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  • SIR Verification: कभी वोट नहीं दिया तो क्या आपका नाम जुड़ पाएगा? पूरी प्रक्रिया समझिए

    SIR Verification: कभी वोट नहीं दिया तो क्या आपका नाम जुड़ पाएगा? पूरी प्रक्रिया समझिए

    SIR Verification के दौरान अगर आपने कभी वोट नहीं दिया और नाम वोटर लिस्ट में नहीं है, तो क्या होगा? जानिए Form 6, दस्तावेज और पूरी प्रक्रिया।

    मुंबई: महाराष्ट्र और मुंबई में चल रहे Special Intensive Revision (SIR) Verification अभियान के बीच हजारों लोगों के मन में एक ही सवाल है—अगर किसी व्यक्ति ने आज तक कभी वोट नहीं दिया, वोटर आईडी नहीं बनवाई और उसका नाम कभी मतदाता सूची में शामिल नहीं हुआ, तो क्या अब उसका नाम वोटर लिस्ट में जुड़ पाएगा?

    सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप ग्रुप और स्थानीय स्तर पर चल रही चर्चाओं के कारण कई लोगों में भ्रम और चिंता की स्थिति बनी हुई है। कुछ लोगों को लग रहा है कि SIR प्रक्रिया केवल पुराने मतदाताओं के लिए है, जबकि कुछ लोग यह समझ रहे हैं कि बिना पुराने रिकॉर्ड के अब नाम जोड़ना मुश्किल हो जाएगा।

    हालांकि चुनाव आयोग के मौजूदा नियमों के अनुसार ऐसी स्थिति में घबराने की जरूरत नहीं है। यदि कोई पात्र भारतीय नागरिक आज तक मतदाता सूची में शामिल नहीं हुआ है, तो उसके लिए नए मतदाता के रूप में आवेदन करने की व्यवस्था मौजूद है।

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    SIR Verification आखिर है क्या?

    Special Intensive Revision (SIR) चुनाव आयोग द्वारा चलाया जाने वाला विशेष अभियान है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट और सत्यापित करना है।

    इस अभियान के दौरान—

    • घर-घर जाकर सत्यापन किया जाता है।
    • मतदाताओं की जानकारी अपडेट की जाती है।
    • मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के रिकॉर्ड की जांच होती है।
    • डुप्लीकेट प्रविष्टियों की पहचान की जाती है।
    • नए पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करने की प्रक्रिया भी जारी रहती है।

    मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र में BLO (Booth Level Officer) इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

    अगर कभी वोट नहीं दिया तो क्या आपका नाम जुड़ सकता है?

    हाँ, बिल्कुल जुड़ सकता है।

    यदि—

    • आपकी उम्र 18 वर्ष या उससे अधिक है,
    • आप भारतीय नागरिक हैं,
    • आपका नाम आज तक किसी भी मतदाता सूची में नहीं रहा,
    • आपने कभी वोट नहीं दिया,

    तो आप पहली बार मतदाता बनने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

    कई लोगों को लगता है कि 25, 30 या 40 साल की उम्र होने के बाद नया नाम नहीं जुड़ सकता, जबकि ऐसा नहीं है। चुनाव आयोग की व्यवस्था पात्र नागरिकों को किसी भी उम्र में पहली बार मतदाता बनने की अनुमति देती है, बशर्ते वे पहले से पंजीकृत न हों।

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    SIR Form और Form 6 को लेकर सबसे बड़ा भ्रम

    SIR अभियान के दौरान सबसे ज्यादा भ्रम Enumeration Form और Form 6 को लेकर है।

    Enumeration Form क्या है?

    यह SIR Verification के दौरान उपयोग किया जाने वाला सत्यापन फॉर्म है।

    इसका उद्देश्य मौजूदा रिकॉर्ड की पुष्टि करना और मतदाता सूची को अपडेट करना है।

    SIR-Form-6
    SIR Form 6

    Form 6 क्या है?

