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  • इलेक्टोरल बॉन्ड का झोल।

    इलेक्टोरल बॉन्ड का झोल।

    • इलेक्टोरल बॉन्ड का झोल सामने आते शुरू हुआ देश में राजनैतिक भूचाल।
    • कौन से दल ने कितना किया झोल?
    • रिपोर्ट अभी और बाकी है..
    • Electoral Bond Indian Government Political News

    सुरेन्द्र राय
    मुंबई-
    हम भारतीय अपने जहन में कई वर्षो से लगातार एक जटिल समस्या का हल ढूंढ रहे है और वह जटिल समस्या यह है, कि इंसान अंततः भ्रस्ट क्यों हो रहा है? जबकि हमारे भारतीय समाज में भ्रस्टाचार के वर्चस्व का एक नया स्तंभ स्थापित हो चुका है और हमने इसमें ज्ञान, दौलत और हिंसा की एक ऐसी मिसाल इलेक्टोरल बॉन्ड जैसे को खड़ी कर दी है, जो भ्रस्टाचार और सत्ता के मध्य अटुट और अतरंग संबंध स्थापित करती नजर आ रही है।

    हालांकि यह सत्ता विमर्श एक गंभीर जिरह की मांग करता है, जो सामाजिक विकास कार्य में अवरुद्ध करने वाला घटक के रूप में साबित हो रहा है, जो एक भ्रस्ट आचरण की पहचान है। जिसकी हमें घोर निंदा की जानी चाहिए।
    अब ऐसे में पिछले पांच वर्षों में कंपनियों ने अपने फ़ायदे के लिए सरकार को इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए कितना पैसा दिया यह पूरी तरह से अभी खुला नहीं है। घाघ लोगों का खुलासा एस बी आई ने नहीं किया। पांच वर्षों में किस कंपनी ने कितना चंदा दिया?

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    ‘बिजनेस टाइम्स’ मैगज़ीन में छपी खबर के अनुसार भारती एयरटेल में 241 करोड़, तता स्टील ने 175 करोड़, एल एन्ड टी ने 85 करोड़, महेंद्रा एन्ड महिंद्रा ने 39 करोड़, अल्ट्राटेक सीमेंट ने 23 करोड़, बजाज फाईनैंस ने 20 करोड़, मारुति सुज़ुकी ने 20 करोड़, टेक एम ने 15 करोड़ रुपए के बॉन्ड खरीदे। बीजेपी को पिछले दो वर्षों में यानी 2019 में 216.9 करोड़, 2023/24 में 296.12 करोड़ मिले। जबकि कांग्रेस को 2019 में मात्र 15.85 करोड़ और 2023/24 में 81.1 करोड़ मिले। इसके साथ ही दूसरे दलों को 2019 में 4.55 करोड़ और 2023/24 में 33 करोड़ मिले।

    किसने कितने खरीदे इलेक्टोरल बॉन्ड ?

    पिछले पांच साल इलेक्टोरल बॉन्ड में कितने पैसे मिले हैं इसपर नज़र डालें तो पता चलता है, कि 2019 में 237 करोड़ , 2020 में 46 करोड़, 2021 में 40 करोड़ रुपए मिले। जबकि 2022 में 563 करोड़ और 2023 में 347 करोड़ के साथ दो वर्षों का भारी उछाल देखने को मिला। 2024 में सिर्फ 65 करोड़ के इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदे गए।

    इलेक्टोरल बॉन्ड,

    कांग्रेस के चारों एकाउंट आई टी ने फ्रीज किए हैं। इसलिए सुप्रीमकोर्ट द्वारा गैरकानूनी गैरसंवैधानिक बताए जाने पर बीजेपी के भी खाते सीज करने की मांग की ज़ा रही है। यही न्याय का तकाज़ा भी है।
    प्रकाशित खबर के मुताबिक, फ्यूचर जेमिंग कंपनी द्वारा 149 करोड़ 2020 में, 324 करोड़ 2021 में, 440 करोड़ 2022 में, 321 करोड़ 2023 में और 2024 में 63 करोड़ क्षेत्रीय दलो जिसमें डी एम के, टी एम सी, वाई एस आर कांग्रेस और अन्य को दिए।

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    जबकि 2019 में बीजेपी को 125 करोड़ 2021 में, 33 करोड़ 2022 में, 129 करोड़ और 2023 में, 297 करोड़ रुपये मेघा इंजीनियरिंग ने दिए। क्विक ने भाजपा को 325 करोड़ 2022 में, शिवसेना को 25 करोड़, 2023 में बीजेपी को 50 करोड़ दिए।
    इसके साथ ही लिस्टेड कंपनियों से बीजेपी को 2019 और 2023/24 में 216.9 करोड़ और 298.12 करोड़ रुपए मिले, जबकि कांग्रेस को 15.85 और 81.1 करोड़, अन्य दलों को 4.55 और 33 करोड़ मिले।

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    टॉप 10 डोनर्स के 9.6 करोड़ मूल्य के इलेक्टोरल बॉन्ड एकस्पायर हो गए। जिनमे फ्यूचर जेमिंग के 3, ई सी एल के 2, पैसिफिया इंडिया के 1.25, सिलवेनस बिल्डर के 1, सी मेकर्तिच के 0.4, वेदांता लिमिटेड के 0.3, सुधा कमर्शियल के 0.3, जुपिटर के 0.25, उत्कल अलमुनियम के 0.2 करोड़ रुपए का इलेक्टोरल बॉन्ड एकस्पायर हो गया। अकेले जालान ग्रुप की कंपनी केवेंटर फूडपार्क ने बीजेपी को 144.5, कांग्रेस को 20, अकाली दल को 0.5, यस पी को 10, टी एम सी को 20 करोड़ रुपये दिए।

