मुंबई के 16 साल पुराने Malad Firing Case में बोरीवली कोर्ट ने दो कारोबारियों को सबूतों के अभाव में बरी किया। Arms Act केस में बड़ा फैसला।
मुंबई: चर्चित 16 साल पुराने मालाड फायरिंग केस में आखिरकार बड़ा फैसला सामने आया है। बोरीवली की स्थानीय अदालत ने दक्षिण मुंबई के दो कारोबारियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। दोनों पर आरोप था कि उन्होंने शराब के नशे में मालाड वेस्ट के एक बार के बाहर लाइसेंसी पिस्टल से हवा में फायरिंग की थी। हालांकि अदालत ने कहा कि पुलिस ठोस वैज्ञानिक और तकनीकी सबूत पेश नहीं कर पाई। इसी वजह से दोनों आरोपियों को राहत मिल गई।
यह मामला एक बार फिर मुंबई पुलिस की जांच प्रक्रिया, Arms Act मामलों में सबूतों की अहमियत और लंबी कानूनी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रहा है।
क्या था पूरा मालाड फायरिंग केस?
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22 सितंबर 2010 की रात का मामला
यह मामला 22 सितंबर 2010 का है। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक दिलीप कन्हैयालाल बॉम्बेवाला, प्रतीक रसिकलाल गोराडिया और उनका एक दोस्त मालाड वेस्ट के लिंक रोड स्थित Garden View Bar गए थे।

पुलिस के अनुसार तीनों ने शराब पी रखी थी। इसी दौरान कथित तौर पर दिलीप बॉम्बेवाला ने अपनी पिस्टल निकाली और हवा में फायरिंग की। बाद में प्रतीक गोराडिया ने भी वही हथियार लेकर हवा में गोली चलाई।
उस वक्त इलाके में अफरा-तफरी मच गई थी। इसके बाद मालाड पुलिस मौके पर पहुंची और कार्रवाई शुरू की।
पुलिस ने किन धाराओं में किया था केस दर्ज?
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Arms Act और जान जोखिम में डालने का आरोप
मालाड पुलिस ने दोनों कारोबारियों के खिलाफ Arms Act और मानव जीवन को खतरे में डालने जैसी धाराओं में मामला दर्ज किया था।
पुलिस का दावा था कि:
- बॉम्बेवाला के पास से एक पिस्टल और छह गोलियां बरामद हुईं
- गोराडिया के पास से दूसरी पिस्टल और एक जिंदा कारतूस मिला
- दोनों ने शराब के नशे में सार्वजनिक जगह पर फायरिंग की
इसके बाद दोनों को गिरफ्तार किया गया था।
अदालत में बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?
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“कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं मिला”
बचाव पक्ष के वकील Sunil Pandey ने अदालत में कहा कि पुलिस ने बिना पर्याप्त सबूतों के उनके मुवक्किलों को फंसाया।
उन्होंने कहा:
- कोई GSR Test नहीं हुआ
- कोई Ballistic Report पेश नहीं की गई
- CCTV फुटेज नहीं था
- कोई वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं थी
- बरामद गोलियों का हथियार से मिलान नहीं हुआ
वकील ने अदालत से कहा कि सिर्फ लाइसेंसी हथियार रखने से Arms Act के तहत अपराध साबित नहीं होता।
तीसरे व्यक्ति को छोड़ने पर भी उठे सवाल
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पुलिस जांच पर अदालत में हुई बहस malad firing case
डिफेंस ने यह भी सवाल उठाया कि घटना के वक्त तीन लोग मौजूद थे, लेकिन पुलिस ने सिर्फ दो लोगों को गिरफ्तार किया जबकि तीसरे व्यक्ति को छोड़ दिया गया।
इस दलील ने पुलिस जांच की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े किए।
वकील सुनील पांडे ने अदालत में कहा कि:
“मेरे मुवक्किलों ने हवा में फायरिंग नहीं की। पुलिस ने उचित जांच नहीं की।”
कोर्ट ने किन आधारों पर दिया फैसला?
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सबूतों की कमी बनी सबसे बड़ा कारण
बोरीवली कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक और प्रत्यक्ष सबूत पेश नहीं कर सका।
अदालत ने माना कि:
- हथियार लाइसेंसी थे
- फायरिंग साबित करने के लिए तकनीकी रिपोर्ट नहीं थी
- पुलिस जांच में कई कमियां थीं
इन्हीं आधारों पर दोनों कारोबारियों को बरी कर दिया गया।
लाइसेंसी हथियार रखने के कानून क्या कहते हैं?
भारत में वैध Arms Licence रखने वाले व्यक्ति को कानूनी रूप से हथियार रखने की अनुमति होती है। हालांकि सार्वजनिक स्थान पर हथियार का गलत इस्तेमाल कानूनन अपराध माना जाता है।
Arms Act से जुड़ी जानकारी यहां देख सकते हैं:
16 साल बाद malad firing case ने क्या सवाल खड़े किए?
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लंबी कानूनी प्रक्रिया पर चर्चा
यह मामला करीब 16 साल तक अदालत में चलता रहा। ऐसे मामलों में देरी को लेकर अक्सर न्याय व्यवस्था पर सवाल उठते हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि:
- पुराने मामलों में सबूत कमजोर हो जाते हैं
- गवाहों की याददाश्त प्रभावित होती है
- तकनीकी जांच का अभाव केस कमजोर करता है
मुंबई जैसे महानगर में Arms Act और पब्लिक सेफ्टी से जुड़े मामलों में फॉरेंसिक सबूत बेहद अहम माने जाते हैं।
FAQ
मालाड फायरिंग केस क्या है?
यह 2010 का मामला है जिसमें दो कारोबारियों पर मालाड के एक बार के बाहर हवा में फायरिंग करने का आरोप था।
कोर्ट ने आरोपियों को क्यों बरी किया?
अदालत ने कहा कि पुलिस पर्याप्त वैज्ञानिक और तकनीकी सबूत पेश नहीं कर पाई।
क्या आरोपियों के पास लाइसेंसी हथियार थे?
हाँ, बचाव पक्ष के अनुसार कम से कम एक आरोपी के पास वैध Arms Licence था।
पुलिस ने क्या बरामद किया था?
पुलिस ने पिस्टल, गोलियां और जिंदा कारतूस बरामद करने का दावा किया था।
केस कितने साल चला?
यह मामला करीब 16 साल तक अदालत में चला।
Conclusion
मुंबई के 16 साल पुराने मालाड फायरिंग केस में आया यह फैसला सिर्फ दो कारोबारियों की राहत तक सीमित नहीं है। यह मामला पुलिस जांच, वैज्ञानिक सबूतों की अहमियत और लंबी कानूनी प्रक्रिया पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। अदालत ने साफ कर दिया कि किसी भी आपराधिक मामले में सिर्फ आरोप काफी नहीं होते, बल्कि ठोस सबूत होना भी जरूरी है। आने वाले समय में ऐसे मामलों में फॉरेंसिक और तकनीकी जांच की भूमिका और ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है।
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