    यह चुनाव आयोग का आधिकारिक फॉर्म है, जिसका उपयोग पहली बार मतदाता बनने के लिए किया जाता है।

    यदि आपका नाम कभी मतदाता सूची में नहीं रहा है, तो आपको Form 6 के माध्यम से नए मतदाता के रूप में आवेदन करना होगा।

    BLO घर आए तो क्या करें?

    यदि BLO आपके घर आता है तो—

    • सही जानकारी दें।
    • दस्तावेज उपलब्ध कराएं।
    • सत्यापन फॉर्म ध्यान से भरें।
    • यदि आपका नाम कभी मतदाता सूची में नहीं रहा है तो BLO से नए मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया के बारे में जानकारी लें।

    गलत या अधूरी जानकारी देने से भविष्य में परेशानी हो सकती है।

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    अगर BLO घर नहीं आया तो क्या करें?

    मुंबई जैसे बड़े शहरों में कई बार लोग नौकरी, व्यवसाय या यात्रा के कारण घर पर मौजूद नहीं होते।

    ऐसी स्थिति में—

    • अपने मतदान केंद्र के BLO से संपर्क करें।
    • निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) कार्यालय जाएं।
    • Voters Service Portal पर जानकारी जांचें।
    • आवश्यक होने पर ऑनलाइन आवेदन करें।

    सिर्फ इसलिए कि BLO घर नहीं आया, आपका मतदाता बनने का अधिकार खत्म नहीं होता।

    पहली बार वोटर बनने के लिए किन दस्तावेजों की जरूरत पड़ सकती है?

    आमतौर पर निम्न दस्तावेज मांगे जा सकते हैं—

    • आयु प्रमाण
    • निवास प्रमाण
    • पासपोर्ट आकार का फोटो (यदि आवश्यक हो)
    • मोबाइल नंबर

    दस्तावेजों की अंतिम सूची चुनाव आयोग की वर्तमान गाइडलाइन के अनुसार तय होती है।

    मुंबई के लोगों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

    मुंबई में बड़ी संख्या में लोग किराए के मकानों में रहते हैं या काम के कारण बार-बार पता बदलते हैं। ऐसे लोगों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि—

    • उनका नाम वर्तमान क्षेत्र की मतदाता सूची में है या नहीं।
    • किसी अन्य क्षेत्र में पुराना रिकॉर्ड तो नहीं है।
    • यदि नाम कहीं भी दर्ज नहीं है तो नए मतदाता के रूप में आवेदन करें।

    किन गलतफहमियों से बचना जरूरी है?

    गलतफहमी 1:

    अगर कभी वोट नहीं दिया तो अब नाम नहीं जुड़ सकता।

    सच्चाई: पात्र नागरिक पहली बार मतदाता बन सकते हैं।

    गलतफहमी 2:

    SIR Form ही नया वोटर बनने का फॉर्म है।

    सच्चाई: नए मतदाता के लिए Form 6 का उपयोग किया जाता है।

    गलतफहमी 3:

    30 साल से ज्यादा उम्र हो गई तो वोटर आईडी नहीं बनेगी।

    सच्चाई: उम्र कोई बाधा नहीं है, यदि व्यक्ति पहले पंजीकृत नहीं है।

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    महाराष्ट्र में SIR Verification के दौरान लोगों की सबसे बड़ी चिंता क्या है?

    पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर कई तरह की अधूरी और भ्रामक जानकारियां वायरल हुई हैं। इसके कारण कई लोगों को लग रहा है कि यदि उनके पास पुराना वोटर रिकॉर्ड नहीं है तो उनका नाम नहीं जुड़ पाएगा।

    लेकिन चुनाव आयोग की प्रक्रिया में नए पात्र मतदाताओं को जोड़ने का प्रावधान मौजूद है। इसलिए किसी अफवाह पर भरोसा करने के बजाय केवल आधिकारिक सूचना पर ही भरोसा करना चाहिए।

    महाराष्ट्र और मुंबई में चल रहे SIR Verification अभियान के बीच सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर आपने आज तक कभी वोट नहीं दिया और आपका नाम कभी मतदाता सूची में शामिल नहीं हुआ, तब भी आपके लिए मतदाता बनने का रास्ता खुला है। SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को सही और अद्यतन बनाना है, न कि पात्र नागरिकों को बाहर करना। इसलिए घबराने के बजाय अपने रिकॉर्ड की जांच करें, सही जानकारी दें और जरूरत पड़ने पर नए मतदाता के रूप में आवेदन करें।

    FAQ

    क्या कभी वोट नहीं देने वाले व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट में जुड़ सकता है?

