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  • Mumbai: Notice ना देने पर MNS कार्यकर्ता रिहा, कोर्ट ने बताया Arrest अवैध

    Mumbai: Notice ना देने पर MNS कार्यकर्ता रिहा, कोर्ट ने बताया Arrest अवैध

    Mumbai में MNS activist Ravindra Shinde की गिरफ्तारी को कोर्ट ने अवैध माना। BNSS Section 35(3) के तहत notice न देने पर magistrate court ने दी रिहाई। Extortion case में पुलिस की कार्रवाई पर उठे सवाल।

    मुंबई: मुंबई में एक बड़ा कानूनी मोड़ सामने आया है। South Mumbai में रोड वर्क ठेकेदार से कथित तौर पर धमकी देकर वसूली (extortion) करने के आरोप में गिरफ्तार किए गए MNS कार्यकर्ता Ravindra Shinde को अदालत ने रिहा कर दिया है। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने माना कि गिरफ्तारी प्रक्रिया में BNSS के तहत जरूरी notice नहीं दिया गया, जिससे arrest अवैध हो गया।

    ⚖️ Court का बड़ा फैसला: Arrest को बताया Illegal

    मामले की सुनवाई के दौरान magistrate court ने कहा कि चूंकि आरोपी को Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (BNSS) Section 35(3) के तहत अनिवार्य notice for appearance नहीं दिया गया, इसलिए गिरफ्तारी वैध नहीं मानी जा सकती।

    यह मामला उन अपराधों से जुड़ा है जिनमें अधिकतम सजा सात साल तक की है। ऐसे मामलों में Supreme Court के आदेश के मुताबिक पहले notice जारी करना जरूरी है।

    👤 कौन हैं आरोपी?

    इस मामले में गिरफ्तार किए गए आरोपी का नाम Ravindra Shinde है, जो MNS (Maharashtra Navnirman Sena) से जुड़े कार्यकर्ता बताए जा रहे हैं। उन्हें शनिवार को पुलिस ने गिरफ्तार किया था।

    उन पर आरोप है कि उन्होंने South Mumbai में एक road work contractor को धमकाकर पैसे की मांग की थी।

    📜 Defence ने Supreme Court Order का दिया हवाला

    Shinde की ओर से वकील Rajendra Shirodkar, साथ में Archit Sakhalkar ने कोर्ट में दलील दी। उन्होंने Supreme Court के उस आदेश का हवाला दिया जिसमें कहा गया है कि जिन अपराधों में सात साल तक की सजा है, उनमें Section 35(3) BNSS के तहत पहले notice देना अनिवार्य है।

    डिफेंस का तर्क था कि पुलिस ने यह जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं की।

    🏛️ Police ने कहा – Process Follow किया

    Public Prosecutor R A Patil ने अदालत में कहा कि पुलिस ने सभी जरूरी प्रक्रियाओं का पालन किया है।

    हालांकि कोर्ट ने पाया कि जांच अधिकारी यह साबित नहीं कर सके कि आरोपी को Section 35(3) के तहत notice जारी किया गया था।

    📌 BNSS की किन धाराओं का पालन हुआ?

    डिफेंस वकील Shirodkar ने बताया कि मजिस्ट्रेट ने माना कि पुलिस ने:

    • Section 47(1) BNSS के तहत गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी दी
    • Section 48(2) और 48(3) BNSS के तहत आरोपी के रिश्तेदारों को सूचना दी

    लेकिन सबसे अहम Section 35(3) notice for appearance जारी करने का कोई प्रमाण पेश नहीं किया जा सका।

    🔎 Legal Procedure पर फिर उठे सवाल

    इस फैसले के बाद Mumbai Police की arrest procedure और BNSS compliance को लेकर फिर से चर्चा तेज हो गई है। Legal experts का मानना है कि Supreme Court guidelines का पालन न करना जांच पर असर डाल सकता है।


    ❓ FAQ Section

    Q1. किसे रिहा किया गया है?
    MNS कार्यकर्ता Ravindra Shinde को कोर्ट ने रिहा किया।

    Q2. कोर्ट ने गिरफ्तारी को अवैध क्यों माना?
    क्योंकि BNSS Section 35(3) के तहत अनिवार्य notice for appearance जारी नहीं किया गया था।

    Q3. आरोपी पर क्या आरोप हैं?
    South Mumbai में एक road work contractor को धमकाकर extortion करने का आरोप है।

    Q4. पुलिस ने कौन सी कानूनी प्रक्रिया पूरी की थी?
    Section 47(1) के तहत गिरफ्तारी के कारण बताए और Section 48(2)(3) के तहत रिश्तेदारों को सूचना दी।

    Q5. Supreme Court का क्या आदेश है?
    जिन मामलों में सजा सात साल तक है, उनमें पहले notice जारी करना जरूरी है।

  • चुनाव आयोग की आज़ादी पर सवाल: लोकतंत्र में ‘फेयर गेम’ की बहस फिर तेज़

    चुनाव आयोग की आज़ादी पर सवाल: लोकतंत्र में ‘फेयर गेम’ की बहस फिर तेज़

    मोदी सरकार और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के टकराव के बीच चुनाव आयोग की भूमिका पर नए सवाल उठ रहे हैं। क्या लोकतंत्र में पारदर्शिता खतरे में है या विपक्ष की सियासत सिर्फ आरोपों का खेल खेल रही है?

    🔹 लोकतंत्र या नियंत्रण?

    देश में लोकतंत्र के नाम पर सत्ता की बढ़ती पकड़ को लेकर बहस एक बार फिर तेज़ हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को दरकिनार करते हुए सरकार द्वारा बनाए गए नए कानूनों ने विपक्ष ही नहीं, बल्कि आम जनता में भी चिंता बढ़ा दी है।
    पहले दिल्ली सरकार के प्रशासनिक अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनी हुई सरकार के पक्ष में फैसला दिया, मगर केंद्र ने संसद में बहुमत के आधार पर नया कानून बनाकर सारे अधिकार उपराज्यपाल को दे दिए। सवाल ये उठता है — क्या यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया है या सत्ता का केंद्रीकरण?

