Shweta Tripathi का Low AMH खुलासा: मां बनने का फैसला खुद लेना चाहती थीं एक्ट्रेस

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Shweta Tripathi ने कम AMH लेवल, फर्टिलिटी और मातृत्व पर खुलकर बात की। जानें क्यों उन्हें अपनी रिपोर्ट से झटका लगा और क्या है Low AMH का मतलब।

मुंबई: अभिनेत्री Shweta Tripathi ने अपनी फर्टिलिटी को लेकर एक ऐसा निजी अनुभव साझा किया है, जिसने महिलाओं के मातृत्व और व्यक्तिगत फैसले से जुड़े सवालों को फिर चर्चा में ला दिया है। एक्ट्रेस ने बताया कि जब उन्हें अपने AMH (Anti-Müllerian Hormone) का स्तर काफी कम होने की जानकारी मिली, तो वह बहुत परेशान हो गई थीं। उनकी चिंता सिर्फ मां बनने को लेकर नहीं थी, बल्कि इस बात को लेकर भी थी कि उन्हें बच्चा चाहिए या नहीं, इसका फैसला करने का अधिकार उनके पास होना चाहिए।

Shweta ने यह खुलासा Soha Ali Khan के पॉडकास्ट ‘All About Her’ में किया। बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी फर्टिलिटी, शादी, मां बनने की जिम्मेदारियों और समाज की अपेक्षाओं पर खुलकर अपनी बात रखी।

Low AMH रिपोर्ट देखकर क्यों परेशान हुई थीं Shweta Tripathi?

Shweta Tripathi ने बताया कि जब पहली बार उन्हें अपनी फर्टिलिटी के कम स्तर की जानकारी मिली, तब वह काफी upset हो गई थीं। उन्होंने कहा कि वह नहीं चाहती थीं कि कोई दूसरा व्यक्ति या मेडिकल स्थिति उनके लिए यह तय करे कि वह मां बन सकती हैं या नहीं।

उन्होंने पॉडकास्ट में कहा, “मैं याद कर सकती हूं कि मैं बहुत परेशान थी, क्योंकि मैं चाहती थी कि यह फैसला मेरा हो। मैं नहीं चाहती थी कि कोई दूसरा मुझे बताए कि तुम बच्चा नहीं कर सकती। उस समय भले ही मैं खुद यह सोच रही थी कि मुझे बच्चा चाहिए या नहीं।”

उनके इस बयान का मुख्य पहलू यह है कि वह मातृत्व को अपनी पसंद मानती थीं। वह इस विकल्प को खुला रखना चाहती थीं, न कि किसी मेडिकल रिपोर्ट के कारण खुद को पहले से किसी एक फैसले तक सीमित महसूस करना चाहती थीं।

AMH टेस्ट में क्या पता चला था?

Shweta के खुलासे में AMH टेस्ट का भी जिक्र सामने आया। AMH का पूरा नाम Anti-Müllerian Hormone है। यह महिलाओं के अंडाशय (Ovaries) में मौजूद छोटे विकसित हो रहे फॉलिकल्स से बनने वाला हार्मोन है। इसका टेस्ट Ovarian Reserve यानी अंडाशय में उपलब्ध अंडाणुओं की अनुमानित संख्या का आकलन करने में मदद करता है।

कम AMH स्तर का मतलब यह हो सकता है कि अंडाशय में उपलब्ध अंडाणुओं का रिजर्व अपेक्षाकृत कम है। हालांकि, कम AMH का अर्थ यह नहीं है कि महिला प्राकृतिक रूप से गर्भधारण नहीं कर सकती।

AMH टेस्ट अकेले किसी महिला की गर्भधारण करने की पूरी क्षमता निर्धारित नहीं करता। इसकी रिपोर्ट को उम्र, मेडिकल हिस्ट्री और दूसरी जांचों के साथ समझा जाता है। फर्टिलिटी ट्रीटमेंट, खासकर IVF के दौरान भी इस टेस्ट का इस्तेमाल अंडाशय की संभावित प्रतिक्रिया का अनुमान लगाने के लिए किया जाता है।

इसलिए Shweta के कम AMH स्तर को बांझपन या मां न बन पाने की पुष्टि के रूप में देखना सही नहीं होगा।

पहले मां बनना चाहती थीं, फिर क्यों बदल गया नजरिया?