    हाँ। यदि वह पात्र भारतीय नागरिक है और उसका नाम पहले कभी मतदाता सूची में दर्ज नहीं हुआ है।

    क्या 30 या 40 साल की उम्र में पहली बार वोटर बन सकते हैं?

    हाँ। यदि पहले कभी मतदाता पंजीकरण नहीं कराया गया है।

    SIR Verification और Form 6 में क्या अंतर है?

    SIR Verification मतदाता सूची के सत्यापन की प्रक्रिया है, जबकि Form 6 नए मतदाता पंजीकरण के लिए उपयोग किया जाता है।

    अगर BLO घर नहीं आया तो क्या करें?

    आप BLO, ERO कार्यालय या आधिकारिक मतदाता सेवा पोर्टल के माध्यम से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

    क्या ऑनलाइन आवेदन की सुविधा उपलब्ध है?

    हाँ, चुनाव आयोग की आधिकारिक सेवाओं के माध्यम से कई प्रक्रियाएं ऑनलाइन भी उपलब्ध हैं।

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  • मुंबई बीएमसी चुनाव की तारीख़ों का आज ऐलान संभव! महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव पर दोपहर में प्रेस कॉन्फ्रेंस

    मुंबई बीएमसी चुनाव की तारीख़ों का आज ऐलान संभव! महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव पर दोपहर में प्रेस कॉन्फ्रेंस

    महाराष्ट्र में लंबे इंतज़ार के बाद बीएमसी समेत सभी स्थानीय निकाय चुनावों की घोषणा आज होने की संभावना है। राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) ने दोपहर 4 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई है, जिसमें चुनाव की तारीख़ें घोषित की जा सकती हैं।

    मुंबई: 4 नवंबर महाराष्ट्र में लंबे इंतज़ार के बाद बीएमसी (BMC) समेत राज्य के स्थानीय निकाय चुनावों की घोषणा आज होने की संभावना है। राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission – SEC) ने आज दोपहर 4 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई है, जिसमें राज्य निर्वाचन आयुक्त दिनेश वाघमारे औपचारिक रूप से चुनाव कार्यक्रम का ऐलान कर सकते हैं।

    सूत्रों के मुताबिक, घोषणा के तुरंत बाद आचार संहिता (Model Code of Conduct) पूरे राज्य में लागू हो जाएगी।

    🏙️ तीन चरणों में होंगे महाराष्ट्र के निकाय चुनाव

    राज्य निर्वाचन आयोग के सूत्रों के अनुसार, इस बार स्थानीय निकाय चुनाव तीन चरणों में कराए जाने की संभावना है।

    1️⃣ पहला चरण: 246 नगरपालिका परिषदों और 42 नगर पंचायतों के चुनाव होंगे।
    2️⃣ दूसरा चरण: जिल्हा परिषद (Zilla Parishad) और पंचायत समितियों के लिए मतदान होगा।
    3️⃣ अंतिम चरण: बड़े नगर निगमों — मुंबई, पुणे, नागपुर, ठाणे और नासिक के चुनाव होंगे।

    संभावना है कि पहले चरण का मतदान नवंबर के अंत तक कराया जाएगा, यानी चुनावी प्रक्रिया इसी हफ्ते शुरू हो सकती है।

    🏛️ सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार समयसीमा तय

    सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक, जिन निकायों का कार्यकाल पूरा हो चुका है, उनके चुनाव 31 जनवरी 2026 से पहले संपन्न कराना अनिवार्य है।
    इसी वजह से राज्य निर्वाचन आयोग पर समय पर चुनाव कराने का दबाव बढ़ गया है।