    जबकि मदनलाल लिमिटेड ने बीजेपी को एकमुश्त 175 करोड़, कांग्रेस को 10 करोड़ और एम के जे ने कांग्रेस को 69.35, आप को 7, टी एम सी को 18.5, बी आर एस को 10, बीजेपी को 12.5, और बी जे डी को 10 करोड़ रुपए दिए। इसके साथ ही एम के जे ने कांग्रेस को 22.25, टी एम सी को 27.4, बीजेपी को 14.07 करोड़ दिए। सस्मल इंफ्रास्ट्रक्चर ने कांग्रेस को 39 करोड़ और बीजेपी को 5 करोड़ दिए।

  • ठंडे पड़ गये हैं भारतीय जनता पार्टी के नेता

    ठंडे पड़ गये हैं भारतीय जनता पार्टी के नेता

    • भारतीय जनता पार्टी के नेता चुनावी समर भूमि में ठंडे पड़ गए हैं..
    • बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में पार्टी की नीतियों का हो रहा है खामियाजा..

    सुरेंद्र राय
    मुंबई-
    बड़ा शोर है भारतीय जनता पार्टी के चुनाव प्रचार का लेकिन मोदी को छोड़कर एक भी चुनावी समर भूमि में सक्रिय नेता नहीं है। सबसे बड़ी 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के नेता चुनाव प्रचार में दूर दूर तक नजर नहीं आते। सबसे बड़ा हिंदुत्व चेहरा हैं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। जिनकी देश में बड़ी मांग है, लेकिन मोदी की तरह वे कहीं भी चुनावी मूड में नहीं दिखते।

    भारतीय जनता पार्टी का युपी में चुनाव प्रचार

    दो दो डिप्टी सीएम हैं जो अपनी खोल से अभी बाहर ही नहीं निकल सके हैं। प्रांतीय अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी भी कहीं नमूदार नहीं हो रहे। बड़े जोर शोर से ढिंढोरा पिटा गया था, चौधरी चरण सिंह के पोते जयंत चौधरी का। उन्हें गाजे बाजे के साथ भारतीय जनता पार्टी में लाया गया। यह सोचकर कि उनके दादा चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देकर पश्चिमी यूपी की सारी सीटें बिना प्रचार किए भारतीय जनता पार्टी की झोली में आ गिरेंगी। परंतु अभी भी जयंत चौधरी पशोपेश में हैं। किसान बिरादरी उनके बीजेपी में जाने पर उनसे दूरी बना ली है। अब वे किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह की तरह किसानों के नेता नहीं रह गए हैं। बिना संख्या बल के वे भारतीय जनता पार्टी को कितनी सीटें दिलाएंगे खुद समझ नहीं पा रहे। चुनाव प्रचार तो बड़ी दूर की कौड़ी है उनके लिए। हालत यह हो गई है, “आधी छोड़ सारी को धावे। आधी मिले न सारी पावे।”

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    तुरूप का इक्का ..

    भारतीय जनता पार्टी के साथी अनुप्रिया पटेल और बड़बोले अस्तित्वहीन ओमप्रकाश राजभर जिनकी अमित शाह ने उत्तर प्रदेश सरकार में ताजपोशी कराई है। छवि बेहद खराब होने से जनता उनसे कन्नी काटने लगी है। मेनका गांधी और संतोष गंगवार यूपी के आठ आठ बार सांसद रहे हैं। लेकिन उनके टिकट ही पक्के नहीं हुए हैं। करें भी तो क्या? टिकट मिलेगा या नहीं? कहा भी नहीं जा सकता। तुरूप का इक्का होने से रहे।

    भारतीय जनता पार्टी,

    बिहार की संसदीय गठबंधन ..

    सांसदों के लिहाज से बिहार में 40 सीटें होने से बिहार का बड़ा महत्त्व है। वहां गठबंधन तुड़ाकर नीतीश कुमार को भारतीय जनता पार्टी अपने पाले में भले ले आई है लेकिन जनता में उनकी पलटू चाचा की छवि बनने से उनकी खुद की छवि को बड़ा धक्का लगा है। जनता में उनकी पूछ नहीं रही। सुशील मोदी ज़रूर बड़ा चेहरा बने थे, लेकिन वे कहीं चुनाव प्रचार करते नहीं दिखते। राजीव प्रसाद रूडी का कहीं अता पता नहीं है। हरदम मोदी नाम की माला जपने और विपक्षी दलों को बुरा भला कहने वाले रवि शंकर प्रसाद नदारत हैं। उनके अलावा सम्राट चौधरी, गिरिराज सिंह और चौबे सांसद रहे हैं। बड़बोले भी लेकिन चुनाव प्रचार में वे दोनो दूर दूर तक नजर नहीं आते। गिरिराज सिंह का हाल यह है, कि उनकी भारतीय जनता पार्टी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने मुर्दाबाद के नारे लगाए और काले झंडे दिखाकर उन्हें क्षेत्र में आने ही नहीं दिया।

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    महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार ..

