मुंबई में फेरीवालों के खिलाफ एक बार फिर सख्त कार्रवाई की तैयारी है। नो-फेरीवाला जोन बनाने की योजना, बुलडोजर कार्रवाई और लाइसेंस के सवाल पर गरीब फेरीवालों का भविष्य फिर संकट में है।
मुंबई: एक बार फिर गरीब फेरीवालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की सुगबुगाहट तेज हो गई है। सूत्रों के मुताबिक, पूरी मुंबई को नो-फेरीवाला जोन बनाने की तैयारी चल रही है। रेलवे स्टेशन इलाकों से अभियान की शुरुआत होगी। सवाल यह है कि जब प्रधानमंत्री से लेकर सरकारें फेरीवालों को सुरक्षा देने की बात करती हैं, तो ज़मीन पर बुलडोजर ही क्यों गरजता है?
🏙️ मुंबई में फेरीवालों की समस्या: पुरानी, लेकिन अनसुलझी
मुंबई में फेरीवालों की समस्या कोई नई नहीं है। दशकों से लाखों लोग फल, सब्ज़ी, कपड़े और रोजमर्रा का सामान बेचकर अपना और अपने परिवार का पेट पालते हैं।
हकीकत यह है कि फेरीवाले शहर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन सबसे ज़्यादा मार भी इन्हीं पर पड़ती है।

🧨 बुलडोजर, तोड़-फोड़ और डर का माहौल
जहां देखो वहीं BMC के तोड़क दस्ते, ट्रॉली तोड़ना, रेहड़ी जब्त करना और सामान फेंक देना—ये सब अब आम बात हो चुकी है।
चुनाव से पहले कार्रवाई रोक दी जाती है और चुनाव खत्म होते ही फिर से अभियान शुरू हो जाता है। गरीब फेरीवालों के लिए यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होता।
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🗳️ चुनाव से पहले राहत, बाद में कार्रवाई
महानगरपालिका चुनाव से पहले फेरीवालों को हटाने के लिए विशेष दस्ते तैनात किए गए थे, लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते कार्रवाई रोक दी गई।
अब चुनाव खत्म होते ही फिर से फेरीवालों को शहर से हटाने की योजना पर काम शुरू हो गया है।
🚉 रेलवे स्टेशन पहले निशाने पर
सूत्रों के अनुसार, अभियान के पहले चरण में
- रेलवे स्टेशन परिसर
- स्टेशन रोड
- प्रमुख जंक्शन
से फेरीवालों को हटाया जाएगा। इसके लिए मनपा की अलग-अलग टीमों को जिम्मेदारी दी जा रही है।
🏢 गुप्त आदेश, गुप्त कार्रवाई
बताया जा रहा है कि
- कार्रवाई की योजना सहायक आयुक्त स्तर तक ही सीमित रहेगी
- किस इलाके में कब कार्रवाई होगी, इसकी जानकारी बाहर नहीं जाएगी
- हर विभाग को अपने स्तर पर प्लान बनाने के निर्देश दिए गए हैं
इसका मकसद यह बताया जा रहा है कि फेरीवालों को पहले से भनक न लगे।
💸 हफ्ता, राजनीति और दोहरा मापदंड
हकीकत यह भी है कि
- कुछ राजनीतिक दलों से जुड़े लोग फेरीवालों से हफ्ता वसूलते हैं
- कई जगह मनपा कर्मी अपने वरिष्ठ अधिकारियों के नाम पर मुफ्त फल-सब्ज़ी लेते हैं
- प्रांतीयता और भाषा के आधार पर भी भेदभाव होता है
इस सिस्टम में सबसे आसान शिकार हमेशा गरीब फेरीवाले ही बनते हैं।
❓ लाइसेंस क्यों नहीं?
सबसे बड़ा सवाल यही है—
अगर सरकार और मनपा चाहें तो फेरीवालों को लाइसेंस देकर “अवैध” शब्द खत्म किया जा सकता है।
लेकिन ऐसा नहीं किया जाता, क्योंकि अवैध रहेंगे तो
- हफ्ता वसूली चलेगी
- दबाव बनाना आसान रहेगा
- तोड़क कार्रवाई का डर बना रहेगा
🏗️ अवैध इमारतें सुरक्षित, गरीब असुरक्षित
मुंबई में हजारों इमारतें ऐसी हैं
- जिनका नक्शा पास नहीं
- जिनके पास NOC नहीं
- जो सरकारी ज़मीन पर बनी हैं
लेकिन उन पर बुलडोजर चलाने की हिम्मत कोई नहीं करता।
वहीं गरीब फेरीवाले पर कार्रवाई सबसे आसान मानी जाती है।
🏚️ झोपड़ी मुक्त आदेश की खुलेआम अवहेलना
आरोप यह भी है कि
- झोपड़ी मुक्त आदेश के बावजूद
- लाखों रुपये के लेन-देन से
- झोपड़ियां और कमर्शियल गाले बनवाए जाते हैं
- और उन्हें संरक्षण दिया जाता है
यह दोहरा रवैया गरीबों के खिलाफ व्यवस्था की सोच को उजागर करता है।
⚖️ नागरिक अधिकारों का सवाल
गरीब फेरीवाले भी भारत के नागरिक हैं।
राज्य का दायित्व लोगों को रुलाना नहीं, बल्कि रोजगार और आय के साधन देना है।
संविधान में दिए गए मौलिक अधिकार सिर्फ कागज़ पर नहीं, ज़मीन पर भी दिखने चाहिए।
❓ FAQ
Q1. क्या पूरी मुंबई को नो-फेरीवाला जोन बनाया जाएगा?
सूत्रों के अनुसार, ऐसी योजना पर काम चल रहा है, हालांकि आधिकारिक घोषणा बाकी है।
Q2. कार्रवाई की शुरुआत कहां से होगी?
पहले चरण में रेलवे स्टेशन और आसपास के इलाकों से फेरीवालों को हटाया जाएगा।
Q3. फेरीवालों को लाइसेंस क्यों नहीं दिया जाता?
आरोप है कि सिस्टम में अवैध स्थिति बनाए रखना कुछ लोगों के लिए फायदेमंद है।
Q4. क्या यह कार्रवाई सभी अवैध निर्माणों पर होगी?
जमीनी हकीकत में कार्रवाई ज़्यादातर गरीब फेरीवालों तक ही सीमित रहती है।
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