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  • 93% मुआवजा फिर भी सत्याग्रह क्यों? केन-बेतवा पर आदिवासियों की लड़ाई में राहुल गांधी की एंट्री, 14 गांवों में फिर होगा सर्वे

    93% मुआवजा फिर भी सत्याग्रह क्यों? केन-बेतवा पर आदिवासियों की लड़ाई में राहुल गांधी की एंट्री, 14 गांवों में फिर होगा सर्वे

    केन-बेतवा परियोजना पर आदिवासी सत्याग्रह के बीच राहुल गांधी का समर्थन, 93% मुआवजे के सरकारी दावे और 14 गांवों के नए सर्वे से जुड़े सवाल जानिए।

    भोपाल/छतरपुर: केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर बुंदेलखंड में आदिवासी परिवारों का संघर्ष एक बार फिर तेज हो गया है। 19 अगस्त 2026 को राहुल गांधी ने आंदोलन कर रहे आदिवासी भाई-बहनों से मुलाकात कर उनकी समस्याएं, मांगें और आपबीती सुनी और इस लड़ाई में उनके साथ खड़े रहने का भरोसा दिया।

    राहुल गांधी ने कहा कि सालों से अपने अधिकारों के लिए अन्याय और अत्याचार सह रहे बुंदेलखंड के निवासी सम्मान और समर्थन के हकदार हैं। उन्होंने साफ कहा कि आदिवासी भाई-बहनों की इस लड़ाई में वह और कांग्रेस उनके साथ हैं।

    लेकिन इस पूरी खबर में सबसे बड़ा सवाल राहुल गांधी का समर्थन नहीं, बल्कि यह है—

    जब सरकार खुद दावा कर रही है कि प्रभावित परिवारों को 93.78% rehabilitation compensation दिया जा चुका है, तो फिर आदिवासी परिवार अभी भी सत्याग्रह क्यों कर रहे हैं?

    यही सवाल अब केन-बेतवा परियोजना के पूरे विवाद के केंद्र में आ गया है।

    केन-बेतवा परियोजना आखिर क्यों इतनी बड़ी है?

    केन-बेतवा लिंक परियोजना का मकसद केन नदी के पानी को बेतवा नदी बेसिन तक पहुंचाना है। इसमें दाउधन बांध और करीब 221 किलोमीटर की link canal सहित कई बड़े infrastructure works शामिल हैं।

    सरकार का कहना है कि यह project बुंदेलखंड के लंबे समय से चले आ रहे water crisis को कम करने में मदद करेगा। सिंचाई का विस्तार होगा, किसानों को पानी मिलेगा और मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में drinking water supply बेहतर होगी।

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    सरकारी project details के मुताबिक लाखों हेक्टेयर जमीन को irrigation coverage देने और लाखों लोगों तक drinking water पहुंचाने का target है।

    यानी एक तरफ सरकार इसे बुंदेलखंड के लिए पानी और विकास की बड़ी योजना बता रही है, वहीं दूसरी तरफ project area में रहने वाले परिवारों का सवाल है—

    “विकास होगा, लेकिन हमारी जमीन और हमारी जिंदगी का क्या होगा?”

    आदिवासी परिवारों का विरोध आखिर किस बात पर है?

    प्रदर्शन कर रहे परिवारों की शिकायत सिर्फ इतनी नहीं है कि उन्हें compensation नहीं चाहिए।

    उनकी मांग है कि अगर project की वजह से उन्हें अपनी जमीन, घर और livelihood छोड़ना पड़ रहा है, तो rehabilitation ऐसा होना चाहिए जिससे विस्थापन के बाद उनकी जिंदगी दोबारा खड़ी हो सके।

    आंदोलन में मुख्य तौर पर इन सवालों को उठाया गया है—

    • कौन-कौन से परिवार वास्तव में project से प्रभावित हैं?
    • क्या सभी eligible परिवारों के नाम rehabilitation list में हैं?
    • जमीन और मकान का assessment सही हुआ है या नहीं?
    • compensation कितना और किस आधार पर मिल रहा है?
    • rehabilitation के बाद खेती और रोजगार का क्या होगा?
    • जंगल और natural resources पर निर्भर परिवारों का क्या होगा?
    • नए स्थान पर घर, पानी, स्कूल और healthcare की व्यवस्था कैसी होगी?

    यानी मामला सिर्फ “पैसा कितना मिला” का नहीं है।

    मामला यह भी है कि “पैसा मिलने के बाद जिंदगी कैसे चलेगी?”