    इस चुनावी प्रक्रिया में शामिल होंगे —

    • 289 नगरपालिका परिषदें
    • 32 जिल्हा परिषदें
    • 331 पंचायत समितियाँ
    • 29 नगर निगम (Municipal Corporations)

    यह हाल के वर्षों में महाराष्ट्र का सबसे बड़ा नागरिक चुनाव होगा।

    ⚡ राजनीतिक दलों के लिए लिटमस टेस्ट

    बीएमसी चुनाव हमेशा से महाराष्ट्र की राजनीति का केंद्र रहे हैं।
    इस बार का नतीजा 2026 विधानसभा चुनावों की दिशा तय करने वाला माना जा रहा है।
    राज्य के प्रमुख दल —
    भारतीय जनता पार्टी (BJP), शिवसेना (शिंदे गट), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजीत पवार गट), कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गट) — सभी इस चुनाव को अपनी साख से जोड़कर देख रहे हैं।

    बीएमसी पर फिलहाल प्रशासक का शासन है, और अब चुनावी बिगुल बजते ही मुंबई की सियासत में गर्मी तेज़ होना तय है।

    🕓 चुनाव कार्यक्रम का ऐलान आज शाम

    राज्य निर्वाचन आयुक्त दिनेश वाघमारे आज शाम 4 बजे प्रेस से बातचीत करेंगे।
    सूत्रों के अनुसार, प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद ही चुनावी अधिसूचना जारी की जाएगी और पूरे महाराष्ट्र में चुनावी माहौल बन जाएगा।


    FAQ सेक्शन

    प्रश्न 1: बीएमसी और महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव कब होंगे?
    👉 राज्य निर्वाचन आयोग आज शाम प्रेस कॉन्फ्रेंस में तारीख़ों का ऐलान करेगा।
    प्रश्न 2: कितने चरणों में होंगे चुनाव?
    👉 तीन चरणों में — नगरपालिका परिषद, पंचायत समितियाँ और बड़े नगर निगम (जैसे मुंबई, पुणे, नागपुर)।
    प्रश्न 3: क्या आज से आचार संहिता लागू होगी?
    👉 हाँ, घोषणा के तुरंत बाद आचार संहिता लागू होने की संभावना है।
    प्रश्न 4: कौन से शहर अंतिम चरण में रहेंगे?
    👉 मुंबई, पुणे, नागपुर, ठाणे और नासिक।
    प्रश्न 5: यह चुनाव क्यों महत्वपूर्ण है?
    👉 क्योंकि यह 2026 विधानसभा चुनावों से पहले सभी राजनीतिक दलों के लिए बड़ा टेस्ट साबित होगा।

  • चुनाव आयोग की आज़ादी पर सवाल: लोकतंत्र में ‘फेयर गेम’ की बहस फिर तेज़

    चुनाव आयोग की आज़ादी पर सवाल: लोकतंत्र में ‘फेयर गेम’ की बहस फिर तेज़

    मोदी सरकार और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के टकराव के बीच चुनाव आयोग की भूमिका पर नए सवाल उठ रहे हैं। क्या लोकतंत्र में पारदर्शिता खतरे में है या विपक्ष की सियासत सिर्फ आरोपों का खेल खेल रही है?

    🔹 लोकतंत्र या नियंत्रण?

    देश में लोकतंत्र के नाम पर सत्ता की बढ़ती पकड़ को लेकर बहस एक बार फिर तेज़ हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को दरकिनार करते हुए सरकार द्वारा बनाए गए नए कानूनों ने विपक्ष ही नहीं, बल्कि आम जनता में भी चिंता बढ़ा दी है।
    पहले दिल्ली सरकार के प्रशासनिक अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनी हुई सरकार के पक्ष में फैसला दिया, मगर केंद्र ने संसद में बहुमत के आधार पर नया कानून बनाकर सारे अधिकार उपराज्यपाल को दे दिए। सवाल ये उठता है — क्या यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया है या सत्ता का केंद्रीकरण?

