्णय, उसकी जांच और मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया अलग-अलग चरण हैं।
ओम बिरला ने ज्ञानेश कुमार पर क्या कहा?
22 अक्टूबर को संसद परिसर में 12वें BRICS Parliamentary Forum से पहले पत्रकारों से बातचीत के दौरान ओम बिरला से मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ नए प्रस्ताव की संभावना पर सवाल पूछा गया। उन्होंने कहा कि प्रस्ताव आने पर निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाएगा।
बिरला ने स्पष्ट किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए भी वही संवैधानिक प्रक्रिया लागू होती है, जो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के मामले में अपनाई जाती है। इसका अर्थ है कि किसी राजनीतिक मांग या बयान से पद से हटाने की प्रक्रिया अपने आप पूरी नहीं हो जाती।
ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए पहले क्या हुआ था?
विपक्ष ने 2026 में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई के लिए दो बार प्रयास किए हैं। पहली कोशिश के दौरान लोकसभा और राज्यसभा में दिए गए नोटिस दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने खारिज कर दिए थे। इन नोटिसों को खारिज करने के पीछे बताया गया कारण यह था कि लगाए गए आरोप हटाने की संवैधानिक कार्यवाही शुरू करने के लिए आवश्यक प्रारंभिक मानक को पूरा नहीं करते थे।
दूसरी कोशिश के दौरान दिए गए नोटिस राज्यसभा में लंबित बताए गए हैं। इसलिए नए प्रस्ताव की चर्चा के साथ पहले से लंबित नोटिसों पर क्या हुआ यह भी जानना जरूरी है।
विपक्ष का आरोप है कि SIR के दौरान मतदाता सूची में संशोधन और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया को वापस लेने की मांग भी की है। हालांकि, ये राजनीतिक आरोप हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है?
भारत के संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने जैसी प्रक्रिया अपनानी होती है। इसमें संसद की भूमिका महत्वपूर्ण है।
लोकसभा में प्रस्ताव संबंधी नोटिस के लिए कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं। संबंधित सदन के अध्यक्ष या सभापति नोटिस पर प्रारंभिक निर्णय लेते हैं। यदि प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो कानून के अनुसार जांच समिति गठित की जा सकती है।
अंतिम रूप से हटाने के लिए दोनों सदनों में कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित होना जरूरी है। इसके बाद राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं।
इसलिए ओम बिरला के बयान के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या नया औपचारिक नोटिस दिया जाता है और उस पर संसदीय प्रक्रिया के तहत क्या निर्णय होता है।
SIR विवाद में चुनाव आयोग पर क्या आरोप हैं?
Special Intensive Revision यानी SIR मतदाता सूची की विशेष गहन समीक्षा की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया को लेकर विपक्ष ने आरोप लगाए हैं कि मतदाता सूची में संशोधन के दौरान अनियमितताएं हुईं और चुनाव आयोग के निर्णय लेने के तरीके पर सवाल उठे।
इस विवाद ने सितंबर 2026 में तब और ध्यान खींचा, जब चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से SIR से जुड़े कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्तियां उठाए जाने की खबरें सामने आईं। इन आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण फॉर्म, चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर तक पहुंच और पश्चिम बंगाल में अपीलों की प्रक्रिया जैसे मुद्दे शामिल बताए गए।
चुनाव आयोग की ओर से यह पक्ष रखा गया कि आंतरिक मतभेद संस्थागत निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं और प्रमुख निर्णय सामूहिक रूप से लिए गए।
सुप्रीम कोर्ट में भी उठा है मामला
SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज से जुड़े कुछ मुद्दे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे हैं। याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह ने चुनाव आयोग में कथित तौर पर एकतरफा निर्णय लिए जाने और मतदाता सूची संशोधन की वैधता को लेकर सवाल उठाए हैं।
5 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे थे, ने ज्ञानेश कुमार को अंतरिम रूप से निलंबित करने की मांग स्वीकार नहीं की थी। अदालत ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और संबंधित पक्षों से जवाब मांगे थे। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे।
अदालत ने स्पष्ट किया था कि केवल मीडिया रिपोर्टों के आधार पर एकतरफा अंतरिम आदेश नहीं दिया जा सकता। संबंधित रिकॉर्ड और कानूनी प्रावधानों की जांच के बाद ही आगे का निर्णय लिया जा सकता है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका लंबित होना अपने आप में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आरोप साबित होने का प्रमाण नहीं है।
विपक्ष की आगे की रणनीति क्या है?
विपक्षी INDIA गठबंधन ने SIR को वापस लेने और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग जारी रखी है। जानकारी के अनुसार, विपक्ष ने 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली आयोजित करने की योजना भी घोषित की है।
इस बीच, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलकर विपक्ष ने अपनी मांगें रखी हैं। विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून को लेकर भी आपत्तियां जताई हैं। आगे की राजनीतिक रणनीति इस बात पर निर्भर करेगी कि नया नोटिस औपचारिक रूप से आता है या नहीं और लंबित मामलों में क्या प्रगति होती है।
ओम बिरला के सामने एक और संसदीय मामला
मुख्य चुनाव आयुक्त से जुड़े मुद्दे के अलावा ओम बिरला ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल हुए 20 सांसदों से संबंधित अयोग्यता याचिकाओं पर भी बयान दिया है। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों से जवाब मिलने के बाद प्रक्रिया में तेजी लाई जाएगी।
तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने इन सांसदों की अयोग्यता की मांग की है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी शीघ्र निर्णय की अपेक्षा जताई थी। हालांकि, यह ज्ञानेश कुमार को हटाने के प्रस्ताव से अलग संसदीय मामला है।
अब आगे क्या होगा?
ज्ञानेश कुमार के मामले में अगला महत्वपूर्ण घटनाक्रम नए औपचारिक नोटिस की स्थिति और पहले से लंबित नोटिसों पर होने वाली कार्रवाई होगी। यदि नया नोटिस दिया जाता है, तो उस पर नियमों के अनुसार विचार किया जाएगा। इसके बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि प्रक्रिया आगे बढ़ती है या नोटिस प्रारंभिक चरण में ही खारिज हो जाता है। फिलहाल, ओम बिरला ने नए प्रस्ताव को मंजूरी देने या ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की घोषणा नहीं की है।