    सरकार का बड़ा दावा: 93.78% compensation paid

    इसी बीच केंद्र सरकार ने 19 अगस्त को केन-बेतवा परियोजना से जुड़े compensation और rehabilitation के आंकड़े सामने रखे हैं।

    सरकार के मुताबिक 5,039 project-affected families को rehabilitation के लिए चिन्हित किया गया है। इनके लिए ₹629.87 करोड़ के awards बनाए गए थे, जिसमें से ₹590.74 करोड़ यानी 93.78% भुगतान किया जा चुका है।

    कृषि भूमि से जुड़े 10,913 प्रभावित व्यक्तियों के लिए ₹360.66 करोड़ के awards बताए गए हैं। इनमें ₹320.45 करोड़ यानी 88.85% रकम का भुगतान होने की जानकारी दी गई है।

    आवासीय संपत्तियों के compensation में भी करीब 94% payment का सरकारी दावा है।

    सरकार का कहना है कि जिन मामलों में payment बाकी है, वहां जरूरी legal और administrative formalities पूरी होने के बाद भुगतान किया जाएगा और land records की verification भी जारी है।

    लेकिन फिर वही सवाल—

    अगर इतना बड़ा हिस्सा भुगतान हो चुका है, तो आंदोलन खत्म क्यों नहीं हुआ?

    असल पेंच: कौन प्रभावित है और किसे कितना मिलेगा?

    यहीं से पूरा विवाद और complicated हो रहा है।

    किसी परिवार का नाम compensation list में होना और हर प्रभावित व्यक्ति की वास्तविक जरूरत पूरी होना एक ही बात नहीं है।

    आंदोलन से जुड़े लोगों ने eligibility, beneficiary criteria, compensation calculation और rehabilitation package को लेकर सवाल उठाए हैं।

    कुछ प्रदर्शनकारियों की मांग है कि rehabilitation benefits तय करते समय परिवार में मौजूद eligible adult members और उनकी वास्तविक livelihood जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाए।

    यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि “एक परिवार को कितना मिला?”

    सवाल यह भी है—

    “उस परिवार में कितने लोग अपनी आजीविका के लिए उसी जमीन पर depend थे?”

    14 गांवों में फिर से survey क्यों कराया जा रहा है?

    इस विवाद के बीच एक बड़ा administrative development सामने आया है।

    छतरपुर प्रशासन ने 14 प्रभावित गांवों में fresh survey का आदेश दिया है।

    इन गांवों में Sukwaha, Bhaurkhuwa, Ghughri, Naiguwan, Kakra, Kadwara, Palkoha, Kharyani, Dhodhan, Mainari, Kupi, Shahpura, Basudha और Dugaria शामिल हैं।

    Fresh verification में जमीन, मकान, पेड़, दूसरी assets और प्रभावित परिवारों की जानकारी दोबारा देखी जा रही है।

    इसका मकसद यह पता लगाना है कि कोई eligible परिवार या asset compensation और rehabilitation process से बाहर तो नहीं रह गया।

    यही fresh survey अब आंदोलनकारियों की मांग और सरकार के आंकड़ों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है।

    अप्रैल से अगस्त तक कैसे बढ़ा आंदोलन?

    यह विरोध आज से शुरू नहीं हुआ।

    प्रभावित परिवारों ने पिछले कई महीनों में अलग-अलग तरीकों से अपनी बात सरकार तक पहुंचाई।

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    जल सत्याग्रह

    प्रदर्शनकारियों ने पानी में खड़े होकर अपना विरोध जताया।

    चिता आंदोलन

    आदिवासी महिलाओं ने symbolic चिताओं पर लेटकर protest किया। इसका संदेश था कि जमीन और livelihood छिनने के बाद उनके सामने जिंदगी और मौत जैसा सवाल खड़ा हो गया है।

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    Hunger Strike

    इसके बाद भूख हड़ताल शुरू हुई, जो कई दिनों तक चली।

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    Chulha Bandh

    जुलाई में protest का एक और symbolic तरीका सामने आया—Chulha Bandh। यानी खाना बनाना तक बंद कर विरोध जताया गया।

    Protest-against-Ken-Betwa-Project-MP-Chhatarpur

    आंदोलन में महिलाओं की बड़ी भागीदारी ने इसे और गंभीर बना दिया।

    19 जुलाई को police action के बाद विवाद और बढ़ा

    जुलाई में आंदोलन उस समय और बड़ा मुद्दा बन गया जब प्रशासन और पुलिस ने protest site खाली कराया।

    19 जुलाई को प्रदर्शनकारियों को आंदोलन स्थल से हटाया गया। इसके बाद protesters की तरफ से police action पर सवाल उठाए गए।