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    🔹 सुप्रीम कोर्ट की बेंच और सरकार का टकराव

    चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने साफ कहा था कि प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश – तीनों मिलकर नियुक्ति करेंगे ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
    लेकिन सरकार ने इस आदेश को बदलते हुए नया कानून पास किया — जिसमें सीजेआई को हटाकर प्रधानमंत्री, उनके नामित मंत्री और नेता प्रतिपक्ष को शामिल किया गया।
    यहां भी बहुमत का समीकरण साफ दिखाई देता है – दो वोट सरकार के पक्ष में और एक विपक्ष का। ऐसे में नियुक्ति का फैसला पहले से तय माना जा रहा है।

    🔹 चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल

    देश के लोकतंत्र का स्तंभ माने जाने वाले चुनाव आयोग पर भी अब गंभीर आरोप लग रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि आयोग अब “स्वतंत्र संस्था” नहीं रह गई, बल्कि “सरकार की सुविधा आयोग” बन चुकी है।
    कई मामलों में आयोग पर वोटर लिस्ट से नाम काटने, फर्जी मतदाता जोड़ने और CCTV फुटेज न देने के आरोप हैं।
    खासकर बिहार में लाखों वोटर लिस्ट से नाम काटे जाने का मामला सुर्खियों में है। विपक्ष का दावा है कि इनमें ज़्यादातर नाम सीमावर्ती मुस्लिम इलाकों के मतदाताओं के हैं।

    🔹 ईवीएम पर फिर उठे सवाल

    वोटिंग मशीन यानी EVM को लेकर भी विवाद फिर से गर्म है। कभी बीजेपी खुद कांग्रेस पर ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप लगाती थी, लेकिन अब विपक्ष बीजेपी पर यही आरोप दोहरा रहा है।
    अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप, एलन मस्क और जापान की तकनीकी कंपनियों ने भी कहा कि कोई भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस पूरी तरह “हैक-प्रूफ” नहीं होती।
    फिर सवाल उठता है — जब मोबाइल, सैटेलाइट और अंतरिक्ष यान को कंट्रोल किया जा सकता है, तो EVM क्यों नहीं?

    🔹 बिहार का वोटर डेटा विवाद

    बिहार में चुनाव आयोग ने SIR सिस्टम लागू कर लगभग 65 लाख वोटरों के नाम हटाए। आयोग का कहना है कि ये नाम डुप्लीकेट या फर्जी थे, जबकि विपक्ष का आरोप है कि यह “टारगेटेड वोट डिलीशन” है।
    कई इलाकों में मृत मतदाताओं के नाम हटाने के बहाने असली मतदाताओं को लिस्ट से बाहर कर दिया गया।
    विपक्षी नेताओं का कहना है कि बिना आधार कार्ड, बिना नागरिकता सत्यापन और बिना जांच के इतने नाम कैसे जोड़े या हटाए जा सकते हैं?

    🔹 संसद में बने विवादित कानून

    सरकार ने संसद से ऐसा कानून पास किया जिसके तहत चुनाव आयोग की किसी भी कार्रवाई को लेकर कोई कोर्ट, चाहे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट, मामला नहीं सुन सकता
    यानी आयोग चाहे जितनी मनमानी करे, उस पर न्यायिक रोक संभव नहीं।
    विपक्ष का कहना है कि यही असली “लोकतंत्र की हत्या” है — जब जनता के पास न्याय की अपील का अधिकार ही नहीं बचेगा।

    🔹 विपक्ष को खत्म करने की साजिश?

    हाल में विपक्षी नेताओं के जेल जाने की घटनाओं ने इस बहस को और हवा दी है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और राज्यसभा सांसद संजय सिंह के खिलाफ कार्रवाई को विपक्ष “राजनीतिक बदला” बता रहा है।
    नए कानून में यह प्रावधान है कि अगर कोई मुख्यमंत्री या मंत्री तीन महीने से ज़्यादा जेल में रहता है, तो उसका पद स्वतः समाप्त माना जाएगा।
    विपक्षी दलों का आरोप है कि इसी का फायदा उठाकर सरकार सत्ता में बैठे विपक्षी मुख्यमंत्रियों को हटाने की साजिश रच रही है।

    🔹 क्या भारत लोकतंत्र से राजतंत्र की ओर?

    राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर यही रफ्तार रही तो भारत में चुनाव सिर्फ “औपचारिक प्रक्रिया” बनकर रह जाएंगे।
    जब सरकार खुद ही चुनाव आयोग, प्रशासन और कानून को नियंत्रित करेगी, तो चुनाव का मतलब क्या बचेगा?
    कई विपक्षी नेताओं ने व्यंग्य में कहा कि “अब तो प्रधानमंत्री अपने उत्तराधिकारी का नाम कागज़ पर लिखेंगे और वही बाद में घोषित हो जाएगा — जैसे किसी संगठन का प्रमुख तय होता है।”

    🧩 जनता का सवाल: भरोसा किस पर करें?

    जनता अब यह सोचने पर मजबूर है कि अगर न्यायपालिका के आदेश, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और विपक्ष की आवाज़ — तीनों पर अंकुश लग जाए, तो लोकतंत्र का अस्तित्व कहाँ बचेगा?
    अब ज़रूरत है कि पारदर्शिता और जवाबदेही को फिर से प्राथमिकता दी जाए। लोकतंत्र सिर्फ चुनाव का नाम नहीं, बल्कि जनता की आस्था और विश्वास का प्रतीक है।


    ❓ FAQ सेक्शन

    Q1. क्या सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के नियम बदले थे?
    हाँ, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नियुक्ति में सीजेआई, प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष शामिल हों।

    Q2. सरकार ने इस आदेश को कैसे बदला?
    सरकार ने संसद में नया कानून पारित कर सीजेआई को हटाकर एक केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया।

    Q3. क्या ईवीएम को हैक किया जा सकता है?
    तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि कोई भी इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम 100% सुरक्षित नहीं होता, इसलिए पारदर्शिता के उपाय ज़रूरी हैं।

    Q4. क्या बिहार में वाकई लाखों वोटर हटाए गए?
    हाँ, SIR सिस्टम के तहत लाखों नाम हटाए गए, जिनमें विपक्ष का दावा है कि बड़ी संख्या मुस्लिम मतदाताओं की है।

    Q5. क्या यह सब लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है?
    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर संस्थाओं की स्वतंत्रता पर दबाव जारी रहा, तो लोकतंत्र का स्वरूप प्रभावित हो सकता है।

  • BMC चुनाव से पहले शिवसेना ने BJP को शर्तों में उलझाया

    BMC चुनाव से पहले शिवसेना ने BJP को शर्तों में उलझाया

    BMC चुनाव से पहले शिवसेना और बीजेपी में गठबंधन को लेकर नई खींचतान शुरू हो गई है। शिवसेना मुंबई में बीजेपी को समर्थन देने के लिए तैयार है, लेकिन बदले में ठाणे और कल्याण-डोंबिवली में भी बीजेपी का समर्थन चाहती है। Before BMC elections, Shiv Sena entangled BJP in conditions

    मंत्रालय प्रतिनिधि
    मुंबई:
    आगामी कुछ ही दिनों में चुनाव आयोग महाराष्ट्र में पार्षदों के चुनाव की अधिसूचना जारी करने वाला है। 6 मई को सुप्रीम कोर्ट ने चार सप्ताह के भीतर चुनाव की तारीख जारी करने के आदेश दिए थे। चुनाव की तैयारियों के बीच महायुति गठबंधन में तोलमोल शुरू हो गए हैं। शिंदे की शिवसेना ने चुनाव से पहले बीजेपी के सामने अपनी शर्तों को रख दिया है। शिवसेना का कहना है कि अगर बीजेपी बृहन्मुंबई महानगर पालिका (BMC) चुनाव में गठबंधन चाहती है, तो उसे ठाणे और कल्याण-डोंबिवली (KDMC) में भी ऐसा ही करना होगा। शिवसेना, भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर दबाव बनाने के लिए उद्धव ठाकरे गुट के पार्षदों को शामिल करा रही है, ताकि गठबंधन नहीं होने की स्थिति में उन्हें चुनाव में उतारा जा सके। Before BMC elections, Shiv Sena entangled BJP in conditions

    शिवसेना की शर्त क्या है?

