मुंबई के मालाड में पारधी आदिवासी परिवारों की बेदखली, बच्चों की पढ़ाई, पुलिस कार्रवाई के आरोप, BMC Pay & Park और पुनर्वास की स्थिति जानें।
मुंबई: मालाड पश्चिम मार्वे रोड के चिकुवाड़ी इलाके में पारधी आदिवासी परिवारों की बेदखली के बाद उनके पुनर्वास और रोजमर्रा की जिंदगी पर सवाल बने हुए हैं। जिस जगह पर पहले मजदूर परिवार रहते थे, वहां अब BMC Pay & Park सुविधा होने का दावा है। दूसरी ओर, प्रभावित परिवारों की ओर से पुलिस की कार्रवाई, बच्चों की पढ़ाई और रात में सुरक्षित ठिकाना नहीं मिलने जैसी समस्याएं उठाई गई हैं।
इस मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि बेदखल परिवारों को अब तक वैकल्पिक आवास मिला या नहीं और जिस जमीन पर उनकी बस्ती थी, वहां पार्किंग की सुविधा किस अनुमति के तहत संचालित हो रही है।
मालाड में पारधी परिवारों के साथ क्या हुआ?
चिकुवाड़ी नाले के पास रहने वाले पारधी आदिवासी परिवारों की बस्ती को हटाने की कार्रवाई दिसंबर 2025 से चर्चा में रही। जानकारी के अनुसार, उस दौरान 95 घरों को ध्वस्त किया गया। इसके बाद जून 2026 में फिर से परिवारों को उस जगह से हटा दिया गया।
18 अप्रैल 2026 की एक स्थानीय खबर में इसी इलाके में लगभग 60 झोपड़ियों को हटाए जाने और कम-से-कम 35 विद्यार्थियों के परीक्षा में शामिल नहीं हो पाने की जानकारी सामने आई थी।
प्रभावित परिवारों का कहना है कि घरों के साथ उनकी रोजमर्रा की जरूरतों का सामान और बच्चों की पढ़ाई से जुड़ी सामग्री भी नष्ट हुई। विस्थापन के बाद कुछ परिवारों के फुटपाथों और पुलों के आसपास रहने की बात भी सामने आई।
बस्ती की जगह पार्किंग, जमीन के इस्तेमाल पर सवाल
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू जमीन का मौजूदा इस्तेमाल है। जानकारी के मुताबिक, चिकुवाड़ी की पुरानी बस्ती वाली जगह पर BMC Pay & Park सुविधा संचालित हो रही है। वहीं, संबंधित Development Plan में इस भूखंड को Recreation Ground यानी मनोरंजन मैदान के लिए आरक्षित बताया गया है।
इस इलाके में आवासीय इमारतों और नए रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स का विस्तार भी हो रहा है। ऐसे में सार्वजनिक जमीन, गरीब परिवारों के आवास और शहरी विकास के बीच संतुलन का सवाल महत्वपूर्ण हो गया है।
पारधी परिवारों ने पुलिस पर क्या आरोप लगाए?
पारधी परिवारों की सदस्य रचना ने अपनी स्थिति बताते हुए कहा कि उन्हें BMC और पुलिस की कार्रवाई का डर बना रहता है। उनके मुताबिक, परिवार रात में सुरक्षित जगह तलाशने के लिए वाहनों के पास, दीवारों के पीछे और पुलों के नीचे छिपने को मजबूर होते हैं।
रचना ने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस उन्हें पकड़ने और भीख मांगने, चेन स्नैचिंग या ड्रग्स से जुड़े मामलों में फंसाने की धमकी देती है। ये परिवारों की ओर से लगाए गए आरोप हैं। संबंधित पुलिस अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष और इन आरोपों से जुड़े केस रिकॉर्ड उपलब्ध होने पर ही मामले की पूरी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
इस घटना का एक पुराना संदर्भ भी है। कहा जा रहा है कि बस्ती तोड़े जाने से पहले समुदाय के कुछ लोगों को पुलिस स्टेशन में मजदूरी के काम के लिए बुलाया गया था। वहां पहुंचने 85पर उन्हें Prevention of Begging Act, 1960 के तहत कार्रवाई का सामना करना पड़ा। इस दावे की पुष्टि के लिए संबंधित पुलिस स्टेशन के रिकॉर्ड और दर्ज मामलों का विवरण जरूरी है।

पारधी समुदाय का इतिहास भी इस मामले को समझने में अहम है। ब्रिटिश शासन के दौरान Criminal Tribes Act के तहत कई समुदायों को अपराधी घोषित करने वाली व्यवस्था लागू थी। 1952 में इस कानून को निरस्त किए जाने के बाद ऐसे समुदायों को विमुक्त जनजातियों (Denotified Tribes) की श्रेणी में रखा गया। इसके बावजूद पारधी समुदाय को लेकर सामाजिक पूर्वाग्रह और संदेह की समस्या बनी रहने के आरोप सामने आते रहे हैं।