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    🔹 सुप्रीम कोर्ट की बेंच और सरकार का टकराव

    चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने साफ कहा था कि प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश – तीनों मिलकर नियुक्ति करेंगे ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
    लेकिन सरकार ने इस आदेश को बदलते हुए नया कानून पास किया — जिसमें सीजेआई को हटाकर प्रधानमंत्री, उनके नामित मंत्री और नेता प्रतिपक्ष को शामिल किया गया।
    यहां भी बहुमत का समीकरण साफ दिखाई देता है – दो वोट सरकार के पक्ष में और एक विपक्ष का। ऐसे में नियुक्ति का फैसला पहले से तय माना जा रहा है।

    🔹 चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल

    देश के लोकतंत्र का स्तंभ माने जाने वाले चुनाव आयोग पर भी अब गंभीर आरोप लग रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि आयोग अब “स्वतंत्र संस्था” नहीं रह गई, बल्कि “सरकार की सुविधा आयोग” बन चुकी है।
    कई मामलों में आयोग पर वोटर लिस्ट से नाम काटने, फर्जी मतदाता जोड़ने और CCTV फुटेज न देने के आरोप हैं।
    खासकर बिहार में लाखों वोटर लिस्ट से नाम काटे जाने का मामला सुर्खियों में है। विपक्ष का दावा है कि इनमें ज़्यादातर नाम सीमावर्ती मुस्लिम इलाकों के मतदाताओं के हैं।

    🔹 ईवीएम पर फिर उठे सवाल

    वोटिंग मशीन यानी EVM को लेकर भी विवाद फिर से गर्म है। कभी बीजेपी खुद कांग्रेस पर ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप लगाती थी, लेकिन अब विपक्ष बीजेपी पर यही आरोप दोहरा रहा है।
    अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप, एलन मस्क और जापान की तकनीकी कंपनियों ने भी कहा कि कोई भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस पूरी तरह “हैक-प्रूफ” नहीं होती।
    फिर सवाल उठता है — जब मोबाइल, सैटेलाइट और अंतरिक्ष यान को कंट्रोल किया जा सकता है, तो EVM क्यों नहीं?

    🔹 बिहार का वोटर डेटा विवाद

    बिहार में चुनाव आयोग ने SIR सिस्टम लागू कर लगभग 65 लाख वोटरों के नाम हटाए। आयोग का कहना है कि ये नाम डुप्लीकेट या फर्जी थे, जबकि विपक्ष का आरोप है कि यह “टारगेटेड वोट डिलीशन” है।
    कई इलाकों में मृत मतदाताओं के नाम हटाने के बहाने असली मतदाताओं को लिस्ट से बाहर कर दिया गया।
    विपक्षी नेताओं का कहना है कि बिना आधार कार्ड, बिना नागरिकता सत्यापन और बिना जांच के इतने नाम कैसे जोड़े या हटाए जा सकते हैं?

    🔹 संसद में बने विवादित कानून

    सरकार ने संसद से ऐसा कानून पास किया जिसके तहत चुनाव आयोग की किसी भी कार्रवाई को लेकर कोई कोर्ट, चाहे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट, मामला नहीं सुन सकता
    यानी आयोग चाहे जितनी मनमानी करे, उस पर न्यायिक रोक संभव नहीं।
    विपक्ष का कहना है कि यही असली “लोकतंत्र की हत्या” है — जब जनता के पास न्याय की अपील का अधिकार ही नहीं बचेगा।

    🔹 विपक्ष को खत्म करने की साजिश?

    हाल में विपक्षी नेताओं के जेल जाने की घटनाओं ने इस बहस को और हवा दी है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और राज्यसभा सांसद संजय सिंह के खिलाफ कार्रवाई को विपक्ष “राजनीतिक बदला” बता रहा है।
    नए कानून में यह प्रावधान है कि अगर कोई मुख्यमंत्री या मंत्री तीन महीने से ज़्यादा जेल में रहता है, तो उसका पद स्वतः समाप्त माना जाएगा।
    विपक्षी दलों का आरोप है कि इसी का फायदा उठाकर सरकार सत्ता में बैठे विपक्षी मुख्यमंत्रियों को हटाने की साजिश रच रही है।

    🔹 क्या भारत लोकतंत्र से राजतंत्र की ओर?

    राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर यही रफ्तार रही तो भारत में चुनाव सिर्फ “औपचारिक प्रक्रिया” बनकर रह जाएंगे।
    जब सरकार खुद ही चुनाव आयोग, प्रशासन और कानून को नियंत्रित करेगी, तो चुनाव का मतलब क्या बचेगा?
    कई विपक्षी नेताओं ने व्यंग्य में कहा कि “अब तो प्रधानमंत्री अपने उत्तराधिकारी का नाम कागज़ पर लिखेंगे और वही बाद में घोषित हो जाएगा — जैसे किसी संगठन का प्रमुख तय होता है।”

    🧩 जनता का सवाल: भरोसा किस पर करें?