Shweta ने बताया कि एक समय ऐसा था जब उन्होंने हमेशा खुद को मां बनते हुए देखा था। लेकिन समय के साथ उनकी सोच बदली और उन्होंने इस बात पर विचार करना शुरू किया कि क्या मातृत्व वास्तव में उनके जीवन का जरूरी हिस्सा होना चाहिए।

उन्होंने अपनी दोस्तों और अपनी भाभी को मां बनने के बाद जिम्मेदारियां निभाते हुए देखा है। उनका कहना था कि मां बनना बाहर से जितना आसान दिखाई देता है, वास्तविक जिंदगी में उतना ही चुनौतीपूर्ण होता है।

Shweta ने कहा कि मां बनने के बाद महिलाएं एक तरह से सुपरह्यूमन बन जाती हैं। उन्होंने अपनी भाभी और दोस्तों के अनुभवों का जिक्र करते हुए बताया कि मातृत्व में काफी मेहनत, हिम्मत, त्याग और जिम्मेदारी की जरूरत होती है।

उन्होंने यह भी कहा कि पिछली पीढ़ियों की महिलाओं ने इन जिम्मेदारियों को किस तरह संभाला, यह देखकर उन्हें आश्चर्य होता है। उनके अनुसार, कई बार महिलाओं को मातृत्व की वास्तविक चुनौतियों के बारे में पहले से पर्याप्त जानकारी नहीं दी जाती।

पति Chaitanya Sharma के साथ भी हुई थी बच्चे को लेकर बातचीत

Shweta Tripathi ने अपने पति Chaitanya Sharma के साथ भी मातृत्व को लेकर हुई बातचीत का जिक्र किया। Chaitanya को SlowCheeta के नाम से भी जाना जाता है। दोनों ने जून 2018 में शादी की थी।

Shweta के अनुसार, उनकी बातचीत में पहले दो बच्चे होने, फिर एक बच्चा होने और अंत में बच्चे न करने जैसे विकल्पों पर भी विचार हुआ। इससे पता चलता है कि उनके लिए मातृत्व का फैसला समय के साथ बदलती सोच और आपसी बातचीत का हिस्सा रहा है।

उन्होंने अपने पति को अपना सबसे अच्छा दोस्त और पसंदीदा व्यक्ति बताया। उनके लिए किसी भी बड़े जीवन के फैसले में आपसी समझ और जिम्मेदारियों की साझेदारी महत्वपूर्ण है।

बातचीत में Shweta ने अपने पुराने एक अस्वस्थ रिश्ते का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उस अनुभव ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि कई बार महिलाओं से बच्चे की जिम्मेदारी उठाने के साथ-साथ घर और पार्टनर की देखभाल की अपेक्षा भी की जाती है।

वह ऐसी स्थिति नहीं चाहती थीं, जिसमें पूरी जिम्मेदारी सिर्फ महिला के ऊपर आ जाए।

33 साल की उम्र में शादी के बाद भी सुनने पड़ते थे सवाल

Shweta ने बताया कि उनकी शादी 33 साल की उम्र में हुई थी। शादी से पहले उन्हें आसपास के लोगों से लगातार यह सवाल सुनने पड़ते थे कि वह शादी कब करेंगी।

उन्होंने कहा कि यह दबाव उनके माता-पिता की तरफ से नहीं था, बल्कि आसपास के लोगों की ओर से आता था। ऐसे सवाल उन्हें परेशान करते थे।

शादी के बाद बच्चे को लेकर भी सवालों का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि उनकी भाभी के मां बनने के बाद घर में काम करने वाली कुछ महिलाओं ने उनसे पूछना शुरू कर दिया कि अब उनकी बारी कब आएगी और वह गुड न्यूज कब देंगी।

हालांकि, Shweta ने अपने दोनों परिवारों की तारीफ की। उन्होंने बताया कि उनके परिवार के लोग दादा-दादी और नाना-नानी बनने की इच्छा रखते थे, लेकिन उन्होंने कभी उन पर बच्चा पैदा करने के लिए दबाव नहीं बनाया।

उनके अनुसार, परिवार की ओर से उन्हें हमेशा अपनी जिंदगी के फैसले लेने की आजादी मिली।

भारत में महिलाओं पर मातृत्व का कितना दबाव है?