बच्चों की पढ़ाई और रोजगार पर असर
बस्ती हटने से केवल आवास का संकट नहीं पैदा होता, बल्कि बच्चों की शिक्षा और परिवारों की आजीविका भी प्रभावित हो सकती है। अप्रैल 2026 में सामने आए 35 विद्यार्थियों के परीक्षा में शामिल नहीं हो पाने के आंकड़े इस समस्या की गंभीरता दिखाते हैं।
इन बच्चों ने बाद में परीक्षा दी या नहीं, कितने बच्चे अब नियमित स्कूल जा रहे हैं और क्या उन्हें किताबें व अन्य शैक्षणिक सामग्री दोबारा मिली, इसकी वर्तमान स्थिति की जानकारी प्राप्त नहीं हुई है।
समुदाय के कई सदस्य नालों की सफाई, निर्माण कार्य और दूसरे तरह की मजदूरी से जुड़े रहे हैं। रचना के अनुसार, काम के लिए मुकादम यानी काम दिलाने वाले ठेकेदारों के जरिए मजदूरों को जुटाया जाता था। उन्होंने बताया कि जब नियमित काम नहीं मिलता, तो कुछ परिवार नींबू-मिर्च से जुड़े पारंपरिक सामान और त्योहारों में इस्तेमाल होने वाली सजावटी चीजें बेचकर गुजारा करते हैं।
ऐसे परिवारों के लिए रहने की जगह छिनने का असर काम पर जाने, सामान रखने और बच्चों की देखभाल करने तक प्रभावित हुई है।
राशन कार्ड, बैंक खाते और वोटर लिस्ट का मुद्दा
एक NGO की मदद से समुदाय के कुछ परिवारों ने राशन कार्ड, बैंक खाते और ई-श्रम कार्ड बनवाए थे। जानकारी के अनुसार, 2022 में समुदाय के 74 लोगों को मतदाता पहचान पत्र मिले थे।
परिवारों ने मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) से जुड़े प्रारूप रिकॉर्ड में 54 नाम नहीं दिखने की बात कही है।
बेघर होने के बाद पते और पहचान से जुड़े दस्तावेजों का इस्तेमाल करना भी कठिन हो गया है। इसलिए संबंधित चुनाव अधिकारियों से यह स्पष्ट होना चाहिए कि प्रभावित परिवार अपने नाम की स्थिति कैसे जांच सकते हैं और जरूरत पड़ने पर सुधार के लिए कौन-सी प्रक्रिया अपना सकते हैं।
महाराष्ट्र सरकार के विशेष पैकेज से क्या मिलेगा?
3 जून 2026 को महाराष्ट्र के आदिवासी विकास मंत्री अशोक उइके की ओर से पारधी समुदाय की समस्याओं के समाधान के लिए विशेष पैकेज तैयार करने की बात सामने आई थी। इसमें आवास, शिक्षा, जमीन, छात्रावास, जाति प्रमाणपत्र और सरकारी योजनाओं जैसे मुद्दे शामिल बताए गए थे।
हालांकि, इस घोषणा से यह साबित नहीं होता कि मालाड के बेदखल परिवारों को पुनर्वास या आर्थिक सहायता मिल सकती है। इसके लिए सरकारी शासन निर्णय, मंजूर बजट, पात्रता की शर्तें और लाभार्थियों की सूची की पुष्टि जरूरी है।
महाराष्ट्र सरकार और BMC के सामने अब यह स्पष्ट करने का सवाल है कि प्रभावित परिवारों को वैकल्पिक आवास देने की कोई योजना है या नहीं। यदि कोई योजना मौजूद है, तो उसकी पात्रता और आवेदन प्रक्रिया क्या है?
अब आगे क्या?
मालाड के पारधी परिवारों के मामले में तीन प्रमुख सवालों के जवाब अब भी जरूरी हैं। पहला, बेदखली के बाद कितने परिवार बेघर हैं और उनके पुनर्वास की क्या व्यवस्था की गई है। दूसरा, पुरानी बस्ती वाली जमीन पर Pay & Park चलाने के लिए क्या अनुमति दी गई है। तीसरा, पुलिस पर लगाए गए आरोपों और बच्चों की शिक्षा से जुड़ी समस्याओं पर प्रशासन ने क्या कदम उठाए हैं।
BMC के संबंधित वार्ड कार्यालय, मुंबई पुलिस, महाराष्ट्र के आदिवासी विकास विभाग और चुनाव अधिकारियों से इन मुद्दों पर आधिकारिक जानकारी मिलने के बाद ही स्थिति की पूरी तस्वीर सामने आएगी।
फिलहाल उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह मामला केवल एक बस्ती हटाने तक सीमित नहीं है। यह आवास, रोजगार, शिक्षा, नागरिक दस्तावेजों और सार्वजनिक जमीन के इस्तेमाल से जुड़े उन सवालों को सामने लाता है, जिनका जवाब प्रभावित परिवारों के साथ-साथ संबंधित प्रशासन को भी देना होगा।