    जनता अब यह सोचने पर मजबूर है कि अगर न्यायपालिका के आदेश, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और विपक्ष की आवाज़ — तीनों पर अंकुश लग जाए, तो लोकतंत्र का अस्तित्व कहाँ बचेगा?
    अब ज़रूरत है कि पारदर्शिता और जवाबदेही को फिर से प्राथमिकता दी जाए। लोकतंत्र सिर्फ चुनाव का नाम नहीं, बल्कि जनता की आस्था और विश्वास का प्रतीक है।


    ❓ FAQ सेक्शन

    Q1. क्या सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के नियम बदले थे?
    हाँ, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नियुक्ति में सीजेआई, प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष शामिल हों।

    Q2. सरकार ने इस आदेश को कैसे बदला?
    सरकार ने संसद में नया कानून पारित कर सीजेआई को हटाकर एक केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया।

    Q3. क्या ईवीएम को हैक किया जा सकता है?
    तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि कोई भी इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम 100% सुरक्षित नहीं होता, इसलिए पारदर्शिता के उपाय ज़रूरी हैं।

    Q4. क्या बिहार में वाकई लाखों वोटर हटाए गए?
    हाँ, SIR सिस्टम के तहत लाखों नाम हटाए गए, जिनमें विपक्ष का दावा है कि बड़ी संख्या मुस्लिम मतदाताओं की है।

    Q5. क्या यह सब लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है?
    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर संस्थाओं की स्वतंत्रता पर दबाव जारी रहा, तो लोकतंत्र का स्वरूप प्रभावित हो सकता है।

  • झूठे गवाहों का इस्तेमाल कर 19 साल की जेल, मुंबई लोकल ब्लास्ट में 12 मुसल्मानों को किसने फंसाया?

    झूठे गवाहों का इस्तेमाल कर 19 साल की जेल, मुंबई लोकल ब्लास्ट में 12 मुसल्मानों को किसने फंसाया?

    11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में पिछले 19 सालों से जिन 12 मुसलमानों को दोषी ठहरा कर जेल में कैद कर लिया गया था। हाईकोर्ट ने सभी को एक साथ बरी कर दिया। लेकिन इन सब के पीछे कौन हो सकता है यह अभ भी सवाल का विषय बना हुआ है। 19 years in jail using false witnesses, who implicated 12 Muslims in Mumbai local train blast?

    मुंबई: 2006 के मुंबई लोकल ट्रेन बम धमाकों ने पूरे देश को हिला दिया था। इन धमाकों में 187 लोगों की जान गई, 800 से ज़्यादा घायल हुए। इस भयानक घटना के 19 साल बाद, बॉम्बे हाई कोर्ट ने 12 लोगों को बरी कर दिया, जिन्हें इन धमाकों का दोषी ठहराया गया था। हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट के इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है, लेकिन यह भी साफ कर दिया है कि बरी किए गए लोगों को वापस जेल नहीं भेजा जाएगा। अब सवाल है, कि इन 12 मुसलमानों को फंसाने का काम किसने किया था। जिसकी वजह से एक विशेष समुदाय को टार्गेट किया गया। ये सवाल हैं उन 12 लोगों में से एक मोहम्मद अली का, जिन्हें इसी मामले में बरी कर दिया गया है।

    हाईकोर्ट के फैसले पर लगा रोक

    सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने साफ कर दिया, कि सभी आरोपी जेल से रिहा हो चुके हैं, इसलिए उन्हें दोबारा जेल भेजने का सवाल ही नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल की दलीलों पर विचार करते हुए कहा, कि हाई कोर्ट के फैसले को कानूनी मिसाल के तौर पर नहीं माना जाएगा और उस फैसले पर रोक लगाई जाती है। 19 years in jail using false witnesses, who implicated 12 Muslims in Mumbai local train blast?

    वो 13 लोग कौन थे?

    2006 के धमाकों के बाद मुंबई पुलिस ने 13 लोगों को गिरफ्तार किया था। इनमें कमाल अहमद, मोहम्मद साजिद मरगूब अंसारी, मोहम्मद माजिद, नवीद हुसैन खान, मोहम्मद फ़ैसल अतउर रहमान शेख, सुहैल महमूद शेख, आसिफ खान, एहतेशाम कुतुबुद्दीन सिद्दीकी, शेख मोहम्मद अली, जमीर अहमद, मुजम्मिल अतउर रहमान शेख, तनवीर अहमद और अब्दुल वहीद शेख शामिल थे। 19 years in jail using false witnesses, who implicated 12 Muslims in Mumbai local train blast?

    एक की हो गयी मौत

    गिरफ्तार 12 लोगों ने बॉम्बे हाईकोर्ट में अपनी बेगुनाही की अपील की थी। हाईकोर्ट में 10 साल केस चला फिर फैसला आया कि ये सब बेकसूर हैं। इस पूरे मामले में एक ऐसा शख्स भी था जिसने अपनी बेगुनाही की खबर सुनने से पहले ही दुनिया छोड़ दिया। बिहार के मधुबनी जिले के बसोपट्टी के रहने वाले कमाल अहमद मोहम्मद वकील अंसारी की 2021 में कोविड के दौरान जेल में ही मौत हो गई थी। 19 years in jail using false witnesses, who implicated 12 Muslims in Mumbai local train blast?

    मजदूर को किया था गिरफ्तार

    जब कमाल को पुलिस ने गिरफ्तार किया तब उनके बेटे अब्दुल्ला अंसारी सिर्फ छह साल के थे। अब्दुल्ला कहा, ATS ने कमाल अंसारी पर पाकिस्तान में हथियारों का ट्रेनिंग लेने, भारत-नेपाल बॉर्डर के रास्ते आतंकवादियों को लाने और मुंबई के माटुंगा स्टेशन पर विस्फोटक रखने का इल्जाम लगाया था। लेकिन अब्दुल्ला बताते हैं कि उनके पिता एक मजदूर थे, उन्होंने ऐसा नहीं किया। 19 years in jail using false witnesses, who implicated 12 Muslims in Mumbai local train blast?

    क्या अब सरकारें, पुलिस, मीडिया कमाल के परिवार से माफी मांगेगे? उसकी बदनामी के दाग को कौन धोएगा?