    सीट के लिहाज से महाराष्ट्र 48 सीटों वाला बड़ा महत्त्वपूर्ण राज्य है। यहां के सबसे बड़े नेता हैं नितिन गडकरी जो भारतीय जनता पार्टी की नीतियों के धुर विरोधी रहे हैं। मुमकिन नहीं कि वे चुनाव प्रचार करेंगे। शिवसेना और राकांपा तोड़कर शिंदे और अजीत पवार के साथी छगन भुजबल, पटेल आदि पर खुद भारतीय जनता पार्टी ने हजारों करोड़ के घोटाले का मामला उठाकर उन्हें अपने साथ लाकर सरकार तो बना ली लेकिन महाराष्ट्र की जनता उन्हें गद्दार कहकर नफरत करती है। कुछ समय बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। उस चुनाव को याद कर ही सिहरने वाले ये नेता चुनाव प्रचार की हिम्मत भला कैसे दिखाएंगे? अपने ही बड़े नेता पूर्व मुख्यमंत्री का कद छोटा कर डिप्टी सी एम बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी उनसे चुनाव में कोई उम्मीद कैसे कर सकती है।

  • यह देखो मोदी का खेल। जिनको जाना था जेल। बन गए सीएम, डिप्टी सीएम और मंत्री।

    यह देखो मोदी का खेल। जिनको जाना था जेल। बन गए सीएम, डिप्टी सीएम और मंत्री।

    • गुजरात बनाम महाराष्ट्र की जंग शुरू।
    • महाराष्ट्र दिवस पर मुंबई को लेकर मराठी माणुस का स्वाभिमान जागा।
    • बिना रीढ़ के नेता ही मोदी के सामने दंडवत करने लगते हैं।

    सुरेंद्र राजभर
    मुंबई-
    मोदी के पैरों के नीचे से जमीन खिसक चुकी है। बौखलाहट साफ दिख रही है। लेकिन उनकी हर चाल उन्हीं पर भारी पड़ेगी। महाराष्ट्र में पहले शिंदे एंड कंपनी के भ्रष्टाचार की जांच में जेल जाना था मगर शिंदे दंडवत मुद्रा में आ गए। मुख्यमंत्री बन गए। फिर बारी आई अजित पवार, प्रफुल्ल पटेल और छगनभूजबल जैसे भ्रष्टाचारियों की। इसके साथ ही महाराष्ट्र में गुजरात बनाम महाराष्ट्र की जंग शुरू हो चुकी है।

    भोपाल में दो दिन पहले कहा था, सारे भ्रष्टाचारी जेल जाएंगे। राकांपा ने किया है सत्तर हजार करोड़ के घोटाले का खेल। बस अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार से गद्दारी कर मोदी का चरण रज ले बैठे और उपमुख्यमंत्री बन गए। अन्य भ्रष्ट मंत्री पद की शपथ ले लिए। बिना रीढ़ के नेता ही मोदी के सामने दंडवत करने लगते हैं। क्योंकि मोदी खुद बिना रीढ़ के हो चुके हैं। जिनमें स्वाभिमान शेष है,  झुकना नहीं चाहेंगे वे ही जेल जाएंगे।

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    गुजरात, महाराष्ट्र,
    महाराष्ट्र वोटिंग की फाइल तस्वीर

    गुजरात बनाम महाराष्ट्र की जंग..

    लेकिन देश में दूसरे नंबर के सांसद देने वाले महाराष्ट्र के नागरिकों का मराठी माणूस जाग चुका है। मराठी बनाम गुजराती का भाव बढ़ रहा है। तत्कालीन रूप से भले ही मोदी की कूटनीति जीत रही हो, लेकिन जब लोकसभा और विधानसभा के चुनाव होंगे तो मोदी के सिपहसालार जो सीएम, डिप्टी सीएम और मंत्री बन चुके हैं उन्हें और उनके भ्रष्ट गद्दार साथियों को मराठी माणूस उनकी जमानत जब्त कराकर शिक्षा देंगे।

    जिस्म का कारोबार और शिवसेना का नेता! अड्डे पर मिलीं 44 लड़कियां

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    इतना ही नहीं लोकसभा चुनाव में छः से ज्यादा सीटें बीजेपी को मिलने वाली नहीं है और न हीं महाराष्ट्र में कभी बीजेपी की सरकार ही बनने देंगे मराठी माणूस। गुजरात बनाम महाराष्ट्र की जंग शुरू हो गई है। जिस तरह एक मई को महाराष्ट्र स्थापना दिवस पर मुंबई को लेकर मराठी माणूस का स्वाभिमान जागा था। वैसे ही आज भी जाग चुका है और एक बार फिर गुजरात की हार सुनिश्चित है।

  • गुजरात मोडल और मोदी का डूबता सूरज

    गुजरात मोडल और मोदी का डूबता सूरज

    • प्रचार तंत्र के आधार पर मोदी की गढ़ी गई छवि।
    • भोली भाली जनता ने मान लिया अपना नायक।
    • झूठ पर झूठ से जनता ऊब चुकी है।

    सुरेंद्र राजभर
    मुंबई-
    कृत्रिम चमक वाले वास्तविकता से रहित, हिंसा अन्याय अत्याचार से पूर्ण गुजरात मॉडल, जो सदियों से विश्व व्यापार में अपना अहम स्थान बना चुका था। जिसमें मोदी का कोई हाथ नहीं था। उस धनी, व्यापारिक गुजरात को मोदी द्वारा निर्मित बताकर प्रायोजित किया गया था।
    गुजरात मॉडल से 2014 में उसी को गुजरात मॉडल बताकर पीएम उम्मीदवार बनाया गया था।

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    मोदी,
    गुजरात मॉडल के सवालों पर मोदी की एडिट तस्वीर

    प्रचार तंत्र के आधार पर गढ़ी गई छवि, जिनका नाम तक देश पहले नहीं जानता था, मोदी को भोली भाली जनता ने अपना नायक मान लिया। बीजेपी भारी बहुमत से जीती कांग्रेस के कथित वंशवाद से भारत मुक्त करने के नारे देकर कांग्रेसी घोटालों को बहु प्रचारित कर जीतकर केंद्र में मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी। राममंदिर का मुद्दा, जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाने का मुद्दा फिर सबका साथ सबका विकास नारे में सबका विश्वास पर जनता ने मोदी को सिर माथे पर बिठाया। नतीजा हुआ कि बीजेपी पूरे देश में हर चुनाव चाहे विधानसभा हो या लोकसभा जीतती चली गई।

    मोदी का डूबता सूरज.