    राहुल गांधी ने भी इस कार्रवाई की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण protest को दबाया गया।

    हालांकि police और administration का पक्ष अलग है, इसलिए इस मामले में दोनों पक्षों के दावों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

    राहुल गांधी पहले भी उठा चुके हैं मुद्दा

    राहुल गांधी का यह इस मुद्दे पर पहला intervention नहीं है।

    7 अगस्त को Lok Sabha में भी Ken-Betwa project से जुड़े tribal displacement और rehabilitation का मुद्दा उठाया गया था।

    केंद्र के Tribal Affairs Ministry ने बताया कि इस विषय से जुड़ी complaints और representations मिली हैं और उन्हें मध्य प्रदेश सरकार को action और response के लिए भेजा गया है।

    इसके बाद 13 अगस्त को राहुल गांधी ने प्रभावित परिवारों के delegation से मुलाकात की।

    और अब 19 अगस्त को एक बार फिर उन्होंने सार्वजनिक तौर पर इस संघर्ष को समर्थन दिया है।

    इससे साफ है कि Ken-Betwa का tribal displacement issue अब local protest से निकलकर national political debate का हिस्सा बन चुका है।

    सिर्फ जमीन नहीं, जंगल और पर्यावरण का भी सवाल

    केन-बेतवा project का दूसरा बड़ा विवाद environmental impact को लेकर है।

    Project के लिए forest land diversion और Panna Tiger Reserve के आसपास के ecological impact को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।

    पर्यावरण को लेकर concerns में forest habitat, wildlife movement और river ecosystem शामिल हैं।

    दूसरी तरफ project को जरूरी environmental और forest clearances मिल चुकी हैं और सरकार mitigation measures तथा project benefits पर जोर देती रही है।

    इसलिए सवाल यह नहीं है कि सिर्फ “project सही है या गलत?”

    सवाल यह है—

    “बुंदेलखंड को पानी देने वाली इस project के साथ जंगल और wildlife पर पड़ने वाले असर को कितना कम किया जा सकता है?”

    बुंदेलखंड को project से क्या फायदा मिलेगा?

    सरकार का तर्क है कि बुंदेलखंड लंबे समय से पानी की कमी से जूझता रहा है।

    Ken-Betwa project से:

    • irrigation coverage बढ़ेगा
    • किसानों को पानी मिलेगा
    • drinking water supply बेहतर होगी
    • water-stressed गांवों को फायदा मिलेगा
    • hydropower और दूसरे energy benefits मिलेंगे

    सरकार इसे बुंदेलखंड की water security से जोड़कर देख रही है।

    लेकिन प्रभावित परिवारों के लिए सवाल है—

    “अगर बुंदेलखंड को पानी मिलेगा, तो जिस जमीन पर हम रहते हैं, वहां रहने वाले लोगों का भविष्य भी सुरक्षित होगा या नहीं?”

    मुआवजा मिलना और जिंदगी दोबारा बसना एक बात नहीं

    यही इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी मानवीय तस्वीर है।

    एक किसान के लिए जमीन सिर्फ जमीन नहीं होती।

    उसी जमीन से:

    खेती → income → पशुपालन → घर → परिवार का future

    जुड़ा होता है।

    आदिवासी परिवारों के लिए जंगल और आसपास के natural resources भी रोजमर्रा की livelihood का हिस्सा हो सकते हैं।

    ऐसे में compensation मिलने के बाद भी असली सवाल रहता है—

    नया घर कहां होगा? खेती कैसे होगी? रोजगार कहां मिलेगा? बच्चों की पढ़ाई कैसे चलेगी? पानी और healthcare की सुविधा कैसी होगी?

    यही वजह है कि rehabilitation को सिर्फ bank account में पहुंची रकम से नहीं, बल्कि विस्थापित परिवार की नई जिंदगी कितनी स्थिर हुई, इससे भी देखा जाता है।

    देश में अकेला नहीं है Ken-Betwa विवाद

    भारत के अलग-अलग हिस्सों में बड़े dams, mining और infrastructure projects को लेकर tribal displacement और rehabilitation के सवाल उठते रहे हैं।

    राजस्थान के Mahi Bajaj Sagar से जुड़े मामलों में भी displaced families के rehabilitation और दोबारा विस्थापन की चिंता सामने आई है।

    छत्तीसगढ़ के Hasdeo क्षेत्र में mining, forest rights और tribal communities के अधिकारों को लेकर विरोध जारी रहा है।

    इन सभी मामलों में एक common सवाल सामने आता है—

    क्या development project की planning जितनी मजबूत होती है, उतनी ही मजबूत प्रभावित लोगों को बसाने की planning भी होती है?