    झूठे गवाह और मनगढ़ंत कबूलनामे का खुलासा

    इस मामले में पुलिस ने आरोपियों को फंसाने के लिए कई हथकंडे अपनाए, जिनकी पोल RTI ने खोल दी।

    • गवाह नंबर 74 की झूठी गवाही: अभियोजन पक्ष के गवाह नंबर 74 ने विशेष मकोका अदालत में बताया था कि उसने एहतेशाम सिद्दीकी को चर्चगेट रेलवे स्टेशन पर एक काले बैग के साथ देखा था। इसी गवाही के आधार पर एहतेशाम को बम लगाने वाला बताया गया। लेकिन RTI से मिली जानकारी ने इस गवाह की पोल खोल दी। गवाह ने जिस अस्पताल में किसी से मिलने की बात कही थी, वहां उस नाम का कोई व्यक्ति था ही नहीं और जिस बैंक में मिलने का दावा किया था, वह व्यक्ति भी वहां नहीं था। अदालत ने इस गवाह को पुलिस का ‘स्टॉक गवाह’ करार दिया, यानी एक ऐसा गवाह जिसे पुलिस हर केस में इस्तेमाल करती है। RTI से यह भी सामने आया कि यही गवाह पुलिस के लिए चार और मामलों में भी पेश हुआ था।
    • पहचान में देरी पर सवाल: पुलिस ने कुछ ऐसे गवाह भी पेश किए जिन्होंने ब्लास्ट के 100 दिनों बाद आरोपियों को पहचानने की बात कही। अदालत ने इस पर सवाल उठाया कि कोई इतने लंबे समय बाद किसी व्यक्ति का चेहरा कैसे याद रख सकता है? यह दर्शाता है कि पुलिस असली गुनहगारों को ढूंढने के बजाय आम लोगों को बलि का बकरा बना रही थी।
    • स्केच गवाह का अनुपस्थित होना: आरोपी के स्केच बनाने में मदद करने वाले गवाह को ट्रायल के लिए नहीं बुलाया गया और न ही उसे अदालत में आरोपी की पहचान करने के लिए कहा गया। मामले का यह एक सबसे बड़ा लूप-होल था।
    • कॉपी-पेस्ट के कबूलनामे: पुलिस का केस ज़्यादातर कबूलनामों पर आधारित था, जो पुलिस ने अपनी कस्टडी में लिए थे। MCOCA की धारा 18 के तहत पुलिस के सामने दिए गए कबूलनामों को कोर्ट में मान्यता देता है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इन कबूलनामों के आधार पर सजा देने से इंकार कर दिया, क्योंकि कोई पुख्ता सबूत मौजूद नहीं थे। कोर्ट ने यह भी पाया कि कई आरोपियों ने दो अलग-अलग अधिकारियों के सामने जुर्म कबूल किया था, लेकिन दोनों कबूलनामों में घटना का विवरण, यहां तक कि फुल स्टॉप और कॉमा भी हूबहू कॉपी-पेस्ट थे। कोर्ट ने इसे अविश्वसनीय माना।

    2015 में इसी केस में बरी हुएम अब्दुल वाहिद शेख बताते हैं कि उन्होंने “हर दिन 20-25 आरटीआई एप्लीकेशन” दायर किए, जिनमें पुलिस स्टेशनों की लॉगबुक से लेकर अस्पताल के रिकॉर्ड और हर जरूरी जानकारी मांगी गई।

    19 सालों बाद सामने आया पीड़ितों का दर्द

    मोहम्मद साजिद अंसारी, जो इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि से थे, बताते हैं, “मेरा इलेक्ट्रॉनिक्स का बैकग्राउंड था, इसलिए इन लोगों के लिए आसान था कहना कि ये टाइमर बम बनाने के लायक है। इसी वजह से मुझे टारगेट किया गया, इन्होंने रिकवरी के तौर पर मेरे मोबाइल रिपेयरिंग इंस्टीट्यूट के जो सामान थे और जो रिपेयरिंग की इलेक्ट्रॉनिक्स की चीजें थी उसे रिकवरी में दिखाया गया। हालांकि एफएसएल रिपोर्ट के अंदर क्लियर हुआ कि कुछ भी एक्सप्लोसिव मेरे पास नहीं मिला।”

    187 लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है?

    19 सालों तक इन लोगों के परिवार के साथ पुलिस, समाज, मीडिया, सरकारें, अदालत नाइंसाफी करती रहीं।

    ऐसे में सवाल उठता है कि इन 12 लोगों और इनके परिवार के 19 साल के दर्द का जिम्मेदार कौन है? क्या उन लोगों को सजा मिलेगी जिन्होंने इन 12 लोगों को फंसाया था?

    एक सवाल और है, 2006 के ब्लास्ट में 187 लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है? उन परिवारों से क्या कहा जाएगा जिन्होंने अपनों को खोया था? वो लोग लौटकर नहीं आएंगे लेकिन उनके कातिल को हमारा प्रशासन आज तक नहीं ढूंढ पाया और ना ही कटघरे में खड़ा कर पाया, सजा तो दूर की बात हो गई। 19 years in jail using false witnesses, who implicated 12 Muslims in Mumbai local train blast?

  • बकरा ईद पर बकरे की कुर्बानी देने की प्रथा पर शक्ति प्रयोग क्यों?

    बकरा ईद पर बकरे की कुर्बानी देने की प्रथा पर शक्ति प्रयोग क्यों?