Shweta का अनुभव भारत में महिलाओं के सामने आने वाली एक बड़ी सामाजिक चुनौती की ओर भी ध्यान दिलाता है। शादी के बाद महिलाओं से बच्चे को लेकर सवाल करना कई परिवारों और सामाजिक परिस्थितियों में सामान्य व्यवहार माना जाता है।

अक्टूबर 2026 में सामने आए Outlook-Toluna सर्वे में महानगरों और टियर-1 शहरों की 1,334 महिलाओं को शामिल किया गया था। सर्वे में विवाहित महिलाओं के बीच बेटे को जन्म देने की अपेक्षा से जुड़े दबाव की बात सामने आई।

इसमें 39 प्रतिशत विवाहित महिलाओं ने बेटे की चाह से जुड़े दबाव का अनुभव करने की बात कही। 34 प्रतिशत ने माता-पिता, 27 प्रतिशत ने सास-ससुर और 26 प्रतिशत ने पति की ओर से इस तरह के दबाव की जानकारी दी।

यह सर्वे सामान्य मातृत्व दबाव का नहीं, बल्कि विशेष रूप से बेटे की चाह से संबंधित है। फिर भी यह दिखाता है कि महिलाओं के प्रजनन संबंधी फैसलों में परिवार और समाज की अपेक्षाएं कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

दुनिया में हर छह में से एक व्यक्ति को Infertility की समस्या

फर्टिलिटी से जुड़ी समस्या सिर्फ सेलिब्रिटी या किसी एक देश तक सीमित नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया में लगभग हर छह में से एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में Infertility का अनुभव करता है।

WHO की क्लिनिकल परिभाषा के अनुसार, नियमित असुरक्षित यौन संबंध के बावजूद 12 महीने या उससे अधिक समय तक गर्भधारण नहीं होना Infertility की स्थिति मानी जाती है।

भारत में 2026 में प्रकाशित एक Systematic Review और Meta-analysis में प्रजनन आयु की महिलाओं से जुड़े आठ अध्ययनों का विश्लेषण किया गया। इसमें कुल 25,778 महिलाओं का डेटा शामिल था। शोधकर्ताओं ने Primary Infertility का संयुक्त अनुमान लगभग 5 प्रतिशत और Secondary Infertility का लगभग 2 प्रतिशत बताया।

एक अन्य अध्ययन में NFHS-5 के 2019 से 2021 के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए 5,12,408 विवाहित महिलाओं का डेटा शामिल किया गया था। उसमें Primary Infertility का अनुमान 3.28 प्रतिशत और Secondary Infertility का 13.9 प्रतिशत बताया गया।

इन दोनों अध्ययनों की परिभाषाएं और अध्ययन पद्धति अलग हैं, इसलिए इनके आंकड़ों को सीधे एक-दूसरे से तुलना नहीं करनी चाहिए।

फर्टिलिटी की समस्या का असर सिर्फ गर्भधारण तक सीमित नहीं रहता। इसका संबंध मानसिक तनाव, पारिवारिक संबंधों, सामाजिक दबाव और इलाज के आर्थिक खर्च से भी हो सकता है।

Shweta Tripathi कौन हैं?

Shweta Tripathi भारतीय अभिनेत्री हैं, जिन्हें खासतौर पर वेब सीरीज ‘Mirzapur’ में Golu Gupta के किरदार के लिए पहचान मिली। इसके अलावा उन्होंने फिल्मों और अन्य डिजिटल प्रोजेक्ट्स में भी काम किया है।

उनके पति Chaitanya Sharma अभिनेता, रैपर और लेखक हैं तथा SlowCheeta नाम से पहचाने जाते हैं।

Shweta ने अपने इस पॉडकास्ट इंटरव्यू में जिस तरह फर्टिलिटी, मातृत्व और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बात की, उससे एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आया है: क्या मां बनना हर महिला के जीवन का अनिवार्य लक्ष्य होना चाहिए?

उनका अनुभव बताता है कि मातृत्व का फैसला महिला की अपनी इच्छा, परिस्थितियों और प्राथमिकताओं के अनुसार होना चाहिए। किसी महिला से बार-बार शादी या बच्चे को लेकर सवाल करना उसके निजी जीवन में अनावश्यक दबाव पैदा कर सकता है।

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