    महाराष्ट्र निकाय चुनाव में गठबंधन को लेकर सीएम देवेंद्र फडणवीस ने कहा था कि बीजेपी पूरे प्रदेश में गठबंधन नहीं करेगी। इसके जवाब में शिवसेना ने भी अपनी चाल चल दी है और बीएमसी चुनाव के साथ अन्य नगर निगमों के चुनाव में भी गठबंधन का दबाव बना दिया है। शिवसेना के नेताओं ने कहा, कि बीजेपी मुंबई में गठबंधन करना चाहती है तो उसे ठाणे और कल्याण-डोंबिवली में भी शिवसेना का साथ देना होगा। अगर ऐसा हुआ तो बीजेपी बीएमसी की सत्ता में आ सकती है और शिवसेना ठाणे और कल्याण-डोंबिवली में अपना दबदबा बनाए रख सकती है। Before BMC elections, Shiv Sena entangled BJP in conditions

    भाजपा को मुंबई में होगा नुकसान

    शिवसेना नेता ने कहा कि अगर बीजेपी अकेले बीएमसी चुनाव में उतरेगी तो उसे नुकसान होना तय है। मुंबई में बीजेपी उद्धव ठाकरे की सेना यूबीटी के खिलाफ चुनाव लड़ेगी मगर उसे एकनाथ शिंदे की शिवसेना और मनसे के साथ भी दो-दो हाथ करना पड़ेगा। ऐसे में वोट बंट सकते हैं और बीजेपी को बीएमसी की सत्ता हासिल नही हो सकेगी। ऐसे में उसे शिवसेना का समर्थन लेना होगा। शिवसेना नेता ने साफ किया कि बीजेपी मुंबई में दबदबा बनाना चाहती है। वहीं, शिवसेना (शिंदे गुट) ठाणे और कल्याण-डोंबिवली में मजबूत होना चाहती है। इन इलाकों में हमारी पार्टी वहां मजबूत है और हम चाहते हैं कि यह ऐसा ही बना रहे। Before BMC elections, Shiv Sena entangled BJP in conditions

    उद्धव गुट के 45 पार्षद शिंदे गुट में शामिल

    जब एकनाथ शिंदे ने शिवसेना से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई, तो मुंबई के ज्यादा पार्षद उनके साथ नहीं गए। अब बृहन्मुंबई महानगर पालिका का कार्यकाल खत्म हो गया है। एकनाथ शिंदे ने उद्धव गुट के लगभग 45 पार्षदों को अपनी तरफ कर लिया है। शिवसेना की इस रणनीति से बीजेपी पर दबाव बढ़ रहा है। शिंदे बीजेपी को यह जताना चाहते हैं कि अगर वह ठाणे और कल्याण-डोंबिवली में गठबंधन नहीं करती है, तो शिवसेना पुराने पार्षदों को बृहन्मुंबई महानगर पालिका (BMC) चुनाव में उतार सकती है। इस वजह से बीजेपी को नुकसान हो सकता है। Before BMC elections, Shiv Sena entangled BJP in conditions

  • विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान, 5 राज्यों के समीकरण | सेमीफाइनल या रिहर्सल

    विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान, 5 राज्यों के समीकरण | सेमीफाइनल या रिहर्सल

    देश के पांच राज्यों में 7 नवंबर से शुरू होकर 30 नवंबर तक कुल चार चरणों में मतदान होंगे। छत्तीसगढ़ में दो चरणों में, जबकि बाकी राज्यों में एक ही दिन वोट डाले जाएंगे। नतीजे 3 दिसंबर को आएंगे। साल के ये आखिरी चुनाव सेमीफाइनल तो नहीं, लेकिन 2024 के आम चुनाव के लिए रिहर्सल जैसे जरूर हैं।