    • मंदिरों में बलि देने की परंपरा को बंद कर उदाहरण प्रस्तुत करे सरकार
    • सुप्रीम कोर्ट के आदेश स्वीकार कर मुसलमानों ने नजीर पेश की
    • भारतीय संविधान कानून और न्यायालय में विश्वास रखते हैं भारत के मुसलमान

    डिजिटल डेस्क
    हिंदू हिंदुत्व के ठेकेदार बनने वाले आरएसएस के उपांग बीजेपी, विश्वहिंदू परिषद, बजरंग दल जैसे संगठन भारत के मुसलमानों द्वारा बकरा ईद पर बकरे की कुर्बानी देने की प्रथा बंद करने के लिए शक्ति प्रयोग करने से भी पीछे नहीं हट रहे। उन्हें सबसे पहले हिंदुओं के जिन मंदिरों में जानवरों की बलि देकर उस मांस को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। उन मंदिरों में बलि देने की परंपरा को बंद कर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। पहले सत्तर प्रतिशत हिंदुओं के मांस खाने पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। फिर मुसलमानों के बकरा बलि को कानून बनाकर रोका जा सकता है। निश्चित ही भारत के मुसलमान इसे स्वीकार करेंगे क्योंकि देश में समानता का व्यवहार माना जाएगा। बाबरी राम जन्मभूमि मामले में सुप्रीमकोर्ट के आदेश को स्वीकार कर मुसलमानों ने नजीर पेश की थी।
    अर्थ है
    भारत के मुसलमान भारतीय संविधान कानून और न्यायालय में विश्वास रखते हैं। अगर संसद ऐसा कानून बनाती है जिसमें किसी भी पशु की बलि यानी हत्या अपराध होगा जिसपर कानूनी अपराध मानकर कोर्ट दंडित करेगी तो निश्चित ही भारत के मुसलमान इससे सहमत होंगे। जहां तक देशप्रेम और देशभक्ति का सवाल है। उसमें भी मुसलमानों ने एकता का प्रदर्शन, पाकिस्तान के विरोध में पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाकर पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए भारतीय सेना और सरकार के साथ खड़े रहे हैं। यहां तक कि मुस्लिम महिला द्वारा ही भारतीय सेना ने सिंदूर ऑपरेशन का नायक बनाया था। प्रेस कांफ्रेंस में भी मुस्लिम और दलित चेहरा सामने लाकर बता दिया था कि भारतीय सेना जाति मजहब को नहीं मानती।वह भारत की रक्षा के लिए अपनी शहादत देती है।
    सेना ने प्रतीकात्मक रूप से संदेश दिया था कि मुसलमानों और दलितों पर अन्याय अत्याचार बंद कर देना होगा। भारत के जिन ग्रुपों को पहलगाम और ऑपरेशन सिंदूर का सच बताने विदेश भेजा गया था उसमें मुस्लिम चेहरा इस्लामिक राष्ट्रों में जबरदस्त संदेश देकर बता दिया कि पाकिस्तान बार बार अपने आतंकी भेजकर भारत में निर्दोष लोगों की हत्या करवाता है। जिससे साफ है कि देश का मुसलमान देश की हिफाजत के लिए पाकिस्तान हो या कोई अन्य राष्ट्र भारत का मुसलमान बलिदान देने को तैयार है। एकजुटता दिखने में मुसलमान पीछे नहीं हटे।
    पहले हिंदूधर्म और अब सनातनधर्म के ठेकेदारों को मालूम होना चाहिए कि सनातन धर्म में किसी भी जीव की हत्या का निषेध करता है।सत्य, प्रेम न्याय और पुण्य को धर्म जानना मानना ही सनातन धर्मी का संकेत है।
    गौ को माता मानने वाले क्यों नहीं उन चार हिंदू जिनके भारत में बड़े बड़े कत्लखाने हैं। जहां लाखों गाएं रोज काटकर उनका मांस विदेश भेजने वाले देशों में दूसरे नंबर पर लाकर खड़ा कर दिया है। जिनसे हिंदुत्व और हिंदू की ठेकेदार बीजेपी सरकार चंदा लेने में संकोच नहीं करती, उन कारखानों को बंद कराने क्यों नहीं जाते? इसलिए कि मोदी सरकार उनके साथ खड़ी है।
    योगीजी क्यों नहीं उन कत्ल खानों में गौ का कटना बंद करा देते? हिम्मत नहीं पड़ती गौ भक्ति की आड में जो बजरंगदल खुद गौ काटकर पूजा स्थल में फेकने पर पकड़े जा चुके हैं। जो गौ मांस होने का शक केवल गरीब मुसलमानों पर कहर बनकर टूट पड़ते और उनकी हत्या का अपराध करने में नहीं झिझकते भला वे कैसे हिंदू और सनातनी होते हैं।
    सनातन धर्म तो समानता और न्याय का धर्म है फिर मॉब लांचिंग क्यों करते हैं? हत्या करना अपराध तो है ही पाप भी है। क्या उन्हें पाप करते शर्म आती है कभी? फिर किस मुंह से वे हिंदू और सनातनी कहते हैं। कभी खुद के हृदय में झांककर तो देखें। अगर उनकी आत्मा मरी नहीं होगी तो जवाब भीतर से ही मिल जायेगा।
    छत्रपति शिवाजी महाराज के सेनापति मुसलमान, नौ सेना प्रमुख मुसलमान थे।महाराणा प्रताप के सेनापति मुसलमान थे।उन्होंने अपनी जान पर खेलकर महाराणा प्रताप के प्राण बचाए थे, जबकि मुगल सम्राट अकबर के सेनापति जयपुर के राजा मानसिंह ने हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप की हत्या करने की कोशिश की थी। जयपुर के ही जयसिंह ने औरंगज़ेब की गुलामी की थी और उसका सेनापति बनकर शिवाजी के ऊपर हमला किया और उन्हें बंदी बनाकर उनसे तीस किले मुगलों को सौंपने का समझौता करने को बाध्य किया। आगरा दरबार में लेजाकर शिवाजी की बेइज्जती कराई। मानसिंह और जयसिंह जैसे हिंदू और हिंदुत्व के शत्रुओं के परिजनों को सम्मान देने वाले कैसे किसी को गद्दार होने का सार्टिफिकेट दे सकते हैं?
    क्या जिन नेताओं की बहन बेटियों को मुगलों से शादी कराई गई और बाद में नेताओं ने अपनी बेटियां भतीजियां मुसलमानों से ब्याह दी वे किस मुंह से हिन्दू और सनातन शब्द बोलते हैं? जो लोग हत्या को अपराध और पाप मानते हैं खुद महात्मा गांधी के हत्यारे नाथु राम गोडसे को पूजते हैं। भारत बंटवारे के झूठे आरोप में महात्मा गांधी की हत्या करने वाला क्यों नहीं मोहम्मद अली जिन्ना जिसने अंग्रेजों से मिलकर देश को बांटा उसकी हत्या करने की मर्दानगी दिखाई?
    सच तो यह है कि जर्मन तानाशाह हिटलर के नाज़ीवाद और इटली के तानाशाह मुसोलिनी के फासीवाद को अपना आदर्श मानने वालों से शांति की उम्मीद कैसे रखी जा सकती है। वे भला सनातनधर्म की सहिष्णुता का पालन कैसे कर सकते हैं? सनातनधर्म में नफरत के लिए कोई भी स्थान नहीं है फिर हिंदू मुस्लिम करके वोट की राजनीति करने वालों से प्रेम की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