    भले बेरोजगारी को चुनावी मुद्दा बनाने, दो करोड़ लोगों को प्रति वर्ष रोजगार देने जैसे दर्जनों वादों में से कोई भी पूरा नहीं किया। धीरे- धीरे यह बात जनता को पता चलती गई जिसका परिणाम हुआ एक भी चुनाव विधानसभा का जीत पाने की स्थिति में नहीं हैं मोदी। सर्वे में लोकसभा में सरकार बनने के आसार भी धूमिल हो गए हैं।

    झूठ पर झूठ से जनता ऊब चुकी है और अब जनमानस अब मोदी को हटाने का मन बना कर अपने मन की बात सुनाना चाहती है जिसे कभी मोदी को सुनना गंवारा ही नहीं ।
    आर एस एस को चिंता में डाल दिया है। अब वह मोदी का विकल्प ढूंढ रही है। ऐसा क्यों हुआ? सोचना मोदी को है।

  • हिंदू क्यों नहीं अपनी लड़कियां सम्हाल कर रखते?

    हिंदू क्यों नहीं अपनी लड़कियां सम्हाल कर रखते?

    • बीजेपी आरएसएस और शंकराचार्य..
    • हिंदू लड़कियां ही क्यों लव जिहाद की शिकार होती है?
    • हिंदू समाज में भेदभाव और तिरस्कार ही धर्म बदलने को प्रेरित करता है।
    • आरएसएस, विहिप, बजरंग दल और बीजेपी गोवंश के नाम पर मुस्लिमों को मारते हैं।
    • गोहत्या कर मांस विदेश भेजने वाले चार बड़े बूचड़खाने हिंदुओं के क्यों?
    • बीजेपी के साथ वही संत है जो जानते ही नहीं कि सनातन धर्म क्या है?
    • अपराधियों को बचने के लिए दो ही रास्ते एक राजनीति दुसरा धर्म का चोला।

    सुरेंद्र राजभर
    मुंबई-
    बीजेपी दो मुहीं नहीं तीन-तीन मुहिं चाल चलती है। एक तरफ बीजेपी के तमाम बड़े नेता अपनी बेटियों को मुस्लिम से व्याहते हैं। तो दूसरी तरफ गौवंश को लेकर मुस्लिमों की हत्या भी करते हैं। लव जिहाद की बात कर प्रताड़ित करते हैं। जहां तक लव जिहाद का मामला है इसमें हिंदू लड़की की रजामंदी रहती है। जब गोमांस खाने,शमजहब बदलने की बात होती है। तो तब हिंदू लड़कियों का इश्क और मोहब्बत फना हो जाता है।

    संभव है कुछ हिंदू लड़कियां अपहृत कर चंगुल में फंसाई जाती हैं। लेकिन उसमें भी कहीं न कहीं इशारेबाजी होती ही है। क्यों नहीं हिंदू अपनी लड़कियां सम्हाल कर रखते? क्यों हिंदू लड़कियां ही लव जिहाद की शिकार होती हैं? तड़क-भड़क पसंद करने वाली लड़कियां चंगुल में आसानी से फंसती हैं। इसका अर्थ है, कि हिंदू अपनी लड़कियों की परवरिश और संस्कार उपयुक्त तरीके से नहीं देते। दोषी हिंदू ही हैं।

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    बीजेपी, आरएसएस, शंकराचार्य,
    शंकराचार्य महाराज की फाइल तस्वीर

    यक्षप्रश्न है, कि केवल हिंदू पुरुष ही सहपरिवार धर्म बदलते हैं। कोई मुस्लिम या ईसाई नहीं। खासकर दलित अधिकतर धर्म बदलते देखे जाते हैं। ईसाई का एजेंट गैदरिंग करता है जिसमें ओबीसी और एस सी की महिलाएं अधिकतर जाती और ज्ञान लेती हैं। फिर ईसाई बन जाती हैं। धन का लोभ खुली जिंदगी छुआछूत का अभाव। जातियों का बंधन नहीं। हिंदू समाज में भेदभाव और तिरस्कार ही धर्म बदलने को प्रेरित करता है।

    गोहत्या कर मांस विदेश भेजने वाले चार बड़े बूचड़खाने हिंदुओं के क्यों?

    एक तरफ आर एस एस, विहिप, बजरंग दल और बीजेपी गोवंश के नाम पर मुस्लिमो को मारते हैं। तो दूसरी तरफ कथित रूप से हिन्दुत्व की राजनीति करने वाली सरकार गोमांश निर्यात में विश्व का प्रथम राष्ट्र बनाने के लिए करोड़ों रुपए सब्सिडी देती है। देश की सबसे बड़ी गोहत्या कर मांस विदेश भेजने वाली चार बड़े बूचड़खाने हिंदुओं के क्यों हैं? बीजेपी की सरकार हिंदुत्व का नाम केवल हिंदुओं को मूर्ख बनाकर वोट लेने और सत्ता में आने पर मनमानी करती है।

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    बीजेपी आरएसएस और शंकराचार्य..