    वी बी माणिक
    नई दिल्ली
    – देश की राजनीति में सेमीफाइनल मैच का बिगुल बज चुका है। इसके तहत देश के पाँच राज्यो में सभी दलों के रण बाकुरो की टोली ताल ठोकना शुरू कर दिया है। इस चुनावी खेल में कौन पहलवान जीतेगा? कौन हारेगा? ये समय बतायेगा। इस समय जाति गणना की माँग जोरो पर चल रही है। पर अधिकांश नेता अपनी जाति के बारे में कुछ नही बोल रहे है।

    देश में महिलाओ के साथ बलात्कार की घटना में काफी बढ़ोतरी हुई है। जिस पर राज्य सरकारें चुप्पी साध कर बैठी है। सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह समाप्ति की ओर बढ़ती जा रही है। रणबाँकुरों की ओर से टिकट के लिये जोर आजमाइश की जा रही है। चाहे वह कितना बड़ा अपराधी हो, इसको पार्टियां नही देख रही है। जितने दोषी राजनीतिक पार्टियां है उससे ज्यादा दोषी चुनाव आयोग है।

    इसे भी पढ़ें:- Mumbai: महिला पुलिस कांस्टेबल से छेड़छाड़ नाबालिग लड़क गिरफ्तार..

    देश के पांच राज्यों में चुनाव

    मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार से देश की जनता कई माध्यमों सवाल करती आ रही है, कि क्योंकि चुनाव आयोग इस बात की जाँच क्यों नही करता कि जो भी नेता चुनाव लड़ रहा है उस के खिलाफ आपराधिक कितने केस दर्ज है? न्यायालय में कितने में दोषी पाया गया है और कितने केस विचाराधीन है? अगर है तो चुनाव लड़ने के योग्य नही है। चुनाव आयोग एकदम निष्पक्ष नही है क्योंकि चुनाव आयोग से रिटायर्ड होने के बाद ये भी किसी राजनीतिक पार्टी से चुनाव लड़कर या पीछे के रास्ते से लोकसभा-राज्यसभा में पहुँच जाते है। और आजीवन मलाई खाते है।

    चुनाव,
    चुनावी समीकरण को दर्शाती हुई तस्वीर

    पांचो राज्यों में कुल चार चरणों में वोटिंग होगी। सिर्फ छत्तीसगढ़ में दो चरणों में मतदान होंगे बाकी राज्यों में एक ही चरण में वोट डाले जाएंगे। शुरुआत मिजोरम से 7 नवंबर को होगी, जबकि आखिरी चरण में तेलंगाना विधानसभा के लिए 30 नवंबर को वोट डाले जाएंगे – सभी राज्यों में मतगणना 3 नवंबर को होगी।

    अब राजीनीतिक पार्टीयो के पहलवानो मे से ये पहलवान चुनाव जीतने के बाद पाँच वर्ष तक अपने एरिया में अपने चमचो के साथ केवल दहशत पैदा करना। पुलिस थानों को अपनी रखैल बनाकर रखना। दुकानदारों व्यापारियों और अन्य कारोबारियों से अवैध धन उगाही का काम करते है और ठेकेदारों से हर कार्य का कमीशन लेना, सरकारी दफ्तरों में वसूली करना, कर्मचारियों को धमकी देना, यही काम करते है। चुनाव आयोग इसकी जाँच क्यों नही करवाता है? बहुत गरीब वर्ग इन विधायकों द्वारा ठगी के शिकार हुए होते है इस पर कोई कार्रवाई नही होती है। अब देखना है, कि 3 दिसंबर को इस सेमीफाइनल मुकाबले का क्या रिजल्ट आता है।

    चुनाव तारीखों की घोषणा तो अब हुई है, लेकिन राजनीतिक पार्टियां काफी पहले से ही चुनाव कैंपेन शुरू कर चुकी हैं। अब तक का हाल तो यही बता रहा है कि 3 राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई है, जबकि तेलंगाना और मिजोरम में क्षेत्रीय दलों का दबदबा है।

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