    इसे भी पढ़े:- बकरी ईद के पहले बीजेपी नेता किरीट सोमैय्या का बड़ा बयान, बोले “नहीं कटने दूंगा बकरे”

  • दिल्ली के सभी प्राइवेट स्कूलों को अपने कब्जे में ले लें दिल्ली सरकार

    दिल्ली के सभी प्राइवेट स्कूलों को अपने कब्जे में ले लें दिल्ली सरकार

    • सरकार से डर नहीं लगता शिक्षा माफियाओं को..!
    • दिल्ली का DPS द्वारका स्कूल सुर्खियो में..
    • गेट पर बॉउंसर तैनात कर बढाई मनमानी फीस

    नई दिल्ली: जब सरकारें निशुल्क शिक्षा देने के अपने दायित्व से भागेगी और शिक्षा माफियाओं को आजाद कर देगी तो लूटने के लिए, तो क्या होगा? शिक्षा माफियाओं को न तो सरकार से डर लगता है और न ही शिक्षा विभाग से और न किसी कोर्ट से। बेलगाम घोड़े बन गए हैं। खासकर दिल्ली में सरकारी जमीन पर खुले हुए प्राइवेट स्कूल जो किसी की परवाह किए बिना ही हर वर्ष मनमाने तरीके से फीस बढ़ाते जा रहे हैं। यहां तक कि डायरेक्टरेट ऑफ एज्युकेशन से अनुमति लेने की भी जहमत नहीं उठाते। Delhi government should take over all the private schools in Delhi

    माता-पिता नौकरी करने पर मजबूर

    आज कल दिल्ली का D.P.S द्वारका स्कूल सुर्खियों में है जो गेट पर बाउंसर तैनात करके बढ़ाई गई मनमानी फीस जमा नहीं करने वाले अभिभावकों के बच्चों को गेट पर ही रोककर जबरन बस में उनके घर पहुंचा रहे हैं। चाहे घर में ताला ही क्यों न लगा हो। कारण माता पिता दोनों ही मंहगाई बढ़ाए जाने के कारण नौकरी करने के लिए मजबूर हैं। स्कूल गेट पर तैनात बाउंसर कितने बदतमीज और बेहूदे होंगे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे लड़कियों की बांह तक पकड़कर स्कूल के भीतर जाने से रोकते है। Delhi government should take over all the private schools in Delhi

    कब-कितना फीस बढ़ाया गया?

    D.P.S द्वारका स्कूल की मनमानी देखिए। पिछले पांच वर्षों में बच्चों की फीस को 139630 रुपए से बढ़ाकर 190000 रुपए कर दिया गया है। इसी कड़ी में हाईकोर्ट ने प्राइवेट स्कूलों को पैसे कमाने की मशीन और बच्चों के साथ बाउंसरों और स्कूल संचालकों द्वारा पर यातना तक बताया जा रहा है। D.P.S स्कूल द्वारका के द्वारा पिछले पांच वर्षों में फीस मनमाने तरीके से कैसे बढ़ाया गया? इसका नमूना वर्ष 2020/21 में फीस थी 139630 रुपए , 2021/22 में उतनी ही रही, लेकिन 2022/23 में 152510 रुपए कर दी गई। फिर वर्ष 2023/24 में 164844 रूपये, 2024/25 में 176340 रुपए और 2025/26 में पूरे 190000 रुपए कर दी गई है। इसमें विवरण देखा जाए तो ट्यूशन फीस 142800 रुपए, इन्यूअल चार्ज 32016 रुपए और डेवलपमेंट फीस 14280 रुपए जो पैरेंट टीचर मीटिंग की फीस केवल एक बार होने की है। Delhi government should take over all the private schools in Delhi

    क्यों नाम काटा गया?

    इतना ही नहीं, फीस बढ़ाने की सूचना नहीं देने के कारण फीस जमा नहीं कर पाने वाले 32 बच्चों के नाम काट दिए गए। नाम काट देना किस एज्युकेशन मैनुएल में लिखा है? नियमानुसार सरकारी जमीन पर बने स्कूल हॉस्पिटल में 15% लोगों को निःशुल्क सुविधा देनी चाहिए। विवाद डेवलपमेंट फीस को लेकर है। डायरेक्टरेट ऑफ एज्युकेशन के अनुसार दस प्रतिशत फीस बढ़ाई जा सकती है वह भी अनुमति लेकर, लेकिन शिक्षा माफिया कब मानते हैं? जिन बच्चों के नाम काटे गए, उनके मित्र फोन कर पूछते हैं, कि क्यों नाम काटा गया? बच्चों को अकेले घर जबरन छोड़ने के कारण बच्चों के मन में भय उत्पन्न होता है। मानसिक उत्पीड़न होती है और बच्चों को भारी सदमा पहुंचता हैं। इंफ्रियोरिटी कॉम्प्लेक्स पैदा होता है। मनोवैज्ञानिक दबाव से बच्चों के मानसिक संतुलन बिगड़ने का डर रहता है। लेकिन दौलत कमाने की हवस प्राइवेट स्कूल संचालकों में इस कदर हावी है कि उनके बच्चों पर पढ़ने वाले कॉम्प्लेक्स से कोई मतलब नहीं। Delhi government should take over all the private schools in Delhi