    शंकराचार्य अविमुक्तेश्वर नंद ने बीजेपी और आर एस एस की कलई खोल कर रख दिया है। जिन हिंदू साधु संतों को बीजेपी अपने खेमे में लाकर चुनाव में पोलराइजेशन करना चाहती है। उनमें किसी का भी कद शंकराचार्य के पैरों से अधिक नहीं है। शंकराचार्य परिपाटी ढाई हजार साल पूर्व आदि शंकर ने चलाई थी। बीजेपी के साथ वही संत हैं, जो जानते ही नहीं, कि सनातनधर्म क्या है। ऐसे लोगों का बैकग्राउंड तलाशा जाए तो अधिकांश क्रिमिनल्स होंगे। अपराधियों के बचने के लिए दो ही रास्ते हैं एक राजनीति दूसरा धर्म का चोला गेरुआ ओढ़ लो। यदि ये सच्चे संत होते तो महिला पहलवानों के यौन शोषण करने के आरोपी बृजभूषण का साथ क्यों देते? मैत्री समान विचारधारा वालों में ही होती है।

  • भाजपा मंत्री, बीजेपी सचिव के घर की आगजनी, बीजेपी के वादे से मुकरने का नतीजा

    भाजपा मंत्री, बीजेपी सचिव के घर की आगजनी, बीजेपी के वादे से मुकरने का नतीजा

    • मणिपुर घटना में अमित शाह लाचार।
    • दरअसल झूठ की भी अपनी हद होती है।
    • पीएम की छवि विदेशों में भी धूमिल।
    • मैती समुदाय को आरक्षण देना गुजरात लॉबी का वादा।
    • मैती समुदाय आक्रामक भूमिका में..
    • कुकी, नगा और आदिवासी उतर गए तो स्थिति होगी अत्यंत भयंकर।
    • गुजरात लॉबी की तानाशाही के भय से बीजेपी के सांसद, मंत्री चुप।
    • आरएसएस के सामने अब नही तो कभी नहीं की विकट स्थिति।

    सुरेंद्र राजभर
    मुंबई-
    मणिपुर की हिंसा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के हाथ पांव फूला देने के लिए काफी है। पीएम नरेंद्र मोदी मणिपुर जलता छोड़ विदेश चले गए। जो उन्हें देश की नहीं अपनी छवि बनाने की चिंता है। लेकिन छवि बनाते-बनाते कब मटिया मेट हो गई पता नहीं चला। दरअसल झूठ की भी हद होती है। महिला पहलवान अब उनकी और देश की बेटियां नहीं रही। वे अपने बाहुबली आरोपी सांसद को बचाने में लगे रहे इसी बीच विदेशों में भी उनकी छवि धूमिल हो गई।

    ये राहुल गांधी हैं कि अमेरिका में जाकर मोदी की यात्रा के पहले सारा गुड गोबर कर दिए। बीजेपी की ऐसी तैसी कर दी। दूसरी तरफ गुजरात लॉबी द्वारा महिला पहलवानों की उपेक्षा से आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और माफियाओं बलात्कारियों को मटियामेट करने का एलान करने वाले यूपी से सीएम योगी आदित्यनाथ की पेशानी पर बल पड़ गए हैं। उन्हे लगता है गुजरात लॉबी बीजेपी का सत्यानाश कर देगी।

    बाहुबली को पीएम, गृहमंत्री द्वारा दिल्ली पुलिस द्वारा नाबालिग पहलवान के यौनशोषण मामले में क्लीन चिट देकर पॉक्सो कानून से हटाने का असर देश की आधी आबादी यानी महिलाओं पर पड़ेगा। यदि उन्होंने बीजेपी को वोट नहीं दिया तो बीजेपी को खत्म होने से कोई रोक नहीं पाएगा।

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    मणिपुर, अमित शाह,
    मणिपुर आगजनी की तस्वीर

    गुजरात लॉबी का वादा..

    मणिपुर हिंसा बीजेपी की ही बोई गई है। मैती समुदाय को आरक्षण देने का वादा गुजरात लॉबी का था। तो मणिपुर हिंसा आगजनी का श्रेय भी इन्ही के माथे जाएगा। गृहमंत्री अमित शाह मणिपुर दौरा कर चुके हैं। लेकिन हासिल कुछ नहीं हुआ। बीजेपी मंत्री एवं बीजेपी सचिव के घर की आगजनी बीजेपी के वादे से मुकरने का नतीजा है। आरक्षण का पेच कुछ इस तरह फंस गया है, कि अमित शाह के सम्मुख एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है। अगर बीजेपी मैती समुदाय को आरक्षण देती है तो यह कुकी, नगा और अन्य आदिवासियों के लिए निर्धारित कोटे में से दिया जाएगा जिसे ये अपने हक पर डाका डालना समझेंगे।

    मणिपुर घटना में अमित शाह लाचार।

    अभी तो मैती समुदाय आक्रामक भूमिका में है। कल कुकी नगा और आदिवासी उतर गए तो स्थिति अत्यंत भयंकर होगी। गृहयुद्ध भीषण रूप से फैलेगा। अमित शाह को शायद इसी बात की चिंता हो। उनकी समझ में नहीं आ रहा, कि करें तो क्या करें? मणिपुर हिंसा की आग में जल रहा है। जिसमे खुद अब बीजेपी के घर भी जद में आ गए हैं। अमित शाह के बूते का नहीं रहा मणिपुर। पीएम तो विदेश यात्रा के द्वारा अपनी नष्ट हो चुकी छवि को सुधारने में लगे हैं।