    अब आगे क्या होगा?

    अब केन-बेतवा विवाद में सबसे ज्यादा नजर 14 गांवों के fresh survey पर रहेगी।

    देखना होगा कि दोबारा verification में कितने नए eligible families या assets सामने आते हैं और compensation तथा rehabilitation से जुड़े pending मामलों का क्या होता है।

    दूसरी तरफ आदिवासी संगठनों की मांगें और तेज होती हैं या सरकार के साथ बातचीत का रास्ता निकलता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।

    राहुल गांधी के समर्थन से इस आंदोलन को political momentum मिला है, जबकि केंद्र ने अपने ताजा आंकड़ों के जरिए compensation process पर अपना पक्ष सामने रखा है।

    लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल अभी भी वही है—

    “93% से ज्यादा मुआवजा दिया जा चुका है, फिर भी आदिवासी सड़क पर क्यों हैं?”

    इस सवाल का जवाब सिर्फ compensation के आंकड़े में नहीं, बल्कि जमीन, rehabilitation, livelihood, जंगल और प्रभावित परिवारों की वास्तविक जिंदगी में छिपा है।

  • बकरी ईद के पहले बीजेपी नेता किरीट सोमैय्या का बड़ा बयान, बोले “नहीं कटने दूंगा बकरे”

    बकरी ईद के पहले बीजेपी नेता किरीट सोमैय्या का बड़ा बयान, बोले “नहीं कटने दूंगा बकरे”

    Mumbai News: बीजेपी नेता किरीट सोमैय्या ने आरोप लगाते हुए कहा कि एनसीपी शरद पवार, कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की वोट जिहाद की सेना ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करती है। इस बार मैं खुद ग्राउंड पर हूँ। नहीं काटने दूंगा बकरा ..

    मुंबई: बकरी ईद के मद्देनजर बीजेपी नेता और पूर्व सांसद किरीट सोमैय्या रहिवासी चालों और इमारतों का दौरा कर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेता रविवार 25 मई को घाटकोपर स्थित मैत्री को-ऑपरेटिव सोसायटी और दामोदर पार्क का दौरा किया। इसी परिसर में बकरा ईद को लेकर पहले भी दो गुटों के बीच विवाद देखने को मिला था। अब एक बार फिर कुछ रहिवासियों का विरोध देखने को मिल रहा है। BJP leader Kirit Somaiya made a big statement before Bakri Eid, said “I will not let goats be slaughtered”

    बकरा नहीं काटने दूंगा ..

    बीजेपी नेता किरीट सोमैय्या ने आरोप लगाते हुए कहा, कि “एनसीपी शरद पवार, कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की वोट जिहाद की सेना ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करती है। यह सब वोट जिहाद के लिए हो रहा है। अगली बार अगर कोई दहशत फैलाने के लिए ऐसा कोई काम करेगा, यानी बकरा काटेगा तो हम ऐसा नहीं होने देंगे।

    हम रैली में ब्यस्त हैं और चीन कर रहा है तैयारी 

    किरीट सोमैया हुए हमलावर

    उन्होंने आगे कहा, कि “पिछली बार महानगरपालिका अधिकारियों और माफिया ने पुलिस को धमकी देकर घाटकोपर में बकरा काटा था। इस बार मैं खुद ग्राउंड पर हूं। एनसीपी शरद पवार, उद्धव की सेना या राहुल गांधी की कांग्रेस का यहां पर टारगेट ही है वोट जिहाद करने का।” उन्होंने कहा, “पहलगाम हमले के बाद हमने जो जवाब दिया, वैसा ही अमेरिका में भी वोट जिहाद किया गया। भगवान उन्हें सद्‌बुद्धि दे।

    हिजरी कैलेंडर का आखिरी महीना

    ईद उल-अजहा मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए अहम हिस्सा है। इस पर आम बोलचाल की भाषा में बकरा ईद भी कहा जाता है। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक बकरी ईद का त्योहार जुल हिज्जा (Dhul Hijjah) महीने की दसवीं तारीख को मनाया जाता है, जोकि हिजरी कैलेंडर का 12वां या आखिरी महीना होता है। BJP leader Kirit Somaiya made a big statement before Bakri Eid, said “I will not let goats be slaughtered”

    कब है बकरी ईद ?