    जनता को ही दंडित किया जा रहा है।

    जब सैकड़ों अभिभावक कोर्ट गए तो स्कूल में छुट्टी घोषित कर संचालक फरार हो गए। अभिभावकों ने पुलिस बुलाई तो बिना नेम प्लेट वाली पुलिस पहुंची लेकिन वह खुद बच्चों और उनके अभिभावकों को टॉर्चर करने लगी। पुलिस और स्कूल संस्थापकों द्वारा लगाए गए गुंडों के द्वारा दुर्व्यवहार को अलग अलग नहीं किया जा सकता। दोनों ने ही अमानवीयता का परिचय दिया है। पुलिस जो जनता की रक्षा के लिए होती है उसे जनता के विरुद्ध कर दिया गया। सरकार की तरह उसका प्रशासन भी जनता को ही दंडित करने में लगा है। Delhi government should take over all the private schools in Delhi

    आम आदमी पार्टी की सरकार

    आम आदमी पार्टी का शासन था तब, केंद्र सरकार ने सुप्रीमकोर्ट के फैसले के खिलाफ दिल्ली आप सरकार से संसद में कानून बनाकर सारे प्रशासनिक अधिकार छीन लिए और मुख्यमंत्री, शिक्षा, स्वास्थ्य मंत्री सहित झूठे शराब मामले में ई डी द्वारा जेल भेजवाया गया था। इसलिए मनमानी फीस बढ़ाने के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का दोष नहीं दिया जा सकता। सारा प्रशासन एल जी के हाथ में दे दिया गया। इसलिए एल जी को संज्ञान लेना चाहिए था, लेकिन नहीं लिया। दुनिया ने देखा किस प्रकार आम आदमी सरकार को बदनाम करने के लिए यमुना नदी की सफाई के लिए एल जी ने कुछ भी नहीं किया और सारा दोष अरविंद केजरीवाल पर मढ़ते रहे। Delhi government should take over all the private schools in Delhi

    सरकार का दायित्व

    जब दिल्ली में बीजेपी सरकार बनी तब कितनी जल्दी मशीनें लगाकर यमुना को साफ करने का ढिंढोरा पीटा गया, जबकि आज भी दिल्ली के गंदे नाले लगातार कई घाटों के पास नाले का गंदा पानी यमुना में छोड़ रहे हैं।
    शुक्र है बीजेपी की दिल्ली सरकार कम से कम प्राइवेट स्कूलों की ऑडिट करने लगी है। लेकिन यह भी अपर्याप्त है। शिक्षा, रोजगार और चिकित्सा निःशुल्क देना सरकार का दायित्व है। Delhi government should take over all the private schools in Delhi

    स्कूल कॉलेज बने लूट के धंधे

    लेकिन केंद्र सरकार ने अपने दायित्व निभाने के स्थान पर शिक्षा को प्राइवेट हाथों में सौप कर लूटने के लिए खुला छोड़ दिया। जिसके कारण समूचे देश में शिक्षा माफिया स्कूल कॉलेज को लूट का धंधा बना लिए हैं। इन माफियाओं पर लगाम लगाने का दायित्व सरकार का है। दिल्ली के मुख्यमंत्री ही नहीं समूचे देश के मुख्यमंत्रियों का दायित्व बनता है कि वह समान शिक्षा नीति अपनाए और सभी प्राइवेट स्कूलों को अधिग्रहीत कर लें ताकि जनता का शोषण नहीं हो। Delhi government should take over all the private schools in Delhi

  • ‘इस्लाम तो इस्लाम ही रहेगा, चाहे कोई…’- सुप्रीम कोर्ट

    ‘इस्लाम तो इस्लाम ही रहेगा, चाहे कोई…’- सुप्रीम कोर्ट

    सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि जेपीसी ने बताया कि ट्राइबल एरिया में रहने वाले मुस्लिम बाकी हिस्सों में रहने वाले मुसलमानों की तरह इस्लाम का पालन नहीं करते। ‘Islam will remain Islam, no matter who…’ – Supreme Court

    डिजिटल डेस्क
    नई दिल्ली:
    वक्फ संशोधन कानून, 2025 के विरोध में दाखिल याचिकाओं पर गुरुवार (22 मई, 2025) को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह ने बेहद अहम टिप्पणी की है। जस्टिस मसीह ने कहा कि कोई कहीं भी रहे इस्लाम तो इस्लाम ही रहेगा। जज ने केंद्र की उस दलील पर यह बात कही, जिसमें कहा गया कि ट्राइबल एरिया में रहने वाला अनुसूचित जनजाति का मुस्लिम समुदाय इस्लाम का उस तरह पालन नहीं करता है, जैसे देश के बाकी हिस्सों में पालन किया जाता है। ‘Islam will remain Islam, no matter who…’ – Supreme Court

    लगातार हो रही है सुनवाई

    बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार मुख्य न्यायाधीश भूषण रामाकृष्ण गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच लगातार तीन दिन से वक्फ कानून मामले की सुनवाई कर रही है। तीसरे दिन की सुनवाई में केंद्र की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि नए कानून के तहत अनुसूचित जनजाति वर्ग के मुस्लिम समुदाय के लोगों की जमीनों को संरक्षण देना सही है। उन्होंने कहा कि ट्राइबल एरिया में रहने वाले अनुसूचित वर्ग के लोगों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है, जो वैध कारणों से उन्हें मिला है। ‘Islam will remain Islam, no matter who…’ – Supreme Court