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    आरएसएस के सामने अब नही तो कभी नहीं की विकट स्थिति।

    आश्चर्य नहीं होगा कि आज गुजरात लॉबी की तानाशाही के भय से बीजेपी के जो सांसद, मंत्री चुप हैं। मूक दर्शक बने हुए हैं कल सारे के सारे गुजरात लॉबी के विरुद्ध उठ खड़े हों। आसार तो यही नजर आते है, कि बीजेपी आत्मघात के रास्ते पर बहुत आगे निकल गई है जहां से लौटना असंभव है। आरएसएस के सामने अब नहीं तो कभी नहीं की विकट स्थिति आ खड़ी हुई है। देखना मजेदार होगा कि क्या आरएसएस गुजरात लॉबी को बीजेपी से अलग-थलग करेगी या बीजेपी को नष्ट होने देती है।

  • आसान नहीं नितिन गडकरी को पार्टी से निकाल फेंकना।

    आसान नहीं नितिन गडकरी को पार्टी से निकाल फेंकना।

    • सादगी के लिए विख्यात गडकरी सच बोलते है।
    • नितिन गडकरी का प्रभाव पूरे महाराष्ट्र में है।
    • महाराष्ट्र के निर्विवाद सबसे बड़े नेता है गडकरी।

    सुरेंद्र राजभर
    मुंबई-
    केंद्र की बीजेपी सरकार में पीएम मोदी की कृपा पाने के लिए मंत्री तक हमेशा मोदी के बचाव में अनर्गल प्रलाप करते देखे सुने जाते हैं।
    परिवहन मंत्री नितिन गडकरी एक ऐसे व्यक्तित्व हैं। जिन पर कभी कोई लांछन नहीं लगा। सादगी के लिए विख्यात गडकरी सच बोलते हैं। इसी कारण वे यदा-कदा अपनी ही सरकार की नीतियों का प्रेस के सामने मुखर विरोध करते हैं। तभी उनके पास भारी और खास मंत्रालयों की भरमार है। उनका कद छोटा करने के लिए उनसे अन्य मंत्रालय छीन लिए गए लेकिन परिवहन मंत्रालय का भारी भरकम मंत्रालय आज भी उनके हाथ में है।

    अन्य मंत्रालय छीन लिए जाने का कारण है। उनकी साफ गोई का स्वभाव। वे अपनी ही सरकार के प्रबल आलोचक हैं। जिस कारण गुजरात लॉबी को वे फूटी आंखों में सुझाते हैं।  अगर बस चलता तो कभी का उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया होता। केंद्र सरकार में एकमात्र मंत्री नितिन गडकरी हैं। जो कार्य करने में नंबर वन बन कर आज भी स्थिर हैं। पूर्व कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद पहले थोड़ा मनमौजी स्वभाव के थे। लेकिन मंत्रालय में जगह नहीं मिलने से अब बेवजह प्रेस के सामने आकर बेवजह विलाप करते हुए विपक्षियों पर आरोप मढ़ते रहते हैं। उन्हे याद रखना होगा कि कितनी भी चाटुकारिता कर लें मंत्री पद नही मिलेगी।

    क्या आरएसएस बदलेगी पीएम का चेहरा?

    गडकरी,
    भाजपा परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की फाइल तस्वीर

    नितिन गडकरी का प्रभाव पूरे महाराष्ट्र में है।

    गडकरी महाराष्ट्र के निर्विवाद सबसे बड़े नेता हैं। पक्ष-विपक्ष का कोई भी नेता इनसे किसी भी समय मिल सकता है। वे दूसरे नेताओं को आगे बढ़ाते रहते हैं। इसी कारण वे जहां जनता के लाडले हैं वहीं नेताओं द्वारा समापुजित भी हैं। जब मोदी और शाह आरोपी बाहुबली से भयभीत हैं जो मुश्किल से चार या पांच सीटों पर प्रभाव रखता है तो नितिन गडकरी का प्रभाव पूरे महाराष्ट्र में है। महाराष्ट्र के सभी नेता इनकी प्रशंसा करते हैं। जिसके उलट फड़नवीस  विदेशी शिक्षा लेकर एलिट बने हुए हैं। उनसे मिलने के लिए अपॉइंटमेंट लेना पड़ता है। सभी से तो मिलते भी नहीं। उनकी शिवसेना पार्टी को तोड़ने में बड़ा हाथ रहा। केंद्र की नजदीकियां इन पर भारी पड़ी।

    महाराष्ट्र सरकार —- हनीमून खत्म

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    सादगी के लिए विख्यात गडकरी सच बोलते है।

    शाह नहीं चाहते कि महाराष्ट्र या किसी राज्य में कोई नेता ऐसा हो पाए जो उनकी पीएम पद की राह में रोड़ा बनें। मोदी के बाद अमित शाह खुद को नंबर दो बनाने पर लगे हुए हैं। यूपी के सीएम योगी की राह में कांटे उनके बिछाए हुए हैं। लेकिन योगी आज भी मोदी के लिए चैलेंज बने हुए है। लगभग बीस लोकसभा सीटों पर उनकी मजबूत पकड़ है। इसलिए अमित शाह उन्हे अपने जाल में कैद नहीं कर पाए हैं। इन सबसे अलग नितिन गडकरी सुयोग्य शासक बनने के गुणों से भरपुर हैं। भाजपा में यदि पीएम पोस्ट के लिए कोई योग्य व्यक्ति है तो नितिन गडकरी हैं। इसीलिए अमित शाह के लिए उनका पत्ता साफ कर पाना बूते से बाहर है। हर नेता गडकरी नहीं बन पाएगा।