    इस साल बकरी ईद का त्योहार 6 या 7 जून को मनाने की संभावना है। इस त्योहार को लेकर तारीख की आधिकारिक घोषणा चांद नजर आने के बाद ही की जाएगी। बकरी ईद का अर्थ सिर्फ जानवरों की कुर्बानी मात्र से नहीं है, बल्कि इसका धार्मिक अर्थ बहुत ही गहरा है। यह पर्व अल्लाह के प्रति समर्पण, त्याग और दान से जुड़ा हुआ है। इसकी मान्यता है कि बकरा ईद पर कुर्बानी के हिस्से को तीन भागों में तकसिम किया जाया है। पहला गरीब और जरूरतमंदों को, दूसरा हिस्सा मित्रों और रिश्तेदारों के लिए और तीसरी हिस्सा अपने घर-परिवार के लिए रखा जाता है। साथ ही ईद की नमाज़ से पहले जकत, फितरे का पैसा निकाला जाता है। जो ज़रूरतमंदों को देकर उनकी मदद की जाती है। BJP leader Kirit Somaiya made a big statement before Bakri Eid, said “I will not let goats be slaughtered”

  • भारत का GDP ग्रोथ रेट घटने के कारण क्या है?

    भारत का GDP ग्रोथ रेट घटने के कारण क्या है?

    भारत की GDP ग्रोथ रेट दो साल में सबसे नीचे 5.4% पर आ गई है। यह पिछले अनुमानों क्रमशः 6.9 फीसदी और 5 फीसदी से कम है। राहुल गांधी ने इसके लिए सरकारी नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। कहा, कि स्थिति में सुधार के लिए बिना समय गंवाए एक नई सोच और बिज़नेसेस के लिए एक नई डील की भारत को ज़रूरत है। (What is the reason for the decline in India’s GDP growth rate?)

    उन्होंने कहा, बात साफ है, कि भारतीय अर्थव्यवस्था तब तक तरक्की नहीं कर सकती, जब तक इसका फ़ायदा सिर्फ़ गिने-चुने अरबपतियों को मिल रहा हो और किसान, मज़दूर, मध्यमवर्ग और ग़रीब तरह-तरह की आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे हों। (What is the reason for the decline in India’s GDP growth rate?)

    इन तथ्यों पर एक नज़र डालिए, देखिए स्थिति कितनी चिंताजनक है:

    • खुदरा महंगाई दर बढ़कर 14 महीने के उच्चतम स्तर 6.21% पर पहुंच गई है। पिछले साल अक्टूबर की तुलना में इस वर्ष आलू और प्याज़ की क़ीमत लगभग 50% बढ़ गई है।
    • रुपया 84.50 के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है।
    • बेरोज़गारी पहले ही 45 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ चुकी है।
    • पिछले 5 सालों में मज़दूरों, कर्मचारियों और छोटे व्यापारियों की आमदनी या तो ठहर गई है या काफी कम हो गई है।
    • आमदनी कम होने से मांग में भी कमी आई है। 10 लाख से कम क़ीमत वाले कारों की बिक्री में हिस्सेदारी घटकर 50% से कम हो गई है, जो 2018-19 में 80% थी।
    • सस्ते घरों की कुल बिक्री में हिस्सेदारी घटकर क़रीब 22% रह गई है, जो पिछले साल 38% थी। FMCG प्रोडक्ट्स की मांग पहले से ही कम होती जा रही है।
    • कॉरपोरेट टैक्स का हिस्सा पिछले 10 सालों में 7% कम हुआ है, जबकि इनकम टैक्स 11% बढ़ा है।
    • नोटबंदी और GST की मार से अर्थव्यवस्था में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा घटकर 50 वर्षों में सबसे कम सिर्फ़ 13% रह गया है। ऐसे में नई नौकरियों के अवसर कैसे बनेंगे?

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    राहुल गांधी ने भारत सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा, कि भारत की अर्थव्यवस्था के सुधार के लिए एक नई सोच चाहिए और बिज़नेसेस के लिए एक नई डील उसका अहम भाग है। सबको समान रूप से आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा, तभी हमारी अर्थव्यवस्था का पहिया आगे बढ़ेगा।

    अर्थव्यवस्था का बुरा हाल, जनता का हाल बेहाल – इस स्थिति में सुधार के लिए बिना समय गंवाए एक नई सोच और बिज़नेसेस के लिए एक नई डील की ज़रूरत है।

    S&P ने चालू वित्त वर्ष 2024-25 में जीडीपी ग्रोथ रेट 6.8 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है। रेटिंग एजेंसी को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2027-28 में जीडीपी ग्रोथ रेट 5 फीसदी रहेगी। (What is the reason for the decline in India’s GDP growth rate?)