    ST मुसलमानों को लेकर केंद्र की दलील

    एसजी तुषार मेहता ने कहा, “वक्फ का मतलब होता है खुदा के लिए स्थाई समर्पण। मान लीजिए मैंने अपनी जमीन बेची और पाया गया कि अनुसूचित जनजाति (ST) के शख्स के साथ धोखा हुआ है तो इस मामले में जमीन वापस की जा सकती है, लेकिन वक्फ अपरिवर्तनीय है।” उन्होंने बताया कि “जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी (JPC) का कहना है कि इन ट्राइबल एरिया में रहने वाले मुस्लिम, देश के बाकी हिस्सों में रह रहे मुसलमानों की तरह इस्लाम का पालन नहीं करते हैं, उनकी अपनी सांस्कृतिक पहचान है।” ‘Islam will remain Islam, no matter who…’ – Supreme Court

    इस्लाम पर अहम टिप्पणी

    एसजी तुषार मेहता की इस दलील पर जस्टिस एजी मसीह ने कहा, “इस्लाम तो इस्लाम ही रहेगा। कोई कहीं भी रहे धर्म एक ही है। अलग-अलग हिस्सों में रहने वालों की सांस्कृतिक प्रथाओं में अंतर हो सकता है।” इस पर एसजी मेहता ने कहा, “मैं बस पूछ रहा हूं कि क्या कानून पर रोक लगाने का यह कोई आधार हो सकता है?” ‘Islam will remain Islam, no matter who…’ – Supreme Court

    वक्फ के नाम पर हड़पी जा रही जमीनें- तुषार मेहता

    सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को बताया कि ट्राइबल संगठनों ने दलील दी है कि उनको प्रताड़ित किया जा रहा है और उनकी जमीन वक्फ के नाम पर हड़पी जा रही हैं। तुषार मेहता ने कोर्ट से सवाल करते हुए कहा, कि “क्या यह पूरी तरह से असंवैधानिक नहीं है?” ‘Islam will remain Islam, no matter who…’ – Supreme Court

    मंगलवार से नए सीजेआई बी आर गवई की बेंच ने वक्फ संशोधन कानून को चुनौती देने के लिए दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की है। इससे पहले पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना इस मामले को देख रहे थे, लेकिन रिटायरमेंट से पहले उन्होंने मामला जस्टिस बी आर गवई की बेंच को ट्रांसफर कर दिया। ‘Islam will remain Islam, no matter who…’ – Supreme Court

  • मुंबई में गुरुद्वारा विध्वंस पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया संज्ञान मनपा अधिकारियों को नोटिस जारी

    मुंबई में गुरुद्वारा विध्वंस पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया संज्ञान मनपा अधिकारियों को नोटिस जारी

    मुंबई के गुरूद्वारा विध्वंस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बृहन्मुंबई महानगर पालिका के अधिकारियों के खिलाफ नोटिस जारी किया। बताया कोर्ट के आदेशों का हुआ है उलंघन.. (Supreme Court takes cognizance of demolition of Gurudwara in Mumbai, notice issued to Municipal Corporation officials)

    विशेष संवाददाता
    मुंबई
    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक गुरुद्वारे के गिराए जाने के मामले में बृहन्मुंबई महानगर पालिका के अधिकारियों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही की याचिका पर नोटिस जारी किया है। न्यायमूर्ति बीआर गवई और केवी विश्वनाथन की पीठ ने मामले की अगली सुनवाई तक यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया और संबंधित प्रतिवादियों को नोटिस भेजा। याचिकाकर्ता प्रवीण जीवन वालोदरा का प्रतिनिधित्व एड्वोकेट सौम्या प्रियदर्शिनी ने कर रहे हैं, जिन्होंने आरोप लगाया कि बीएमसी के अधिकारियों ने संपत्तियों को गिराने पर रोक लगाने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन किया है। (Supreme Court takes cognizance of demolition of Gurudwara in Mumbai, notice issued to Municipal Corporation officials)

    कोर्ट के अंतरिम आदेशों का पूर्ण उल्लंघन

    याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है, कि बीएमसी के अधिकारियों ने उनके आश्रय के अधिकार का उल्लंघन किया है, जो भारत के संविधान द्वारा सुरक्षित है। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह तोड़क कार्यवाही 15 अक्टूबर 2024 को हुआ, जो 17 सितंबर 2024 और 1 अक्टूबर 2024 के अंतरिम आदेशों का उल्लंघन है, जिसमें शीर्ष न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा था कि बिना अनुमति के किसी भी स्थान पर स्ट्रक्चर पर तोड़क कार्यवाही को नहीं किया जा सकता। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि अवमाननाकर्ताओं ने न्यायालय की अनुमति के बिना संरचना को ध्वस्त कर दिया, और यह दावा किया गया है कि यह संरचना सार्वजनिक सड़क पर स्थित थी। जबकि बृहन्मुंबई महानगर पालिका द्वारा याचिकाकर्ता को प्रदान किए गए किसी भी आंतरिक पत्राचार या याचिकाकर्ता के पास उपलब्ध अभिलेखों में ऐसा कुछ भी दर्ज नहीं किया गया है। (Supreme Court takes cognizance of demolition of Gurudwara in Mumbai, notice issued to Municipal Corporation officials)

    याचिका में खास क्या रहा ?

    याचिकाकर्ता ने बताया कि वे गुरुद्वारे का संचालन कर रहे थे और अपने परिवार के साथ वर्षों से उस संरचना के कमरे में शांति से निवास कर रहे थे, जैसा कि उनके पूर्वजों ने 1955 के आस-पास किया था, जो दस्तावेजों से स्पष्ट है। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि उन्होंने और उनके पूर्वजों ने उस भूमि और संरचना से संबंधित संपत्ति कर का भुगतान किया है। (Supreme Court takes cognizance of demolition of Gurudwara in Mumbai, notice issued to Municipal Corporation officials)