  • महाराष्ट्र सरकार —- हनीमून खत्म

    महाराष्ट्र सरकार —- हनीमून खत्म

    • महाराष्ट्र सरकार की राजनीति।
    • दो घड़ों में बट गए बिल्डर लॉबी और कॉरपोरेट।
    • चाणक्य भूल जाते हैं कि लोकसभा की 41 सीटें जीतने में शिवसेना गठबंधन का हाथ था।
    • महाराष्ट्र में बीजेपी दोयम दर्जे से कभी आगे नहीं बढ़ी।

    सुरेंद्र राजभर
    मुंबई-
    महाराष्ट्र सरकार में यहां भूचाल मचा हुआ है। दो पक्षों की साझेदारी में धीरे-धीरे तनाव उत्पन्न हो रहा है। शिंदे और फडणवीस के बीच तलवारें खिंच चुकी हैं। क्योंकि फडणवीस गृहमंत्री होते हुए भी ठाणे जिले के आईपीएस को हटा नहीं सकते जबकि भाजपा के स्थानीय बड़े नेता का सिर फोड़ दिया गया। यह साझेदारी कब तक चलेगी यह कहा नहीं जा सकता।

    दिल्ली बड़ी बेरहम है। जो कोई सत्ता में आता है, खुद को सम्राट समझने लगता है। वहां का सत्ताधारी कभी भी बर्दास्त नहीं करता, कि उसके साम्राज्य में किसी प्रांत का नेता शक्तिशाली बनकर उसे चुनौती देने की स्थिति में आए। इसीलिए यूपी में भाजपा के स्टार प्रचारक योगी आदित्यनाथ के पर कतर दिए गए। बिना दांत और नाखून के सीएम बना दिए गए। मजबूरी थी केंद्र की क्योंकि योगी आरएसएस के बेहद करीब हैं। सरकार में उनके दाहिने बाएं तो महावत के रूप में उपमुख्यमंत्री रख दिए गए। संगठन में प्रांतीय अध्यक्ष और प्रभारी दिल्ली ने नियुक्त कर योगी को रोक दिया। लेकिन योगी के बगावती तेवर ने उन्हें शक्तिशाली सीएम बना दिया।

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    महाराष्ट्र, सरकार,
    मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की फाइल तस्वीर

    महाराष्ट्र सरकार की राजनीति ..

    महाराष्ट्र में बकौल पूर्व सीएम फड़णवीस ने ही शिवसेना तोड़ने, शिंदे के साथ अपनी मित्रता निभाने और खुद मुख्यमंत्री बनने के ख्वाब पाले थे। किंतु चाणक्य ने सस्पेंस रखते हुए एकनाथ शिंदे को सीएम बना दिया। फड़नवीस को बेइज्जत करने के लिए उन्हें डिप्टी सीएम बनने को मजबूर कर दिया।
    अब शिंदे और फडणवीस के बीच तलवारें खिंच चुकी हैं। क्योंकि फडणवीस गृहमंत्री होते हुए भी ठाणे जिले के आईपीएस को हटा नहीं सकते। जबकि भाजपा के स्थानीय बड़े नेता का सिर फोड़ दिया गया। शिंदे के प्रभाव के कारण एफआईआर भी नहीं लिखी गई। कितने असहज हो चुके हैं फडणवीस?

    इलेक्टोरल बॉन्ड का झोल।

    बिल्डर लॉबी,कॉरपोरेट भी दो घड़े में बंट गए हैं। कुछ को शिंदे तो कुछ को फडणवीस का वरद हस्त प्राप्त है। बीजेपी के कार्यकर्ता पीटे जाय। फडणवीस उसके पक्ष में खड़े भी हो जाएं लेकिन शिंदे द्वारा यह कहा जाए कि ठाणे जिले के किसी पुलिस अधिकारी का फडणवीस ट्रांसफर या पोस्टिंग, प्रमोशन नहीं कर सकते। क्योंकि बॉस शिंदे हैं और फडणवीस उनके अधीन हैं। उन्हे शिंदे का आदेश मानना ही पड़ेगा। बेचारे शिंदे करते भी तो क्या ? क्योंकि निरंतर उनका अपमान चाणक्य के फोन आने के बाद किया जाता है।

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    आज हालत ऐसे हैं कि कभी अभिन्न मित्र आज आंख में आंख मिलाकर बात तक नहीं करते। जिसका खामियाजा लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बीजेपी को ही भुगतना पड़ेगा। यूपी में लोकसभा की 64 सीटें 2019 में बीजेपी जीती थी। वहां योगी को नीचा दिखाया जा रहा और महाराष्ट्र में कुल 41 लोकसभा सीटें जीतने वाली भाजपा आगामी चुनाव में दहाई तक का आंकड़ा भी नहीं छूने की स्थिति में रह गई है। जिस बालासाहेब ठाकरे ने 2001 के गुजरात दंगे में सीएम मोदी का साथ दिया था। उन्हीं के बेटे उद्धव ठाकरे को चाणक्य ने लहूलुहान कर मोदी के विजय रथ को रोक दिया है। संभव है चाणक्य खुद पीएम की कुर्सी पाना चाहते हों और मोदी को डोमिनेट करने की महत्त्वाकांक्षा रखते हों।

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    महाराष्ट्र के मामले में चाणक्य भूल जाते हैं, कि लोकसभा की 41 सीटें जीतने में शिवसेना गठबंधन का हाथ था और यह भी भूल गए कि महाराष्ट्र में बीजेपी दोयम दर्जे से कभी आगे नहीं बढ़ी। शिवसेना के प्रभुत्व का लाभ बीजेपी को मिलता रहा है। लेकिन उद्धव ठाकरे को चोटिल कर चाणक्य ने भाजपा का महाराष्ट्र में सर्वनाश करने का जुगाड कर लिया है। इससे, सबसे बड़ा नुकसान पीएम मोदी का ही होगा और विधानसभा चुनाव में आने वाले समय में बीजेपी को 288 सीटों में बमुश्किल 20 सीटें ही मिलेंगी। शरद पवार, कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की ही आगामी सरकार बनेगी। उसी तरह जैसे यूपी की लोकसभा चुनाव में 40 सीटों पर पेंच फसने से आरएसएस चिंतित है।

  • क्या आरएसएस बदलेगी पीएम का चेहरा?

    क्या आरएसएस बदलेगी पीएम का चेहरा?

    • भारत का मुसलमान सिर्फ उस दल को वोट देगा जो बीजेपी को हरा सके।
    • चुनावी सर्वे में मोदी मैजिक खत्म होने के संकेत।
    • गुजरात लॉबी केवल दो उद्योगपतियों के लिए कर रही है काम।
    • पूर्व राज्यपाल ने चालीस जवानों के हत्या की कथित साजिश का किया खुलासा।
    • आगामी विधानसभा चुनावों में राजस्थान, मध्यप्रदेश, तेलंगाना जैसे राज्यों में बीजेपी की करारी हार की संभावना।
    • कांग्रेस का दामन थाम रहे बीजेपी की लेफ्ट वाहिनी बजरंग दल के लोग।

    सुरेंद्र राजभर
    मुंबई-
    आसार तो यही नजर आ रहे हैं, कि अब मोदी मैजिक खत्म हो रहा है। जिस तरह मोदी के चेहरे पर दो बार लोकसभा और अन्य कई राज्यों में विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में दो बार मोदी चेहरे ने प्रचंड जीत दिलाई थी। उसके आसार खत्म होने के संकेत चुनावी सर्वे में मिलने लगे हैं। मोदी का चेहरा, हिंदुत्व कार्ड, हिंदू-मुस्लिम और पाकिस्तान की बार-बार रट अब नहीं चलने वाली है। अहम बात यह कि ऐसा क्यों हो रहा?कारण अनेक हैं जिनमें एक कारण है गुजरात लॉबी द्वारा खुद को बीजेपी, सरकार और देश समझने की भ्रांति।

    पूरे देश को लगने लगा है कि जिस तरह देश की विरासतें जिन्हें पिछले सत्तर वर्षों में अथक श्रम से निर्मित किया गया था उसे एक झटके में खत्म करने के लिए औने-पौने दाम पर केवल दो गुजराती व्यापारियों को बेचने के कारण जनता समझने लगी है कि गुजरात लॉबी केवल उद्योगपतियों के लिए काम कर रही है। पिछले समय में अडानी पर हिडेनबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार फेक कंपनी द्वारा अडानी डिफेंस में बीस हजार करोड़ का इन्वेस्टमेंट शंकाएं पैदा करने लगा है।

    गुजरात लॉबी..

    चालीस जवानों की हत्या की कथित साजिश जिसको लेकर पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने खुलासे किए हैं, जो बेहद शर्मनाक हैं। गुजरात के बाद उत्तर प्रदेश ने दो बार 80 लोकसभा सीटों में अधिकतम सीटें दिलाने वाले राज्य के सीएम योगी आदित्यनाथ के उपर जिस तरह से गुजरात लॉबी ने दूसरे दलों के लोगों को डिप्टी सीएम बनाकर योगी को बांध दिया गया और गुजरात लॉबी ने योगी को अपंग बनाने के लिए संगठन में प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी नियुक्त किए उससे योगी समर्थकों में मायूसी होने से यूपी की चालीस सीटों पर पेंच फंस गया है।

    आसान नहीं नितिन गडकरी को पार्टी से निकाल फेंकना।

    भारत का मुसलमान सिर्फ उस दल को वोट देगा जो बीजेपी को हरा सके।

    कर्नाटक में बुरी तरह हार हुई है। सर्वे बताते हैं, कि आगामी विधानसभा चुनावों में राजस्थान, मध्यप्रदेश, तेलंगाना जैसे राज्यों में बीजेपी की करारी हार संभावित है। जिस तरह बीजेपी की लेफ्ट वाहिनी बजरंग दल के लोग कांग्रेस का दामन थाम रहे, जिस तरह बीजेपी से मोह भंग होने के कारण बीजेपी छोड़ रहे है। लोकसभा चुनाव में बीजेपी की हार सुनिश्चित लगने के बाद आरएसएस को चिंता में डाल दिया है।

    भाजपा मंत्री, बीजेपी सचिव के घर की आगजनी, बीजेपी के वादे से मुकरने का नतीजा

    आरएसएस समझ चुका है कि मोदी अब रेस जीतने वाले नहीं रहे इसलिए वह मोदी के स्थान पर दूसरा चेहरा आगे लाने पर विचार कर रहा है। जिसे देखकर स्पष्ट है कि अब गुजरात लॉबी के दिन खत्म होने वाले हैं। यद्यपि नरेंद्र मोदी और अमित शाह मुस्लिमों को साधने में लगे हैं लेकिन इतना तय है कि भारत का मुसलमान सिर्फ उस दल को वोट देगा जो बीजेपी को हरा सके।